
Adhyaya 60: Self-Assertion, Daiva, and the Rhetoric of Inevitability (उद्योग पर्व)
Upa-parva: Sanjaya–Dhritarashtra Dialogue on Power and Daiva (Udyoga-parva, Adhyaya 60 context unit)
Vaiśaṃpāyana narrates a court exchange in which, after hearing paternal words, Dhārtarāṣṭra’s side responds with heightened indignation and a sustained argument about power. The speaker contends that “divine secretaries” (devasacivāḥ) cannot render the Pārthas invulnerable, and reframes the gods as operating without human-like passions (kāma, lobha, dveṣa), implying that divine order will not override the speaker’s resolve. A sequence of hyperbolic claims follows: control over elemental forces, the ability to restrain calamities, command over waters and terrain, and the capacity to secure the realm from threats—presented as public, ‘world-witnessed’ renown rather than mere boasting. The discourse culminates in explicit forecasts of defeating the Pāṇḍavas and their allies (Matsyas, Pāñcālas, Kekayas, Sātyaki, Vāsudeva) and in assertions of superior buddhi, tejas, vīrya, vidyā, and yoga, including mastery comparable to renowned martial teachers. The chapter ends with renewed questioning of Sañjaya, signaling an operational shift from ideological assertion to immediate planning within a time-sensitive crisis.
Chapter Arc: राजसभा के भीतर दुर्योधन अपने ही शब्दों को शस्त्र बनाकर उठता है—वह पिता धृतराष्ट्र के भय को काटने के लिए नहीं, अपने अहं को सिंहासन पर बैठाने के लिए बोलता है: ‘पार्थों को अजेय मानना छोड़िए।’ → वह तर्क नहीं, दर्प का घोष करता है—देवताओं के देवत्व का कारण बताकर (काम, द्वेष, लोभ, क्रोध आदि दोषों से रहित होना) संकेत देता है कि ‘मैं भी वैसा ही अडिग हूँ’; फिर व्यास-नारद-परशुराम की पुरानी कथाओं का स्मरण कराकर अपने पक्ष को ‘धर्म-ज्ञान’ की आड़ देता है। → दुर्योधन की प्रतिज्ञा उग्र शिखर पर पहुँचती है: ‘पृथ्वी फटती हो, पर्वत टूटें—मैं मंत्रबल से थाम दूँ; और जिन्हें मैं द्वेष करता हूँ, उन्हें देव-गन्धर्व-असुर-राक्षस भी नहीं बचा सकते।’ यह आत्मप्रशंसा नहीं, युद्ध-निश्चय का उद्घोष है। → अंत में वह विजय की सूची सुनाता है—पाण्डव, मत्स्य, पाञ्चाल, केकय, सात्यकि और स्वयं वासुदेव तक को ‘मेरे द्वारा जीते हुए’ सुनोगे—और यह भी कि भीष्म-द्रोण-कृप-शल्य-शल जैसे आचार्यों का समस्त अस्त्र-ज्ञान ‘मुझमें’ है; सभा पर उसका आत्मविश्वास भारी पड़ता है। → दुर्योधन के ऐसे वचन सुनकर संजय से फिर प्रश्न किया जाता है—अब आगे कौन-सा उपाय, कौन-सी चाल, और किसका मन बदलेगा?
Verse 1
/ [दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ ३ श*लोक मिलाकर कुल २५ ह “लोक हैं।] #ीी:)#ीीि >> ह््न श्रीशम्ि एकषष्टितमो< ध्याय: दुर्योधनद्वारा आत्मप्रशंसा वैशम्पायन उवाच पितुरेतद् वच: श्रुत्वा धार्तराष्ट्रो 5त्यमर्षण: । आधाय विपुलं क्रोध॑ं पुनरेवेदमब्रवीत्
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! পিতার এই কথা শুনে ধৃতরাষ্ট্রপুত্র দুর্যোধন, যে স্বভাবতই অসহিষ্ণু, অন্তরে প্রবল ক্রোধ ধারণ করে পুনরায় এইভাবে বলল।
Verse 2
अशक्या देवसचिवा: पार्था: स्युरिति यद् भवान् | मन्यते तद् भयं व्येतु भवतो राजसत्तम
রাজশ্রেষ্ঠ! আপনি যদি মনে করেন—‘দেবতারা তাদের সহায়, তাই পার্থদের জয় করা অসম্ভব’—তবে আপনার মনে যে ভয় আছে তা দূর হোক।
Verse 3
अकामद्वेषसंयोगलो भद्रोहाच्च भारत । उपेक्षया च भावानां देवा देवत्वमाप्रुवन्
হে ভারত! কাম (আসক্তি), দ্বেষ, সংযোগ (মমতা-আবদ্ধতা), লোভ ও দ্ৰোহ (শত্রুতাপূর্ণ ক্রোধ) থেকে মুক্ত থাকা এবং কলুষিত ভাবকে উপেক্ষা করার কারণেই দেবতারা দেবত্ব লাভ করেছেন।
Verse 4
इति द्वैपायनो व्यासो नारदश्न महातपा: । जामदग्न्यशक्ष॒ रामो न: कथामकथयत् पुरा,“यह बात पूर्वकालमें द्वैवायन व्यासजी, महातपस्वी नारदजी तथा जमदग्निनन्दन परशुरामजीने हमलोगोंको बतायी थी
এ কথা প্রাচীনকালে দ্বৈপায়ন ব্যাস, মহাতপস্বী নারদ এবং জমদগ্নিনন্দন রাম (পরশুরাম) আমাদের বলেছিলেন।
Verse 5
नैव मानुषवद् देवा: प्रवर्तन्ते कदाचन । कामात् क्रोधात् तथा लोभाद् द्वेषाच्च भरतर्षभ
বৈশম্পায়ন বললেন— হে ভরতশ্রেষ্ঠ! দেবগণ কখনও সাধারণ মানুষের মতো আচরণ করেন না। কাম, ক্রোধ, লোভ কিংবা দ্বেষ থেকে প্রেরিত হয়ে তাঁরা কর্মে প্রবৃত্ত হন না, হে ভরতকুলের বৃষ।
Verse 6
“भरतश्रेष्ठ! देवता मनुष्योंकी भाँति काम, क्रोध, लोभ और द्वेषभावसे किसी कार्यमें प्रवृत्त नहीं होते हैं ।।
বৈশম্পায়ন বললেন— হে ভরতশ্রেষ্ঠ! দেবগণ মানুষের মতো কাম, ক্রোধ, লোভ ও দ্বেষে চালিত হয়ে কর্মে প্রবৃত্ত হন না। কেননা যদি অগ্নি, বায়ু, ধর্ম, ইন্দ্র এবং দুই অশ্বিনী-কুমারও কামনার বশে সর্ব বিষয়ে কর্মে প্রবৃত্ত হতেন, তবে কুন্তীপুত্রেরা (পাণ্ডবেরা) কখনও দুঃখ ভোগ করত না।
Verse 7
तस्मान्न भवता चिन्ता कार्यषा स्यात् कथंचन । दैवेष्वपेक्षका होते शश्वद् भावेषु भारत
অতএব আপনার কোনো প্রকার উদ্বেগ করা উচিত নয়। হে ভারত! দেবগণ সর্বদা শম, সংযম প্রভৃতি দিব্য গুণেরই প্রত্যাশা করেন; কাম-ক্রোধের মতো আসুরিক তাড়নার নয়।
Verse 8
अथ चेत् कामसंयोगाद् द्वेषो लोभश्व लक्ष्यते । देवेषु दैवप्रामाण्यान्नैषां तद् विक्रमिष्यति
তবু যদি কামের সংযোগে দেবতাদের মধ্যেও দ্বেষ ও লোভ দেখা যায়, তবে তাদের সেই শক্তি আমাদের উপর প্রভাব ফেলতে পারবে না; কারণ দেবলোকেও দিব্য তত্ত্বেরই প্রাধান্য।
Verse 9
मयाभिमन्त्रित: शश्वज्जातवेदा: प्रशाम्यति । दिधक्षु: सकलॉल्लोकान् परिक्षिप्प समन्ततः
যদি আমি তাতে অভিমন্ত্রিত করি, তবে জাতবেদা অগ্নি তৎক্ষণাৎ প্রশমিত হবে—যদিও সে চারদিকে ছড়িয়ে পড়ে সমস্ত লোককে দগ্ধ করে ভস্ম করতে উদ্যত হয়ে জ্বলতে থাকে।
Verse 10
यद् वा परमकं तेजो येन युक्ता दिवौकस: । ममाप्यनुपमं भूयो देवेभ्यो विद्धि भारत
বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভারত! দেবতারা যে পরম তেজে বিভূষিত, যদি তেমন কোনো শ্রেষ্ঠ দীপ্তি থাকে, তবে জেনে রেখো—আমারও দেবতাদের থেকেই প্রাপ্ত অতুলনীয় তেজ আছে।
Verse 11
विदीर्यमाणां वसुधां गिरीणां शिखराणि च । लोकस्य पश्यतो राजन् स्थापयाम्यभिमन्त्रणात्
হে রাজন! সকলের চোখের সামনেই বিদীর্ণ হতে থাকা পৃথিবী এবং ভেঙে পড়তে থাকা পর্বতশৃঙ্গগুলিকেও আমি মন্ত্রবল দ্বারা অভিমন্ত্রিত করে পূর্বের মতো স্থির করে দিতে পারি।
Verse 12
चेतनाचेतनस्यास्य जड़मस्थावरस्य च । विनाशाय समुत्पन्नमहं घोर॑ महास्वनम्
এই চেতন-অচেতন, জড় ও স্থাবর জগতের বিনাশের জন্য যে ভয়ংকর, মহাগর্জনময় উপদ্রব উদ্ভূত হয়েছে, সকল প্রাণীর প্রতি করুণা করে আমি তা-ও সকলের চোখের সামনেই এখানেই শান্ত করতে পারি।
Verse 13
अश्मवर्ष च वायुं च शमयामीह नित्यश: । जगत: पश्यतो5भीक्ष्णं भूतानामनुकम्पया
শিলাবৃষ্টি ও প্রবল ঝড়কেও আমি সর্বদা, সকল প্রাণীর প্রতি অনুকম্পা করে, জগতের চোখের সামনেই বারবার এখানেই শান্ত করে দিতে পারি।
Verse 14
स्तम्भितास्वप्सु गच्छन्ति मया रथपदातय: । देवासुराणां भावानामहमेकः: प्रवर्तिता
আমার দ্বারা স্তম্ভিত ও স্থির করা জলের উপর রথ ও পদাতিক সৈন্য চলতে পারে। দেব ও অসুরশক্তির ভাব-প্রবৃত্তি প্রকাশ ও প্রবর্তিত করতে একমাত্র আমিই সক্ষম।
Verse 15
अक्षौहिणीभिर्यान् देशान् यामि कार्येण केनचित् । तत्राश्वा मे प्रवर्तन्ते यत्र यत्राभिकामये
বৈশম্পায়ন বললেন—কোনো উদ্দেশ্যে বহু অক্ষৌহিণী সৈন্যসহ আমি যে যে দেশে যাই, সেখানে সেখানে যেখানে যেখানে আমার ইচ্ছা হয়, আমার অশ্বেরা অবাধ গতিতে ঠিক সেই সব স্থানে বিচরণ করে।
Verse 16
भयानकानि विषये व्यालादीनि न सन्ति मे । मन्त्रगुप्तानि भूतानि न हिंसन्ति भयंकरा:
বৈশম্পায়ন বললেন—আমার রাজ্যে সাপ প্রভৃতি ভয়ংকর ব্যালাদি প্রাণী নেই। আর ভয়ংকর সত্তা থাকলেও, মন্ত্রের দ্বারা সংযত ও রক্ষিত হওয়ায় তারা কারও অনিষ্ট করে না।
Verse 17
“मेरे राज्यमें सर्प आदि भयंकर जीव-जन्तु नही हैं। यदि कोई भयंकर प्राणी हों तो भी वे मेरे मन्त्रोंद्वारा सुरक्षित जीव-जन्तुओंकी कभी हिंसा नहीं करते हैं ।।
বৈশম্পায়ন বললেন—হে মহারাজ, আমার রাজ্যে বসবাসকারী প্রজাদের জন্য মেঘ যথাসময়ে ও পর্যাপ্ত বৃষ্টি বর্ষণ করে। আমার সকল প্রজা ধর্মনিষ্ঠ, এবং আমার রাষ্ট্রে না অনাবৃষ্টি, না অতিবৃষ্টি, না অন্য কোনো উপদ্রব আছে।
Verse 18
अश्विनावथ वाय्वग्नी मरुद्धि: सह वृत्रहा । धर्मश्नैव मया द्विष्टान् नोत्सहन्तेडभिरक्षितुम्
বৈশম্পায়ন বললেন—যাদের প্রতি আমার দ্বেষ স্থির হয়েছে, তাদের রক্ষা করার সাহস অশ্বিনীকুমারদ্বয়ের নেই, নেই বায়ুর, নেই অগ্নির, নেই মরুদ্গণসহ বৃত্রহন্তা ইন্দ্রের; এমনকি ধর্মেরও নেই।
Verse 19
यदि होते समर्था: स्युर्मद्द्विषस्त्रातुमजजसा । न सम त्रयोदश समा: पार्था दुःखमवाप्रुयु:,“यदि ये लोग अनायास ही मेरे शत्रुओंकी रक्षा करनेमें समर्थ होते तो कुन्तीके पुत्र तेरह वर्षोतक कष्ट नहीं भोगते
বৈশম্পায়ন বললেন—যদি এরা অনায়াসে আমার শত্রুদের রক্ষা করতে সক্ষম হতো, তবে কুন্তীপুত্র পার্থরা তেরো বছর ধরে দুঃখ ভোগ করত না।
Verse 20
नैव देवा न गन्धर्वा नासुरा न च राक्षसा: । शक्तास्त्रातुं मया द्विष्टं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते
পিতাজী! আমি আপনাকে সত্যই বলছি—দেবতা, গন্ধর্ব, অসুর কিংবা রাক্ষস—কেউই আমার দ্বারা দ্বিষ্ট শত্রুকে রক্ষা করতে সক্ষম নয়।
Verse 21
यदभिध्याम्यहं शश्वच्छुभं वा यदि वाशुभम् । नैतद् विपन्नपूर्व मे मित्रेष्वरिषु चोभयो:,“मैं अपने मित्रों और शत्रुओं--दोनोंके विषयमें शुभ या अशुभ जैसा भी चिन्तन करता हूँ, वह पहले कभी निष्फल नहीं हुआ है
আমি আমার বন্ধু ও শত্রু—উভয়ের বিষয়ে শুভ বা অশুভ যা-ই নিরন্তর চিন্তা করি, তা আমার ক্ষেত্রে আগে কখনও নিষ্ফল হয়নি।
Verse 22
भविष्यतीदमिति वा यद् ब्रवीमि परंतप । नान्यथा भूतपूर्व च सत्यवागिति मां विदु:
হে শত্রু-সন্তাপক মহারাজ! আমি যখন বলি—‘এটি ঠিক এইভাবেই ঘটবে’—তখন অতীতে তা কখনও অন্যথা হয়নি; তাই লোকেরা আমাকে সত্যভাষী বলে জানে।
Verse 23
लोकसाक्षिकमेतन्मे माहात्म्यं दिक्षु विश्रुतम् । आश्चासनार्थ भवतः प्रोक्ते न श्लाघया नूप
রাজন! আমার এই মাহাত্ম্য সকলের চোখের সামনে; সর্বদিকেই প্রসিদ্ধ। আমি এটি এখানে আপনার আশ্বাসের জন্যই বলেছি, আত্মশ্লাঘার জন্য নয়।
Verse 24
न हाहं “लाघनो राजन् भूतपूर्व: कदाचन । असदाचरितं होतद् यदात्मानं प्रशंसति
মহারাজ! আজ পর্যন্ত আমি কখনও আত্মপ্রশংসা করিনি; কারণ নিজের প্রশংসা করা সজ্জনদের আচরণ নয়।
Verse 25
पाण्डवांश्वैव मत्स्यांश्व पज्चालान् केकयै: सह । सात्यकिं वासुदेवं॑ च श्रोतासि विजितान् मया
বৈশম্পায়ন বললেন— একদিন তুমি শুনবে—আমি পাণ্ডবদের, মৎস্যদেশের যোদ্ধাদের, কেকয়দেরসহ পাঞ্চালদের, এবং সাত্যকি ও বসুদেবনন্দন কৃষ্ণকেও পরাজিত করেছি।
Verse 26
सरित: सागरं प्राप्य यथा नश्यन्ति सर्वश: । तथैव ते विनड्क्ष्यन्ति मामासाद्य सहान्वया:
বৈশম্পায়ন বললেন— যেমন নদীগুলি সাগরে পৌঁছে সম্পূর্ণভাবে স্বতন্ত্র সত্তা হারায়, তেমনি তারাও—আমার কাছে এসে—নিজেদের বংশ-পরিজনসহ বিনষ্ট হবে।
Verse 27
परा बुद्धि: परं तेजो वीर्य च परमं मम । परा विद्या पते योगो मम तेभ्यो विशिष्यते
বৈশম্পায়ন বললেন— আমার বুদ্ধি শ্রেষ্ঠ, আমার তেজ পরম, আর আমার বীর্য সর্বাগ্রে। আমার বিদ্যা উচ্চতর, আমার উদ্যোগ-সংকল্প অতুল; এই সব বিষয়ে আমি তাদের চেয়ে শ্রেষ্ঠ।
Verse 28
पितामहमश्न द्रोणश्न॒ कृप: शल्य: शलस्तथा । अस्त्रेषु यत् प्रजानन्ति सर्व तनन््मयि विद्यते
বৈশম্পায়ন বললেন— পিতামহ ভীষ্ম, দ্রোণ, কৃপ, শল্য এবং শল—অস্ত্রবিদ্যায় যা কিছু জানেন, সেই সমস্ত জ্ঞানই আমার মধ্যে বিদ্যমান।
Verse 29
इत्युक्ते संजयं भूय: पमेर्यपृच्छत भारत: । ज्ञात्वा युयुत्सो: कार्याणि प्राप्तकालमरिंदम
জনমেজয়! দুর্যোধন এ কথা বলার পর, ভরতনন্দন ধৃতরাষ্ট্র যুদ্ধকামী দুর্যোধনের অভিপ্রায় বুঝে, সময়োচিত বিষয় জানার জন্য আবার সংজয়কে প্রশ্ন করলেন।
Verse 61
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि दुर्योधनवाक्ये एकषष्टितमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें दुर्योधनवाक्यविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত যান-সন্ধিপর্বে দুর্যোধনের বক্তব্যবিষয়ক একষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
The tension lies between responsible kingship grounded in counsel and restraint versus governance driven by anger and self-certainty, where claims of inevitability are used to bypass ethical deliberation.
The chapter functions as a cautionary illustration: when agency is inflated and daiva is rhetorically minimized, decision-making can become insulated from corrective feedback, increasing the likelihood of avoidable escalation.
No formal phalaśruti appears in this excerpt; the meta-layer is indirect, conveyed through the narrator’s framing and the contrast between asserted ‘world-witnessed’ greatness and the chapter’s role in accelerating the crisis toward confrontation.