Adhyaya 168
Udyoga ParvaAdhyaya 16838 Verses

Adhyaya 168

Bhīṣma’s Appraisal of Pāṇḍava-Alliance Warriors (Śikhaṇḍin, Dhṛṣṭadyumna, and Allied Kings)

Upa-parva: Udyoga Parva — Bhīṣma’s Enumeration of Pāṇḍava Allies and Chariot-warrior Grades (Chapter 168 context)

Bhīṣma addresses Dhṛtarāṣṭra and enumerates prominent fighters aligned with the Pāṇḍavas, beginning with Śikhaṇḍin of Pāñcāla, presented as a leading chariot-warrior in Arjuna’s formation and as a destabilizing factor for established battle arrays. He then elevates Dhṛṣṭadyumna—Droṇa’s disciple and commander—describing his battlefield intensity and the scale of his chariot forces, likened to an oceanic mass. The discourse proceeds as a catalogue of allied kings and notable warriors (including Cedi’s Dhṛṣṭaketu and other named chiefs), repeatedly classifying them by chariot-warrior grades and combat attributes (speed of missiles, firmness, training, and loyalty). The chapter’s function is archival and strategic: it records a threat-assessment register of the Pāṇḍava coalition, emphasizing both numerical support (Pāñcālas, Prabhadrakas, Kekayas) and qualitative leadership (mahāratha/atiratha figures), thereby setting expectations for the coming engagement.

Chapter Arc: कर्ण के कौतूहल को जगाते हुए भीष्म कहते हैं—कौरव-पक्ष के रथी-अतिरथी तो गिनाए जा चुके; अब यदि पाण्डवों के बल की जिज्ञासा हो, तो उनके रथियों की संख्या और महिमा भी सुनो। → भीष्म पाण्डव-पक्ष के प्रमुख रथियों का क्रमशः उल्लेख करते हैं—माद्रीपुत्र नकुल-सहदेव से लेकर अन्य राजाओं तक—और संकेत देते हैं कि यह सेना केवल संख्या से नहीं, तेज, शौर्य और संयोग (सहायता) से भी प्रबल है। → अर्जुन और भीम की अतुलनीयता का घोष होता है—अर्जुन के समान देव-दानव-नाग-यक्ष-राक्षसों में भी कोई नहीं, और भीमसेन अकेले अनेक रथियों के तुल्य हैं; ऊपर से वासुदेव-सहाय अर्जुन को भीष्म प्रचण्ड मेघ-तूफान के समान अजेय बताते हैं। → भीष्म निष्कर्ष देते हैं कि पाण्डवों की शक्ति का मूल केवल वीर नहीं, बल्कि उनका अद्वितीय संयोग है—अर्जुन के सारथी-सखा स्वयं नारायणस्वरूप श्रीकृष्ण हैं; दोनों सेनाओं में वैसा रथ (वैसा सहायक-बल) किसी और के पास नहीं। → कर्ण के भीतर उठता प्रश्न अनकहा रह जाता है—यदि पाण्डवों का ऐसा बल है, तो युद्ध का आग्रह किस धर्म पर टिकेगा, और कौरव-पक्ष किस उपाय से टिक पाएगा?

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माजल छा |: एकोनसप्तत्यधिकशततमो< ध्याय: पाण्डवपक्षके रथी आदिका एवं उनकी महिमाका वर्णन भीष्म उवाच एते रथास्तवाख्यातास्तथैवातिरथा नृप । ये चाप्यर्धरथा राजन्‌ पाण्डवानामत: शूणु,भीष्मजी कहते हैं--नरेश्वर! ये तुम्हारे पक्षके रथी, अतिरथी और अर्धरथी बताये गये हैं। राजन्‌! अब तुम पाण्डवपक्षके रथी आदिका वर्णन सुनो

ভীষ্ম বললেন—হে নৃপ! তোমার পক্ষের রথী, অতিরথী ও অর্ধরথীদের বর্ণনা করা হয়েছে। এখন, হে রাজন, পাণ্ডবপক্ষের রথী প্রভৃতির বিবরণ শোনো।

Verse 2

यदि कौतूहलं तेडद्य पाण्डवानां बले नृप । रथसंख्यां शृणुष्व त्वं सहैभिर्वसुधाधिपै:

ভীষ্ম বললেন—হে নৃপ! আজ যদি পাণ্ডবদের বল সম্পর্কে তোমার কৌতূহল থাকে, তবে এই ভূধর রাজাদের সঙ্গে তাদের রথসংখ্যা শোনো।

Verse 3

नरेश! अब यदि पाण्डवोंकी सेनाके विषयमें भी जानकारी करनेके लिये तुम्हारे मनमें कौतूहल हो तो इन भूमिपालोंके साथ तुम उनके रथियोंकी गणना सुनो ।। स्वयं राजा रथोदार: पाण्डव: कुन्तिनन्दन: । अग्निवत्‌ समरे तात चरिष्यति न संशय:

ভীষ্ম বললেন—হে নরেশ! পাণ্ডবদের সেনা সম্বন্ধেও যদি তোমার মনে কৌতূহল জাগে, তবে এই ভূপালদের সঙ্গে তাদের রথীদের গণনা শোনো। স্বয়ং কুন্তীনন্দন পাণ্ডব, মহারথ-প্রতাপী রাজা—হে তাত—যুদ্ধে অগ্নির ন্যায় সর্বত্র বিচরণ করবেন; এতে সন্দেহ নেই।

Verse 4

तात! कुन्तीका आनन्द बढ़ानेवाले स्वयं पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर एक श्रेष्ठ रथी (महारथी) हैं। वे समरभूमिमें अग्निके समान सब ओर विचरेंगे, इसमें संशय नहीं है ।। भीमसेनस्तु राजेन्द्र रथोडष्टगुणसम्मित: । न तस्यास्ति समो युद्धे गदया सायकैरपि

ভীষ্ম বললেন—হে তাত! কুন্তীর আনন্দবর্ধক পাণ্ডুপুত্র রাজা যুধিষ্ঠির স্বয়ং শ্রেষ্ঠ রথী, মহারথী। তিনি রণক্ষেত্রে অগ্নির ন্যায় সর্বদিকে বিচরণ করবেন; এতে সন্দেহ নেই। আর হে রাজেন্দ্র! ভীমসেন অষ্টগুণ পরাক্রমসম্পন্ন রথী; যুদ্ধে গদা হোক বা শর—তাঁর সমান কেউ নেই।

Verse 5

माद्रीपुत्रो च रथिनौ द्वावेव पुरुषर्षभी

ভীষ্ম বললেন—আর মাদ্রীর দুই পুত্রও রথী; তারা উভয়েই পুরুষশ্রেষ্ঠ, বৃষভসম বীর।

Verse 6

एते चमूमुपगता: स्मरन्त: क्लेशमुत्तमम्‌

ভীষ্ম বললেন—পরম দুঃখ স্মরণ করতে করতে এরা সকলেই সেনার নিকট এসে উপস্থিত হয়েছে।

Verse 7

सर्व एव महात्मान: शालस्तम्भा इवोद्गता:

ভীষ্ম বললেন—তাঁরা সকলেই সত্যই মহাত্মা; শালবৃক্ষের স্তম্ভের মতো ঋজু ও অচল হয়ে দাঁড়িয়েছিলেন।

Verse 8

सिंहसंहनना: सर्वे पाण्डुपुत्रा महाबला:,सभी पाण्डव सिंहके समान सुगठित शरीरवाले और महान्‌ बलवान हैं। तात! उन सबने ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया है, पुरुषोंमें सिंहके समान पराक्रमी पाण्डव तपस्वी, लज्जाशील और व्याप्रके समान उत्कट बलशाली हैं

ভীষ্ম বললেন—পাণ্ডুর সকল পুত্রই সিংহসম সুগঠিত দেহধারী ও অতীব বলবান। হে তাত! তারা সকলেই ব্রহ্মচর্যব্রত যথাযথভাবে পালন করেছে। মানুষের মধ্যে সিংহের মতো পরাক্রমী সেই পাণ্ডবরা তপস্বী, লজ্জাশীল, এবং ব্যাঘ্রের ন্যায় তীব্র, একাগ্র শক্তিসম্পন্ন।

Verse 9

चरितव्रद्याचर्याश्व सर्वे तात तपस्विन: । ह्वीमन्त: पुरुषव्याप्रा व्याप्रा इव बलोत्कटा:,सभी पाण्डव सिंहके समान सुगठित शरीरवाले और महान्‌ बलवान हैं। तात! उन सबने ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया है, पुरुषोंमें सिंहके समान पराक्रमी पाण्डव तपस्वी, लज्जाशील और व्याप्रके समान उत्कट बलशाली हैं

ভীষ্ম বললেন—হে তাত! তারা সকলেই আচরণে তপস্বী ও ব্রতে অচল; ব্রহ্মচর্যধর্ম পালন করেছে। লজ্জাসংযমী, পুরুষদের মধ্যে ব্যাঘ্র সেই পাণ্ডবরা ব্যাঘ্রের ন্যায় তীব্র বলসম্পন্ন।

Verse 10

जवे प्रहारे सम्मर्दे सर्व एवातिमानुषा: । सर्वर्जिता महीपाला दिग्जये भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! वे वेग, प्रहार और संघर्षमें अमानुषिक शक्तिसे सम्पन्न हैं। उन सबने दिग्विजयके समय बहुत-से राजाओंपर विजय पायी है

ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! বেগে, আঘাতে ও সংঘর্ষে তারা সকলেই অতিমানবীয় শক্তিসম্পন্ন। হে ভরতকুলশ্রেষ্ঠ! দিগ্বিজয়ের কালে তারা বহু রাজাকে পরাজিত করেছিল।

Verse 11

न चैषां पुरुषा: केचिदायुधानि गदा: शरान्‌ | विषहन्ति सदा कर्तुमधिज्यान्यपि कौरव,बालैरपि भवन्तस्तै: सर्व एव विशेषिता: । कुरुनन्दन! इनके आयुधों, गदाओं और बाणोंका आघात कोई भी नहीं सह सकते हैं। इसके सिवा न तो कोई इनके धनुषपर प्रत्यंचा ही चढ़ा पाते हैं, न युद्धमें इनकी भारी गदाको ही उठा सकते हैं और न इनके बाणोंका ही प्रयोग कर सकते हैं। वेगसे चलने, लक्ष्य-भेद करने, खाने-पीने तथा धूलि-क्रीड़ा करने आदिमें उन सबने बाल्यावस्थामें भी तुम्हें पराजित कर दिया था

ভীষ্ম বললেন—হে কৌরব! এদের অস্ত্র—গদা ও বাণের আঘাত কোনো মানুষ সহ্য করতে পারে না। তদুপরি কেউ এদের ধনুকে জ্যা পরাতে পারে না, যুদ্ধে এদের ভারী গদা তুলতে পারে না, কিংবা এদের বাণ যথাযথভাবে প্রয়োগ করতে পারে না। শৈশবেই তারা গতি, লক্ষ্যভেদ, আহার-পান এবং ধূলিক্রীড়ায় তোমাদের সকলকে অতিক্রম করেছিল; তাই তারা সকলেই বিশেষভাবে শ্রেষ্ঠ।

Verse 12

उद्यन्तुं वा गदा गुर्वी: शरान्‌ वा क्षेप्तुमाहवे । जवे लक्ष्यस्य हरणे भोज्ये पांसुविकर्षणे

ভারী গদা তুলে চালানো হোক বা রণে বাণ নিক্ষেপ; গতি, লক্ষ্য দখল/ভেদ, ভোজন-শক্তি কিংবা ধূলিতে টেনে নেওয়ার মতো কসরতে—(এসব সব পরীক্ষায়) সে শ্রেষ্ঠ।

Verse 13

एतत्‌ सैन्यं समासाद्य सर्व एव बलोत्कटा:

এই সেনার মুখোমুখি হয়ে তারা সকলেই বল-পরাক্রমে উগ্র হয়ে উঠেছে।

Verse 14

विध्वंसयिष्यन्ति रणे मा सम तैः सह सद्भम: । इस सेनामें आकर वे सभी उत्कट बलशाली हो गये हैं। युद्धमें आनेपर वे तुम्हारी सेनाका विध्वंस कर डालेंगे। मैं चाहता हूँ उनसे कहीं भी तुम्हारी मुठभेड़ न हो ।। एकैकशस्ते सम्मर्दे हन्यु: सर्वान्‌ महीक्षित:

যুদ্ধে তারা তোমাদের সেনাকে ধ্বংস করে দেবে; অতএব তাদের সঙ্গে সমানে সমান ভেবে সংঘর্ষে যেয়ো না, ঘনিষ্ঠ মুঠভেড়েও জড়িয়ো না। এই সেনায় এসে তারা সকলেই প্রবল শক্তিধর হয়েছে। যুদ্ধ শুরু হলেই তারা তোমাদের বাহিনীকে উজাড় করবে। আমি চাই, কোথাও তোমাদের সঙ্গে তাদের সরাসরি সংঘর্ষ না হোক। ঘোর সমরে তারা একে একে সকল রাজাকেও নিধন করতে সক্ষম।

Verse 15

द्रौपद्याश्व॒ परिक्लेशं द्यूते च परुषा गिर:

দ্যূতসভায় দ্রৌপদীর সেই ভয়ংকর ক্লেশ এবং সেখানে উচ্চারিত কঠোর, বিদ্ধকারী বাক্যগুলি আমার মনে পড়ে।

Verse 16

लोहिताक्षो गुडाकेशो नारायणसहायवान्‌

রক্তবর্ণ নেত্রবিশিষ্ট, দৃঢ়প্রতিজ্ঞ গুড়াকেশ অর্জুন নারায়ণ (শ্রীকৃষ্ণ)-সহায়ে বলবান।

Verse 17

न हि देवेषु सर्वेषु नासुरेषूरगेषु च,समस्त देवताओं, असुरों, नागों, राक्षसों तथा यक्षोंमें भी अर्जुनके समान कोई नहीं है; फिर मनुष्योंमें तो हो ही कैसे सकता है? भूत या भविष्यमें भी कोई ऐसा रथी मेरे सुननेमें नहीं आया है

ভীষ্ম বললেন—সমস্ত দেবগণের মধ্যে, অসুরদের মধ্যে, নাগদের মধ্যেও অর্জুনের সমকক্ষ কেউ নেই; রাক্ষস ও যক্ষদের মধ্যেও নেই। তবে মানুষের মধ্যে সে তুলনা কীভাবে হবে? অতীতে বা ভবিষ্যতে এমন রথী আমি কখনও শুনিনি।

Verse 18

राक्षसेष्वथ यक्षेषु नरेषु कुत एव तु । भूतो5थवा भविष्यो वा रथ: वक्चिन्मया श्रुत:,समस्त देवताओं, असुरों, नागों, राक्षसों तथा यक्षोंमें भी अर्जुनके समान कोई नहीं है; फिर मनुष्योंमें तो हो ही कैसे सकता है? भूत या भविष्यमें भी कोई ऐसा रथी मेरे सुननेमें नहीं आया है

ভীষ্ম বললেন—রাক্ষস ও যক্ষদের মধ্যেও নয়, তবে মানুষের মধ্যে তো কথাই নেই—অর্জুনের তুল্য কেউ নেই। অতীত হোক বা ভবিষ্যৎ, তার মতো কোনো রথী আমি কখনও শুনিনি।

Verse 19

समायुक्तो महाराज रथ: पार्थस्य धीमत:ः । वासुदेवश्च संयन्ता योद्धा चैव धनंजय:,महाराज! बुद्धिमान्‌ अर्जुनका रथ जुता हुआ है। भगवान्‌ श्रीकृष्ण उसके सारथि और युद्धकुशल धनंजय रथी हैं

ভীষ্ম বললেন—হে মহারাজ! প্রাজ্ঞ পার্থের (অর্জুনের) রথ সুসংযোজিত ও সুসজ্জিত। বাসুদেব (শ্রীকৃষ্ণ) তার সারথি, আর ধনঞ্জয় নিজেই সেই রথের যোদ্ধা।

Verse 20

गाण्डीवं च धर्नुर्दिव्यं ते चाश्वा वातरंहस: । अभेद्यं कवचं दिव्यमक्षय्यौ च महेषुधी,दिव्य गाण्डीव धनुष है, वायुके समान वेगशाली अअश्व हैं, अभेद्य दिव्य कव४च है तथा अक्षय बाणोंसे भरे हुए दो महान्‌ तरकस हैं

ভীষ্ম বললেন—তোমার কাছে আছে দিব্য গাণ্ডীব ধনুক; তোমার অশ্বেরা বায়ুর মতো বেগবান। তোমার দিব্য কবচ অভেদ্য, আর অক্ষয় বাণে পূর্ণ দুই মহাতূণীরও আছে।

Verse 21

अस्त्रग्रामश्न माहेन्द्रो रौद्र:ः कौबेर एव च । याम्यश्न वारुणश्रैव गदाश्षोग्रप्रदर्शना:,उस रथमें अस्त्रोंके समुदाय-महेन्द्र, रुद्र, कुबेर, यम एवं वरुणसम्बन्धी अस्त्र हैं, भयंकर दिखायी देनेवाली गदाएँ हैं

সেই রথে ছিল দিব্য অস্ত্রসমূহের সম্পূর্ণ সমাবেশ—ইন্দ্র, রুদ্র, কুবের, যম ও বরুণ-অধিষ্ঠিত অস্ত্র; আর ছিল ভয়ংকর দর্শন গদাও।

Verse 22

वज़ादीनि च मुख्यानि नानाप्रहरणानि च । दानवानां सहस्राणि हिरण्यपुरवासिनाम्‌

বজ্র প্রভৃতি প্রধান অস্ত্র এবং নানাবিধ প্রহার-উপকরণও ছিল—হিরণ্যপুরবাসী সহস্র সহস্র দানবদের নিজস্ব আয়ুধ।

Verse 23

हतान्येकरथेनाजी कस्तस्य सदृशो रथ: । वज्र आदि भाँति-भाँतिके श्रेष्ठ आयुध भी उस रथमें विद्यमान हैं। अर्जुनने युद्धमें एकमात्र उस रथकी सहायतासे हिरण्यपुरमें निवास करनेवाले सहस्रों दानवोंका संहार किया है। उसके समान दूसरा कौन रथ हो सकता है? ।। एष हन्याद्धि संरम्भी बलवान्‌ सत्यविक्रम:

যুদ্ধে একমাত্র সেই রথের দ্বারাই এতজন নিহত হয়েছে—তার সমান আর কোন রথ আছে? তাতে বজ্র প্রভৃতি নানাবিধ শ্রেষ্ঠ আয়ুধ বিদ্যমান। সেই রথের সাহায্যেই অর্জুন যুদ্ধে হিরণ্যপুরবাসী সহস্র দানবকে বিনাশ করেছিল। তার তুল্য দ্বিতীয় কে? ক্রোধে উদ্দীপ্ত এই বলবান, সত্যবিক্রম নিশ্চয়ই শত্রুদের সংহার করবে।

Verse 24

तव सेनां महाबाहु: स्वां चैव परिपालयन्‌ । ये बलवान, सत्यपराक्रमी, महाबाहु अर्जुन क्रोधमें आकर तुम्हारी सेनाका संहार करेंगे और अपनी सेनाकी रक्षामें संलग्न रहेंगे || २३ है ।। अहं चैनं प्रत्युदियामाचार्यो वा धनंजयम्‌,मैं अथवा द्रोणाचार्य ही धनंजयका सामना कर सकते हैं। राजेन्द्र! दोनों सेनाओंमें तीसरा कोई ऐसा रथी नहीं है, जो बाणोंकी वर्षा करते हुए अर्जुनके सामने जा सके

মহাবাহু অর্জুন, নিজের সেনাকে রক্ষা করতে করতে, ক্রোধে উদ্দীপ্ত হয়ে তোমার সেনার সংহার করবে—সে বলবান ও সত্যবিক্রম। ধনঞ্জয়ের সম্মুখে আমি অথবা আচার্য দ্রোণই দাঁড়াতে পারি। রাজেন্দ্র! উভয় সেনাতেই তৃতীয় কোনো রথী নেই, যে বাণবর্ষণকারী অর্জুনের সামনে অগ্রসর হতে পারে।

Verse 25

न तृतीयो<स्ति राजेन्द्र सेनयोरुभयोरपि । य एन॑ शरवर्षाणि वर्षन्तमुदियाद्‌ रथी,मैं अथवा द्रोणाचार्य ही धनंजयका सामना कर सकते हैं। राजेन्द्र! दोनों सेनाओंमें तीसरा कोई ऐसा रथी नहीं है, जो बाणोंकी वर्षा करते हुए अर्जुनके सामने जा सके

রাজেন্দ্র! উভয় সেনাতেই তৃতীয় কোনো রথী নেই, যে বাণবর্ষণকারী অর্জুনের সামনে অগ্রসর হতে পারে।

Verse 26

जीमूत एव घर्मान्ति महावातसमीरित: । समायुक्तस्तु कौन्तेयो वासुदेवसहायवान्‌ | तरुणश्न कृती चैव जीर्णावावामुभावषि,ग्रीष्म-ऋतुके अन्तमें प्रचण्ड वायुसे प्रेरित महामेघकी भाँति श्रीकृष्णसहित अर्जुन युद्धके लिये तैयार है। वह अस्त्रोंका विद्वान्‌ और तरुण भी है। इधर हम दोनों वृद्ध हो चले हैं

ভীষ্ম বললেন— যেমন গ্রীষ্মের অন্তে প্রবল বায়ুতে তাড়িত মহামেঘ গর্জে ওঠে, তেমনই কুন্তীপুত্র অর্জুন বাসুদেব (শ্রীকৃষ্ণ)-সহায় হয়ে যুদ্ধে সম্পূর্ণ প্রস্তুত। সে তরুণ, কৃতী এবং অস্ত্রবিদ্যায় পারদর্শী; আর আমরা দু’জন তো বার্ধক্যে জীর্ণ হয়ে পড়েছি।

Verse 27

वैशम्पायन उवाच एतच्छुत्वा तु भीष्मस्य राज्ञां दध्वंसिरे तदा । काज्चनाड्रदिन: पीना भुजाश्षन्दनरूषिता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भीष्मकी यह बात सुनकर पाण्डवोंके पुरातन बल-पराक्रमको प्रत्यक्ष देखनेकी भाँति स्मरण करके राजाओंकी सुवर्णमय भुजबंदोंसे विभूषित चन्दनचर्चित स्थूल भुजाएँ एवं मन भी आवेगयुक्त होकर शिथिल हो गये

বৈশম্পায়ন বললেন— ভীষ্মের কথা শুনে তখনই সমবেত রাজারা বিচলিত হয়ে পড়ল। সোনার বাহুবন্ধে ভূষিত ও চন্দনে লেপা তাদের স্থূল বাহু শিথিল হয়ে গেল; মনও অস্থিরতায় কেঁপে উঠল।

Verse 28

मनोभि: सह संवेगै: संस्मृत्य च पुरातनम्‌ । सामर्थ्य पाण्डवेयानां यथा प्रत्यक्षदर्शनात्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भीष्मकी यह बात सुनकर पाण्डवोंके पुरातन बल-पराक्रमको प्रत्यक्ष देखनेकी भाँति स्मरण करके राजाओंकी सुवर्णमय भुजबंदोंसे विभूषित चन्दनचर्चित स्थूल भुजाएँ एवं मन भी आवेगयुक्त होकर शिथिल हो गये

বৈশম্পায়ন বললেন— হে জনমেজয়! ভীষ্মের কথা শুনে রাজারা মনে প্রবল আবেগ নিয়ে পাণ্ডবদের প্রাচীন পরাক্রম এমনভাবে স্মরণ করল যেন চোখের সামনে দেখছে। সেই স্মৃতিই তাদের সাহস শিথিল করল, আর তারা সংশয় ও চিন্তায় নিমগ্ন হয়ে পড়ল।

Verse 46

नागायुतबलो मानी तेजसा न स मानुष: । राजेन्द्र! भीमसेन तो अकेले आठ रथियोंके बराबर हैं। गदा और बाणोंद्वारा किये जानेवाले युद्धमें उनके समान दूसरा कोई योद्धा नहीं है। उनमें दस हजार हाथियोंका बल है। वे बड़े ही मानी तथा अलौकिक तेजसे सम्पन्न हैं

ভীষ্ম বললেন— হে রাজেন্দ্র! ভীমসেনের শক্তি দশ হাজার হাতির সমান। তিনি গর্বিত এবং অলৌকিক তেজে দীপ্ত—যেন সাধারণ মানুষ নন। ভীম একাই আটজন মহারথীর সমান। গদা ও বাণের যুদ্ধে তাঁর তুল্য আর কোনো যোদ্ধা নেই।

Verse 56

अश्विनाविव रूपेण तेजसा च समन्वितौ । माद्रीके दोनों पुत्र अश्विनीकुमारोंक समान रूपवान्‌ और तेजस्वी हैं। वे दोनों ही पुरुषरत्न रथी हैं

ভীষ্ম বললেন— মাদ্রীর দুই পুত্র রূপে ও তেজে অশ্বিনীকুমারদের সমান। তারা উভয়েই নরশ্রেষ্ঠ, পুরুষরত্ন এবং সিদ্ধ রথী।

Verse 66

रुद्रवत्‌ प्रचरिष्यन्ति तत्र मे नास्ति संशय: । ये चारों भाई महान्‌ क्लेशोंका स्मरण करके तुम्हारी सेनामें घुसकर रुद्रदेवके समान संहार करते हुए विचरेंगे; इस विषयमें मुझे संशय नहीं है

তারা সেখানে রুদ্রের ন্যায় বিচরণ করবে—এ বিষয়ে আমার কোনো সংশয় নেই। সেই চার ভাই মহাক্লেশের স্মৃতি মনে করে তোমার সেনার মধ্যে প্রবেশ করবে এবং রুদ্রদেবের মতো সংহার করতে করতে বিচরণ করবে; এতে আমার বিন্দুমাত্র সন্দেহ নেই।

Verse 76

प्रादेशेनाधिका: पुम्भिरन्यैस्ते च प्रमाणत: । ये सभी महामना पाण्डव शालवृक्षके स्तम्भोंके समान ऊँचे हैं। उनकी ऊँचाईका मान अन्य पुरुषोंसे एक बित्ता अधिक है

পরিমাপে তারা অন্য পুরুষদের চেয়ে এক প্রাদেশ (এক বিটা) অধিক উচ্চ। সেই মহামনা পাণ্ডবগণ সকলেই শালবৃক্ষের স্তম্ভের ন্যায় সুউচ্চ।

Verse 126

बालैरपि भवन्तस्तै: सर्व एव विशेषिता: । कुरुनन्दन! इनके आयुधों, गदाओं और बाणोंका आघात कोई भी नहीं सह सकते हैं। इसके सिवा न तो कोई इनके धनुषपर प्रत्यंचा ही चढ़ा पाते हैं, न युद्धमें इनकी भारी गदाको ही उठा सकते हैं और न इनके बाणोंका ही प्रयोग कर सकते हैं। वेगसे चलने, लक्ष्य-भेद करने, खाने-पीने तथा धूलि-क्रीड़ा करने आदिमें उन सबने बाल्यावस्थामें भी तुम्हें पराजित कर दिया था

কুরুনন্দন! বাল্যকালেও তোমরা সকলেই তাদের দ্বারা ছাপিয়ে গিয়েছিলে। তাদের অস্ত্র—গদা ও বাণের—আঘাত কেউ সহ্য করতে পারে না। তদুপরি কেউ তাদের ধনুকে প্রত্যঞ্চা পরাতে পারে না, যুদ্ধে তাদের ভারী গদা তুলতে পারে না, কিংবা তাদের বাণ যথাযথভাবে প্রয়োগ করতে পারে না। দ্রুত গমন, লক্ষ্যভেদ, আহার-পান এবং ধূলিক্রীড়া প্রভৃতিতেও তারা বাল্যকালেই তোমাদের পরাজিত করেছিল।

Verse 143

प्रत्यक्ष तव राजेन्द्र राजसूये यथाभवत्‌ । उनमेंसे एक-एकमें इतनी शक्ति है कि वे समस्त राजाओंका युद्धमें संहार कर सकते हैं। राजेन्द्र! राजसूय-यज्ञमें जैसा जो कुछ हुआ था, वह सब तुमने अपनी आँखों देखा था

রাজেন্দ্র! রাজসূয় যজ্ঞে যেমন যা ঘটেছিল, তা সবই তুমি প্রত্যক্ষ নিজের চোখে দেখেছিলে।

Verse 156

ते स्मरन्तश्न संग्रामे चरिष्यन्ति च रुद्रवत्‌ । द्यूतक्रीड़ाके समय द्रौपदीको जो महान्‌ क्लेश दिया गया और पाण्डवोंके प्रति कठोर बातें सुनायी गयीं, उन सबको याद करके वे संग्रामभूमिमें रुद्रके समान विचरेंगे

যুদ্ধে তারা সেই সব স্মরণ করে রুদ্রের ন্যায় বিচরণ করবে। পাশাখেলার সময় দ্রৌপদীকে যে মহাক্লেশ দেওয়া হয়েছিল এবং পাণ্ডবদের প্রতি যে কঠোর বাক্য উচ্চারিত হয়েছিল—তা মনে করে তারা রণভূমিতে রুদ্রসম সংহার করতে করতে বিচরণ করবে।

Verse 166

उभयो: सेनयोर्वीरो रथो नास्तीति तादृश: । लाल नेत्रोंवाले निद्राविजयी अर्जुनके सखा और सहायक नारायणस्वरूप भगवान्‌ श्रीकृष्ण हैं। कौरव-पाण्डव दोनों सेनाओंमें अर्जुनके समान वीर रथी दूसरा कोई नहीं है

ভীষ্ম বললেন—উভয় সেনাতেই তেমন আর কোনো রথযোদ্ধা নেই। কারণ অর্জুনের বন্ধু ও সহায় স্বয়ং ভগবান শ্রীকৃষ্ণ—নারায়ণস্বરૂપ, পদ্মনয়ন এবং নিদ্রাজয়ী। অতএব কৌরব ও পাণ্ডব—দুই পক্ষেই অর্জুনের সমান দ্বিতীয় কোনো বীর রথী নেই।

Verse 168

इस प्रकार श्रीमह्या भारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत रथातिरथसंख्यानपर्वमें भीष्य- कर्णसंवादविषयक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত রথাতিরথসংখ্যানপর্বে ভীষ্ম-কর্ণ সংলাপবিষয়ক একশো আটষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 169

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि रथातिरथसंख्यानपर्वणि पाण्डवरथातिरथसंख्यायां एकोनसप्तत्यधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत रथातिरथसंख्यानपर्वमें पाण्डवपक्षके राथियों और अतिराथियोंका संख्याविषयक एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত রথাতিরথসংখ্যানপর্বে পাণ্ডবপক্ষের রথী ও অতিরথীদের সংখ্যাবিষয়ক একশো ঊনআশিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Frequently Asked Questions

The ethical tension centers on advisory responsibility: an elder must present an unembellished assessment of opponent strength, even when such realism undermines court confidence or exposes prior political misjudgment.

Competent governance requires disciplined perception—accurate classification of capabilities, alliances, and leadership—because dharma in statecraft includes preventing avoidable harm through informed decision-making.

No explicit phalaśruti is stated; the chapter’s meta-function is documentary and strategic, positioning this assessment as interpretive guidance within the broader mobilization narrative of Udyoga Parva.