Adhyaya 15
Udyoga ParvaAdhyaya 1536 Verses

Adhyaya 15

Nahūṣa’s Pride, the Ṛṣi-Borne Palanquin, and the Search for Indra (नहुष-इन्द्राणी-प्रकरणम्)

Upa-parva: Nahūṣa–Indrāṇī–Bṛhaspati–Agni Episode (Udyoga Parva: Adhyāya 15)

Śalya narrates an embedded episode in which a confidential plan is communicated to Indrāṇī: she is instructed to approach Nahūṣa privately and propose that, if he desires her allegiance, he should come in a distinctive conveyance. Indrāṇī meets Nahūṣa; he welcomes her, promises to fulfill her request, and is persuaded by her proposal that ṛṣis collectively bear him in a palanquin—an unprecedented display meant to test his conduct. Nahūṣa, exhilarated, interprets the arrangement as proof of his superiority and articulates expansive claims about his power and cosmic centrality. He then compels disciplined sages to carry him, characterized as a lapse into adharma fueled by intoxication of boons and desire. Released from Nahūṣa, Indrāṇī appeals to Bṛhaspati: the time-limit imposed by Nahūṣa is nearly spent, and Indra must be found. Bṛhaspati reassures her that Nahūṣa’s unethical treatment of sages will not endure and undertakes a rite to locate the devarāja. Agni, assuming an extraordinary disguise, searches rapidly across realms but reports inability to enter the waters, citing existential risk; Bṛhaspati directs him toward the waters nonetheless, and a cosmological maxim is stated about elemental energies returning to their own wombs (yoni) and becoming quiescent there.

Chapter Arc: शल्य उवाच—इन्द्र के अन्तर्धान के बाद देवसभा में अस्थिरता है; इन्द्राणी (शची) को उपाय सूझता है कि नहुष के बढ़ते अहंकार को उसी के वचन-जाल में बाँधकर देवाधिपत्य की मर्यादा बचाई जाए। → ऋषियों के हव्य-कव्य से तेजस्वी होकर नहुष इन्द्रासन पर बैठता है और इन्द्राणी पर अधिकार जताता है। इन्द्राणी उसे एक ‘शर्त’ में उलझाती है—गुप्त रूप से जाकर एकान्त में उसे उकसाती है कि वह अपूर्व वाहन की इच्छा करे। नहुष, काम और मद में, ऋषियों को ही अपना वाहन बनाने की बात स्वीकार कर लेता है। → नहुष का ‘अपूर्व वाहन’—ऋषियों को पालकी/वाहन बनाना—धर्म-सीमा का अतिक्रमण बनकर फूट पड़ता है; ब्रह्मतेज का अपमान और राजतेज का उन्माद टकराते हैं। इसी बीच बृहस्पति विधिपूर्वक अग्नि प्रज्वलित कर हवि अर्पित करते हैं और देव-व्यवस्था को पुनः स्थिर करने हेतु इन्द्र-प्राप्ति का यज्ञीय उपाय आरम्भ होता है। → बृहस्पति और अग्नि के संवाद में सृष्टि-तत्त्वों का क्रम (जल से अग्नि, ब्राह्मण से क्षत्र, पत्थर से लोहा—तेज का अपने-अपने योनि में शमन) प्रतिपादित होता है—यह संकेत देता है कि उन्मत्त तेज भी मर्यादा में लौटता है। इन्द्राणी आश्वस्त होती है कि नहुष का अधर्म उसे शीघ्र पतन की ओर ले जाएगा और इन्द्र की पुनर्प्राप्ति सम्भव है। → नहुष के पतन की घड़ी निकट है—ऋषियों को वाहन बनाने का दुष्परिणाम कब और कैसे प्रकट होगा, और इन्द्र किस प्रकार पुनः प्राप्त होंगे?

Shlokas

Verse 1

अत-४--क+ पञ्चदशो<् ध्याय: इन्द्रकी आज्ञासे इन्द्राणीके अनुरोधपर नहुषका ऋषियोंको अपना वाहन बनाना तथा बृहस्पति और अग्निका संवाद शल्य उवाच एवमुक्त: स भगवाऊ्छच्या तां पुनरब्रवीत्‌ | विक्रमस्य न कालो<यं नहुषो बलवत्तर:,शल्य कहते हैं--युधिष्ठिर! शचीदेवीके ऐसा कहनेपर भगवान्‌ इन्द्रने पुन: उनसे कहा --देवि! यह पराक्रम करनेका समय नहीं है। आजकल नहुष बहुत बलवान हो गया है

শল্য বললেন—শচী এমন বললে ভগবান ইন্দ্র তাঁকে আবার বললেন—“দেবি! এখন বীরত্ব প্রদর্শনের সময় নয়; এই সময়ে নহুষ অত্যন্ত বলবান হয়ে উঠেছে।”

Verse 2

विवर्धितश्न ऋषिभिह॑व्यकव्यैशक्ष भाविनि । नीतिमत्र विधास्यामि देवि तां कर्तुमहसि,'भामिनि! ऋषियोंने हव्य और कव्य देकर उसकी शक्तिको बहुत बढ़ा दिया है। अतः मैं यहाँ नीतिसे काम लूँगा। देवि! तुम उसी नीतिका पालन करो

“হে ভামিনী! ঋষিরা হব্য ও কব্য অর্ঘ্য দিয়ে তার শক্তি বহুগুণ বাড়িয়ে দিয়েছেন। অতএব এখানে আমি নীতির পথেই চলব। দেবি, তুমিও সেই নীতিই অনুসরণ করো।”

Verse 3

गुहां चैतत्‌ त्वया कार्य नाख्यातव्यं शुभे क्वचित्‌ | गत्वा नहुषमेकान्ते ब्रवीहि च सुमध्यमे,'शुभे! तुम्हें गुप्तरूपसे यह कार्य करना है। कहीं (भी इसे) प्रकट न करना। सुमध्यमे! तुम एकान्तमें नहुषके पास जाकर कहो--जगत्पते! आप दिव्य ऋषियानपर बैठकर मेरे पास आइये। ऐसा होनेपर मैं प्रसन्नतापूर्वक आपके वशमें हो जाऊँगी”

“শুভে! এ কাজ তোমাকে গোপনে করতে হবে; কোথাও একে প্রকাশ করবে না। হে সুমধ্যমে! একান্তে নহুষের কাছে গিয়ে এই বার্তা বলো।”

Verse 4

ऋषियानेन दिव्येन मामुपैहि जगत्पते । एवं तव वशे प्रीता भविष्यामीति तं॑ वद,'शुभे! तुम्हें गुप्तरूपसे यह कार्य करना है। कहीं (भी इसे) प्रकट न करना। सुमध्यमे! तुम एकान्तमें नहुषके पास जाकर कहो--जगत्पते! आप दिव्य ऋषियानपर बैठकर मेरे पास आइये। ऐसा होनेपर मैं प्रसन्नतापूर्वक आपके वशमें हो जाऊँगी”

“হে জগত্পতি! দিব্য ঋষি-যানে আরূঢ় হয়ে আমার কাছে আসুন; তা হলে আমি আনন্দিত হয়ে আপনার বশে থাকব”—নহুষকে এ কথাই বলো।

Verse 5

इत्युक्ता देवराजेन पत्नी सा कमलेक्षणा । एवमस्त्वित्यथोक्त्वा तु जगाम नहुषं प्रति,देवराजके इस प्रकार आदेश देनेपर उनकी कमलनयनी पत्नी शची 'एवमस्तु” कहकर नहुषके पास गयीं

দেবরাজের এমন আদেশে কমলনয়না পত্নী শচী ‘এবমস্তু’ বলে নহুষের দিকে গেলেন।

Verse 6

नहुषस्तां ततो दृष्टवा सस्मितो वाक्यमब्रवीत्‌ स्वागतं ते वरारोहे कि करोमि शुचिस्मिते,उन्हें देखकर नहुष मुसकराया और इस प्रकार बोला--“वरारोहे! तुम्हारा स्वागत है। शुचिस्मिते! कहो, तुम्हारी क्या सेवा करूँ?

তাঁকে দেখে নহুষ মৃদু হাসলেন এবং বললেন—“বরারোহে, তোমাকে স্বাগতম। শুচিস্মিতে, বলো—আমি তোমার কী সেবা করব?”

Verse 7

भक्त मां भज कल्याणि किमिच्छसि मनस्विनि । तव कल्याणि यत्‌ कार्य तत्‌ करिष्ये सुमध्यमे,“कल्याणि! मैं तुम्हारा भक्त हूँ, मुझे स्वीकार करो। मनस्विनि! तुम क्‍या चाहती हो? सुमध्यमे! तुम्हारा जो भी कार्य होगा, उसे मैं सिद्ध करूँगा

“কল্যাণি, আমি তোমার ভক্ত—আমাকে গ্রহণ করো। মনস্বিনী, তুমি কী চাও? সুমধ্যমে, তোমার মঙ্গলার্থে যা করণীয়, আমি তা সম্পন্ন করব।”

Verse 8

न च व्रीडा त्वया कार्या सुश्रोणि मयि विश्वसे: । सत्येन वै शपे देवि करिष्ये वचनं तव,'सुश्रोणि! तुम्हें मुझसे लज्जा नहीं करनी चाहिये। मुझपर विश्वास करो। देवि! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ, तुम्हारी प्रत्येक आज्ञाका पालन करूँगा”

“সুশ্রোণি, আমার কাছে লজ্জা কোরো না; আমার ওপর বিশ্বাস রাখো। দেবি, সত্যের শপথ করে বলছি—তোমার বাক্য আমি পালন করব।”

Verse 9

इन्द्राण्युवाच यो मे कृतस्त्वया कालस्तमाकाडुक्षे जगत्पते । ततस्त्वमेव भर्ता मे भविष्यसि सुराधिप,इन्द्राणी बोलीं--जगत्पते! आपके साथ जो मेरी शर्त हो चुकी है, उसे मैं पूर्ण करना चाहती हूँ। सुरेश्वर! फिर तो आप ही मेरे पति होंगे

ইন্দ্রাণী বললেন—“জগত্পতে! তুমি আমার জন্য যে সময়-শর্ত স্থির করেছিলে, তার পূরণই আমি চাই। সুরাধিপ! অতএব তুমিই আমার স্বামী হবে।”

Verse 10

कार्य च हृदि मे यत्‌ तद्‌ देवराजावधारय । वक्ष्यामि यदि मे राजन्‌ प्रियमेतत्‌ करिष्यसि

শল্যা বলল—হে দেবরাজ! আমার হৃদয়ে যে কর্তব্য নিহিত আছে, তা ভালো করে ধারণ করুন। হে রাজন! আপনি যদি আমার প্রতি অনুগ্রহ করে এই প্রিয় কাজটি সম্পন্ন করেন, তবে আমি তা বলব।

Verse 11

वाक्यं॑ प्रणयसंयुक्तं ततः स्यां वशगा तव । देवराज! मेरे हृदयमें एक कार्यकी अभिलाषा है, उसे बताती हूँ, सुनिये। राजन्‌! यदि आप मेरे इस प्रिय कार्यको पूर्ण कर देंगे, प्रेमपूर्वक कही हुई मेरी यह बात मान लेंगे तो मैं आपके अधीन हो जाऊँगी ।। १० ह ।। इन्द्रस्य वाजिनो वाहा हस्तिनो5थ रथास्तथा,सुरेश्वर! पहले जो इन्द्र थे, उनके वाहन हाथी, घोड़े तथा रथ आदि रहे हैं, परंतु आपका वाहन उनसे सर्वथा विलक्षण--अपूर्व हो, ऐसी मेरी इच्छा है। वह वाहन ऐसा होना चाहिये, जो भगवान्‌ विष्णु, रुद्र, असुर तथा राक्षसोंके भी उपयोगमें न आया हो

শল্যা বলল—আপনি যদি স্নেহমিশ্রিত আমার বাক্য গ্রহণ করে হৃদয়ের প্রিয় অভিলাষ পূর্ণ করেন, তবে আমি সম্পূর্ণ আপনার অধীন হব। পূর্বকালে ইন্দ্রের বাহন ছিল ঘোড়া, হাতি ও রথ; কিন্তু হে সুরেশ্বর! আমি চাই আপনার বাহন হোক সম্পূর্ণ ব্যতিক্রমী, অপূর্ব—যা বিষ্ণু বা রুদ্র, কিংবা অসুর ও রাক্ষসদের দ্বারাও কখনো ব্যবহৃত হয়নি।

Verse 12

इच्छाम्यहमथापूर्व वाहनं ते सुराधिप । यन्न विष्णोर्न रुद्रस्य नासुराणां न रक्षसाम्‌,सुरेश्वर! पहले जो इन्द्र थे, उनके वाहन हाथी, घोड़े तथा रथ आदि रहे हैं, परंतु आपका वाहन उनसे सर्वथा विलक्षण--अपूर्व हो, ऐसी मेरी इच्छा है। वह वाहन ऐसा होना चाहिये, जो भगवान्‌ विष्णु, रुद्र, असुर तथा राक्षसोंके भी उपयोगमें न आया हो

শল্যা বলল—হে সুরাধিপ! আমি আপনার জন্য এক অপূর্ব বাহন চাই—যা না বিষ্ণুর, না রুদ্রের, না অসুরদের, না রাক্ষসদের কখনো ব্যবহৃত হয়েছে।

Verse 13

वहन्तु त्वां महाभागा ऋषय: संगता विभो । सर्वे शिबिकया राजन्नेतद्धि मम रोचते

শল্যা বলল—হে বিভো, হে মহাভাগ! সমবেত ঋষিগণ সকলে পালকিতে আপনাকে বহন করুন। হে রাজন! এটাই আমার প্রিয়।

Verse 14

प्रभो! महाभाग सप्तर्षि एकत्र होकर शिबिकाद्वारा आपका वहन करें। राजन्‌! यही मुझे अच्छा लगता है ।। नासुरेषु न देवेषु तुल्यो भवितुमरहसि । सर्वेषां तेज आदत्से स्वेन वीर्येण दर्शनात्‌ | न ते प्रमुखतः स्थातुं कश्निच्छक्नोति वीर्यवान्‌,आप अपने पराक्रमसे तथा दृष्टिपात करनेमात्रसे सबका तेज हर लेते हैं। देवताओं तथा असुरोंमें कोई भी आपकी समानता करनेवाला नहीं है। कोई कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, आपके सामने ठहर नहीं सकता है

শল্যা বলল—হে প্রভু, হে মহাভাগ! সপ্তর্ষি একত্র হয়ে পালকিতে আপনাকে বহন করুন; হে রাজন! এটাই আমার প্রিয়। দেব ও অসুরদের মধ্যে কেউই আপনার সমকক্ষ হওয়ার যোগ্য নয়। আপনার নিজ শক্তিতে, কেবল দর্শনমাত্রেই, আপনি সকলের তেজ হরণ করেন। যতই শক্তিমান হোক, কেউ আপনার সম্মুখে স্থির থাকতে পারে না।

Verse 15

शल्य उवाच एवमुक्तस्तु नहुष: प्राह्ृष्पत तदा किल । उवाच वचन चापि सुरेन्द्रस्तामनिन्दिताम्‌,शल्य कहते हैं--युधिष्ठिर! इन्द्राणीके ऐसा कहनेपर देवराज नहुष बड़े प्रसन्न हुए और उस सती-साध्वी देवीसे इस प्रकार बोले इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि बृहस्पत्यग्निसंवादे पज्चदशो<ध्याय:

শল্য বললেন—যুধিষ্ঠির! ইন্দ্রাণী এ কথা বলতেই দেবরাজ-পদে অধিষ্ঠিত নহুষ অত্যন্ত প্রসন্ন হলেন এবং সেই অনিন্দ্যা দেবীকে উদ্দেশ করে এইরূপ বাক্য বললেন।

Verse 16

नहुष उवाच अपूर्व वाहनमिदं त्वयोक्तं वरवर्णिनि । दृढं मे रुचितं देवि त्वद्वशो5स्मि वरानने,नहुषने कहा--सुन्दरि! तुमने तो यह अपूर्व वाहन बताया। देवि! मुझे भी वही सवारी अधिक पसंद है। सुमुखि! मैं तुम्हारे वशमें हूँ

নহুষ বললেন—হে সুন্দরবর্ণা! তুমি যে অপূর্ব বাহনের কথা বললে, তা আমার হৃদয়ে দৃঢ়ভাবে প্রিয় হয়ে উঠেছে। হে দেবী, হে সুমুখী! আমি তোমার বশে আছি।

Verse 17

न हाल्पवीर्यो भवति यो वाहान्‌ कुरुते मुनीन्‌ | अहं तपस्वी बलवान्‌ भूतभव्यभवत्प्रभु:,जो ऋषियोंको भी अपना वाहन बना सके, उस पुरुषमें थोड़ी शक्ति नहीं होती है। मैं तपस्वी, बलवान्‌ तथा भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंका स्वामी हूँ

নহুষ বললেন—যে মুনিদেরও বাহন করে নিতে পারে, সে সামান্য শক্তির অধিকারী নয়। আমি তপস্বী, বলবান, এবং অতীত-ভবিষ্যৎ-বর্তমান—তিন কালেরই প্রভু।

Verse 18

मयि क्ुद्धे जगन्न स्यान्मयि सर्व प्रतिष्ठितम्‌ । देवदानवगन्धर्वा: किन्नरोरगराक्षसा:,मेरे कुपित होनेपर यह संसार मिट जायगा। मुझपर ही सब कुछ टिका हुआ है। शुचिस्मिते! यदि मैं क्रोधमें भर जाऊँ तो यह देवता, दानव, गन्धर्व, किन्नर, नाग, राक्षस और सम्पूर्ण लोक मेरा सामना नहीं कर सकते हैं। मैं अपनी आँखसे जिसको देख लेता हूँ, उसका तेज हर लेता हूँ

নহুষ বললেন—আমি ক্রুদ্ধ হলে জগৎই আর থাকবে না; সবই আমার ওপর প্রতিষ্ঠিত। দেব, দানব, গন্ধর্ব, কিন্নর, নাগ ও রাক্ষস—এরা কেউই আমার সম্মুখে দাঁড়াতে পারবে না।

Verse 19

न मे क्रुद्धस्य पर्याप्ता: सर्वे लोका: शुचिस्मिते । चक्षुषा यं प्रपश्यामि तस्य तेजो हराम्यहम्‌,मेरे कुपित होनेपर यह संसार मिट जायगा। मुझपर ही सब कुछ टिका हुआ है। शुचिस्मिते! यदि मैं क्रोधमें भर जाऊँ तो यह देवता, दानव, गन्धर्व, किन्नर, नाग, राक्षस और सम्पूर्ण लोक मेरा सामना नहीं कर सकते हैं। मैं अपनी आँखसे जिसको देख लेता हूँ, उसका तेज हर लेता हूँ

নহুষ বললেন—হে শুচিস্মিতে! আমি ক্রুদ্ধ হলে সমস্ত লোকও আমাকে প্রতিহত করার জন্য যথেষ্ট নয়। যাকে আমি চোখে দেখি, তার তেজ আমি হরণ করি।

Verse 20

तस्मात्‌ ते वचन देवि करिष्यामि न संशय: । सप्तर्षयो मां वक्ष्यन्ति सर्वे ब्रह्मर्षयस्तथा । पश्य माहात्म्ययोगं मे ऋद्धिं च वरवर्णिनि,अतः देवि! मैं तुम्हारी आज्ञाका पालन करूँगा, इसमें संशय नहीं है। सम्पूर्ण सप्तर्षि और ब्रह्मर्षि मेरी पालकी ढोयेंगे। वरवर्णिनि! मेरे माहात्म्य तथा समृद्धिको तुम प्रत्यक्ष देख लो

অতএব দেবী, তোমার আদেশ আমি অবশ্যই পালন করব—এতে কোনো সন্দেহ নেই। সপ্তর্ষিগণ এবং সকল ব্রহ্মর্ষিও আমাকে বহন করবেন। হে শুভবর্ণা, আমার মহিমার যোগ ও সমৃদ্ধির পূর্ণতা তুমি প্রত্যক্ষ দেখো।

Verse 21

शल्य उवाच एवमुकक्‍त्वा तु तां देवीं विसृज्य च वराननाम्‌ | विमाने योजयित्वा च ऋषीन्‌ नियममास्थितान्‌,शल्य कहते हैं--राजन्‌! सुन्दर मुखवाली शची देवीसे ऐसा कहकर नहुषने उन्हें विदा कर दिया और यम-नियमका पालन करनेवाले बड़े-बड़े ऋषि-मुनियोंका अपमान करके अपनी पालकीमें जोत दिया। वह ब्राह्मणद्रोही नरेश बल पाकर उन्मत्त हो गया था। मद और बलसे गर्वित हो स्वेच्छाचारी दुष्टात्मा नहुषने उन महर्षियोंको अपना वाहन बनाया

শল্য বললেন—রাজন! এই কথা বলে সুন্দরমুখী সেই দেবীকে বিদায় দিয়ে নহুষ, সংযম-নিয়মে প্রতিষ্ঠিত ঋষিদের প্রতি অশ্রদ্ধা দেখিয়ে, তাদেরকে নিজের বিমান/পালকিতে জুড়ে দিল।

Verse 22

अब्रह्माण्यो बलोपेतो मत्तो मदबलेन च | कामवृत्त: स दुष्टात्मा वाहयामास तानूषीन्‌,शल्य कहते हैं--राजन्‌! सुन्दर मुखवाली शची देवीसे ऐसा कहकर नहुषने उन्हें विदा कर दिया और यम-नियमका पालन करनेवाले बड़े-बड़े ऋषि-मुनियोंका अपमान करके अपनी पालकीमें जोत दिया। वह ब्राह्मणद्रोही नरेश बल पाकर उन्मत्त हो गया था। मद और बलसे गर्वित हो स्वेच्छाचारी दुष्टात्मा नहुषने उन महर्षियोंको अपना वाहन बनाया

ব্রাহ্মণবিরোধী সেই রাজা বল পেয়ে উন্মত্ত হয়ে উঠল। শক্তি ও অহংকারের মদে দগ্ধ, কামবৃত্তিসম্পন্ন সেই দুষ্টাত্মা নহুষ ঋষিদের জোর করে বহন করাতে লাগল।

Verse 23

नहुषेण विसृष्टा च बृहस्पतिमथाब्रवीत्‌ । समयोअल्पावशेषो मे नहुषेणेह यः कृत:,उधर नहुषसे विदा लेकर इन्द्राणी बृहस्पतिके यहाँ गयीं और इस प्रकार बोलीं --देवगुरो! नहुषने मेरे लिये जो समय निश्चित किया है, उसमें थोड़ा ही शेष रह गया है

নহুষের কাছ থেকে বিদায় নিয়ে ইন্দ্রাণী বৃহস্পতির কাছে গেলেন এবং বললেন—দেবগুরু! নহুষ আমার জন্য এখানে যে সময়সীমা স্থির করেছে, তার অল্পই অবশিষ্ট আছে।

Verse 24

शक्रं मृगय शीघ्र त्वं भक्ताया: कुरु मे दयाम्‌ । बाढमित्येव भगवान्‌ बृहस्पतिरुवाच ताम्‌,“आप शीघ्र इन्द्रका पता लगाइये। मैं आपकी भक्त हूँ। मुझपर दया कीजिये।” तब भगवान्‌ बृहस्पतिने “बहुत अच्छा” कहकर उनसे इस प्रकार कहा--

“আপনি শীঘ্রই শক্র (ইন্দ্র)-কে খুঁজে বের করুন; আমি আপনার শরণাগত ভক্তা—আমার প্রতি দয়া করুন।” তখন ভগবান বৃহস্পতি বললেন, “তথাস্তু,” এবং তাকে আরও বললেন।

Verse 25

न भेतव्यं त्वया देवि नहुषाद्‌ दुष्टचेतस: । न होष स्थास्यति चिरं गत एष नराधम:,'देवि! तुम दुष्टात्मा नहुषसे डरो मत। यह नराधम अब अधिक समयतक यहाँ ठहर नहीं सकेगा। इसे गया हुआ ही समझो

শল্য বললেন—দেবি, দুষ্টচিত্ত নহুষকে তুমি ভয় কোরো না। এই নরাধম বেশিদিন এখানে থাকবে না; একে প্রায় গতই মনে করো।

Verse 26

अधर्मज्ञो महर्षीणां वाहनाच्च ततः शुभे । इष्टिं चाहं करिष्यामि विनाशायास्य दुर्मते:

শল্য বললেন—শুভে, এ অধর্মজ্ঞ; মহর্ষিদের বাহনও সে কেড়ে নিয়েছে। তাই এই দুর্মতির বিনাশের জন্য আমি ইষ্টিযজ্ঞ করব।

Verse 27

ततः प्रज्वाल्य विधिवज्जुहाव परमं हवि:,तदनन्तर महातेजस्वी बृहस्पतिने देवराजकी प्राप्तिके लिये विधिपूर्वक अग्निको प्रज्वलित करके उसमें उत्तम हविष्यकी आहुति दी। राजन! अग्निमें आहुति देकर उन्होंने अग्निदेवसे कहा--“आप इन्द्रदेवका पता लगाइये”

তারপর তিনি বিধিমতে অগ্নি প্রজ্বলিত করে শ্রেষ্ঠ হব্য অর্পণ করলেন। হে রাজন, আহুতি দিয়ে তিনি অগ্নিদেবকে বললেন—“ইন্দ্রদেব কোথায় আছেন, তা সন্ধান করো।”

Verse 28

बृहस्पतिर्महातेजा देवराजोपलब्धये । ह॒त्वाग्निं सो5ब्रवीद्‌ राजज्छक्रमन्विष्यतामिति,तदनन्तर महातेजस्वी बृहस्पतिने देवराजकी प्राप्तिके लिये विधिपूर्वक अग्निको प्रज्वलित करके उसमें उत्तम हविष्यकी आहुति दी। राजन! अग्निमें आहुति देकर उन्होंने अग्निदेवसे कहा--“आप इन्द्रदेवका पता लगाइये”

মহাতেজস্বী বৃহস্পতি দেবরাজকে পুনরুদ্ধার করতে বিধিমতে অগ্নিতে শ্রেষ্ঠ হব্য আহুতি দিলেন। হে রাজন, আহুতি দিয়ে তিনি অগ্নিদেবকে বললেন—“শক্র (ইন্দ্র)-কে অন্বেষণ করো।”

Verse 29

तस्माच्च भगवान्‌ देव: स्वयमेव हुताशन: । स्त्रीवेषमद्धुतं कृत्वा तत्रैवान्तरधीयत,उस हवनकुण्डसे साक्षात्‌ भगवान्‌ अग्निदेव प्रकट होकर अद्भुत स्त्रीवेष धारण करके वहीं अन्तर्धान हो गये

অতএব সেই হোমকুণ্ড থেকেই স্বয়ং ভগবান অগ্নিদেব প্রকাশিত হলেন। তিনি আশ্চর্য নারীবেশ ধারণ করে সেখানেই অন্তর্ধান করলেন।

Verse 30

| / दा | 23 ((([१ | //2८ पृथिवीं चान्तरिक्षं च विचिन्त्याथ मनोगति: । निमेषान्तरमात्रेण बृहस्पतिमुपागमत्‌,मनके समान तीव्र गतिवाले अग्निदेव सम्पूर्ण दिशाओं, विदिशाओं, पर्वतों और वनोंमें तथा भूतल और आकाशमें भी इन्द्रकी खोज करके पलभरमें बृहस्पतिके पास लौट आये

পৃথিবী ও অন্তরীক্ষ সর্বত্র অনুসন্ধান করে, মনসম বেগবান সেই দূত নিমেষমাত্রে বৃহস্পতির নিকট প্রত্যাবর্তন করল।

Verse 31

अग्निर्वाच बृहस्पते न पश्यामि देवराजमिह क्वचित्‌ । आप: शेषता: सदा चाप: प्रवेष्टं नोत्सहाम्पयहम्‌,अग्निदेव बोले--बृहस्पते! मैं देवराजको तो इस संसारमें कहीं नहीं देख रहा हूँ, केवल जल शेष रह गया है, जहाँ उनकी खोज नहीं की है। परंतु मैं कभी भी जलनमें प्रवेश करनेका साहस नहीं कर सकता

অগ্নি বললেন— “হে বৃহস্পতি, আমি এখানে কোথাও দেবরাজকে দেখছি না। কেবল জলই অবশিষ্ট আছে—সেখানেই অনুসন্ধান হয়নি; কিন্তু জলে প্রবেশ করার সাহস আমার নেই।”

Verse 32

न मे तत्र गतिर्तब्रह्मन्‌ किमन्यत्‌ करवाणि ते । तमब्रवीद्‌ देवगुरुरपो विश महाद्युते,ब्रह्म! जलमें मेरी गति नहीं है। इसके सिवा तुम्हारा दूसरा कौन कार्य मैं करूँ? तब देवगुरुने कहा--“महाद्युते! आप जलमें भी प्रवेश कीजिये”

অগ্নি বলল— “হে ব্রাহ্মণ, সেখানে (জলে) আমার গতি নেই; আপনার আর কী সেবা করব?” তখন দেবগুরু বললেন— “হে মহাদ্যুতি, জলে প্রবেশ করো।”

Verse 33

अग्निरवाच नाप: प्रवेष्ठुं शक्ष्यामि क्षयो मे5त्र भविष्यति । शरणं त्वां प्रपन्नो5स्मि स्वस्ति ते5स्तु महाद्युते

অগ্নি বললেন— “আমি জলে প্রবেশ করতে পারব না; সেখানে আমার বিনাশ হবে। আমি আপনার শরণ নিয়েছি। হে মহাদ্যুতি, আপনার মঙ্গল হোক।”

Verse 34

३३ ॥। अद्भयोडन्नि््रह्यृत: क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम्‌ । तेषां सर्वत्रगं तेज: स्वासु योनिषु शाम्यति,जलसे अगन्नि, ब्राह्मणसे क्षत्रिय तथा पत्थरसे लोहेकी उत्पत्ति हुई है। इनका तेज सर्वत्र काम करता है। परंतु अपने कारणभूत पदार्थोमें आकर बुझ जाता है

হে ব্রাহ্মণ, জল থেকে অগ্নি আহৃত হয়; ব্রাহ্মণ থেকে ক্ষত্রিয়ের উদ্ভব; আর পাথর থেকে লোহা উৎপন্ন হয়। এদের তেজ সর্বত্র কার্য করে, কিন্তু নিজ নিজ যোনি—নিজ কারণ-তত্ত্বে—ফিরলে শান্ত হয়ে যায়।

Verse 266

शक्रं चाधिगमिष्यामि मा भैस्त्वं भद्रमस्तु ते । 'शुभे! यह पापी धर्मको नहीं जानता। अतः महर्षियोंको अपना वाहन बनानेके कारण शीघ्र नीचे गिरेगा। इसके सिवा मैं भी इस दुर्बुद्धि नहुषके विनाशके लिये एक यज्ञ करूँगा। साथ ही इन्द्रका भी पता लगाऊँगा। तुम डरो मत। तुम्हारा कल्याण होगा”

“আমি শক্র (ইন্দ্র)-কেও খুঁজে বের করব। ভয় কোরো না; তোমার মঙ্গল হোক। এই পাপী ধর্ম জানে না; মহর্ষিদের বাহন করতে বাধ্য করে সে শীঘ্রই উচ্চস্থান থেকে পতিত হবে। এই দুর্বুদ্ধি নহুষের বিনাশের জন্য আমি এক যজ্ঞ করব এবং ইন্দ্রের অবস্থানও অনুসন্ধান করব।”

Verse 77777

ता

“তা…” (পংক্তিটি খণ্ডিত; প্রদত্ত অংশে কেবল “তা” আছে, পরবর্তী অংশ অনুপস্থিত।)

Frequently Asked Questions

The chapter dramatizes the misuse of delegated or assumed sovereignty: whether power can be exercised through coercion and spectacle, particularly by subordinating ṛṣis to royal vanity—an act framed as ethically corrosive and politically self-defeating.

Authority is stabilized by restraint and reverence for dharmic institutions; when pride and desire compel a ruler to instrumentalize ascetics, that ruler undermines legitimacy and invites corrective consequences through social and cosmic order.

No explicit phalaśruti appears in this chapter segment; its meta-function is exemplum-based—embedding a cautionary narrative to illustrate how adharma in leadership produces rapid reversal and necessitates ritual and ethical restoration.