Adhyaya 8
Sabha ParvaAdhyaya 842 Verses

Adhyaya 8

यमसभावर्णनम् (Yamasabhā-varṇanam) — Nārada’s Description of Dharmarāja’s Assembly

Upa-parva: Nārada–Yamasabhā-varṇana (Description of Yama’s Divine Assembly)

Nārada begins by instructing Yudhiṣṭhira that he will describe a divine assembly built by Viśvakarmā for Vaivasvata (Yama/Dharmarāja). The sabhā is portrayed as vast, radiant like the sun, mobile at will, and climatically balanced—neither excessively cold nor hot—producing mental delight. Within it, negative human conditions are absent: sorrow, aging, hunger, thirst, unpleasantness, humiliation, fatigue, and adversity are explicitly negated, establishing the hall as a normative space of well-being. The chapter then inventories abundance: divine and human enjoyments, plentiful and tasteful foods, fragrant garlands, ever-flowering and fruiting trees, and waters of varied temperatures. A long catalog of rājarṣis and brahmarṣis is presented as attending and honoring Vaivasvata, followed by additional cosmological attendants (pitṛs and other classes), emphasizing a structured moral universe. The description returns to the hall’s spaciousness and splendor, noting ascetics and truth-speakers who reach it through severe austerity and purified conduct. Gandharvas, apsarases, music, dance, and auspicious sensory qualities surround the assembly. The chapter concludes by affirming the greatness of Pitṛrāja’s sabhā and signals a forthcoming description of Varuṇa’s lotus-garlanded assembly.

Chapter Arc: नारद युधिष्ठिर से कहते हैं—हे राजन्, मैं तुम्हें यमराज (पितृराज) की दिव्य सभा का वर्णन सुनाता हूँ, जहाँ धर्म का तेज स्वयं आकार लेता है। → सभा का विस्तार और अद्भुत स्वभाव प्रकट होता है: वह शत-योजन विस्तीर्ण, तेजोमयी, सूर्य-प्रकाश-सी दीप्त, इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली, न अति शीतल न अति उष्ण, और मन को हर्षित करनेवाली है। फिर वहाँ उपस्थित महापुरुषों की दीर्घ परंपरा—राजर्षि, तपस्वी, धर्मनिष्ठ—एक-एक कर गिनाई जाती है, जिससे श्रोता पर लोकातीत गरिमा का भार बढ़ता जाता है। → सभा का चरम वैभव तब उभरता है जब नारद बताते हैं कि वहाँ शान्त, संन्यासी, शुद्ध, पुण्यकर्म से पवित्र, भास्वर देह और विरज वस्त्रधारी जनों के शत-सहस्र नहीं, बल्कि ‘शतं शतसहस्राणि’—असंख्य धर्मात्मा महात्मा यम को उपासते हैं; स्वयं धर्मराज की उपस्थिति उस सभा को न्याय और मर्यादा का जीवित केंद्र बना देती है। → नारद निष्कर्ष रूप में कहते हैं—राजन्, यम की सभा ऐसी ही दिव्य और धर्म-परिपूर्ण है; वहाँ पुण्यात्मा राजर्षि और निर्मल हृदय वाले जन हर्षपूर्वक यम वैवस्वत की सेवा करते हैं। → यमसभा का वर्णन समाप्त करते हुए नारद अगली कड़ी खोलते हैं—अब मैं वरुण की पुष्करमालिनी सभा का वर्णन करूँगा।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ३२ श्लोक हैं) भीकम (2 अमान अष्टमो< ध्याय: यमराजकी सभाका वर्णन नारद उवाच कथयिष्ये सभां याम्यां युधिष्ठिर निबोध ताम्‌ । वैवस्वतस्य यां पार्थ विश्वकर्मा चकार ह,नारदजी कहते हैं--कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! अब मैं सूर्यपुत्र यमकी सभाका वर्णन करता हूँ, सुनो। उसकी रचना भी विश्वकर्माने ही की है

নারদ বললেন—কুন্তীনন্দন যুধিষ্ঠির, মনোযোগ দিয়ে শোনো। এখন আমি বিবস্বান-পুত্র যমের সভার বর্ণনা করব। হে পার্থ, সেই দিব্য সভা স্বয়ং বিশ্বকর্মাই নির্মাণ করেছিলেন।

Verse 2

तैजसी सा सभा राजन्‌ बभूव शतयोजना । विस्तारायामसम्पन्ना भूयसी चापि पाण्डव,राजन्‌! वह तेजोमयी विशाल सभा लम्बाई और चौड़ाईमें भी सौ योजन है तथा पाण्डुनन्दन! सम्भव है, इससे भी कुछ बड़ी हो

নারদ বললেন—হে রাজন, সেই তেজোময় সভা শত যোজন বিস্তৃত ছিল। দৈর্ঘ্য ও প্রস্থে তা সম্পূর্ণ সুষম; আর হে পাণ্ডুনন্দন, সম্ভবত তা আরও কিছু বৃহৎও ছিল।

Verse 3

अर्कप्रकाशा भ्राजिष्णु: सर्वतः कामरूपिणी । नातिशीता न चात्युष्णा मनसश्च प्रहर्षिणी,उसका प्रकाश सूर्यके समान है। इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली वह सभा सब ओरसे प्रकाशित होती है। वह न तो अधिक शीतल है, न अधिक गर्म। मनको अत्यन्त आनन्द देनेवाली है

নারদ বললেন—সেই সভাগৃহ সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান। ইচ্ছামতো রূপ ধারণ করতে সক্ষম হয়ে তা চারদিক থেকে উজ্জ্বল হয়ে প্রকাশিত হয়। তা না অতিশয় শীতল, না অতিশয় উষ্ণ; মনকে অত্যন্ত আনন্দিত করে।

Verse 4

न शोको न जरा तसस्‍यां क्षुत्पिपासे न चाप्रियम्‌ । न च दैन्यं क्लमो वापि प्रतिकूलं न चाप्युत,उसके भीतर न शोक है, न जीर्णता; न भूख लगती है, न प्यास। वहाँ कोई भी अप्रिय घटना नहीं घटित होती। दीनता, थकावट अथवा प्रतिकूलताका तो वहाँ नाम भी नहीं है

নাৰদ বললেন—সেখানে না শোক আছে, না বার্ধক্য; না ক্ষুধা, না তৃষ্ণা। সেখানে কোনো অপ্রিয় ঘটনা ঘটে না। দীনতা, ক্লান্তি কিংবা প্রতিকূলতার নামও সেখানে নেই।

Verse 5

सर्वे कामा: स्थितास्तस्यां ये दिव्या ये च मानुषा: । सारवच्च प्रभूतं च भक्ष्यं भोज्यमरिंदम,शत्रुदमन! वहाँ दिव्य और मानुष, सभी प्रकारके भोग उपस्थित रहते हैं। सरस एवं स्वादिष्ठ भक्ष्य-भोज्य पदार्थ प्रचुर मात्रामें संचित रहते हैं

নাৰদ বললেন—হে শত্রুদমন! সেখানে দিব্য ও মানব—সব প্রকার ভোগই প্রস্তুত থাকে। রসাল ও উৎকৃষ্ট ভক্ষ্য-ভোজ্যেরও সেখানে প্রাচুর্য সঞ্চিত।

Verse 6

लेहां चोष्यं च पेयं च हृद्यं स्‍्वादु मनोहरम्‌ । पुण्यगन्धा: स्रजस्तस्य नित्यं कामफला द्रुमा:,इसके सिवा चाटनेयोग्य, चूसनेयोग्य, पीनेयोग्य तथा हृदयको प्रिय लगनेवाली और भी स्वादिष्ठ एवं मनोहर वस्तुएँ वहाँ सदा प्रस्तुत रहती हैं। उस सभामें पवित्र सुगन्ध फैलानेवाली पुष्प-मालाएँ और सदा इच्छानुसार फल देनेवाले वृक्ष लहलहाते रहते हैं

নাৰদ বললেন—সেখানে চাটবার যোগ্য, চুষবার যোগ্য ও পানীয়—হৃদয়প্রিয়, মধুর ও মনোহর বস্তু সর্বদা প্রস্তুত থাকে। সেই সভায় পবিত্র সুগন্ধ ছড়ানো পুষ্পমালা সদা বিদ্যমান, আর ইচ্ছামতো ফলদানকারী বৃক্ষ সর্বদা শোভিত থাকে।

Verse 7

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापवके अन्तर्गत लोकपालयभाख्यानपर्वमें इन्द्रयभा-वर्णन नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ,रसवन्ति च तोयानि शीतान्युष्णानि चैव हि | तस्यां राजर्षय: पुण्यास्तथा ब्रह्मर्षयो5डमला:

সেখানে জলও রসাল ও মনোরম—কিছু শীতল, কিছু উষ্ণ। সেই লোকধামে পুণ্যবান রাজর্ষি এবং তদ্রূপ নির্মল ব্রহ্মর্ষিগণ বাস করেন।

Verse 8

ययातिर्नहुष: पूरुर्मान्धाता सोमको नृग:,इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि यमसभावर्णन नामाष्टमोड्ध्याय:

নারদ বললেন—এখানে যযাতি, নহুষ, পুরূ, মান্ধাতা, সোমক ও নৃগ—এই রাজাদের নাম উচ্চারিত হল। এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বে, ‘লোকপাল-সভা-আখ্যান’ অংশের অন্তর্গত ‘যমসভা-বর্ণন’ নামক অষ্টম অধ্যায় সমাপ্ত।

Verse 9

त्रसहस्युश्न॒ राजर्षि: कृतवीर्य: श्रुतश्रवा: । अरिष्टनेमि: सिद्धश्च कृतवेग: कृतिर्निमि:

নারদ বললেন—ত্রসহস্যু নামে এক রাজর্ষি, পরাক্রমশালী কৃতবীর্য, খ্যাত শ্রুতশ্রবা; আর সিদ্ধ আরিষ্টনেমি, কৃতবেগ, কৃতি ও নিমি—এঁরাও ছিলেন।

Verse 10

प्रतर्दन: शिबिर्मत्स्य:ः पृथुलाक्षो बृहद्रथ: । वार्तो मरुत्त: कुशिक: सांकाश्य: सांकृतिर्धुव

নারদ বললেন—প্রতর্দন, শিবি, মৎস্য, পৃথুলাক্ষ, বৃহদ্রথ, বার্ত, মরুত্ত, কুশিক, সাঙ্কাশ্য, সাঙ্কৃতি ও ধ্রুব—এঁরা প্রসিদ্ধ রাজপুরুষ।

Verse 11

चतुरश्चः सदश्चोर्मि: कार्तवीर्यश्व पार्थिव: । भरत: सुरथश्वैव सुनीथो निशठो नलः

নারদ বললেন—চতুর, সদ, ঊর্মি ও পার্থিব কার্তবীর্য; আর ভরত, সুরথ, সুনীথ, নিশঠ ও নল—এঁরাও প্রাচীন প্রসিদ্ধ রাজা।

Verse 12

दिवोदासश्न सुमना अम्बरीषो भगीरथ: । व्यश्वः सदश्चो वध्यश्वः पृथुवेग: पृथुअ्रवा:

নারদ বললেন—দিবোদাস, সুমনা, অম্বরীষ ও ভগীরথ; আর ব্যশ্ব, সদশ্ব, বধ্যশ্ব, পৃথুবেগ ও পৃথুশ্রবা—এঁরাও প্রসিদ্ধ রাজা।

Verse 13

पृषदश्चो वसुमना: क्षुपश्ष सुमहाबल: । रुषद्रुर्वषसेनश्न पुरुकुत्सो ध्वजी रथी

নারদ আরও বললেন—পৃষদশ, বসুমনা ও মহাবলী ক্ষুপ; আর রুষদ্রু, বৃষসেন, পুরুকুৎস এবং ধ্বজী—এরা সকলেই প্রসিদ্ধ রথী ও পরাক্রান্ত নৃপতি ছিলেন।

Verse 14

आर्डिषेणो दिलीपश्न महात्मा चाप्युशीनर: । औशीनरि: पुण्डरीक: शर्यातिः शरभ: शुचि:

নারদ বললেন—আর্ডিষেণ, দিলীপ এবং মহাত্মা উশীনর; আর ঔশীনরি, পুণ্ডরীক, শর্য্যাতি, শরভ ও শুচি—এরা সকলেই প্রসিদ্ধ রাজা ছিলেন।

Verse 15

अड्जोषरिष्ट श्न वेनश्व दुष्पन्त: सृजजयो जय: । भाज़ासुरि: सुनीथश्व निषधो5थ वहीनर:

নারদ বললেন—অড্জোষরিষ্ট, বেন, দুষ্পন্ত; সৃজজয় ও জয়; ভাজাসুরি ও সুনীথ; এবং পরে নিষধ ও বহীনর—এরা সকলেই রাজবংশের ধারায় গণ্য।

Verse 16

करन्धमो बाह्नविकश्न सुद्युम्नो बलवान्‌ मधु: । ऐलो मरुत्तश्न तथा बलवान्‌ पृथिवीपति:

নারদ বললেন—করন্ধম, বাহ্নবিক ও সুদ্যুম্ন; মহাবলী মধু; এবং ঐল ও মরুত্ত—এরা সকলেই শক্তিমান ভূ-পতি ছিলেন।

Verse 17

कपोतरोमा तृणकः सहदेवार्जुनौ तथा । व्यश्वः साशथ्वः कृशाश्वश्च शशबिन्दुश्च पार्थिव:

নারদ বললেন—কপোতরোমা, তৃণক; তদ্রূপ সহদেব ও অর্জুন; আবার ব্যশ্ব, সাশথ্ব, কৃশাশ্ব এবং শশবিন্দু—এরা সকলেই ভূ-পতি ছিলেন।

Verse 18

राजा दशरथश्चैव ककुत्स्थो5थ प्रवर्धन: । अलर्क: कक्षसेनश्न गयो गौराश्वच एवच

নারদ বললেন—রাজা দশরথ, ককুত্স্থ, তারপর প্রবর্ধন; আলর্ক, কক্ষসেন, গয় এবং গৌরাশ্বও।

Verse 19

जामदग्न्यश्न रामश्चन नाभागसगरौ तथा | भूरिट्युम्नो महाश्वश्व पृथाश्वो जनकस्तथा

জামদগ্ন্য রাম, নাভাগ ও সগর; তদুপরি ভূরিদ্যুম্ন, মহাশ্ব, পৃথাশ্ব এবং জনকও।

Verse 20

राजा वैन्यो वारिसेन: पुरुजिज्जनमेजय: । ब्रह्मदत्तस्त्रिगर्तक्ष राजोपरिचरस्तथा

রাজা বৈন্য, বারিসেন, পুরুজিৎ, জনমেজয়; ত্রিগর্তদের ব্রহ্মদত্ত, এবং রাজোপরিচরও।

Verse 21

इन्द्रद्युम्नो भीमजानुर्गौरपृष्ठोडनघो लय: । पद्मयो5थ मुचुकुन्दश्न भूरिद्युम्न: प्रसेनजित्‌

ইন্দ্রদ্যুম্ন, ভীমজানু, গৌরপৃষ্ঠ, নিষ্পাপ লয়; পদ্ময়, আর মুচুকুন্দ, ভূরিদ্যুম্ন ও প্রসেনজিৎ।

Verse 22

अरिष्टनेमि: सुद्युम्न: पृथुलाश्वोडष्टकस्तथा । शतं मत्स्या नृपतय: शतं नीपा: शतं गया:

অরিষ্টনেমি, সুদ্যুম্ন, পৃথুলাশ্ব ও ঌষ্টক; আর মৎস্যদের একশো রাজা, নীপদের একশো, গয়দেরও একশো।

Verse 23

धृतराष्ट्रश्ैकशतमशीतिर्जनमेजया: । शतं च ब्रह्मुदत्तानां वीरिणामीरिणां शतम्‌

নারদ বললেন— হে জনমেজয়! ধৃতরাষ্ট্রের একশো আশি পুত্র ছিল; আর ব্রহ্মুদত্তদের মধ্যেও ছিল একশো—বল ও পরাক্রমে খ্যাত বীর।

Verse 24

भीष्माणां द्वे शतेडप्यत्र भीमानां तु तथा शतम्‌ | शतं च प्रतिविन्ध्यानां शतं नागा: शतं हया:

নারদ বললেন— এখানে ভীষ্মদের দুইশো; ভীমদের তেমনি একশো। প্রতিবিন্ধ্যদেরও একশো; একশো হাতি ও একশো ঘোড়া।

Verse 25

पलाशानां शतं ज्ञेयं शतं काशकुशादय: । शान्तनुश्लैव राजेन्द्र पाण्डुश्वैव पिता तव

নারদ বললেন— জেনে রাখো, পলাশের একশো গাছ আছে; আর কাশ, কুশ প্রভৃতিরও একশো ঝোপ আছে। আর হে রাজেন্দ্র! শান্তনুও—এবং পাণ্ডুও—তোমার পিতা।

Verse 26

उशड्भव: शतरथो देवराजो जयद्रथ: । वृषदर्भश्न राजर्षिबुद्धिमान्‌ सह मन्त्रिभि:

নারদ বললেন— উশদ্ভব, শতরথ, দেবরাজ, জয়দ্রথ, আর বৃষদর্ভ—সেই প্রজ্ঞাবান রাজর্ষি—নিজ মন্ত্রীদের সঙ্গে।

Verse 27

अथापरे सहस््राणि ये गता: शशबिन्दव: । इष्टवाश्वमेधैर्बहुभिर्महद्धिभूरिदक्षिणै:

নারদ বললেন— আর এমনই আরও সহস্র জন—শশবিন্দুর মতো—গত হয়ে গেছে; যারা বহু মহৎ অশ্বমেধ যজ্ঞ করেছে এবং বিপুল দক্ষিণা দান করেছে।

Verse 28

एते राजर्षय: पुण्या: कीर्तिमन्तो बहुश्रुता: । तस्यां सभायां राजेन्द्र वैवस्चतमुपासते

নারদ বললেন—হে রাজেন্দ্র! এঁরা পুণ্যবান, কীর্তিমান ও বহুশ্রুত রাজর্ষিগণ; সেই সভায় তাঁরা বৈবস্বত যমকে উপাসনা করেন। তাঁদের উপস্থিতি ঘোষণা করে—সত্য রাজত্বের মানদণ্ড কেবল শক্তি নয়, বরং পুণ্য, বিদ্যা ও ধর্মাচরণ।

Verse 29

ययाति, नहुष, पूरु, मान्धाता, सोमक, नृग, त्रसहस्यु, राजर्षि कृतवीर्य, श्रुतश्रवा, अरिष्टनेमि, सिद्ध, कृतवेग, कृति, निमि, प्रतर्दन, शिबि, मत्स्य, पृथुलाक्ष, बृहद्रथ, वार्त, मरुत्त, कुशिक, सांकाश्य, सांकृति, ध्रुव, चतुरश्च, सदश्वोर्मि, राजा कार्तवीर्य अर्जुन, भरत, सुरथ, सुनीथ, निशठ, नल, दिवोदास, सुमना, अम्बरीष, भगीरथ, व्यश्व, सदश्व, वध्यश्व, पृथुवेग, पृथुश्रवा, पृषदश्च, वसुमना, महाबली क्षुप, रुषट्र, वृषसेन, रथ और ध्वजासे युक्त पुरुकुत्स, आर्टिषेण, दिलीप, महात्मा उशीनर, औशीनरि, पुण्डरीक, शर्याति, शरभ, शुचि, अंग, अरिष्ट, वेन, दुष्यन्त, सुंजय, जय, भांगासुरि, सुनीथ, निषध, वहीनर, करन्धम, बाह्लिक, सुद्युम्न, बलवान्‌ मधु, इला-नन्दन पुरूरवा, बलवान राजा मरुत्त, कपोतरोमा, तृणक, सहदेव, अर्जुन, व्यश्व, साश्व, कृशाश्व, राजा शशबिन्दु, महाराज दशरथ, ककुत्स्थ, प्रवर्धन, अलर्क, कक्षसेन, गय, गौराश्वच, जमदग्निनन्दन परशुराम, नाभाग, सगर, भूरिद्युम्न, महाश्वच, पृथाश्व, जनक, राजा पृथु, वारिसेन, पुरुजितूु, जनमेजय, ब्रह्मदत्त, त्रिगर्त, राजा उपरिचर, इन्द्रद्युम्न, भीमजानु, गौरपृष्ठ, अनघ, लय, पद्दा, मुचुकुन्द, भूरिद्युम्न, प्रसेनजित्‌, अरिष्टनेमि, सुद्युम्न, पृथुलाश्वच, अष्टक, एक सौ मत्स्य, एक सौ नीप, एक सौ गय, एक सौ धृतराष्ट्र, अस्सी जनमेजय, सौ ब्रह्मदत्त, सौ वीरी, सौ ईरी, दो सौ भीष्म, एक सौ भीम, एक सौ प्रतिविन्ध्य, एक सौ नाग तथा एक सौ हय, सौ पलाश, सौ काश और सौ कुश राजा एवं शान्तनु, तुम्हारे पिता पाण्डु, उशंगव, शतरथ, देवराज, जयद्रथ, मन्त्रियोंसहित बुद्धिमान्‌ राजर्षि वृषदर्भ तथा इनके सिवा सहस्रों शशबिन्दु नामक राजा, जो अधिक दक्षिणावाले अनेक महान्‌ अश्वमेधयज्ञोंद्वारा यजन करके धर्मराजके लोकमें गये हुए हैं। राजेन्द्र! ये सभी पुण्यात्मा, कीर्तिमान्‌ और बहुश्रुत राजर्षि उस सभामें सूर्यपुत्र यमकी उपासना करते हैं ।। ८ --२८ || अगस्त्योडथ मतड़श्च कालो मृत्युस्तथैव च । यज्वानश्लैव सिद्धाक्ष ये च योगशरीरिण:,अगस्त्य, मतंग, काल, मृत्यु, यज्ञकर्ता, सिद्ध, योगशरीरधारी, अग्निष्वात्त पितर, फेनप, ऊष्मप, स्वधावान्‌, बर्हिषद्‌ तथा दूसरे मूर्तिमान्‌ पितर, साक्षात्‌ कालचक्र (संवत्सर आदि कालविभागके अभिमानी देवता), भगवान्‌ हव्यवाहन (अग्नि), दक्षिणायनमें मरनेवाले तथा सकामभावसे दुष्कर (श्रमसाध्य) कर्म करनेवाले मनुष्य, जनेश्वर कालकी अआज्ञामें तत्पर यमदूत, शिंशप एवं पलाश, काश और कुश आदिके अभिमानी देवता मूर्तिमान्‌ होकर उस सभामें धर्मराजकी उपासना करते हैं

নারদ বললেন—হে রাজা! সেই সভায় যযাতি, নহুষ, পুরূ, মান্ধাতা, সোমক, নৃগ, ত্রসহস্যু, কৃতবীর্য, শ্রুতশ্রবা, অরিষ্টনেমি প্রভৃতি অসংখ্য কীর্তিমান রাজর্ষিকে দেখা যায়; শান্তনু এবং তোমার পিতা পাণ্ডুও সেখানে আছেন। যাঁরা বিপুল দানসহ মহাযজ্ঞ—বিশেষত বহু অশ্বমেধ—সম্পন্ন করে ধর্মরাজের লোক লাভ করেছেন, সেই শশবিন্দু নামে সহস্র সহস্র রাজা ও আরও বহু নৃপতি সেখানে উপস্থিত। এ সকল পুণ্যবান, প্রসিদ্ধ ও বহুশ্রুত রাজর্ষি সূর্যপুত্র যমকে উপাসনা করেন। সেখানে অগস্ত্য, মাতঙ্গ, কাল ও মৃত্যু; যজ্ঞকারী, সিদ্ধ ও যোগশরীরধারী যোগীগণ; পিতৃলোকের নানা শ্রেণি এবং বৃক্ষ-তৃণের অধিষ্ঠাত্রী দেবতাগণও বিদ্যমান। কালের বিধানে নিবদ্ধ যমদূতরাও ধর্মরাজের সেবায় স্থিত।

Verse 30

अग्निष्वात्ताश्न पितर: फेनपाश्चोष्मपाश्च ये । स्वधावन्तो बर्लहिषदो मूर्तिमन्तस्तथापरे,अगस्त्य, मतंग, काल, मृत्यु, यज्ञकर्ता, सिद्ध, योगशरीरधारी, अग्निष्वात्त पितर, फेनप, ऊष्मप, स्वधावान्‌, बर्हिषद्‌ तथा दूसरे मूर्तिमान्‌ पितर, साक्षात्‌ कालचक्र (संवत्सर आदि कालविभागके अभिमानी देवता), भगवान्‌ हव्यवाहन (अग्नि), दक्षिणायनमें मरनेवाले तथा सकामभावसे दुष्कर (श्रमसाध्य) कर्म करनेवाले मनुष्य, जनेश्वर कालकी अआज्ञामें तत्पर यमदूत, शिंशप एवं पलाश, काश और कुश आदिके अभिमानी देवता मूर्तिमान्‌ होकर उस सभामें धर्मराजकी उपासना करते हैं

নারদ বললেন—সেখানে অগ্নিষ্বাত্ত, ফেনপ ও ঊষ্মপ নামে পিতৃগণ আছেন; স্বধাবন্ত ও বর্হিষদও আছেন, এবং আরও অন্যান্য মূর্তিমান পিতৃগণও উপস্থিত। এঁরা সকলেই নিজ নিজ শ্রেণিতে স্থিত হয়ে সেই রাজসভায় ধর্মরাজ যমকে প্রণাম করে উপাসনা করেন। এতে বোঝা যায়—ধর্মের সূক্ষ্ম বিধানও পিতৃলোক ও বিশ্বব্যবস্থার সাক্ষ্যে প্রতিষ্ঠিত।

Verse 31

कालचक्रं च साक्षाच्च भगवान्‌ हव्यवाहन:ः । नरा दुष्कृतकर्माणो दक्षिणायनमृत्यव:,अगस्त्य, मतंग, काल, मृत्यु, यज्ञकर्ता, सिद्ध, योगशरीरधारी, अग्निष्वात्त पितर, फेनप, ऊष्मप, स्वधावान्‌, बर्हिषद्‌ तथा दूसरे मूर्तिमान्‌ पितर, साक्षात्‌ कालचक्र (संवत्सर आदि कालविभागके अभिमानी देवता), भगवान्‌ हव्यवाहन (अग्नि), दक्षिणायनमें मरनेवाले तथा सकामभावसे दुष्कर (श्रमसाध्य) कर्म करनेवाले मनुष्य, जनेश्वर कालकी अआज्ञामें तत्पर यमदूत, शिंशप एवं पलाश, काश और कुश आदिके अभिमानी देवता मूर्तिमान्‌ होकर उस सभामें धर्मराजकी उपासना करते हैं

নারদ বললেন—হে রাজেন্দ্র! সেখানে স্বয়ং কালচক্র এবং ভগবান হব্যবাহন (অগ্নি) মূর্তিমান হয়ে উপস্থিত। দক্ষিণায়নে মৃত মানুষ এবং যারা কামনাবশে কষ্টসাধ্য ও দোষযুক্ত কর্ম করে—তারাও সেখানে দেখা যায়। সকলেই কালের বিধানে, যমের আদেশে স্থিত হয়ে সেই সভায় ধর্মরাজের সেবা করে।

Verse 32

कालस्य नयने युक्ता यमस्य पुरुषाश्न ये । तस्यां शिंशपपालाशास्तथा काशकुशादय: । उपासते धर्मराजं मूर्तिमन्‍्तो जनाधिप,अगस्त्य, मतंग, काल, मृत्यु, यज्ञकर्ता, सिद्ध, योगशरीरधारी, अग्निष्वात्त पितर, फेनप, ऊष्मप, स्वधावान्‌, बर्हिषद्‌ तथा दूसरे मूर्तिमान्‌ पितर, साक्षात्‌ कालचक्र (संवत्सर आदि कालविभागके अभिमानी देवता), भगवान्‌ हव्यवाहन (अग्नि), दक्षिणायनमें मरनेवाले तथा सकामभावसे दुष्कर (श्रमसाध्य) कर्म करनेवाले मनुष्य, जनेश्वर कालकी अआज्ञामें तत्पर यमदूत, शिंशप एवं पलाश, काश और कुश आदिके अभिमानी देवता मूर्तिमान्‌ होकर उस सभामें धर्मराजकी उपासना करते हैं

নারদ বললেন—হে জনাধিপ! কালের ‘চক্ষু’ রূপে নিযুক্ত এবং যমের কর্মচারী বলে পরিচিত যাঁরা, তাঁরাও সেখানে আছেন। শিম্শপা ও পলাশ বৃক্ষের, এবং কাশ ও কুশ প্রভৃতির অধিষ্ঠাত্রী দেবতাগণও মূর্তিমান হয়ে সেই সভায় অবস্থান করেন। এঁরা সকলেই ধর্মরাজ বৈবস্বত যমকে উপাসনা করেন। সেই দৃশ্য দেখায়—লোকনিয়ন্ত্রণ কালের ও যমের দ্বারা সম্পন্ন হলেও, তাদেরও পরম আশ্রয় ধর্ম; তাই তারা ধর্মের প্রতিমূর্তির সম্মুখে নিত্য নত।

Verse 33

एते चान्ये च बहव: पितृराजसभासद: । न शक्‍्या: परिसंख्यातुं नामभि: कर्मभिस्तथा,ये तथा और भी बहुत-से लोग पितृराज यमकी सभाके सदस्य हैं, जिनके नामों और कर्मोंकी गणना नहीं की जा सकती

নারদ বললেন—এরা এবং এদের অতিরিক্ত আরও বহুজন পিতৃরাজ যমের সভাসদ। নাম ও কর্ম—কোনোটির দ্বারাই তাদের সম্পূর্ণ গণনা করা যায় না।

Verse 34

असम्बाधा हि सा पार्थ रम्या कामगमा सभा | दीर्घकालं तपस्तप्त्वा निर्मिता विश्वकर्मणा,कुन्तीनन्दन! वह सभा बाधारहित है। वह रमणीय तथा इच्छानुसार गमन करनेवाली है। विश्वकर्माने दीर्घनकालतक तपस्या करके उसका निर्माण किया है

নারদ বললেন—হে পার্থ, সেই সভা সত্যিই অবাধ; প্রশস্ত ও নির্বিঘ্ন। তা মনোরম, আর সেখানে ইচ্ছামতো চলাফেরা করা যায়। দীর্ঘকাল তপস্যা করে বিশ্বকর্মা তা নির্মাণ করেছেন।

Verse 35

ज्वलन्ती भासमाना च तेजसा स्वेन भारत । तामुग्रतपसो यान्ति सुव्रता: सत्यवादिन:,भारत! वह सभा अपने तेजसे प्रज्वलित तथा उद्धासित होती रहती है। कठोर तपस्या और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, सत्यवादी, शान्त, संन्यासी तथा अपने पुण्यकर्मसे शुद्ध एवं पवित्र हुए पुरुष उस सभामें जाते हैं। उन सबके शरीर तेजसे प्रकाशित होते रहते हैं। सभी निर्मल वस्त्र धारण करते हैं

হে ভারত! সেই সভা নিজেরই তেজে জ্বলজ্বল করে দীপ্তিমান থাকে। সেখানে যান উগ্র তপস্যাকারী, উত্তম ব্রতধারী ও সত্যবাদী পুরুষেরা।

Verse 36

शान्ता: संन्यासिन: शुद्धा: पूता: पुण्येन कर्मणा । सर्वे भास्वरदेहा श्व॒ सर्वे च विरजो>म्बरा:,भारत! वह सभा अपने तेजसे प्रज्वलित तथा उद्धासित होती रहती है। कठोर तपस्या और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, सत्यवादी, शान्त, संन्यासी तथा अपने पुण्यकर्मसे शुद्ध एवं पवित्र हुए पुरुष उस सभामें जाते हैं। उन सबके शरीर तेजसे प्रकाशित होते रहते हैं। सभी निर्मल वस्त्र धारण करते हैं

নারদ বললেন—সে সভায় প্রবেশ করেন শান্ত, সংযমী সন্ন্যাসীরা—পুণ্যকর্মে শুদ্ধ ও পবিত্র। তাঁদের সকলের দেহ দীপ্তিমান, আর সকলেই নির্মল বস্ত্র পরিধান করেন।

Verse 37

चित्राड्दाश्षित्रमाल्या: सर्वे ज्वलितकुण्डला: । सुकृतै: कर्मभि: पुण्यै: पारिबर्ैश्ष भूषिता:,सभी अद्भुत बाजूबंद, विचित्र हार और जगमगाते हुए कुण्डल धारण करते हैं। वे अपने पवित्र शुभ कर्मों तथा वस्त्राभूषणोंसे भी विभूषित होते हैं

নারদ বললেন—তাঁরা সকলেই বিচিত্র পুষ্পমালা ও অপূর্ব হার ধারণ করেন, আর তাঁদের কুণ্ডল জ্বলজ্বল করে। পুণ্য ও শুভ কর্মের দ্বারা, এবং উৎকৃষ্ট বস্ত্র-অলংকারে তাঁরা ভূষিত।

Verse 38

गन्धर्वाश्व महात्मान: सड्घशश्चाप्सरोगणा: । वादित्रं नृत्यगीतं च हास्यं लास्यं च सर्वशः,कितने ही महामना गन्धर्व और झुंड-की-झुंड अप्सराएँ उस सभामें उपस्थित हो सब प्रकारके वाद्य, नृत्य, गीत, हास्य और लास्यकी उत्तम कलाका प्रदर्शन करती हैं

সেখানে বহু মহাত্মা গন্ধর্ব এবং দলে-দলে অপ্সরা সেই সভায় উপস্থিত হয়ে সর্বপ্রকার বাদ্য, নৃত্য, গীত, হাস্য ও লাস্যের উৎকৃষ্ট কলা প্রদর্শন করত।

Verse 39

पुण्याश्न गन्धा: शब्दाश्न॒ तस्यां पार्थ समन्ततः । दिव्यानि चैव माल्यानि उपतिष्ठन्ति नित्यश:,कुन्तीकुमार! उस सभामें सदा सब ओर पवित्र गन्ध, मधुर शब्द और दिव्य मालाओंके सुखद स्पर्श प्राप्त होते रहते हैं

হে পার্থ! সেই সভার চারদিকে সর্বদা পবিত্র সুগন্ধ ও মধুর-মঙ্গল ধ্বনি বিরাজ করে; আর দিব্য মাল্যও নিত্যই সন্নিহিত থাকে।

Verse 40

शतं शतसहस्राणि धर्मिणां त॑ प्रजेश्वरम्‌ । उपासते महात्मानं रूपयुक्ता मनस्विन:,सुन्दर रूप धारण करनेवाले एक करोड़ धर्मात्मा एवं मनस्वी पुरुष महात्मा यमकी उपासना करते हैं

সুন্দর রূপে ভূষিত অসংখ্য ধর্মাত্মা ও দৃঢ়চিত্ত পুরুষ সেই মহাত্মা প্রজেশ্বরের উপাসনা করে।

Verse 41

ईदृशी सा सभा राजन पित्राज्ञों महात्मन: । वरुणस्यापि वक्ष्यामि सभां पुष्करमालिनीम्‌,राजन! पितृराज महात्मा यमकी सभा ऐसी ही है। अब मैं वरुणकी मूर्तिमान्‌ पुष्कर आदि तीर्थमालाओंसे सुशोभित सभाका भी वर्णन करूँगा

হে রাজন! পিতৃরাজ মহাত্মা যমের সভা এমনই। এখন আমি পুষ্কর প্রভৃতি তীর্থমালায় শোভিত বরুণের সভারও বর্ণনা করব।

Verse 76

यम॑ वैवस्वतं तात प्रह्ृष्टा: पर्युपासते । वहाँ ठंडे और गर्म स्वादिष्ठ जल नित्य उपलब्ध होते हैं। तात! वहाँ बहुत-से पुण्यात्मा राजर्षि और निर्मल हृदयवाले ब्रह्मर्षि प्रसन्नतापूर्वक बैठकर सूर्यपुत्र यमकी उपासना करते हैं

হে তাত! সেখানে শীতল ও উষ্ণ—উভয় প্রকার সুস্বাদু জল নিত্যই মেলে। আর বহু পুণ্যবান রাজর্ষি ও নির্মলহৃদয় ব্রহ্মর্ষি আনন্দিত হয়ে আসন গ্রহণ করে সূর্যপুত্র যম বৈবস্বতকে ভক্তিভরে পরিবেশন করে।

Frequently Asked Questions

The sabhā is defined by the absence of common afflictions (sorrow, aging, hunger, thirst, fatigue, humiliation), contrasting ordinary political spaces with an idealized domain where dharma is experienced as ordered well-being.

The chapter implicitly teaches that legitimate rule should approximate dharmic order: balanced conditions, procedural fairness, cultivated restraint, and an environment that supports mental clarity rather than agitation.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is archival and exemplary—mapping dharmic authority through description, catalog, and cosmological framing rather than promising recitational rewards.