
गालवस्य विषादः तथा विष्णुप्रयाणम् (Gālava’s Despair and Resolve to Seek Viṣṇu)
Upa-parva: Galavopākhyāna (Episode of Gālava: vow, debt, and recourse to Viṣṇu)
Nārada reports that, after being addressed by the wise Viśvāmitra, Gālava enters an extreme ascetic-like paralysis: he neither sits nor sleeps nor eats, becoming emaciated and consumed by anxiety and grief (1–2). He verbalizes a cascading logic of deprivation—without resources, how can he sustain friendships, accumulate wealth, or obtain the demanded steeds—culminating in the collapse of faith in food, comfort, and even life itself (3–5). He frames indebtedness and unfulfilled obligation as intrinsically joyless, and judges death preferable to living after consuming friends’ resources without the capacity to reciprocate (6–7). He then articulates a moral doctrine: failure to carry out a promised duty burns one with falsehood and destroys the merit of iṣṭa and pūrta; untruth yields no ‘form,’ no continuity, no sovereignty, and no auspicious end; ingratitude is socially untrustworthy and lacks expiation (8–10). He internalizes these charges—calling himself sinful, ungrateful, miserly, and untruthful for not accomplishing his guru’s task—and resolves to relinquish life after a final effort (11–12). The chapter pivots as he notes he has never petitioned the gods, yet is honored among them, and therefore chooses to approach Viṣṇu/Kṛṣṇa, the supreme refuge and imperishable yogin, seeking direct audience (13–15). In response, Garuḍa—his friend—appears, affirms mutual friendship and capability, and offers to carry Gālava swiftly even beyond the earth, indicating practical aid aligned with the renewed ethical purpose (16–19).
Chapter Arc: जनमेजय का प्रश्न उठता है—दुर्योधन जैसा अनर्थकारी, जो स्वजनों के दुःख और शत्रुओं के हर्ष का कारण बनता है, उसे उसके बन्धु, सुहृद या पितामह भी क्यों नहीं रोक पाते? → वैशम्पायन उत्तर के लिए ‘पुरातन इतिहास’ का उदाहरण खोलते हैं: गालव का हठ और दुराग्रह। धर्म स्वयं (सप्तर्षि-वेष में) कौशिक-आश्रम में पहुँचते हैं, जहाँ विश्वामित्र की तपस्या-प्रतिष्ठा और आश्रम-धर्म की कसौटी बनती है। → गालव की सेवा से प्रसन्न विश्वामित्र बार-बार उसे विदा करते हैं, पर गालव का निर्बन्ध बढ़ता जाता है; अंततः विश्वामित्र का संयम टूटता है और वे क्रोध में अत्यन्त कठिन दान/दक्षिणा का आदेश देते हैं—चन्द्रवर्चस, श्यामकर्ण अश्वों की ‘आठ सौ’ संख्या का कठोर आग्रह। → आख्यान यह स्थापित करता है कि हठ से पराजय और संकट जन्म लेते हैं—गालव का आग्रह गुरु को भी क्रोध तक ले जाता है और असम्भव-सा भार उसके सिर पर रख देता है; इसी से दुर्योधन के ‘विमार्ग’ पर अड़े रहने की मनोवृत्ति का कारण-रूपक स्पष्ट होता है। → गालव अब उस असाध्य-सी आज्ञा को कैसे पूरा करेगा—किससे, कहाँ से, और किस मूल्य पर—यह प्रश्न अगले अध्यायों के लिए द्वार खोल देता है।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें मातलिके द्वारा वरका खोजविषयक एक सौ पॉचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १०५ ॥/ ऑपन-माज बक। डे षर्डाधिकभशततमोब् ध्याय: लि की धनको समझाते हुए धर्मराजके द्वारा वि परीक्षा तथा गालवके विश्वामित्रसे गुरुदक्षिणा माँगनेके लिये हठका वर्णन जनमेजय उवाच अनर्थ जातनिर्बन्ध॑ परार्थे लोभमोहितम् । अनार्यकेष्वभिरतं मरणे कृतनिश्चयम्,जनमेजयने कहा--भगवन्! दुर्योधनका अनर्थकारी कार्योंमें ही अधिक आग्रह था। पराये धनके प्रति अधिक लोभ रखनेके कारण वह मोहित हो गया था। दुर्जनोंमें ही उसका अनुराग था। उसने मरनेका ही निश्चय कर लिया था। वह कुट॒म्बीजनोंके लिये दुःख-दायक और भाई-बन्धुओंके शोकको बढ़ानेवाला था। सुहृदोंको क्लेश पहुँचाता और शत्रुओंका हर्ष बढ़ाता था। ऐसे कुमार्गपर चलनेवाले इस दुर्योधनको उसके भाई-बन्धु रोकते क्यों नहीं थे? कोई सुहृद, स्नेही अथवा पितामह भगवान् व्यास उसे सौहार्दवश मना क्यों नहीं करते थे?
জনমেজয় বললেন— “ভগবন্! দুর্যোধন অনর্থজনক কর্মেই একাগ্র হঠে আবদ্ধ ছিল। পরের ধনের লোভে মোহিত হয়ে সে অনার্যদের সঙ্গ ও আচরণে রত ছিল, এবং মৃত্যুর দিকে নিয়ে যায় এমন পথেই সে দৃঢ় সংকল্প করেছিল।”
Verse 2
ज्ञातीनां दुःखकर्तारें बन्धूनां शोकवर्धनम् । सुहृदां क्लेशदातारं द्विषतां हर्षवर्धनम्,जनमेजयने कहा--भगवन्! दुर्योधनका अनर्थकारी कार्योंमें ही अधिक आग्रह था। पराये धनके प्रति अधिक लोभ रखनेके कारण वह मोहित हो गया था। दुर्जनोंमें ही उसका अनुराग था। उसने मरनेका ही निश्चय कर लिया था। वह कुट॒म्बीजनोंके लिये दुःख-दायक और भाई-बन्धुओंके शोकको बढ़ानेवाला था। सुहृदोंको क्लेश पहुँचाता और शत्रुओंका हर्ष बढ़ाता था। ऐसे कुमार्गपर चलनेवाले इस दुर्योधनको उसके भाई-बन्धु रोकते क्यों नहीं थे? कोई सुहृद, स्नेही अथवा पितामह भगवान् व्यास उसे सौहार्दवश मना क्यों नहीं करते थे?
“যে আপনজনকে দুঃখ দেয়, আত্মীয়দের শোক বাড়ায়, সুহৃদদের ক্লেশ দেয় এবং শত্রুদের আনন্দ বৃদ্ধি করে—এমন কুপথগামী দুর্যোধনকে তার ভাই-বন্ধুরা কেন নিবৃত্ত করল না?”
Verse 3
कथं नैनं विमार्गस्थं वारयन्तीह बान्धवा: । सौह्ददाद् वा सुहृत् स्निग्धो भगवान् वा पितामह:,जनमेजयने कहा--भगवन्! दुर्योधनका अनर्थकारी कार्योंमें ही अधिक आग्रह था। पराये धनके प्रति अधिक लोभ रखनेके कारण वह मोहित हो गया था। दुर्जनोंमें ही उसका अनुराग था। उसने मरनेका ही निश्चय कर लिया था। वह कुट॒म्बीजनोंके लिये दुःख-दायक और भाई-बन्धुओंके शोकको बढ़ानेवाला था। सुहृदोंको क्लेश पहुँचाता और शत्रुओंका हर्ष बढ़ाता था। ऐसे कुमार्गपर चलनेवाले इस दुर्योधनको उसके भाई-बन्धु रोकते क्यों नहीं थे? कोई सुहृद, स्नेही अथवा पितामह भगवान् व्यास उसे सौहार्दवश मना क्यों नहीं करते थे?
“এখানে সে যখন বিপথে চলেছিল, তখন তার আত্মীয়স্বজন কেন তাকে নিবৃত্ত করল না? অথবা সৌহার্দ্যবশত কোনো স্নেহশীল সুহৃদ—অথবা স্বয়ং পিতামহ ভগবান ব্যাস—কেন তাকে থামালেন না?”
Verse 4
वैशम्पायन उवाच उक्त भगवता वाक्यमुक्त भीष्मेण यत् क्षमम् उक्त बहुविधं चैव नारदेनापि तच्छूणु,वैशम्पायनजी बोले--राजन्! भगवान् वेदव्यासने भी दुर्योधनसे उसके हितकी बात कही। भीष्मजीने भी जो उचित कर्तव्य था, वह बताया। इसके सिवा नारदजीने भी नाना प्रकारके उपदेश दिये। वह सब तुम सुनो
বৈশম্পায়ন বললেন— “রাজন্! ভগবান ব্যাস দুর্যোধনের মঙ্গলের জন্য উপদেশ দিয়েছিলেন; ভীষ্মও যা যথোচিত ও করণীয়, তা বলেছিলেন। তদুপরি নারদও নানা প্রকারে শিক্ষা দিয়েছিলেন। সে সবই তুমি শোনো।”
Verse 5
नारद उवाच दुर्लभो वै सुहृच्छोता दुर्लभश्न हित: सुहृत् । तिष्ठते हि सुह्ृद् यत्र न बन्धुस्तत्र तिछते,नारदजीने कहा--अकारण हित चाहनेवाले सुहृदकी बातोंको जो मन लगाकर सुने, ऐसा श्रोता दुर्लभ है। हितैषी सुहृद् भी दुर्लभ ही है; क्योंकि महान् संकटमें सुहृद् ही खड़ा हो सकता है, वहाँ भाई-बन्धु नहीं ठहर सकते
নারদ বললেন—নিঃস্বার্থ কল্যাণকামী সুহৃদের কথা মনোযোগ দিয়ে শোনে এমন শ্রোতা দুর্লভ; আর হিতৈষী সুহৃদও দুর্লভ। কারণ মহাসঙ্কট উপস্থিত হলে যেখানে সত্য বন্ধু অটল থাকে, সেখানে কেবল আত্মীয়স্বজন স্থির থাকতে পারে না।
Verse 6
श्रोतव्यमपि पश्यामि सुहृदां कुरुनन्दन । न कर्तव्यश्न निर्बन्धो निर्बन्धो हि सुदारुण:,कुरुनन्दन! मैं देखता हूँ कि तुम्हें अपने सुहृदोंके उपदेशको सुननेकी विशेष आवश्यकता है; अतः तुम्हें किसी एक बातका दुराग्रह नहीं रखना चाहिये। आग्रहका परिणाम बड़ा भयंकर होता है
কুরুনন্দন! আমি দেখছি, তোমার উচিত সুহৃদদের উপদেশ মন দিয়ে শোনা; অতএব কোনো এক বিষয়ে হঠ বা একগুঁয়েমি করা উচিত নয়। একগুঁয়েমির পরিণাম অত্যন্ত ভয়ংকর।
Verse 7
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । यथा निर्बन्धत: प्राप्तो गालवेन पराजय:
এ বিষয়েও তারা এক প্রাচীন ইতিহাসের দৃষ্টান্ত দেন—কীভাবে একগুঁয়ে অনুরোধ ও হঠের ফলে গালব পরাজিত হয়েছিল।
Verse 8
इस विषयमें विज्ञ पुरुष इस पुरातन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जिससे ज्ञात होता है कि महर्षि गालवने हठ या दुराग्रहके कारण पराजय प्राप्त की थी ।। विश्वामित्रं तपस्यन्तं धर्मो जिज्ञासया पुरा । अभ्यगच्छत् स्वयं भूत्वा वसिष्ठो भगवानृषि:,पहलेकी बात है, साक्षात् धर्मराज महर्षि भगवान् वसिष्ठका रूप धारण करके तपस्यामें लगे हुए विश्वामित्रके पास उनकी परीक्षा लेनेके लिये आये
এ বিষয়ে জ্ঞানীরা এই প্রাচীন ইতিহাসের দৃষ্টান্ত দেন, যাতে বোঝা যায় যে মহর্ষি গালব হঠ ও একগুঁয়েমির কারণে পরাজয় লাভ করেছিলেন। একদা বিশ্বামিত্র তপস্যায় রত ছিলেন; তাঁকে পরীক্ষা ও বুঝতে ধর্মরাজ স্বয়ং ভগবান ঋষি বশিষ্ঠের রূপ ধারণ করে তাঁর কাছে উপস্থিত হলেন।
Verse 9
सप्तर्षीणामन्यतमं वेषमास्थाय भारत । बुभुक्षुः क्षुभितो राजन्नाश्रमं कौशिकस्य तु,भारत! धर्म सप्तर्षियोंमेंसे एक (वसिष्ठजी)-का वेष धारण करके भूखसे पीड़ित हो भोजनकी इच्छासे विश्वामित्रके आश्रमपर आये
হে ভারত! ধর্ম সপ্তর্ষিদের একজনের (বশিষ্ঠের) বেশ ধারণ করে, ক্ষুধায় কাতর হয়ে আহারের আকাঙ্ক্ষায়, হে রাজন, কৌশিক (বিশ্বামিত্র)-এর আশ্রমে এলেন।
Verse 10
विश्वामित्रो5थ सम्भ्रान्त: श्रपयामास वै चरुम् परमान्नस्य यत्नेन न च तं प्रत्यपालयत्,विश्वामित्रजीने बड़ी उतावलीके साथ उनके लिये उत्तम भोजन देनेकी इच्छासे यत्नपूर्वक चरुपाक बनाना आरम्भ किया; परंतु ये अतिथिदेवता उनकी प्रतीक्षा न कर सके
তখন ব্যস্ত হয়ে বিশ্বামিত্র পরম উৎকৃষ্ট অন্নের চরু যত্ন করে রাঁধতে লাগলেন; কিন্তু অতিথির যথাসময়ে সেবা-আপ্যায়ন করতে পারলেন না, কারণ অতিথি অপেক্ষা করলেন না।
Verse 11
अन्न तेन तदा भुक्तमन्यैर्दत्तं तपस्विभि: । अथ गह्ान्नमत्युष्णं विश्वामित्रो5प्युपागमत्,उन्होंने जब दूसरे तपस्वी मुनियोंका दिया हुआ अन्न खा लिया, तब विश्वामित्रजी भी अत्यन्त उष्ण भोजन लेकर उनकी सेवामें उपस्थित हुए
তিনি যখন অন্য তপস্বী মুনিদের দেওয়া অন্ন ভোজন করলেন, তখন বিশ্বামিত্রও অতিশয় গরম আহার নিয়ে সেবায় উপস্থিত হলেন।
Verse 12
भुक्त मे तिष्ठ तावत् त्वमित्युक्त्वा भगवान् ययौ । विश्वामित्रस्ततो राजन् स्थित एव महाद्युति:,उस समय भगवान् धर्म यह कहकर कि मैंने भोजन कर लिया, अब तुम रहने दो, वहाँसे चल दिये। राजन्! तब महातेजस्वी विश्वामित्र मुनि वहाँ उसी अवस्थामें खड़े ही रह गये
ভগবান ধর্ম বললেন, ‘আমি ভোজন করেছি; তুমি আপাতত এখানেই থাকো’, বলে সেখান থেকে চলে গেলেন। হে রাজন, তখন মহাতেজস্বী বিশ্বামিত্র সেই অবস্থাতেই দাঁড়িয়ে রইলেন।
Verse 13
भक्तं प्रगृह्म मूर्ध्ना वै बाहुभ्यां संशितव्रत: । स्थित: स्थाणुरिवाभ्याशे निश्चेष्टो मार्ताशन:,कठोर व्रतका पालन करनेवाले विश्वामित्रने दोनों हाथोंसे उस भोजनपात्रको थामकर माथेपर रख लिया और आश्रमके समीप ही ढूँठे पेड़की भाँति वे निश्वेष्ट खड़े रहे। उस अवस्थामें केवल वायु ही उनका आहार था
কঠোর ব্রতধারী বিশ্বামিত্র দুই হাতে ভোজনপাত্র তুলে মাথায় ধারণ করলেন এবং আশ্রমের নিকটে গাছের গুঁড়ির মতো নিশ্চল দাঁড়িয়ে রইলেন; সেই অবস্থায় তাঁর আহার ছিল কেবল বায়ু।
Verse 14
तस्य शुश्रूषणे यत्नमकरोद् गालवो मुनि: । गौरवाद् बहुमानाच्च हार्देन प्रियकाम्यया,उन दिनों उनके प्रति गौरवबुद्धि, विशेष आदर-सम्मानका भाव तथा प्रेम-भक्ति होनेके कारण उनकी प्रसन्नताके लिये गालव मुनि यत्नपूर्वक उनकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे
তাঁর প্রতি গৌরববোধ, বিশেষ সম্মান এবং হৃদয়ের স্নেহ-ভক্তির কারণে, তাঁকে প্রসন্ন করতে গালব মুনি যত্ন করে সেবা-শুশ্রূষায় নিয়োজিত থাকতেন।
Verse 15
अथ वर्षशते पूर्णे धर्म: पुनरुपागमत् । वासिष्ठ॑ वेषमास्थाय कौशिकं भोजनेप्सया,तदनन्तर सौ वर्ष पूर्ण होनेपर पुनः धर्मदेव वसिष्ठ मुनिका वेष धारण करके भोजनकी इच्छासे विश्वामित्र मुनिके पास आये
একশো বছর পূর্ণ হলে ধর্মদেব আবার ফিরে এলেন। বশিষ্ঠ মুনির বেশ ধারণ করে, আহারের আকাঙ্ক্ষায় তিনি কৌশিক (বিশ্বামিত্র)-এর কাছে এলেন।
Verse 16
स दृष्टवा शिरसा भक्तं प्रियमाणं महर्षिणा । तिष्ठता वायुभक्षेण विश्वामित्रेण धीमता,उन्होंने देखा कि परम बुद्धिमान महर्षि विश्वामित्र केवल वायु पीकर रहते हुए सिरपर भोजनपात्र रखे खड़े हैं। यह देखकर धर्मने वह भोजन ले लिया। वह अन्न उसी प्रकार तुरंतकी तैयार की हुई रसोईके समान गरम था। उसे खाकर वे बोले--“ब्रह्मर्ष! मैं आपपर बहुत प्रसन्न हूँ।! ऐसा कहकर मुनिवेषधारी धर्मदेव चले गये
ধর্ম দেখলেন—পরম বুদ্ধিমান মহর্ষি বিশ্বামিত্র কেবল বায়ু আহার করে, ভক্তিভরে মাথায় অন্নপাত্র বহন করে অচলভাবে দাঁড়িয়ে আছেন।
Verse 17
प्रतिगृह्म ततो धर्मस्तथैवोष्णं तथा नवम् | भुक््त्वा प्रीतो5स्मि विप्ररषे तमुक्त्वा स मुनिर्गतः,उन्होंने देखा कि परम बुद्धिमान महर्षि विश्वामित्र केवल वायु पीकर रहते हुए सिरपर भोजनपात्र रखे खड़े हैं। यह देखकर धर्मने वह भोजन ले लिया। वह अन्न उसी प्रकार तुरंतकी तैयार की हुई रसोईके समान गरम था। उसे खाकर वे बोले--“ब्रह्मर्ष! मैं आपपर बहुत प्रसन्न हूँ।! ऐसा कहकर मुनिवेषधारी धर्मदेव चले गये
তখন ধর্ম তা গ্রহণ করলেন; অন্নটি তেমনি উষ্ণ ও নবীন ছিল, যেন সদ্য রান্না হয়েছে। ভোজন করে তিনি বললেন—“হে ব্রহ্মর্ষি, আমি তোমার প্রতি অত্যন্ত প্রসন্ন।” এ কথা বলে মুনিবেশধারী ধর্মদেব প্রস্থান করলেন।
Verse 18
क्षत्रभावादपगतो ब्राह्मणत्वमुपागत: । धर्मस्य वचनात् प्रीतो विश्वामित्रस्तदाभवत्,क्षत्रियत्वसे ऊँचे उठकर ब्राह्मणत्वको प्राप्त हुए विश्वामित्रको धर्मके वचनसे उस समय बड़ी प्रसन्नता हुई
ক্ষত্রভাব ত্যাগ করে ব্রাহ্মণত্ব লাভ করা বিশ্বামিত্র, ধর্মের বাক্যে তখন অত্যন্ত প্রসন্ন হলেন।
Verse 19
विश्वामित्रस्तु शिष्यस्थ गालवस्य तपस्विन: । शुश्रूषया च भक्त्या च प्रीतिमानित्युवाच ह,वे अपने शिष्य तपस्वी गालव मुनिकी सेवा-शुश्रूषा तथा भक्तिसे संतुष्ट होकर बोले --
তপস্বী শিষ্য গালবের সেবা-শুশ্রূষা ও ভক্তিতে সন্তুষ্ট হয়ে বিশ্বামিত্র স্নেহভরে তাকে বললেন।
Verse 20
अनुज्ञातो मया वत्स यथेष्टं गच्छ गालव । इत्युक्त: प्रत्युवाचेदं गालवो मुनिसत्तमम्
নারদ বললেন—“বৎস! আমি তোমাকে অনুমতি দিলাম; তোমার ইচ্ছামতো যেখানে খুশি যাও, গালব।” এ কথা শুনে গালব সেই মুনিশ্রেষ্ঠকে উত্তর দিল।
Verse 21
प्रीतो मधुरया वाचा विश्वामित्र॑ महाद्युतिम् । दक्षिणा: का: प्रयच्छामि भवते गुरुकर्मणि
নারদ বললেন—“তোমার মধুর বাক্যে প্রসন্ন হয়ে, মহাদ্যুতিমান বিশ্বামিত্র! গুরুসেবার প্রতিদানে আমি তোমাকে কী দক্ষিণা অর্পণ করব?”
Verse 22
“वत्स गालव! अब मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, जाओ।” उनके इस प्रकार आदेश देनेपर गालवने प्रसन्नता प्रकट करते हुए मधुर वाणीमें महातेजस्वी मुनिवर विश्वामित्रसे इस प्रकार पूछा--“भगवन्! मैं आपको गुरुदक्षिणाके रूपमें क्या दूँ? ।। दक्षिणाभिरुपेतं हि कर्म सिद्धयति मानद । दक्षिणानां हि दाता वै अपवर्गेण युज्यते
নারদ বললেন—“বৎস গালব! এখন আমি তোমাকে অনুমতি দিচ্ছি; তোমার ইচ্ছামতো যেখানে চাও যাও।” এভাবে অনুমতি পেয়ে গালব আনন্দ প্রকাশ করে মধুর বাক্যে মহাতেজস্বী মুনিবর বিশ্বামিত্রকে জিজ্ঞাসা করল—“ভগবন্! গুরুদক্ষিণা রূপে আমি আপনাকে কী দেব? হে মানদ! দক্ষিণাসহ কর্ম সিদ্ধ হয়, আর দক্ষিণাদাতা পুরুষ মোক্ষের সঙ্গে যুক্ত হন।”
Verse 23
“मानद! दक्षिणायुक्त कर्म ही सफल होता है। दक्षिणा देनेवाले पुरुषको ही सिद्धि प्राप्त होती है ।। स्वर्गे क्रतुफलं तद्धि दक्षिणा शान्तिरुच्यते । किमाहरामि गुर्वर्थ ब्रवीतु भगवानिति,'दक्षिणा देनेवाला मनुष्य ही स्वर्गमें यज्ञका फल पाता है। वेदमें दक्षिणाको ही शान्तिप्रद बताया गया है। अतः पूज्य गुरुदेव! बतावें कि मैं क्या गुरुदक्षिणा ले आऊँ?
গালব বলল—“হে মানদ! দক্ষিণাসহ কর্মই সফল হয়; দক্ষিণাদাতা পুরুষই সিদ্ধি লাভ করে। স্বর্গে যজ্ঞের ফল সত্যই দক্ষিণার উপর প্রতিষ্ঠিত বলা হয়েছে, আর বেদে দক্ষিণাকে শান্তিদায়িনী বলা হয়েছে। অতএব পূজ্য গুরুদেব! বলুন—গুরুদক্ষিণার জন্য আমি কী নিয়ে আসব?”
Verse 24
जानानस्तेन भगवाज्जित: शुश्रूषणेन वै । विश्वामित्रस्तमसकृद् गच्छ गच्छेत्यचोदयत्
তার সেবাভক্তিতে তিনি সত্যই জয়ী হয়েছেন—এ কথা জেনে ভগবান বিশ্বামিত্র তাকে বারবার তাগিদ দিলেন—“যাও, যাও।”
Verse 25
गालवकी सेवा-शुश्रूषासे भगवान् विश्वामित्र उनके वशमें हो गये थे। अतः उनके उपकारको समझते हुए विश्वामित्रने उनसे बार-बार कहा--'जाओ, जाओ! ।। असकृद् गच्छ गच्छेति विश्वामित्रेण भाषित: । कि ददानीति बहुशो गालव: प्रत्यभाषत,उनके द्वारा बारंबार 'जाओ, जाओ' की आज्ञा मिलनेपर भी गालवने अनेक बार आग्रहपूर्वक पूछा--“मैं आपको क्या गुरुदक्षिणा दूँ?”
গালবের সেবা-শুশ্রূষায় ভগবান বিশ্বামিত্র তাঁর প্রতি প্রসন্ন ও বশীভূত হয়েছিলেন। সেই উপকার স্মরণ করে তিনি বারবার বললেন—“যাও, যাও।” কিন্তু বিশ্বামিত্রের পুনঃপুন “যাও” আদেশ সত্ত্বেও গালব বিনীতভাবে বারবার জিজ্ঞাসা করল—“আমি আপনাকে কী গুরুদক্ষিণা দেব?”
Verse 26
निर्बन्धतस्तु बहुशो गालवस्य तपस्विन: । किंचिदागतसंरम्भो विश्वामित्रो5ब्रवीदिदम्
তপস্বী গালব বারবার অনুরোধে জেদ ধরলে বিশ্বামিত্রের মনে সামান্য বিরক্তি জাগল; তখন তিনি এই কথা বললেন।
Verse 27
तपस्वी गालवके बहुत आग्रह करनेपर विश्वामित्रको कुछ क्रोध आ गया; अतः उन्होंने इस प्रकार कहा-- ।। एकत: श्यामकर्णानां हयानां चन्द्रवर्चसाम् । अष्टौ शतानि मे देहि गच्छ गालव मा चिरम्,“गालव! तुम मुझे चन्द्रमाके समान श्वेत रंगवाले ऐसे आठ सौ घोड़े दो, जिनके कान एक ओरसे श्याम वर्णके हों। जाओ, देर न करो”
হে গালব! চাঁদের মতো দীপ্তিমান এমন আটশো ঘোড়া আমাকে দাও, যাদের এক কান কালো রঙের। যাও—বিলম্ব কোরো না।
Verse 106
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते षडधिकशततमोड<्ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের ভগবদ্যানপর্বে গালবচরিত প্রসঙ্গে একশো ছয়তম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Gālava confronts the dilemma of having accepted an obligation to his guru yet lacking means to fulfill it, weighing the ethical consequences of unkept promises against the duty to continue striving.
The discourse presents truthfulness, gratitude, and reciprocity as foundations of personal and social legitimacy; ethical failure is portrayed as self-destructive, while disciplined recourse and renewed effort restore agency.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter functions as an ethical exemplum, implying that understanding the linkage between promise, truth, and merit is integral to dharma-oriented conduct.