Adhyaya 180
Udyoga ParvaAdhyaya 18018 Versesनिर्णायक बढ़त किसी की नहीं; दोनों पक्ष समान रूप से घायल, अस्त्र-प्रतिघात में संतुलन, संध्या ने संघर्ष रोक दिया।

Adhyaya 180

Bhīṣma–Jāmadagnya-saṃvādaḥ (Bhishma’s account of the encounter with Rāma Jāmadagnya)

Upa-parva: Bhīṣma–Paraśurāma Yuddha-smṛti (Retrospective on the Bhīṣma–Jāmadagnya encounter)

Bhīṣma narrates a remembered engagement with Rāma Jāmadagnya. He begins by addressing the impropriety of fighting a chariot-mounted opponent while one is on the ground, instructing Rāma to mount a chariot and don armor if he seeks a formal contest. Rāma replies with a cosmological self-description—earth as chariot, Vedas as steeds, wind as charioteer, and the Veda-mothers as armor—asserting ascetic-spiritual preparedness translated into martial idiom. Bhīṣma then observes a divine, mind-constructed chariot and accoutrements, and the engagement proceeds over many days with mutual competitive intent. After exchanges of volleys, Bhīṣma demonstrates force by damaging Rāma’s bow and striking him with numerous arrows, describing visible injury. Rāma retaliates fiercely; Bhīṣma responds in kind, but then experiences remorse and self-reproach for harming a revered dvija figure. Recognizing the ethical breach implied by continued assault on Jāmadagnya, Bhīṣma ceases further striking; at day’s end, the engagement pauses with sunset, emphasizing restraint and the boundary between kṣātra duty and reverence for spiritual authority.

Chapter Arc: भीष्म स्मरण करते हैं कि परशुराम के पुनः आगमन के साथ ही अगले दिन एक और ‘अतिदारुण’ संग्राम निश्चित हो गया—गुरु और शिष्य का सामना अब टल नहीं सकता। → दोनों महावीर दिव्यास्त्रों की वर्षा करते हैं; परशुराम अनेक दिव्यास्त्रों का प्रयोग करते हैं और भीष्म प्रतिघातक अस्त्रों से एक-एक को काटते/निष्फल करते जाते हैं। बाण-जाल, शक्तियाँ, और घोर आयुधों की परत-दर-परत टक्कर से रणभूमि घनीभूत हो उठती है; भीष्म का रथ, वाहक, सारथि, युग, चक्र और अक्ष तक शर-प्रहारों से विदीर्ण/भंग होने लगते हैं। → परशुराम की सुवर्णजटित विचित्र शक्तियाँ सर्प-सी आकृति लिए प्रचण्ड वेग से आती हैं; भीष्म उन्हें शरजाल से भेदकर काटते हैं, फिर द्वादश बाण छोड़ते हैं और प्रत्युत्तर में घोर शक्तियों को भी ध्वस्त करते हैं—दिव्यास्त्र-युद्ध अपने चरम पर पहुँचता है। → बाण-वर्षा थमती है; दोनों पक्ष गहरे घायल हैं—परशुराम भी बाणजाल से तप्त, भीष्म भी गाढ़े विद्ध। रक्त बहता है, पर संध्या निकट आने पर युद्ध अपराह्न में विराम लेता है। → अगले दिवस यह गुरु-शिष्य संग्राम किस निर्णायक अस्त्र/प्रतिज्ञा तक पहुँचेगा—यह अनिश्चितता बनी रहती है।

Shlokas

Verse 1

/ भीकम (2 अमान एकाशीकरत्याधिकशततमो< ध्याय: भीष्म और परशुरामका युद्ध भीष्म उवाच समागतस्य रामेण पुनरेवातिदारुणम्‌ । अन्येद्युस्तुमुलं युद्ध तदा भरतसत्तम,भीष्मजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ। दूसरे दिन परशुरामजीके साथ भेंट होनेपर पुनः अत्यन्त भयंकर युद्ध प्रारम्भ हुआ

ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! পরদিন পরশুরামের সঙ্গে পুনরায় সাক্ষাৎ হলে আবার অতিদারুণ, তুমুল যুদ্ধ আরম্ভ হল।

Verse 2

ततो दिव्यास्त्रविच्छूरो दिव्यान्यस्त्राण्यनेकश: । अयोजयत्‌ स धर्मात्मा दिवसे दिवसे विभु:,फिर तो दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता, शूरवीर एवं धर्मात्मा भगवान्‌ परशुरामजी प्रतिदिन अनेक प्रकारके अलौकिक अस्त्रोंका प्रयोग करने लगे

তারপর দিব্যাস্ত্রবিদ, শূর ও ধর্মাত্মা সেই বিভু পরশুরাম দিন দিন নানাবিধ দিব্য অস্ত্র প্রয়োগ করতে লাগলেন।

Verse 3

तान्यहं तत्प्रतीघातैरस्त्रैरस्त्राणि भारत । व्यधमं तुमुले युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा सुदुस्त्यजान्‌,भारत! उस तुमुल युद्धमें अपने दुस्त्यज प्राणोंकी परवा न करके मैंने उनके सभी अस्त्रोंका विघातक अस्त्रोंद्वारा संहार कर डाला

হে ভারত! সেই ঘোরতর যুদ্ধক্ষেত্রে দুর্লভ-ত্যাজ্য প্রাণেরও পরোয়া না করে আমি প্রতিঘাতক অস্ত্রে তাদের অস্ত্রসমূহ ভেঙে চূর্ণ করেছিলাম।

Verse 4

अस्त्रैरस्त्रेषु बहुधा हतेष्वेव च भारत । अक्रुध्यत महातेजास्त्यक्तप्राण: स संयुगे,भरतनन्दन! इस प्रकार बार-बार मेरे अस्त्रोंद्रार अपने अस्त्रोंके विनष्ट होनेपर महातेजस्वी परशुरामजी उस युद्धमें प्राणोंका मोह छोड़कर अत्यन्त कुपित हो उठे

হে ভরতনন্দন! যুদ্ধে বারংবার আমার অস্ত্রে তাঁর অস্ত্র বিনষ্ট হতে থাকলে, মহাতেজস্বী পরশুরাম প্রাণের মমতা ত্যাগ করে প্রবল ক্রোধে জ্বলে উঠলেন।

Verse 5

ततः शक्ति प्राहिणोद्‌ घोररूपा- मस्त्रे रुद्धे जामदग्न्यो महात्मा । कालोत्सृष्टां प्रजवबलितामिवोल्कां संदीप्ताग्रां तेजसा व्याप्प लोकम्‌,इस प्रकार अपने अस्त्रोंका अवरोध होनेपर जमदग्निनन्दन महात्मा परशुरामने कालकी छोड़ी हुई प्रज्वलित उल्काके समान एक भयंकर शक्ति छोड़ी, जिसका अग्रभाग उद्दीप्त हो रहा था। वह शक्ति अपने तेजसे सम्पूर्ण लोकको व्याप्त किये हुए थी

তখন তাঁর অস্ত্র প্রতিহত হলে, জামদগ্ন্য মহাত্মা পরশুরাম ভয়ংকর এক শক্তি নিক্ষেপ করলেন—যেন কালের দ্বারা নিক্ষিপ্ত জ্বলন্ত উল্কা; তার অগ্রভাগ দীপ্ত, আর তার তেজে যেন সমগ্র লোক আচ্ছন্ন হয়ে গেল।

Verse 6

ततोऊ5हं तामिषुभिरद्दीप्यमानां समायान्तीमन्तकालार्कदीप्ताम्‌ । छित्त्वा त्रिधा पातयामास भूमौ ततो ववौ पवन: पुण्यगन्धि:,तब मैंने प्रलयकालके सूर्यकी भाँति प्रज्वलित होनेवाली उस देदीप्यमान शक्तिको अपनी ओर आती देख अनेक बाणोंद्वारा उसके तीन टुकड़े करके उसे भूमिपर गिरा दिया। फिर तो पवित्र सुगन्धसे युक्त मन्द-मन्द वायु चलने लगी

তখন প্রলয়কালের সূর্যের ন্যায় দীপ্ত সেই শক্তি আমার দিকে ধেয়ে আসতে দেখে আমি বহু বাণে তাকে তিন খণ্ড করে ভূমিতে ফেলে দিলাম। তারপর পবিত্র সুগন্ধবাহী মৃদু বায়ু প্রবাহিত হতে লাগল।

Verse 7

तस्यां छिन्नायां क्रोधदीप्तो5थ राम: शक्तीर्घोरा: प्राहिणोद्‌ द्वादशान्या: । तासां रूपं भारत नोत शक्‍्यं तेजस्वित्वाल्लाघवाच्चैव वक्तुम्‌,उस शक्तिके कट जानेपर परशुरामजी क्रोधसे जल उठे तथा उन्होंने दूसरी-दूसरी भयंकर बारह शक्तियाँ और छोड़ीं। भारत! वे इतनी तेजस्विनी तथा शीघ्रगामिनी थीं कि उनके स्वरूपका वर्णन करना असम्भव है

সেই শক্তি ছিন্ন হতেই রাম (পরশুরাম) ক্রোধে দগ্ধ হয়ে আরও বারোটি ভয়ংকর শক্তি নিক্ষেপ করলেন। হে ভারত! তাদের রূপ বর্ণনা করা অসম্ভব—তাদের তেজ ও দ্রুতগতি এমনই ছিল।

Verse 8

कि त्वेवाहं विह्नल: सम्प्रदृश्य दिग्भ्य: सर्वास्ता महोल्का इवाग्ने: । नानारूपास्तेजसोग्रेण दीप्ता यथा<55दित्या द्वादश लोकसंक्षये,प्रलयकालके बारह सूर्योके समान भयंकर तेजसे प्रज्वलित अनेक रूपवाली तथा अग्निकी प्रचण्ड ज्वालाओंके समान धधकती हुई उन शक्तियोंको सब ओरसे आती देख मैं अत्यन्त विह्वल हो गया

ভীষ্ম বললেন—কিন্তু যখন আমি দেখলাম সেই শক্তিগুলি চার দিক থেকে ধেয়ে আসছে—প্রচণ্ড অগ্নি থেকে ছিটকে পড়া মহা উল্কার মতো, নানারূপে তীব্র তেজে দগ্ধমান, আর প্রলয়কালে জগত্‌-সংহারে উদিত দ্বাদশ আদিত্যের ন্যায় ভয়ংকর—তখন আমি সম্পূর্ণভাবে বিচলিত ও অভিভূত হয়ে পড়লাম।

Verse 9

ततो जाल॑ बाणमयं विवृत्तं संदृश्य भित्त्वा शरजालेन राजन्‌ | द्वादशेषून्‌ प्राहिणवं रणेडहं ततः शक्तीरप्यधमं घोररूपा:

তখন, হে রাজন, ঘূর্ণায়মান বাণজাল দেখে আমি শরের প্রতিজাল দিয়ে তা ভেদ করে চূর্ণ করলাম। সেই রণে আমি বারোটি বাণ নিক্ষেপ করলাম; তারপর যুদ্ধকে আরও তীব্র করতে ভয়ংকর রূপধারী ঘোর শক্তিও নিক্ষেপ করলাম।

Verse 10

राजन! तत्पश्चात्‌ वहाँ फैले हुए बाणमय जालको देखकर मैंने अपने बाणसमूहोंसे उसे छिन्न-भिन्न कर डाला और उस रणभूमिमें बारह सायकोंका प्रयोग किया, जिनसे उन भयंकर शक्तियोंको भी व्यर्थ कर दिया ।। ततो राजज्जामदग्न्यो महात्मा शक्तीर्घोरा व्याक्षिपद्धेमदण्डा: । विचित्रिता: काउ्चनपट्टनद्धा यथा महोलल्‍का ज्वलितास्तथा ता:,राजन! तत्पश्चात्‌ महात्मा जमदग्निनन्दम परशुरामने स्वर्णमय दण्डसे विभूषित और भी बहुत-सी भयानक शक्तियाँ चलायीं, जो विचित्र दिखायी देती थीं, उनके ऊपर सोनेके पत्र जड़े हुए थे और वे जलती हुई बड़ी-बड़ी उल्काओंके समान प्रतीत होती थीं

হে রাজন, তারপর সেখানে বিস্তৃত বাণজাল দেখে আমি আমার বাণবৃষ্টিতে তা ছিন্নভিন্ন করলাম। রণভূমিতে আমি বারোটি শর প্রয়োগ করলাম, যাতে সেই ভয়ংকর শক্তিগুলিও নিষ্ফল হয়ে গেল। তখন, হে রাজন, মহাত্মা জামদগ্ন্য পরশুরাম স্বর্ণদণ্ডযুক্ত বহু ঘোর শক্তি নিক্ষেপ করলেন—সেগুলি ছিল বিচিত্র, সোনার পাত বসানো, এবং জ্বলন্ত মহা উল্কার মতো দীপ্তিমান।

Verse 11

ताक्षाप्युग्राश्चर्मणा वारयित्वा खड्गेनाजौ पातयित्वा नरेन्द्र । बाणैर्दिव्यैर्जामदग्न्यस्य संख्ये दिव्यानश्वानभ्यवर्ष ससूतान्‌,नरेन्द्र! उन भयंकर शक्तियोंको भी मैंने ढालसे रोककर तलवारसे रणभूमिमें काट गिराया। तत्पश्चात्‌ परशुरामजीके दिव्य घोड़ों तथा सारथिपर मैंने दिव्य बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी

নরেন্দ্র, সেই উগ্র শক্তিগুলিকেও আমি ঢাল দিয়ে প্রতিহত করে এবং রণে খড়্গ দিয়ে কেটে মাটিতে ফেলে দিলাম। তারপর জামদগ্ন্য পরশুরামের সঙ্গে যুদ্ধে আমি দিব্য বাণে তাঁর দিব্য অশ্বসমূহ ও সারথির উপর বৃষ্টি নামালাম।

Verse 12

निर्मुक्तानां पन्नगानां सरूपा दृष्टवा शक्तीहेंमचित्रा निकृत्ता: । प्रादुश्चक्रे दिव्यमस्त्रं महात्मा क्रोधाविष्टो हैहयेशप्रमाथी

সোনায় অলঙ্কৃত, বিচিত্র নকশাযুক্ত সেই কাটা শক্তিগুলি—যেন খোলস ছেড়ে দেওয়া সাপ—পড়ে থাকতে দেখে, ক্রোধে আচ্ছন্ন এবং হৈহয়েশ-দমনকারী সেই মহাত্মা এক দিব্য অস্ত্র প্রকাশ করলেন।

Verse 13

केंचुलिसे छूटकर निकले हुए सर्पोके समान आकृतिवाली उन सुवर्णजटित विचित्र शक्तियोंको कटी हुई देख हैहयराजका विनाश करनेवाले महात्मा परशुरामजीने कुपित होकर पुनः अपना दिव्य अस्त्र प्रकट किया ।। ततः श्रेण्य: शलभानामिवोग्रा: समापेतुर्विशिखानां प्रदीप्ता: । समाचिनोच्चापि भृशं शरीरं हयान्‌ सूतं सरथं चैव महाम्‌,फिर तो टिड्डियोंकी पंक्तियोंके समान प्रज्वलित एवं भयंकर बाणोंके समूह प्रकट होने लगे। इस प्रकार उन्होंने मेरे शरीर, रथ, सारथि और घोड़ोंकों सर्वथा आच्छादित कर दिया

ভীষ্ম বললেন— তখন পঙ্গপালের ঘন ঝাঁকের মতো জ্বলন্ত ও ভয়ংকর তীরের প্রবল স্রোত ধেয়ে এল। তা আমার দেহ, রথ, সারথি ও অশ্বদের চারদিক থেকে সম্পূর্ণ আচ্ছাদিত করে দিল। আর মহাত্মা পরশুরাম যখন দেখলেন তাঁর স্বর্ণজটিত, বিচিত্র শক্তিগুলি—যেন খোলস ছেড়ে বেরোনো সাপের মতো—কেটে ফেলা হয়েছে, তখন হৈহয়রাজ-সংহারক তিনি ক্রুদ্ধ হয়ে পুনরায় তাঁর দিব্য অস্ত্র প্রকাশ করলেন।

Verse 14

रथ: शरैमें निचितः सर्वतो&भूत्‌ तथा वाहा: सारथिश्वैव राजन्‌ । युगं रथेषां च तथैव चक्रे तथैवाक्ष: शरकृत्तोडथ भग्न:,राजन! मेरा रथ चारों ओरसे उनके बाणोंद्वारा व्याप्त हो रहा था। घोड़ों और सारथिकी भी यही दशा थी। युग तथा ईषादण्डको भी उन्होंने उसी प्रकार बाणविद्धु कर रखा था और रथका धुरा उनके बाणोंसे कटकर टूक-टूक हो गया था

ভীষ্ম বললেন— হে রাজন, আমার রথ চারদিক থেকে তীরে ভরে উঠল; অশ্ব ও সারথিও একই অবস্থায় পড়ল। যোক, দণ্ড ও চক্রও তেমনি বিদ্ধ হলো; আর শেষে ধুরা তীরে কেটে খণ্ড খণ্ড হয়ে ভেঙে পড়ল।

Verse 15

ततस्तस्मिन्‌ बाणवर्षे व्यतीते शरीौघेण प्रत्यवर्ष गुरुं तम्‌ । स विक्षतो मार्गणैर््रह्यराशि- देहादसक्तं मुमुचे भूरि रक्तम्‌,जब उनकी बाण-वर्षा समाप्त हुई, तब मैंने भी बदलेमें गुरुदेवपर बाणसमूहोंकी बौछार आरम्भ कर दी। वे ब्रह्मराशि महात्मा मेरे बाणोंसे क्षत-विक्षत होकर अपने शरीरसे अधिकाधिक रक्तकी धारा बहाने लगे

যখন তাঁর তীরবৃষ্টি থেমে গেল, তখন আমিও পাল্টা সেই পূজ্য গুরুদেবের উপর ঘন তীরবর্ষণ শুরু করলাম। আমার তীরে ক্ষতবিক্ষত হয়ে সেই মহাতপস্বী তাঁর আহত দেহ থেকে প্রচুর রক্তধারা ঝরাতে লাগলেন।

Verse 16

यथा रामो बाणजालाभितप्त- स्तथैवाहं सुभृशं गाढविद्ध: । ततो युद्ध व्यरमच्चापराह्ने भानावस्तं प्रति याते मही ध्रम्‌ू,जिस प्रकार परशुरामजी मेरे सायकसमूहोंसे संतप्त थे, उसी प्रकार मैं भी उनके बाणोंसे अत्यन्त घायल हो रहा था। तदनन्तर सायंकालमें जब सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये, तब युद्ध बंद हो गया

যেমন রাম (পরশুরাম) আমার ঘন তীরবাণে দগ্ধ হচ্ছিলেন, তেমনি আমিও তাঁর তীরে গভীরভাবে বিদ্ধ ও গুরুতর আহত হচ্ছিলাম। তারপর অপরাহ্নে সূর্য অস্তাচলের দিকে গমন করলে যুদ্ধ থেমে গেল।

Verse 180

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अग्बोपाख्यानपर्वमें परशुराम- भीष्मयुद्धविषयक एक सौ असीवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত আম্বোপাখ্যানপর্বে পরশুরাম-ভীষ্মযুদ্ধ-বর্ণনাকারী একশো আশিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 181

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि एकाशीत्यधिकशततमो<ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বে অম্বোপাখ্যানপর্বের অন্তর্গত একশো একাশি-তম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Frequently Asked Questions

Bhīṣma confronts the dilemma of pursuing victory under warrior duty while recognizing that continued harm to a revered dvija/ācārya-like figure violates maryādā and undermines dharmic restraint.

The chapter teaches that correct procedure and power are not sufficient criteria for action; legitimate conduct requires aligning martial capacity with hierarchy of reverence, proportionality, and the ethical limits imposed by tapas and guru-status.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-commentary is implicit in Bhīṣma’s self-critique and cessation of further strikes, modeling how narrative remembrance functions as ethical instruction within the epic’s dharma discourse.