
Adhyāya 108: Paścima-dik—Varuṇa’s Realm, Sunset Cosmology, and Sacred-Geographic Markers (Suparṇa–Gālava संवाद)
Upa-parva: Tīrtha–Digvarṇana (Paścima-dik) — Suparṇa’s Directional Discourse to Gālava
Suparṇa describes the western direction as a theologically governed space associated with Varuṇa, guardian of waters, presenting it as a ‘digdvāra’ (directional portal). The account ties observable phenomena—sunset, twilight (sandhyā), the emergence of night and sleep—to mythic causation and divine administration. It notes Varuṇa’s consecration by Kaśyapa, references Soma’s emergence after imbibing Varuṇa’s ‘rasas,’ and situates episodes involving Daityas, Vāyu, and Nāgas in the west. Mythic events are layered onto geography: Indra’s act affecting Diti and the origin of the Marut hosts; the immeasurable rootward extent of Himavat toward Mandara; Surabhī’s milk at the ocean’s shore; and oceanic marvels including Svarbhānu’s ‘kabandha’ threatening Soma and Sūrya. Auditory signs of an unseen, immeasurable presence are mentioned, along with Dhvajavatī stationed in the sky by the Sun’s command. The chapter concludes with a cosmological claim about the Sun’s laterally turning course, the periodic ingress of luminaries into the solar orb, and the west as a locus for Varuṇa-supported waters across the three worlds, including Ananta’s abode and Viṣṇu’s supreme station, before Suparṇa asks Gālava to decide their onward course.
Chapter Arc: गरुड़ गालव से कहते हैं कि यह ‘दक्षिण’ दिशा यूँ ही नहीं कहलाती—पूर्वकाल में विवस्वान् (सूर्य) ने वेदोक्त विधि से यज्ञ कर आचार्य कश्यप को दक्षिणा-रूप में इस दिशा का दान किया था। → दक्षिण दिशा का रहस्य गहराता जाता है: यहाँ पितरों के साथ विश्वेदेवों का निवास, मृत्यु के बाद सभी प्राणियों का इसी दिशा की ओर प्रवाह, और ऐसे प्रसंग जिनसे देव-दानव वैर, नागलोक की सुरक्षा, तथा पुण्य-पाप के परिणामों का भूगोल जुड़ता है। → मृत्योत्तर-मार्ग का भयावह सत्य उद्घाटित होता है—इस दिशा में जाने वाले प्राणी को घोर अन्धकार का सामना करना पड़ता है, ऐसा तम जो भास्कर (सूर्य) के लिए भी अभेद्य-सा कहा गया है; अज्ञान से घिरी यह दिशा ‘सुख-गम्य’ नहीं रहती। → गरुड़ दक्षिण दिशा को केवल भय का प्रदेश नहीं रहने देते—वे वहाँ के देव-पितृ-लोक, नागपुरी भोगवती, और सिद्ध-ब्राह्मणों/तपस्वियों (जैसे ‘शिव’ नाम से प्रसिद्ध सिद्ध) के मोक्ष-प्राप्ति प्रसंगों से बताते हैं कि यह दिशा कर्मफल, तप, और ज्ञान—तीनों का संगम-स्थल है। → गालव के सामने प्रश्न शेष रह जाता है: यदि दक्षिण दिशा मृत्यु का मार्ग है और तमस से ढकी है, तो कौन-सा ज्ञान/धर्म-आचरण उस अन्धकार को पार कर मोक्ष का द्वार खोलता है?
Verse 1
ऑपनआ कराता बछ। अर: 2 नवाधिकशततमो<्ध्याय: दक्षिणदिशाका वर्णन युपर्ण उवाच इयं विवस्वता पूर्व श्रेतेन विधिना किल । गुरवे दक्षिणा दत्ता दक्षिणेत्युच्यते च दिक्
যুপর্ণ বললেন—প্রাচীন কালে বিবস্বান (সূর্য) প্রতিষ্ঠিত বিধি অনুসারে গুরুকে দক্ষিণা-রূপে এই দিক দান করেছিলেন; তাই একে ‘দক্ষিণ’ দিক বলা হয়, কারণ এটি ছিল ‘দক্ষিণা’।
Verse 2
गरुड़ कहते हैं--गालव! यह प्रसिद्ध है कि पूर्वकालमें भगवान् सूर्यने वेदोक्त विधिके अनुसार यज्ञ करके आचार्य कश्यपको दक्षिणारूपसे इस दिशाका दान किया था, इसीलिये इसे दक्षिण दिशा कहते हैं ।। अत्र लोकत्रयस्यास्य पितृपक्ष: प्रतिष्ठित: । अत्रोष्मपाणां देवानां निवास: श्रूयते द्विज,ब्रह्म! तीनों लोकोंके पितृगण इसी दिशामें प्रतिष्ठित हैं तथा “ऊष्मप” नामक देवताओंका निवास भी इसी दिशामें सुना जाता है
গরুড় বললেন—গালব! প্রসিদ্ধ যে প্রাচীন কালে ভগবান সূর্য বেদোক্ত বিধিতে যজ্ঞ সম্পন্ন করে আচার্য কশ্যপকে দক্ষিণা-রূপে এই দিক দান করেছিলেন; তাই একে ‘দক্ষিণ’ দিক বলা হয়। এই দিকেই ত্রিলোকের পিতৃগণ প্রতিষ্ঠিত, এবং হে দ্বিজ! শ্রুতি-পরম্পরা মতে ‘উষ্মপ’ নামে দেবগণের নিবাসও এখানে।
Verse 3
अत्र विश्वे सदा देवा: पितृभि: सार्थमासते । इज्यमाना: सम लोकेषु सम्प्राप्तास्तुल्यभागताम्,पितरोंके साथ विश्वेदेवगण सदा दक्षिण दिशामें ही वास करते हैं। वे समस्त लोकोंमें पूजित हो श्राद्धमें पितरोंके समान ही भाग प्राप्त करते हैं
এখানে বিশ্বেদেবগণ সর্বদা পিতৃদের সঙ্গে বাস করেন। সর্বলোকেই পূজিত হয়ে তাঁরা সমান ভাগ লাভ করেন—শ্রাদ্ধে পিতৃদের ন্যায়ই তাঁদের অংশ নির্ধারিত।
Verse 4
एतद द्वितीयं देवस्य द्वारमाचक्षते द्विज । त्रुटिशो लवशश्लापि गण्यते कालनिश्चय:,विप्रवर! विद्वान् पुरुष इस दक्षिण दिशाको धर्म-देवताका दूसरा द्वार कहते हैं। यहीं (चित्रगुप्त आदिके द्वारा) 'त्रुटि' और “लव” आदि सूक्ष्म-से-सूक्ष्म कालांशों-पर दृष्टि रखते हुए प्राणियोंकी आयुकी निश्चित गणना की जाती है
হে দ্বিজ! জ্ঞানীরা এই দিককে দেবতার দ্বিতীয় দ্বার বলেন। এখানে ত্রুটি ও লব প্রভৃতি অতি সূক্ষ্ম কালমান পর্যন্ত গণনা করে সময়ের নিশ্চিত নির্ণয় করা হয়।
Verse 5
अत्र देवर्षयो नित्यं पितृलोकर्षयस्तथा । तथा राजर्षय: सर्वे निवसन्ति गतव्यथा:,देवर्षि, पितृलोकके ऋषि तथा समस्त राजर्षिगण दुःखरहित हो सदा इसी दिशामें निवास करते हैं
এখানে দেবর্ষি, পিতৃলোকের ঋষি এবং সকল রাজর্ষি নিত্য বাস করেন—তাঁরা সকলেই ব্যথা ও দুঃখমুক্ত।
Verse 6
अत्र धर्मश्न सत्यं च कर्म चात्र निगद्यते | गतिरेषा द्विजश्रेष्ठ कर्मणामवसायिनाम्,द्विजश्रेष्ठ! इसी दिशामें (रहकर चित्रगुप्त आदिके द्वारा धर्मराजके निकट प्राणियोंके) धर्म, सत्य तथा साधारण कर्मोंके विषयमें कहा जाता है। मृत प्राणी तथा उनके कर्म इसी दिशाका आश्रय लेते हैं
হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! এখানে ধর্ম, সত্য এবং কর্মের হিসাব উচ্চারিত ও নিরূপিত হয়। কর্মসমাপ্তিতে দেহধারীদের এটাই নির্ধারিত গতি; মৃত প্রাণী ও তাদের কর্ম এই দিকেই আশ্রয় নিয়ে ধর্মরাজের নিকট নিবেদিত হয়।
Verse 7
एषा दिक् सा द्विजश्रेष्ठ यां सर्व: प्रतिपद्यते । वृता त्वनवबोधेन सुखं तेन न गम्यते,विप्रवर! यह वह दिशा है, जिसमें मृत्युके पश्चात् सभी प्राणियोंको जाना पड़ता है। यह सदा अज्ञानान्धकारसे आवृत रहती है, इसलिये इसमें सुखपूर्वक यात्रा सम्भव नहीं हो पाती है
হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! এটাই সেই দিক, মৃত্যুর পরে যেদিকে সকল প্রাণীকেই যেতে হয়। কিন্তু তা অজ্ঞতার আবরণে আচ্ছন্ন; তাই এই পথে সুখে গমন সম্ভব নয়।
Verse 8
नै#तानां सहस््राणि बहुन्यत्र द्विजर्षभ । सृष्टानि प्रतिकूलानि द्रष्टव्यान्यकृतात्मभि:,द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्माजीने इस दिशामें प्रतिकूल स्वभाव एवं आचरणवाले सहसों राक्षसोंकी सृष्टि की है, जिनका दर्शन अशुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुषोंको ही होता है
হে দ্বিজর্ষভ! এখানে প্রতিকূল স্বভাব ও বিপরীত আচরণসম্পন্ন অগণিত সহস্র সহস্র সত্তা সৃষ্টি হয়েছে। তাদের দর্শন কেবল অশুদ্ধ অন্তঃকরণ ও অসংযত আত্মার লোকেরই হয়।
Verse 9
अत्र मन्दरकुग्जेषु विप्रर्षिसदनेषु च । गायन्ति गाथा गन्धर्वक्षित्तबुद्धिहरा द्विज,ब्रह्म! इसी दिशामें गन्धर्वगण मन्दराचलके कुंजों और ब्रह्मर्षियोंके आश्रमोंमें मन और बुद्धिको आकर्षित करनेवाली गाथाओंका गान करते हैं
হে দ্বিজ! এই দিকেই মন্দর পর্বতের কুঞ্জে এবং ব্রহ্মর্ষিদের আশ্রমে গন্ধর্বগণ এমন গাথা গায়, যা মন ও বুদ্ধিকে মোহিত করে হরণ করে নেয়।
Verse 10
अत्र सामानि गाथाभि: श्र॒ुत्वा गीतानि रैवत: । गतदारो गतामात्यो गतराज्यो वनं गत:,पूर्वकालमें यहीं राजा रैवत गाथाओंके रूपमें सामगान सुनते-सुनते अपनी स्त्री, मन्त्री तथा राज्यसे भी वियुक्त हो वनमें चले गये थे”
প্রাচীনকালে এখানেই রাজা রৈবত গাথারূপে গীত সামগান শুনতে শুনতে বৈরাগ্য লাভ করেন; স্ত্রী, মন্ত্রী ও রাজ্য ত্যাগ করে তিনি বনে গমন করেন।
Verse 11
अत्र सावर्णिना चैव यवक्रीतात्मजेन च । मर्यादा स्थापिता ब्रह्मन् यां सूर्यो नातिवर्तते
হে ব্রাহ্মণ! এখানে সাবর্ণি মনু এবং যবক্রীতের পুত্র ধর্মাচরণের এমন এক অটল মর্যাদা স্থাপন করেছিলেন, যা সূর্যও কখনও অতিক্রম করেন না।
Verse 12
ब्रह्म! इस दिशामें सावर्णि मनु तथा यवक्रीतके पुत्रने सूर्यकी गतिके लिये मर्यादा (सीमा) स्थापित की थी, जिसका सूर्यदेव कभी उल्लंघन नहीं करते हैं ।। अत्र राक्षसराजेन पौलस्त्येन महात्मना । रावणेन तपश्नीर्त्वा सुरेभ्योडमरता वृता,पुलस्त्यवंशी राक्षसराज महामना रावणने इसी दिशामें तपस्या करके देवताओंसे अवध्य होनेका वरदान प्राप्त किया था
যূপর্ণ বললেন—হে ব্রাহ্মণ! এই দিকেই সাবর্ণি মনু এবং যবক্রীতের পুত্র সূর্যের গতির জন্য এমন এক স্থির মর্যাদা স্থাপন করেছিলেন, যা সূর্যদেব কখনও লঙ্ঘন করেন না। এখানেই পুলস্ত্যবংশীয় মহাত্মা রাক্ষসরাজ রাবণ তপস্যা করে দেবতাদের কাছ থেকে অমরত্ব (অথবা অবধ্যতা)-র বর লাভ করেছিল।
Verse 13
अत्र वृत्तेन वृत्रो5पि शक्रशत्र॒ुत्वमीयिवान् | अत्र सर्वासव: प्राप्ता: पुनर्गच्छन्ति पडचधा,इसी दिशामें घटित हुई घटनाके कारण वृत्रासुर देवराज इन्द्रका शत्रु बन बैठा था। दक्षिण दिशामें ही आकर सबके प्राण पुनः (प्राण-अपान आदिके भेदसे) पाँच भागोंमें बँट जाते हैं (अर्थात् प्राणी नूतन देह धारण करते हैं)
এখানে যা ঘটেছিল তার ফলে বৃত্রও শক্র (ইন্দ্র)-এর শত্রু হয়ে উঠেছিল। আর এখানেই এসে সকল প্রাণশক্তি আবার পাঁচ ভাগে বিভক্ত হয়ে অগ্রসর হয়।
Verse 14
अत्र दुष्कृतकर्माणो नरा: पच्यन्ति गालव । अत्र वैतरणी नाम नदी वितरणैर्वृता,गालव! इसी दिशामें पापाचारी मनुष्य नरकोंकी आगमें पकाये जाते हैं। दक्षिणमें ही वह वैतरणी नदी है, जो वैतरणी नरकके अधिकारी पापियोंसे घिरी रहती है
হে গালব! এখানে দুষ্কর্মকারী মানুষ যন্ত্রণায় দগ্ধ হয়। আর এখানেই বৈতরণী নামে নদী আছে, যা বৈতরণী-নরকের যোগ্য পাপীদের দ্বারা পরিবেষ্টিত।
Verse 15
अत्र गत्वा सुखस्यान्तं दुःखस्यान्तं प्रपद्यते अन्रावृत्तो दिनकर: सुरसं क्षरते पय:
এখানে গিয়ে মানুষ সুখেরও শেষ এবং দুঃখেরও শেষ প্রাপ্ত হয়। সেখানে দিনকর (সূর্য) অবাধ গতিতে চলতে চলতে মধুর রসযুক্ত দুধধারা প্রবাহিত করেন।
Verse 16
अत्राहं गालव पुरा क्षुधार्त: परिचिन्तयन्
হে গালব! এখানে আমি বহু আগে ক্ষুধায় কাতর হয়ে গভীর চিন্তায় দাঁড়িয়েছিলাম—দুর্দশার মধ্যে কোন পথটি ধর্মসম্মত ও কার্যকর, তাই ভাবছিলাম।
Verse 17
अत्र चक्रधनुर्नाम सूर्याज्जातो महानृषि:
এখানেই সূর্যজাত ‘চক্রধনু’ নামে এক মহর্ষিও ছিলেন।
Verse 18
अत्र सिद्धा: शिवा नाम ब्राह्मणा वेदपारगा:
এখানে ‘শিবা’ নামে খ্যাত সিদ্ধ ব্রাহ্মণেরা আছেন, যাঁরা বেদের পারদর্শী।
Verse 19
अत्र भोगवती नाम पुरी वासुकिपालिता
এখানে ‘ভোগবতী’ নামে এক নগরী আছে, যা বাসুকির দ্বারা রক্ষিত ও পালিত।
Verse 20
तक्षकेण च नागेन तथैवैरावतेन च । दक्षिणमें ही वासुकिद्वारा पालित तथा तक्षक एवं ऐरावत नागद्वारा सुरक्षित भोगवती नामक पुरी है ।। अत्र निर्याणकालेडपि तम: सम्प्राप्पते महत्
যুপর্ণ বলল—“দক্ষিণ দেশে ভোগবতী নামে এক নগরী আছে। বাসুকির দ্বারে তার প্রহরা; তেমনি তক্ষক ও ঐরাবত নাগও তাকে রক্ষা করে। সেখান থেকে বেরোবার সময়ও মহা অন্ধকার এসে ঘিরে ধরে।”
Verse 21
एष तस्यापि ते मार्ग: परिचार्यस्य गालव । ब्रृूहि मे यदि गन्तव्यं प्रतीचीं शूणु चापराम्,गालव! तुम मेरे द्वारा परिचर्या पाने (सेवा ग्रहण करने)-के योग्य हो, अतः तुम्हें यह दक्षिण मार्ग बताया है; यदि इस दिशामें चलना हो तो मुझसे कहो अथवा अब तीसरी पश्चिम दिशाका वर्णन सुनो
গালব! তুমি আমার দ্বারা পরিচর্যা লাভের (সেবা গ্রহণের) যোগ্য; তাই তোমাকে এই দক্ষিণ পথ জানালাম। যদি এই দিকেই যেতে হয় তবে আমাকে বলো; নতুবা এখন তৃতীয়—পশ্চিম দিকের—বিবরণও শোনো।
Verse 109
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते नवाधिकशततमोड<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের ভগবদ্যানপর্বান্তর্গত গালবচরিতে একশো নয়তম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 156
काष्छां चासाद्य वासिष्ठीं हिममुत्सूजते पुनः । मनुष्य इसी दिशामें जाकर सुख और दुःखके अन्तको प्राप्त होता है। इसी दक्षिण दिशामें लौटनेपर (अर्थात् उत्तरायणके अन्तिम भागमें पहुँचकर दक्षिणायनके आरम्भमें आनेपर जब कि वर्षा ऋतु रहती है,) सूर्यदेव सुस्वादु जलकी वर्षा करते हैं। फिर वसिष्ठ मुनिके द्वारा सेवित उत्तर दिशामें पहुँचकर (अर्थात् उत्तरायणके प्रारम्भमें जब कि शिशिर ऋतु रहती है,) वे ओले गिराते हैं
বাসিষ্ঠী দিশায় পৌঁছে সে আবার তুষার নিক্ষেপ করে। মানুষ এই দিকেই গিয়ে সুখ-দুঃখের অন্ত প্রাপ্ত হয়। এই দক্ষিণ দিকেই সূর্য যখন ফিরে আসে—অর্থাৎ উত্তরায়ণের শেষভাগ পেরিয়ে দক্ষিণায়ণের আরম্ভে, বর্ষাকালে—সূর্যদেব সুস্বাদু, মনোরম জলের বৃষ্টি বর্ষণ করেন। তারপর ঋষি বসিষ্ঠের দ্বারা সেবিত উত্তর দিশায় পৌঁছে—অর্থাৎ উত্তরায়ণের শুরুতে, শীতঋতুতে—তিনি শিলাবৃষ্টি ঘটান।
Verse 166
लब्धवान् युध्यमानौ द्वौ बृहन्तौ गजकच्छपौ । गालव! पूर्वकालकी बात है, मैं भूखसे पीड़ित होकर भारी चिन्तामें पड़ गया था, परंतु इसी दिशामें आनेपर दो विशाल प्राणी--हाथी और कछुआ मेरे हाथ लग गये, जो आपसमें लड़ रहे थे
গালব! প্রাচীন কালের কথা—ক্ষুধায় কাতর হয়ে আমি গভীর চিন্তায় পড়েছিলাম; কিন্তু এই দিকেই আসতে দু’টি বিরাট প্রাণী—একটি হাতি ও একটি কচ্ছপ—আমার হাতে এসে পড়ল, তারা পরস্পর যুদ্ধ করছিল।
Verse 176
विदुर्य कपिल देवं येनार्ता: सगरात्मजा: । सूर्यके समान तेजस्वी महर्षि कर्दमसे उत्पन्न हुए “चक्रधनु” नामक महर्षि इसी दिशामें रहते थे, जिन्हें सब लोग “कपिलदेव”के नामसे जानते हैं। उन्होंने ही सगरके पुत्रोंको भस्म कर दिया था
বিদুর! সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান, মহর্ষি কর্দম থেকে উৎপন্ন ‘চক্রধনু’ নামধারী যে মহর্ষি, তিনি এই দিকেই বাস করেন; সকলেই তাঁকে ‘কপিলদেব’ নামে জানে। তিনিই সগরের পুত্রদের ভস্ম করে দিয়েছিলেন।
Verse 186
अधीत्य सकलान् वेदाल्लेभिरे मोक्षमक्षयम् । इसी दिशामें “शिव” नामसे प्रसिद्ध कुछ सिद्ध ब्राह्मण रहते थे, जो वेदोंके पारंगत पण्डित थे। उन्होंने सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करके (तत्त्वज्ञानद्वारा) अक्षय मोक्ष प्राप्त कर लिया
সমস্ত বেদ অধ্যয়ন করে তাঁরা অক্ষয় মোক্ষ লাভ করেছিলেন। সেই দিকেই “শিব” নামে প্রসিদ্ধ কয়েকজন সিদ্ধ ব্রাহ্মণ ঋষি বাস করতেন—বৈদিক বিদ্যায় পারদর্শী। সম্পূর্ণ বেদাধ্যয়ন তত্ত্বজ্ঞানরূপে পরিণত হওয়ায় তাঁরা অবিনশ্বর মোক্ষপদে উপনীত হন।
Verse 206
अभेद्यं भास्करेणापि स्वयं वा कृष्णवर्त्मना । मृत्युके पश्चात् इस दिशामें जानेवाले प्राणीको ऐसे घोर अन्धकारका सामना करना पड़ता है, जो साक्षात् अग्नि एवं सूर्यके लिये भी अभेद्य है
যুপর্ণ বললেন—মৃত্যুর পরে যে প্রাণী এই দিকে যায়, তাকে এমন ভয়ংকর অন্ধকারের মুখোমুখি হতে হয়, যা অগ্নি ও সূর্যের পক্ষেও অভেদ্য। সেখানে আলোর ও পথনির্দেশের সাধারণ উপায় ব্যর্থ হয়ে যায়।
The implied dilemma is epistemic rather than juridical: whether reality should be read primarily through empirical observation (sunset, nightfall) or through mythic-theological causation (deities and consecrations), with the chapter modeling an integrated interpretive method.
Orientation precedes action: one should situate decisions within a coherent map of time (day/night cycles), domain authority (Varuṇa and other devas), and remembered precedent (mythic events), thereby aligning conduct with cosmic order.
No explicit phalaśruti is present in the supplied verses; the chapter’s closing functions as pragmatic meta-commentary by returning from cosmography to agency—Suparṇa asks Gālava to state the plan of travel/action after the western ‘digdvāra’ has been defined.