Adhyaya 34
Udyoga ParvaAdhyaya 3477 Verses

Adhyaya 34

Udyoga-parva Adhyāya 34 — Vidura’s Counsel on Deliberation, Speech-Discipline, and Dharmic Kingship

Upa-parva: Vidura-nīti (Counsel of Vidura) — Dhṛtarāṣṭra–Vidura Saṃvāda

Dhṛtarāṣṭra opens with an anxious request: he is “burning while awake” and asks Vidura—skilled in dharma and artha—to prescribe what should be done for the Kurus and for Ajātaśatru (Yudhiṣṭhira). Vidura frames counsel as benevolent truth-telling that prevents defeat, then develops a layered nīti manual. Key instructions include: avoid projects built on false premises or lacking proper means; do not act by impulse but by analyzing downstream consequences (anubandha) and ripening outcomes (vipāka). Governance requires measurement in revenue, territory, punishment, and public welfare; arrogance after attaining power destroys prosperity. Vidura uses analogies (fish and hook; unripe vs ripe fruit; bee collecting honey without harming flowers) to teach sustainable acquisition and non-destructive policy. He stresses self-control: the body as chariot, senses as horses, and the need to master internal enemies (kāma, krodha, etc.) before external rivals. He warns about harmful speech—verbal wounds that do not heal—and praises restraint and courteous language. The chapter culminates in explicit political counsel: Dhṛtarāṣṭra should accept Yudhiṣṭhira as a qualified ruler; opposition to the Pāṇḍavas reflects distorted judgment and invites decline.

Chapter Arc: धृतराष्ट्र, विदुर के वचनों से तृप्त न होकर फिर आग्रह करता है—“महाबुद्धे! धर्म और अर्थ से युक्त बातें पुनः कहो; इन्हें सुनकर भी मेरी तृष्णा नहीं मिटती।” → विदुर धृतराष्ट्र को निष्पक्षता का कठोर उपदेश देता है—कौरव और पाण्डव दोनों पुत्रों के प्रति समान आर्जव रखो; इसी से इस लोक में कीर्ति और परलोक में स्वर्ग मिलेगा। फिर वह एक दृष्टान्त की ओर ले जाता है—विरोचन और सुधन्वा का प्रह्लाद के पास विवाद, जो सत्य-धर्म की कसौटी बनेगा। → विरोचन-सुधन्वा का ‘प्राणों की बाज़ी’ वाला विवाद प्रह्लाद के सामने पहुँचता है; विरोचन कहता है कि वह असत्य नहीं बोलेगा और तत्त्व-निर्णय पिता से पूछता है—यहाँ सत्य, न्याय और पुत्र-हित के बीच प्रह्लाद की परीक्षा चरम पर आती है। → दृष्टान्त के सहारे विदुर धृतराष्ट्र को नीति-सूत्रों में बाँधता है: दुष्ट-लक्षणों (अगारदाही, गरद, मित्रध्रुक्, पारदारिक आदि) से सावधान रहो; समय रहते कल्याणकारी कर्म करो; बुद्धि-प्रधान कर्म श्रेष्ठ हैं। अंततः वह धृतराष्ट्र को चेताता है कि दुर्योधन-शकुनि-दुःशासन-कर्ण पर राज्य-भार रखकर समृद्धि नहीं मिल सकती, जबकि पाण्डव देवगणों-से समर्थ होकर भी तुम्हें पिता-वत् मानते हैं—तुम उन्हें पुत्र-वत् मानो। → धृतराष्ट्र के सामने निर्णायक मोड़ खड़ा है—क्या वह विदुर की निष्पक्ष नीति अपनाकर पाण्डवों से मेल करेगा, या दुर्योधन-पक्षपात में फँसकर विनाश की ओर बढ़ेगा?

Shlokas

Verse 1

ऑपन-मा_ज बक। डे पजञ्चत्रिशो<ड्ध्याय: विदुरके द्वारा केशिनीके लिये सुधन्‍्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन करते हुए धृतराष्ट्रको धर्मोपदेश ध्ृतराष्टर उवाच ब्रूहि भूयो महाबुद्धे धर्मार्थसहितं वच: । शृण्वतो नास्ति मे तृप्तिविचित्राणीह भाषसे

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—হে মহাবুদ্ধিমান! আবার ধর্ম ও অর্থসহিত বাক্য বলো। শুনতে শুনতে আমার তৃপ্তি হয় না; তুমি এখানে বিচিত্র ও শিক্ষাপ্রদ কথা বলছ।

Verse 2

धृतराष्ट्रने कहा--महाबुद्धे! तुम पुनः धर्म और अर्थसे युक्त बातें कहो। इन्हें सुनकर मुझे तृप्ति नहीं होती। इस विषयमें तुम विलक्षण बातें कह रहे हो ।। विदुर उवाच सर्वतीर्थेषु वा स्नानं॑ सर्वभूतेषु चार्जवम्‌ । उभे त्वेते समे स्यातामार्जवं वा विशिष्यते,विदुरजी बोले--राजन्‌! सब तीथर्थोमें स्नान और सब प्राणियोंके साथ कोमलताका बर्ताव--ये दोनों एक समान हैं; अथवा कोमलताके बर्तावका विशेष महत्त्व है

বিদুর বললেন—হে রাজন! সকল তীর্থে স্নান এবং সকল প্রাণীর প্রতি আর্জব (সরলতা ও সৎ আচরণ)—এ দুটিকে সমান বলা যায়; কিন্তু প্রকৃতপক্ষে সকলের প্রতি আর্জবই অধিক শ্রেয়।

Verse 3

आर्ज॑वं प्रतिपद्यस्व पुत्रेषु सततं विभो । इह कीर्ति परां प्राप्य प्रेत्य स्वर्गमवाप्स्यसि,विभो! आप अपने पुत्र कौरव, पाण्डव दोनोंके साथ (समानरूपसे) कोमलताका बर्ताव कीजिये। ऐसा करनेसे इस लोकमें महान्‌ सुयश प्राप्त करके मरनेके पश्चात्‌ लोकमें आप स्वर्गलोकमें जायँगे

বিদুর বললেন—হে বিভো! পুত্রদের বিষয়ে সর্বদা আর্জব (সরলতা ও নিরপেক্ষ ন্যায়) অবলম্বন করুন—কৌরব ও পাণ্ডব উভয়ের প্রতিই সমদৃষ্টি রাখুন। এতে এই লোকেতে মহাকীর্তি লাভ করে, পরলোকে স্বর্গ প্রাপ্ত হবেন।

Verse 4

यावत्‌ कीर्तिर्मिनुष्यस्य पुण्या लोके प्रगीयते । तावत्‌ स पुरुषव्याप्र स्वर्गलोके महीयते,पुरुषश्रेष्ठ] इस लोकमें जबतक मनुष्यकी पावन कीर्तिका गान किया जाता है, तबतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है

বিদুর বললেন—এই জগতে যতদিন মানুষের পবিত্র খ্যাতি গীত হয়, ততদিনই সে স্বর্গলোকে সম্মানিত ও মহিমান্বিত হয়।

Verse 5

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । विरोचनस्य संवाद केशिन्यर्थे सुधन्‍्वना,इस विषयमें उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जिसमें “केशिनी” के लिये सुधन्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन है

এ বিষয়েও লোকেরা এক প্রাচীন ইতিহাসের দৃষ্টান্ত দেয়—কেশিনীর কারণে বিরোচন ও সুধন্বার মধ্যে যে সংলাপ-তর্ক হয়েছিল।

Verse 6

स्वयंवरे स्थिता कन्या केशिनी नाम नामतः । रूपेणाप्रतिमा राजन्‌ विशिष्टपतिकाम्यया,राजन्‌! एक समयकी बात है, केशिनी नामवाली एक अनुपम सुन्दरी कन्या सर्वश्रेष्ठ पतिको वरण करनेकी इच्छासे स्वयंवर-सभामें उपस्थित हुई

বিদুর বললেন—হে রাজন! এক সময় কেশিনী নামে এক কন্যা স্বয়ংবরসভায় উপস্থিত ছিল। রূপে সে অতুলনীয়া, এবং সর্বোত্তম পতি বরণ করার আকাঙ্ক্ষায় এসেছিল।

Verse 7

विरोचनो<थ दैतेयस्तदा तत्राजगाम ह । प्राप्तुमिच्छंस्ततस्तत्र दैत्येन्द्रं प्राह केशिनी,उसी समय दैत्यकुमार विरोचन उसे प्राप्त करनेकी इच्छासे वहाँ आया। तब केशिनीने वहाँ दैत्यराजसे इस प्रकार बातचीत की

তখন দৈত্যপুত্র বিরোচন তাকে লাভ করার বাসনায় সেখানে এল। এরপর কেশিনী সেখানে দৈত্যদের অধিপতিকে এইভাবে বলল।

Verse 8

केशिन्युवाच किं ब्राह्मणा: स्विच्छेयांसो दितिजा: स्विद्‌ विरोचन । अथ केन सम पर्यड्कं सुधन्‍्वा नाधिरोहति,केशिनी बोली--विरोचन! ब्राह्मण श्रेष्ठ होते हैं या दैत्य? यदि ब्राह्मण श्रेष्ठ होते हैं तो सुधन्वा ब्राह्मण ही मेरी शय्यापर क्‍यों न बैठे? अर्थात्‌ मैं सुधन्वासे ही विवाह क्‍यों न करूँ?

কেশিনী বলল—বিরোচন! বলো তো, ব্রাহ্মণ শ্রেষ্ঠ, না দিতিপুত্র দৈত্যেরা? যদি ব্রাহ্মণই শ্রেষ্ঠ হয়, তবে ব্রাহ্মণ সুধন্বা কেন তোমার সঙ্গে একই শয্যায় আরোহন করে না? অর্থাৎ আমি কেন সুধন্বাকেই স্বামী হিসেবে বরণ করব না?

Verse 9

विरोचन उवाच प्राजापत्यास्तु वै श्रेष्ठा वयं केशिनि सत्तमा: । अस्माकं खल्विमे लोका: के देवा: के द्विजातय:,विरोचनने कहा--केशिनी! हम प्रजापतिकी श्रेष्ठ संतानें हैं, अतः सबसे उत्तम हैं। यह सारा संसार हमलोगोंका ही है। हमारे सामने देवता क्‍या हैं? और ब्राह्मण कौन चीज हैं?

বিরোচন বলল— কেশিনী! আমরা প্রজাপতির শ্রেষ্ঠ সন্তান, অতএব সর্বোত্তম। এই সমগ্র লোক আমাদেরই; আমাদের সামনে দেবতারা কী, আর দ্বিজাতিরাই বা কে?

Verse 10

केशिन्युवाच इहैवावां प्रतीक्षाव उपस्थाने विरोचन । सुधन्वा प्रातरागन्ता पश्येयं वां समागतौ,केशिनी बोली--विरोचन! इसी जगह हम दोनों प्रतीक्षा करें; कल प्रातः:काल सुधन्वा यहाँ आवेगा। फिर मैं तुम दोनोंको एकत्र उपस्थित देखूँगी

কেশিনী বলল— বিরোচন! এই মিলনস্থলেই আমরা দু’জন অপেক্ষা করি। কাল প্রাতে সুধন্বা এখানে আসবে; তখন আমি তোমাদের দু’জনকে একসঙ্গে উপস্থিত দেখব।

Verse 11

विरोचन उवाच तथा भद्रे करिष्यामि यथा त्वं भीरु भाषसे । सुधन्वानं च मां चैव प्रातर्द्रष्टासि संगतो,विरोचन बोला--कल्याणी! तुम जैसा कहती हो, वही करूँगा। भीरु! प्रातःकाल तुम मुझे और सुधन्वाको एक साथ उपस्थित देखोगी

বিরোচন বলল— কল্যাণী! হে ভীরু, তুমি যেমন বলছ তেমনই করব। প্রাতে তুমি সুধন্বা ও আমাকে একসঙ্গে মিলিত অবস্থায় দেখবে।

Verse 12

विदुर उवाच अतीतायां च शर्वर्यामुदिते सूर्यमण्डले । अथाजगाम त॑ देशं सुधन्वा राजसत्तम । विरोचनो यत्र विभो केशिन्या सहित: स्थित:,विदुरजी कहते हैं--राजाओंमें श्रेष्ठ धृतराष्ट्! इसके बाद जब रात बीती और सूर्यमण्डलका उदय हुआ, उस समय सुधन्वा उस स्थानपर आया, जहाँ विरोचन केशिनीके साथ उपस्थित था

বিদুর বললেন— হে রাজশ্রেষ্ঠ ধৃতরাষ্ট্র! রাত্রি অতীত হলে এবং সূর্যমণ্ডল উদিত হলে, তখন সুধন্বা সেই স্থানে এল, যেখানে পরাক্রান্ত বিরোচন কেশিনীর সঙ্গে অবস্থান করছিল।

Verse 13

सुधन्वा च समागच्छत्‌ प्राह्मदिं केशिनीं तथा । समागतं द्विजं दृष्टवा केशिनी भरतर्षभ । प्रत्युत्थायासनं तस्मै पाद्यमर्घ्य ददौ पुन:,भरतमश्रेष्ठ! सुधन्वा प्रह्मादकुमार विरोचन और केशिनीके पास आया। ब्राह्मगको आया देख केशिनी उठ खड़ी हुई और उसने उसे आसन, पाद्य और अर्घ्य निवेदन किया

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! প্রাহ্মদের পুত্র সুধন্বা বিরোচন ও কেশিনীর কাছে এল। আগত ব্রাহ্মণকে দেখে কেশিনী উঠে দাঁড়াল এবং তাকে আসন, পাদ্য ও অর্ঘ্য পুনরায় নিবেদন করল।

Verse 14

युधन्वोवाच अन्वालभे हिरण्मयं प्राह्मदे ते वरासनम्‌ | एकत्वमुपसम्पन्नो न त्वासे5हं त्वया सह,सुधन्वा बोला--प्रह्लादनन्दन! मैं तुम्हारे इस सुवर्णमय सुन्दर सिंहासनको केवल छू लेता हूँ, तुम्हारे साथ इसपर बैठ नहीं सकता; क्योंकि ऐसा होनेसे हम दोनों एक समान हो जायूँगे

যুধন্বা বলল—হে ব্রাহ্মণ! তোমার এই সুবর্ণময় উৎকৃষ্ট সিংহাসন আমি কেবল স্পর্শ করি; তোমার সঙ্গে এতে বসতে পারি না। কারণ তাতে আমরা দু’জন সমান হয়ে যাব।

Verse 15

विरोचन उवाच तवा्हते तु फलकं कूर्च वाप्यथवा बृसी । सुधन्वन्‌ न त्वमहोंडसि मया सह समासनम्‌,विरोचनने कहा--सुधन्वन्‌! तुम्हारे लिये तो पीढ़ा, चटाई या कुशका आसन उचित है; तुम मेरे साथ बराबरके आसनपर बैठनेयोग्य हो ही नहीं

বিরোচন বলল—সুধন্বন! তোমার জন্য পিঁড়ি, চাটাই কিংবা কুশঘাসের আসনই উপযুক্ত; আমার সঙ্গে সমাসনে বসার যোগ্য তুমি নও।

Verse 16

युधन्वोवाच पितापुत्रौ सहासीतां द्वौ विप्रौ क्षत्रियावपि । वृद्धौ वैश्यौ च शूद्रौ च न त्वन्यावितरेतरम्‌,सुधन्वाने कहा--विरोचन! पिता और पुत्र एक साथ एक आसनपर बैठ सकते हैं; दो ब्राह्मण, दो क्षत्रिय, दो वृद्ध, दो वैश्य और दो शूद्र भी एक साथ बैठ सकते हैं; किंतु दूसरे कोई दो व्यक्ति परस्पर एक साथ नहीं बैठ सकते

সুধন্বা বলল—হে বিরোচন! পিতা ও পুত্র একসঙ্গে একই আসনে বসতে পারে। তেমনি দুই ব্রাহ্মণ, দুই ক্ষত্রিয়, দুই বৃদ্ধ, দুই বৈশ্য এবং দুই শূদ্রও একসঙ্গে বসতে পারে; কিন্তু এদের বাইরে অন্য কোনো দুই ব্যক্তি পরস্পর সমান হয়ে একসঙ্গে বসা উচিত নয়।

Verse 17

पिता हि ते समासीनमुपासीतैव मामधथ: । बाल: सुखैधितो गेहे न त्वं किंचन बुध्यसे,तुम्हारे पिता प्रह्नाद नीचे बैठकर ही उच्चासनपर आसीन हुए मुझ सुधन्वाकी सेवा किया करते हैं। तुम अभी बालक हो, घरमें सुखसे पले हो; अतः तुम्हें इन बातोंका कुछ भी ज्ञान नहीं है

সুধন্বা বলল—তোমার পিতা প্রহ্লাদ তো নিচে বসে, তুমি উপরে আসনে বসে থাকলেও, আমার সেবা করতেন। তুমি এখনও শিশু, ঘরের সুখে লালিত; তাই এসব বিষয়ে তোমার কোনো বোধ নেই।

Verse 18

विरेचन उवाच हिरण्यं च गवाश्चृं च यद्‌ वित्तमसुरेषु न: । सुधन्वन्‌ विपणे तेन प्रश्न॑ पृच्छाव ये विदु:,विरोचन बोला--सुधन्वन्‌! हम असुरोंके पास जो कुछ भी सोना, गौ, घोड़ा आदि धन है, उसकी मैं बाजी लगाता हूँ; हम-तुम दोनों चलकर जो इस विषयके जानकार हों, उनसे पूछें कि हम दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है?

বিরোচন বলল—সুধন্বন! আমাদের অসুরদের কাছে যা কিছু ধন আছে—সোনা, গরু, ঘোড়া ইত্যাদি—আমি তা বাজি রাখছি। চলো, আমরা দু’জনেই যাঁরা এ বিষয়ে সত্যিই জানেন, তাঁদের কাছে জিজ্ঞেস করি—আমাদের মধ্যে কে শ্রেষ্ঠ।

Verse 19

युधन्वोवाच हिरण्यं च गवाश्चं च तवैवास्तु विरोचन । प्राणयोस्तु पणं कृत्वा प्रश्न॑ पृच्छाव ये विदु:,सुधन्वा बोला--विरोचन! सुवर्ण, गाय और घोड़ा तुम्हारे ही पास रहें। हम दोनों प्राणोंकी बाजी लगाकर जो जानकार हों, उनसे पूछें

সুধন্বা বলল—হে বিরোচন, স্বর্ণ আর গবাদি পশু তোমারই থাক। কিন্তু আমরা দু’জন প্রাণকে পণ করে, যে সত্য জানে তাদের কাছেই প্রশ্নটি জিজ্ঞাসা করি।

Verse 20

विरोचन उवाच आवां कुत्र गमिष्याव: प्राणयोर्विपणे कृते | नतु देवेष्वहं स्थाता न मनुष्येषु कहिचित्‌,विरोचनने कहा--अच्छा, प्राणोंकी बाजी लगानेके पश्चात्‌ हम दोनों कहाँ चलेंगे? मैं तो न देवताओंके पास जा सकता हूँ और न कभी मनुष्योंसे ही निर्णण करा सकता हूँ

বিরোচন বলল—ভালো, যখন প্রাণের পণ ধরা হলো, তখন আমরা দু’জন কোথায় যাব? দেবলোকেও আমার কোনো স্থান নেই, মানুষের মধ্যেও কোথাও স্থির আশ্রয় নেই।

Verse 21

युधन्वोवाच पितरं ते गमिष्याव: प्राणयोर्विपणे कृते । पुत्रस्यापि स हेतोहिं प्रह्ादो नानृतं वदेत्‌,सुधन्वा बोला--प्राणोंकी बाजी लग जानेपर हम दोनों तुम्हारे पिताके पास चलेंगे। [मुझे विश्वास है कि] प्रह्नाद अपने बेटेके (जीवनके) लिये भी झूठ नहीं बोल सकते हैं

সুধন্বা বলল—প্রাণের পণ স্থির হলে আমরা দু’জন তোমার পিতার কাছে যাব। কারণ প্রহ্লাদ নিজের পুত্রের জন্যও মিথ্যা বলবেন না।

Verse 22

विदुर उवाच एवं कृतपणोौ क्रुद्धौ तत्राभिजग्मतुस्तदा । विरोचनसुधन्वानौ प्रह्वादो यत्र तिषठति,विदुरजी कहते हैं--राजन्‌! इस तरह बाजी लगाकर परस्पर क़ुद्ध हो विरोचन और सुधन्वा दोनों उस समय वहाँ गये, जहाँ प्रह्नमाद थे

বিদুর বললেন—হে রাজন, এভাবে পণ স্থির করে পরস্পরের প্রতি ক্রুদ্ধ হয়ে বিরোচন ও সুধন্বা তখন প্রহ্লাদ যেখানে অবস্থান করছিলেন, সেখানেই গেল।

Verse 23

प्रह्माद उवाच इमौ तौ सम्प्रदृश्येते याभ्यां न चरितं सह । आशीविषाविव क्रुद्धावेकमार्गाविहागतौ,प्रह्नादने (मन-ही-मन) कहा--जो कभी भी एक साथ नहीं चले थे, वे ही दोनों ये सुधन्वा और विरोचन आज साँपकी तरह क़ुद्ध होकर एक ही राहसे आते दिखायी देते हैं

প্রহ্লাদ (মনে মনে) বললেন—এই দু’জনকেই তো দেখা যাচ্ছে, যারা কখনও একসঙ্গে চলেনি। ক্রুদ্ধ বিষধর সাপের মতো তারা একই পথে এখানে এসেছে।

Verse 24

कि वै सहैवं चरथो न पुरा चरथ: सह । विरोचनैतत्‌ पृच्छामि कि ते सख्यं सुधन्वना,[फिर प्रकटरूपमें विरोचनसे कहा--] विरोचन! मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या सुधन्वाके साथ तुम्हारी मित्रता हो गयी है? फिर कैसे एक साथ आ रहे हो? पहले तो तुम दोनों कभी एक साथ नहीं चलते थे

প্রহ্লাদ বললেন—তোমরা দু’জন এভাবে একসঙ্গে কেন চলছ? আগে তো কখনও একসঙ্গে চলতে না। বিরোচন, আমি স্পষ্ট করে জিজ্ঞেস করছি—সুধন্বার সঙ্গে কি তোমার মৈত্রী হয়েছে? যদি হয়ে থাকে, তবে এই সঙ্গ কীভাবে ঘটল?

Verse 25

वियेचन उवाच न मे सुधन्वना सख्यं प्राणयोर्विपणावहे । प्रह्माद तत्त्वं पृच्छामि मा प्रश्नमनृतं वदे:,विरोचन बोला--पिताजी! सुधन्वाके साथ मेरी मित्रता नहीं हुई है। हम दोनों प्राणोंकी बाजी लगाये आ रहे हैं। मैं आपसे यथार्थ बात पूछता हूँ। मेरे प्रश्नका झूठा उत्तर न दीजियेगा

বিরোচন বলল—পিতাজি! সুধন্বার সঙ্গে আমার মৈত্রী হয়নি; আমরা দু’জন প্রাণের পণ নিয়ে এগিয়ে চলেছি। আমি আপনাকে সত্য কথাই জিজ্ঞেস করছি—আমার প্রশ্নের উত্তরে মিথ্যা বলবেন না।

Verse 26

प्रह्माद उवाच उदकं मधुपर्क वाप्यानयन्तु सुधन्वने । ब्रह्मन्न भ्यर्चनीयो 5सि श्वेता गौ: पीवरी कृता,प्रह्नमादने कहा--सेवको! सुधन्वाके लिये जल और मधुपर्क भी लाओ। [फिर सुधन्वासे कहा--] ब्रह्मन! तुम मेरे पूजनीय अतिथि हो, मैंने तुम्हें दान करनेके लिये खूब मोटी-ताजी सफेद गौ रख रखी है

প্রহ্লাদ বললেন—সেবকেরা, সুধন্বার জন্য জল ও মধুপর্কও নিয়ে এসো। হে ব্রাহ্মণ! তুমি আমার পূজনীয় অতিথি; দানের জন্য আমি একটি সুপুষ্ট, তাজা, শ্বেত গাভী প্রস্তুত রেখেছি।

Verse 27

युधन्वोवाच उदकं मधुपर्क च पथिष्वेवार्पितं मम । प्रह्मद त्वं तु मे तथ्यं प्रश्न॑ प्रत्रूहि पृष्छत: । कि ब्राह्मणा: स्विच्छेयांस उताहो स्विद्‌ विरोचन:,सुधन्वा बोला--प्रह्नाद! जल और मधुपर्क तो मुझे मार्गमें ही मिल गया है। तुम तो जो मैं पूछ रहा हूँ, उस प्रश्नचका ठीक-ठीक उत्तर दो-ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं अथवा विरोचन?

সুধন্বা বলল—জল ও মধুপর্ক তো পথে-ই আমাকে দেওয়া হয়েছে। কিন্তু প্রহ্লাদ! আমি যা জিজ্ঞেস করছি তার সত্য উত্তর দাও—শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণরা, না কি বিরোচন?

Verse 28

प्रह्माद उवाच पुत्र एको मम ब्रह्म॑ंस्त्वं च साक्षादिहास्थित: । तयोर्विवदतो: प्रश्न कथमस्मद्विधो वदेत्‌

প্রহ্লাদ বললেন—পুত্র! একদিকে আমার নিজের পুত্র, আর অন্যদিকে তুমি স্বয়ং ব্রাহ্মণ সশরীরে এখানে উপস্থিত। এ দু’জনের মধ্যে বিতর্ক উঠলে এবং প্রশ্ন দাঁড়ালে, আমার মতো লোক কীভাবে উত্তর দেবে?

Verse 29

प्रह्नाद बोले--ब्रह्मन्‌! मेरे एक ही पुत्र है और इधर तुम स्वयं उपस्थित हो; भला, तुम दोनोंके विवादमें मेरे-जैसा मनुष्य कैसे निर्णय दे सकता है? ।। युधन्वोवाच गां प्रदद्यास्त्वौरसाय यद्धान्यत्‌ स्यात्‌ प्रियं धनम्‌ । द्वयोविवदतोस्तथ्यं वाच्यं च मतिमंस्त्वया,सुधन्वा बोला--मतिमन्‌! तुम्हारे पास गौ तथा दूसरा जो कुछ भी प्रिय धन हो, वह सब अपने औरस पुत्र विरोचनको दे दो; परंतु हम दोनोंके विवादमें तो तुम्हें ठीक-ठीक उत्तर देना ही चाहिये

প্রহ্লাদ বললেন— “হে ব্রাহ্মণ! আমার তো একটিই পুত্র, আর আপনি নিজেই এখানে উপস্থিত। আপনাদের দু’জনের বিবাদে আমার মতো মানুষ কীভাবে বিচার দিতে পারে?” সুধন্বা বললেন— “গাভী এবং তোমার যে-কোনো প্রিয় ধনসম্পদ—সবই তোমার ঔরস পুত্র বিরোচনকে দাও; কিন্তু আমাদের দু’জনের বিবাদে, হে বুদ্ধিমান, তোমাকে সত্যই বলতে হবে এবং নির্ভুল উত্তর দিতে হবে।”

Verse 30

प्रह्माद उवाच अथ यो नैव प्रब्रूयात्‌ सत्यं वा यदि वानृतम्‌ । एतत्‌ सुधन्वन्‌ पृच्छामि दुर्विवक्ता सम कि वसेत्‌,प्रह्नमादने कहा--सुधन्वन्‌! अब मैं तुमसे यह बात पूछता हूँ--जो सत्य न बोले अथवा अस॒त्य निर्णय करे, ऐसे दुष्ट वक्ताकी क्या स्थिति होती है?

প্রহ্লাদ বললেন— “সুধন্বন! এখন আমি তোমাকে জিজ্ঞেস করি—যে সত্য বলে না, অথবা বিচার করতে ডেকে মিথ্যা রায় দেয়, সেই দুষ্ট বক্তার পরিণতি কী?”

Verse 31

युधन्वोवाच यां रात्रिमधिविन्ना स्त्री यां चैवाक्षपराजित: । यां च भाराभिततप्ताड़्े दुर्विवक्ता सम तां वसेत्‌,सुधन्वा बोला--सौतवाली स्त्री, जूएमें हारे हुए जुआरी और भार ढोनेसे व्यथित शरीरवाले मनुष्यकी रातमें जो स्थिति होती है, वही स्थिति उलटा न्याय देनेवाले वक्ताकी भी होती है

সুধন্বা বললেন— “যে রাত অপমানিত ও পরিত্যক্তা নারীর; যে রাত পাশায় পরাজিত জুয়াড়ির; আর যে রাত ভার বহনে দগ্ধ দেহের শ্রমিকের—ঠিক তেমনই রাত কাটে অন্যায় কথা বলা ও বিকৃত বিচার দেওয়া দুষ্ট বক্তার।”

Verse 32

नगरे प्रतिरुद्ध: सन्‌ बहिद्वरि बुभुक्षित: । अमित्रान्‌ भूयस: पश्येद्‌ यः साक्ष्यमनृतं वदेत्‌,जो झूठा निर्णय देता है, वह राजा नगरमें कैद होकर बाहरी दरवाजेपर भूखका कष्ट उठाता हुआ बहुत-से शत्रुओंको देखता है

যে মিথ্যা সাক্ষ্য দেয়, সে নগরে আবদ্ধ হয়ে বাহিরের দ্বারে ক্ষুধায় কাতর অবস্থায় বহু শত্রুকে দেখতে বাধ্য হয়।

Verse 33

पज्च पश्चनृते हन्ति दश हन्ति गवानृते । शतमश्चानृते हन्ति सहस्न॑ पुरुषानृते,(अपने स्वार्थके वशीभूत हो) पशुके लिये झूठ बोलनेसे पाँच, गौके लिये झूठ बोलनेपर दस, घोड़ेके लिये असत्य-भाषण करनेपर सौ पीढ़ियोंको और मनुष्यके लिये झूठ बोलनेपर एक हजार पीढ़ियोंको मनुष्य नरकमें गिराता है

পশুর জন্য মিথ্যা বললে পাঁচ (বংশধারা) নষ্ট হয়; গাভীর জন্য মিথ্যা বললে দশ; ঘোড়ার জন্য অসত্য বললে একশ; আর মানুষের জন্য মিথ্যা বললে এক হাজার—এবং সেই ব্যক্তি নরকে পতিত হয়।

Verse 34

हन्ति जातानजातांश्व हिरण्यार्थेडनृतं वदन्‌ । सर्व भूम्यनृते हन्ति मा सम भूम्यनृतं वदे:,सुवर्णके लिये झूठ बोलनेवाला अपनी भूत और भविष्य सभी पीढ़ियोंको नरकमें गिराता है। पृथ्वी तथा स्त्रीके लिये झूठ कहनेवाला तो अपना सर्वनाश ही कर लेता है; इसलिये तुम भूमि या स्त्रीके लिये कभी झूठ न बोलना

সোনার লোভে যে মিথ্যা বলে, সে জন্মানো ও অজন্মা—বর্তমান ও ভবিষ্যৎ—বংশধর সকলকে বিনাশ করে। ভূমি (এবং নারীর) বিষয়ে মিথ্যা সর্বনাশ ডেকে আনে; অতএব ভূমি বা নারীর জন্য কখনও অসত্য বলো না।

Verse 35

प्रह्माद उवाच मत्त: श्रेयानड्रिरा वै सुधन्वा त्वद्वधिरोचन | मातास्य श्रेयसी मातुस्तस्मात्‌ त्वं तेन वै जित:,भरतश्रेष्ठ) पाण्डव तो सभी उत्तम गुणोंसे सम्पन्न हैं और आपमें पिताका-सा भाव रखकर बर्ताव करते हैं; आप भी उनपर पुत्रभाव रखकर उचित बर्ताव कीजिये ।। इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरनीतिवाक्ये पउठ्चत्रिंशो 5ध्याय: [

প্রহ্লাদ বললেন—“অঙ্গিরা আমার চেয়ে শ্রেষ্ঠ; আর সুধন্বা তোমার চেয়ে শ্রেষ্ঠ—সে তোমার বিনাশের জন্য অটল সংকল্প। তার মাতা তোমার মাতার চেয়েও শ্রেষ্ঠ; অতএব তুমি তার দ্বারাই পরাভূত।”

Verse 36

प्रह्नमादने कहा--विरोचन! सुधन्वाके पिता अंगिरा मुझसे श्रेष्ठ हैं, सुधन्वा तुमसे श्रेष्ठ है, इसकी माता तुम्हारी मातासे श्रेष्ठ है; अतः तुम आज सुधन्वाके द्वारा जीते गये ।। विरोचन सुधन्वायं प्राणानामी श्वरस्तव । सुधन्वन्‌ पुनरिच्छामि त्वया दत्तं विरोचनम्‌,विरोचन! अब सुधन्वा तुम्हारे प्राणोंका स्वामी है। सुधन्वन्‌! अब यदि तुम दे दो तो मैं विरोचनको पाना चाहता हूँ

প্রহ্লাদ বললেন—“বিরোচন! সুধন্বার পিতা অঙ্গিরা আমার চেয়ে শ্রেষ্ঠ; সুধন্বা তোমার চেয়ে শ্রেষ্ঠ; আর তার মাতা তোমার মাতার চেয়েও শ্রেষ্ঠ; তাই আজ তুমি সুধন্বার দ্বারা পরাজিত। বিরোচন! এখন সুধন্বাই তোমার প্রাণের অধীশ্বর। সুধন্বন! তুমি যদি তাকে ফিরিয়ে দাও, তবে তোমাকে দত্ত হিসেবে দেওয়া সেই বিরোচনকে আমি পুনরায় পেতে চাই।”

Verse 37

युधन्वोवाच यद्‌ धर्ममवृणीथास्त्वं न कामादनृतं वदी: । पुनर्ददामि ते पुत्र॑ तस्मात्‌ प्रह्मद दुर्लभम्‌,7 कि लक हा ५ खा 4 अर प 90-5० सुधन्वा बोला--प्रह्नाद! तुमने धर्मको ही स्वीकार किया है, स्वार्थवश झूठ नहीं कहा है; इसलिये अब तुम्हारे इस दुर्लभ पुत्रको फिर तुम्हें दे रहा हूँ

সুধন্বা বলল—“প্রহ্লাদ! তুমি ধর্মই বেছে নিয়েছ, স্বার্থের বশে অসত্য বলোনি; তাই তোমার এই দুর্লভ পুত্রকে আমি আবার তোমাকে ফিরিয়ে দিচ্ছি।”

Verse 38

एष प्रह्माद पुत्रस्ते मया दत्तो विरोचन: । पादप्रक्षालनं कुर्यात्‌ कुमार्या: संनिधौ मम,प्रह्माद! तुम्हारे इस पुत्र विरोचनको मैंने पुनः तुम्हें दे दिया; किंतु अब यह कुमारी केशिनीके निकट चलकर मेरे पैर धोवे

সুধন্বা বলল—“প্রহ্লাদ! এই তোমার পুত্র বিরোচনকে আমি তোমাকে ফিরিয়ে দিলাম; কিন্তু আমার সম্মুখে সে কুমারী কেশিনীর কাছে গিয়ে আমার পা ধুয়ে দিক।”

Verse 39

विदुर उवाच तस्माद्‌ राजेन्द्र भूम्यर्थे नानृतं वक्तुमहसि । मा गम: ससुतामात्यो नाशं पुत्रार्थमब्रुवन्‌,विदुरजी कहते हैं--इसलिये राजेन्द्र! आप पृथ्वीके लिये झूठ न बोलें। बेटेके स्वार्थथश सच्ची बात न कहकर पुत्र और मन्त्रियोंके साथ विनाशके मुखमें न जायेँ

বিদুর বললেন—অতএব, রাজেন্দ্র! ভূমি ও রাজ্যলাভের জন্য মিথ্যা বলো না। পুত্রের মোহে সত্য বলা থেকে বিরত থেকো না; নচেৎ পুত্র ও মন্ত্রীদের সঙ্গে সর্বনাশের পথে এগিয়ে যাবে।

Verse 40

न देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत्‌ | यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्धया संविभजन्ति तम्‌,देवतालोग चरवाहोंकी तरह डंडा लेकर किसीका पहरा नहीं देते। वे जिसकी रक्षा करना चाहते हैं, उसे उत्तम बुद्धिसे युक्त कर देते हैं

দেবতারা গোপালের মতো লাঠি হাতে নিয়ে কারও পাহারা দেন না। যাকে তাঁরা রক্ষা করতে চান, তাকে তাঁরা বিবেচনাশীল বুদ্ধি দান করেন—যাতে সে সঠিক বিচার করে নিজেই নিজের কল্যাণ সাধন করতে পারে।

Verse 41

यथा यथा हि पुरुष: कल्याणे कुरुते मन: । तथा तथास्यथ सर्वार्था: सिद्धयन्ते नात्र संशय:,मनुष्य जैसे-जैसे कल्याणमें मन लगाता है, वैसे-ही-वैसे उसके सारे अभीष्ट सिद्ध होते हैं--इसमें तनिक भी संदेह नहीं है

মানুষ যত যত করে মনকে কল্যাণ ও ধর্মের দিকে স্থির করে, তত ততই তার সকল ন্যায্য অভীষ্ট সিদ্ধ হয়—এতে কোনো সন্দেহ নেই।

Verse 42

प्रह्नमादजीका न्याय आत्रेय मुनि और साध्यगण नैनं छनन्‍्दांसि वृजिनात्‌ तारयन्ति मायाविनं मायया वर्तमानम्‌ | नीडं शकुन्ता इव जातपक्षा- श्छन्दांस्थेनं प्रजहत्यन्तकाले,कपट॒पूर्ण व्यवहार करनेवाले मायावीको वेद पापोंसे मुक्त नहीं करते; किंतु जैसे पंख निकल आनेपर चिड़ियोंके बच्चे घोंसला छोड़ देते हैं, उसी प्रकार वेद भी अन्तकालमें उस (मायावी)-को त्याग देते हैं

মায়ায় জীবনযাপনকারী প্রতারককে বৈদিক ছন্দ পাপ থেকে উদ্ধার করে না। বরং জীবনের অন্তিম কালে বেদ তাকে ত্যাগ করে—যেমন ডানা গজালে পাখির ছানারা বাসা ছেড়ে যায়।

Verse 43

मद्यपानं कलहूं, पूगवैरं भार्यपत्योरन्तरं ज्ञातिभेदम्‌ । राजद्विष्ट॑ स्त्रीपुंसयोविवादं वर्ज्यान्याहुर्यश्व॒ पन्था: प्रदुष्ट:,शराब पीना, कलह, समूहके साथ वैर, पति-पत्नीमें भेद पैदा करना, कुटुम्बवालोंमें भेदबुद्धि उत्पन्न करना, राजाके साथ द्वेष, स्त्री और पुरुषमें विवाद और बुरे रास्ते--ये सब त्याग देनेयोग्य बताये गये हैं

মদ্যপান, কলহ, নিজের দলের সঙ্গে বৈর, স্বামী-স্ত্রীর মধ্যে বিচ্ছেদ সৃষ্টি, আত্মীয়দের মধ্যে বিভেদ, রাজার প্রতি বিদ্বেষ, নারী-পুরুষের বিবাদ, এবং যে কোনো কলুষিত আচরণের পথ—এসবই ত্যাজ্য বলে বলা হয়েছে।

Verse 44

सामुद्रिकं वणिजं चोरपूर्व शलाकधूर्त॑ च चिकित्सकं च | अरिं च मित्र च कुशीलवं च नैतान्‌ साक्ष्ये त्वधिकुर्वीत सप्त,हस्तरेखा देखनेवाला, चोरी करके व्यापार करनेवाला, जुआरी, वैद्य, शत्रु, मित्र और नर्तक--इन सातोंको कभी भी गवाह न बनावे

বিদুর বলেন—সাক্ষ্যের বিষয়ে এই সাতজনকে কখনও সাক্ষী করা উচিত নয়: সামুদ্রিক/হস্তরেখা-দর্শক, চৌর্যবৃত্তি-যুক্ত বণিক, ছলনায় পারদর্শী জুয়াড়ি, চিকিৎসক, শত্রু, বন্ধু এবং কুশীলব (নট-নর্তক)।

Verse 45

मानाग्निहोत्रमुत मानमौनं मानेनाधीतमुत मानयज्ञ: । एतानि चत्वार्यभयंकराणि भयं प्रयच्छन्त्ययथाकृतानि,आदरके साथ अमन्निहोत्र, आदरपूर्वक मौनका पालन, आदरपूर्वक स्वाध्याय और आदरके साथ यज्ञका अनुष्ठान--ये चार कर्म भयको दूर करनेवाले हैं; किंतु वे ही यदि ठीक तरहसे सम्पादित न हों तो भय प्रदान करनेवाले होते हैं

বিদুর বলেন—শ্রদ্ধাসহ অগ্নিহোত্র, শ্রদ্ধাসহ মৌন, শ্রদ্ধাসহ স্বাধ্যায় এবং শ্রদ্ধাসহ যজ্ঞ—এই চারটি কর্ম স্বভাবতই ভয়নাশক; কিন্তু বিধিমতো না হলে এগুলিই ভয়ের কারণ হয়ে ওঠে।

Verse 46

अगारदाही गरद: कुण्डाशी सोमविक्रयी । पर्वकारश्न सूची च मित्रध्रुक्‌ पारदारिक:,घरमें आग लगानेवाला, विष देनेवाला, जारज संतानकी कमाई खानेवाला, सोमरस बेचनेवाला, शस्त्र बनानेवाला, चुगली करनेवाला, मित्रद्रोही, परस्त्रीलम्पट, गर्भकी हत्या करनेवाला, गुरुस्त्रीगामी, ब्राह्मण होकर शराब पीनेवाला, अधिक तीखे स्वभाववाला, कौएकी तरह कार्ये-कार्यँ करनेवाला, नास्तिक, वेदकी निन्दा करनेवाला, ग्रामपुरोहित, व्रात्य-, क्रूर तथा शक्तिमान्‌ होते हुए भी “मेरी रक्षा करो", इस प्रकार कहनेवाले शरणागतका जो वध करता है--ये सब-के-सब ब्रह्म-हत्यारोंके समान हैं

বিদুর বললেন—যে পরের ঘরে আগুন লাগায়, যে বিষ দেয়, যে পরস্ত্রী-সম্বন্ধজাত সন্তানের উপার্জনে জীবিকা চালায়, যে সোম বিক্রি করে, যে অস্ত্র নির্মাণ করে, যে পরনিন্দা/চুগলি করে, যে বন্ধুদ্রোহী, এবং যে পরস্ত্রীলম্পট—এরা সকলেই মহাপাপীদের দলে গণ্য।

Verse 47

भ्रूणहा गुरुतल्पी च यश्न स्यात्‌ पानपो द्विज: । अतितीक्षणश्न॒ काकश्न नास्तिको वेदनिन्दक:,घरमें आग लगानेवाला, विष देनेवाला, जारज संतानकी कमाई खानेवाला, सोमरस बेचनेवाला, शस्त्र बनानेवाला, चुगली करनेवाला, मित्रद्रोही, परस्त्रीलम्पट, गर्भकी हत्या करनेवाला, गुरुस्त्रीगामी, ब्राह्मण होकर शराब पीनेवाला, अधिक तीखे स्वभाववाला, कौएकी तरह कार्ये-कार्यँ करनेवाला, नास्तिक, वेदकी निन्दा करनेवाला, ग्रामपुरोहित, व्रात्य-, क्रूर तथा शक्तिमान्‌ होते हुए भी “मेरी रक्षा करो", इस प्रकार कहनेवाले शरणागतका जो वध करता है--ये सब-के-सब ब्रह्म-हत्यारोंके समान हैं

বিদুর বলেন—ভ্রূণহন্তা, গুরুর পত্নীগামী, মদ্যপায়ী ব্রাহ্মণ, অতিশয় কঠোর স্বভাবের ব্যক্তি, কাকের মতো অবিবেচক আচরণকারী, নাস্তিক এবং বেদ-নিন্দাকারী—এরা সকলেই ব্রহ্মহত্যার সমতুল্য পাপী বলে গণ্য।

Verse 48

ख्रुवप्रग्रहणो व्रात्य: कीनाशश्नात्मवानपि । रक्षेत्युक्तश्न यो हिंस्यात्‌ सर्वे ब्रह्मृहभि: समा:,घरमें आग लगानेवाला, विष देनेवाला, जारज संतानकी कमाई खानेवाला, सोमरस बेचनेवाला, शस्त्र बनानेवाला, चुगली करनेवाला, मित्रद्रोही, परस्त्रीलम्पट, गर्भकी हत्या करनेवाला, गुरुस्त्रीगामी, ब्राह्मण होकर शराब पीनेवाला, अधिक तीखे स्वभाववाला, कौएकी तरह कार्ये-कार्यँ करनेवाला, नास्तिक, वेदकी निन्दा करनेवाला, ग्रामपुरोहित, व्रात्य-, क्रूर तथा शक्तिमान्‌ होते हुए भी “मेरी रक्षा करो", इस प्रकार कहनेवाले शरणागतका जो वध करता है--ये सब-के-सब ब्रह्म-हत्यारोंके समान हैं

বিদুর বলেন—ব্রাত্য হোক, কৃষক হোক, কিংবা আত্মবলসম্পন্ন শক্তিমানই হোক—যে আশ্রয় চেয়ে বলে ‘আমাকে রক্ষা করো’, তাকে আঘাত করা উচিত নয়। যে এমন শরণাগতকে কষ্ট দেয় বা হত্যা করে, সে ব্রহ্মহন্তার সমান।

Verse 49

तृणोल्कया ज्ञायते जातरूप॑ं वृत्तेन भद्रो व्यवहारेण साधु: । शूरो भयेष्वर्थकृच्छेषु धीर: कृच्छेष्वापत्सु सुहृदश्चारयश्च,जलती हुई आगसे सुवर्णकी पहचान होती है, सदाचारसे सत्पुरुषकी, व्यवहारसे श्रेष्ठ पुरुषकी, भय प्राप्त होनेपर शूरकी, आर्थिक कठिनाईमें धीरकी और कठिन आपपत्तिमें शत्रु एवं मित्रकी परीक्षा होती है

বিদুর বলেন—আগুনে পরীক্ষা হলে সোনার পরিচয় মেলে; আচরণে সজ্জনের, ব্যবহারে সত্যিকারের মহৎ পুরুষের। ভয় উপস্থিত হলে বীরের পরিচয়, অর্থকষ্টে ধীরের; আর ঘোর বিপদে বোঝা যায় কে প্রকৃত বন্ধু, কে শত্রু।

Verse 50

जरा रूप॑ हरति हि धैर्यमाशा मृत्यु: प्राणान्‌ धर्मचर्यामसूया । क्रोध: श्रियं शीलमनार्यसेवा हियं काम: सर्वमेवाभिमान:,बुढ़ापा (सुन्दर) रूपको, आशा धीरताको, मृत्यु प्राणोंको, असूया (गुणोंमें दोष देखनेका स्वभाव) धर्माचरणको, क्रोध लक्ष्मीको, नीच पुरुषोंकी सेवा सत्स्वभभावको, काम लज्जाको और अभिमान सर्वस्वको नष्ट कर देता है

বিদুর বলেন—বার্ধক্য রূপ কেড়ে নেয়; আসক্তিময় আশা ধৈর্য হরণ করে; মৃত্যু প্রাণ হরণ করে; আর দোষদর্শী ঈর্ষা ধর্মাচরণ নষ্ট করে। ক্রোধ লক্ষ্মী নাশ করে; নীচের সেবা শীল নষ্ট করে; কাম লজ্জা হরণ করে; আর অহংকার সর্বস্ব গ্রাস করে।

Verse 51

श्रीमड्नलात्‌ प्रभवति प्रागल्भ्यात्‌ सम्प्रवर्धते । दाक्ष्यात्‌ तु कुरुते मूलं संयमात्‌ प्रतितिष्ठति,शुभ कर्मोसे लक्ष्मीकी उत्पत्ति होती है, प्रगल्भतासे वह बढ़ती है, चतुरतासे जड़ जमा लेती है और संयमसे सुरक्षित रहती है

বিদুর বলেন—শুভ কর্ম থেকে লক্ষ্মীর জন্ম; সাহসী উদ্যোগে তার বৃদ্ধি; দক্ষতায় সে শিকড় গাড়ে; আর সংযমে সে স্থির ও নিরাপদ থাকে।

Verse 52

अष्टौ गुणा: पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च दम: श्रुतं च । पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च,आठ गुण पुरुषकी शोभा बढ़ाते हैं--बुद्धि, कुलीनता, दम, शास्त्रज्ञान, पराक्रम, बहुत न बोलना, यथाशक्ति दान देना और कृतज्ञ होना

বিদুর বললেন—আটটি গুণ মানুষকে দীপ্ত করে: প্রজ্ঞা, কৌলীন্য, দম (ইন্দ্রিয়সংযম), শ্রুত (শাস্ত্রজ্ঞান), পরাক্রম, অল্পভাষিতা, সামর্থ্য অনুযায়ী দান, এবং কৃতজ্ঞতা।

Verse 53

एतान्‌ गुणांस्तात महानुभावा- नेको गुण: संश्रयते प्रसहा । राजा यदा सत्कुरुते मनुष्यं सर्वान्‌ गुणानेष गुणो विभाति,तात! एक गुण ऐसा है, जो इन सभी महत्त्वपूर्ण गुणोंपर हठात्‌ अधिकार जमा लेता है। जिस समय राजा किसी मनुष्यका सत्कार करता है, उस समय यह एक ही गुण (राजसम्मान) सभी गुणोंसे बढ़कर शोभा पाता है

বিদুর বললেন—হে তাত! এই মহৎ গুণসমূহকে একটিমাত্র গুণ জোর করে নিজের আশ্রয়ে টেনে নেয়। রাজা যখন কোনো ব্যক্তিকে সম্মান দেন, তখন সেই এক গুণ—রাজসম্মান—সব গুণকে ছাপিয়ে উজ্জ্বল হয়ে ওঠে।

Verse 54

अष्टी नृपेमानि मनुष्यलोके स्वर्गस्थ लोकस्य निदर्शनानि । चत्वार्येषामन्ववेतानि सद्धि- श्वृत्वारि चैषामनुयान्ति सन्‍्तः,राजन! मनुष्यलोकमें ये आठ गुण स्वर्गलोकका दर्शन करानेवाले हैं; इनमेंसे चार तो संतोंके साथ नित्य सम्बद्ध हैं--उनमें सदा विद्यमान रहते हैं और चारका सज्जन पुरुष अनुसरण करते हैं

বিদুর বললেন—হে রাজন, মানবলোকে এমন আটটি গুণ আছে যা স্বর্গলোকের দিকে নির্দেশকারী স্পষ্ট লক্ষণ। এর মধ্যে চারটি সজ্জনদের সঙ্গেই অবিচ্ছিন্নভাবে যুক্ত—তাদের মধ্যে সদা বিরাজমান; আর বাকি চারটি সেই গুণ, যা সদাচারী জনেরা সচেতনভাবে অনুসরণ ও সাধন করেন।

Verse 55

यज्ञों दानमध्ययनं तपश्न चत्वार्येतान्यन्ववेतानि सद्धिः | दम: सत्यमार्जवमानृशंस्यं चत्वार्येतान्यनुयान्ति सन्त:,यज्ञ, दान, शास्त्रोंका अध्ययन और तप--ये चार सज्जनोंके साथ नित्य सम्बद्ध हैं और इन्द्रियनिग्रह, सत्य, सरलता तथा कोमलता--इन चारोंका संतलोग अनुसरण करते हैं

যজ্ঞ, দান, শাস্ত্র অধ্যয়ন ও তপস্যা—এই চারটি সজ্জনদের সঙ্গে নিত্য যুক্ত থাকে। আর ইন্দ্রিয়সংযম, সত্য, সরলতা ও করুণা—এই চারটি গুণ সাধুজন অনুসরণ করেন।

Verse 56

इज्याध्ययनदानानि तप: सत्य॑ क्षमा घृणा । अलोभ इति मार्गो<यं धर्मस्याष्टविध: स्मृत:,यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, दया और निर्लेभता--ये धर्मके आठ प्रकारके मार्ग बताये गये हैं

যজ্ঞ, অধ্যয়ন, দান, তপস্যা, সত্য, ক্ষমা, দয়া এবং নির্লোভতা—এইটিই ধর্মের অষ্টবিধ পথ বলে স্মৃত।

Verse 57

तत्र पूर्वचतुर्वर्गो दम्भार्थमपि सेव्यते । उत्तरश्न चतुर्वर्गो नामहात्मसु तिष्तति,इनमेंसे पहले चारोंका तो कोई (दम्भी पुरुष भी) दम्भके लिये सेवन कर सकता है, परंतु अन्तिम चार तो जो महात्मा नहीं हैं, उनमें रह ही नहीं सकते

এ বিষয়ে প্রথম চারটি গুণ তো দম্ভের জন্যও পালন করা যায়; কিন্তু শেষ চারটি গুণ মহাত্মা নন—এমন লোকের মধ্যে সত্যিই স্থির থাকে না।

Verse 58

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा नते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम्‌ नासौ धर्मों यत्र न सत्यमस्ति न तत्‌ सत्यं यच्छलेना भ्युपेतम्‌,जिस सभामें बड़े-बूढ़े नहीं, वह सभा नहीं; जो धर्मकी बात न कहें, वे बूढ़े नहीं; जिसमें सत्य नहीं, वह धर्म नहीं और जो कपटसे पूर्ण हो, वह सत्य नहीं है

যে সভায় বৃদ্ধজন নেই, তা সভা নয়; আর যারা ধর্মের কথা বলে না, তারা বৃদ্ধও নয়। যেখানে সত্য নেই, সেখানে ধর্ম নেই; আর যা ছলনার দ্বারা প্রতিষ্ঠিত, তা সত্য নয়।

Verse 59

सत्यं रूप॑ श्रुतं विद्या कौल्यं शीलं बलं धनम्‌ | शौर्य च चित्रभाष्यं च दशेमे स्वर्गयोनय:,सत्य, विनयकी मुद्रा, शास्त्रज्ञान, विद्या, कुलीनता, शील, बल, धन, शूरता और चमत्कारपूर्ण बात कहना--ये दस स्वर्गके हेतु हैं

বিদুর বললেন—সত্য, মনোহর ও মর্যাদাময় রূপ, শ্রবণসূত্রে প্রাপ্ত শাস্ত্র-পরম্পরার জ্ঞান, প্রকৃত বিদ্যা, কুলীনতা, শীল, বল, ধন, শৌর্য এবং চিত্রবৎ দীপ্তিময় বাক্য—এই দশটি স্বর্গপ্রাপ্তির কারণ বলে কথিত।

Verse 60

पाप॑ं कुर्वन्‌ पापकीर्ति: पापमेवा श्ुते फलम्‌ | पुण्य॑ कुर्वन्‌ पुण्यकीर्ति: पुण्यमत्यन्तमश्चुते,पापकीर्तिवाला निन्दित मनुष्य पापाचरण करता हुआ पापके फलको ही प्राप्त करता है और पुण्य कीर्तिवाला (प्रशंसित) मनुष्य पुण्य करता हुआ अत्यन्त पुण्यफलका ही उपभोग करता है

পাপ করে যে পাপখ্যাতি অর্জন করে, সে পাপের ফলই ভোগ করে; আর পুণ্য করে যে পুণ্যখ্যাতি পায়, সে পরম পুণ্যফলই ভোগ করে।

Verse 61

तस्मात्‌ पापं न कुर्वीत पुरुष: शंसितव्रत: । पापं प्रज्ञां नाशयति क्रियमाणं पुन: पुन:,इसलिये प्रशंसित व्रतका आचरण करनेवाले पुरुषको पाप नहीं करना चाहिये; क्योंकि बारंबार किया हुआ पाप बुद्धिको नष्ट कर देता है

অতএব প্রশংসিত ব্রত পালনকারী পুরুষের পাপ করা উচিত নয়; কারণ বারবার করা পাপ প্রজ্ঞাকে নষ্ট করে দেয়।

Verse 62

नष्टप्रज्ञ: पापमेव नित्यमारभते नर: । पुण्यं प्रज्ञां वर्धयति क्रियमाणं पुन: पुन:,जिसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है, वह मनुष्य सदा पाप ही करता रहता है। इसी प्रकार बारंबार किया हुआ पुण्य बुद्धिको बढ़ाता है

যার প্রজ্ঞা নষ্ট হয়ে যায়, সে মানুষ সর্বদাই পাপের কাজে প্রবৃত্ত হয়; আর তেমনি বারবার করা পুণ্য প্রজ্ঞাকে বৃদ্ধি করে।

Verse 63

वृद्धप्रज्ञ: पुण्यमेव नित्यमारभते नर: । पुण्यं कुर्वन्‌ पुण्यकीर्ति: पुण्यं स्थानं सम गच्छति । तस्मात्‌ पुण्यं निषेवेत पुरुष: सुसमाहितः,जिसकी बुद्धि बढ़ जाती है, वह मनुष्य सदा पुण्य ही करता है। इस प्रकार पुण्यकर्मा मनुष्य पुण्य करता हुआ पुण्यलोकको ही जाता है। इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह सदा एकाग्रचित्त होकर पुण्यका ही सेवन करे

যার প্রজ্ঞা পরিণত হয়েছে, সে মানুষ সর্বদাই পুণ্যকর্মে প্রবৃত্ত হয়। পুণ্য করতে করতে সে পুণ্যখ্যাতি লাভ করে এবং পুণ্যময় গন্তব্যে পৌঁছে যায়। অতএব মানুষের উচিত সুসংযতচিত্তে পুণ্যেই নিবিষ্ট থাকা।

Verse 64

असूयको दन्दशूको निष्ठछरो वैरकूच्छठ: । स कृच्छूं महदाप्रोति न चिरात्‌ पापमाचरन्‌,गुणोंमें दोष देखनेवाला, मर्मपर आघात करने-वाला, निर्दयी, शत्रुता करनेवाला और शठ मनुष्य पापका आचरण करता हुआ शीघ्र ही महान्‌ कष्टको प्राप्त होता है

যে ব্যক্তি ঈর্ষাপরায়ণ, দংশনকারী কঠোর বাক্যে আঘাত করে, নির্দয়, শত্রুতা পোষণ করে এবং শঠ—সে পাপাচরণে লিপ্ত থেকে অচিরেই মহাদুঃখে পতিত হয়।

Verse 65

अनसूयु: कृतप्रज्ञ: शोभनान्याचरन्‌ सदा । न कृच्छूं महदाप्रोति सर्वत्र च विरोचते,दोषदृष्टिसे रहित शुद्ध बुद्धिवाला पुरुष सदा शुभकर्मोका अनुष्ठान करता हुआ महान्‌ सुखको प्राप्त होता है और सर्वत्र उसका सम्मान होता है

যে ব্যক্তি দোষদৃষ্টি-রহিত, স্থিরবুদ্ধি এবং সর্বদা শুভ আচরণে রত—সে মহাদুঃখে পতিত হয় না; সর্বত্রই সে দীপ্তিমান হয়ে সম্মান লাভ করে।

Verse 66

प्रज्ञामेवागमयति य: प्राज्ञेभ्य:ः स पण्डित: । प्राज्ञो हवाप्य धर्मार्थी शक्‍्नोति सुखमेधितुम्‌,जो बुद्धिमान्‌ पुरुषोंसे सदबुद्धि प्राप्त करता है, वही पण्डित है; क्योंकि बुद्धिमान्‌ पुरुष ही धर्म और अर्थको प्राप्तककर अनायास ही अपनी उन्नति करनेमें समर्थ होता है

যে ব্যক্তি জ্ঞানীদের নিকট থেকে প্রজ্ঞা অর্জন করে, সেই-ই পণ্ডিত; কারণ প্রাজ্ঞ ব্যক্তি ধর্ম ও অর্থ সাধন করে অনায়াসে সুখসহ উন্নতি করতে সক্ষম।

Verse 67

दिवसेनैव तत्‌ कुर्याद्‌ येन रात्रौ सुखं वसेत्‌ अष्टमासेन तत्‌ कुर्याद्‌ येन वर्षा: सुखं वसेत्‌,दिनभरमें ही वह कार्य कर ले, जिससे रातमें सुखसे रह सके और आठ महीनोंमें वह कार्य कर ले, जिससे वर्षाके चार महीने सुखसे व्यतीत कर सके

দিনের মধ্যেই সেই কাজ সম্পন্ন করা উচিত, যাতে রাতে সুখে থাকা যায়; আর আট মাসের মধ্যেই সেই কাজ করে রাখা উচিত, যাতে বর্ষার চার মাস সুখে কাটে।

Verse 68

पूर्वे वयसि तत्‌ कुर्याद्‌ येन वृद्ध: सुखं वसेत्‌ । यावज्जीवेन तत्‌ कुर्याद्‌ येन प्रेत्य सुखं वसेत्‌,पहली अवस्थामें वह काम करे, जिससे वृद्धावस्थामें सुखपूर्वक रह सके और जीवनभर वह कार्य करे, जिससे मरनेके बाद भी (परलोकमें) सुखसे रह सके

যৌবনেই সেই কাজ করা উচিত, যাতে বার্ধক্যে সুখে থাকা যায়; আর জীবনভর এমন কর্ম করা উচিত, যাতে মৃত্যুর পরে পরলোকে সুখে বাস করা যায়।

Verse 69

जीर्णमन्नं प्रशंसन्ति भार्या च गतयौवनाम्‌ । शूरं विजितसंग्रामं गतपारं तपस्विनम्‌,सज्जन पुरुष पच जानेपर अन्नकी, (निष्कलंक) यौवन बीत जानेपर स्त्रीकी, संग्राम जीत लेनेपर शूरकी और संसारसागरको पार कर लेनेपर तपस्वीकी प्रशंसा करते हैं

লোকেরা বাসি অন্নের, যৌবন-অতীত স্ত্রীর, যুদ্ধজয়ী বীরের এবং সংসার-সাগর পার হওয়া তপস্বীরই প্রশংসা করে।

Verse 70

धनेनाधर्मलब्धेन यच्छिद्रमपिधीयते । असंवृतं तद्‌ भवति ततो<न्यदवदीर्यते,अधर्मसे प्राप्त हुए धनके द्वारा जो दोष छिपाया जाता है, वह तो छिपता नहीं; (परंतु दोष छिपानेके कारण) उससे भिन्न और नया दोष प्रकट हो जाता है

অধর্মে অর্জিত ধন দিয়ে যে দোষ ঢাকতে চাওয়া হয়, তা ঢাকে না; বরং সেখান থেকে আর-একটি নতুন দোষ প্রকাশ পায়।

Verse 71

गुरुरात्मवतां शास्ता शास्ता राजा दुरात्मनाम्‌ | अथ प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्चतो यम:,अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें करनेवाले शिष्योंके शासक गुरु हैं, दुष्टोंके शासक राजा हैं और छिपे-छिपे पाप करनेवालोंके शासक सूर्यपुत्र यमराज हैं

আত্মসংযমীদের শাসক গুরু, দুষ্টদের শাসক রাজা, আর গোপনে পাপকারীদের শাসক বৈবস্বত যম।

Verse 72

ऋषीणां च नदीनां च कुलानां च महात्मनाम्‌ | प्रभवो नाधिगन्तव्यः स्त्रीणां दुश्नरितस्थ च,ऋषि, नदी, वंश एवं महात्माओंका तथा स्त्रियोंके दुश्चरित्रका उत्पत्तिस्थान नहीं जाना जा सकता

ঋষি, নদী, বংশ ও মহাত্মাদের উৎপত্তিস্থান জানা যায় না; তেমনি নারীর দুশ্চরিত্রের উৎসও নিশ্চিতভাবে নির্ণয় করা যায় না।

Verse 73

द्विजातिपूजाभिरतो दाता ज्ञातिषु चार्जवी । क्षत्रिय: शीलभागू राजंश्विरं पालयते महीम्‌,राजन! ब्राह्मणोंकी सेवा-पूजामें संलग्न रहनेवाला, दाता, कुट॒म्बीजनोंके प्रति कोमलताका बर्ताव करने-वाला और शीलवान्‌ राजा चिरकालतक पृथ्वीका पालन करता है

রাজন! যে ক্ষত্রিয় দ্বিজদের পূজা-সেবায় রত, দানশীল, স্বজনদের প্রতি সরল ও কোমল আচরণকারী এবং শীলবান—সে রাজা দীর্ঘকাল পৃথিবী রক্ষা করে।

Verse 74

सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वन्ति पुरुषास्त्रय: । शूरश्न कृतविद्यश्न यश्व जानाति सेवितुम्‌,शूर, विद्वान्‌ और सेवाधर्मको जाननेवाले--ये तीन प्रकारके मनुष्य पृथ्वीरूप लतासे सुवर्णरूपी पुष्पका संचय करते हैं

বিদুর বললেন—এই পৃথিবী যেন সোনালি ফুলধারী এক লতা। সেই সোনার ফুল কুড়োয় কেবল তিন প্রকার মানুষ—(১) বীর, (২) বিদ্যায় সুপ্রশিক্ষিত পণ্ডিত, এবং (৩) যে সেবাধর্ম জানে—যথাবিধি পরিচর্যা করতে পারে।

Verse 75

बुद्धिश्रेष्ठानि कर्माणि बाहुमध्यानि भारत । तानि जड्घाजघन्यानि भारप्रत्यवराणि च,भारत! बुद्धिसे विचारकर किये हुए कर्म श्रेष्ठ होते हैं, बाहुबलसे किये जानेवाले कर्म मध्यम श्रेणीके हैं, जंघासे किये जानेवाले कार्य अधम हैं और भार ढोनेका काम महान्‌ अधम है

বিদুর বললেন—হে ভারত! বুদ্ধিবিবেচনায় পরিচালিত কর্মই শ্রেষ্ঠ; বাহুবলে সম্পন্ন কর্ম মধ্যম; পায়ের জোরে করা কাজ অধম; আর কেবল বোঝা বহনের কাজ সর্বাধিক নীচ।

Verse 76

दुर्योधनेड5थ शकुनौ मूढे दुःशासने तथा । कर्णे चैश्वर्यमाधाय कथं त्वं भूतिमिच्छसि,राजन! अब आप दुर्योधन, शकुनि, मूर्ख दुःशासन तथा कर्णपर राज्यका भार रखकर उन्नति कैसे चाहते हैं?

বিদুর বললেন—হে রাজন! দুর্যোধন, শকুনি, মূঢ় দুঃশাসন এবং কর্ণের হাতে রাজ্যৈশ্বর্য সঁপে দিয়ে আপনি কীভাবে মঙ্গল ও উন্নতি কামনা করেন?

Verse 77

सर्वर्गणैरुपेतास्तु पाण्डवा भरतर्षभ | पितृवत्‌ त्वयि वर्तन्ते तेषु वर्तस्व पुत्रवत्‌

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! পাণ্ডবরা তাদের সকল অনুচরসহ আপনার প্রতি পিতার ন্যায় আচরণ করে; অতএব আপনিও তাদের প্রতি পুত্রদের ন্যায় আচরণ করুন।

Frequently Asked Questions

How a ruler should choose policy under anxiety and factional pressure: Vidura argues for dharma-grounded decisions that weigh consequences, restrain impulse, and prevent self-inflicted decline.

Sovereignty is stabilized by pramāṇa (proper measure), sustainable acquisition without harm, disciplined speech, and mastery over internal enemies; without self-control, external victory efforts become counterproductive.

No formal phalaśruti is stated in the provided passage; instead, the chapter embeds pragmatic “results” logic—prosperity follows dharmic conduct and measured policy, while arrogance, uncontrolled senses, and harsh speech produce political deterioration.