उद्योगपर्व — अध्याय ५४: दुर्योधनस्य धृतराष्ट्रं प्रति बलप्रशंसन-युक्तः आश्वासनवादः
Duryodhana’s Reassurance and Force-Praise to Dhritarashtra
अस्मत्संस्था च पृथिवी वर्तते भरतर्षभ । एकार्था: सुखदु:खेषु समानीताश्च पार्थिवा:,भरतश्रेष्ठ] इस समय यह पृथ्वी हमारे अधिकारमें है। हमने जिन राजाओंको यहाँ बुलाया है, ये सब सुख और दु:खमें भी हमारे साथ एक-सा प्रयोजन रखते हैं--हमारे सुख- दुःखको अपना ही सुख-दुःख मानते हैं
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! এই সময়ে পৃথিবী আমাদের অধিকারেই আছে। আমরা যেসব রাজাকে এখানে আহ্বান করেছি, তারা সকলেই সুখ-দুঃখে আমাদের সঙ্গে এক উদ্দেশ্যে—আমাদের সুখ-দুঃখকেই নিজেদের সুখ-দুঃখ বলে গণ্য করে।
दुर्योधन उवाच