Adhyaya 69
Udyoga ParvaAdhyaya 6918 Verses

Adhyaya 69

Udyoga-parva Adhyāya 69: Dhṛtarāṣṭra’s Reverential Address to Sañjaya on Vāsudeva

Upa-parva: Sanjaya–Dhritarashtra Dialogue on Vasudeva (Contextual Hymnic Praise Episode)

This chapter presents Dhṛtarāṣṭra’s speech to Sañjaya in which he expresses yearning for those able to behold Vāsudeva nearby, described as radiant and direction-illuminating. The discourse proceeds through a sequence of elevated descriptors: Vāsudeva as the stirring voice and revered speech among the Bhāratas; as the singular hero and leader of the Yādavas; as a disruptor of adversarial confidence and a remover of opponents’ fame; and as a figure whose compassionate, non-cruel speech can ‘bewilder’ or morally disarm Dhṛtarāṣṭra’s party. The language culminates in cosmological identifications—Vāsudeva as ancient seer, ocean of speech, refuge beyond refuges, creator-like principle associated with the ordering of the three worlds, and a supreme shelter invoked through explicit acts of taking refuge (śaraṇa-prapatti). The thematic lesson is the fusion of political anticipation with theological recognition: Kṛṣṇa’s authority is framed as simultaneously rhetorical (ethical speech), strategic (leadership and deterrence), and metaphysical (cosmic ground).

Chapter Arc: धृतराष्ट्र, संजय से पुनः पूछते हैं—‘पुण्डरीकाक्ष’ श्रीकृष्ण के विविध नामों की व्युत्पत्ति और उनका रहस्य मुझे विस्तार से सुनाओ; जिन नामों में स्वयं धर्म का प्रकाश छिपा है, वे कैसे बने? → संजय कहता है कि उसने वासुदेव के शुभ नाम-निर्वचन को सुना है; फिर एक-एक नाम के अर्थ खोलते हुए वह कृष्ण की सर्वव्यापकता, अविनाशिता और लोक-व्यापी सत्ता का संकेत देता है—मानो राजसभा में युद्ध-पूर्व क्षणों में ईश्वर-परिचय का दीपक जल रहा हो। → नामों की व्युत्पत्ति के माध्यम से कृष्ण का ‘सत्य’ से अभिन्न होना उभरता है—‘गोविन्द’ सत्य में प्रतिष्ठित हैं और सत्य उनमें; साथ ही ‘अधोक्षज’, ‘नारायण’, ‘विष्णु’, ‘जिष्णु’ आदि नामों से उनका अजेय, अवनत न होने वाला, और त्रिलोकी-विक्रमी स्वरूप चरम पर पहुँचता है। → संजय नामों के अर्थों को समेटकर यह स्थापित करता है कि ये नाम केवल संबोधन नहीं, बल्कि भगवान् के गुण, कर्म और तत्त्व का संक्षिप्त वेद हैं—जिससे धृतराष्ट्र को कृष्ण-तत्त्व का बोध और आगामी निर्णयों के लिए नैतिक आलोक मिलता है। → कृष्ण के नामों से सत्य और धर्म का मानदण्ड तो स्पष्ट हो गया—अब प्रश्न यह रह जाता है कि धृतराष्ट्र और कौरव उस मानदण्ड के सामने झुकेंगे या उसे अनसुना कर युद्ध की ओर बढ़ेंगे।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माजल बछ। अकाल सप्ततितमो<ध्याय: भगवान्‌ श्रीकृष्णके विभिन्न नामोंकी व्युत्पत्तियोंका कथन धृतराष्ट उवाच भूयो मे पुण्डरीकाक्षं संजयाचक्ष्व पृच्छत: । नामकर्मार्थिवित्‌ तात प्राप्तुयां पुरुषोत्तमम्‌,धृतराष्ट्र बोले--संजय! तुम भगवान्‌ श्रीकृष्णके नाम और कर्मोका अभिप्राय जानते हो, अतः मेरे प्रश्नके अनुसार एक बार पुनः कमलनयन भगवान्‌ श्रीकृष्णका वर्णन करो

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সঞ্জয়, আমার প্রশ্নের উত্তরে আবারও কমলনয়ন ভগবান শ্রীকৃষ্ণের বর্ণনা করো। প্রিয় বৎস, তুমি তাঁর নাম ও কর্মের অন্তর্মর্ম জানো; অতএব বলো—সে পুরুষোত্তমকে কীভাবে লাভ করা যায়।

Verse 2

संजय उवाच श्रुतं मे वासुदेवस्य नामनिर्वचनं शुभम्‌ | यावत्‌ तत्राभिजाने5हमप्रमेयो हि केशव:,संजयने कहा--राजन्‌! मैंने वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके नामोंकी मंगलमयी व्युत्पत्ति सुन रखी है, उसमें जितना मुझे स्मरण है, उतना बता रहा हूँ। वास्तवमें तो भगवान्‌ श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंकी पहुँचसे परे हैं

সঞ্জয় বললেন—রাজন! আমি বসুদেবনন্দন বাসুদেবের নামসমূহের মঙ্গলময় ব্যুৎপত্তি ও তাৎপর্য শুনেছি। যতটা আমার স্মরণে আছে, ততটাই বলছি; কারণ কেশব সত্যই অপরিমেয়—সমস্ত প্রাণীর সম্পূর্ণ বোধের অতীত।

Verse 3

वसनात्‌ सर्वभूतानां वसुत्वाद्‌ देवयोनित: । वासुदेवस्ततो वेद्यो बृहत्त्वाद्‌ विष्णुरुच्यते,भगवान्‌ समस्त प्राणियोंके निवासस्थान हैं तथा वे सब भूतोंमें वास करते हैं, इसलिये “वसु' हैं एवं देवताओंकी उत्पत्तिके स्थान होनेसे और समस्त देवता उनमें वास करते हैं, इसलिये उन्हें 'देव” कहा जाता है। अतएव उनका नाम “वासुदेव” है, ऐसा जानना चाहिये। बृहत्‌ अर्थात्‌ व्यापक होनेके कारण वे ही “विष्णु' कहलाते हैं

সঞ্জয় বললেন—সমস্ত প্রাণীর আশ্রয় তিনি, এবং সকল ভূতে তিনি নিজে বাস করেন—এই কারণে তিনি ‘বসু’। আর দেবতাদের উৎপত্তিস্থান তিনি, এবং সকল দেবতাই তাঁর মধ্যে অধিষ্ঠিত—এই কারণে তিনি ‘দেব’। অতএব তাঁকে ‘বাসুদেব’ নামে জানা উচিত। আর তিনি বृहৎ, সর্বব্যাপী—এই জন্যই তিনি ‘বিষ্ণু’ নামে অভিহিত।

Verse 4

मौनाद्‌ ध्यानाच्च योगाच्च विद्धि भारत माधवम्‌ | सर्वतत्त्वमयत्वाच्च मधुहा मधुसूदन:,भारत! मौन, ध्यान और योगसे उनका बोध अथवा साक्षात्कार होता है; इसलिये आप उन्हें “माधव” समझें। मधु शब्दसे प्रतिपादित पृथ्वी आदि सम्पूर्ण तत्त्वोंके उपादान एवं अधिष्ठान होनेके कारण मधुसूदन श्रीकृष्णको “मधुहा' कहा गया है

সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! মৌন, ধ্যান ও যোগের দ্বারা তাঁর উপলব্ধি হয়; তাই তাঁকে ‘মাধব’ বলে জানো। আর তিনি যেহেতু সর্বতত্ত্বময়, সকল তত্ত্বের আধার—তাই মধুসূদনকে ‘মধুহা’ও বলা হয়।

Verse 5

कृषिर्भूवाचक: शब्दो णश्न निर्वतिवाचक: । विष्णुस्तद्भधावयोगाच्च कृष्णो भवति सात्वत:,“कृष' धातु सत्ता अर्थका वाचक है और “ण” शब्द आनन्द अर्थका बोध कराता है, इन दोनों भावोंसे युक्त होनेके कारण यदुकुलमें अवतीर्ण हुए नित्य आनन्दस्वरूप श्रीविष्णु “कृष्ण” कहलाते हैं

‘কৃষ্’ ধাতু সত্তা/ভূ অর্থবাচক, আর ‘ণ’ শব্দ নির্বৃতি—আনন্দ—বোধক। এই দুই ভাবের সংযোগে, যদুবংশে অবতীর্ণ নিত্য-আনন্দস্বরূপ ভগবান বিষ্ণু ‘কৃষ্ণ’ নামে অভিহিত হন।

Verse 6

पुण्डरीकं परं धाम नित्यमक्षयमव्ययम्‌ । तद्धभावात्‌ पुण्डरीकाक्षो दस्युत्रासाज्जनार्दन:

সঞ্জয় বললেন—‘পুণ্ডরীক’ হলো পরম ধাম—নিত্য, অক্ষয় ও অব্যয়। সেই পরম তত্ত্বে তাঁর প্রতিষ্ঠা থাকার কারণে তিনি ‘পুণ্ডরীকাক্ষ’; আর দস্যুদের ভীত ও দমন করার কারণে তিনি ‘জনার্দন’।

Verse 7

नित्य, अक्षय, अविनाशी एवं परम भगवद्धामका नाम पुण्डरीक है। उसमें स्थित होकर जो अक्षतभावसे विराजते हैं, वे भगवान्‌ 'पुण्डरीकाक्ष' कहलाते हैं। (अथवा पुण्डरीक-- कमलके समान उनके अक्षि--नेत्र हैं, इसलिये उनका नाम पुण्डरीकाक्ष है)। दस्युजनोंको त्रास (अर्दन या पीड़ा) देनेके कारण उनको “जनार्दन” कहते हैं ।। यतः सत्त्वान्न च्यवते यच्च सत्त्वान्न हीयते । सत्त्वतः सात्वतस्तस्मादार्षभाद्‌ वृषभेक्षण:

সঞ্জয় বললেন—তিনি সত্ত্ব (সদ্গুণ) থেকে কখনও বিচ্যুত হন না, আর তাঁর সত্ত্ব কখনও ক্ষয়ও পায় না; তাই তিনি ‘সাত্বত’ নামে খ্যাত। আর ধার্মিকদের মধ্যে তিনি শ্রেষ্ঠ—যেমন গোর দলে বৃষভ—এইজন্য তাঁকে ‘বৃষভেক্ষণ’ (বৃষভ-নয়ন)ও বলা হয়।

Verse 8

वे सत्यसे कभी च्युत नहीं होते और न सत्त्वसे अलग ही होते हैं, इसलिये सद्भावके सम्बन्धसे उनका नाम 'सात्वत” है। आर्ष कहते हैं वेदको, उससे भासित होनेके कारण भगवानका एक नाम “आर्षभ' है। आर्षभके योगसे ही वे “वृषभेक्षण” कहलाते हैं (वृषभका अर्थ है वेद, वही ईक्षण--नेत्रके समान उनका ज्ञापक है; इस व्युत्पत्तिके अनुसार वृषभेक्षण नामकी सिद्धि होती है) ।। न जायते जनित्रायमजस्तस्मादनीकजित्‌ । देवानां स्वप्रकाशत्वाद्‌ दमाद्‌ दामोदरो विभु:,शत्रुसेनाओंपर विजय पानेवाले ये भगवान्‌ श्रीकृष्ण किसी जन्मदाताके द्वारा जन्म ग्रहण नहीं करते हैं, इसलिये “अज” कहलाते हैं। देवता स्वयंप्रकाशरूप होते हैं, अतः उत्कृष्ट रूपसे प्रकाशित होनेके कारण भगवान्‌ श्रीकृष्णको “उदर' कहा गया है और दम (इन्द्रियसंयम) नामक गुणसे सम्पन्न होनेके कारण उनका नाम “दाम” है। इस प्रकार दाम और उदर--इन दोनों शब्दोंके संयोगसे वे 'दामोदर' कहलाते हैं

সঞ্জয় বললেন—শত্রুসেনা-জয়ী, সর্বব্যাপী প্রভু কোনো জনকের দ্বারা জন্মগ্রহণ করেন না; তাই তিনি ‘অজ’ (অজন্মা)। দেবত্ব স্বপ্রকাশ; অতএব পরম প্রকাশিত হওয়ায় তিনি ‘উদর’ নামে কথিত, আর ইন্দ্রিয়সংযম (দম) গুণে তিনি ‘দাম’। ‘দাম’ ও ‘উদর’—এই দুইয়ের যোগে তিনি ‘দামোদর’ নামে প্রসিদ্ধ।

Verse 9

हर्षात्‌ सुखात्‌ सुखैश्वर्याद्धूषीकेशत्वम श्रुते । बाहुभ्यां रोदसी बिश्रन्महाबाहुरिति स्मृतः,वे हर्ष अर्थात्‌ सुखसे युक्त होनेके कारण हृषीक हैं और सुख-ऐश्वर्यसे सम्पन्न होनेके कारण “ईश' कहे गये हैं। इस प्रकार वे भगवान्‌ 'हृषीकेश” नाम धारण करते हैं। अपनी दोनों बाहुओंद्वारा भगवान्‌ इस पृथ्वी और आकाशको धारण करते हैं, इसलिये उनका नाम “महाबाहु' है

সঞ্জয় বললেন—হর্ষ ও সুখে যুক্ত এবং সুখ-ঐশ্বর্যে সমৃদ্ধ হওয়ায় তিনি ‘হৃষীকেশ’ নামে শ্রুত। আর দুই বাহু দিয়ে পৃথিবী ও আকাশ—এই দুই জগতকে ধারণ করেন বলে তিনি ‘মহাবাহু’ নামে স্মৃত।

Verse 10

अधो न क्षीयते जातु यस्मात्‌ तस्मादधोक्षज: । नराणामयनाच्चापि ततो नारायण: स्मृत:,श्रीकृष्ण कभी नीचे गिरकर क्षीण नहीं होते, अतः (“अधो न क्षीयते जातु'--इस व्युत्पत्तिके अनुसार) “अधोक्षज' कहलाते हैं। वे नरों (जीवात्माओं)-के अयन (आश्रय) हैं, इसलिये उन्हें “नारायण” भी कहते हैं

সঞ্জয় বললেন—তিনি কখনও অধঃপতিত হয়ে ক্ষয়প্রাপ্ত হন না; তাই তিনি ‘অধোক্ষজ’ নামে খ্যাত। আর তিনি নরদের (জীবদের) অয়ন—আশ্রয়; তাই তিনি ‘নারায়ণ’ বলেও স্মৃত।

Verse 11

पूरणात्‌ सदनाच्चापि ततो$सौ पुरुषोत्तम: | असतश्न सतश्वैव सर्वस्य प्रभवाप्ययात्‌

সঞ্জয় বললেন—পূর্ণতা ও লয়—উভয়েরও ঊর্ধ্বে সেই পুরুষোত্তম; কারণ অসৎ ও সৎ—উভয়েরই, এবং সমগ্র জগতেরও, উৎপত্তি তাঁর থেকেই এবং লয়ও তাঁর মধ্যেই।

Verse 12

सर्वस्य च सदा ज्ञानात्‌ सर्वमेतं प्रचक्षते । वे सर्वत्र परिपूर्ण हैं तथा सबके निवासस्थान हैं, इसलिये 'पुरुष' हैं और सब पुरुषोंमें उत्तम होनेके कारण उनकी पुरुषोत्तम" संज्ञा है। वे सत्‌ और असत्‌ सबकी उत्पत्ति और लयके स्थान हैं तथा सर्वदा उन सबका ज्ञान रखते हैं; इसलिये उन्हें “सर्व” कहते हैं ।। ११ ६ || सत्ये प्रतिष्ठित: कृष्ण: सत्यमत्र प्रतिष्ठितम्‌

সঞ্জয় বললেন—তিনি সর্বদা সকলের জ্ঞান ধারণ করেন বলেই জ্ঞানীরা তাঁকে ‘সর্ব’ বলেন। কৃষ্ণ সত্যে প্রতিষ্ঠিত, আর সত্যও তাঁর মধ্যেই প্রতিষ্ঠিত।

Verse 13

विष्णुविक्रमणाद्‌ देवो जयनाज्जिष्णुरुच्यते

বিষ্ণুর মহাপদক্ষেপ-পরাক্রমের কারণে তিনি ‘দেব’ নামে অভিহিত; আর যুদ্ধে বিজয়ী হওয়ায় তাঁকে ‘জিষ্ণু’ বলা হয়।

Verse 14

अतत्त्वं कुरुते तत्त्व तेन मोहयते प्रजा:,वे अपनी सत्ता-स्फूर्ति देकर असत्यको भी सत्य-सा कर देते हैं और इस प्रकार सारी प्रजाको मोहमें डाल देते हैं

তিনি অসত্যকেও সত্যের মতো করে তোলেন; আর সেই শক্তিতেই প্রজাকে মোহগ্রস্ত করেন।

Verse 15

एवंविधो धर्मनित्यो भगवान्‌ मधुसूदन: । आगन्ता हि महाबाहुरानृशंस्यार्थमच्युत:,निरन्तर धर्ममें तत्पर रहनेवाले उन भगवान्‌ मधुसूदनका स्वरूप ऐसा ही है। अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले महाबाहु श्रीकृष्ण कौरवोंपर कृपा करनेके लिये यहाँ पधारनेवाले हैं

এইরূপই ধর্মে নিত্যস্থিত ভগবান মধুসূদনের স্বভাব। মহাবাহু অচ্যুত কৌরবদের প্রতি অনুকম্পা প্রদর্শন ও ধর্মরক্ষার জন্য নিশ্চয়ই এখানে আগমন করবেন।

Verse 70

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि संजयवाक्ये सप्ततितमो< ध्याय: ।। ७० || इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें संजयवाक्यविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত যানসন্ধিপর্বে সঞ্জয়বাক্য-বিষয়ক সত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 126

सत्यात्‌ सत्यं तु गोविन्दस्तस्मात्‌ सत्योडपि नामतः । श्रीकृष्ण सत्यमें प्रतिष्ठित हैं और सत्य उनमें प्रतिष्ठित है। वे भगवान्‌ गोविन्द सत्यसे भी उत्कृष्ट सत्य हैं। अतः उनका एक नाम “सत्य” भी है

সঞ্জয় বললেন—গোবিন্দ সাধারণ সত্যেরও অতীত পরম সত্য; তাই তাঁর এক নাম ‘সত্য’। তিনি সত্যে প্রতিষ্ঠিত, আর সত্যও তাঁর মধ্যে প্রতিষ্ঠিত—এইজন্য তিনিই ধর্মবিশ্বাসের মূল আধার।

Verse 136

शाश्वतत्वादनन्तश्न गोविन्दो वेदनाद्‌ गवाम्‌ | विक्रमण (वामनावतारमें तीनों लोकोंको आक्रान्त) करनेके कारण वे भगवान्‌ “विष्णु' कहलाते हैं। वे सबपर विजय पानेसे “जिष्णु', शाश्वत (नित्य) होनेसे 'अनन्त' तथा गौओं (इन्द्रियों)-के ज्ञाता और प्रकाशक होनेके कारण (गां विन्दति) इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'गोविन्द' कहलाते हैं

সঞ্জয় বললেন—চিরন্তন হওয়ায় তিনি ‘অনন্ত’; ‘গো’ অর্থাৎ ইন্দ্রিয়সমূহকে জেনে ও প্রকাশ করে দেন বলে তিনি ‘গোবিন্দ’। বামন অবতারে তিন লোককে পদক্ষেপে আচ্ছাদিত করায় তিনি ‘বিষ্ণু’; আর সকলকে জয় করেন বলে তিনি ‘জিষ্ণু’।

Frequently Asked Questions

The implicit dilemma is whether the Kuru court can remain committed to its current course when confronted with an authority portrayed as both ethically compelling (non-cruel, truth-oriented speech) and strategically decisive.

Legitimate leadership and counsel are depicted as grounded in moral speech and discernment, and the text frames recognition of higher ethical authority as integral to sound political judgment.

No explicit phalaśruti is stated in the provided verses; the chapter’s meta-function is devotional-ethical framing—positioning Vāsudeva as a refuge principle that reorients interpretation of the surrounding political narrative.