
Udyoga Parva 142: Vidura’s warning to Kuntī and Kuntī’s resolve to meet Karṇa (Gaṅgātīra encounter begins)
Upa-parva: Kuntī–Karṇa Saṃvāda (Kuntī’s approach to Karṇa on the Gaṅgā bank)
Vaiśaṃpāyana narrates that, with Kṛṣṇa’s conciliation unsuccessful and the Pāṇḍavas returned from the Kurus, Vidura approaches Kuntī in grief and speaks of the worsening situation: Duryodhana refuses counsel; Yudhiṣṭhira, though settled at Upaplavya, still seeks kin-harmony; Dhṛtarāṣṭra’s age does not restrain him from partiality born of attachment to his son; and divisive influence is attributed to key partisans (including Karṇa, Jayadratha, Duḥśāsana, and Śakuni). Vidura anticipates a destructive course and sleeplessly worries about the resulting loss. Kuntī, distressed, reflects on the futility of wealth and victory purchased by kinsmen’s destruction, and fears formidable elders and teachers aligned with the Kauravas. She identifies Karṇa’s persistent hostility as especially consequential, then recalls the earlier boon granted by Durvāsā and her youthful invocation of Sūrya that led to Karṇa’s birth. Concluding that she must attempt to soften Karṇa toward the Pāṇḍavas, she goes to the Bhāgīrathī. Hearing Karṇa’s Vedic recitation at the riverbank, she stands behind him, waiting until he completes his japa; when he turns, he greets her with proper respect, and the encounter is formally set for the ensuing dialogue.
Chapter Arc: कृष्ण के समक्ष कर्ण अपने भीतर उठते अनिष्ट-संकेतों और स्वप्न-छायाओं का द्वार खोलता है—मानो युद्ध का भविष्य पहले ही आकाश में लिख दिया गया हो। → कर्ण कृष्ण से कहता है कि आप सब जानते हुए भी मुझे मोह में क्यों डालना चाहते हैं; विनाश उपस्थित है, और इस विनाश के निमित्त शकुनि, दुःशासन, दुर्योधन तथा धृतराष्ट्र-पुत्रों की हठधर्मिता है। फिर वह विचित्र अपशकुनों का क्रम गिनाता है—सेनाओं में वाद्यों का न बजना, संध्याओं में शिवा का घोर रुदन, दिशाओं का रक्त-शस्त्र-रंग होना, और देह-प्रकृति तक में विकृति के संकेत। → कर्ण निर्णायक स्वर में भविष्यवाणी-सा निष्कर्ष रखता है: ये लक्षण पाण्डवों की विजय और कौरवों की पराजय बताते हैं; स्वयं कर्ण भी भीतर से दीन-चित्त हो उठता है, फिर भी अपने पक्ष-बंधन को नहीं तोड़ता। → अपशकुनों की सूची और कारण-निर्देश के बाद संवाद एक कठोर सत्य पर टिकता है—पराजय का ज्ञान होते हुए भी कर्ण का संकल्प दुर्योधन के साथ बना रहता है; कृष्ण की नीति-भाषा और कर्ण की प्रतिज्ञा एक-दूसरे को काटती हुई आगे के निर्णयों की भूमि तैयार करती है। → कर्ण स्वर्ण-विभूषित रथ पर चढ़कर लौटता है; उधर कृष्ण सात्यकि सहित शीघ्र प्रस्थान करते हैं और सारथि से बार-बार कहते हैं—“चलो, चलो”—मानो अगले ही क्षण कोई निर्णायक कूटनीतिक मोड़ आने वाला हो।
Verse 1
अपन हत< बक। ] अंक: त्रिचत्वारिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: कर्णके द्वारा पाण्डवोंकी विजय और कौरवोंकी पराजय सूचित करनेवाले लक्षणों एवं अपने स्वप्रका वर्णन संजय उवाच केशवस्य तु तद् वाक्य कर्ण: श्रुत्वा हितं शुभम् । अब्रवीदभिसम्पूज्य कृष्णं तं मधुसूदनम्,संजय कहते हैं--राजन्! भगवान् केशवका वह हितकर एवं कल्याणकारी वचन सुनकर कर्ण मधुसूदन श्रीकृष्णके प्रति सम्मानका भाव प्रदर्शित करते हुए इस प्रकार बोला --
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, কেশবের সেই হিতকর ও মঙ্গলময় বাক্য শুনে কর্ণ মধুসূদন শ্রীকৃষ্ণকে যথোচিত সম্মান জানিয়ে প্রত্যুত্তর দিল।
Verse 2
जानन् मां कि महाबाहो सम्मोहयितुमिच्छसि । यो<यं पृथिव्या: कार्त्स्न्येन विनाश: समुपस्थित:,“महाबाहो! आप सब कुछ जानते हुए भी मुझे मोहमें क्यों डालना चाहते हैं? यह जो इस भूतलका पूर्णरूपसे विनाश उपस्थित हुआ है, उसमें मैं, शकुनि, दुःशासन तथा धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन निमित्तमात्र हुए हैं
হে মহাবাহো! সব জেনেও তুমি কেন আমাকে মোহে ফেলতে চাও? এই যে সমগ্র পৃথিবীকে গ্রাসকারী বিনাশ উপস্থিত হয়েছে—তা এখন সন্নিকটে।
Verse 3
निमित्तं तत्र शकुनिरहं दुःशासनस्तथा । दुर्योधनश्व नृपतिर्धुतराष्ट्रसुतो5 भवत्,“महाबाहो! आप सब कुछ जानते हुए भी मुझे मोहमें क्यों डालना चाहते हैं? यह जो इस भूतलका पूर्णरूपसे विनाश उपस्थित हुआ है, उसमें मैं, शकुनि, दुःशासन तथा धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन निमित्तमात्र हुए हैं
সেই মহাবিপর্যয়ে শকুনি, আমি, দুঃশাসন এবং ধৃতরাষ্ট্রপুত্র রাজা দুর্যোধন—আমরা কেবল নিমিত্তমাত্র হয়েছি।
Verse 4
असंशयमिदं कृष्ण महद् युद्धमुपस्थितम् । पाण्डवानां कुरूणां च घोरं रुधिरकर्दमम्,“श्रीकृष्ण! इसमें संदेह नहीं कि कौरवों और पाण्डवोंका यह बड़ा भयंकर युद्ध उपस्थित हुआ है, जो रक्तकी कीच मचा देनेवाला है
হে কৃষ্ণ! এতে সন্দেহ নেই—পাণ্ডব ও কৌরবদের মধ্যে এই মহাযুদ্ধ উপস্থিত হয়েছে; ভয়ংকর, যা রণক্ষেত্রকে রক্তের কাদায় পরিণত করবে।
Verse 5
राजानो राजपुत्राश्न दुर्योधनवशानुगा: । रणे शस्त्राग्निना दग्धा: प्राप्स्पन्ति यमसादनम्,“दुर्योधनके वशमें रहनेवाले जो राजा और राजकुमार हैं, वे रणभूमिमें अस्त्र-शस्त्रोंकी आगसे जलकर निश्चय ही यमलोकमें जा पहुँचेंगे
দুর্যোধনের বশ অনুসরণকারী রাজা ও রাজপুত্রেরা রণক্ষেত্রে অস্ত্রশস্ত্রের অগ্নিতে দগ্ধ হয়ে নিশ্চিতই যমের আবাসে পৌঁছাবে।
Verse 6
स्वप्ना हि बहवो घोरा दृश्यन्ते मधुसूदन । निमित्तानि च घोराणि तथोत्पाता: सुदारुणा:,“मधुसूदन! मुझे बहुत-से भयंकर स्वप्न दिखायी देते हैं। घोर अपशकुन तथा अत्यन्त दारुण उत्पात दृष्टिगोचर होते हैं
সঞ্জয় বললেন—হে মধুসূদন! আমার কাছে বারবার বহু ভয়ংকর স্বপ্ন দেখা দিচ্ছে। ভীষণ অশুভ লক্ষণ ও অত্যন্ত দারুণ উৎপাতও দৃষ্টিগোচর হচ্ছে।
Verse 7
पराजयं धार्तराष्ट्रे विजयं च युधिष्ठिरे । शंसन्त इव वार्ष्णेय विविधा रोमहर्षणा:,वृष्णिनन्दन! वे रोंगटे खड़े कर देनेवाले विविध उत्पात मानो दुर्योधनकी पराजय और युधिष्ठिरकी विजय घोषित करते हैं
সঞ্জয় বললেন—হে বার্ষ্ণেয়! এই নানাবিধ রোমহর্ষক উৎপাত যেন ধৃতরাষ্ট্র-পুত্রের পরাজয় এবং যুধিষ্ঠিরের বিজয় ঘোষণা করছে।
Verse 8
प्राजापत्यं हि नक्षत्र ग्रहस्तीक्ष्णो महाद्युति: । शनैश्वर: पीडयति पीडयन् प्राणिनोडधिकम्,“महातेजस्वी एवं तीक्ष्ण ग्रह शनैश्षर प्रजापति-सम्बन्धी रोहिणीनक्षत्रको पीड़ित करते हुए जगतके प्राणियोंको अधिक-से-अधिक पीड़ा दे रहे हैं
সঞ্জয় বললেন—উজ্জ্বল দীপ্তিসম্পন্ন তীক্ষ্ণ গ্রহ শনৈশ্চর প্রজাপতি-সম্পর্কিত নক্ষত্রকে পীড়িত করছে; আর সেই পীড়ার দ্বারাই সে জীবসমূহকে আরও অধিক দুঃখ দিচ্ছে।
Verse 9
कृत्वा चाड्भरारको वक्रं ज्येष्ठायां मधुसूदन । अनुराधां प्रार्थयते मैत्रं संगमयज्निव
সঞ্জয় বললেন—হে মধুসূদন! অঙ্গারক (মঙ্গল) বক্রগতি ধারণ করে জ্যেষ্ঠার মধ্যে দিয়ে অনুরাধাকে প্রার্থনা করছে—যেন মৈত্রীর সন্ধি স্থাপন করতে, যেন কোনো সংযোগ-যজ্ঞের আয়োজন।
Verse 10
“मधुसूदन! मंगल ग्रह ज्येष्ठाके निकटसे वक्रणतिका आश्रय ले अनुराधा नक्षत्रपर आना चाहते हैं। जो राज्यस्थ राजाके मित्रमण्डलका विनाश-सा सूचित कर रहे हैं ।। नूनं महद्धयं कृष्ण कुरूणां समुपस्थितम् । विशेषेण हि वार्ष्णेय चित्रां पीडयते ग्रह:,वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! निश्चय ही कौरवोंपर महान् भय उपस्थित हुआ है। विशेषत: “महापात” नामक ग्रह चित्राको पीड़ा दे रहा है (जो राजाओंके विनाशका सूचक है)
সঞ্জয় বললেন—হে মধুসূদন! মঙ্গল জ্যেষ্ঠার নিকট দিয়ে বক্রগতি অবলম্বন করে অনুরাধা নক্ষত্রে যেতে চাইছে; এ যেন রাজাসীন রাজার মিত্রমণ্ডলের বিনাশেরই সংকেত। হে কৃষ্ণ! কৌরবদের উপর নিশ্চিতই মহাভয় এসে উপস্থিত হয়েছে। বিশেষত, হে বার্ষ্ণেয়, গ্রহটি চিত্রাকে পীড়িত করছে।
Verse 11
सोमस्य लक्ष्म व्यावृत्तं राहुररकमुपैति च । दिवश्लोल्का: पतन्त्येता: सनिर्घाता: सकम्पना:,'चन्द्रमाका कलंक (काला चिह्न) मिट-सा गया है, राहु सूर्यके समीप जा रहा है। आकाशसे ये उल्काएँ गिर रही हैं, वजपातके-से शब्द हो रहे हैं और धरती डोलती-सी जान पड़ती है
সঞ্জয় বললেন—চন্দ্রের কলঙ্কচিহ্ন যেন সরে গেছে, আর রাহু সূর্যের দিকে এগিয়ে আসছে। আকাশ থেকে উল্কা ঝরে পড়ছে; বজ্রাঘাতের মতো ভয়ংকর গর্জন উঠছে, আর পৃথিবী কাঁপতে কাঁপতে উঠছে বলে মনে হয়।
Verse 12
निष्टनन्ति च मातड्ा मुज्चन्त्यश्रूणि वाजिन: । पानीयं यवसं चापि नाभिनन्दन्ति माधव,“माधव! गजराज परस्पर टकराते और विकृत शब्द करते हैं। घोड़े नेत्रोंसे आँसू बहा रहे हैं। वे घास और पानी भी प्रसन्नतापूर्वक नहीं ग्रहण करते हैं
সঞ্জয় বললেন—হে মাধব! গজরাজেরা বিকৃত ও কর্কশ ধ্বনি তুলে চিৎকার করছে এবং পরস্পরকে ধাক্কা দিচ্ছে। অশ্বেরা চোখ দিয়ে অশ্রু ঝরাচ্ছে; জল ও ঘাসও তারা আনন্দসহকারে গ্রহণ করছে না।
Verse 13
प्रादुर्भूतेषु चैतेषु भयमाहुरुपस्थितम् । निमित्तेषु महाबाहो दारुणं प्राणिनाशनम्,“महाबाहो! कहते हैं, इन निमित्तों (उत्पातसूचक लक्षणों)-के प्रकट होनेपर प्राणियोंके विनाश करनेवाले दारुण भयकी उपस्थिति होती है
সঞ্জয় বললেন—হে মহাবাহো! বলা হয়, এইসব নিমিত্ত প্রকাশ পেলে প্রাণিনাশক ভয়ংকর আতঙ্ক উপস্থিত হয়।
Verse 14
अल्पे भुक्ते पुरीषं च प्रभूतमिह दृश्यते । वाजिनां वारणानां च मनुष्याणां च केशव,“केशव! हाथी, घोड़े तथा मनुष्य भोजन तो थोड़ा ही करते है; परंतु उनके पेटसे मल अधिक निकलता देखा जाता है
সঞ্জয় বললেন—হে কেশব! এখানে দেখা যাচ্ছে, হাতি, ঘোড়া ও মানুষ অল্পই আহার করছে, কিন্তু তাদের দেহ থেকে মল অত্যধিক পরিমাণে নির্গত হচ্ছে।
Verse 15
धार्तराष्ट्रस्य सैन्येषु सर्वेषु मधुसूदन । पराभवस्य तल्लिड्भरमिति प्राहुर्मनीषिण:,“मधुसूदन! दुर्योधनकी समस्त सेनाओंमें ये बातें पायी जाती हैं। मनीषी पुरुष इन्हें पराजयका लक्षण कहते हैं
সঞ্জয় বললেন—হে মধুসূদন! ধৃতরাষ্ট্রপুত্রের সমগ্র সেনাদলে এই লক্ষণগুলি দেখা যাচ্ছে। জ্ঞানীরা একে পরাজয়ের আসন্নতার লক্ষণসমষ্টি বলে ঘোষণা করেন।
Verse 16
प्रहृष्ट वाहनं कृष्ण पाण्डवानां प्रचक्षते | प्रदक्षिणा मृगाश्नैव तत् तेषां जयलक्षणम्,“श्रीकृष्ण! पाण्डवोंके वाहन प्रसन्न बताये जाते हैं और मृग उनके दाहिनेसे जाते देखे जाते हैं; यह लक्षण उनकी विजयका सूचक है
সঞ্জয় বললেন—হে কৃষ্ণ! পাণ্ডবদের বাহনগুলি প্রফুল্ল ও উদ্দীপ্ত দেখা যাচ্ছে, আর হরিণেরা তাদের ডান দিক দিয়ে অতিক্রম করছে। এটাই তাদের জয়ের লক্ষণ।
Verse 17
अपस्व्या मृगा: सर्वे धार्तराष्ट्रस्य केशव । वाचश्नचाप्यशरीरिण्यस्तत् पराभवलक्षणम्,“केशव! सभी मृग दुर्योधनके बाँयेंसे निकलते हैं और उसे प्राय: ऐसी वाणी सुनायी देती है, जिसके बोलनेवालेका शरीर नहीं दिखायी देता। यह उसकी पराजयका चिह्न है
সঞ্জয় বললেন—হে কেশব! ধৃতরাষ্ট্রপুত্রের বাম দিক দিয়ে সব মৃগই যাচ্ছে, আর সে বারবার এমন অশরীরী বাণী শুনছে যার বক্তা দেখা যায় না। এ তার পরাজয়ের লক্ষণ।
Verse 18
मयूरा: पुण्यशकुना हंससारसचातका: । जीवंजीवकसडसघाश्षाप्यनुगच्छन्ति पाण्डवान्,“मोर, शुभ शकुन सूचित करनेवाले मुर्गे, हंस, सारस, चातक तथा चकोरोंके समुदाय पाण्डवोंका अनुसरण करते हैं
সঞ্জয় বললেন—ময়ূর, শুভ শকুনসূচক পাখি, হাঁস, সারস, চাতক এবং জীবঞ্জীবক প্রভৃতি পাখির দল পাণ্ডবদের অনুসরণ করছে।
Verse 19
गृध्रा: कड़का बका: श्येना यातुधानास्तथा वृका: । मक्षिकाणां च सड्घाता अनुधावन्ति कौरवान्,“इसी प्रकार गीध, कंक, बक, श्येन (बाज), राक्षस, भेड़िये तथा मक्खियोंके समूह कौरवोंके पीछे दौड़ते हैं
সঞ্জয় বললেন—তেমনি শকুন, কঙ্ক, বক, শ্যেন (বাজ), যাতুধান (রাক্ষস) ও নেকড়ে, আর মাছির ঝাঁক কৌরবদের পেছনে ছুটছে।
Verse 20
धार्तराष्ट्रस्य सैन्येषु भेरीणां नास्ति नि:ःस्वन: । अनाहता: पाण्डवानां नदन्ति पटहा: किल,“दुर्योधनकी सेनाओंमें बजानेपर भी भेरियोंके शब्द प्रकट नहीं होते हैं और पाण्डवोंके डंके बिना बजाये ही बज उठते हैं
সঞ্জয় বললেন—ধৃতরাষ্ট্রপুত্রের সেনায় আঘাত করলেও ভেরীর ধ্বনি ওঠে না; কিন্তু পাণ্ডবদের পটহ যেন বিনা আঘাতেই গর্জে ওঠে।
Verse 21
उदपानाश्ष नर्दन्ति यथा गोवृषभास्तथा । धार्तराष्ट्रस्य सैन्येषु तत् पराभवलक्षणम्,“दुर्योधनकी सेनाओंमें कुएँ आदि जलाशय गाय-बैलोंके समान शब्द करते हैं। यह उसकी पराजयका लक्षण है
সঞ্জয় বললেন—ধৃতরাষ্ট্রের বাহিনীতে কূপ ও অন্যান্য জলাশয়ও যেন গোরু-ষাঁড়ের মতো ডেকে ওঠে; এ তাদের পরাজয়ের লক্ষণ।
Verse 22
मांसशोणितवर्ष च वृष्टं देवेन माधव । तथा गन्धर्वनगरं भानुमत् समुपस्थितम्,“माधव! बादल आकाशसे मांस और रक्तकी वर्षा करते हैं। अन्तरिक्षमें चहारदिवारी, खाईं, वप्र और सुन्दर फाटकोंसहित सूर्ययुक्त गन्धर्वनगर प्रकट दिखायी देता है। वहाँ सूर्यको चारों ओरसे घेरकर एक काला परिघ प्रकट होता है
সঞ্জয় বললেন—হে মাধব! দেবতা মাংস ও রক্তের বৃষ্টি বর্ষিয়েছেন; আর আকাশে দীপ্তিমান গন্ধর্ব-নগরও প্রকাশ পেয়েছে।
Verse 23
सप्राकारं सपरिखं सवप्रं चारुतोरणम् । कृष्णश्न परिघस्तत्र भानुमावृत्य तिकछति,“माधव! बादल आकाशसे मांस और रक्तकी वर्षा करते हैं। अन्तरिक्षमें चहारदिवारी, खाईं, वप्र और सुन्दर फाटकोंसहित सूर्ययुक्त गन्धर्वनगर प्रकट दिखायी देता है। वहाँ सूर्यको चारों ओरसे घेरकर एक काला परिघ प्रकट होता है
সঞ্জয় বললেন—আকাশে এক নগর দেখা যায়, প্রাকার, পরিখা, বপ্র ও সুন্দর তোরণসহ; সেখানে সূর্যকে ঘিরে এক কালো বৃত্তাকার আবরণ তাকে আচ্ছন্ন করে।
Verse 24
उदयास्तमने संध्ये वेदयन्ती महद्धयम् । शिवा च वाशते घोरं तत् पराभवलक्षणम्,'सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों संध्याओंके समय एक गीदड़ी महान् भयकी सूचना देती हुई भयंकर आवाजमें रोती है। यह भी कौरवोंकी पराजयका लक्षण है
সঞ্জয় বললেন—সূর্যোদয় ও সূর্যাস্তের সন্ধিক্ষণে এক শেয়াল মহাভয়ের সংবাদ দিচ্ছে যেন, ভয়ংকর স্বরে হুংকার করে কাঁদে; এটিও পরাজয়ের লক্ষণ।
Verse 25
एकपक्षाक्षिचरणा: पक्षिणो मधुसूदन । उत्सृजन्ति महद् घोरं तत् पराभवलक्षणम्,“मधुसूदन! एक पाँख, एक आँख और एक पैरवाले पक्षी अत्यन्त भयंकर शब्द करते हैं। यह भी कौरवपक्षकी पराजयका ही लक्षण है
সঞ্জয় বললেন—হে মধুসূদন! এক ডানা, এক চোখ ও এক পা-ওয়ালা বিকৃত পাখিরা প্রবল ভয়ংকর ধ্বনি তোলে; এটিও পরাজয়ের লক্ষণ।
Verse 26
कृष्णग्रीवाश्व॒ शकुना रक्तपादा भयानका: । संध्यामभिमुखा यान्ति तत् पराभवलक्षणम्,'संध्याकालमें काली ग्रीवा और लाल पैरवाले भयानक पक्षी सामने आ जाते हैं, वह भी पराजयका ही चिह्न है
সঞ্জয় বললেন— কালো গ্রীবা ও লাল পা-ওয়ালা ভয়ংকর পাখিরা সন্ধ্যার দিকে সোজা এগিয়ে আসে; এ পরাজয়ের লক্ষণ।
Verse 27
ब्राह्मणान् प्रथमं द्वेष्टि गुरूंश्व मधुसूदन । भृत्यान् भक्तिमतश्चापि तत् पराभवलक्षणम्,“मधुसूदन! दुर्योधन पहले ब्राह्मणोंसे द्वेष करता है; फिर गुरुजनोंसे तथा अपने प्रति भक्ति रखनेवाले भृत्योंसे भी द्रोह करने लगता है, यह उसकी पराजयका ही लक्षण है
সঞ্জয় বললেন— হে মধুসূদন! দুর্যোধন প্রথমে ব্রাহ্মণদের ঘৃণা করে; তারপর গুরুজনদের অবজ্ঞা করে, এমনকি তার প্রতি অনুরক্ত ভৃত্যদেরও বিশ্বাসঘাতকতা করে—এ পরাজয়ের স্পষ্ট লক্ষণ।
Verse 28
पूर्वा दिगू लोहिताकारा शस्त्रवर्णा च दक्षिणा । आमपात्रप्रतीकाशा पश्चिमा मधुसूदन । उत्तरा शड्खवर्णाभा दिशां वर्णा उदाह्वता:,“श्रीकृष्ण! पूर्व दिशा लाल, दक्षिण दिशा शस्त्रोंके समान रंगवाली (काली), पश्चिम दिशा मिट्टीके कच्चे बर्तनोंकी भाँति मटमैली तथा उत्तर दिशा शंखके समान श्वेत दिखायी देती है। इस प्रकार ये दिशाओंके पृथक्-पृथक् वर्ण बताये गये हैं
সঞ্জয় বললেন— হে মধুসূদন! পূর্ব দিক রক্তিম দেখায়; দক্ষিণ দিক অস্ত্রের মতো কঠোর শ্যামবর্ণ; পশ্চিম দিক কাঁচা মাটির পাত্রের মতো মলিন; আর উত্তর দিক শঙ্খের মতো শুভ্র দীপ্ত—এইভাবে দিকগুলির পৃথক পৃথক বর্ণ বর্ণিত হল।
Verse 29
प्रदीप्ताश्न॒ दिश: सर्वा धार्तराष्ट्रस्य माधव । महद् भयं वेदयन्ति तस्मिन्नुत्पातदर्शने,“माधव! दुर्योधनको इन उत्पातोंका दर्शन तो होता ही है। उसके लिये सारी दिशाएँ भी प्रज्वलित-सी होकर महान् भयकी सूचना दे रही हैं
সঞ্জয় বললেন— হে মাধব! ধার্তরাষ্ট্র-পুত্রের জন্য সব দিক যেন জ্বলন্ত; সেই অশুভ উৎপাতে তারা মহাভয়ের সংবাদ দিচ্ছে।
Verse 30
सहस्रपादं प्रासादं स्वप्रान्ते सम युधिष्ठिर: । अधिरोहन् मया दृष्ट: सह भ्रातृभिरच्युत,“अच्युत! मैंने स्वप्रके अन्तिम भागमें युधिष्ठिरकों एक हजार खंभोंवाले महलपर भाइयोंसहित चढ़ते देखा है
সঞ্জয় বললেন— হে অচ্যুত! স্বপ্নের শেষ ভাগে আমি যুধিষ্ঠিরকে তাঁর ভাইদের সঙ্গে, নিজের সীমান্তের প্রান্তে অবস্থিত সহস্র স্তম্ভবিশিষ্ট প্রাসাদে আরোহণ করতে দেখেছি।
Verse 31
श्वेतोष्णीषाश्व दृश्यन्ते सर्वे वै शुक्लवासस: । आसनानि च शुभ्राणि सर्वेषामुपलक्षये,“उन सबके सिरपर सफेद पगड़ी और अंगोंमें श्वेत वस्त्र शोभित दिखायी दिये हैं। मैंने उन सबके आसनोंको भी श्वेत वर्णका ही देखा है
সঞ্জয় বললেন—তাঁরা সকলেই শ্বেত পাগড়ি ও শ্বেত বস্ত্র পরিধান করে দেখা দিচ্ছেন। আমি লক্ষ্য করছি, তাঁদের সকলের আসনও শুভ্র শ্বেত।
Verse 32
तव चापि मया कृष्ण स्वप्रान्ते रुधिराविला । अन्त्रेण पृथिवी दृष्टा परिक्षिप्ता जनार्दन,“'जनार्दन! श्रीकृष्ण! मैंने स्वप्रके अन्तमें आपकी इस पृथ्वीको भी रक्तसे मलिन और आँतसे लिपटी हुई देखा है
সঞ্জয় বললেন—হে কৃষ্ণ, হে জনার্দন! স্বপ্নের শেষে আমি এই পৃথিবীকেও রক্তে কলুষিত এবং অন্ত্রে জড়ানো অবস্থায় দেখেছি।
Verse 33
अस्थिसंचयमारूढश्चामितौजा युधिष्ठिर: । सुवर्णपात्र्यां संहृष्टो भुक्ततवान् घृतपायसम्,“मैंने स्वप्रमें देखा, अमिततेजस्वी युधिष्ठिर सफेद हड्डियोंके ढेरपर बैठे हुए हैं और सोनेके पात्रमें रखी हुई घृतमिश्रित खीरको बड़ी प्रसन्नताके साथ खा रहे हैं
সঞ্জয় বললেন—স্বপ্নে আমি দেখেছি, অপরিমেয় তেজস্বী যুধিষ্ঠির অস্থির স্তূপের উপর বসে সোনার পাত্রে রাখা ঘৃতমিশ্রিত পায়স আনন্দের সঙ্গে ভক্ষণ করছেন।
Verse 34
युधिष्ठिरो मया दृष्टो ग्रसमानो वसुन्धराम् | त्वया दत्तामिमां व्यक्त भोक्ष्यते स वसुन्धराम्,“मैंने यह भी देखा कि युधिष्ठिर इस पृथ्वीको अपना ग्रास बनाये जा रहे हैं; अतः यह निश्चित है कि आपकी दी हुई वसुन्धराका वे ही उपभोग करेंगे
সঞ্জয় বললেন—আমি যুধিষ্ঠিরকে যেন এই পৃথিবীকে গ্রাস করছেন এমন দেখেছি; অতএব স্পষ্ট যে, তোমার দান করা এই বসুন্ধরার ভোগ ও শাসন তিনিই করবেন।
Verse 35
उच्च॑ पर्वतमारूढो भीमकर्मा वृकोदर: । गदापाणिर्नरिव्याप्रो ग्रसन्निव महीमिमाम्,“भयंकर कर्म करनेवाले नरश्रेष्ठ भीमसेन भी हाथमें गदा लिये ऊँचे पर्वतपर आरूढ़ हो इस पृथ्वीको ग्रसते हुए-से स्वप्नमें दिखायी दिये हैं
সঞ্জয় বললেন—স্বপ্নে আমি ভীমসেনকে দেখেছি—ভয়ংকর কর্মে প্রবল বৃকোদর, হাতে গদা নিয়ে, উচ্চ পর্বতে আরোহণ করে, যেন এই পৃথিবীকে গ্রাস করতে উদ্যত।
Verse 36
क्षपयिष्यति न: सर्वान् स सुव्यक्त महारणे । विदितं मे हृषीकेश यतो धर्मस्ततो जय:,अतः यह स्पष्टरूपसे जान पड़ता है कि वे इस महायुद्धमें हम सब लोगोंका संहार कर डालेंगे। हृषीकेश! मुझे यह भी विदित है कि जहाँ धर्म है उसी पक्षकी विजय होती है
সঞ্জয় বললেন—সেই মহাযুদ্ধে সে স্পষ্টই আমাদের সকলকে বিনাশ করবে। হে হৃষীকেশ! আমার এও জানা—যেখানে ধর্ম, সেখানেই জয়।
Verse 37
पाण्डुरं गजमारूढो गाण्डीवी स धनंजय: । त्वया सार्थ हृषीकेश श्रिया परमया ज्वलन्,“श्रीकृष्ण! इसी प्रकार गाण्डीवधारी धनंजय भी आपके साथ श्वेत गजराजपर आरूढ़ हो अपनी परम कान्तिसे प्रकाशित होते हुए मुझे स्वप्रमें दृष्टिगोचर हुए हैं
সঞ্জয় বললেন—হে হৃষীকেশ! আমি ধনঞ্জয়কে (অর্জুনকে), গাণ্ডীবধারীকে, শ্বেত গজরাজে আরূঢ়, আপনার সঙ্গে—পরম শ্রীতে দীপ্তিমান—দেখেছি।
Verse 38
यूयं सर्वे वधिष्यध्वं तत्र मे नास्ति संशय: । पार्थिवान् समरे कृष्ण दुर्योधनपुरोगमान्,“अत: श्रीकृष्ण! आप सब लोग इस युद्धमें दुर्योधन आदि समस्त राजाओंका वध कर डालेंगे, इसमें मुझे संशय नहीं है
সঞ্জয় বললেন—হে কৃষ্ণ! তোমরা সকলেই নিশ্চয়ই তাদের বধ করবে; এতে আমার কোনো সংশয় নেই। সমরে দুর্যোধনের অগ্রে চলা সেই রাজাদের তোমরা নিধন করবে।
Verse 39
नकुलः सहदेवश्व सात्यकिश्न महारथ: । शुक्लकेयूरकण्ठत्रा: शुक्लमाल्याम्बरावृता:,“नकुल, सहदेव तथा महारथी सात्यकि--ये तीन नरश्रेष्ठ मुझे स्वप्नमें श्वेत भुजबन्द, श्वेत कण्ठहार, श्वेत वस्त्र और श्वेत मालाओंसे विभूषित हो उत्तम नरयान (पालकी)-पर चढ़े दिखायी दिये हैं। ये तीनों ही श्वेत छत्र और श्वेत वस्त्रोंसे सुशोभित थे
সঞ্জয় বললেন—নকুল, সহদেব এবং মহারথী সাত্যকি—এই তিনজন—শ্বেত বাহুবন্ধ ও শ্বেত কণ্ঠালংকারে ভূষিত, শ্বেত বস্ত্র ও শ্বেত মালায় আচ্ছাদিত—আমার (স্বপ্নে) দৃষ্টিগোচর হলেন।
Verse 40
अधिरूढा नरव्याप्रा नरवाहनमुत्तमम् | त्रय एते मया दृष्टा: पाण्डुरच्छत्रवासस:,“नकुल, सहदेव तथा महारथी सात्यकि--ये तीन नरश्रेष्ठ मुझे स्वप्नमें श्वेत भुजबन्द, श्वेत कण्ठहार, श्वेत वस्त्र और श्वेत मालाओंसे विभूषित हो उत्तम नरयान (पालकी)-पर चढ़े दिखायी दिये हैं। ये तीनों ही श्वेत छत्र और श्वेत वस्त्रोंसे सुशोभित थे
সঞ্জয় বললেন—এই তিনজন পরাক্রান্ত পুরুষ উত্তম নরবাহনে আরূঢ় ছিলেন; শ্বেত ছত্রে ছায়িত এবং ধবল বস্ত্রধারী—আমার (স্বপ্নে) দৃষ্টিগোচর হলেন।
Verse 41
श्वेतोष्णीषाश्न दृश्यन्ते त्रय एते जनार्दन | धार्तरष्टेषु सैन्येषु तान् विजानीहि केशव,“'जनार्दन! दुर्योधनकी सेनाओंमेंसे मुझे तीन ही व्यक्ति स्वप्नमें श्वेत पगड़ीसे सुशोभित दिखायी दिये हैं। केशव! आप उनके नाम मुझसे जान लें। वे हैं--अश्वत्थामा, कृपाचार्य और यादव कृतवर्मा। माधव! अन्य सब नरेश मुझे लाल पगड़ी धारण किये दिखायी दिये हैं
সঞ্জয় বললেন— জনার্দন! স্বপ্নে আমি ধৃতরাষ্ট্রের সেনাদলে কেবল তিনজনকে শ্বেত পাগড়িতে ভূষিত দেখেছি। কেশব! অনুগ্রহ করে তাঁদের নাম আমাকে জানিয়ে দিন।
Verse 42
अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वत: । रक्तोष्णीषाश्न दृश्यन्ते सर्वे माधव पार्थिवा:,“'जनार्दन! दुर्योधनकी सेनाओंमेंसे मुझे तीन ही व्यक्ति स्वप्नमें श्वेत पगड़ीसे सुशोभित दिखायी दिये हैं। केशव! आप उनके नाम मुझसे जान लें। वे हैं--अश्वत्थामा, कृपाचार्य और यादव कृतवर्मा। माधव! अन्य सब नरेश मुझे लाल पगड़ी धारण किये दिखायी दिये हैं
সঞ্জয় বললেন— অশ্বত্থামা, কৃপাচার্য এবং সাত্বত কৃতবর্মা—এই তিনজনকে আমি শ্বেত পাগড়িতে দেখি; কিন্তু মাধব! অন্য সব রাজাকে আমি রক্তবর্ণ পাগড়ি পরিহিতই দেখি।
Verse 43
उष्ट्प्रयुक्तमारूढौ भीष्मद्रोणी महारथौ | मया सार्ध महाबाहो धार्तराष्ट्रेण वा विभो,“महाबाहु जनार्दन! मैंने स्वप्नमें देखा, भीष्म और द्रोणाचार्य दोनों महारथी मेरे तथा दुर्योधनके साथ ऊँट जुते हुए रथपर आरूढ़ हो दक्षिण दिशाकी ओर जा रहे थे। विभो! इसका फल यह होगा कि हमलोग थोड़े ही दिनोंमें यमलोक पहुँच जायँगे
সঞ্জয় বললেন— মহাবাহু জনার্দন! স্বপ্নে আমি দেখেছি, মহারথী ভীষ্ম ও দ্রোণ উট-যোজিত রথে আরূঢ় হয়ে আমার সঙ্গে—অথবা ধৃতরাষ্ট্রপুত্রের সঙ্গে—দক্ষিণ দিকে গমন করছেন।
Verse 44
अगस्त्यशास्तां च दिशं प्रयाता: सम जनार्दन । अचिरेणैव कालेन प्राप्स्यामो यमसादनम्,“महाबाहु जनार्दन! मैंने स्वप्नमें देखा, भीष्म और द्रोणाचार्य दोनों महारथी मेरे तथा दुर्योधनके साथ ऊँट जुते हुए रथपर आरूढ़ हो दक्षिण दिशाकी ओर जा रहे थे। विभो! इसका फल यह होगा कि हमलोग थोड़े ही दिनोंमें यमलोक पहुँच जायँगे
সঞ্জয় বললেন— জনার্দন! আমরা অগস্ত্য-শাসিত দক্ষিণ দিশার দিকে অগ্রসর হচ্ছি। অতি অল্প সময়ের মধ্যেই আমরা যমের সদন (যমলোক) লাভ করব।
Verse 45
अहं चान्ये च राजानो यच्च तत् क्षत्रमण्डलम् | गाण्डीवान्निं प्रवेक्ष्याम इति मे नास्ति संशय:,“'मैं' अन्यान्य नरेश तथा वह सारा क्षत्रियसममाज सब-के-सब गाण्डीवकी अम्निमें प्रवेश कर जायँगे, इसमें संशय नहीं है
সঞ্জয় বললেন— আমি এবং অন্যান্য রাজারা—সমগ্র ক্ষত্রমণ্ডল—গাণ্ডীবের অগ্নিতে প্রবেশ করব; এতে আমার কোনো সংশয় নেই।
Verse 46
श्रीकृष्ण उवाच उपस्थितविनाशेयं नूनमद्य वसुन्धरा । यथा हि मे वच: कर्ण नोपैति हृदयं तव,श्रीकृष्ण बोले--कर्ण! निश्चय ही अब इस पृथ्वीका विनाशकाल उपस्थित हो गया है; इसीलिये मेरी बात तुम्हारे हृदयतक नहीं पहुँचती है
শ্রীকৃষ্ণ বললেন—কর্ণ! নিশ্চয়ই আজ এই পৃথিবীর উপর বিনাশের ক্ষণ উপস্থিত হয়েছে; তাই তোমার মঙ্গলের জন্য বলা আমার বাক্যও তোমার হৃদয়ে প্রবেশ করছে না।
Verse 47
सर्वेषां तात भूतानां विनाशे प्रत्युपस्थिते । अनयो नयसंकाशो हृदयान्नापसर्पति,तात! जब समस्त प्राणियोंका विनाश निकट आ जाता है, तब अन्याय भी न्यायके समान प्रतीत होकर हृदयसे निकल नहीं पाता है
হে প্রিয়! যখন সকল প্রাণীর বিনাশ নিকটে এসে দাঁড়ায়, তখন অন্যায়ও ন্যায়ের মতোই মনে হয় এবং হৃদয় থেকে সরে যায় না।
Verse 48
कर्ण उवाच अपि त्वां कृष्ण पश्याम जीवन्तो5स्मान्महारणात् | समुत्तीर्णा महाबाहो वीरक्षत्रविनाशनात्,कर्ण बोला--महाबाह श्रीकृष्ण! वीर क्षत्रियोंका विनाश करनेवाले इस महायुद्धसे पार होकर यदि हम जीवित बच गये तो पुनः: आपका दर्शन करेंगे
কর্ণ বলল—হে মহাবাহু শ্রীকৃষ্ণ! বীর ক্ষত্রিয়দের বিনাশ ঘটানো এই মহাযুদ্ধ পার হয়ে যদি আমরা জীবিত থাকি, তবে আবার আপনার দর্শন লাভ করব।
Verse 49
अथवा सड्म: कृष्ण स्वर्गे नो भविता ध्रुवम् तत्रेदानीं समेष्याम: पुनः सार्थ त्वयानघ,अथवा श्रीकृष्ण! अब हमलोग स्वर्गमें ही मिलेंगे, यह निश्चित है। अनघ! वहाँ आजकी ही भाँति पुन: आपसे हमारी भेंट होगी
অথবা, হে শ্রীকৃষ্ণ! আমাদের মিলনস্থল নিশ্চিতই স্বর্গে হবে। হে অনঘ! সেখানে আজকের মতোই আবার আপনার সঙ্গে আমাদের সাক্ষাৎ হবে।
Verse 50
संजय उवाच इत्युक्त्वा माधवं कर्ण: परिष्वज्य च पीडितम् । विसर्जितः केशवेन रथोपस्थादवातरत्,संजय कहते हैं--ऐसा कहकर कर्ण भगवान् श्रीकृष्णका प्रगाढ़ आलिंगन करके उनसे विदा ले रथके पिछले भागसे उतर गया
সঞ্জয় বললেন—এ কথা বলে অন্তর্যন্ত্রণায় পীড়িত কর্ণ মাধব শ্রীকৃষ্ণকে দৃঢ়ভাবে আলিঙ্গন করল। তারপর কেশবের কাছ থেকে বিদায় নিয়ে সে রথের পশ্চাৎভাগ দিয়ে নেমে গেল।
Verse 51
ततः स्वरथमास्थाय जाम्बूनदविभूषितम् । सहास्माभिननिववृते राधेयो दीनमानस:,तदनन्तर अपने सुवर्णभूषित रथपर आरूढ़ हो राधानन्दन कर्ण दीनचित्त होकर हमलोगोंके साथ लौट आया
তারপর জাম্বূনদ-সোনায় বিভূষিত নিজের রথে আরোহন করে রাধেয় কর্ণ দীনচিত্তে আমাদের সঙ্গে ফিরে এলেন।
Verse 52
ततः शीघ्रतरं प्रायात् केशव: सहसात्यकि: । पुनरुच्चारयन् वाणीं याहि याहीति सारथिम्,तदनन्तर सात्यकिसहित श्रीकृष्ण सारथिसे बार-बार “चलो-चलो' ऐसा कहते हुए अत्यन्त तीव्र गतिसे उपप्लव्य नगरकी ओर चल दिये
তারপর সাত্যকিসহ কেশব আরও দ্রুতগতিতে রওনা হলেন। তিনি বারবার উচ্চস্বরে সারথিকে বললেন—“চলো, চলো!”—এবং এভাবে উপপ্লব্য নগরের দিকে অতি দ্রুত অগ্রসর হলেন।
Verse 143
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कर्णोपनिवादे कृष्णकर्णसंवादे त्रिचत्वारिंशदधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें कर्णके द्वारा अपने अभिप्राय निवेदनके प्रसंगर्में भगवद््वाक्यविषयक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত ভগবদ্যানপর্বে, কর্ণের অভিপ্রায়-নিবেদনের প্রসঙ্গে, কৃষ্ণ-কৰ্ণ-সংবাদে একশ তেতাল্লিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Kuntī confronts whether any political gain can justify outcomes that entail broad kin-destruction, and whether personal responsibility and maternal disclosure can be used to avert collective harm when public diplomacy has failed.
The chapter emphasizes the ethical necessity of heeding counsel, restraining pride-driven decision-making, and prioritizing social cohesion; it also frames ritual discipline and respectful dialogue as prerequisites for serious moral negotiation.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter functions as causal and ethical positioning—showing how counsel, memory, and identity shape later decisions within the epic’s broader dharma inquiry.