
Dhṛtarāṣṭra’s Counsel on Restraint and the Pāṇḍavas’ Authorized Return (धृतराष्ट्र-उपदेशः)
Upa-parva: Dyūta-anumati and Nīti-upadeśa (Post-dice permission and counsel episode)
Yudhiṣṭhira addresses Dhṛtarāṣṭra as sovereign and asks what course of action should be taken, affirming his wish to remain under Kuru governance (1). Dhṛtarāṣṭra replies with auspicious benediction, grants leave, and instructs the Pāṇḍavas—accompanied by their wealth—to administer their own kingdom (2). He frames his words as the considered instruction of an elder, presented as beneficial and oriented to long-term welfare (3). He praises Yudhiṣṭhira’s subtle understanding of dharma, his discipline, and service to elders (4). The counsel emphasizes that peace follows from sound judgment; weapons do not advance where calm prevails, and conflict is to be set down rather than carried forward (5). Exemplary persons are described as perceiving virtues rather than faults, not recognizing enmities, and not pursuing antagonism (6). A typology of speech follows: the ignoble speak harshly; the middling respond in kind; the steadfast do not engage in harmful, harsh speech whether provoked or unprovoked (7–8). The virtuous remember good deeds rather than hostilities, grounded in self-verified confidence (9). Dhṛtarāṣṭra urges Yudhiṣṭhira not to lodge Duryodhana’s harshness in his heart, and invokes the presence of elders—Gāndhārī and the blind aged father—seeking regard (10–11). He adds a retrospective note that he had permitted the dice match to observe allies and assess the strengths and weaknesses of his sons (12). He points to Vidura as a learned minister and indicates the distribution of virtues among the Pāṇḍavas—dharma in Yudhiṣṭhira, valor in Arjuna, strength in Bhīma, and devotion to teachers in the twins (13–14). He concludes by directing Yudhiṣṭhira to enter Khāṇḍavaprastha, maintain brotherly concord, and keep the mind established in dharma (15). Vaiśaṃpāyana closes the unit: Yudhiṣṭhira, having completed proper courtesies, departs with his brothers and Kṛṣṇā (Draupadī) toward Indraprastha in cloud-like chariots, with uplifted spirits (16–17).
Chapter Arc: सभा में पासों की खनक के बीच शकुनि युधिष्ठिर को उकसाता है—“बहु वित्त पराजैषी” कहकर याद दिलाता है कि वे धन, राज्य और भाइयों तक हार चुके हैं; अब पूछता है कि क्या कुछ ‘अवशिष्ट’ बचा है। → युधिष्ठिर अपने असंख्य वैभव का उल्लेख करते हुए (अयुत, प्रयुत, शंकु, पद्म… कोटि तक) यह जताते हैं कि धन की कमी नहीं; पर शकुनि का लक्ष्य धन नहीं, पतन है। युधिष्ठिर शकुनि को ‘अधर्मचारी’ कहकर चेताते हैं कि वह भाइयों में फूट डालना चाहता है, फिर भी खेल की मर्यादा और अपनी प्रतिज्ञा-जैसी जकड़न से पीछे नहीं हटते। शकुनि छल-नीति (निकृति) का आश्रय लेकर बार-बार “जितम्” कहता हुआ पासे फिर उठाता है और दांव को आगे धकेलता है। → शकुनि अंतिम सीमा तक दांव बढ़वाता है और द्रौपदी को भी दांव पर लगवाकर जीत लेता है—अध्याय का केंद्र ‘द्रौपदी-पराजय’ है, जहाँ स्त्री को वस्तु की तरह दांव में रखे जाने का अधर्म चरम पर पहुँचता है। → युधिष्ठिर की हार पूर्णता को छूती है—धन, राज्य, स्वयं, भाई और अंततः द्रौपदी तक। सभा में ‘जीत’ का उद्घोष तो होता है, पर नैतिक पराजय कौरव-पक्ष की छाया बनकर फैल जाती है; धर्म का स्वर दबता नहीं, केवल क्षण भर के लिए कुचला जाता है। → द्रौपदी अब किस अधिकार से किसकी है—और उसे सभा में कैसे बुलाया/घसीटा जाएगा? अगले प्रसंग में यही प्रश्न विस्फोट बनकर उठने को है।
Verse 1
ऑपन- माल बछ। अकाल पजञज्चषष्टितमो< ध्याय: युधिष्ठटिरका धन, राज्य, भाइयों तथा द्रौपदीसहित अपनेको भी हारना शकुनिरुवाच बहु वित्त पराजैषी: पाण्डवानां युधिष्ठिर । आचक्ष्व वित्त कौन्तेय यदि ते5स्त्यपराजितम्,शकुनि बोला--कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर![ आप अबतक पाण्डवोंका बहुत-सा धन हार चुके। यदि आपके पास बिना हारा हुआ कोई धन शेष हो तो बताइये
শকুনি বলল—কুন্তীনন্দন যুধিষ্ঠির! তুমি পাণ্ডবদের বহু ধন হেরে ফেলেছ। হে কৌন্তেয়, যদি তোমার কাছে এখনও এমন কোনো সম্পদ থাকে যা বাজি রেখে হারানো হয়নি, তবে তা বলো।
Verse 2
युधिछिर उवाच मम वित्तमसंख्येयं यदहं वेद सौबल । अथ त्वं शकुने कस्माद् वित्तं समनुपृच्छसि,युधिष्ठटिर बोले--सुबलपुत्र! मेरे पास असंख्य धन है, जिसे मैं जानता हूँ। शकुने! तुम मेरे धनका परिमाण क्यों पूछते हो?
যুধিষ্ঠির বললেন—হে সৌবলপুত্র! আমার ধন অগণিত, তা আমি জানি। হে শকুনি! তবে তুমি কেন আমার ঐশ্বর্যের পরিমাণ জানতে চাইছ?
Verse 3
अयुतं प्रयुतं चैव शड्कुं पद्म तथार्बुदम् खर्व शड्खं निखर्व च महापद्मं च कोटय:,अयुत, प्रयुत, शंकु, पद्म, अर्बुद, खर्व, शंख, निखर्व, महापद्म, कोटि, मध्य, परार्ध और पर इतना धन मेरे पास है। राजन! खेलो, मैं इसीको दाँवपर रखकर तुम्हारे साथ खेलता हूँ
যুধিষ্ঠির বললেন—অযুত, প্রযুত, শঙ্কু, পদ্ম, অর্বুদ, খর্ব, শঙ্খ, নিখর্ব, মহাপদ্ম এবং কোটি—এই সকল পরিমাপ পর্যন্ত আমার ধন আছে। হে রাজন! খেল; এই ধনই পণ রেখে আমি তোমার সঙ্গে পাশা খেলব।
Verse 4
मध्यं चैव परार्थ च सपरं चात्र पण्यताम् | एतन्मम धन राजंस्तेन दीव्याम्यहं त्वया,अयुत, प्रयुत, शंकु, पद्म, अर्बुद, खर्व, शंख, निखर्व, महापद्म, कोटि, मध्य, परार्ध और पर इतना धन मेरे पास है। राजन! खेलो, मैं इसीको दाँवपर रखकर तुम्हारे साथ खेलता हूँ
যুধিষ্ঠির বললেন—এখানে ‘মধ্য’, ‘পরার্ধ’ এবং তারও ঊর্ধ্ব পর্যন্ত আমার ধনই পণ হোক। হে রাজন! এটাই আমার ভাণ্ডার; এই ধন নিয়েই আমি তোমার সঙ্গে পাশা খেলব।
Verse 5
वैशम्पायन उवाच पक पाक निकृतिं समुपाश्रित: । शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यह सुनकर शकुनिने छलका आश्रय ले पुनः इसी निश्चयके साथ युधिष्ठिरसे कहा--'लो, यह धन भी मैंने जीत लिया”
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! ছল-কপটের কৌশল আশ্রয় করে, সেই একই সংকল্পে শকুনি আবার যুধিষ্ঠিরকে বলল—“দেখো, এই ধনও আমি জিতে নিলাম।”
Verse 6
युधिछिर उवाच गवाश्चव॑ं बहुधेनूकमसंख्येयमजाविकम् । यत् किंचिदनुपर्णाशां प्राक् सिन्धोरपि सौबल । एतन्मम धन सर्व तेन दीव्याम्यहं त्वया,युधिष्ठिर बोले--सुबलपुत्र! मेरे पास सिन्धु नदीके पूर्वी तटसे लेकर पर्णाशा नदीके किनारेतक जो भी बैल, घोड़े, गाय, भेड़ एवं बकरी आदि पशुधन हैं, वह असंख्य है। उनमें भी दूध देनेवाली गौओंकी संख्या अधिक है। यह सारा मेरा धन है, जिसे मैं दाँवपर रखकर तुम्हारे साथ खेलता हूँ
যুধিষ্ঠির বললেন—হে সৌবলপুত্র! সিন্ধুর পূর্ব দিক থেকে পর্ণাশা পর্যন্ত আমার যত বলদ-ঘোড়া, গাভী, আর অগণিত ছাগল ও ভেড়া আছে—যার মধ্যে দুধেল গাভীর সংখ্যাই অধিক—সে সবই আমার ধন। সেই সমগ্র ধন পণ রেখে আমি তোমার সঙ্গে পাশা খেলি।
Verse 7
वैशम्पायन उवाच 52: 20/4864828 निकृतिं समुपाश्रित: । शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यह सुनकर शठताके आश्रित हुए शकुनिने अपनी ही जीत घोषित करते हुए युधिष्ठिस्से कहा--'लो, यह दाँव भी मैंने ही जीता”
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! ছল-কপটের আশ্রয় নিয়ে শকুনি নিজেরই জয় ঘোষণা করে যুধিষ্ঠিরকে বলল—“দেখো, এই পণও আমি জিতেছি।”
Verse 8
युधिछिर उवाच पुरं जनपदो भूमिरब्राह्मणधनै: सह । अब्राह्मणाश्व पुरुषा राजज्छिष्टं धनं मम । एतदू राजन् मम धन तेन दीव्याम्यहं त्वया,युधिष्ठिर बोले--राजन्! ब्राह्मणोंको जीविकारूपमें जो ग्रामादि दिये गये हैं, उन्हें छोड़कर शेष जो नगर, जनपद तथा भूमि मेरे अधिकारमें है तथा जो ब्राह्मणेतर मनुष्य मेरे यहाँ रहते हैं, वे सब मेरे शेष धन हैं। शकुने! मैं इसी धनको दाँवपर रखकर तुम्हारे साथ जूआ खेलता हूँ
যুধিষ্ঠির বললেন—রাজন! ব্রাহ্মণদের জীবিকারূপে যে গ্রামাদি দান করা হয়েছে, তা বাদ দিয়ে অবশিষ্ট নগর, জনপদ ও ভূমি, আর আমার অধীনস্থ অ-ব্রাহ্মণ প্রজারা—এটাই আমার অবশিষ্ট ধন। হে রাজন, এই ধনই পণ রেখে আমি তোমার সঙ্গে পাশা খেলি।
Verse 9
वैशम्पायन उवाच > आ/उकलक क निकृतिं समुपाश्रित: । शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यह सुनकर कपटका आश्रय ग्रहण करके शकुनिने पुन: अपनी ही जीतका निश्चय करके युधिष्ठिरसे कहा--“इस दाँवपर भी मेरी ही विजय हुई”
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! এ কথা শুনে ছল-কপটের আশ্রয় নিয়ে শকুনি আবারও নিজের জয় নিশ্চিত জেনে যুধিষ্ঠিরকে বলল—“এই পণেও আমারই জয়।”
Verse 10
युधिछिर उवाच राजपुत्रा इमे राजज्छोभन्ते यैर्विभूषिता: । कुण्डलानि च निष्काश्च सर्व राजविभूषणम् । एतन्मम धन राजंस्तेन दीव्याम्यहं त्वया,युधिष्ठिर बोले--राजन्! ये राजपुत्र जिन आभूषणोंसे विभूषित होकर शोभित हो रहे हैं, वे कुण्डल और गलेके स्वर्णभूषण आदि समस्त राजकीय आभूषण मेरे धन हैं। इन्हें दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ
যুধিষ্ঠির বললেন—রাজন! এই রাজপুত্ররা যে অলংকারে ভূষিত হয়ে দীপ্তিমান—কুণ্ডল, নিষ্ক এবং সমস্ত রাজকীয় ভূষণ—এটাই আমার ধন। হে রাজন, এগুলিই পণ রেখে আমি তোমার সঙ্গে পাশা খেলি।
Verse 11
वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! यह सुनकर छल-कपटका आश्रय लेनेवाले शकुनिने युधिष्ठिरसे निश्चयपूर्वक कहा--“लो, यह भी मैंने जीता”
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! এ কথা শুনে ছল-কপটের আশ্রয় নেওয়া শকুনি দৃঢ় নিশ্চিতভাবে যুধিষ্ঠিরকে বলল—“দেখো, এটাও আমি জিতেছি।”
Verse 12
युधिछिर उवाच श्यामो युवा लोहिताक्ष: सिंहस्कन्धो महाभुज: । नकुलो ग्लह एवैको विद्धयेतन्मम तद्धनम्,युधिष्ठिर बोले--श्यामवर्ण, तरुण, लाल नेत्रों और सिंहके समान कंधोंवाले महाबाहु नकुलको ही इस समय मैं दाँवपर रखता हूँ, इन्हींको मेरे दाँवका धन समझो
যুধিষ্ঠির বললেন—শ্যামবর্ণ, তরুণ, রক্তনয়ন, সিংহসম স্কন্ধবিশিষ্ট মহাবাহু নকুলকেই আমি এই পণে রাখছি। তাকেই আমার পণের ধন বলে জেনো।
Verse 13
शकुनिरुवाच प्रियस्ते नकुलो राजन् राजपुत्रो युधिष्ठिर । अस्माकं वशतां प्राप्तो भूय: केनेह दीव्यसे,शकुनि बोला--धर्मराज युधिष्ठिर![ आपके परमप्रिय राजकुमार नकुल तो हमारे अधीन हो गये, अब किस धनसे आप यहाँ खेल रहे हैं?
শকুনি বলল—হে রাজা যুধিষ্ঠির, তোমার প্রিয় রাজপুত্র নকুল তো এখন আমাদের অধীন হয়েছে। এবার আবার কোন ধন নিয়ে তুমি এখানে জুয়া খেলবে?
Verse 14
वैशम्पायन उवाच एवमुकक््त्वा तु तानक्षाउ्छकुनि: प्रत्यदीव्यत । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर शकुनिने पासे फेंके और युधिष्ठिससे कहा--'लो, इस दाँवपर भी मेरी ही विजय हुई”
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! এ কথা বলে শকুনি আবার পাশা নিক্ষেপ করে খেলল। তারপর সে যুধিষ্ঠিরকে বলল—“এই দাওয়াতেও আমারই জয়।”
Verse 15
युधिछिर उवाच अयं धर्मान् सहदेवोडनुशास्ति लोके हास्मिन् पण्डिताख्यां गतश्न । अनर्हता राजपुत्रेण तेन दीव्याम्यहं चाप्रियवत् प्रियेण,युधिष्ठिर बोले--ये सहदेव धर्मोंका उपदेश करते हैं। संसारमें पण्डितके रूपमें इनकी ख्याति है। मेरे प्रिय राजकुमार सहदेव यद्यपि दाँवपर लगानेके योग्य नहीं हैं, तो भी मैं अप्रिय वस्तुकी भाँति इन्हें दाँवपर रखकर खेलता हूँ
যুধিষ্ঠির বললেন—এই সহদেব এ জগতে ধর্মের শিক্ষা দেয় এবং পণ্ডিত বলে খ্যাতি লাভ করেছে। যদিও এই রাজপুত্রকে পণ করা উচিত নয়, তবু আমি প্রিয়জনকে অপ্রিয় বস্তুর মতো পণ করে খেলছি।
Verse 16
वैशम्पायन उवाच एतच्छुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रित: । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यह सुनकर छली शकुनिने उसी निश्चयके साथ युधिष्ठिससे कहा--“'यह दाँव भी मैंने ही जीता”
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! এ কথা শুনে, প্রতারণার আশ্রয় নিয়ে এবং সংকল্পে দৃঢ় হয়ে, শকুনি যুধিষ্ঠিরকে বলল—“এই দাওয়াতেও আমারই জয়।”
Verse 17
शकुनिरुवाच माद्रीपुत्रौ प्रियौ राजंस्तवेमौ विजितौ मया । गरीयांसौ तु ते मन्ये भीमसेनधनंजयौ,शकुनि बोला--राजन्! आपके ये दोनों प्रिय भाई माद्रीके पुत्र नकुल-सहदेव तो मेरे द्वारा जीत लिये गये, अब रहे भीमसेन और अर्जुन। मैं समझता हूँ, ये दोनों आपके लिये अधिक गौरवकी वस्तु हैं (इसीलिये आप इन्हें दाँवपर नहीं लगाते)
শকুনি বলল—হে রাজন, তোমার প্রিয় মাদ্রীপুত্র এই দুইজনকে আমি জিতে নিয়েছি। কিন্তু ভীমসেন ও ধনঞ্জয়কে আমি তোমার কাছে অধিক মর্যাদাসম্পন্ন ও গৌরবকর বলে মনে করি; তাই তুমি তাদের পণ রাখো না।
Verse 18
युधिछिर उवाच अधर्म चरसे नून॑ यो नावेक्षसि वै नयम् | यो नः सुमनसां मूढ विभेदं कर्तुमिच्छसि
যুধিষ্ঠির বললেন—নিশ্চয়ই তুমি অধর্মাচরণ করছ, কারণ তুমি নীতি ও যথোচিত আচরণ একেবারেই বিবেচনা করছ না। হে মূঢ়, আমরা যারা একমন ও এক উদ্দেশ্যে যুক্ত, আমাদের মধ্যে বিভেদ ঘটাতে তুমি চাও।
Verse 19
युधिष्ठिर बोले--ओ मूढ़! तू निश्चय ही अधर्मका आचरण कर रहा है, जो न्यायकी ओर नहीं देखता। तू शुद्ध हृदयवाले हमारे भाइयोंमें फ़ूट डालना चाहता है ।। शकुनिरुवाच गर्ते मत्त: प्रपतते प्रमत्त: स्थाणुमृच्छति । ज्येष्टो राजन् वरिष्ठोडसि नमस्ते भरतर्षभ
যুধিষ্ঠির বললেন—হে মূঢ়, তুমি নিশ্চয়ই অধর্মাচরণ করছ; কারণ তুমি ন্যায়ের দিকে তাকাও না। শুদ্ধহৃদয় আমাদের ভাইদের মধ্যে তুমি বিভেদ ঘটাতে চাও। শকুনি বলল—মত্ত মানুষ গর্তে পড়ে, আর অসতর্ক ব্যক্তি খুঁটির সঙ্গে ধাক্কা খায়। হে রাজন, আপনি জ্যেষ্ঠ ও শ্রেষ্ঠ; হে ভরতবংশের বৃষভ, আপনাকে প্রণাম।
Verse 20
शकुनि बोला--राजन्! धनके लोभसे अधर्म करनेवाला मतवाला मनुष्य नरककुण्डमें सरिता है। अधिक उन्मत्त हुआ ढूँठा काठ हो जाता है। आप तो आयुमें बड़े और गुणोंमें श्रेष्ठ हैं। भरतवंशविभूषण! आपको नमस्कार है ।। स्वप्ले तानि न दृश्यन्ते जाग्रतो वा युधिष्ठिर । कितवा यानि दीव्यन्त: प्रलपन्त्युत्कटा इव,धर्मराज युधिष्ठिर! जुआरी जूआ खेलते समय पागल होकर जो अनाप-शनाप बातें बक जाया करते हैं, वे न कभी स्वप्नमें दिखायी देती हैं और न जाग्रत्कालमें ही
ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির! জুয়ার নেশায় জুয়াড়িরা যে উন্মত্ত ও বেপরোয়া কথা বলে, তা না স্বপ্নে সত্য হয়ে দেখা দেয়, না জাগ্রত অবস্থায়; সেগুলিকে বাস্তব বা বাধ্যতামূলক বলে গণ্য করা উচিত নয়।
Verse 21
युधिछिर उवाच यो नः संख्ये नौरिव पारनेता जेता रिपूणां राजपुत्रस्तरस्वी । अनर्हता लोकवीरेण तेन दीव्याम्यहं शकुने फाल्गुनेन,युधिष्ठिरने कहा--शकुने! जो युद्धरूपी समुद्रमें हमलोगोंको नौकाकी भाँति पार लगानेवाले हैं तथा शत्रुओंपर विजय पाते हैं, वे लोकविख्यात वेगशाली वीर राजकुमार अर्जुन यद्यपि दाँवपर लगानेयोग्य नहीं हैं, तो भी उनको दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ
যুধিষ্ঠির বললেন—হে শকুনি! যিনি যুদ্ধরূপী সমুদ্রে আমাদের নৌকার মতো পার করিয়ে দেবেন, শত্রুজয়ী, লোকখ্যাত দ্রুতগামী বীর রাজপুত্র ফাল্গুন (অর্জুন)—তিনি পণ রাখার যোগ্য নন, তবু আমি তাঁকেই পণ রেখে তোমার সঙ্গে খেলছি।
Verse 22
वैशम्पायन उवाच ८ अा 408 निकृतिं समुपाश्रित: । शकुनिर्युधिष्ठटिरमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यह सुनकर कपटी शकुनिने पूर्ववत् विजयका निश्चय करके युधिष्ठिरसे कहा--“यह भी मैंने ही जीता”
বৈশম্পায়ন বললেন—প্রতারণার আশ্রয় নিয়ে শকুনি পূর্বের মতোই জয়ের নিশ্চিত ভঙ্গিতে যুধিষ্ঠিরকে বলল—“এটিও আমিই জিতেছি।”
Verse 23
शकुनिरुवाच अयं मया पाण्डवानां धनुर्धर: पराजित: पाण्डव: सव्यसाची । भीमेन राजन् दयितेन दीव्य यत् कैतवं पाण्डव तेडवशिष्टम्,शकुनि फिर बोला--राजन्! ये पाण्डवोंमें धनुर्धर वीर सव्यसाची अर्जुन मेरे द्वारा जीत लिये गये। पाण्डुनन्दन! अब आपके पास भीमसेन ही जुआरियोंको प्राप्त होनेवाले धनके रूपमें शेष हैं, अतः उन्हींको दाँवपर रखकर खेलिये
শকুনি বলল—হে রাজন! পাণ্ডবদের মধ্যে মহান ধনুর্ধর সব্যসাচী অর্জুনকে আমি পরাজিত করেছি। এখন, হে পাণ্ডব, তোমার কাছে প্রিয় ভীমই কেবল অবশিষ্ট; জুয়াড়িরা যে সম্পদ জিতে নেয়, সেইরূপ তাকে পণ রেখে খেল।
Verse 24
युधिछिर उवाच यो नो नेता युधि नः प्रणेता यथा वज्री दानवशत्रुरेक: । तिर्यक्प्रेक्षी संनत भ्रूर्महात्मा सिंहस्कन्धो यश्नू सदात्यमर्षी,युधिष्ठिरने कहा--राजन्! जो युद्धमें हमारे सेनापति और दानवशत्रु वज्रधारी इन्द्रके समान अकेले ही आगे बढ़नेवाले हैं; जो तिरछी दृष्टिसे देखते हैं, जिनकी भौंहें धनुषकी भाँति झुकी हुई हैं, जिनका हृदय विशाल और कंधे सिंहके समान हैं, जो सदा अत्यन्त अमर्षमें भरे रहते हैं, बलमें जिनकी समानता करनेवाला कोई पुरुष नहीं है, जो गदाधारियोंमें अग्रगण्य तथा अपने शत्रुओंको कुचल डालनेवाले हैं, उन्हीं राजकुमार भीमसेनको दाँवपर लगाकर मैं जूआ खेलता हूँ। यद्यपि वे इसके योग्य नहीं हैं
যুধিষ্ঠির বললেন—হে রাজন! যিনি যুদ্ধে আমাদের নেতা ও অগ্রসেনাপতি, দানবশত্রু বজ্রধারী ইন্দ্রের মতো একাই অগ্রসর হন; যাঁর দৃষ্টি তির্যক, ভ্রূ ধনুকের মতো নত, আত্মা মহৎ, কাঁধ সিংহসম, এবং যিনি সদা তীব্র ক্রোধে উন্মত্ত—সেই রাজপুত্র ভীমসেনকেই আমি এই পাশাখেলায় পণ রাখছি, যদিও তিনি পণ হওয়ার যোগ্য নন।
Verse 25
बलेन तुल्यो यस्य पुमान् न विद्यते गदाभूतामग्रय इहारिमर्दन: । अनर्हता राजपुत्रेण तेन दीव्याम्यहं भीमसेनेन राजन्,युधिष्ठिरने कहा--राजन्! जो युद्धमें हमारे सेनापति और दानवशत्रु वज्रधारी इन्द्रके समान अकेले ही आगे बढ़नेवाले हैं; जो तिरछी दृष्टिसे देखते हैं, जिनकी भौंहें धनुषकी भाँति झुकी हुई हैं, जिनका हृदय विशाल और कंधे सिंहके समान हैं, जो सदा अत्यन्त अमर्षमें भरे रहते हैं, बलमें जिनकी समानता करनेवाला कोई पुरुष नहीं है, जो गदाधारियोंमें अग्रगण्य तथा अपने शत्रुओंको कुचल डालनेवाले हैं, उन्हीं राजकुमार भीमसेनको दाँवपर लगाकर मैं जूआ खेलता हूँ। यद्यपि वे इसके योग्य नहीं हैं
যুধিষ্ঠির বললেন—হে রাজন! যার শক্তির তুল্য কোনো পুরুষ নেই, যে গদাধারীদের মধ্যে অগ্রগণ্য ও শত্রুমর্দনকারী—সেই রাজপুত্র ভীমসেনকে আমি পণ রেখে খেলছি; যদিও তিনি পণ হওয়ার যোগ্য নন।
Verse 26
वैशम्पायन उवाच 6 सकल निकृतिं समुपाश्रित: । शकुनिर्युधिष्ठटिरमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यह सुनकर शठताका आश्रय लेकर शकुनिने उसी निश्चयके साथ युधिष्ठिरसे कहा, “यह दाँव भी मैंने ही जीता”
বৈশম্পায়ন বললেন—সমস্ত প্রতারণার আশ্রয় নিয়ে শকুনি সেই একই নিশ্চিত ভঙ্গিতে যুধিষ্ঠিরকে বলল—“এই দাওটিও আমিই জিতেছি।”
Verse 27
शकुनिरुवाच बहु वित्त पराजैषी र्भ्रातृंश्व सहयद्विपान् । आचक्ष्व वित्त कौन्तेय यदि ते5स्त्यपराजितम्
শকুনি বলল—কুন্তীপুত্র! তুমি ভ্রাতৃগণসহ, এমনকি হাতিসহও, বহু ধন হারিয়েছ। এখন বলো, হে কৌন্তেয়, তোমার কাছে এমন কোন ধন অবশিষ্ট আছে যা এখনও পরাজিত হয়নি?
Verse 28
शकुनि बोला--कुन्तीनन्दन! आप अपने भाइयों और हाथी-घोड़ोंसहित बहुत धन हार चुके, अब आपके पास बिना हारा हुआ धन कोई अवशिष्ट हो, तो बतलाइये ।। युधिछिर उवाच अहं विशिष्ट: सर्वेषां भ्रातृणां दयितस्तथा । कुर्यामहं जित: कर्म स्वयमात्मन्युपप्लुते,युधिष्ठिरने कहा--मैं अपने सब भाइयोंमें बड़ा और सबका प्रिय हूँ; अतः अपनेको ही दाँवपर लगाता हूँ। यदि मैं हार गया तो पराजित दासकी भाँति सब कार्य करूँगा
যুধিষ্ঠির বললেন—আমি আমার সকল ভ্রাতার মধ্যে জ্যেষ্ঠ এবং তাদের সকলেরই প্রিয়। অতএব আমি নিজেকেই পণ রাখছি। যদি আমি পরাজিত হই, তবে জয়ী পক্ষের দাসের মতো আমার উপর আরোপিত সকল কাজই করব।
Verse 29
वैशम्पायन उवाच 488 अर निकृतिं समुपाश्रित: । शकुनिर्युधिष्ठटिरमभाषत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! यह सुनकर कपटी शकुनिने निश्चयपूर्वक अपनी जीत घोषित करते हुए युधिष्ठिससे कहा--'ये दाँव भी मैंने ही जीता”
বৈশম্পায়ন বললেন—এ কথা শুনে, প্রতারণার আশ্রয় নিয়ে শকুনি যুধিষ্ঠিরকে সম্বোধন করল; নিশ্চিত ভঙ্গিতে জয়ের ঘোষণা করে বলল—“এই পণও আমি জিতেছি।”
Verse 30
शकुनिरुवाच एतत् पापिष्ठमकरोर्यदात्मानमहारय: । शिष्टे सति धने राजन् पाप आत्मपराजय:,शकुनि फिर बोला--राजन्! आप अपनेको दाँवपर लगाकर जो हार गये, यह आपके द्वारा बड़ा अधर्म-कार्य हुआ। धनके शेष रहते हुए अपने-आपको हार जाना महान् पाप है
শকুনি বলল—রাজন! নিজেকেই পণ রেখে তুমি যে হেরে গেলে, তা তুমি অতি পাপময় কাজ করেছ। ধন অবশিষ্ট থাকতে নিজেরই পরাজয়—এ আত্মপরাজয় মহাপাপ।
Verse 31
वैशम्पायन उवाच एवमुकक््त्वा मताक्षस्तान् ग्लहे सर्वानवस्थितान् । पराजयं लोकवीरानुकत्वा राज्ञां पृूथक्ू-पृथक्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पासा फेंकनेकी विद्यामें निपुण शकुनिने राजा युधिष्ठिससे दाँव लगानेके विषयमें उक्त बातें कहकर सभामें बैठे हुए लोक-प्रसिद्ध वीर राजाओंको पृथक्-पृथक् पाण्डवोंकी पराजय सूचित की
বৈশম্পায়ন বললেন—এ কথা বলে, পাশা নিক্ষেপে নিপুণ শকুনি সভায় উপস্থিত লোকখ্যাত বীর রাজাদের কাছে একে একে পাণ্ডবদের পরাজয়ের ঘোষণা করল।
Verse 32
शकुनिरुवाच अस्ति ते वै प्रिया राजन् ग्लह एको5पराजित: । पणस्व कृष्णां पाञ्चालीं तया$5त्मानं पुनर्जय,तत्पश्चात् शकुनिने फिर कहा--राजन्! आपकी प्रियतमा द्रौपदी एक ऐसा दाँव है, जिसे आप अबतक नहीं हारे हैं; अत: पांचालराजकुमारी कृष्णाको आप दाँवपर रखिये और उसके द्वारा फिर अपनेको जीत लीजिये
শকুনি বলল—রাজন! তোমার এখনও একটি দাও বাকি আছে, যা তুমি হারাওনি—তোমার প্রিয় দ্রৌপদী। পাঞ্চালকন্যা কৃষ্ণাকে পণ রাখো; তাকে পণ করে আবার নিজেকেই জিতে নাও।
Verse 33
युधिछिर उवाच नैव हस्वा न महती न कृष्णा नातिरोहिणी । नीलकुज्चितकेशी च तया दीव्याम्यहं त्वया,युधिष्ठिरे कहा--जो न नाटी है न लंबी, न कृष्णवर्णा है न अधिक रक्तवर्णा तथा जिसके केश नीले और घूँघराले हैं, उस द्रौपदीको दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ जूआ खेलता हूँ
যুধিষ্ঠির বলল—সে না খাটো, না অতিশয় লম্বা; না শ্যামবর্ণা, না অতিরিক্ত রক্তিম; তার কেশ নীল-শ্যাম ও কুঞ্চিত। সেই দ্রৌপদীকেই পণ করে আমি তোমার সঙ্গে পাশা খেলব।
Verse 34
शारदोत्पलपत्राक्ष्या शारदोत्पलगन्धया । शारदोत्पलसेविन्या रूपेण श्रीसमानया,उसके नेत्र शरद्ू-ऋतुके प्रफुल्ल कमलदलके समान सुन्दर एवं विशाल हैं। उसके शरीरसे शारदीय कमलके समान सुगन्ध फैलती रहती है। वह शरद्-ऋतुके कमलोंका सेवन करती है तथा रूपमें साक्षात् लक्ष्मीके समान है
তার চোখ শরৎকালের প্রস্ফুটিত পদ্মপত্রের মতো বিস্তৃত ও মনোহর; তার দেহ থেকে শরৎ-পদ্মের মতো সুগন্ধ ছড়ায়; সে শরৎ-কমলে রমণ করে, আর রূপে সে যেন স্বয়ং শ্রী (লক্ষ্মী)-সমা।
Verse 35
तथैव स्यादानृशंस्यात् तथा स्यथाद् रूपसम्पदा । तथा स्याच्छीलसम्पत्त्या यामिच्छेत् पुरुष: स्त्रियम्,पुरुष जैसी स्त्री प्राप्त करनेकी अभिलाषा रखता है, उसमें वैसा ही दयाभाव है, वैसी ही रूपसम्पत्ति है तथा वैसे ही शील-स्वभाव हैं
পুরুষ যে রকম স্ত্রী কামনা করে, সে তেমনই করুণায়, তেমনই রূপসম্পদে, এবং তেমনই শীল-স্বভাবের গুণে সমৃদ্ধ হয়।
Verse 36
सर्वैगुणैर्हि सम्पन्नामनुकूलां प्रियंवदाम् । यादृशीं धर्मकामार्थसिद्धिमिच्छेन्नर: स्त्रियम्,वह समस्त सदगुणोंसे सम्पन्न तथा मनके अनुकूल और प्रिय वचन बोलनेवाली है। मनुष्य धर्म, काम और अर्थकी सिद्धिके लिये जैसी पत्नीकी इच्छा रखता है, द्रौपदी वैसी ही है
সে সর্বগুণে সম্পন্ন, মনোমতো এবং মধুরভাষিণী। ধর্ম, কাম ও অর্থের সিদ্ধির জন্য মানুষ যে রকম স্ত্রী কামনা করে, সে তেমনই।
Verse 37
चरम॑ संविशति या प्रथम प्रतिबुध्यते । आगोपालाविपालेभ्य: सर्व वेद कृताकृतम्,वह ग्वालों और भेड़ोंके चरवाहोंसे भी पीछे सोती और सबसे पहले जागती है। कौन- सा कार्य हुआ और कौन-सा नहीं हुआ, इन सबकी वह जानकारी रखती है
সে সবার শেষে শোয় এবং সবার আগে জাগে—গোয়াল ও মেষপালকদের থেকেও পরে শয়ন করে। কী করা হয়েছে আর কী বাকি আছে—সব কিছুরই সে হিসাব রাখে।
Verse 38
आभाति पद्मवद् वक्त्र॑ सस्वेदं मल्लिकेव च । वेदिमध्या दीर्घकेशी ताम्रास्था नातिलोमशा,उसका स्वेदबिन्दुओंसे विभूषित मुख कमलके समान सुन्दर और मल्लिकाके समान सुगन्धित है। उसका मध्यभाग वेदीके समान कृश दिखायी देता है। उसके सिरके केश बड़े- बड़े हैं, मुख और ओछ्ठ अरुणवर्णके हैं तथा उसके अंगोंमें अधिक रोमावलियाँ नहीं हैं
ঘামের বিন্দুতে অলংকৃত তার মুখ পদ্মের মতো দীপ্ত, আর মল্লিকার মতো সুগন্ধময়। তার কোমর যজ্ঞবেদির মধ্যভাগের মতো সরু; কেশ দীর্ঘ; ঠোঁট তাম্র-লাল; এবং অঙ্গে অতিরিক্ত লোম নেই।
Verse 39
तयैवंविधया राजन् पाज्चाल्याहं सुमध्यया । ग्लहं दीव्यामि चार्वड़या द्रौपद्या हन्त सौबल,सुबलपुत्र! ऐसी सर्वांगसुन्दरी सुमध्यमा पांचाल-राजकुमारी द्रौपदीको दाँवपर रखकर मैं तुम्हारे साथ जूआ खेलता हूँ; यद्यपि ऐसा करते हुए मुझे महान् कष्ट हो रहा है
রাজন! এইরূপ সর্বাঙ্গসুন্দরী, সুমধ্যা পাঞ্চালী দ্রৌপদীকে পণ করে আমি তোমার সঙ্গে পাশা খেলছি। হায়, সৌবল—সুবলের পুত্র! তা করতেই আমার অন্তরে মহাদুঃখ জাগছে।
Verse 40
वैशम्पायन उवाच एवमुक्ते तु वचने धर्मराजेन धीमता । धिग्धिगित्येव वृद्धानां सभ्यानां नि:ःसृता गिर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! बुद्धिमान् धर्मराजके ऐसा कहते ही उस सभामें बैठे हुए बड़े-बूढ़े लोगोंके मुखसे “धिक्कार है, धिक््कार है” की आवाज आने लगी
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! প্রজ্ঞাবান ধর্মরাজ এ কথা বলামাত্রই সভায় বসা বৃদ্ধজনদের মুখ থেকে ‘ধিক্ ধিক্’ ধ্বনি বেরিয়ে এল।
Verse 41
चुक्षुभे सा सभा राजन राज्ञां संजज्ञिरे शुच: | भीष्मद्रोणकृपादीनां स्वेदश्व समजायत,राजन्! उस समय सारी सभामें हलचल मच गयी। राजाओंको बड़ा शोक हुआ। भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदिके शरीरसे पसीना छूटने लगा
রাজন! তখন সমগ্র সভা অস্থির হয়ে উঠল; রাজাদের মনে গভীর শোক জাগল। ভীষ্ম, দ্রোণ ও কৃপ প্রমুখের দেহেও ঘাম ফুটে উঠল।
Verse 42
शिरो गृहीत्वा विदुरो गतसत्त्व इवाभवत् | आस्ते ध्यायन्नधोवक्त्रो नि:श्वसन्निव पन्नग:,विदुरजी तो दोनों हाथोंसे अपना सिर थामकर बेहोश-से हो गये। वे फुँफकारते हुए सर्पकी भाँति उच्छवास लेकर मुँह नीचे किये हुए गम्भीर चिन्तामें निमग्न हो बैठे रह गये
বৈশম্পায়ন বললেন—বিদুর দুই হাতে মাথা চেপে ধরলেন; যেন শক্তি ও চেতনা হারালেন। মুখ নত করে তিনি গভীর চিন্তায় নিমগ্ন হয়ে বসে রইলেন, অন্তরের যন্ত্রণায় সাপের মতো ভারী নিশ্বাস ফেলতে লাগলেন।
Verse 43
(बाह्लीक: सोमदत्तश्न प्रातीपेय: ससंजय: । द्रौणिभूरिश्रवाश्वैव युयुत्सुर्धतराष्ट्रज: ।। हस्तौ पिंषन्नधोवक्त्रा नि:श्वसनन््त इवोरगा: ।।) बाह्लीक, प्रतीपके पौत्र सोमदत्त, भीष्म, संजय, अअश्वत्थामा, भूरिश्रवा तथा धृतराष्ट्रपुत्र युयुत्सु--ये सब मुँह नीचे किये सर्पोंके समान लंबी साँसें खींचते हुए अपने दोनों हाथ मलने लगे। धृतराष्ट्रस्तु तं हृष्ट: पर्यपृच्छत् पुन: पुनः । कि जित॑ कि जितमिति ह्याकारं नाभ्यरक्षत,धृतराष्ट्र मन-ही-मन प्रसन्न हो उनसे बार-बार पूछ रहे थे, “क्या हमारे पक्षकी जीत हो रही है?' वे अपनी प्रसन्नताकी आकृतिको न छिपा सके
বৈশম্পায়ন বললেন—বাহ্লীক, প্রতীপের পৌত্র সোমদত্ত, সঞ্জয়, দ্রোণের পুত্র অশ্বত্থামা, ভূরিশ্রবা এবং ধৃতরাষ্ট্রপুত্র যুযুৎসু—এরা সকলেই মুখ নত করে সাপের মতো দীর্ঘ নিশ্বাস ফেলতে ফেলতে দুই হাত ঘষতে লাগল। কিন্তু ধৃতরাষ্ট্র অন্তরে আনন্দিত হয়ে বারবার জিজ্ঞেস করলেন—“কী জিতলে? কী জিতলে?”—এবং নিজের আনন্দের লক্ষণ গোপন করতে পারলেন না।
Verse 44
जहर्ष कर्णोडतिभूशं सह दुःशासनादिशभि: । इतरेषां तु सभ्यानां नेत्रेभ्य: प्रापतज्जलम्,दुःशासन आदिके साथ कर्णको तो बड़ा हर्ष हुआ; परंतु अन्य सभासदोंकी आँखोंसे आँसू गिरने लगे
বৈশম্পায়ন বললেন—দুঃশাসন প্রমুখের সঙ্গে কর্ণ অত্যন্ত উল্লসিত হল; কিন্তু সভায় উপস্থিত অন্যদের চোখ থেকে অশ্রু ঝরে পড়ল।
Verse 45
सौबलस्त्वभिधायैवं जितकाशी मदोत्कट: । जितमित्येव तानक्षान् पुनरेवान्वपद्यत,सुबलपुत्र शकुनिने मैंने यह भी जीत लिया, ऐसा कहकर पासोंको पुनः उठा लिया। उस समय वह विजयोल्लाससे सुशोभित और मदोन्मत्त हो रहा था
বৈশম্পায়ন বললেন—সুবলের পুত্র শকুনি এ কথা বলে যে “আমি জিতেছি”, জয়ের গর্বে উন্মত্ত হয়ে আবারও পাশাগুলি হাতে তুলে নিল।
Verse 65
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि द्रौपदीपराजये पठचषष्टितमो5ध्याय: ।। ६५ | इस प्रकार श्रीमह्ाभारत सभापर्वके अन्तर्गत झ्टूतपर्वमें द्रौपदीपराजयविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত দ্যূতপর্বে দ্রৌপদী-পরাজয় (অপমান) বিষয়ক পঁয়ষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 131
वैशम्पायन उवाच 52886: 4 २#44028 निकृतिं समुपाश्रित: । शकुनिर्युधिष्ठटिरमभाषत
বৈশম্পায়ন বললেন—প্রতারণার কৌশল অবলম্বন করে শকুনি যুধিষ্ঠিরকে সম্বোধন করল।
The dilemma concerns how a wronged party should respond to provocation and humiliation: whether to preserve social order through restraint and disciplined speech, or to internalize grievance and escalate hostility.
Peace is treated as an outcome of cultivated judgment: the exemplary person refuses harmful speech, remembers beneficence over injury, and sets down conflict rather than carrying it forward—thereby protecting both polity and inner composure.
No explicit phalaśruti is stated; the meta-function is narrative-ethical closure: the counsel is framed as an elder’s welfare-oriented instruction, and the concluding departure scene marks a procedural transition back to lawful governance.