Adhyaya 103
Udyoga ParvaAdhyaya 10333 Verses

Adhyaya 103

Udyoga Parva Adhyāya 103: Garuḍa’s Protest, Viṣṇu’s Demonstration, and Counsel Toward Śama

Upa-parva: Garuḍa–Indra–Viṣṇu Bala-Parīkṣā Episode (Embedded Exemplum within Udyoga Parva)

Kaṇva narrates that Garuḍa learns Indra has granted longevity to a nāga, obstructs the worlds with his wing-wind, and confronts Indra, alleging disrespect and interference with his ordained sustenance. Garuḍa asserts lineage, prior feats against daityas, and claims of unmatched burden-bearing, interpreting his service at the banner-station as a cause of being slighted. Kaṇva then describes a corrective intervention: Viṣṇu (rathacakrabhṛt) challenges Garuḍa’s self-praise and proposes a test—Garuḍa should bear a single arm. When the arm is placed upon Garuḍa’s shoulder, he collapses under the weight, shedding feathers, losing composure, and acknowledging he misjudged Viṣṇu’s supreme strength. Viṣṇu grants reassurance and redirects the lesson into policy counsel addressed to a royal figure: desist from hostility, seek śama, and recognize the formidable coalition associated with the Pāṇḍavas. Vaiśaṃpāyana closes with Duryodhana hearing Kaṇva’s words, reacting with derision and fatalistic self-justification rather than adopting restraint.

Chapter Arc: देवराज इन्द्र के सारथि और मन्त्री-तुल्य मित्र मातलि का परिचय—जिसका रथ सहस्र हरियों से युक्त होकर देवासुर-संग्रामों में मनोबल से ही नियंत्रित होता है—और उसी मातलि का पृथ्वी पर ‘वर’ खोजने का असाधारण प्रयोजन। → मातलि योग्य वर की खोज में मानवीय कुलों और ऋषि-आश्रमों के मानदण्डों को टटोलता है; कण्व-मुनि के आश्रम में आर्यक के पुत्र सुमुख के गुण (शील, शौच, दम आदि) सामने आते हैं, पर ‘जामातृ’ के रूप में स्वीकार्यता, कुल-प्रतिष्ठा और देव-मानव मर्यादा का प्रश्न तनाव बढ़ाता है। → दैवयोग से चतुर्भुज भगवान विष्णु की उपस्थिति में नारद द्वारा समस्त वृत्तान्त का उद्घाटन; इन्द्र गरुड़ (वैनतेय) के पराक्रम का स्मरण कर विष्णु से निवेदन करता है—‘आप ही इसे प्रदान करें’—और वर-निर्णय देव-आज्ञा के स्तर पर प्रतिष्ठित हो जाता है। → सुमुख की योग्यता और मर्यादा मान्य होती है; मातलि स्वयं कन्यादान हेतु उद्यत होकर आर्यक/कण्व-पक्ष से सम्मान और स्वीकृति की अपेक्षा करता है—सम्बन्ध की विधिवत स्थापना की दिशा स्पष्ट हो जाती है। → देव-समर्थन से वर निश्चित तो होता है, पर विवाह-सम्पादन और दोनों कुलों/लोकों के बीच इस सम्बन्ध के दूरगामी परिणाम अगले प्रसंग की ओर संकेत करते हैं।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें मातलिके द्वारा वरका खोजविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १०३ ॥। ऑपन-माज बछ। अकाल चतुर्राधिकशततमो< ध्याय: नारदजीका नागराज आर्यकके सम्मुख सुमुखके साथ मातलिकी कन्याके विवाहका प्रस्ताव एवं मातलिका नारदजी

নারদ বললেন—হে নাগরাজ! ইনি মাতলি নামে পরিচিত—শক্র (ইন্দ্র)-এর প্রিয়, বিশ্বস্ত সখা ও সারথি। তিনি শুচি, শীল ও সদ্‌গুণে সমৃদ্ধ; তেজস্বী, বীর্যবান এবং বলবান।

Verse 2

शक्रस्थायं सखा चैव मन्त्री सारथिरेव च । अल्पान्तरप्रभावश्नल वासवेन रणे रणे

ইনি শক্র (ইন্দ্র)-এর সখা, মন্ত্রী এবং সারথি—সবই। প্রতিটি যুদ্ধে তিনি বাসবের পাশে থাকেন; তাঁর প্রভাব ইন্দ্রের থেকে সামান্যই কম।

Verse 3

अयं हरिसहस्रेण युक्त जैत्र॑ रथोत्तमम्‌ । देवासुरेषु युद्धेषु मनसैव नियच्छति

দেবাসুর-সংগ্রামে সহস্র অশ্বযুক্ত সেই বিজয়ী শ্রেষ্ঠ রথকে তিনি কেবল মনোবলেই সংযত ও নিয়ন্ত্রিত করেন।

Verse 4

अनेन विजितानबश्नैर्दोर्भ्यां जयति वासव: । अनेन बलभित्‌ पूर्व प्रह्ते प्रहरत्युत

ইনির অশ্বদের দ্বারা যাদের আগে জয় করা হয়, বাসব (ইন্দ্র) তাদেরই পরে নিজের বাহুবলে পরাস্ত করেন। ইনি প্রথমে আঘাত হানলে তবেই বলভিদ্‌ (ইন্দ্র) শত্রুদের উপর প্রহার করেন।

Verse 5

अस्य कन्या वरारोहा रूपेणासदृशी भुवि । सत्यशीलगुणोपेता गुणकेशीति विश्रुता

তাঁর এক কন্যা আছে—বরারোহা, যার রূপ পৃথিবীতে অতুলনীয়। সত্য, শীল ও সদ্গুণে সমৃদ্ধ সে ‘গুণকেশী’ নামে প্রসিদ্ধ।

Verse 6

इनके एक सुन्दरी कन्या है, जिसके रूपकी समानता भूमण्डलमें कहीं नहीं है। उसका नाम है गुणकेशी। वह सत्य, शील और सदगुणोंसे सम्पन्न है ।।

নারদ বললেন—উপযুক্ত বর সন্ধানে তিন লোক জুড়ে পরিশ্রমসহ বিচরণ করতে করতে মাতলি এই উদ্দেশ্যেই এখানে এসেছেন। হে নাগরাজ! আপনার পৌত্র সুমুখ তাঁকে কন্যার উপযুক্ত পতি বলে প্রতীয়মান হয়েছে; দেবসম কান্তিযুক্ত সেই সুমুখকেই তিনি বেছে নিয়েছেন।

Verse 7

यदि ते रोचते सम्यग्‌ भुजगोत्तम मा चिरम्‌ | क्रियतामार्यक क्षिप्रं बुद्धि: कन्यापरिग्रहे

নারদ বললেন—হে ভুজগোত্তম! যদি এই প্রস্তাব তোমার সত্যিই মনঃপূত হয়, তবে বিলম্ব কোরো না। হে আর্যক! শীঘ্রই কন্যা-পরিগ্রহের সিদ্ধান্ত গ্রহণ করো।

Verse 8

यथा विष्णुकुले लक्ष्मीर्यथा स्वाहा विभावसो: । कुले तव तथैवास्तु गुणकेशी सुमध्यमा

নারদ বললেন—যেমন বিষ্ণুর গৃহে লক্ষ্মী শোভা পান, আর অগ্নির অধিষ্ঠানে স্বাহা সম্মানিত হন, তেমনই সুমধ্যমা সুন্দরী গুণকেশী তোমার কুলে প্রতিষ্ঠিত ও আদৃত হোক।

Verse 9

पौत्रस्यार्थे भवांस्तस्माद्‌ गुणकेशीं प्रतीच्छतु । सदृशीं प्रतिरूपस्य वासवस्य शचीमिव

নারদ বললেন—অতএব পৌত্রের কল্যাণার্থে আপনি গুণকেশীকে গ্রহণ করুন। যেমন বাসব (ইন্দ্র)-এর উপযুক্ত শচী, তেমনই আপনার প্রতিরূপবান যোগ্য পৌত্রের জন্য গুণকেশী উপযুক্ত বধূ।

Verse 10

पितृहीनमपि होनं गुणतो वरयामहे । बहुमानाच्च भवतस्तथैवैरावतस्य च

নারদ বললেন—পিতৃবংশহীন ও লোকদৃষ্টিতে ‘হীন’ হলেও গুণের বলেই আমরা তাকে বরণ করি; আর এও তোমার এবং ঐরাবতের প্রতি সম্মানবশত।

Verse 11

अभिगम्य स्वयं कन्यामयं दातुं समुद्यत:

সে নিজে গিয়ে কন্যাটিকে দান করতে উদ্যত হয়ে দাঁড়াল—প্রতিশ্রুত দানের দায় নিজেই গ্রহণ করে, অন্যের হাতে না ছেড়ে।

Verse 12

कण्व उवाच स तु दीन: प्रद्ृष्ट श्न प्राह नारदमार्यक:,कण्व मुनि कहते हैं--कुरुनन्दन! तब नागराज आर्यक प्रसन्न होकर दीनभावसे बोले --

কণ্ব মুনি বললেন—তখন নাগরাজ আর্যক অন্তরে বিনয় ধারণ করে নারদকে দেখে সংযতভাবে বললেন।

Verse 13

आर्यक उवाच व्रियमाणे तथा पौत्रे पुत्रे च निधनं गते । कथमिच्छामि देवर्षे गुणकेशीं स्नुषां प्रति

আর্যক বললেন—হে দেবর্ষি! যখন আমার পৌত্র মরণাসন্ন এবং পুত্রও মৃত্যুকে প্রাপ্ত, তখন আমি কীভাবে গুণকেশীকে পুত্রবধূ করতে চাইতে পারি?

Verse 14

न मे नैतद्‌ बहुमतं महर्षे वचनं तव । सखा शक्रस्य संयुक्त: कस्यायं नेप्सितो भवेत्‌

হে মহর্ষি! তোমার এই বাক্য আমার কাছে গ্রহণযোগ্য নয়। যে শক্রের সখা এবং তাঁর সঙ্গে যুক্ত, সে কীভাবে কারও কাছে অপ্রার্থিত হতে পারে?

Verse 15

महर्षे! मेरी दृष्टिमें आपके इस वचनका कम आदर नहीं है और ये मातलि तो इन्द्रके साथ रहनेवाले उनके सखा हैं; अत: ये किसको प्रिय नहीं लगेंगे? ।।

আর্যক বললেন—“মহামুনি! আপনার বাক্যকে আমি কিছুমাত্র অবমাননা করি না। আর এই মাতলি তো ইন্দ্রের সহচর, তাঁর সান্নিধ্যে থাকা সখা—তাই কে-ই বা তাঁকে প্রিয় না বলবে? কিন্তু পূজনীয় মুনি, কারণটি দুর্বল ও অনিশ্চিত বলে আমি গভীর চিন্তায় পড়েছি। মহাদ্যুতে! এই বালকের পিতা—আমারই পুত্র—গরুড়ের আহার হয়েছে। সেই শোকে আমরা সকলেই দগ্ধ। প্রভো! গরুড় এখান থেকে বিদায় নিতে নিতে আবার বলেছিল—‘দ্বিতীয় মাসে সুমুখকেও আমি ভক্ষণ করব।’ নিশ্চয়ই তা-ই হবে, কারণ গরুড়ের দৃঢ় সংকল্প আমরা জানি। গরুড়ের সেই বাক্যে আমার হাসি-আনন্দ নিঃশেষ হয়েছে।”

Verse 16

भक्षितो वैनतेयेन दुःखातास्तेन वै वयम्‌ । पुनरेव च तेनोक्तं वैनतेयेन गच्छता । मासेनान्येन सुमुखं भक्षयिष्य इति प्रभो

আর্যক বললেন—“বৈনতেয় (গরুড়) আমার পুত্রকে—যে এই বালকের পিতা—ভক্ষণ করেছে; সেই দুঃখে আমরা শোকাকুল। আর বৈনতেয় এখান থেকে যেতে যেতে আবার বলেছিল—‘হে প্রভু! আর এক মাস পরে সুমুখকেও আমি ভক্ষণ করব।’ তা নিশ্চয়ই ঘটবে, কারণ গরুড়ের দৃঢ় সংকল্প আমরা জানি। গরুড়ের সেই ঘোষণায় আমার সুখ-হর্ষ লুপ্ত হয়েছে, আর কারণের দুর্বলতায় আমি সদা আশঙ্কিত।”

Verse 17

ध्रुवं तथा तद्‌ भविता जानीमस्तस्यथ निश्चयम्‌ । तेन हर्ष: प्रणष्टो मे सुपर्णवचनेन वै

“নিশ্চয়ই তেমনই হবে; তার সংকল্পের দৃঢ়তা আমরা ভালো করেই জানি। তাই সুপর্ণ (গরুড়)-এর বাক্যে আমার হর্ষ লুপ্ত হয়েছে।”

Verse 18

कण्व उवाच मातलिस्त्वब्रवीदेनं बुद्धिरत्र कृता मया । जामातृभावेन वृतः सुमुखस्तव पुत्रज:

কণ্ব বললেন—“রাজন! তখন মাতলি আর্যককে বলল—‘এ বিষয়ে আমি একটি বিচক্ষণ পরিকল্পনা করেছি। তোমার পৌত্র সুমুখকে আমি জামাতা রূপে বেছে নিয়েছি।’”

Verse 19

सो<5यं मया च सहितो नारदेन च पन्नग: । त्रिलोकेशं सुरपतिं गत्वा पश्यतु वासवम्‌,“अतः यह नागकुमार मेरे और नारदजीके साथ त्रिलोकीनाथ देवराज इन्द्रके पास चलकर उनका दर्शन करे

কণ্ব বললেন—“এই নাগরাজপুত্র আমার ও নারদের সঙ্গে ত্রিলোকেশ, দেবপতি বাসব (ইন্দ্র)-এর কাছে গিয়ে তাঁর দর্শন করুক।”

Verse 20

शेषेणैवास्य कार्येण प्रज्ञास्याम्पहमायुष: । सुपर्णस्य विघाते च प्रयतिष्यामि सत्तम

হে সজ্জনশ্রেষ্ঠ! এই বিষয়ে অবশিষ্ট কার্য সম্পন্ন করে আমি তার আয়ুর পরিমাণ নির্ণয় করব; আর সুপর্ণ (গরুড়) যেন তাকে আঘাত করে বধ করতে না পারে—সেজন্যও আমি চেষ্টা করব।

Verse 21

सुमुखश्न॒ मया सार्ध देवेशमभिगच्छतु । कार्यसंसाधनार्थाय स्वस्ति ते5स्तु भुजंगम,“नागराज! आपका कल्याण हो। सुमुख अपने अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये मेरे साथ देवराज इन्द्रके पास चले”

হে নাগরাজ! তোমার মঙ্গল হোক। প্রয়োজনীয় কার্যসিদ্ধির জন্য সুমুখ আমার সঙ্গে দেবেশ্বর ইন্দ্রের নিকট গমন করুক।

Verse 22

ततस्ते सुमुखं गृह सर्व एव महौजस: । ददृशु: शक्रमासीनं देवराज॑ महाद्युतिम्‌

তারপর সেই সকল মহাতেজস্বী সজ্জন সুমুখকে সঙ্গে নিয়ে স্বর্গাসনে উপবিষ্ট পরম দীপ্তিমান দেবরাজ শক্র (ইন্দ্র)-কে দর্শন করলেন।

Verse 23

संगत्या तत्र भगवान्‌ विष्णुरासीच्चतुर्भुज: । ततस्तत्‌ सर्वमाचख्यौ नारदो मातलिं प्रति

দৈবযোগে সেখানে চতুর্ভুজ ভগবান বিষ্ণুও উপস্থিত ছিলেন। তারপর দেবর্ষি নারদ মাতলির সঙ্গে সংশ্লিষ্ট সমগ্র বৃত্তান্ত বর্ণনা করলেন।

Verse 24

वैशम्पायन उवाच ततः पुरंदरं विष्णुरुवाच भुवनेश्वरम्‌ । अमृतं दीयतामस्मै क्रियताममरै: सम:

বৈশম্পায়ন বললেন—তারপর ভুবনেশ্বর পুরন্দর (ইন্দ্র)-কে ভগবান বিষ্ণু বললেন—“একে অমৃত দাও; এবং একে অমরদের সমান করো।”

Verse 25

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ विष्णुने लोकेश्वर इन्द्रसे कहा --'देवराज! तुम सुमुखको अमृत दे दो और इसे देवताओंके समान बना दो ।।

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! এরপর ভগবান বিষ্ণু লোকেশ্বর ইন্দ্রকে বললেন—“দেবরাজ! সুমুখকে অমৃত দাও এবং তাকে দেবতাদের সমান করো। হে বাসব! মাতলি, নারদ ও সুমুখ—এরা সকলেই তোমার প্রসাদে, অমৃত-দানের দ্বারা, নিজ নিজ ইচ্ছামতো কাম্য বর লাভ করে তাদের অভীষ্ট সিদ্ধি প্রাপ্ত হোক।”

Verse 26

पुरंदरो5थ संचिन्त्य वैनतेयपराक्रमम्‌ । विष्णुमेवाब्रवीदेनं भवानेव ददात्विति,तब देवराज इन्द्रने गरुड़के पराक्रमका विचार करके भगवान्‌ विष्णुसे कहा--“आप ही इसे उत्तम आयु प्रदान कीजिये”

তখন পুরন্দর (ইন্দ্র) বৈনতেয় (গরুড়)-এর পরাক্রম স্মরণ করে কেবল ভগবান বিষ্ণুকেই বললেন—“এই বর আপনি নিজেই দিন।”

Verse 27

विष्णुरुवाच ईशस्त्वं सर्वलोकानां चराणामचराश्ष ये । त्वया दत्तमदत्तं कः कर्तुमुत्सहते विभो

ভগবান বিষ্ণু বললেন—“হে প্রভু! সকল লোকের চল ও অচল যত প্রাণী আছে, তাদের সকলেরই তুমি ঈশ্বর। হে বিভো! তোমার দ্বারা প্রদত্ত আয়ুকে অপ্রদত্ত (নষ্ট) করার সাহস কার আছে?”

Verse 28

प्रादाच्छक्रस्ततस्तस्मै पन्नगायायुरुत्तमम्‌ । न त्वेनममृतप्राशं चकार बलवृत्रहा,तब इन्द्रने उस नागको अच्छी आयु प्रदान की, परंतु बलासुर और वृत्रासुरका विनाश करनेवाले इन्द्रने उसे अमृतभोजी नहीं बनाया

তখন শক্র (ইন্দ্র) সেই নাগকে উৎকৃষ্ট আয়ু দান করলেন; কিন্তু বল ও বৃত্র-সংহারী ইন্দ্র তাকে অমৃত-প্রাশী (অমৃতভোজী) করলেন না।

Verse 29

लब्ध्वा वरं तु सुमुख: सुमुख: सम्बभूव ह । कृतदारो यथाकामं॑ जगाम च गृहान्‌ प्रति,इन्द्रका वर पाकर सुमुखका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। वह विवाह करके इच्छानुसार अपने घरको चला गया

বর লাভ করে সুমুখ সত্যই প্রসন্ন ও দীপ্তিময় হল। বিবাহ সম্পন্ন করে, নিজের ইচ্ছামতো, সে গৃহাভিমুখে রওনা দিল।

Verse 30

नारदस्त्वार्यकश्चैव कृतकार्यो मुदा युतौ । अभिमजम्मतुरभ्यर्च्य देवराजं महाद्युतिम्‌ू,नारद और आर्यक दोनों ही कृतकृत्य हो महातेजस्वी देवराजकी अर्चना करके प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थानको चले गये

বৈশম্পায়ন বললেন—নারদ ও আর্যক উভয়েই কার্যসিদ্ধ করে আনন্দে পরিপূর্ণ হয়ে মহাদ্যুতিমান দেবরাজ ইন্দ্রকে বিধিপূর্বক পূজা করলেন। তাঁকে যথোচিত সম্মান জানিয়ে সন্তুষ্টচিত্তে তারা প্রত্যেকে নিজ নিজ ধামে প্রত্যাবর্তন করলেন।

Verse 104

इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि मातलिवरान्वेषणे चतुरधिकशततमो<ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের ভগবদ্যানপর্বে মাতলি-বরান্বেষণ প্রসঙ্গে (চার অতিরিক্তসহ) একশত চতুর্থ অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 106

सुमुखस्य गुणैश्नैव शीलशौचदमादिभि: | आपके और ऐरावतके प्रति हमारे हृदयमें विशेष सम्मान है और यह सुमुख भी शील

নারদ বললেন—শুধু বংশের কারণে বর গ্রহণ করা উচিত নয়; শীল, শৌচ, দম (ইন্দ্রিয়সংযম) প্রভৃতি গুণই আসল মানদণ্ড। অতএব পিতৃ-আশ্রয়হীন হলেও সুমুখ গুণসম্পন্ন; গুণের কারণেই আমরা তাকে গ্রহণ করি। আর আপনার ও ঐরাবতের প্রতিও আমাদের হৃদয়ে বিশেষ সম্মান আছে।

Verse 116

मातलिस्तस्य सम्मान कर्तुमहों भवानपि । ये मातलि स्वयं चलकर कन्यादान करनेको उद्यत हैं। आपको भी इनका सम्मान करना चाहिये

নারদ বললেন—মাতলি সম্মানের যোগ্য; আপনাকেও তাঁকে সম্মান করা উচিত। কারণ মাতলি নিজে অগ্রসর হয়ে কন্যাদান সম্পাদনে উদ্যত হয়েছেন; অতএব আপনিও তাঁকে যথোচিত মর্যাদা দিন।

Frequently Asked Questions

The dilemma is the conflict between perceived entitlement to one’s ordained role (Garuḍa’s sustenance and status) and the ethical requirement to recognize higher order, accept correction, and prevent pride from driving destructive escalation.

The episode teaches that self-estimation is unreliable without calibrated comparison; genuine strength includes discernment and restraint, and recognition of superior order should redirect action from confrontation to prudent policy.

Yes. The narrative explicitly pivots into counsel urging cessation of hostility and acceptance of śama, and it is immediately contrasted with Duryodhana’s dismissive reaction, underscoring how ignored counsel accelerates systemic breakdown.