
Chapter Arc: राज्य-हरण और वनवास की तैयारी के बीच, मृगचर्म धारण किए पाण्डवों को देखकर दुःशासन का कटु उपहास सभा के घाव पर नमक छिड़क देता है। → दुःशासन दुर्योधन के ‘एकछत्र चक्र’ के प्रवर्तन का गर्व गाता है और पाण्डवों को ‘पतित’ कहकर अपमानित करता है; भीतर-भीतर भीम, अर्जुन, नकुल-सहदेव का क्रोध उबलता है, पर युधिष्ठिर की प्रतिज्ञा और धर्म-बंधन उन्हें रोकता है। → भीम की गर्जना-सी प्रतिज्ञा फूट पड़ती है—धृतराष्ट्रपुत्रों को रण में मारकर ही शान्ति लूँगा; अर्जुन भी प्रतिज्ञा करता है कि जो-जो बुद्धिमोह से कौरव-पक्ष में खड़े होंगे, उन्हें बाणों से यमसदन पहुँचाएगा; सत्य की अचलता को हिमालय-सूर्य-चन्द्र के अटल रूपकों से बाँधकर वे अपनी वाणी को शपथ बना देते हैं। → वैशम्पायन के कथनानुसार, सब व्यायतबाहु पाण्डव अपनी-अपनी प्रतिज्ञाएँ दृढ़ कर धृतराष्ट्र के पास जाते हैं—क्रोध को अनुशासन में बाँधकर, भविष्य के युद्ध को वचन में अंकित करते हुए। → प्रतिज्ञाओं की ज्वाला अब राजसभा के भीतर पहुँची है—धृतराष्ट्र इस उभरते प्रलय-बीज को कैसे थामेगा, और कौरव-पक्ष इस शपथ-युद्ध का क्या उत्तर देगा?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ ३ श्लोक मिलाकर कुल २७३ “लोक हैं) नशा (0) आज अत >> सप्तसप्ततितमो<ध्याय: दुःशासनद्वारा पाण्डवोंका उपहास एवं भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी शत्रुओंको मारनेके लिये भीषण प्रतिज्ञा वैशम्पायन उवाच ततः पराजिता: पार्था वनवासाय दीक्षिता: । अजिनान्युत्तरीयाणि जगृहुश्न यथाक्रमम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! तदनन्तर जूएमें हारे हुए कुन्तीके पुत्रोंने वनवासकी दीक्षा ली और क्रमश: सबने मृगचर्मको उत्तरीय वस्त्रके रूपमें धारण किया
বৈশম্পায়ন বললেন—তারপর পাশাখেলায় পরাজিত পার্থরা বনবাসের ব্রত গ্রহণ করলেন। তখন তারা ক্রমানুসারে হরিণচর্মকে উত্তরীয় বস্ত্ররূপে ধারণ করলেন।
Verse 2
अजिनै: संवृतान् दृष्टवा हृतराज्यानरिंदमान् | प्रस्थितान् वनवासाय ततो दुःशासनोडब्रवीत्,जिनका राज्य छिन गया था, वे शत्रुदमन पाण्डव जब मृगचर्मसे अपने अंगोंको ढँककर वनवासके लिये प्रस्थित हुए, उस समय दुःशासनने सभामें उनको लक्ष्य करके कहा --[
হরিণচর্মে আবৃত, রাজ্যহারা, শত্রুদমন পাণ্ডবদের বনবাসে যাত্রারত দেখে, তখন দুঃশাসন সভায় তাদের উদ্দেশ করে বলল।
Verse 3
प्रवृत्तं धार्तराष्ट्रस्य चक्र राज्ञो महात्मन: । पराजिता: पाण्डवेया विपत्तिं परमां गता:,“धृतराष्ट्रपुत्र महामना राजा दुर्योधनका समस्त भूमण्डलपर एकछत्र राज्य हो गया। पाण्डव पराजित होकर बड़ी भारी विपत्तिमें पड़ गये
ধৃতরাষ্ট্রপুত্র সেই মহাত্মা রাজার (দুর্যোধনের) রাজচক্র চলতে লাগল; আর পরাজিত পাণ্ডবেরা চরম বিপর্যয়ে পতিত হল।
Verse 4
अद्यैव ते सम्प्रयाता: समैर्वत्मभिरस्थलै: । गुणज्येष्ठास्तथा श्रेष्ठा: श्रेयांसो यद् वयं परै:,“आज वे पाण्डव समान मार्गोंसे, जिनपर आये हुओंकी भीड़के कारण जगह नहीं रही है, वनको चले जा रहे हैं। हमलोग अपने प्रतिपक्षियोंसे गुण और अवस्था दोनोंमें बड़े हैं। अतः हमारा स्थान उनसे बहुत ऊँचा है
বৈশম্পায়ন বললেন—“আজই তারা সমতল পথ ধরে রওনা হয়েছে—যে পথ ভিড়ে ভরে গেছে, খোলা জমি আর নেই। আমরা প্রতিপক্ষের তুলনায় গুণে ও জ্যেষ্ঠতায় শ্রেষ্ঠ; অতএব আমাদের মর্যাদা তাদের চেয়ে উচ্চতর।”
Verse 5
नरकं पातिता: पार्था दीर्घकालमनन्तकम् | सुखाच्च हीना राज्याच्च विनष्टा: शाश्वती: समा:,“कुन्तीके पुत्र दीर्घकालतकके लिये अनन्त दुःखरूप नरकमें गिरा दिये गये। ये सदाके लिये सुखसे वंचित तथा राज्यसे हीन हो गये हैं। जो लोग पहले अपने धनसे उन्मत्त हो धृतराष्ट्रपुत्रोंकी हँसी उड़ाया करते थे, वे ही पाण्डव आज पराजित हो अपने धन-वैभवसे हाथ धोकर वनमें जा रहे हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—“পার্থদের দীর্ঘকাল ধরে অনন্ত দুঃখময় নরকে নিক্ষেপ করা হয়েছে। সুখ থেকে বঞ্চিত ও রাজ্যচ্যুত হয়ে তারা অসংখ্য বছর সর্বনাশের পথে পড়েছে।”
Verse 6
धनेन मत्ता ये ते सम धार्तराष्ट्रान् प्रहासिषु: । ते निर्जिता हृतधना वनमेष्यन्ति पाण्डवा,“कुन्तीके पुत्र दीर्घकालतकके लिये अनन्त दुःखरूप नरकमें गिरा दिये गये। ये सदाके लिये सुखसे वंचित तथा राज्यसे हीन हो गये हैं। जो लोग पहले अपने धनसे उन्मत्त हो धृतराष्ट्रपुत्रोंकी हँसी उड़ाया करते थे, वे ही पाण्डव आज पराजित हो अपने धन-वैभवसे हाथ धोकर वनमें जा रहे हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—“যারা ধনের মদে ধৃতরাষ্ট্রের পুত্রদের উপহাস করত, সেই পাণ্ডবরাই আজ পরাজিত হয়ে, সম্পদহারা হয়ে, বনে যাচ্ছে।”
Verse 7
चित्रान् सन्नाहानवमुच्य पार्था वासांसि दिव्यानि च भानुमन्ति । विवास्यन्तां रुरुचर्माणि सर्वे यथा ग्लहं सौबलस्याभ्युपेता:,“सभी पाण्डव अपने शरीरपर जो विचित्र कवच और चमकीले दिव्य वस्त्र हैं, उन सबको उतारकर मृगचर्म धारण कर लें; जैसा कि सुबलपुत्र शकुनिके भावको स्वीकार करके ये लोग जूआ खेले हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—“পার্থরা তাদের বিচিত্র বর্ম খুলে ফেলুক, দীপ্তিমান দিব্য বস্ত্রও ত্যাগ করুক। তারা সবাই হরিণচর্ম পরিধান করুক—যেমন সৌবল (শকুনি) প্রস্তাবিত পাশাখেলা তারা গ্রহণ করেছিল।”
Verse 8
न सन्ति लोकेषु पुमांस ईदृशा इत्येव ये भावितबुद्धयः सदा । ज्ञास्यन्ति ते55त्मानमिमेडद्य पाण्डवा विपर्यये षण्ढतिला इवाफला:,“जो अपनी बुद्धिमें सदा यही अभिमान लिये बैठे थे कि हमारे-जैसे पुरुष तीनों लोकोंमें नहीं हैं, वे ही पाण्डव आज विपरीत अवस्थामें पहुँचकर थोथे तिलों-की भाँति निःसत्त्व हो गये हैं। अब इन्हें अपनी स्थितिका ज्ञान होगा
বৈশম্পায়ন বললেন—“যারা সর্বদা এই অহংকার পোষণ করত—‘তিন লোকেই আমাদের মতো পুরুষ নেই’—সেই পাণ্ডবরাই আজ বিপরীত অবস্থায় পড়ে ফাঁপা তিলের মতো নিষ্ফল ও নির্যাস হয়ে গেছে। আজ তারা নিজেদের প্রকৃত অবস্থাটি বুঝবে।”
Verse 9
इदं हि वासो यदि वेदृशानां मनस्विनां रौरवमाहवेषु । अदीक्षितानामजिनानि यद्वद् बलीयसां पश्यत पाण्डवानाम्,“इन मनस्वी और बलवान पाण्डवोंका यह मृगचर्ममय वस्त्र तो देखो, जिसे यज्ञमें महात्मालोग धारण करते हैं। मुझे तो इनके शरीरपर ये मृगचर्म यज्ञकी दीक्षाके अधिकारसे रहित जंगली कोलभीलोंके चर्ममय वस्त्रके समान ही प्रतीत होते हैं
দেখো, এই মহামনস্বী ও বলবান পাণ্ডবদের মৃগচর্মের বস্ত্র—সংঘর্ষের মাঝখানে পরিধৃত। এমন আবরণ দৃঢ়চিত্ত পুরুষের পক্ষে মানানসই হতে পারে; কিন্তু এদের গায়ে তা যজ্ঞদীক্ষায় পবিত্র মৃগচর্ম বলে নয়, বরং দীক্ষাহীনদের চর্মবস্ত্রের মতোই প্রতীয়মান—ধর্ম ও আচারগত মর্যাদা অস্বীকার করে তাদের লজ্জিত করার উদ্দেশ্যে।
Verse 10
महाप्राज्ञ: सौमकिर्यज्ञसेन: कन्यां पाज्चालीं पाण्डवेभ्य: प्रदाय | अकार्षीद् वै सुकृतं नेह किंचित् क्लीबा: पार्था: पतयो याज्ञसेन्या:,“महाबुद्धिमान् सोमकवंशी राजा ट्रुपदने अपनी कन्या पांचालीको पाण्डवोंके लिये देकर कोई अच्छा काम नहीं किया। द्रौपदीके पति ये कुन्तीपुत्र निरे नपुंसक ही हैं
অতিশয় প্রাজ্ঞ যজ্ঞসেন (দ্রুপদ) পাঞ্চালীকে পাণ্ডবদের হাতে দিয়ে কোনো বিশেষ পুণ্যকর্ম করেননি; কারণ এখানে যাজ্ঞসেনীর স্বামী পৃথাপুত্র পার্থদের ‘ক্লীব’ বলে কটুভাবে নিন্দা করা হচ্ছে—এটি তাদের তৎকালীন অপমান ও অসহায়তার ইঙ্গিত, স্থায়ী মূল্যায়ন নয়।
Verse 11
सूक्ष्पप्रावारानजिनोत्तरीयान् दृष्टवारण्ये निर्धनानप्रतिष्ठान् । कां त्वं प्रीतिं लप्स्यसे याज्ञसेनि पतिं वृणीष्वेह यमन्यमिच्छसि,"द्रौपदी! जो सुन्दर महीन कपड़े पहना करते थे, उन्हीं पाण्डवोंको वनमें निर्धन, अप्रतिष्ठित और मृगचर्मकी चादर ओडढ़े देख तुम्हें क्या प्रसन्नता होगी? अब तुम किसी अन्य पुरुषको, जिसे चाहो, अपना पति बना लो
যে পাণ্ডবরা একদা সূক্ষ্ম ও সুন্দর বস্ত্র পরত, তাদের এখন অরণ্যে দরিদ্র, মর্যাদাহীন, মৃগচর্মে আবৃত দেখে তোমার কী আনন্দ হবে, হে যাজ্ঞসেনী? এখানে তুমি যাকে ইচ্ছা, সেই অন্য পুরুষকেই স্বামী হিসেবে বেছে নাও।
Verse 12
एते हि सर्वे कुरव: समेता: क्षान्ता दान्ता: सुद्रविणोपपन्ना: । एषां वृणीष्वैकतमं पतित्वे न त्वां तपेत् कालविपर्ययोड्यम्,“ये समस्त कौरव क्षमाशील, जितेन्द्रिय तथा उत्तम धन-वैभवसे सम्पन्न हैं। इन्हींमेंसे किसीको अपना पति चुन लो, जिससे यह विपरीत काल ([निर्धनावस्था) तुम्हें संतप्त न करे
এই সকল কৌরব এখানে সমবেত—সহিষ্ণু, সংযত এবং উৎকৃষ্ট ধনসম্পদে সমৃদ্ধ। এদের মধ্য থেকে একজনকে স্বামী হিসেবে বেছে নাও, যাতে কালের এই প্রতিকূল পরিবর্তন—দারিদ্র্য ও দুর্ভাগ্য—তোমাকে দগ্ধ না করে।
Verse 13
यथाफला: षण्ढतिला यथा चर्ममया मृगा: । तथैव पाण्डवा: सर्वे यथा काकयवा अपि,'जैसे थोथे तिल बोनेपर फल नहीं देते हैं, जैसे केवल चर्ममय मृग व्यर्थ हैं तथा जैसे काकयव (तंदुलरहित तृणधान्य) निष्प्रयोजन होते हैं, उसी प्रकार समस्त पाण्डवोंका जीवन निरर्थक हो गया है
যেমন বন্ধ্যা তিল ফল দেয় না, যেমন কেবল চর্মে গড়া ‘হরিণ’ নিছক অনুকরণমাত্র, আর যেমন কাকযব—ধানের দানা-হীন খোসার মতো—নিষ্ফল; তেমনি এই মুহূর্তে সকল পাণ্ডবের জীবনও নিষ্ফল ও নিরর্থক হয়ে পড়েছে।
Verse 14
कि पाण्डवांस्ते पतितानुपास्य मोघ: श्रम: षण्ढतिलानुपास्य । एवं नृशंस: परुषाणि पार्था- नश्रावयद् धृतराष्ट्रस्य पुत्र:,'थोथे तिलोंकी भाँति इन पतित और नपुंसक पाण्डवोंकी सेवा करनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा, व्यर्थका परिश्रम ही तो उठाना पड़ेगा।' इस प्रकार धृतराष्ट्रके नृशंस पुत्र दुःशासनने पाण्डवोंको बहुत-से कठोर वचन सुनाये
বৈশম্পায়ন বললেন—“এই পতিত পাণ্ডবদের সেবা করে তোমার কী লাভ? এ তো বৃথা পরিশ্রম—যেন বন্ধ্যা তিলের পরিচর্যা। এভাবে ধৃতরাষ্ট্রের নিষ্ঠুর পুত্র (দুঃশাসন) পার্থদের বহু কঠোর বাক্য শোনাল।”
Verse 15
तद् वै श्रुत्वा भीमसेनो त्यमर्षी निर्भत्स्योच्चै: संनिगृहीव रोषात् | उवाच चैनं सहसैवोपगम्य सिंहो यथा हैमवत: शृगालम्,यह सब सुनकर भीमसेनको बड़ा क्रोध हुआ। जैसे हिमालयकी गुफामें रहनेवाला सिंह गीदड़के पास जाय, उसी प्रकार वे सहसा दुःशासनके पास जा पहुँचे और रोषपूर्वक उसे रोककर जोर-जोरसे फटकारते हुए बोले
এ কথা শুনে ভীমসেন অসহ্য ক্রোধে জ্বলে উঠলেন; রোষকে কষ্টে সংযত করে তিনি হঠাৎ তার কাছে এগিয়ে গেলেন এবং হিমালয়ের গুহাবাসী সিংহ যেমন শেয়ালের দিকে ধেয়ে যায়, তেমনই উচ্চস্বরে তাকে ধমক দিয়ে বললেন।
Verse 16
भीमसेन उवाच क्रूर पापजनैर्जुष्टमकृतार्थ प्रभाषसे । गान्धारविद्यया हि त्वं राजमध्ये विकत्थसे,भीमसेनने कहा--क्रूर एवं नीच दुःशासन! तू पापी मनुष्योंद्वारा प्रयुक्त होनेवाली ओछी बातें बक रहा है। अरे! तू अपने बाहुबलसे नहीं, शकुनिकी छल-विद्याके प्रभावसे आज राजाओंकी मण्डलीमें अपने मुँहसे अपनी बड़ाई कर रहा है
ভীমসেন বললেন—“হে নিষ্ঠুর! তুমি পাপীদের উপযুক্ত নীচ কথা বলছ, আর প্রকৃত কৃতিত্বহীন হয়েও বড়াই করছ। আজ রাজসমাজে তুমি নিজের বাহুবল নয়—গান্ধারের (শকুনির) ছলবিদ্যার জোরেই দম্ভ দেখাচ্ছ।”
Verse 17
यथा तुदसि मर्माणि वाक्शरैरिह नो भृशम् | तथा स्मारयिता ते<हं कृन्तन् मर्माणि संयुगे,जैसे यहाँ तू अपने वचनरूपी बाणोंसे हमारे मर्मस्थानोंमें अत्यन्त पीड़ा पहुँचा रहा है, उसी प्रकार जब युद्धमें मैं तेरा हृदय विदीर्ण करने लगूँगा, उस समय तेरी कही हुई इन बातोंकी याद दिलाऊँगा
“যেমন এখানে তুমি বাক্যরূপী তীক্ষ্ণ বাণে আমাদের মর্মস্থানে গভীর আঘাত করছ, তেমনই রণক্ষেত্রে যখন আমি তোমার মর্মস্থান ছিন্ন করতে উদ্যত হব, তখন তোমার এই কথাগুলিই তোমাকে স্মরণ করিয়ে দেব।”
Verse 18
ये च त्वामनुवर्तन्ते क्रोधलो भवशानुगा: । गोप्तार: सानुबन्धांस्तान् नेतास्मि यमसादनम्,जो लोग क्रोध और लोभके वशीभूत हो तुम्हारे रक्षक बनकर पीछे-पीछे चलते हैं, उन्हें उनके सम्बन्धियोंसहित यमलोक भेज दूँगा
“আর যারা ক্রোধ ও লোভের বশে তোমার অনুসরণ করে, নিজেদের তোমার রক্ষক বলে—তাদের সকলকে আমি তাদের আত্মীয়-পরিজনসহ যমের ধামে পাঠিয়ে দেব।”
Verse 19
वैशम्पायन उवाच एवं ब्रुवाणमजिनैर्विवासितं दुःशासनस्तं परिनृत्यति सम । मध्ये कुरूणां धर्मनिबद्धमार्ग गौर्गौरिति स्माह्दयन् मुक्तलज्ज:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! मृगचर्म धारण किये भीमसेनको ऐसी बातें करते देख निर्लज्ज दुःशासन कौरवोंके बीचमें उनकी हँसी उड़ाते हुए नाचने लगा और “'ओ बैल! ओ बैल” कहकर उन्हें पुकारने लगा। उस समय भीमका मार्ग धर्मराज युधिष्ठिरने रोक रखा था (अन्यथा वे दुःशासनको जीता न छोड़ते)
বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! মৃগচর্ম পরিহিত ভীমসেনকে এভাবে কথা বলতে দেখে নির্লজ্জ দুঃশাসন কৌরবদের মাঝে নেচে-নেচে উপহাস করতে লাগল এবং ‘ও বল! ও বল!’ বলে তাকে ডাকতে লাগল। কিন্তু ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির ধর্মের বন্ধনে ভীমের পথ রুদ্ধ করে রেখেছিলেন; নইলে ভীম দুঃশাসনকে জীবিত ছাড়ত না।
Verse 20
भीमसेन उवाच नृशंस परुषं॑ वक्तुं शक््यं दुःशासन त्वया । निकृत्या हि धनं लब्ध्वा को विकत्थितुमहति,भीमसेन बोले--ओ नृशंस दुःशासन! तेरे ही मुखसे ऐसी कठोर बातें निकल सकती हैं, तेरे सिवा दूसरा कौन है, जो छल-कपटसे धन पाकर इस तरह आप ही अपनी प्रशंसा करेगा
ভীমসেন বললেন—হে নিষ্ঠুর দুঃশাসন! এমন কঠোর ও নির্দয় কথা কেবল তুমিই বলতে পারো। প্রতারণায় ধন লাভ করে কে-ই বা নিজেকে গর্ব করে প্রশংসা করার যোগ্য?
Verse 21
मेरी बात सुन ले। यह कुन्तीपुत्र भीमसेन यदि युद्धमें तेरी छाती फाड़कर तेरा रक्त न पीये तो इसे पुण्यलोकोंकी प्राप्ति न हो
আমার কথা শোন। আমি কুন্তীপুত্র ভীমসেন যদি যুদ্ধে তোর বুক চিরে তোর রক্ত না পান করি, তবে আমার পুণ্যলোক লাভ না হোক।
Verse 22
धार्रराष्ट्रान रणे हत्वा मिषतां सर्वधन्विनाम् । शमं गन्तास्मि नचिरात् सत्यमेतद् ब्रवीमि ते,मैं तुझसे सच्ची बात कह रहा हूँ, शीघ्र ही वह समय आनेवाला है, जब कि समस्त धनुर्धरोंके देखते-देखते मैं युद्धमें धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंका वध करके शान्ति प्राप्त करूँगा
আমি তোকে সত্য বলছি—অচিরেই সেই সময় আসবে, যখন সকল ধনুর্ধরের চোখের সামনে আমি রণে ধৃতরাষ্ট্রের পুত্রদের বধ করে শান্তি লাভ করব।
Verse 23
मैव सम सुकृताललोकान् गच्छेत् पार्थों वृकोदर: । यदि वक्षो हि ते भित्त्वा न पिबेच्छोणितं रणे,वैशम्पायन उवाच तस्य राजा सिंहगते: सखेलं दुर्योधनो भीमसेनस्य हर्षात् गतिं स्वगत्यानुचकार मन्दो निर्गच्छतां पाण्डवानां सभाया: वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! जब पाण्डवलोग सभाभवनसे निकले, उस समय मन्दबुद्धि राजा दुर्योधन हर्षमें भरकर सिंहके समान मस्तानी चालसे चलनेवाले भीमसेनकी खिल्ली उड़ाते हुए उनकी चालकी नकल करने लगा
ভীমসেন বললেন—যদি আমি রণে তোর বুক চিরে তোর রক্ত না পান করি, তবে অর্জুন ও আমি সমান পুণ্যলোক লাভ না করি। বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! পাণ্ডবেরা সভাগৃহ থেকে বেরিয়ে গেলে, আনন্দে উন্মত্ত মন্দবুদ্ধি রাজা দুর্যোধন সিংহসম গর্বিত গতি নিয়ে চলা ভীমসেনকে বিদ্রূপ করে নিজের চলনে তার চলন অনুকরণ করতে লাগল।
Verse 24
नैतावता कृतमित्यब्रवीत् त॑ वृकोदर: संनिवृत्तार्धकाय: । शीघ्रं हि त्वां निहत॑ सानुबन्ध॑ संस्मार्यहं प्रतिवक्ष्यामि मूढ,यह देख भीमसेनने अपने आधे शरीरकों पीछेकी ओर मोड़कर कहा--'ओ मूढ़! केवल दुःशासनके रक्तपानदद्वारा ही मेरा कर्तव्य पूरा नहीं हो जाता है। तुझे भी सम्बन्धियोंसहित शीघ्र ही यमलोक भेजकर तेरे इस परिहासकी याद दिलाते हुए इसका समुचित उत्तर दूँगा”
বৈশম্পায়ন বললেন—তখন বৃকোদর (ভীম) অর্ধদেহ পিছনে ফিরিয়ে তাকে বলল—“মূঢ়! এতেই আমার কর্তব্য সম্পূর্ণ নয়। শীঘ্রই তোকে তোর স্বজনসহ যমলোকে পাঠাব; আর তোর এই উপহাস স্মরণ করে তার যথোচিত জবাব দেব।”
Verse 25
एवं समीक्ष्यात्मनि चावमानं नियम्य मन्युं बलवान् स मानी । राजानुग: संसदि कौरवाणां विनिष्क्रामन् वाक्यमुवाच भीम:,इस प्रकार अपना अपमान होता देख बलवान् एवं मानी भीमसेन क्रोधको किसी प्रकार रोककर राजा युधिष्ठिरके पीछे कौरवसभासे निकलते हुए इस प्रकार बोले
এইভাবে নিজের অপমান দেখে বলবান ও আত্মাভিমানী ভীম কোনোমতে ক্রোধ সংযত করল। রাজা যুধিষ্ঠিরের অনুসরণে কৌরবসভা থেকে বেরোতে বেরোতে ভীম এই কথা বলল।
Verse 26
भीमसेन उवाच अहं दुर्योधनं हन्ता कर्ण हनता धनंजय: । शकुनिं चाक्षकितवं सहदेवो हनिष्यति,भीमसेनने कहा--मैं दुर्योधनका वध करूँगा, अर्जुन कर्णका संहार करेंगे और इस जुआरी शकुनिको सहदेव मार डालेंगे
ভীমসেন বলল—“দুর্যোধনকে আমি বধ করব; কর্ণকে ধনঞ্জয় (অর্জুন) সংহার করবে; আর পাশাখেলার জুয়াড়ি শকুনিকে সহদেব হত্যা করবে।”
Verse 27
इदं च भूयो वक्ष्यामि सभामध्ये बृहद् वच: । सत्य॑ं देवा: करिष्यन्ति यन्नो युद्ध भविष्यति,साथ ही इस भरी सभामें मैं पुन: एक बहुत बड़ी बात कह रहा हूँ। मेरा यह विश्वास है कि देवतालोग मेरी यह बात सत्य कर दिखायेंगे। जब हम कौरव और पाण्डवोंमें युद्ध होगा, उस समय इस पापी दुर्योधनको मैं गदासे मार गिराऊँगा तथा रणभूमिमें पड़े हुए इस पापीके मस्तकको पैरसे ठुकराऊँगा
আরও একবার এই ভরা সভার মাঝেই আমি এক মহাবাক্য ঘোষণা করছি—দেবতারা একে সত্য করে তুলবেন: আমাদের পাণ্ডব ও কৌরবদের মধ্যে যখন যুদ্ধ হবে।
Verse 28
सुयोधनमिमं पाप॑ हन्तास्मि गदया युधि । शिर: पादेन चास्याहमधिष्ठास्यथामि भूतले,साथ ही इस भरी सभामें मैं पुन: एक बहुत बड़ी बात कह रहा हूँ। मेरा यह विश्वास है कि देवतालोग मेरी यह बात सत्य कर दिखायेंगे। जब हम कौरव और पाण्डवोंमें युद्ध होगा, उस समय इस पापी दुर्योधनको मैं गदासे मार गिराऊँगा तथा रणभूमिमें पड़े हुए इस पापीके मस्तकको पैरसे ठुकराऊँगा
এই পাপী সুয়োধনকে আমি যুদ্ধে গদা দিয়ে বধ করব; আর সে যখন মাটিতে লুটিয়ে পড়বে, তখন তার মস্তকে আমি পা রাখব।
Verse 29
वाक्यशूरस्य चैवास्य परुषस्य दुरात्मन: । दुःशासनस्य रुधिरं पातास्मि मृगराडिव,और यह जो केवल बात बनानेमें बहादुर क्रूर-स्वभाववाला दुरात्मा दुःशासन है, इसकी छातीका खून उसी प्रकार पी लूँगा, जैसे सिंह किसी मृगका रक्त पान करता है
যে কেবল কথায় বীর, স্বভাবে নিষ্ঠুর সেই দুরাত্মা দুঃশাসনের রক্ত আমি সিংহ যেমন শিকারের রক্ত পান করে তেমনই পান করব।
Verse 30
अजुन उवाच नैवं वाचा व्यवसितं भीम विज्ञायते सताम् | इतश्नतुर्दशे वर्षे द्रष्टारो यद् भविष्यति,अर्जुनने कहा--आर्य भीमसेन! साधु पुरुष जो कुछ करना चाहते हैं, उसे इस प्रकार वाणीद्वारा सूचित नहीं करते। आजसे चौदहवें वर्षमें जो घटना घटित होगी, उसे स्वयं ही लोग देखेंगे
অর্জুন বললেন—আর্য ভীমসেন! সৎপুরুষেরা যা করতে স্থির করেন, তা এভাবে কথায় প্রকাশ করেন না। আজ থেকে চতুর্দশ বছরে যা ঘটবে, লোকেরা তা নিজেই দেখবে।
Verse 31
भीमसेन उवाच दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेश्न दुरात्मन: । दुःशासनचतुर्थानां भूमि: पास्यति शोणितम्
ভীমসেন বললেন—দুর্যোধন, কর্ণ, দুরাত্মা শকুনি এবং দুঃশাসন ও তার ভ্রাতৃগণের রক্ত এই ভূমি অবশ্যই পান করবে।
Verse 32
भीमसेन बोले--यह भूमि दुर्योधन, कर्ण, दुरात्मा शकुनि तथा चौथे दुःशासनके रक्तका निश्चय ही पान करेगी ।। अजुन उवाच असूयितार द्रष्टारं प्रवक्तारं विकत्थनम् | भीमसेन नियोगात् ते हन्ताहं कर्णमाहवे,अर्जुनने कहा--भैया भीमसेन! जो हमलोगोंके दोष ही ढूँढ़ा करता है, हमारे दुःख देखकर प्रसन्न होता है, कौरवोंको बुरी सलाहें देता है और व्यर्थ बढ़-बढ़कर बातें बनाता है, उस कर्णको मैं आपकी आज्ञासे अवश्य युद्धमें मार डालूँगा
অর্জুন বললেন—ভাই ভীমসেন! যে সর্বদা দোষ খোঁজে, অন্যের দুঃখ দেখে আনন্দ পায়, কৌরবদের কুটিল পরামর্শ দেয় এবং বৃথা দম্ভ করে—তোমার আদেশে সেই কর্ণকে আমি যুদ্ধে অবশ্যই বধ করব।
Verse 33
अर्जुन: प्रतिजानीते भीमस्य प्रियकाम्यया । कर्ण कर्णनुगांश्वैव रणे हन्तास्मि पत्रिभि:,अपने भाई भीमसेनका प्रिय करनेकी इच्छासे अर्जुन यह प्रतिज्ञा करता है कि “मैं युद्धमें कर्ण और उसके अनुगामियोंको भी बाणोंद्वारा मार डालूँगा”
ভীমসেনের প্রিয় ইচ্ছা পূর্ণ করতে অর্জুন প্রতিজ্ঞা করলেন—“যুদ্ধে আমি কর্ণ এবং তার অনুগামীদেরও আমার বাণে নিপাত করব।”
Verse 34
ये चान्ये प्रतियोत्स्यन्ति बुद्धिमोहेन मां नूपा: । तांश्व॒ सर्वानहं बाणै्नेतास्मि यमसादनम्,दूसरे भी जो नरेश बुद्धिके व्यामोहवश हमारे विपक्षमें होकर युद्ध करेंगे, उन सबको अपने तीक्ष्ण सायकोंद्वारा मैं यमलोक पहुँचा दूँगा
আর যে অন্য রাজারা বুদ্ধিভ্রমে মোহিত হয়ে আমার বিরোধিতা করে যুদ্ধ করতে আসবে, তাদের সকলকে আমি আমার তীক্ষ্ণ বাণে যমধামে পাঠিয়ে দেব।
Verse 35
चलेद्धि हिमवान् स्थानान्निष्प्रभ: स्याद् दिवाकर: । शैत्यं सोमात् प्रणश्येत मत्सत्यं विचलेद् यदि,यदि मेरा सत्य विचलित हो जाय तो हिमालय पर्वत अपने स्थानसे हट जाय, सूर्यकी प्रभा नष्ट हो जाय और चन्द्रमासे उसकी शीतलता दूर हो जाय (अर्थात् जैसे हिमालय अपने स्थानसे नहीं हट सकता, सूर्यकी प्रभा नष्ट नहीं हो सकती, चन्द्रमासे उसकी शीतलता दूर नहीं हो सकती, वैसे ही मेरे वचन मिथ्या नहीं हो सकते)
যদি আমার সত্য টলে যায়, তবে হিমালয় তার স্থান থেকে সরে যাবে, সূর্য নিষ্প্রভ হবে, আর চন্দ্রের শীতলতা লুপ্ত হবে—কিন্তু তা অসম্ভব; অতএব আমার বাক্য মিথ্যা হতে পারে না।
Verse 36
न प्रदास्यति भेद् राज्यमितो वर्षे चतुर्दशे । दुर्योधनो$भिसत्कृत्य सत्यमेतद् भविष्यति,यदि आजसे चौदहवें वर्षमें दुर्योधन सत्कारपूर्वक हमारा राज्य हमें वापस न दे देगा तो ये सब बातें सत्य होकर रहेंगी
আজ থেকে চতুর্দশ বছরে যদি দুর্যোধন যথোচিত সম্মানসহ আমাদের রাজ্য ফিরিয়ে না দেয়, তবে এ ঘোষিত বাক্য অবশ্যই সত্য হয়ে উঠবে।
Verse 37
वैशम्पायन उवाच इत्युक्तवति पार्थे तु श्रीमान् माद्रवतीसुतः । प्रगृह्य विपुलं बाहुं सहदेव: प्रतापवान्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! अर्जुनके ऐसा कहनेपर परम सुन्दर प्रतापी वीर माद्रीनन्दन सहदेवने अपनी विशाल भुजा ऊपर उठाकर शकुनिके वधकी इच्छासे इस प्रकार कहा; उस समय उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे और वे फुँफकारते हुए सर्पकी भाँति उच्छवास ले रहे थे
বৈশম্পায়ন বললেন—পার্থ এ কথা বলার পর শ্রীমান, প্রতাপশালী মাদ্রীপুত্র সহদেব তাঁর বিশাল বাহু উত্তোলন করলেন।
Verse 38
सौबलस्य वर्ध॑ प्रेप्सुरिदं वचनमत्रवीत् । क्रोधसंरक्तनयनो नि:श्वसन्निव पन्नग:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! अर्जुनके ऐसा कहनेपर परम सुन्दर प्रतापी वीर माद्रीनन्दन सहदेवने अपनी विशाल भुजा ऊपर उठाकर शकुनिके वधकी इच्छासे इस प्रकार कहा; उस समय उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे और वे फुँफकारते हुए सर्पकी भाँति उच्छवास ले रहे थे
সৌবলপুত্র শকুনির বধ কামনা করে তিনি এই বাক্য বললেন; ক্রোধে তাঁর চোখ রক্তিম হয়ে উঠেছিল, আর তিনি সাপের মতো ফোঁসফোঁস করে দীর্ঘশ্বাস ফেলছিলেন।
Verse 39
सहदेव उवाच अक्षान् यान् मन्यसे मूढ गान्धाराणां यशोहर । नैते5क्षा निशिता बाणास्त्वयैते समरे वृता:,सहदेवने कहा--ओ गान्धारनिवासी क्षत्रियकुलके कलंक मूर्ख शकुने! जिन्हें तू पासे समझ रहा है, वे पासे नहीं हैं, उनके रूपमें तूने युद्धमें तीखे बाणोंका वरण किया है
সহদেব বললেন—হে মূঢ় শকুনি, গন্ধারদের যশহরণকারী! তুমি যেগুলোকে পাশা মনে করছ, সেগুলো পাশা নয়; সেগুলো তীক্ষ্ণ বাণ। এই দ্যূত বেছে নিয়ে তুমি আসলে সমরে সেই বাণগুলোকেই বেছে নিয়েছ।
Verse 40
यथा चैवोक्तवान् भीमस्त्वामुद्दधिश्य सबान्धवम् । कर्ताह कर्मणस्तस्य कुरु कार्याणि सर्वश:,आर्य भीमसेनने बन्धु-बान्धवोंसहित तेरे विषयमें जो बात कही है, मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगा। तुझे अपने बचावके लिये जो कुछ करना हो, वह सब कर डाल
সহদেব বললেন—আর্য ভীমসেন তোমাকে তোমার আত্মীয়স্বজনসহ যে কথা বলেছেন, আমি সেই কর্ম অবশ্যই সম্পন্ন করব। আত্মরক্ষার জন্য যা কিছু করা উচিত, সব দিক থেকেই করে নাও।
Verse 41
हन्तास्मि तरसा युद्धे त्वामेवेह सबान्धवम् । यदि स्थास्यसि संग्रामे क्षत्रधमेण सौबल,सुबलकुमार! यदि तू क्षत्रियधर्मके अनुसार संग्राममें डटा रह जायगा, तो मैं वेगपूर्वक तुझे तेरे बन्धु-बान्धवोंसहित अवश्य मार डालूँगा
সহদেব বললেন—হে সৌবল, সুবলের পুত্র! যদি তুমি ক্ষত্রধর্ম অনুসারে এই সংগ্রামে স্থির হয়ে দাঁড়াও, তবে আমি ত্বরায় এখানে যুদ্ধে তোমাকে তোমার আত্মীয়স্বজনসহ নিধন করব।
Verse 42
सहदेववच: श्रुत्वा नकुलो5पि विशाम्पते । दर्शनीयतमो नृणामिदं वचनमब्रवीत्,राजन! सहदेवकी बात सुनकर मनुष्योंमें परम दर्शनीय रूपवाले नकुलने भी यह बात कही
হে রাজন, সহদেবের কথা শুনে মানুষের মধ্যে সর্বাধিক মনোহর নকুলও এই বাক্য উচ্চারণ করল।
Verse 43
नकुल उवाच सुतेयं यज्ञसेनस्य द्यूते5स्मिन् धृतराष्ट्रजै: । यैर्वाच: श्राविता रूक्षा: स्थितैर्दुर्योधनप्रिये
নকুল বললেন—যজ্ঞসেনের এই কন্যা এই দ্যূতে ধৃতরাষ্ট্রের পুত্রদের দ্বারা জয়ী হয়েছে; আর দুর্যোধনের পক্ষ নিয়ে দাঁড়িয়ে তারা তাকে কঠোর ও রূঢ় বাক্য শুনিয়েছে।
Verse 44
तान् धारराष्ट्रान् दुर्वत्तान् मुमूर्षन् कालनोदितान् । गमयिष्यामि भूयिष्ठानहं वैवस्वतक्षयम्
নকুল বললেন—ধৃতরাষ্ট্রের সেই পুত্রেরা, যারা দুরাচারে নিমগ্ন, কালের প্রেরণায় মৃত্যুর দিকে ধাবিত; আমি তাদের বহু সংখ্যায় বৈবস্বত যমের ধামে পাঠিয়ে দেব।
Verse 45
नकुल बोले--दुर्योधनके प्रियसाधनमें लगे हुए जिन धृतराष्ट्रपुत्रोने इस द्यूतसभामें द्रपदकुमारी कृष्णाको कठोर बातें सुनायी हैं, कालसे प्रेरित हो मौतके मुँहमें जानेकी इच्छा रखनेवाले उन दुराचारी बहुसंख्यक धुृतराष्ट्रकुमारोंको मैं यमलोकका अतिथि बना दूँगा ।। निदेशाद् धर्मराजस्य द्रौपद्या: पदवीं चरन् । निर्धार्तराष्ट्रां पृथिवीं कर्तास्मि नचिरादिव,धर्मराजकी अज्ञासे द्रौपदीका प्रिय करते हुए मैं सारी पृथिवीको धृतराष्ट्रपुत्रोंसे सूनी कर दूँगा; इसमें अधिक देर नहीं है
নকুল বললেন—যে ধৃতরাষ্ট্রপুত্রেরা দুর্যোধনকে তুষ্ট করতে উদ্যত হয়ে এই দ্যূতসভায় দ্রুপদকন্যা কৃষ্ণা (দ্রৌপদী)-কে কঠোর বাক্য শুনিয়েছে—সেই দুষ্কৃতী জন, কালের প্রেরণায় মৃত্যুমুখে ঝাঁপ দিতে উদ্গ্রীব; আমি তাদের বহু সংখ্যায় যমলোকের অতিথি করে দেব। ধর্মরাজের আদেশে, দ্রৌপদীর পক্ষ অবলম্বন করে, অচিরেই আমি পৃথিবীকে ধৃতরাষ্ট্রপুত্রশূন্য করে তুলব।
Verse 46
वैशम्पायन उवाच एवं ते पुरुषव्याप्रा: सर्वे व्यायतबाहव: । प्रतिज्ञा बहुला: कृत्वा धृतराष्ट्रमुपागमन्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! इस प्रकार वे सभी पुरुषसिंह महाबाहु पाण्डव बहुत-सी प्रतिज्ञाएँ करके राजा धृतराष्ट्रके पास गये
বৈশম্পায়ন বললেন—রাজন! এইভাবে সেই সকল পুরুষসিংহ, প্রসারিত বাহুবিশিষ্ট ও কর্মতৎপর পাণ্ডবেরা বহু প্রতিজ্ঞা করে রাজা ধৃতরাষ্ট্রের নিকট গেলেন।
Verse 76
इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें युधिष्ठटिरपराभवविषयक छिह्तत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত অনুদ্যূতপর্বে যুধিষ্ঠিরের পরাভব-বিষয়ক সাতাত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 77
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि पाण्डवप्रतिज्ञाकरणे सप्तसप्ततितमोध्याय:
ইতি শ্রীমহাভারতের সভাপর্বে অনুদ্যূতপর্বের অন্তর্গত পাণ্ডব-প্রতিজ্ঞা-কারণ বিষয়ক সাতাত্তরতম অধ্যায়।