
अध्याय ८ — शल्यस्य सत्कारः, वरदानं, पाण्डवसमागमश्च (Śalya’s Reception, the Boon, and Meeting the Pāṇḍavas)
Upa-parva: Śalya–Duryodhana Saṃgama (Alliance Hospitality and Command-Commitment Episode)
Vaiśaṃpāyana describes Śalya’s approach with a large, visually diverse army whose encampment spans a broad measure, emphasizing the scale and pageantry of mobilization. Duryodhana, informed of Śalya’s arrival, personally hastens to honor him and arranges ornate assembly-halls in pleasing locales, staging a sequence of receptions that elevate Śalya’s sense of regard. In this atmosphere of exceptional hospitality, Śalya queries attendants about the makers of these halls; Duryodhana then reveals himself and solicits a boon. Duryodhana requests Śalya to become the overall leader of his forces; Śalya assents, with Gāndhārī repeatedly affirming the commitment. Afterward, Śalya proceeds to Upaplavya, enters the Pāṇḍava camp, and is received according to protocol with offerings and embraces. In dialogue with Yudhiṣṭhira, Śalya recounts the Kaurava encounter and boon. Yudhiṣṭhira then reframes Śalya’s obligation into a strategic-ethical request: in the Karṇa–Arjuna chariot duel, Śalya should serve as Karṇa’s charioteer yet weaken Karṇa’s morale through discouraging speech, enabling a fairer prospect for the Pāṇḍavas. Śalya agrees, promising to speak contrary, confidence-reducing counsel to Karṇa while also consoling Yudhiṣṭhira regarding prior hardships and the inevitability of suffering even among exalted beings.
Chapter Arc: कृष्ण के सारथ्य-स्वीकार की गूँज के बाद कथा का रुख़ सेनाओं की वास्तविक तैयारी और राजधर्म की कसौटी की ओर मुड़ता है—शल्य की विपुल सेना का पड़ाव मानो धरती पर एक नया नगर बसाता है। → शल्य की अक्षौहिणी-सम्पन्न शक्ति, विचित्र कवच-ध्वजों से सुसज्जित शूरवीरों की भीड़, और धृतराष्ट्र-पुत्रों द्वारा रचे गए दुःख का स्मरण—इन सबके बीच युधिष्ठिर के मन में पुराने अपमान (द्यूतसभा, द्रौपदी का दुःख, कर्ण के कटुवचन) फिर से जागते हैं। शल्य की वाणी राजधर्म, लोभ-त्याग और धर्मनिष्ठा की प्रशंसा करते हुए भी युद्ध की अनिवार्यता का संकेत देती है। → शल्य युधिष्ठिर को धैर्य देता है—देवताओं और महापुरुषों तक ने समय-समय पर दुःख भोगे हैं; अतः इस ‘धार्तराष्ट्रकृत’ महान् दुःख का प्रतिकार शत्रु-वध से ही सुख-प्राप्ति का मार्ग बनेगा। साथ ही, भविष्य की निर्णायक माँग का बीज पड़ता है: ‘यदि मेरा प्रिय करना चाहते हो, तो युद्ध में अर्जुन की रक्षा करनी होगी’—यह वाक्य अध्याय के अंतःस्वर को तीखा कर देता है। → युधिष्ठिर के शोक का भार तर्क और धर्म-उपदेश से कुछ हल्का होता है; राजधर्म की दृष्टि से युद्ध को ‘अनिवार्य कर्म’ मानने की भूमि तैयार होती है। शल्य की प्रतिष्ठा—उदार, ब्रह्मण्य, दानी, धर्मपरायण—एक ऐसे सहायक की छवि बनाती है जो आगे निर्णायक भूमिका निभा सकता है। → युद्ध में ‘अकर्तव्य’ प्रतीत होने पर भी अर्जुन-रक्षा का आग्रह—शल्य किस पक्ष में, किस रूप में, और किस मूल्य पर यह प्रतिज्ञा निभाएगा?
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोट्रोगपर्वमें श्रीकृष्णका सारथ्यस्वीकारविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ७ ॥। ऑपन--माजल छा अफ<-जआकऋा-ज अष्टमो>< ध्याय: शल्यका दुर्योधनके सत्कारसे प्रसन्न हो उसे वर देना और युधिष्ठिरसे मिलकर उन्हें आश्वासन देना वैशम्पायन उवाच शल्य: श्रुत्वा तु दूतानां सैन्येन महता वृतः । अभ्ययात् पाण्डवान् राजन् सह पुत्रैर्महारथै:
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! পাণ্ডবদের দূতদের বার্তা শুনে রাজা শল্য, মহাসেনায় পরিবৃত হয়ে, তাঁর মহারথী পুত্রদের সঙ্গে পাণ্ডবদের দিকে অগ্রসর হলেন। দূত-সংবাদে সাড়া দিয়ে এক শক্তিশালী মিত্রের এই যাত্রা আসন্ন যুদ্ধের আনুগত্য-সংকটকে ইঙ্গিত করে।
Verse 2
तस्य सेनानिवेशो5भूदध्यर्थमिव योजनम् । तथा हि विपुलां सेनां बिभर्ति स नरर्षभ:,नरश्रेष्ठ शल्य इतनी अधिक सेनाका भरण-पोषण करते थे कि उसका पड़ाव पड़नेपर आधी योजन भूमि घिर जाती थी
তাঁর সেনাশিবির প্রায় অর্ধ যোজন পর্যন্ত বিস্তৃত হতো; কারণ সেই নরশ্রেষ্ঠ শল্য এত বিপুল সেনাকে ধারণ ও প্রতিপালন করতে সক্ষম ছিলেন। এতে বাহিনীর আকারের সঙ্গে সঙ্গে রসদ-দায়িত্ব বহনের সামর্থ্যও প্রকাশ পায়।
Verse 3
अक्षौहिणीपती राजन् महावीर्यपराक्रम: । विचित्रकवचा: शूरा विचित्रध्वजकार्मुका:
হে রাজন! অক্ষৌহিণীর অধিপতি সেই সেনানায়কেরা মহাবীর্য ও পরাক্রমে সমৃদ্ধ—শূর, বিচিত্র বর্মধারী, এবং নানাবিধ ধ্বজা ও ধনুকে বিভূষিত।
Verse 4
विचित्राभरणा: सर्वे विचित्ररथवाहना: । विचित्रस्रग्धरा: सर्वे विचित्राम्बर भूषणा:
বৈশম্পায়ন বললেন— তারা সকলেই বিচিত্র ও দীপ্তিমান অলংকারে ভূষিত ছিল; তাদের রথ ও বাহন ছিল নানা রকমের, আশ্চর্য ও দৃষ্টিনন্দন। সবার গলায় ছিল বহুবর্ণ মালা, আর সবার বসন ও ভূষণ ছিল অপূর্ব জাঁকজমকে উজ্জ্বল।
Verse 5
स्वदेशवेषाभरणा वीरा: शतसहस्रश: । तस्य सेनाप्रणेतारो बभूवु: क्षत्रियर्षभा:
বৈশম্পায়ন বললেন— নিজ নিজ দেশের পোশাক-পরিচ্ছদ ও অলংকার ধারণ করে লক্ষ লক্ষ বীর সেখানে সমবেত হয়েছিল। সেই সেনাবাহিনীর পরিচালনার জন্য ক্ষত্রিয়দের মধ্যে শ্রেষ্ঠরা তার সেনানায়ক ও নেতা হলেন।
Verse 6
व्यथयन्निव भूतानि कम्पयन्निव मेदिनीम् । शनैर्विश्रामयन् सेनां स ययौ येन पाण्डव:
বৈশম্পায়ন বললেন— রাজা শল্য সেই পথ ধরলেন, যাতে তিনি দ্রুত পাণ্ডব (যুধিষ্ঠির)-এর কাছে পৌঁছাতে পারেন। তাঁর বিশাল সেনাদল অগ্রসর হতে হতে যেন জীবজন্তুকে ব্যথিত করছিল এবং পৃথিবীকেও কাঁপিয়ে তুলছিল; তবু তিনি ধীরে ধীরে এগিয়ে, মাঝে মাঝে সেনাকে থামিয়ে বিশ্রাম দিয়ে যাত্রা করলেন।
Verse 7
ततो दुर्योधन: श्रुत्वा महात्मानं महारथम् । उपायान्तमभिद्रुत्य स्वयमानर्च भारत
তখন, হে ভারতনন্দন! দुर্যোধন মহামনা মহারথী রাজা শল্যের আগমনের সংবাদ শুনে নিজে ত্বরিত হয়ে এগিয়ে গেল এবং পথেই তাঁর সেবা-সত্কার আরম্ভ করল।
Verse 8
कारयामास पूजार्थ तस्य दुर्योधन: सभा: । रमणीयेषु देशेषु रत्नचित्रा: स्वलंकृता:
বৈশম্পায়ন বললেন— তাঁর পূজা-সত্কারের জন্য দুর্যোধন মনোরম স্থানে বহু সভাগৃহ নির্মাণ করাল; সেগুলি রত্নখচিত এবং সর্বতোভাবে সুসজ্জিত ছিল।
Verse 9
शिल्पिभिविविधैश्वैव क्रीडास्तत्र प्रयोजिता: । तत्र वस्त्राणि माल्यानि भक्ष्यं पेयं च सत्कृतम्
সেখানে নানা প্রকার দক্ষ শিল্পীরা ক্রীড়া-বিনোদনের জন্য বিচিত্র স্থান ও উপায় সাজিয়ে রেখেছিল। সেখানে নানা রকম বস্ত্র, মালা, ভোজন-পানীয় এবং অতিথি-সৎকারের অন্যান্য সামগ্রীও যত্নসহকারে সংরক্ষিত ছিল।
Verse 10
कूृपाश्न विविधाकारा मनोहर्षविवर्धना: । वाप्यश्न विविधाकारा औदकानि गृहाणि च
নানারূপ কূপ নির্মিত হয়েছিল, যা হৃদয়ের আনন্দ বৃদ্ধি করত। বিচিত্র আকারের পুকুরও করা হয়েছিল, এবং এমন গৃহও নির্মিত ছিল যেখানে জলের বিশেষ ব্যবস্থা ছিল।
Verse 11
स ता: सभा: समासाद्य पूज्यमानो यथामर: । दुर्योधनस्य सचिवैददेशे देशो समन्ततः,सब ओर विभिन्न स्थानोंमें बने हुए उन सभाभवनोंमें पहुँचकर राजा शल्य दुर्योधनके मन्त्रियोंद्वारा देवताओं-की भाँति पूजित होते थे
সেই সভাগৃহসমূহে পৌঁছে রাজা শল্য দেবতার ন্যায় পূজিত হলেন। দুর্যোধনের মন্ত্রীরা চারদিকে তাঁর জন্য স্থান ও আবাসের ব্যবস্থা নির্ধারণ করে দিল।
Verse 12
आजगाम सभामन्यां देवावसथवर्चसम् | स तत्र विषयैर्युक्त: कल्याणैरतिमानुषै:
তারপর তিনি আরেকটি সভাগৃহে এলেন, যা দেবলোকের আবাসের মতো দীপ্তিময়। সেখানে তা অলৌকিক, মঙ্গলময় ও অতিমানবীয় উৎকৃষ্ট উপকরণে সুসজ্জিত ছিল।
Verse 13
इस तरह (यात्रा करते हुए) शल्य किसी दूसरे सभाभवनमें गये, जो देवमन्दिरोंके समान प्रकाशित होता था। वहाँ उन्हें अलौकिक कल्याणमय भोग प्राप्त हुए ।।
এভাবে শল্য আরেকটি সভাগৃহে প্রবেশ করলেন, যা দেবমন্দিরের মতো দীপ্ত ছিল। সেখানে তাঁকে অলৌকিক, মঙ্গলময় ভোগ্যবস্তু প্রদান করা হল। তখন সেই ক্ষত্রিয়শ্রেষ্ঠ নিজেকে পরম সৌভাগ্যবান মনে করলেন; পুরন্দর ইন্দ্রও তাঁর কাছে তুচ্ছ বলে প্রতীয়মান হল। অতিশয় আনন্দিত হয়ে তিনি সেবকদের জিজ্ঞাসা করলেন—
Verse 14
युधिष्ठिरस्य पुरुषा: केउत्र चक्र: सभा इमा: | आनीयमन्तां सभाकारा: प्रदेयार्हा हि मे मता:,'युधिष्ठिरके किन आदमियोंने ये सभाभवन बनाये हैं। उन सबको बुलाओ। मैं उन्हें पुरस्कार देनेके योग्य मानता हूँ
বৈশম্পায়ন বললেন—“যুধিষ্ঠিরের কোন কোন লোক এখানে এই সভাগৃহ নির্মাণ করেছে? সভানির্মাতাদের আমার সামনে আনা হোক; আমার বিচারে তারা নিশ্চয়ই পুরস্কার পাওয়ার যোগ্য।”
Verse 15
प्रसादमेषां दास्यामि कुन्तीपुत्रो$नुमन्यताम् । दुर्योधनाय तत् सर्व कथयन्ति सम विस्मिता:
“আমি এদের সকলকে আমার প্রসন্নতার নিদর্শনস্বরূপ পুরস্কার দেব; কুন্তীপুত্র যুধিষ্ঠিরেরও আমার এই আচরণ অনুমোদন করা উচিত।” এ কথা শুনে পরিচারকেরা বিস্মিত হয়ে সব কথা দুর্যোধনকে জানাল।
Verse 16
सम्प्रहृष्टो यदा शल्यो दिदित्सुरपि जीवितम् । गूढो दुर्योधनस्तत्र दर्शयामास मातुलम्
যখন আনন্দে উল্লসিত রাজা শল্য উপকারের প্রতিদানে প্রাণ পর্যন্ত দিতে উদ্যত হলেন, তখন সেখানে গোপনে লুকিয়ে থাকা দুর্যোধন মাতুল শল্যের সামনে নিজেকে প্রকাশ করল।
Verse 17
त॑ दृष्टवा मद्रराजश्न ज्ञात्वा यत्नं च तस्य तम् | परिष्वज्याब्रवीत् प्रीत इष्टोडर्थो गृहुतामिति
তাকে দেখে এবং বুঝে যে এই সমস্ত আয়োজন তারই করা, মদ্ররাজ প্রসন্ন হয়ে দুর্যোধনকে বুকে জড়িয়ে বললেন—“তোমার অভীষ্ট প্রার্থনা গ্রহণ; আমার কাছে যা চাও, চেয়ে নাও।”
Verse 18
दुर्योधन उवाच सत्यवाग् भव कल्याण वरो वै मम दीयताम् | सर्वसेनाप्रणेता वै भवान् भवितुमहति
দুর্যোধন বলল—“কল্যাণময় মহামান্য! আপনার বাক্য সত্য হোক; আমাকে অবশ্যই বর দিন। আপনি-ই আমার সমগ্র সেনার নেতা ও অধিনায়ক হওয়ার যোগ্য।”
Verse 19
(यथैव पाण्डवास्तुभ्यं तथैव भवते हाहम् । अनुमान्यं च पाल्यं च भक्त च भज मां विभो ।।
বৈশম্পায়ন বললেন—পাণ্ডবেরা যেমন তোমার প্রিয়, আমিও তেমনই। হে প্রভু! আমি তোমার ভক্ত; তাই তোমার দ্বারা সম্মানিত ও রক্ষিত হওয়ার যোগ্য; অতএব আমাকে আশ্রয় দাও। শল্য বললেন—মহারাজ, হে ভূ-পতি, তুমি যা বলছ তা সত্য। আমি প্রসন্ন হয়ে তোমাকে এই বর দিচ্ছি; এভাবেই হবে। বৈশম্পায়ন বললেন—তখন শল্য বললেন, “হয়ে গেল; আর কী করব?” এ কথা শুনে গান্ধারীপুত্র দুর্যোধন বারবার বলল, “হয়ে গেল—আমার সব কাজই আপনি সম্পন্ন করেছেন,” অর্থাৎ শল্যই তার সেনাপতি হবেন।
Verse 20
शल्य उवाच गच्छ दुर्योधन पुरं स्वकमेव नरर्षभ । अहं गमिष्ये द्रष्ट वै युधिष्ठिरमरिंदमम्
শল্য বললেন—হে নরশ্রেষ্ঠ দুর্যোধন, নিজের ইচ্ছামতো নিজ নগরে যাও। আর আমি শত্রুদমন যুধিষ্ঠিরকে দেখতে অবশ্যই যাব।
Verse 21
शल्य बोले--नरश्रेष्ठ दुर्योधन! अब तुम अपने नगरको जाओ मैं शत्रुदमन युधिष्ठिरसे मिलने जाऊँगा ।।
শল্য বললেন—হে নরশ্রেষ্ঠ দুর্যোধন, এখন তুমি তোমার নগরে যাও। আমি শত্রুদমন যুধিষ্ঠিরের সঙ্গে সাক্ষাৎ করতে যাব। হে নৃপতি, যুধিষ্ঠিরকে দেখে আমি শীঘ্রই ফিরে আসব। সেই পাণ্ডব—পুরুষর্ষভ—অবশ্যই দেখা করা কর্তব্য।
Verse 22
दुर्योधन उवाच क्षिप्रमागम्यतां राजन् पाण्डवं वीक्ष्य पार्थिव । त्वय्यधीना: सम राजेन्द्र वरदानं स्मरस्व न:
দুর্যোধন বলল—হে রাজন, হে পার্থিব, পাণ্ডবকে দেখে ও সাক্ষাৎ করে শীঘ্র ফিরে আসুন। হে রাজেন্দ্র, আমরা সকলেই আপনার অধীন; আপনি যে বর দিয়েছেন, তা স্মরণ রাখুন।
Verse 23
शल्य उवाच क्षिप्रमेष्यामि भद्रं ते गच्छस्व स्वपुरं नूप । परिष्वज्य तथान्योन्यं शल्यदुर्योधनावुभौ
শল্য বললেন—আমি শীঘ্রই ফিরে আসব; তোমার মঙ্গল হোক। হে নৃপ, তুমি তোমার নগরে যাও। এ কথা বলে শল্য ও দুর্যোধন পরস্পরকে আলিঙ্গন করে বিদায় নিল।
Verse 24
स तथा शल्यमामन्त्रय पुनरायात् स्वकं पुरम् । शल्यो जगाम कौन्तेयानाख्यातुं कर्म तस्य तत्
এভাবে শল্যের অনুমতি নিয়ে দুর্যোধন আবার নিজের নগরে ফিরে গেল। আর শল্য, দুর্যোধনের সেই কৃতকর্ম যুধিষ্ঠিরকে জানাতে কুন্তীপুত্রদের কাছে গেলেন—যাতে পাণ্ডবরা তার অভিপ্রায় ও আচরণ স্পষ্টভাবে বুঝতে পারে।
Verse 25
उपप्लव्यं स गत्वा तु स्कन्धावारं प्रविश्य च । पाण्डवानथ तानू सर्वान् शल्यस्तत्र ददर्श ह,विराटनगरके उपप्लव्य नामक प्रदेशमें जाकर वे पाण्डवोंकी छावनीमें पहुँचे और वहीं उन सब पाण्डवोंसे मिले
বিরাটনগরের উপপ্লব্য নামে স্থানে গিয়ে তিনি পাণ্ডবদের শিবিরে প্রবেশ করলেন এবং সেখানে সকল পাণ্ডবকে দেখলেন।
Verse 26
समेत्य च महाबाहु: शल्य: पाण्डुसुतैस्तदा । पाद्यमर्घ्य च गां चैव प्रत्यगृह्नाद् यथाविधि
তখন মহাবাহু শল্য পাণ্ডুপুত্রদের সঙ্গে মিলিত হয়ে বিধিমতো পাদ্য, অর্ঘ্য এবং একটি গাভী গ্রহণ করলেন।
Verse 27
पाण्डुपुत्रोंस मिलकर महाबाहु शल्यने उनके द्वारा विधिपूर्वक दिये हुए पाद्य, अर्घ्ध और गौको ग्रहण किया ।। ततः कुशलपूर्व हि मद्रराजोडरिसूदन: । प्रीत्या परमया युक्त: समाश्शलिष्यद् युधिष्ठिरम्
তারপর অরিসূদন মদ্ররাজ শল্য প্রথমে কুশল-প্রশ্ন করলেন এবং পরম স্নেহে যুধিষ্ঠিরকে আলিঙ্গন করলেন।
Verse 28
तथा भीमार्जुनौ हृष्टौ स्वस्रीयौ च यमावुभौ । तत्पश्चात् शत्रुसूदन मद्रराज शल्यने कुशल-प्रश्नके अनन्तर बड़ी प्रसन्नताके साथ राजा युधिष्ठिरको हृदयसे लगाया। इसी प्रकार उन्होंने हर्षमें भरे हुए दोनों भाई भीमसेन और अर्जुनको तथा अपनी बहिनके दोनों जुड़वे पुत्रों--नकुल-सहदेवको भी गले लगाया ।।
এরপর শত্রুসূদন মদ্ররাজ শল্য আনন্দভরে ভীমসেন ও অর্জুনকে, এবং নিজের ভগিনীর যমজ পুত্র নকুল-সহদেবকেও আলিঙ্গন করলেন। তারপর, হে ভারত, দ্রৌপদী, সুভদ্রা ও অভিমন্যু মহাবাহু শল্যের কাছে এসে করজোড়ে প্রণাম করল। তখন ধর্মাত্মা, উদারচিত্ত যুধিষ্ঠির কৃতাঞ্জলি হয়ে শল্যকে বললেন—“রাজন্, আপনাকে স্বাগতম; এই আসনে উপবেশন করুন।” বৈশম্পায়ন বললেন—তখন শল্য স্বর্ণময় শ্রেষ্ঠ সিংহাসনে বসলেন। সেই সময় পাণ্ডুনন্দন যুধিষ্ঠির সর্বসুখপ্রদ শল্যের কুশল সংবাদ জিজ্ঞাসা করলেন। ধর্মাচারী পাণ্ডবদের পরিবেষ্টিত হয়ে আসনে বসে শল্য তখন পার্থকে এইভাবে বললেন।
Verse 29
कुशलं राजशार्दूल कच्चित् ते कुरुनन्दन । अरण्यवासादू दिष्ट्यासि विमुक्तो जयतां वर
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজশার্দূল, হে কুরু-নন্দন! তুমি কি কুশলে আছ? বিজয়ীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ নৃপতি! সৌভাগ্য যে তুমি অরণ্যবাসের দুঃখ থেকে মুক্ত হয়েছ।
Verse 30
सुदुष्करं कृतं राजन् निर्जने वसता त्वया । भ्रातृभि: सह राजेन्द्र कृष्णया चानया सह,“राजन! तुमने अपने भाइयों तथा इस द्रुपदकुमारी कृष्णाके साथ निर्जन वनमें निवास करके अत्यन्त दुष्कर कार्य किया है
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! নির্জন অরণ্যে বাস করে তুমি অতি দুষ্কর কাজ সম্পন্ন করেছ। হে রাজেন্দ্র! ভ্রাতৃগণের সঙ্গে এবং এই কৃষ্ণা (দ্রৌপদী)-সহ তুমি সেই কষ্ট সহ্য করেছ।
Verse 31
अज्ञातवासं घोरं च वसता दुष्करं कृतम् । दुःखमेव कुत:ः सौख्य॑ भ्रष्टराज्यस्य भारत
বৈশম্পায়ন বললেন—ভয়ংকর অজ্ঞাতবাস পালন করে তোমরা আরও দুষ্কর কাজ সম্পন্ন করেছ। হে ভারত! যে রাজ্যচ্যুত, তার ভাগ্যে দুঃখই; সুখ আসে কোথা থেকে?
Verse 32
दुःखस्यैतस्य महतो धार्तराष्ट्रकृतस्य वै । अवाप्स्यसि सुखं राजन् हत्वा शत्रून् परंतप
বৈশম্পায়ন বললেন—হে পরন্তপ রাজন! ধৃতরাষ্ট্রপুত্রদের দ্বারা প্রদত্ত এই মহাদুঃখের শেষে তুমি শত্রুদের বধ করে সুখ লাভ করবে।
Verse 33
विदितं ते महाराज लोकतनन््त्रं नराधिप । तस्माल्लोभकृतं किंचित् तव तात न विद्यते
বৈশম্পায়ন বললেন—হে মহারাজ, নরাধিপ! লোকতন্ত্র—জগতের শাসন-ব্যবস্থা ও আচরণনীতি—তোমার সুপরিচিত। অতএব, প্রিয়জন, তোমার মধ্যে লোভজাত কিছুই নেই।
Verse 34
“महाराज! नरेश्वर! तुम्हें लोकतन्त्रका सम्यक् ज्ञान है। तात! इसीलिये तुममें लोभजनित कोई भी बर्ताव नहीं है ।।
বৈশম্পায়ন বললেন—মহারাজ, নরেশ্বর! লোকনীতি ও শাসনব্যবস্থার সম্যক জ্ঞান তোমার আছে; তাই, তাত, লোভজাত কোনো আচরণ তোমার মধ্যে নেই। হে ভারত! প্রাচীন রাজর্ষিদের পথ অনুসরণ করো। তাত যুধিষ্ঠির! দান, তপস্যা ও সত্যে সর্বদা নিবিষ্ট থাকো।
Verse 35
क्षमा दमश्न सत्यं च अहिंसा च युधिष्छिर । अद्भुतश्न पुनर्लोकस्त्वयि राजन् प्रतिष्ठित:,“राजा युधिष्ठिर! क्षमा, इन्द्रियसंयम, सत्य, अहिंसा तथा अद्भुत लोक--ये सब तुममें प्रतिष्ठित हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—হে যুধিষ্ঠির, হে রাজন! ক্ষমা, ইন্দ্রিয়সংযম, সত্য ও অহিংসা—এসব তোমার মধ্যে দৃঢ়ভাবে প্রতিষ্ঠিত; আর তদুপরি, এক আশ্চর্য নৈতিক জগৎ যেন তোমার উপরই স্থিত।
Verse 36
मृदुर्वदान्यो ब्रह्मण्यो दाता धर्मपरायण: । धममस्ति विदिता राजन् बहवो लोकसाक्षिका:
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! তুমি মৃদুভাষী, উদার, ব্রাহ্মণভক্ত, দাতা এবং ধর্মপরায়ণ। জগৎ যাদের সাক্ষী—এমন বহু ধর্মকর্তব্য তোমার জানা আছে।
Verse 37
सर्व जगदिदं तात विदितं ते परंतप । दिष्ट्या कृच्छुमिदं राजन् पारितं भरतर्षभ
বৈশম্পায়ন বললেন—তাত! পরন্তপ! এই সমগ্র জগতের তত্ত্ব তোমার জানা। হে রাজন, ভরতশ্রেষ্ঠ! সৌভাগ্য যে তুমি এই কঠিন সংকট অতিক্রম করেছ।
Verse 38
दिष्ट्या पश्यामि राजेन्द्र धर्मात्मानं सहानुगम् । निस्तीर्ण दुष्करं राजंस्त्वां धर्मनिचयं प्रभो
সৌভাগ্যক্রমে, হে রাজেন্দ্র, আমি তোমাকে ধর্মাত্মা রূপে এবং অনুগামীসহ দেখছি। হে রাজন, হে প্রভু! যা অতিক্রম করা দুষ্কর ছিল, তুমি তা পার হয়েছ; তুমি তো ধর্মের ভাণ্ডার। ভ্রাতৃগণের সঙ্গে সেই কঠিন প্রতিজ্ঞা পূর্ণ করে আজ তোমাকে দেখা—এ আমার পরম সৌভাগ্য।
Verse 39
वैशम्पायन उवाच ततो<5स्याक थयद्ू राजा दुर्योधनसमागमम् | तच्च शुश्रूषितं सर्व वरदानं च भारत
বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভারত! তারপর রাজা শল্য দুর্যোধনের সঙ্গে সাক্ষাৎ, তার সেবা-শুশ্রূষা এবং তাকে প্রদত্ত বর—এই সমস্ত বিবরণ তাকে জানালেন।
Verse 40
युधिछिर उवाच सुकृतं ते कृतं राजनू् प्रह्ृष्टेनान्तरात्मना । दुर्योधनस्य यद् वीर त्वया वाचा प्रतिश्रुतम्
যুধিষ্ঠির বললেন—হে বীর রাজন! প্রসন্ন অন্তঃকরণে তুমি দুর্যোধনকে যে সহায়তার প্রতিশ্রুতি দিয়েছ, তা তুমি সৎকর্মই করেছ।
Verse 41
एकं च्विच्छामि भद्र| ते क्रियमाणं महीपते । राजन्नकर्तव्यमपि कर्तुमहसि सत्तम
যুধিষ্ঠির বললেন—হে পৃথিবীপতি, তোমার মঙ্গল হোক। আমি তোমার দ্বারা আমার একটি কাজ করাতে চাই। হে রাজন, সজ্জনশ্রেষ্ঠ! যা সাধারণত করা উচিত নয়, তবু আমার প্রতি দৃষ্টি রেখে তা তোমাকে করতেই হবে।
Verse 42
ममत्ववेक्षया वीर शृणु विज्ञापयामि ते । भवानिह च सारथ्ये वासुदेवसमो युधि
যুধিষ্ঠির বললেন—হে বীর! আমার প্রতি স্নেহদৃষ্টি রেখে শোনো; আমি তোমার কাছে নিবেদন করছি। এই যুদ্ধে সারথ্যকর্মে তুমি বাসুদেব (শ্রীকৃষ্ণ)-সম বলে গণ্য।
Verse 43
कण्णार्जुनाभ्यां सम्प्राप्ते द्वैरथे राजसत्तम । कर्णस्य भवता कार्य सारथ्यं नात्र संशय:
যুধিষ্ঠির বললেন—হে রাজশ্রেষ্ঠ! কর্ণ ও অর্জুনের দ্বৈরথযুদ্ধ উপস্থিত হলে তোমাকেই কর্ণের সারথি হতে হবে—এতে কোনো সন্দেহ নেই।
Verse 44
नूपशिरोमणे! जब कर्ण और अर्जुनके द्वैरथयुद्धका अवसर प्राप्त होगा, उस समय आपको ही कर्णके सारथिका काम करना पड़ेगा; इसमें तनिक भी संशय नहीं है ।।
যুধিষ্ঠির বললেন— হে নৃপশিরোমণি! যখন কর্ণ ও অর্জুনের এক-রথের দ্বন্দ্বযুদ্ধের সময় আসবে, তখন তোমাকেই কর্ণের সারথি হতে হবে— এতে বিন্দুমাত্র সন্দেহ নেই। অতএব, রাজন, যদি তুমি আমার প্রিয় করতে চাও, তবে সেই সময় অর্জুনকে রক্ষা করবে। আর সূতপুত্রের যুদ্ধতেজও সংযত করবে; তাতেই আমাদের জয় হবে।
Verse 45
शल्य उवाच शृणु पाण्डव ते भद्रं यद् ब्रवीषि महात्मन: । तेजोवधनिमित्तं मां सूतपुत्रस्य सड़मे
শল্য বললেন— পাণ্ডব, তোমার মঙ্গল হোক; শোনো। হে মহাত্মা, তুমি যা বলছ তা যথার্থ। যুদ্ধে সূতপুত্র কর্ণের তেজ ও উদ্যম ক্ষীণ করার নিমিত্তে তুমি আমাকে যে অনুরোধ করছ, তা সঙ্গত। স্থির হয়েছে— সেই সংগ্রামে আমি তার সারথি হব; আর কর্ণ তো সারথ্যবিদ্যায় সর্বদা আমাকে বাসুদেবের সমানই মনে করে।
Verse 46
अहं तस्य भविष्यामि संग्रामे सारथिर्धुवम् । वासुदेवेन हि सम॑ नित्यं मां स हि मन्यते
সেই সংগ্রামে আমি নিশ্চয়ই তার সারথি হব; কারণ সে সারথ্যবিদ্যায় আমাকে সর্বদা বাসুদেবের সমান মনে করে।
Verse 47
तस्याहं कुरुशार्दूल प्रतीपमहितं वच: । ध्र॒वं संकथयिष्यामि योद्धुकामस्य संयुगे
হে কুরু-শার্দূল! সে যখন যুদ্ধে লড়তে উদ্গ্রীব হবে, তখন আমি নিশ্চয়ই তার প্রতি প্রতিকূল ও অকল্যাণকর বাক্য বলব।
Verse 48
यथा स हृतदर्पश्न हृततेजाश्न पाण्डव । भविष्यति सुखं हन्तुं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते
হে পাণ্ডব! আমি তোমাকে সত্য বলছি— আমি এমনভাবে বলব যে তার দম্ভ ও তেজ ভেঙে যাবে; তখন যুদ্ধে তাকে সহজেই বধ করা যাবে।
Verse 49
एवमेतत् करिष्यामि यथा तात त्वमात्थ माम् | यच्चान्यदपि शक्ष्यामि तत् करिष्यामि ते प्रियम्
শল্য বললেন—হে প্রিয়! তুমি যেমন আমাকে বলেছ, তেমনই আমি করব। আর যা কিছু আমি আরও করতে সক্ষম হব, তাও তোমার কল্যাণ ও প্রীতির জন্য করব।
Verse 50
यच्च दु:खं त्वया प्राप्तं द्यूते वै कृष्णया सह । परुषाणि च वाक्यानि सूतपुत्रकृतानि वै
আর পাশাখেলায় কৃষ্ণা (দ্রৌপদী)-সহ তোমার যে দুঃখ নেমে এসেছিল, এবং সূতপুত্র (কর্ণ) যে কঠোর বাক্য উচ্চারণ করেছিল—সেসবই স্মরণে আসে।
Verse 51
जटासुरात् परिक्लेश: कीचकाच्च महाद्युते । द्रौपद्याधिगतं सर्व दमयन्त्या यथाशुभम्
শল্য বললেন—হে মহাতেজস্বী! জটাসুরের কারণে এবং কীচকের কারণেও মহাকষ্ট হয়েছিল। দ্রৌপদীর ওপর যে-সব বিপদ নেমে এসেছিল, তা দময়ন্তীর ওপর নেমে আসা অশুভ বিপদেরই সদৃশ।
Verse 52
सर्व दुःखमिदं वीर सुखोदर्क भविष्यति । नात्र मन्युस्त्वया कार्यो विधिहिं बलवत्तर:
হে বীর! এই সমস্ত দুঃখ শেষ পর্যন্ত সুখে পরিণত হবে। অতএব এখানে তোমার ক্রোধ করা উচিত নয়; কারণ বিধিই অধিক বলবান।
Verse 53
महातेजस्वी वीरवर युधिष्ठिर! तुमने द्यूतसभामें द्रौपदीके साथ जो दुःख उठाया है
হে যুধিষ্ঠির! মহাত্মাদেরও দুঃখ ভোগ করতে হয়। হে পৃথিবীপতি! দেবতারাও দুঃখ সহ্য করেছেন। অতএব শোক কোরো না; বিধাতার বিধান অতি প্রবল, আর তোমার দুঃখ কালক্রমে তোমার মঙ্গলে পরিণত হবে।
Verse 54
युधिष्ठिर! महात्मा पुरुष भी समय-समयपर दु:ख पाते हैं। पृथ्वीपते! देवताओंने भी बहुत दुःख उठाये हैं ।।
যুধিষ্ঠির! মহাত্মা পুরুষেরাও সময়ে সময়ে দুঃখ ভোগ করেন। হে পৃথিবীপতি! দেবতারাও বহু দুঃখ সহ্য করেছেন। রাজন, ভারতবংশীয় নৃপ! শোনা যায়, মহামনা দেবরাজ ইন্দ্রও পত্নীসহ মহাদুঃখ অনুভব করেছিলেন।
Verse 443
अकर्तव्यमपि होतत् कर्तुमहसि मातुल । राजन्! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं
মামা! যা করা উচিত নয়, তাও তোমাকে করতে হবে। রাজন! যদি তুমি আমার প্রিয় করতে চাও, তবে সেই যুদ্ধে তোমাকে অর্জুনকে রক্ষা করতে হবে। তোমার কাজ শুধু এটুকুই—কর্ণের উৎসাহ ও আত্মবিশ্বাস বারবার ভেঙে দিতে থাকবে। কর্ণকে এইভাবে দমন করাই আমাদের বিজয় এনে দেবে। মামা! আমার জন্য এই অযোগ্য কাজটিও করে দাও।
The chapter presents a vow-conflict: Śalya’s spoken boon to Duryodhana binds him publicly, yet Yudhiṣṭhira seeks to redirect Śalya’s role so that, while formally serving Karṇa, he mitigates harm by undermining Karṇa’s confidence—testing how truthfulness and obligation interact with higher duties.
Speech-acts and honors create real ethical constraints; therefore, one must be vigilant about commitments formed under social pressure. When obligations collide, the narrative suggests seeking a course that preserves formal duty while reducing unjust outcomes through prudent counsel.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-commentary is implicit in the consolatory reflection that suffering is not unique to the dispossessed and can be endured within a broader moral order, reinforcing resilience and dharma-based resolve.