Adhyaya 185
Udyoga ParvaAdhyaya 18542 Verses

Adhyaya 185

भीष्मस्वप्न-स्मृत्युपाख्यानम् | Bhīṣma’s Dream-Linked Recollection of the Paraśurāma Combat

Upa-parva: Bhīṣma–Paraśurāma Saṃsmaraṇa (Retrospective Combat Narrative)

Bhīṣma reports awakening after a night in which he reflects on a significant dream and experiences profound exhilaration, segueing into a recollection of a formidable duel with Bhārgava Rāma (Paraśurāma). The engagement intensifies through successive exchanges: Paraśurāma unleashes a dense rain of arrows, which Bhīṣma checks with a counter-net of shafts. Paraśurāma, anger renewed, hurls a blazing śakti described with storm- and death-staff imagery; it strikes Bhīṣma at the shoulder, drawing heavy blood. Bhīṣma retaliates with a lethal, venom-like arrow that marks Paraśurāma’s forehead; Paraśurāma answers with a terrible projectile that brings Bhīṣma down, bloodied, before Bhīṣma regains consciousness and casts a radiant śakti into Paraśurāma’s arm-region, causing destabilization. A Brahmin ascetic companion consoles Paraśurāma, who then manifests the supreme Brahmāstra; Bhīṣma counters with the same class of weapon to neutralize it. The convergence of the two Brahmāstras generates pure blazing energy in the sky, inducing distress among beings, sages, gandharvas, and devas; the earth trembles, directions smoke, and the world cries out in alarm. In response to brahmavādin counsel, Bhīṣma resolves to ‘put to sleep’ (prasvāpa) the weapon—signaling that the highest dharmic act in an escalated contest is the deliberate cessation of catastrophic force.

Chapter Arc: भीष्म–परशुराम के महायुद्ध का धुआँ अभी थमा ही है कि नारद के बीच-बचाव के बाद कथा अम्बा की कठोर प्रतिज्ञा पर टिक जाती है—जिसे अपमान ने तपस्या में बदल दिया है। → परशुराम स्वीकार करते हैं कि उत्तमोत्तम अस्त्र दिखाकर भी वे युद्ध में भीष्म पर निर्णायक ‘विशेषता’ सिद्ध नहीं कर सके; अम्बा का क्रोध और अधिक तीव्र होकर देह-त्यागी तप में ढलता है—वह तीर्थ-तीर्थ भटकती, वत्सदेश के आश्रमों में विचरती, एक पर्ण पर निर्वाह करती और पादाङ्गुष्ठाग्र पर स्थिर रहकर वर्ष-पर-वर्ष तप करती है। → तपस्या की पराकाष्ठा पर अम्बा का रूपांतरण घटित होता है—उसके तप के प्रभाव से वह आधे शरीर से ‘अम्बा’ और आधे से ‘नदी’ के रूप में प्रकट होती है; मानो प्रतिशोध स्वयं प्रकृति में उतर आया हो। → अम्बा का तप अब केवल व्यक्तिगत शोक नहीं रहता; वह एक दैवी-नियत संकेत बन जाता है—भीष्म-वध की दिशा में उसकी साधना का फल आकार लेने लगता है, और कथा ‘अम्बोपाख्यान’ के अगले मोड़ के लिए भूमि तैयार करती है। → अम्बा का यह अद्भुत रूपांतरण आगे किस देह/जन्म में भीष्म के विनाश का कारण बनेगा—और किसके माध्यम से—यह प्रश्न अगले अध्यायों में तना रहता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--#ह< बक। है २ >> भीष्म और परशुरामके युद्धमें नारदजीद्वारा बीच-बचाव षडशीरत्याधेकशततमो< ध्याय: अम्बाकी कठोर तपस्या राम उवाच प्रत्यक्षमेतल्‍लोकानां सर्वेषामेव भाविनि । यथाशकक्‍्त्या मया युद्ध कृतं वै पौरुषं परम्‌

রাম (পরশুরাম) বললেন—হে ভাবিনি! সকল লোকই প্রত্যক্ষ দেখেছে যে আমি আমার সামর্থ্য অনুযায়ী যুদ্ধ করেছি এবং পরম বীর্য প্রদর্শন করেছি।

Verse 2

न चैवमपि शक्‍्नोमि भीष्म॑ शस्त्रभूतां वरम्‌ । विशेषयितुमत्यर्थमुत्तमास्त्राणि दर्शयन्‌

তবু এভাবে শ্রেষ্ঠ শ্রেষ্ঠ অস্ত্র প্রদর্শন করেও আমি অস্ত্রধারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ভীষ্মের উপর আমার কোনো বিশেষ শ্রেষ্ঠতা প্রমাণ করতে পারিনি।

Verse 3

एषा मे परमा शक्तिरेतन्मे परमं बलम्‌ | यथेष्टं गम्यतां भद्गरे किमन्‍्यद्‌ वा करोमि ते

এটাই আমার পরম শক্তি, এটাই আমার সর্বোচ্চ বল। হে ভদ্রে! এখন তোমার ইচ্ছামতো যেখানে খুশি যাও; অথবা বলো—তোমার আর কোন কাজ আমি সম্পন্ন করব?

Verse 4

भीष्ममेव प्रपद्यस्व न ते5न्या विद्यते गति: । निर्जितो हास्मि भीष्मेण महास्त्राणि प्रमुडचता

শুধু ভীষ্মেরই শরণ নাও; তোমার জন্য অন্য কোনো পথ নেই। মহাস্ত্র নিক্ষেপ করেও ভীষ্ম আমাকে পরাজিত করেছেন।

Verse 5

एवमुक्‍क्त्वा ततो रामो विनि:श्वस्य महामना: । तूष्णीमासीत्‌ ततः कन्या प्रोवाच भूगुनन्दनम्‌,ऐसा कहकर महामना परशुराम लंबी साँस खींचते हुए मौन हो गये। तब राजकन्या अम्बाने उन भृगुनन्दनसे कहा--

এ কথা বলে মহাত্মা পরশুরাম দীর্ঘ নিশ্বাস ফেলে নীরব হয়ে রইলেন। তখন রাজকন্যা অম্বা ভৃগুনন্দনকে বললেন।

Verse 6

भगवन्नेवमेवैतद्‌ यथा55ह भगवांस्तथा । अजेयो युधि भीष्मो5यमपि देवैरुदारधी:

ভগবন্, আপনি যেমন বলেছেন ঠিক তেমনই। উদারবুদ্ধি এই ভীষ্ম যুদ্ধে দেবতাদের কাছেও অজেয়।

Verse 7

“भगवन्‌! आपका कहना ठीक है। वास्तवमें ये उदारबुद्धि भीष्म युद्धमें देवताओंके लिये भी अजेय हैं ।।

ভগবন্, আপনার কথা যথার্থ। সত্যই উদারবুদ্ধি ভীষ্ম যুদ্ধে দেবতাদের কাছেও অজেয়। আপনি আপনার সমস্ত শক্তি ও পূর্ণ উদ্যমে আমার কাজ সম্পন্ন করেছেন; রণে এমন বীর্য দেখিয়েছেন যা ভীষ্ম ব্যতীত আর কেউ রোধ করতে পারে না, এবং নানাবিধ দিব্যাস্ত্রও প্রকাশ করেছেন।

Verse 8

न चैव शक्‍्यते युद्धे विशेषयितुमन्तत: । न चाहमेनं यास्यामि पुनर्भीष्मं कथंचन

কিন্তু শেষ পর্যন্ত যুদ্ধে তাঁর তুলনায় নিজের শ্রেষ্ঠত্ব স্থাপন করা সম্ভব নয়। আর আমি কোনোভাবেই আবার ভীষ্মের কাছে যাব না।

Verse 9

गमिष्यामि तु तत्राहं यत्र भीष्मं तपोधन । समरे पातयिष्यामि स्वयमेव भृगूद्धह,'भुगुश्रेष्ठ तपोधन! अब मैं वहीं जाऊँगी, जहाँ ऐसी बन सकूँ कि समरभूमिमें स्वयं ही भीष्मको मार गिराऊँ'

ভৃগুশ্রেষ্ঠ তপোধন! আমি এখন সেখানেই যাব, যেখানে ভীষ্ম আছেন; আর সমরক্ষেত্রে আমি নিজেই ভীষ্মকে পতিত করব।

Verse 10

एवमुक्त्वा ययौ कन्या रोषव्याकुललोचना । तापस्ये धृतसंकल्पा सा मे चिन्तयती वधम्‌,ऐसा कहकर रोषभरे नेत्रोंवाली वह राजकन्या मेरे वधके उपायका चिन्तन करती हुई तपस्याके लिये दृढ़ संकल्प लेकर वहाँसे चली गयी

এ কথা বলে ক্রোধে অস্থির দৃষ্টিসম্পন্ন সেই কন্যা সেখান থেকে প্রস্থান করল। তপস্যায় দৃঢ় সংকল্প নিয়ে সে আমার বধের উপায় চিন্তা করতে লাগল।

Verse 11

ततो महेन्द्र सह तैर्मुनिभिर्भगुसत्तम: । यथा55गतं तथा सो5गान्मामुपामन्त्रय भारत,भारत! तदनन्तर भृगुश्रेष्ठ परशुरामजी उन महर्षियोंके साथ मुझसे विदा ले जैसे आये थे, वैसे ही महेन्द्र पर्वतपर चले गये

হে ভারত! তারপর ভৃগুশ্রেষ্ঠ পরশুরাম সেই মুনিদের সঙ্গে আমাকে বিদায় জানিয়ে, যেমন এসেছিলেন তেমনই মহেন্দ্র পর্বতে প্রস্থান করলেন।

Verse 12

ततो रथं समारुह्द स्तूयमानो द्विजातिभि: । प्रविश्य नगरं मात्रे सत्यवत्यै न्‍्यवेदयम्‌

মহারাজ! তারপর আমি রথে আরোহণ করলাম; দ্বিজদের প্রশংসা শুনতে শুনতে নগরে প্রবেশ করে মাতা সত্যবতীকে সমস্ত ঘটনা যথাযথভাবে নিবেদন করলাম।

Verse 13

यथावृत्तं महाराज सा च मां प्रत्यनन्दत । पुरुषांश्षादिशं प्राज्ञान्‌ कन्यावृत्तान्तकर्मणि

মহারাজ! আমি ঘটনাটি যেমন ঘটেছিল তেমনই বললাম, আর তিনি আনন্দসহ আমাকে গ্রহণ করলেন। তারপর আমি প্রাজ্ঞ পুরুষদের আদেশ দিলাম—তারা যেন সেই কন্যার সম্পূর্ণ বৃত্তান্ত অনুসন্ধান করে।

Verse 14

दिवसे दिवसे हास्या गतिजल्पितचेष्टितम्‌ । प्रत्याहरंश्न मे युक्ता: स्थिता: प्रियहिते सदा

আমার নিযুক্ত গুপ্তচররা সর্বদা আমার প্রিয় ও হিতের কাজে নিবিষ্ট ছিল। তারা প্রতিদিন সেই কন্যার গতি, বাক্য, আচরণ এবং এমনকি তার হাসি পর্যন্ত—সব সংবাদ নিয়মিতভাবে আমার কাছে পৌঁছে দিত।

Verse 15

यदैव हि वन प्रायात्‌ सा कन्या तपसे धृता । तदैव व्यथितो दीनो गतचेता इवाभवम्‌,जिस दिन वह कन्या तपस्याका निश्चय करके वनमें गयी, उसी दिन मैं व्यथित, दीन और अचेत-सा हो गया

যেদিন সেই কন্যা তপস্যার সংকল্প করে বনে গমন করল, সেদিনই আমি ব্যথিত ও দীন হয়ে পড়লাম—যেন চেতনা হারালাম।

Verse 16

नहिमां क्षत्रिय: कश्चिद्‌ वीर्येण व्यजयद्‌ युधि । ऋते ब्रह्म॒विदस्तात तपसा संशितव्रतात्‌

হে তাত! তপস্যায় কঠোর ব্রতকে শাণিত করে সিদ্ধ করা সেই ব্রহ্মজ্ঞ ব্রাহ্মণ পরশুরামকে বাদ দিলে, কোনো ক্ষত্রিয়ই আজ পর্যন্ত বীর্যে যুদ্ধে আমাকে পরাজিত করতে পারেনি।

Verse 17

अपि चैतन्मया राजन्‌ नारदे5पि निवेदितम्‌ | व्यासे चैव तथा कार्य तौ चोभौ मामवोचताम्‌

হে রাজন! আমি এই বৃত্তান্ত দেবর্ষি নারদকে নিবেদন করেছিলাম, এবং মহর্ষি ব্যাসকেও জানানো উচিত বলে জানিয়েছিলাম। তখন তাঁরা উভয়েই আমাকে বললেন—“রাজন, কাশীরাজার কন্যা বিষয়ে তোমার বিন্দুমাত্র শোক করা উচিত নয়; দैবের বিধানকে মানবপ্রচেষ্টায় কে উল্টাতে পারে?”

Verse 18

न विषादस्त्वया कार्यो भीष्म काशिसुतां प्रति । देवं पुरुषकारेण को निवर्तितुमुत्सहेत्‌

ভীষ্ম! কাশীরাজার কন্যা বিষয়ে তোমার শোক করা উচিত নয়। হে রাজন, দैবের বিধানকে মানবপ্রচেষ্টায় কে উল্টাতে সাহস করবে?

Verse 19

सा कन्या तु महाराज प्रविश्याश्रममण्डलम्‌ | यमुनातीरमाश्रित्य तपस्तेपेडतिमानुषम्‌,महाराज! फिर उस कन्याने आश्रममण्डलमें पहुँचकर यमुनाके तटका आश्रय ले ऐसी कठोर तपस्या की, जो मानवीय शक्तिसे परे है

হে মহারাজ! সেই কন্যা আশ্রম-প্রাঙ্গণে প্রবেশ করে যমুনার তীরে আশ্রয় নিয়ে এমন কঠোর তপস্যা আরম্ভ করল, যা মানবসামর্থ্যের অতীত।

Verse 20

निराहारा कृशा रुक्षा जटिला मलपड़्किनी । षण्मासान्‌ वायुभक्षा च स्थाणुभूता तपोधना

সে আহার ত্যাগ করল; কৃশ ও শুষ্ক হয়ে গেল। তার কেশ জটায় পরিণত হল, আর দেহ ময়লা ও কাদায় আচ্ছন্ন হল। তপস্যাধনে সমৃদ্ধ সেই কন্যা ছয় মাস কেবল বায়ু গ্রহণ করে, গাছের গুঁড়ির মতো নিশ্চল দাঁড়িয়ে রইল।

Verse 21

फिर एक वर्षतक यमुनाजीके जलमें घुसकर बिना कुछ खाये-पीये वह भाविनी राजकन्या जलमें ही रहकर तपस्या करती रही

তারপর সেই ভাগ্যবতী রাজকন্যা যমুনার জলে প্রবেশ করে, সম্পূর্ণ এক বছর আহার-জল ত্যাগ করে, নদীর জলের মধ্যেই অবস্থান করে তপস্যা করতে লাগল।

Verse 22

शीर्णपर्णेन चैकेन पारयामास सा परम्‌ | संवत्सरं तीव्रकोपा पादाड्गुष्ठाग्रधिछ्ठिता

একটি মাত্র শুকনো পাতায় সে জীবনধারণ করে তপস্যাকে পরম সীমায় পৌঁছাল। তীব্র সংকল্পে দৃঢ় হয়ে সে এক বছর পায়ের বৃদ্ধাঙ্গুলির অগ্রভাগে ভর দিয়ে নিশ্চল রইল।

Verse 23

यमुनाजलमाश्रित्य संवत्सरमथापरम्‌ | उदवासं निराहारा पारयामास भाविनी,तत्पश्चात्‌ तीव्र क्रोधसे युक्त हुई अम्बाने पैरके अँगूठेके अग्रभागपर खड़ी हो अपने- आप झड़कर गिरा हुआ केवल एक सूखा पत्ता खाकर एक वर्ष व्यतीत किया ।।

যমুনার জলের আশ্রয়ে সেই দৃঢ়চেতা নারী আরও এক বছর একান্তবাসে, নিরাহারে, ব্রত পালন করল। তারপর তীব্র ক্রোধ ও অটল সংকল্পে সে বারো বছর এমন ঘোর তপস্যা করল যে যেন পৃথিবী ও আকাশ উভয়ই দগ্ধ হতে লাগল। আত্মীয়স্বজন তাকে সেই কঠোর ব্রত থেকে ফেরাতে এলে, তারা সফল হতে পারল না।

Verse 24

ततो5गमद्‌ वत्सभूमिं सिद्धचारणसेविताम्‌ । आश्रमं पुण्यशीलानां तापसानां महात्मनाम्‌

তখন তিনি সিদ্ধ ও চারণদের দ্বারা সেবিত বৎসভূমিতে গমন করলেন এবং পুণ্যশীল মহাত্মা তপস্বীদের আশ্রমে পৌঁছালেন।

Verse 25

तत्र पुण्येषु तीर्थेषु सा55प्लुताड़ी दिवानिशम्‌ व्यचरत्‌ काशिकन्या सा यथाकामविचारिणी

সেখানে সেই পুণ্য তীর্থসমূহে কাশীর কন্যা—সুকোমলাঙ্গী—দিনরাত স্নান করে, ইচ্ছামতো সর্বত্র বিচরণ করত।

Verse 26

तदनन्तर वह सिद्धों और चारणोंद्वारा सेवित वत्सदेशकी भूमिमें गयी और वहाँ पुण्यशील तपस्वी महात्माओंके आश्रमोंमें विचरने लगी। काशिराजकी वह कन्या दिन-रात वहाँके पुण्य तीर्थोमें स्नान करती और अपनी इच्छाके अनुसार सर्वत्र विचरती रहती थी ।।

এরপর সিদ্ধ ও চারণদের সেবিত বৎসদেশের ভূমিতে গিয়ে সে পুণ্যশীল মহাত্মা তপস্বীদের আশ্রমসমূহে বিচরণ করতে লাগল। কাশীরাজার কন্যা দিনরাত সেখানকার পুণ্য তীর্থে স্নান করত এবং ইচ্ছামতো সর্বত্র ঘুরে বেড়াত। হে মহারাজ, কঠোর ব্রত অবলম্বন করে সে ক্রমান্বয়ে শুভ নন্দাশ্রম, পবিত্র উলূকাশ্রম, চ্যবনের আশ্রম, ব্রহ্মস্থান, দেবযজ্ঞভূমি প্রয়াগ, দেবারণ্য, ভোগবতী, কৌশিকাশ্রম, মাণ্ডব্যাশ্রম, দিলীপাশ্রম, রামহ্রদ এবং পৈল-গর্গাশ্রম—এই সকল তীর্থে স্নান করল।

Verse 27

प्रयागे देवयजने देवारण्येषु चैव ह । भोगवत्यां महाराज कौशिकस्याश्रमे तथा

প্রয়াগে—দেবযজ্ঞভূমিতে—এবং দেবারণ্যে; হে মহারাজ, ভোগবতীতেও, তেমনি কৌশিকের আশ্রমেও।

Verse 28

माण्डव्यस्याश्रमे राजन्‌ दिलीपस्याश्रमे तथा । रामह्नदे च कौरव्य पैलगर्गस्य चाश्रमे

হে রাজন, মাণ্ডব্যের আশ্রমে, তেমনি দিলীপের আশ্রমেও; আর হে কৌরব্য, রামহ্রদে এবং পৈল-গর্গের আশ্রমেও।

Verse 29

एतेषु तीर्थेषु तदा काशिकन्या विशाम्पते । आप्लावयत गात्राणि व्रतमास्थाय दुष्करम्‌

তখন, হে প্রজাপতি মহারাজ, কাশীর রাজকন্যা দুঃসাধ্য ব্রত গ্রহণ করে সেই সকল তীর্থে অঙ্গপ্রত্যঙ্গ স্নান করিয়ে শুদ্ধ করল। শুভকারক নন্দাশ্রম, উলূকাশ্রম, চ্যবনাশ্রম, ব্রহ্মস্থান, দেবযজ্ঞস্থান প্রয়াগ, দেবারণ্য, ভোগবতী, কৌশিকাশ্রম, মাণ্ডব্যাশ্রম, দিলীপাশ্রম, রামহ্রদ ও পৈলগর্গাশ্রম—ক্রমে ক্রমে এই সকল তীর্থে সে স্নান করে কঠোর ব্রতনিষ্ঠায় পরিভ্রমণ করল।

Verse 30

तामब्रवीच्च कौरव्य मम माता जले स्थिता । किमर्थ क्लिश्यसे भद्रे तथ्यमेव वदस्व मे

রাম বললেন—“হে কৌরব্য, আমার মাতা জলে দাঁড়িয়ে আছেন। ভদ্রে, তুমি কেন নিজেকে এমন কষ্ট দিচ্ছ? আমাকে সত্যই বলো—স্পষ্ট করে বলো।”

Verse 31

कुरुनन्दन! उस समय मेरी माता गंगाने जलमें प्रकट होकर अम्बासे कहा--*भद्रे! तू किसलिये शरीरको इतना क्लेश देती है। मुझे ठीक-ठीक बता” ।।

কুরুনন্দন! তখন আমার মাতা গঙ্গা জলের মধ্য থেকে উদ্ভাসিত হয়ে অম্বাকে বললেন—“ভদ্রে, তুমি কেন শরীরকে এত কষ্ট দিচ্ছ? আমাকে যথার্থ কথা বলো।” তখন নিষ্কলঙ্ক সাধ্বী অম্বা করজোড়ে বলল—“চারুলোচনে! ভীষ্ম যুদ্ধে রাম (পরশুরাম)-কে পরাজিত করেছেন। তবে আর কোন রাজা ধনুর্বাণ হাতে দাঁড়ানো ভীষ্মকে জয় করতে পারে? অতএব ভীষ্মবিনাশের জন্য আমি অতি কঠোর তপস্যা করছি।”

Verse 32

कोअन्यस्तमुत्सहेज्जेतुमुद्यतेषुं महीपति: । साहं भीष्मविनाशाय तपस्तप्स्ये सुदारुणम्‌

“ধনুক টানা, তীর প্রস্তুত ভীষ্মকে আর কোন রাজা জয় করার সাহস করবে? অতএব, হে রাজন, ভীষ্মবিনাশের জন্য আমি অতি কঠোর তপস্যা করব।”

Verse 33

विचरामि महीं देवि यथा हन्यामहं नृपम्‌ । एतद्‌ व्रतफलं देवि परमस्मिन्‌ यथा हि मे

“দেবি! আমি এই পৃথিবীতে তীর্থে তীর্থে বিচরণ করছি, যাতে যোগ্য হয়ে আমি নিজেই সেই নৃপ (ভীষ্ম)-কে বধ করতে পারি। ভগবতি! যেমন আমি আপনাকে বলেছি, এই জগতে আমার ব্রত ও তপস্যার পরম ফল এটাই।”

Verse 34

ततो<ब्रवीत्‌ सागरगा जिह्दां चरसि भाविनि । नैष कामो5नवलद्याड़ि शक्‍्य: प्राप्तुं त्वयाबले

তখন রাম বললেন— “হে সাগরে বিচরণকারিণী, হে ভাবিনী! তোমার জিহ্বা অস্থির হয়ে ঘুরে বেড়ায়। কিন্তু এই কামনা পূর্ণ হবে না; হে দুর্বলা, তোমার পক্ষে তা লাভ করা সম্ভব নয়।”

Verse 35

तब सतरगामिनी गंगानदीने उससे कहा--'भाविनि! तू कुटिल आचरण कर रही है। सुन्दर अंगोंवाली अबले! तेरा यह मनोरथ कभी पूर्ण नहीं हो सकता ।।

তখন সাগরগামিনী গঙ্গা নদী তাকে বলল— “ভাবিনী! তুমি কুটিল আচরণ করছ। সুন্দরাঙ্গী দুর্বলে! তোমার এই মনোরথ কখনও পূর্ণ হবে না। যদি ভীষ্মবিনাশের জন্য কাশীতে তুমি ব্রত পালন কর, আর ব্রতে স্থির থেকে দেহ ত্যাগও কর—তবু তোমার সংকল্প সিদ্ধ হবে না।”

Verse 36

नदी भविष्यसि शुभे कुटिला वार्षिकोदका । दुस्तीर्था न तु विज्ञेया वार्षिकी नाष्टमासिकी

রাম বললেন— “হে শুভে! তুমি এক নদী হবে—বাঁকা পথে প্রবাহিত, কেবল বর্ষার জলে পূর্ণ। তোমার তীর্থ-ঘাট হবে দুর্লভ; তুমি নির্ভরযোগ্য, চিরপ্রবাহিনী নদী বলে পরিচিত হবে না—তুমি হবে ঋতুনদী, আট মাস প্রবাহমান নয়।”

Verse 37

“काशिराजकन्ये! यदि भीष्मके विनाशके लिये तू प्रयत्न कर रही है और व्रतमें स्थित रहकर ही यदि तू अपना शरीर छोड़ेगी तो शुभे! तुझे टेढ़ी-मेढ़ी नदी होना पड़ेगा। केवल बरसातमें ही तेरे भीतर जल दिखायी देगा। तेरे भीतर तीर्थ या स्नानकी सुविधा बड़ी कठिनाईसे होगी। तू केवल बरसातकी नदी समझी जायगी। शेष आठ महीनोंमें तेरा पता नहीं लगेगा ।। भीमग्राहवती घोरा सर्वभूतभयड्करी । एवमुकक्‍्त्वा ततो राजन्‌ काशिकन्यां न्यवर्तत

রাম বললেন— “কাশিরাজার কন্যে! যদি তুমি ভীষ্মবিনাশের জন্য চেষ্টা কর এবং ব্রতে স্থির থেকে দেহ ত্যাগ করতে চাও, তবে হে শুভে, তোমাকে বাঁকা-চোরা নদী হতে হবে। কেবল বর্ষাকালেই তোমার মধ্যে জল দেখা যাবে। তোমার তীর্থ-ঘাট বা স্নানের সুবিধা মহাকষ্টে মিলবে। তুমি শুধু ‘বর্ষার নদী’ বলেই পরিচিত হবে; বাকি আট মাস তোমার কোনো চিহ্নই প্রায় থাকবে না। ভয়ংকর ঘড়িয়ালে পূর্ণ, ঘোর রূপে তুমি সকল প্রাণীর জন্য ভীতির কারণ হবে।” এ কথা বলে, হে রাজন, আমার পরম সৌভাগ্যবতী মাতা দেবী গঙ্গা মৃদু হাসি হেসে কাশীর কন্যার কাছ থেকে সরে গেলেন। তারপর সেই সুন্দরী কন্যা আবার কঠোর তপস্যায় প্রবৃত্ত হল; কখনও অষ্টম মাস পর্যন্ত, কখনও দশম মাস পর্যন্ত জলও পান করত না।

Verse 38

माता मम महाभागा स्मयमानेव भाविनी । कदाचिदष्टमे मासि कदाचिद्‌ दशमे तथा । न प्राश्नीतोदकमपि पुन: सा वरवर्णिनी

আমার পরম সৌভাগ্যবতী মাতা—সদা প্রসন্ন—হাসতে হাসতে বললেন। সেই শুভবর্ণা কন্যা পরে আবার কখনও অষ্টম মাস পর্যন্ত, কখনও তেমনি দশম মাস পর্যন্ত জলও পান করত না।

Verse 39

सा वत्सभूमिं कौरव्य तीर्थलोभात्‌ ततस्ततः । पतिता परिधावन्ती पुनः काशिपते: सुता

হে কৌরব্য! তীর্থলোভে উদ্বুদ্ধ হয়ে কাশিপতির কন্যা সেই অম্বা বৎসভূমিতে এদিক-ওদিক ছুটে বেড়াত। বারবার পড়ে গেলেও সে আবার উঠে দৌড়াতে থাকত।

Verse 40

कुरुनन्दन! काशिराजकी वह कन्या तीर्थसेवनके लोभसे वत्सदेशकी भूमिपर इधर- उधर दौड़ती फिरती थी ।।

হে কুরুনন্দন! তীর্থসেবনের লোভে কাশিরাজার সেই কন্যা বৎসদেশে এদিক-ওদিক ছুটে বেড়াত। কিছুকাল পরে, হে ভারত! সে বৎসভূমিতে ‘অম্বা’ নামে প্রসিদ্ধ এক নদী হয়ে উঠল—যে কেবল বর্ষাকালে জলপূর্ণ হতো, কুমিরে ভরা থাকত, তাতে নেমে স্নানাদি তীর্থকর্ম করা ছিল অত্যন্ত কঠিন, আর তার প্রবাহ ছিল বাঁকানো।

Verse 41

सा कन्या तपसा तेन देहार्थेन व्यजायत । नदी च राजन्‌ वत्सेषु कन्या चैवाभवत्‌ तदा

হে রাজন! সেই তপস্যার প্রভাবে কন্যাটি আশ্চর্যরূপে পরিবর্তিত হলো—দেহের অর্ধাংশে ‘অম্বা’ নামে নদী হয়ে গেল, আর অর্ধাংশে বৎসদেশে পুনরায় কন্যারূপে প্রকাশ পেল।

Verse 186

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि अम्बातपस्यायां षडशीत्यधिकशततमो<ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত অম্বোপাখ্যানপর্বে ‘অম্বার তপস্যা’ বিষয়ক একশো ছিয়াশি-তম অধ্যায় সমাপ্ত হলো।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether to continue escalating to victory when the means—supreme astras—produce indiscriminate, world-affecting harm; the chapter frames restraint and suspension of force as ethically superior to triumph achieved through catastrophic externalities.

Power must be governed by foresight: the legitimacy of martial action depends not only on personal valor but on safeguarding the broader order; when weapon-energy endangers collective well-being, de-escalation becomes a duty.

Rather than a formal phalaśruti, the chapter provides an implicit meta-teaching: brahmavādin counsel and deliberate ‘sleeping’ of the astra model how knowledge traditions function as ethical brakes on violence, guiding action toward preservation of cosmic and social stability.