Adhyaya 54
Udyoga ParvaAdhyaya 5473 Verses

Adhyaya 54

उद्योगपर्व — अध्याय ५४: दुर्योधनस्य धृतराष्ट्रं प्रति बलप्रशंसन-युक्तः आश्वासनवादः (Duryodhana’s Reassurance and Force-Praise to Dhritarashtra)

Upa-parva: Udyoga Parva — Court-Counsel and Force-Assessment Episode (Chapter 54 Context)

Chapter 54 presents Duryodhana’s extended address to Dhṛtarāṣṭra in a counsel context. He opens by discouraging fear and portraying the Kuru position as militarily secure. He recalls the Pāṇḍavas’ support network—Kṛṣṇa and allied kings—yet reframes it as insufficient against Kuru stalwarts. The speech enumerates and praises principal commanders (Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, Aśvatthāman, Karṇa, Śalya, Jayadratha, and others), invoking their origins, prowess, and prior feats as deterrent proof. Duryodhana emphasizes numerical advantage (akṣauhiṇī counts) and claims that the opposing side is weakened, politically isolated, and dependent. He also introduces a personal boast centered on mace-combat superiority and the anticipated neutralization of Bhīma, followed by confidence that Arjuna can be contained by multiple chariot-warriors. The chapter closes with Vaiśaṃpāyana’s narration that, after speaking thus, Duryodhana again questions Saṃjaya, indicating ongoing strategic deliberation.

Chapter Arc: धृतराष्ट्र के समक्ष दुर्योधन निर्भयता का आवरण ओढ़कर अपने पक्ष की ‘अपराजेयता’ का घोष करता है—पाण्डवों के वनवास से लेकर आज तक की अपनी ‘नीति’ को विजय-गाथा की तरह सुनाते हुए। → वह स्मरण कराता है कि पाण्डवों को वन में भेजे जाने के समय भी अनेक राजा उनके साथ हो गए थे, फिर भी कौरव-बल की धुरी नहीं डिगी; अब कृष्ण के आगमन को वह ‘कौरव-विनाश की योजना’ बताकर सभा में भय और क्रोध दोनों को उकसाता है, और साथ ही अपने महाबली रक्षकों—भीष्म, द्रोण, कृप, अश्वत्थामा, कर्ण, भूरिश्रवा, शल्य, जयद्रथ आदि—की सूची गिनाकर आत्मविश्वास को हथियार बनाता है। → दुर्योधन का चरम तर्क यह है कि भीष्म को कोई मार ही नहीं सकता—शान्तनु के वरदान का स्मरण कराकर वह भीष्म को ‘अवध्य’ ठहराता है; फिर द्रोण, कृप और अश्वत्थामा की उत्पत्ति-कथाओं और अस्त्र-विद्या का बखान कर कौरव-सेना को देवैरपि सुदुःसह बताता है, मानो कृष्ण की कूटनीति भी इन दीवारों से टकराकर टूट जाएगी। → अध्याय का निष्कर्ष दुर्योधन की मानसिक विजय-घोषणा है: प्रणिपात या पलायन नहीं, प्रतिरोध ही नीति—कृष्ण की शान्ति-यात्रा को वह शत्रु-चाल मानकर युद्ध-तैयारी को ही एकमात्र उत्तर ठहराता है। → कृष्ण की वास्तविक वाणी और धृतराष्ट्र-सभा की प्रतिक्रिया अभी शेष है—क्या यह अहंकार शान्ति को रोक देगा, या किसी क्षण विवेक का द्वार खुलेगा?

Shlokas

Verse 1

अपन बछ। ] अति्शशाड< पञ्चपज्चाशत्तमो< ध्याय: धृतराष्ट्रको हर 2 देते हुए दुर्योधनद्वारा अपने उत्कर्ष और [के अपकर्षका वर्णन दुर्योधन उवाच न भेतव्यं महाराज न शोच्या भवता वयम्‌ | समर्था: सम पराज्जेतुं बलिन: समरे विभो,दुर्योधन बोला--महाराज! आप डरें नहीं; आपके द्वारा हमलोग शोक करनेयोग्य नहीं हैं। प्रभो! हम बलवान्‌ और शक्तिशाली हैं तथा समरभूमिमें शत्रुओंको जीतनेकी शक्ति रखते हैं

দুর্যোধন বলল—মহারাজ, ভয় করবেন না; আমরা আপনার শোকের কারণ নই। প্রভু, আমরা বলবান এবং সমরে শত্রুদের জয় করতে সক্ষম।

Verse 2

वने प्रव्राजितान्‌ पार्थान्‌ यदा55यान्मधुसूदन: । महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना,पाण्डवोंको जब हमने वनमें भेज दिया, उस समय शत्रुओंके राष्ट्रोंकी धूलमें मिला देनेवाले विशाल सैन्यसमूहके साथ श्रीकृष्ण यहाँ आये थे। उनके साथ केकयराजकुमार, धृष्टकेतु, ट्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्म तथा और भी बहुत-से नरेश, जो पाण्डवोंके अनुयायी हैं, यहाँतक पधारे थे

যখন আমরা পৃথাপুত্রদের বনবাসে পাঠিয়েছিলাম, তখন মধুসূদন শ্রীকৃষ্ণ শত্রুরাজ্যকে ধূলিসাৎ করতে সক্ষম এক বিরাট, চক্রাকার সেনাবাহিনীসহ এখানে এসেছিলেন।

Verse 3

केकया धष्टकेतुश्न धृष्द्युम्नश्न॒ पार्षत: । राजानश्षान्वयु: पार्थान्‌ बहवो<न्येडनुयायिन:,पाण्डवोंको जब हमने वनमें भेज दिया, उस समय शत्रुओंके राष्ट्रोंकी धूलमें मिला देनेवाले विशाल सैन्यसमूहके साथ श्रीकृष्ण यहाँ आये थे। उनके साथ केकयराजकुमार, धृष्टकेतु, ट्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्म तथा और भी बहुत-से नरेश, जो पाण्डवोंके अनुयायी हैं, यहाँतक पधारे थे

কেকয় দেশের রাজপুত্রগণ, ধৃষ্টকেতু, পার্ষত (দ্রুপদ)-পুত্র ধৃষ্টদ্যুম্ন এবং পৃথাপুত্রদের অনুসারী আরও বহু রাজা তাদের সঙ্গে যোগ দিয়েছে। আমরা পাণ্ডবদের বনবাসে পাঠানোর সময় শ্রীকৃষ্ণ সেই বিরাট সেনাবাহিনীসহ এসেছিলেন; তাঁর সঙ্গে এই মিত্ররাও উপস্থিত হয়েছিল।

Verse 4

इन्द्रप्रस्थस्य चादूरात्‌ समाजम्मुर्महारथा: । व्यगर्हयंश्ष संगम्य भवन्तं कुरुभि: सह,वे सभी महारथी इन्द्रप्रथथ्के निकटतक आये और परस्पर मिलकर समस्त कौरवोंसहित आपकी निन्दा करने लगे

ইন্দ্রপ্রস্থ থেকে খুব দূরে নয়—সেখানে মহারথীরা সমবেত হল। একত্র হয়ে তারা কৌরবদের সঙ্গে তোমাকেও নিন্দা করতে লাগল।

Verse 5

ते युधिष्ठिरमासीनमजि नै: प्रतिवासितम्‌ | कृष्णप्रधाना: संहत्य पर्युपासन्त भारत,भारत! वे नरेश श्रीकृष्णकी प्रधानतामें संगठित हो वनमें विराजमान मृगचर्मधारी युधिष्ठिरके समीप जाकर बैठे और सगे-सम्बन्धियोंसहित आपका मूलोच्छेद कर डालनेकी इच्छा रखकर कहने लगे--'धृतराष्ट्रके हाथसे राज्यको लौटा लेना ही कर्तव्य है”

হে ভারত! সেই রাজারা শ্রীকৃষ্ণকে প্রধান করে একত্রিত হয়ে, বনে মৃগচর্ম পরিধান করে আসীন যুধিষ্ঠিরের নিকটে গিয়ে বসেছিল। তারপর আত্মীয়স্বজনসহ তোমাকে উপড়ে ফেলবার সংকল্পে তারা বলল—“ধৃতরাষ্ট্রের হাত থেকে রাজ্য ফিরিয়ে নেওয়াই আমাদের কর্তব্য।”

Verse 6

प्रत्यादानं च राज्यस्य कार्यमूचुर्नराधिपा: । भवतः: सानुबन्धस्य समुच्छेदं चिकीर्षव:,भारत! वे नरेश श्रीकृष्णकी प्रधानतामें संगठित हो वनमें विराजमान मृगचर्मधारी युधिष्ठिरके समीप जाकर बैठे और सगे-सम्बन्धियोंसहित आपका मूलोच्छेद कर डालनेकी इच्छा रखकर कहने लगे--'धृतराष्ट्रके हाथसे राज्यको लौटा लेना ही कर्तव्य है”

সেই নৃপতিরা বলল—রাজ্য ফিরিয়ে নেওয়াই যথোচিত কর্ম। আর তোমার অনুগামী-সমর্থকদেরসহ তোমাকে বিনাশ করতে চেয়ে তারা এ কথা উচ্চারণ করল।

Verse 7

श्र॒त्वा चैवं मयोक्तास्तु भीष्मद्रोणकृपास्तदा । ज्ञातिक्षयभयाद्‌ राजन्‌ भीतेन भरतर्षभ

রাজন, ভারতশ্রেষ্ঠ! আমার কথা শুনে ভীষ্ম, দ্রোণ ও কৃপ নিজেদের স্বজনদের বিনাশের আশঙ্কায় ভয়ে আচ্ছন্ন হলেন।

Verse 8

न ते स्थास्यन्ति समये पाण्डवा इति मे मतिः । समुच्छेदं हि नः कृत्स्नं वासुदेवश्चिकीर्षति

আমার মতে পাণ্ডবরা নির্ধারিত সময়-চুক্তিতে স্থির থাকবে না; কারণ বাসুদেব আমাদের সম্পূর্ণ বিনাশ করতে চান।

Verse 9

भरतश्रेष्ठ) उनके इस निश्चयको सुनकर मैंने कुटुम्बीजनोंके वधकी आशंकासे भयभीत हो भीष्म, द्रोण और कृपाचार्यसे इस प्रकार निवेदन किया--“तात! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि पाण्डवलोग अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर नहीं रहेंगे; क्योंकि वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण हम सब लोगोंका पूर्णतः विनाश कर डालना चाहते हैं ।। ऋते च विदुरात्‌ सर्वे यूयं वध्या मता मम । धृतराष्ट्रस्तु धर्मज्ञो न वध्य: कुरुसत्तम:,“केवल विदुरजीको छोड़कर आप सब लोग मार डालनेके योग्य समझे गये हैं, यह बात मुझे मालूम हुई है। कुरुश्रेष्ठ धृतराष्ट्र धर्मज्ञ हैं, यह सोचकर उनका भी वध नहीं किया जायगा

ভারতশ্রেষ্ঠ! তাদের সেই সংকল্প শুনে আমি স্বজনবধের আশঙ্কায় ভীত হয়ে ভীষ্ম, দ্রোণ ও কৃপের কাছে গিয়ে নিবেদন করলাম—“তাত! আমার মনে হয় পাণ্ডবরা তাদের প্রতিজ্ঞায় স্থির থাকবে না; কারণ বসুদেবনন্দন শ্রীকৃষ্ণ আমাদের সকলের সম্পূর্ণ বিনাশ করতে চান। বিদুরকে বাদ দিয়ে আপনাদের সকলকে—যেমন আমি জেনেছি—বধযোগ্য বলে গণ্য করা হয়েছে। কিন্তু ধর্মজ্ঞ কুরুশ্রেষ্ঠ ধৃতরাষ্ট্রকে হত্যা করা উচিত নয়।”

Verse 10

समुच्छेद च कृत्स्नं नः कृत्वा तात जनार्दन: । एकराज्यं कुरूणां सम चिकीर्षति युधिष्ठिरे

তাত! জনার্দন (কৃষ্ণ) আমাদের সম্পূর্ণ বিনাশ করে কুরুদের এক অবিভক্ত রাজ্য যুধিষ্ঠিরের জন্য স্থাপন করতে চান।

Verse 11

“तात! श्रीकृष्ण हमारा सर्वनाश करके कौरवोंका एक राज्य बनाकर उसे युधिष्ठिरको सौंपना चाहते हैं ।। तत्र किं प्राप्तकालं न: प्रणिपात: पलायनम्‌ । प्राणान्‌ वा सम्परित्यज्य प्रतियुध्यामहे परान्‌,'ऐसी अवस्थामें इस समय हमारा कया कर्तव्य है? हम उनके चरणोंपर गिरें, पीठ दिखाकर भाग जायाँ अथवा प्राणोंका मोह छोड़कर शत्रुओंका सामना करें

তাত! শ্রীকৃষ্ণ আমাদের সর্বনাশ করে কৌরবদের একটিমাত্র রাজ্য রেখে সেটিও যুধিষ্ঠিরকে দিতে চান। এমন অবস্থায় এখন আমাদের কর্তব্য কী—তাঁদের পায়ে পড়ে আত্মসমর্পণ করব, পিঠ দেখিয়ে পালাব, না কি প্রাণের মায়া ত্যাগ করে শত্রুর সম্মুখে দাঁড়িয়ে যুদ্ধ করব?

Verse 12

प्रतियुद्धे तु नियत: स्यादस्माकं पराजय: । युधिष्ठिरस्य सर्वे हि पार्थिवा वशवर्तिन:,“उनके साथ युद्ध होनेपर हमारी पराजय निश्चित है; क्योंकि इस समय समस्त भूपाल राजा युधिष्ठिरके अधीन हैं। इस राज्यमें रहनेवाले सब लोग हमसे घृणा करते हैं। हमारे मित्र भी कुपित हो गये हैं। सम्पूर्ण नरेश और आत्मीयजन सभी हमें धिक्कार रहे हैं

যদি প্রকাশ্য যুদ্ধ হয়, তবে আমাদের পরাজয় নিশ্চিত; কারণ এই সময় সকল ভূপাল রাজাই যুধিষ্ঠিরের অধীন।

Verse 13

विरक्तराष्ट्रश्न वयं मित्राणि कुपितानि नः । धिककृताः: पार्थिवै: सर्वे: स्वजनेन च सर्वश:,“उनके साथ युद्ध होनेपर हमारी पराजय निश्चित है; क्योंकि इस समय समस्त भूपाल राजा युधिष्ठिरके अधीन हैं। इस राज्यमें रहनेवाले सब लोग हमसे घृणा करते हैं। हमारे मित्र भी कुपित हो गये हैं। सम्पूर्ण नरेश और आत्मीयजन सभी हमें धिक्कार रहे हैं

রাজ্য আমাদের থেকে বিমুখ হয়েছে; আমাদের মিত্ররা ক্রুদ্ধ; আর সকল রাজা ও নিজ স্বজনও সর্বতোভাবে আমাদের ধিক্কার দিচ্ছে।

Verse 14

प्रणिपाते न दोषो5स्ति सन्धिर्न: शाश्वती: समा: । पितरं त्वेव शोचामि प्रज्ञानेत्र जनाधिपम्‌,(मैं समझता हूँ.) इस समय नतमस्तक हो जानेमें कोई दोष नहीं है। इससे हमलोगोंमें सदाके लिये शान्ति हो जायगी, केवल अपने प्रज्ञाचक्षु पिता महाराज धृतराष्ट्रके लिये ही मुझे शोक हो रहा है

এ সময় নত হয়ে প্রণাম করায় কোনো দোষ নেই; এতে বহু বছর স্থায়ী সন্ধি স্থির হতে পারে। কিন্তু আমি কেবল আমার পিতা—প্রজ্ঞাচক্ষু জনাধিপ ধৃতরাষ্ট্রের জন্যই শোক করি।

Verse 15

मत्कृते दुःखमापन्नं क्लेशं प्राप्तमनन्तकम्‌ । कृतं हि तव पुत्रैश्न परेषामवरो धनम्‌ । मत्प्रियार्थ पुरैवैतद्‌ विदितं ते नरोत्तम

আমার কারণেই আপনি দুঃখে পতিত হয়ে অনন্ত ক্লেশ ভোগ করেছেন। আপনার পুত্রেরা অন্যদের ধন হ্রাস করে নীচে নামিয়েছে। হে নরোত্তম! আমার প্রীতির জন্যই এ সব আদিতেই করা হয়েছিল—এ কথা আপনার পূর্ব থেকেই জানা ছিল।

Verse 16

उन्होंने मेरे लिये अनन्त क्लेश और दुःख सहन किये हैं।' नरश्रेष्ठ पिताजी! आपके पुत्रों तथा मेरे भाइयोंने केवल मेरी प्रसन्नताके लिये शत्रुओंको सदा ही सताया है; ये सब बातें आप पहलेसे ही जानते हैं ।। ते राज्ञो धृतराष्ट्रस्य सामात्यस्य महारथा: । वैरं प्रतिकरिष्यन्ति कुलोच्छेदेन पाण्डवा:,“इसलिये वे महारथी पाण्डव मन्त्रियोंसहित महाराज धृतराष्ट्रके कुलका समूलोच्छेद करके अपने वैरका बदला लेंगे”

আমার জন্যই তারা অনন্ত ক্লেশ ও দুঃখ সহ্য করেছে। হে নরশ্রেষ্ঠ পিতা! আপনার পুত্রেরা—আমার ভ্রাতারা—শুধু আমার প্রীতির জন্য শত্রুদের সর্বদা পীড়িত করেছে; এ সব আপনার পূর্ব থেকেই জানা। অতএব সেই মহারথী পাণ্ডবেরা মন্ত্রীদেরসহ রাজা ধৃতরাষ্ট্রের কুলকে সমূলে উৎখাত করে বৈর প্রতিশোধ নেবে।

Verse 17

ततो द्रोणो<ब्रवीद्‌ भीष्म: कृपो द्रौणिश्न भारत । मत्वा मां महतीं चिन्तामास्थितं व्यथितेन्द्रियम्‌,भारत! मेरी यह बात सुनकर आचार्य द्रोण, पितामह भीष्म, कृपाचार्य तथा अश्व॒त्थामाने मुझे बड़ी भारी चिन्तामें पड़कर सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे व्यथित हुआ जान आश्वासन देते हुए कहा--'परंतप! यदि शत्रुपक्षेके लोग हमसे द्रोह रखते हैं तो तुम्हें डरना नहीं चाहिये। शत्रुलोग युद्धमें उपस्थित होनेपर हमें जीतनेमें असमर्थ हैं

তখন দ্রোণ, ভীষ্ম, কৃপ এবং দ্রোণের পুত্র অশ্বত্থামা—হে ভারত—বললেন। আমাকে গভীর উদ্বেগে নিমগ্ন ও ইন্দ্রিয়সমূহ বিচলিত দেখে তাঁরা সান্ত্বনা দিয়ে বললেন— “পরন্তপ! শত্রুপক্ষের লোকেরা আমাদের প্রতি বিদ্বেষ পোষণ করলেও তুমি ভয় কোরো না। যুদ্ধে সম্মুখে এলে সেই শত্রুরা আমাদের পরাজিত করতে অক্ষম হবে।”

Verse 18

अभिद्र॒ग्धा: परे चेन्नो न भेतव्यं परंतप । असमर्था: परे जेतुमस्मान्‌ युधि समास्थितान्‌,भारत! मेरी यह बात सुनकर आचार्य द्रोण, पितामह भीष्म, कृपाचार्य तथा अश्व॒त्थामाने मुझे बड़ी भारी चिन्तामें पड़कर सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे व्यथित हुआ जान आश्वासन देते हुए कहा--'परंतप! यदि शत्रुपक्षेके लोग हमसे द्रोह रखते हैं तो तुम्हें डरना नहीं चाहिये। शत्रुलोग युद्धमें उपस्थित होनेपर हमें जीतनेमें असमर्थ हैं

দুর্যোধন বলল— “পরন্তপ! প্রতিপক্ষ আমাদের প্রতি বিদ্বেষ পোষণ করলেও তুমি ভয় কোরো না। হে ভারত, যুদ্ধে সারিবদ্ধ হয়ে দাঁড়ালে সেই শত্রুরা আমাদের পরাজিত করতে অক্ষম।”

Verse 19

एकैकश: समर्था: स्मो विजेतु सर्वपार्थिवान्‌ । आगच्छन्तु विनेष्यामो दर्पमेषां शितै: शरै:,“हममेंसे एक-एक वीर भी समस्त राजाओंको जीतनेकी शक्ति रखता है। शत्रुलोग आवें तो सही, हम अपने पैने बाणोंसे उनका घमंड चूर-चूर कर देंगे”

“আমাদের প্রত্যেকে একাই সকল রাজাকে জয় করতে সক্ষম। শত্রুরা আসুক—আমাদের তীক্ষ্ণ বাণে তাদের দম্ভ ধূলিসাৎ করে দেব।”

Verse 20

पुरैकेन हि भीष्मेण विजिता: सर्वपार्थिवा: । मृते पितर्यतिक्रुद्धो रथेनेकेन भारत,भारत! पहलेकी बात है, अपने पिता शान्तनुकी मृत्युके पश्चात्‌ भीष्मजीने किसी समय अत्यन्त क्रोधमें भरकर एकमात्र रथकी सहायतासे अकेले ही सब राजाओंको जीत लिया था

দুর্যোধন বলল— “পূর্বকালে ভীষ্ম একাই সকল রাজাকে জয় করেছিলেন। হে ভারত, পিতার মৃত্যুতে প্রবল ক্রোধে উদ্দীপ্ত হয়ে তিনি একটিমাত্র রথের সহায়তায় তা সম্পন্ন করেছিলেন।”

Verse 21

जघान सुबहूंस्तेषां संरब्ध: कुरुसत्तम: । ततस्ते शरणं जम्मुर्देवव्रतमिमं भयात्‌,रोषमें भरे हुए कुरुश्रेष्ठ भीष्मने जब उनमेंसे बहुत-से राजाओंको मार डाला, तब वे डरके मारे पुनः इन्हीं देवव्रत (भीष्म)-की शरणमें आये

ক্রুদ্ধ হয়ে কুরুশ্রেষ্ঠ ভীষ্ম তাদের মধ্যে বহুজনকে বধ করলেন। তখন সেই রাজারা ভয়ে আবার এই দেবব্রত (ভীষ্ম)-এর শরণে গিয়ে পড়ল।

Verse 22

स भीष्म: सुसमर्थोडयमस्माभि: सहितो रणे । परान्‌ विजेतुं तस्मात्‌ ते व्येतु भीर्भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! वे ही पूर्ण सामर्थ्यशाली भीष्म युद्धमें शत्रुओंको जीतनेके लिये हमारे साथ हैं; अत: आपका भय दूर हो जाना चाहिये

দুর্যোধন বলল—এই ভীষ্ম সম্পূর্ণ সক্ষম, এবং শত্রুদের জয় করতে যুদ্ধে তিনি আমাদের সঙ্গে আছেন। অতএব, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, তোমার ভয় দূর হোক।

Verse 23

इत्येषां निश्चयो ह्वासीत्‌ तत्कालेडमिततेजसाम्‌ । पुरा परेषां पृथिवी कृत्स्ना$$सीद्‌ वशवर्तिनी,इन अमिततेजस्वी भीष्म आदिने उसी समय युद्धमें हमारा साथ देनेका दृढ़ निश्चय कर लिया था। पहले यह सारी पृथ्वी हमारे शत्रुओंके काबूमें थी, किंतु अब हमारे हाथमें आ गयी है। हमारे ये शत्रु अब हमें युद्धमें जीतनेकी शक्ति नहीं रखते। सहायकोंके अभावमें पाण्डव पंख कटे हुए पक्षीके समान असहाय एवं पराक्रमशून्य हो गये हैं

দুর্যোধন বলল—সেই সময়েই অপরিমেয় তেজস্বী সেই বীরেরা (আমাদের পক্ষে থাকার) দৃঢ় সংকল্প করেছিল। পূর্বে এই সমগ্র পৃথিবী আমাদের প্রতিপক্ষের অধীন ছিল; কিন্তু এখন তা আমাদের হাতে এসেছে।

Verse 24

अस्मान्‌ पुनरमी नाद्य समर्था जेतुमाहवे । छिन्नपक्षा: परे हाद्य वीर्यहीनाश्ष पाण्डवा:,इन अमिततेजस्वी भीष्म आदिने उसी समय युद्धमें हमारा साथ देनेका दृढ़ निश्चय कर लिया था। पहले यह सारी पृथ्वी हमारे शत्रुओंके काबूमें थी, किंतु अब हमारे हाथमें आ गयी है। हमारे ये शत्रु अब हमें युद्धमें जीतनेकी शक्ति नहीं रखते। सहायकोंके अभावमें पाण्डव पंख कटे हुए पक्षीके समान असहाय एवं पराक्रमशून्य हो गये हैं

দুর্যোধন বলল—আজ এরা যুদ্ধে আমাদের জয় করতে সক্ষম নয়। পাণ্ডবরা আজ ডানা-কাটা পাখির মতো—সহায়হীন, অসহায় এবং বীর্যশূন্য।

Verse 25

अस्मत्संस्था च पृथिवी वर्तते भरतर्षभ । एकार्था: सुखदु:खेषु समानीताश्च पार्थिवा:,भरतश्रेष्ठ] इस समय यह पृथ्वी हमारे अधिकारमें है। हमने जिन राजाओंको यहाँ बुलाया है, ये सब सुख और दु:खमें भी हमारे साथ एक-सा प्रयोजन रखते हैं--हमारे सुख- दुःखको अपना ही सुख-दुःख मानते हैं

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! এই সময়ে পৃথিবী আমাদের অধিকারেই আছে। আমরা যেসব রাজাকে এখানে আহ্বান করেছি, তারা সকলেই সুখ-দুঃখে আমাদের সঙ্গে এক উদ্দেশ্যে—আমাদের সুখ-দুঃখকেই নিজেদের সুখ-দুঃখ বলে গণ্য করে।

Verse 26

अप्यन्निं प्रविशेयुस्ते समुद्र वा परंतप । मदर्थ पार्थिवा: सर्वे तद्‌ विद्धि कुरुसत्तम,शत्रुओंको संताप देनेवाले कुरुश्रेष्ठ! निश्चित मानिये, ये सब समागत नरेश मेरे लिये जलती आगममें भी प्रवेश कर सकते हैं और समुद्रमें भी कूद सकते हैं

হে পরন্তপ, হে কুরুশ্রেষ্ঠ! নিশ্চিত জেনে রাখো—এই সমাগত সকল রাজা আমার জন্য জ্বলন্ত অগ্নিতেও প্রবেশ করতে পারে এবং সমুদ্রেও ঝাঁপ দিতে পারে।

Verse 27

उन्मत्तमिव चापि त्वां प्रहसन्तीह दुःखितम्‌ | विलपन्तं बहुविधं भीत॑ परविकत्थने,इतनेपर भी आप शत्रुओंकी मिथ्या प्रशंसा सुनकर पागल-से हो उठे हैं और दुःखी एवं भयभीत होकर नाना प्रकारसे विलाप कर रहे हैं। यह सब देखकर ये राजालोग यहाँ हँस रहे हैं

শত্রুদের অতিরঞ্জিত কথা আর ফাঁপা দম্ভ শুনে তুমি যেন উন্মত্তের মতো হয়ে পড়েছ। দুঃখিত ও ভীত হয়ে নানা রকম বিলাপ করতে করতে তোমাকে দেখে এখানে এই রাজারা হাসছে।

Verse 28

एषां होकैकशो राज्ञां समर्थ: पाण्डवान्‌ प्रति । आत्मानं मन्यते सर्वो व्येतु ते भयमागतम्‌,इन राजाओंमेंसे प्रत्येक अपने-आपको पाण्डवोंके साथ युद्ध करनेमें समर्थ मानता है; अत: आपके मनमें जो भय आ गया है, वह निकल जाना चाहिये

এই রাজাদের প্রত্যেকেই একা একা নিজেকে পাণ্ডবদের বিরুদ্ধে যুদ্ধে সক্ষম মনে করে। অতএব তোমার মনে যে ভয় জেগেছে, তা দূর হোক।

Verse 29

जेतुं समग्रां सेनां मे वासवो5पि न शकक्‍्नुयात्‌ । हन्तुक्षय्यरूपेयं ब्रद्म॒णो5पि स्वयम्भुवः

আমার সমগ্র সেনাকে জয় করতে বাসব (ইন্দ্র)ও সক্ষম নন। এই বাহিনী ধ্বংস-স্বভাবের; স্বয়ম্ভূ ব্রহ্মাও একে বিনাশ করতে পারবেন না।

Verse 30

मेरी सम्पूर्ण सेनाको इन्द्र भी नहीं जीत सकते। स्वयम्भू ब्रह्माजी भी इसका नाश नहीं कर सकते ।। युधिष्ठिर: पुरं हित्वा पञ्च ग्रामान्‌ स याचति । भीतो हि मामकात्‌ सैन्यात्‌ प्रभावाच्चैव मे विभो,प्रभो! युधिष्ठिर तो मेरी सेना तथा प्रभावसे इतने डर गये हैं कि राजधानी या नगर लेनेकी बात छोड़कर अब पाँच गाँव माँगने लगे हैं

আমার সমগ্র সেনাকে ইন্দ্রও জয় করতে পারবেন না; স্বয়ম্ভূ ব্রহ্মাও একে ধ্বংস করতে পারবেন না। প্রভু! যুধিষ্ঠির আমার সেনা ও আমার প্রভাবের ভয়ে নগর দাবি ত্যাগ করে এখন মাত্র পাঁচটি গ্রাম ভিক্ষা চাইছে।

Verse 31

समर्थ मन्यसे यच्च कुन्तीपुत्रं वृकोदरम्‌ । तन्मिथ्या न हि मे कृत्स्नं प्रभावं वेत्सि भारत,भारत! आप जो कुन्तीकुमार भीमको बहुत शक्तिशाली मान रहे हैं, वह भी मिथ्या ही है; क्योंकि आप मेरे प्रभावको पूर्णरूपसे नहीं जानते हैं

হে ভারত! তুমি যে কুন্তীপুত্র বৃকোদর (ভীম)কে অত্যন্ত শক্তিমান মনে কর, তা ভুল; কারণ তুমি আমার প্রভাবের সম্পূর্ণ পরিমাপ জানো না।

Verse 32

मत्समो हि गदायुद्धे पृथिव्यां नास्ति कश्नन । नासीत्‌ ककश्चिदतिक्रान्तो भविता न च कश्नन,गदायुद्धमें मेरी समानता करनेवाला इस पृथ्वीपर न तो कोई है, न भूतकालमें कोई हुआ था और न भविष्यमें ही कोई होगा

গদাযুদ্ধে এই পৃথিবীতে আমার সমান কেউ নেই; অতীতে কেউ আমাকে অতিক্রম করেনি, ভবিষ্যতেও কেউ করবে না।

Verse 33

युक्तो दुःखोषितश्चाहं विद्यापारगतस्तथा । तस्मान्न भीमान्नान्येभ्यो भयं मे विद्यते क्वचित्‌,गदायुद्धका मेरा अभ्यास बहुत अच्छा है। मैंने गुरुके समीप क्लेशसहनपूर्वक रहकर अस्त्रविद्या सीखी है और उसमें मैं पारंगत हो गया हूँ। अत: भीमसेनसे या दूसरे योद्धाओंसे मुझे कभी कोई भय नहीं है

গদাযুদ্ধে আমার সাধনা উৎকৃষ্ট। গুরুর সান্নিধ্যে কষ্ট সহ্য করে আমি অস্ত্রবিদ্যা শিখেছি এবং তাতে পারদর্শী হয়েছি; অতএব ভীমসেন বা অন্য কোনো যোদ্ধার প্রতি আমার কখনো ভয় নেই।

Verse 34

दुर्योधनसमो नास्ति गदायामिति निश्चय: । संकर्षणस्य भद्रें ते यत्‌ तदैेनमुपावसम्‌,आपका कल्याण हो। बलरामजीका भी यही निश्चय है कि गदायुद्धमें दुर्योधनके समान दूसरा कोई नहीं है। यह बात उन्होंने उस समय कही थी, जब मैं उनके पास रहकर गदाकी शिक्षा ले रहा था

আপনার মঙ্গল হোক। সংকর্ষণ (বলরাম)-এরও এই স্থির বিশ্বাস—গদাযুদ্ধে দুর্যোধনের সমান আর কেউ নেই। আমি যখন তাঁর কাছে থেকে গদার শিক্ষা নিচ্ছিলাম, তখনই তিনি এ কথা বলেছিলেন।

Verse 35

युद्धे संकर्षणसमो बलेनाभ्यधिको भुवि । गदाप्रहारं भीमो मे न जातु विषहेद्‌ युधि,मैं युद्धमें बलरामजीके समान हूँ और बलमें इस भूतलपर सबसे बढ़कर हूँ। युद्धमें भीमसेन मेरी गदाका प्रहार कभी नहीं सह सकते

যুদ্ধে আমি সংকর্ষণ (বলরাম)-এর সমান, আর বলের দিক থেকে এই ভূতলে আমি সর্বশ্রেষ্ঠ। রণে ভীমসেন কখনোই আমার গদার আঘাত সহ্য করতে পারবে না।

Verse 36

एकं प्रहारं यं दद्यां भीमाय रुषितो नृप । स एवैनं नयेद्‌ घोर: क्षिप्रं वैवस्वतक्षयम्‌,महाराज! मैं रोषमें भरकर भीमसेनपर गदाका जो एक बार प्रहार करूँगा, वह अत्यन्त भयंकर एक ही आघात उन्हें शीघ्र ही यमलोक पहुँचा देगा

মহারাজ! আমি যদি ক্রোধে ভরে ভীমসেনের উপর গদার একটিমাত্র আঘাত করি, তবে সেই এক ভয়ংকর আঘাতই তাকে দ্রুত বৈবস্বত (যম)-এর ধামে পৌঁছে দেবে।

Verse 37

इच्छेयं च गदाहस्तं राजन द्रष्टं वृकोदरम्‌ । सुचिरं प्रार्थितो होष मम नित्यं मनोरथ:

দুর্যোধন বলল—হে রাজন, গদা হাতে বৃকোদরকে আমি দেখতে চাই। বহুদিন ধরে এটাই আমার নিত্য মনোরথ—যা আমি অন্তরে সর্বদা প্রার্থনা করে লালন করেছি॥

Verse 38

राजन! मैं चाहता हूँ कि युद्धमें गदा हाथमें लिये हुए भीमसेनको अपने सामने देखूँ। मैंने दीर्घकालसे अपने मनमें सदा इसी मनोरथके सिद्ध होनेकी इच्छा रखी है ।। गदया निहतो हाजौ मया पार्थो वृकोदर: । विशीर्णगात्र: पृथिवीं परासु: प्रपतिष्यति,युद्धमें मेरी गदासे आहत हुए कुन्तीपुत्र भीमसेनका शरीर छिन्न-भिन्न हो जायगा और वे प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर पड़ जायँगे

দুর্যোধন বলল—হে রাজন, যুদ্ধে গদা হাতে ভীমসেন—বৃকোদর—কে আমি আমার সম্মুখে দাঁড়ানো দেখতে চাই। বহুদিন ধরে এই একটিই মনোরথ আমি অন্তরে লালন করেছি, তার সিদ্ধির অপেক্ষায়। আজ আমার গদার আঘাতে সেই পৃথাপুত্র বৃকোদর অঙ্গভঙ্গ হয়ে, প্রাণশূন্য হয়ে, ভূমিতে লুটিয়ে পড়বে॥

Verse 39

गदाप्रहाराभिहतो हिमवानपि पर्वत: । सकृन्मया विदीर्येत गिरि: शतसहस्रधा,यदि मैं एक बार अपनी गदाका आघात कर दूँ तो हिमालय पर्वत भी लाखों टुकड़ोंमें विदीर्ण हो जायगा

দুর্যোধন বলল—গদার আঘাতে আহত হলে হিমালয় পর্বতও, আমি একবার আঘাত করলেই, লক্ষ লক্ষ খণ্ডে বিদীর্ণ হয়ে যাবে॥

Verse 40

स चाप्येतद्‌ विजानाति वासुदेवार्जुनौ तथा । दुर्योधनसमो नास्ति गदायामिति निश्चय:,भीमसेन भी इस बातको जानते हैं। श्रीकृष्ण और अर्जुनको भी यह ज्ञात है। यह निश्चित है कि गदायुद्धमें दुर्योधनके समान दूसरा कोई नहीं है

দুর্যোধন বলল—এ কথা বৃকোদরও জানে, আর বাসুদেব ও অর্জুনও জানেন। আমার স্থির বিশ্বাস—গদাযুদ্ধে দুর্যোধনের সমান আর কেউ নেই॥

Verse 41

तत्‌ ते वृकोदरमयं भयं व्येतु महाहवे । व्यपनेष्याम्यहं होनं मा राजन्‌ विमना भव,अतः राजन! भीमसेनसे जो आपको भय हो रहा है, वह दूर हो जाना चाहिये। मैं महायुद्धमें उन्हें मार गिराऊँगा। इसलिये आप मनमें खेद न करें

দুর্যোধন বলল—হে রাজন, মহাযুদ্ধে বৃকোদরকে কেন্দ্র করে যে ভয় আপনার মনে উঠেছে, তা দূর হোক। আমি তা সম্পূর্ণরূপে অপসারিত করব; হে রাজন, মন বিষণ্ণ করবেন না॥

Verse 42

तस्मिन्‌ मया हते क्षिप्रमर्जुनं बहवो रथा: । तुल्यरूपा विशिष्ट श्ष क्षेप्स्पन्ति भरतर्षभ,भरतमश्रेष्ठ! मेरे द्वारा भीमसेनके मारे जानेपर (हमारे पक्षके) बहुत-से रथी जो अर्जुनके समान या उनसे भी बढ़कर हैं, उनके ऊपर शीतघ्रतापूर्वक बाणोंकी वर्षा करने लगेंगे

দুর্যোধন বলল—“আমি যখন তাকে দ্রুত বধ করব, তখন আমাদের পক্ষের বহু মহারথী—যারা পরাক্রমে অর্জুনের সমান বা তার থেকেও শ্রেষ্ঠ—হে ভরতশ্রেষ্ঠ, তৎক্ষণাৎ অর্জুনের উপর বাণবৃষ্টি বর্ষণ করবে।”

Verse 43

भीष्मो द्रोण: कृपो द्रौणि: कर्णो भूरिश्रवास्तथा । प्राग्ज्योतिषाधिप: शल्य: सिन्धुराजो जयद्रथ:

দুর্যোধন বলল—“ভীষ্ম, দ্রোণ, কৃপ, দ্রোণের পুত্র অশ্বত্থামা, কর্ণ এবং ভূরিশ্রবা; প্রাগ্জ্যোতিষের অধিপতি শল্য, আর সিন্ধুরাজ জয়দ্রথ—এরা আমার প্রধান সহায়।”

Verse 44

समग्रा पार्थिवी सेना पार्थमेक॑ं धनंजयम्‌

দুর্যোধন বলল—“সমস্ত রাজাদের সমগ্র সেনাবাহিনী একা পার্থ ধনঞ্জয় (অর্জুন)-এর বিরুদ্ধে সাজানো আছে।”

Verse 45

कस्मादशक्ता निर्जेतुमिति हेतुर्न विद्यते । राजाओंकी समस्त सेना एकमात्र अर्जुनको परास्त करनेमें असमर्थ कैसे होगी? इसके लिये कोई कारण नहीं है | ४४ इ || शयव्रातैस्तु भीष्मेण शतशो निचितोडवश:

দুর্যোধন বলল—“তাকে জয় করতে আমরা অক্ষম—এমন কোনো কারণ নেই। এত রাজাদের সম্মিলিত সেনা কীভাবে একা অর্জুনকে পরাস্ত করতে অক্ষম হবে? এর কোনো যুক্তি নেই।”

Verse 46

द्रोणद्रौणिकृपैश्वैव गन्ता पार्थो यमक्षयम्‌ । भीष्म, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा तथा कृपाचार्यके चलाये हुए सैकड़ों बाण-समूहोंसे विद्ध होकर कुन्तीपुत्र अर्जुनको विवशतापूर्वक यमलोकमें जाना पड़ेगा ।। पितामहो<पि गाड़ेय: शान्तनोरधि भारत

দুর্যোধন বলল—“দ্রোণ, দ্রৌণি (অশ্বত্থামা) ও কৃপের নিক্ষিপ্ত বাণসমূহে বিদ্ধ হয়ে পার্থকে যমলোক গমন করতে হবে।”

Verse 47

न हन्ता विद्यते चापि राजन्‌ भीष्मस्य कश्नन

দুর্যোধন বলল—রাজন! ভীষ্মকে বধ করার মতো কোনো বধকারী নেই; একেবারেই কেউ নেই।

Verse 48

पित्रा ह्ुक्त: प्रसन्नेन नाकामस्त्वं मरिष्यसि | राजन! भीष्मजीको मारनेवाला तो कोई है ही नहीं; क्योंकि उनके पिताने प्रसन्न होकर उन्हें यह वरदान दिया है कि तुम अपनी इच्छाके बिना नहीं मरोगे ।। ४७ ह ।। ब्रह्मर्षेश्न भरद्वाजाद्‌ द्रोणो द्रोण्यामजायत

তাঁর পিতা প্রসন্ন হয়ে বর দিয়েছিলেন—“তুমি নিজের ইচ্ছা ব্যতীত মরবে না।”

Verse 49

कृपश्चाचार्यमुख्यो5यं महर्षेगौॉतमादपि

এই কৃপ আচার্যদের মধ্যে অগ্রগণ্য; মহর্ষি গৌতমের থেকেও অধিক পূজনীয়।

Verse 50

अयोनिजास्त्रयो होते पिता माता च मातुलः,महाराज! अभश्वृत्थामाके ये पिता, माता और मामा तीनों ही अयोनिज हैं। अश्वत्थामा भी शूरवीर एवं मेरे पक्षमें स्थित हैं। राजन! ये सभी योद्धा देवताओंके समान पराक्रमी एवं महारथी हैं

মহারাজ! এদের পিতা, মাতা ও মামা—এই তিনজনই অযোনিজ (অসাধারণ জন্মধারী)।

Verse 51

अश्वत्थाम्नो महाराज स च शूर: स्थितो मम । सर्व एते महाराज देवकल्पा महारथा:,महाराज! अभश्वृत्थामाके ये पिता, माता और मामा तीनों ही अयोनिज हैं। अश्वत्थामा भी शूरवीर एवं मेरे पक्षमें स्थित हैं। राजन! ये सभी योद्धा देवताओंके समान पराक्रमी एवं महारथी हैं

মহারাজ! অশ্বত্থামাও বীর এবং আমার পক্ষেই অবস্থান করছে। রাজন! এরা সকলেই দেবতুল্য পরাক্রমী মহারথী।

Verse 52

शक्रस्यापि व्यथां कुर्यु: संयुगे भरतर्षभ । नैतेषामर्जुन: शक्त एकैकं प्रति वीक्षितुम्‌,भरतश्रेष्ठ! ये चारों वीर युद्धमें देवराज इन्द्रको भी पीड़ा दे सकते हैं। अर्जुन तो इनमेंसे किसी एककी ओर भी आँख उठाकर देख नहीं सकते

দুর্যোধন বলল—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যুদ্ধে এই বীরেরা দেবরাজ ইন্দ্রকেও যন্ত্রণা দিতে পারে। হে ভরতশ্রেষ্ঠ! অর্জুন তাদের মধ্যে একজনের দিকেও দৃষ্টি তুলে তাকাতে সক্ষম নয়।

Verse 53

सहितास्तु नरव्याप्रा हनिष्यन्ति धनंजयम्‌ | भीष्मद्रोणकृपाणां च तुल्य: कर्णो मतो मम,ये नरश्रेष्ठ जब एक साथ होकर युद्ध करेंगे, तब अर्जुनको अवश्य मार डालेंगे। भीष्म, द्रोण और कृप--इन तीनोंके समान पराक्रमी तो अकेला कर्ण ही है, यह मेरी मान्यता है

দুর্যোধন বলল—এই নরশ্রেষ্ঠেরা একত্র হয়ে যুদ্ধে নামলে ধনঞ্জয় অর্জুনকে অবশ্যই বধ করবে। আর ভীষ্ম, দ্রোণ ও কৃপ—এই তিনজনের সমান পরাক্রমী একমাত্র কর্ণই, এটাই আমার বিশ্বাস।

Verse 54

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें संजयवाक्यविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ,अनुज्ञातश्न रामेण मत्समो5डसीति भारत । कुण्डले रुचिरे चास्तां कर्णस्य सहजे शुभे भारत! परशुरामजीने कर्णको (शिक्षा देनेके पश्चात्‌ घर लौटनेकी) आज्ञा देते हुए यह कहा था कि तुम (अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञानमें) मेरे समान हो। इसके सिवा कर्णको जन्मके साथ ही दो सुन्दर और कल्याणकारी कुण्डल प्राप्त हुए थे

সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! শিক্ষা দান করে রাম (পরশুরাম) কর্ণকে বিদায় দিয়ে বলেছিলেন, ‘অস্ত্রবিদ্যায় তুমি আমার সমান।’ আর কর্ণের জন্মলগ্ন থেকেই ছিল দুটি দীপ্তিমান, মঙ্গলময় কুণ্ডল।

Verse 55

ते शच्यर्थ महेन्द्रेण याचित: स परंतप: । अमोघया महाराज शकक्‍्त्या परमभीमया,परंतु देवराज इन्द्रने शत्रुओंको संताप देनेवाले वीरवर कर्णसे शचीके लिये वे दोनों कुण्डल माँग लिये। महाराज! कर्णने बदलेमें अत्यन्त भयंकर एवं अमोघ शक्ति लेकर वे कुण्डल दिये थे इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि दुर्योधनवाक्ये पञ्चपज्चाशत्तमो<ध्याय:

দুর্যোধন বলল—হে মহারাজ! শচীর জন্য দেবরাজ মহেন্দ্র শত্রু-সন্তাপক বীর কর্ণের কাছে সেই দুই কুণ্ডল ভিক্ষা করেছিলেন। আর কর্ণ বিনিময়ে অত্যন্ত ভয়ংকর, অমোঘ শক্তি-অস্ত্র গ্রহণ করে কুণ্ডলদ্বয় দান করেছিল।

Verse 56

तस्य शकक्‍्त्योपगूढस्य कस्माज्जीवेद्‌ धनंजय: । विजयो मे ध्रुवं राजन्‌ फलं पाणाविवाहितम्‌,इस प्रकार उस अमोघ शक्तिसे सुरक्षित कर्णके सामने युद्धके लिये आकर अर्जुन कैसे जीवित रह सकते हैं? राजन! हाथपर रखे हुए फलकी भाँति विजयकी प्राप्ति तो मुझे अवश्य ही होगी

দুর্যোধন বলল—অমোঘ শক্তি-অস্ত্রে সুরক্ষিত কর্ণের সামনে যুদ্ধে এসে ধনঞ্জয় অর্জুন কীভাবে জীবিত থাকবে? হে রাজন! হাতের তালুতে রাখা ফলের মতোই বিজয় আমার জন্য নিশ্চিত।

Verse 57

अभिव्यक्तः परेषां च कृत्स्नो भुवि पराजय: । अह्वा होकेन भीष्मो<यं प्रयुतं हन्ति भारत,भारत! इस पृथ्वीपर मेरे शत्रुओंकी पूर्णतः पराजय तो इसीसे स्पष्ट है कि ये पितामह भीष्म प्रतिदिन दस हजार विपक्षी योद्धाओंका संहार करेंगे

পৃথিবীতে শত্রুদের সম্পূর্ণ পরাজয় তো ইতিমধ্যেই স্পষ্ট; কারণ যুদ্ধের আহ্বানমাত্রেই এই পিতামহ ভীষ্ম, হে ভারত, প্রতিদিন দশ হাজার প্রতিপক্ষ যোদ্ধাকে সংহার করবেন।

Verse 58

तत्समाश्न महेष्वासा द्रोणद्रौणिकृपा अपि । संशप्तकानां वृन्दानि क्षत्रियाणां परंतप

সেখানে সেই মহাধনুর্ধর—দ্রোণ, দ্রোণের পুত্র (অশ্বত্থামা) এবং কৃপও—অবস্থান নেবে; আর হে পরন্তপ, সংশপ্তক ক্ষত্রিয়দের দলসমূহও সাজানো থাকবে।

Verse 59

अर्जुनं वयमस्मान्‌ वा निहन्यात्‌ कपिकेतन: । त॑ चालमिति मन्यन्ते सव्यसाचिवधे धृता:

কপিধ্বজ অর্জুন হয় আমাদের বধ করবে, নয় আমরা তাকে বধ করব; কিন্তু যারা সব্যসাচীর বধে দৃঢ়প্রতিজ্ঞ, তারা মনে করে—‘এতটাই যথেষ্ট।’

Verse 60

पार्थिवा: स भवांस्तेभ्यो हकस्माद्‌ व्यथते कथम्‌ | परंतप! द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा और कृपाचार्य भी उन्हींके समान महाधनुर्धर हैं। इनके सिवा 'संशप्तक” नामक क्षत्रियोंके समूह भी मेरे ही पक्षमें हैं; जो यह कहते हैं कि या तो हमलोग अर्जुनको मार डालेंगे या कपिध्वज अर्जुन ही हमें मार डालेंगे, तभी हमारे उनके युद्धकी समाप्ति होगी। वे सब नरेश अर्जुनके वधका दृढ़ निश्चय कर चुके हैं और उसके लिये अपनेको पर्याप्त समझते हैं। ऐसी दशामें आप उन पाण्डवोंसे भयभीत हो अकस्मात्‌ व्यथित क्यों हो उठते हैं? || ५८-५९ ह ।। भीमसेने च निहते को<न्यो युध्येत भारत

হে রাজন, তাদের সামনে আপনি হঠাৎ কেন বিচলিত হন? হে পরন্তপ! দ্রোণাচার্য, অশ্বত্থামা ও কৃপাচার্যও তাদেরই সমান মহাধনুর্ধর। এদের ছাড়াও ‘সংশপ্তক’ নামে ক্ষত্রিয়দের দল আমার পক্ষেই স্থিত—যারা বলে, ‘আমরা অর্জুনকে বধ করব, নতুবা কপিধ্বজ অর্জুনই আমাদের বধ করবে; তবেই আমাদের যুদ্ধের শেষ।’ তারা সকলেই অর্জুন-বধে দৃঢ়প্রতিজ্ঞ এবং তার জন্য নিজেদের যথেষ্ট মনে করে। এমন অবস্থায় পাণ্ডবদের ভয়ে আপনি কেন আকস্মিকভাবে ব্যাকুল হন?

Verse 61

परेषां तन्ममाचक्ष्व यदि वेत्थ परंतप । शत्रुओंको संताप देनेवाले भरतनन्दन! अर्जुन और भीमसेनके मारे जानेपर शत्रुओंके दलमें दूसरा कौन ऐसा वीर है, जो युद्ध कर सकेगा? यदि आप किसीको जानते हों तो बताइये ।। ६० इ |। पज्च ते भ्रातर: सर्वे धृष्टद्युम्नो5थ सात्यकि:

হে পরন্তপ! যদি জানো, তবে অন্যদের কথা আমাকে বলো। হে ভারত! অর্জুন ও ভীমসেন নিহত হলে শত্রুসেনায় আর কে এমন আছে যে যুদ্ধ ধরে রাখতে পারবে? সেখানে তোমার পাঁচ ভাইই আছে, আর ধৃষ্টদ্যুম্ন ও সাত্যকিও আছে।

Verse 62

परेषां सप्त ये राजन्‌ योधा: सारं बल॑ मतम्‌ | राजन! पाँचों भाई पाण्डव, धृष्टद्युम्म और सात्यकि--ये कुल सात योद्धा ही शत्रु- पक्षके सारभूत बल माने जाते हैं ।। ६१ ई ।। अस्माकं तु विशिष्टा ये भीष्मद्रोणकृपादय:

হে রাজন, শত্রুপক্ষে এমন সাতজন যোদ্ধা আছে যাদেরকে তাদের সেনাবলের সার ও মূল শক্তি বলে গণ্য করা হয়। কিন্তু আমাদের পক্ষে ভীষ্ম, দ্রোণ, কৃপ প্রভৃতি বিশিষ্ট মহারথীরা আছেন—তাঁদের উপস্থিতিতেই আমাদের শক্তি বিশেষভাবে প্রতিষ্ঠিত।

Verse 63

द्रौणिवैंकर्तन: कर्ण: सोमदत्तो5थ बाह्विक:ः । प्राग्ज्योतिषाधिप: शल्य आवन्त्यौ च जयद्रथ:

দ্রৌণি (অশ্বত্থামা), বৈকর্তন কর্ণ, সোমদত্ত ও বাহ্লীক; প্রাগ্‌জ্যোতিষের অধিপতি ভগদত্ত, শল্য এবং জয়দ্রথ—এরা আমাদের পক্ষের অগ্রগণ্য বীর।

Verse 64

दुःशासनो दुर्मुखश्न दुःसहश्न विशाम्पते । श्रुतायुश्रित्रसेनश्व॒ पुरुमित्रो विविंशति:

হে প্রজানাথ! দুঃশাসন, দুর্মুখ ও দুঃসহ; আর শ্রুতায়ু, শ্রুতসেন, পুরুমিত্র ও বিবিংশতি—এরাও আমাদের প্রধান বীর।

Verse 65

शलो भूरिश्रवाश्वैव विकर्णश्र॒ तवात्मज: । प्रजानाथ! हमलोगोंके पक्षमें जो विशिष्ट योद्धा हैं, उनकी संख्या अधिक है; यथा-- भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य आदि, अश्वत्थामा, वैकर्तन कर्ण, सोमदत्त, बाह्लिक, प्राग्ज्योतिषनरेश भगदत्त, शल्य, अवन्तीके दोनों राजकुमार विन्द और अनुविन्द, जयद्रथ, दुःशासन, दुर्मुख, दुःसह, श्रुतायु, चित्रसेन, पुरुमित्र, विविंशति, शल, भूरिश्रवा तथा आपका पुत्र विकर्ण। (इस प्रकार अपने पक्षके प्रमुख वीरोंकी संख्या शत्रुओंके प्रमुख वीरोंसे तीन गुनी अधिक है) || ६२--६४ ह ।। अक्षौहिण्यो हि मे राजन्‌ दशैका च समाहता: । न्यूना: परेषां सप्तैव कस्मान्मे स्थात्‌ पराजय:,महाराज! अपने यहाँ ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ संगृहीत हो गयी हैं, परंतु शत्रुओंके पक्षमें हमसे बहुत कम कुल सात अक्षौहिणी सेनाएँ हैं; फिर मेरी पराजय कैसे हो सकती है?

শল, ভূরিশ্রবা এবং আপনার পুত্র বিকর্ণও (আমাদের পক্ষেই)। মহারাজ! আমার কাছে এগারো অক্ষৌহিণী সেনা সমবেত হয়েছে; আর শত্রুপক্ষে মাত্র সাত অক্ষৌহিণী—আমাদের তুলনায় অনেক কম। তবে আমার পরাজয় কীভাবে সম্ভব?

Verse 66

बलं त्रिगुणतो हीनं योध्यं प्राह बृहस्पति: । परेभ्यस्त्रिगुणा चेयं मम राजन्ननीकिनी,राजन! बृहस्पतिका कथन है कि शत्रुओंकी सेना अपनेसे एक तिहाई भी कम हो तो उसके साथ अवश्य युद्ध करना चाहिये। परंतु मेरी यह सेना तो शत्रुओंकी अपेक्षा चार अक्षौहिणी अधिक है, इसलिये यह अन्तर मेरी सम्पूर्ण सेनाकी एक तिहाईसे भी अधिक है

হে রাজন! বৃহস্পতির বচন—শত্রুর বল যদি নিজের তুলনায় এক-তৃতীয়াংশ কম হয়, তবে যুদ্ধ করা উচিত। আর আমার এই সেনা তো শত্রুর তুলনায় ত্রিগুণ; অতএব, রাজন, আমার এই সুবিধা আমার সমগ্র বাহিনীর এক-তৃতীয়াংশেরও অধিক।

Verse 67

गुणहीन परेषां च बहु पश्यामि भारत । गुणोदयं बहुगुणमात्मनश्न विशाम्पते,भारत! प्रजानाथ! मैं देख रहा हूँ कि शत्रुओंका बल हमारी अपेक्षा अनेक प्रकारसे गुणहीन (न्यूनतम) है, परंतु मेरा अपना बल सब प्रकारसे बहुत अधिक एवं गुणशाली है

দুর্যোধন বলল—হে ভারত! আমি স্পষ্টই দেখছি, আমাদের প্রতিপক্ষের শক্তি বহু দিক থেকে গুণহীন ও ন্যূন; কিন্তু হে প্রজাপতি! আমার নিজের বল বহুগুণে সমৃদ্ধ ও উৎকর্ষে উদিত।

Verse 68

एतत्‌ सर्व समाज्ञाय बलाग्रयं मम भारत । न्यूनतां पाण्डवानां च न मोहं गन्तुमरहसि,भरतनन्दन! इन सभी दृष्टियोंसे मेरा बल अधिक है और पाण्डवोंका बहुत कम है, यह जानकर आप व्याकुल एवं अधीर न हों

দুর্যোধন বলল—হে ভারত! এ সব জেনে যে আমার সেনাবল শ্রেষ্ঠ এবং পাণ্ডবদের শক্তি তুলনায় ন্যূন, হে ভরতবংশের আনন্দ! তুমি বিভ্রান্তিতে পড়ো না, উদ্বেগে দ্বিধাগ্রস্ত হয়ো না।

Verse 69

इत्युक्त्वा संजयं भूय: पर्यपृच्छत भारत । विवित्सु: प्राप्तकालानि ज्ञात्वा परपुरंजय:,जनमेजय! ऐसा कहकर शत्रुनगरविजयी दुर्योधनने शत्रुओंकी स्थिति जान लेनेके पश्चात्‌ समयोचित कर्तव्योंकी जानकारीके लिये पुनः संजयसे प्रश्न किया

এ কথা বলে, হে ভারত! শত্রুনগরজয়ী দুর্যোধন শত্রুপক্ষের অবস্থা জেনে নিয়ে, সময়োচিত করণীয় জানতে আগ্রহী হয়ে, আবার সঞ্জয়কে প্রশ্ন করল।

Verse 436

एकैक एपषां शक्तस्तु हन्तुं भारत पाण्डवान्‌ । समेतास्तु क्षणेनैतान्‌ नेष्यन्ति यमसादनम्‌ । भारत! भीष्म, द्रोण, कृप, अश्वत्थामा, कर्ण, भूरिश्रवा, प्राग्ज्योतिषनरेश भगदत्त, मद्रराज शल्य तथा सिन्धुराज जयद्रथ--इनमेंसे एक-एक वीर समस्त पाण्डवोंको मारनेकी शक्ति रखता है। यदि ये सब एक साथ मिल जाय॑ँ तो क्षणभरमें उन सबको यमलोक पहुँचा देंगे

দুর্যোধন বলল—হে ভারত! এদের প্রত্যেকেই একা একা পাণ্ডবদের বধ করতে সক্ষম; আর যদি এরা সবাই একত্র হয়, তবে মুহূর্তেই তাদের যমের ধামে পাঠিয়ে দেবে।

Verse 466

ब्रह्मर्षिसदृशो जज्ञे देवैरपि सुदुःसह:ः । भरतनन्दन! हमारे पितामह गंगापुत्र भीष्मजी तो अपने पिता शान्तनुसे भी बढ़कर पराक्रमी हैं। ये ब्रह्मर्षियोंके समान प्रभावसे सम्पन्न होकर उत्पन्न हुए हैं। इनका वेग देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुःसह है

দুর্যোধন বলল—হে ভরতনন্দন! আমাদের পিতামহ গঙ্গাপুত্র ভীষ্ম পিতা শান্তনুর চেয়েও অধিক পরাক্রমশালী। তিনি ব্রহ্মর্ষিসদৃশ তেজে জন্মেছেন; তাঁর বেগ দেবতাদের পক্ষেও অত্যন্ত দুর্বহ।

Verse 486

द्रोणाज्जज्ञे महाराज द्रौणिश्न परमास्त्रवित्‌ । दूसरे वीर आचार्य द्रोण हैं, जो ब्रह्मर्षि भरद्वाजके वीर्यसे कलशमें उत्पन्न हुए हैं। महाराज! इन्हीं आचार्य द्रोणसे वीर अश्वत्थामाकी उत्पत्ति हुई है, जो अस्त्र-विद्याके बहुत बड़े पण्डित हैं

মহারাজ! দ্রোণাচার্য থেকে দ্রৌণি (অশ্বত্থামা) জন্মেছেন—তিনি অস্ত্রবিদ্যায় পরম পারদর্শী। বীর আচার্য দ্রোণ ব্রহ্মর্ষি ভরদ্বাজের তেজ থেকে উৎপন্ন; আর সেই আচার্য দ্রোণ থেকেই এই পরাক্রমী অশ্বত্থামার আবির্ভাব, যিনি যুদ্ধবিদ্যায় মহাপণ্ডিত।

Verse 496

शरस्तम्बोद्धव: श्रीमानवध्य इति मे मतिः । आचार्यामें प्रधान कृप भी महर्षि गौतमके अंशसे सरकण्डोंके समूहमें उत्पन्न हुए हैं। ये श्रीमान्‌ आचार्यपाद अवध्य हैं, ऐसा मेरा विश्वास है

আমার মতে, শর-স্তম্ভ থেকে উৎপন্ন, গৌতমবংশজাত প্রধান আচার্য কৃপ মহাশ্রীমান এবং অবধ্য—তাঁকে বধ করা যায় না।

Frequently Asked Questions

The tension lies between preserving dynastic power through uncompromising posture and acknowledging the moral-legal claims of restitution; the chapter documents how strategic confidence can be used to defer or deny conciliatory obligations.

The chapter is a case study in persuasive statecraft: enumerating assets, narrating past achievements, and controlling perceptions can stabilize a political coalition, though such rhetoric may also obscure risks and ethical accountability.

No explicit phalaśruti is presented here; the meta-level function is historiographical—recording counsel, claims, and strategic reasoning as part of the epic’s analysis of causality and responsibility.