Adhyaya 64
Sabha ParvaAdhyaya 6422 Verses

Adhyaya 64

अध्याय ६४ — सभामध्ये क्रोध-निवारणम् (Restraint of wrath in the royal assembly)

Upa-parva: Dyūta Parva (Dice-Match Episode within Sabhā Parva)

The chapter presents a sequence of courtly reactions following severe provocation. Karṇa opens by framing the situation as unprecedented conduct among women renowned for beauty, implying normative shock. In contrast, Draupadī (Kṛṣṇā, Pāñcālī) is described as a source of śānti for the Pāṇḍavas—metaphorically a boat carrying those sinking in unfordable waters, emphasizing stabilizing counsel amid institutional crisis. Vaiśaṃpāyana then narrates Bhīma’s intense indignation in the Kuru assembly and introduces a maxim attributed to Devala: a man’s three ‘lights’—offspring, action, and knowledge—persist beyond the body, linking personal injury to generational and reputational continuity. A question is raised about how lineage can arise if marital honor is violated, foregrounding anxiety about social order. Arjuna responds with a normative statement on noble speech: the eminent do not trade in harsh words; the virtuous remember merit rather than enmity, implying strategic restraint and moral self-verification. Bhīma, however, urges immediate elimination of assembled adversaries and offers sovereignty to Yudhiṣṭhira, escalating the rhetoric of retaliation. The narration intensifies Bhīma’s embodied rage through imagery of heat, smoke, sparks, and an apocalyptic countenance. Finally, Yudhiṣṭhira physically restrains Bhīma and approaches Dhṛtarāṣṭra with folded hands, reasserting procedural containment and hierarchical petition as the chosen mode of action within sabhā-dharma.

Chapter Arc: सभामण्डप में दुर्योधन का अहंकार उफनता है—वह विदुर पर ‘पराये यश’ की श्लाघा करने और अपने ही कुल के विरुद्ध झुकने का आरोप लगाकर कटु वाणी से आक्रमण करता है। → दुर्योधन विदुर को ‘पोषक का उपहास करने वाले’ और ‘भर्तृघ्न’ के समान बताकर उनकी निष्ठा पर प्रहार करता है; वह मित्रता और हितवचन को भी शत्रुता मानकर विदुर को दरबार से हट जाने का आदेश देता है। → विदुर प्रत्युत्तर में राजधर्म का कठोर सत्य रखते हैं—राजाओं के चित्त डगमगाते हैं; वे पहले सांत्वना देते हैं और फिर ‘मुसल’ समान प्रहार करते हैं। वे दुर्योधन को चेताते हैं कि विषधर सर्पों और नेत्र-विष वाले क्रोध को विद्वान् नहीं उकसाते—पर दुर्योधन उसी विष को जगाने पर तुला है। → दुर्योधन का निर्णय अटल रहता है—वह विदुर को स्पष्ट कह देता है कि जहाँ इच्छा हो वहाँ चले जाएँ; हितवचन का स्थान सभा में नहीं, क्योंकि वह उसे अपमान प्रतीत होता है। विदुर सत्य कहकर भी राजहृदय को न मोड़ पाने की विवशता स्वीकारते हैं। → विदुर के निष्कासन/विमुखीकरण के साथ हस्तिनापुर में नीति की ज्योति मंद पड़ती है—अब द्यूत और विनाश की राह पर कौन रोकेगा?

Shlokas

Verse 1

2: छा 5 - कुरुकुलके एक पूर्वपुरुष । चतुष्षष्टितमो<5 ध्याय: दुर्योधनका विदुरको मा और विदुरका उसे चेतावनी ना दुर्योधन उवाच परेषामेव यशसा श्लाघसे त्वं सदा क्षत्त: कुत्सयन्‌ धार्तराष्ट्रानू | जानीमहे विदुर यत्‌ प्रियस्त्व॑ बालानिवास्मानवमन्यसे नित्यमेव,दुर्योधन बोला--विदुर! तुम सदा हमारे शत्रुओंके ही सुयशकी डींग हाँकते रहते हो और हम सभी धूृतराष्ट्रके पुत्रोंकी निन्दा किया करते हो। तुम किसके प्रेमी हो, यह हम जानते हैं, हमें मूर्ख समझकर तुम सदा हमारा अपमान ही करते रहते हो

দুর্যোধন বলল—হে ক্ষত্তা (বিদুর)! তুমি সর্বদা আমাদের প্রতিপক্ষদেরই যশ গেয়ে বেড়াও এবং ধৃতরাষ্ট্রের পুত্রদের নিন্দা করো। বিদুর, তোমার স্নেহ কোথায়, আমরা জানি; আমাদের শিশু ভেবে তুমি নিরন্তর অবজ্ঞা করো।

Verse 2

स विज्ञेय: पुरुषो<न्यत्रकामो निन्दाप्रशंसे हि तथा युनक्ति | जिह्दा कथं ते हृदयं व्यनक्ति यो न ज्यायस: कृथा मनस: प्रातिकूल्यम्‌,जो दूसरोंको चाहनेवाला है, वह मनुष्य पहचानमें आ जाता है; क्योंकि वह जिसके प्रति द्वेष होता है, उसकी निन्‍्दा और जिसके प्रति राग होता है, उसकी प्रशंसामें संलग्न रहता है। तुम्हारा हृदय हमारे प्रति किस प्रकार द्वेषसे परिपूर्ण है, यह बात तुम्हारी जिह्ना प्रकट कर देती है। तुम अपनेसे श्रेष्ठ पुरुषोंके प्रति इस प्रकार हृदयका द्वेष न प्रकट करो

যে ব্যক্তি অন্যের দিকে আকৃষ্ট, তাকে চেনা যায়; কারণ সে যাকে ঘৃণা করে তার নিন্দায় এবং যাকে ভালোবাসে তার প্রশংসায় লিপ্ত থাকে। আমাদের প্রতি তোমার হৃদয়ে কী রকম বৈর আছে, তা তোমার জিহ্বাই প্রকাশ করে। তোমার চেয়ে শ্রেষ্ঠদের প্রতি মনের এই বিরুদ্ধতা এভাবে প্রকাশ কোরো না।

Verse 3

उत्सज्े च व्याल इवाहितोडसि माजरिवत्‌ पोषकं चोपहंसि । भर्तृघ्न॑ त्वां न हि पापीय आहु- स्तस्मात्‌ क्षत्त: कि न बिभेषि पापात्‌,हमारे लिये तुम गोदमें बैठे साँपके समान हो और बिलावकी भाँति पालनेवालेका ही गला घोंट रहे हो। तुम स्वामिद्रोह रखते हो, फिर भी तुम्हें लोग पापी नहीं कहते? विदुर! तुम इस पापसे डरते क्यों नहीं?

তুমি আমাদের জন্য কোলে পোষা সাপের মতো—সুযোগ পেলেই দংশন করো। আবার বিড়ালের মতো যে তোমাকে পোষে, তারই ওপর ঝাঁপিয়ে পড়ে উপকারীর অনিষ্ট করতে চাও। প্রভুদ্রোহী হয়েও লোকে তোমাকে নিকৃষ্টতম পাপী বলে না! তাই হে ক্ষত্তা (বিদুর), তুমি কেন এই পাপকে ভয় করো না?

Verse 4

जित्वा शत्रून्‌ू फलमाप्तं महद्‌ वै मास्मान्‌ क्षत्त: परुषाणीह वोच: । द्विषद्धिस्त्वं सम्प्रयोगाभिनन्दी मुहुर्देषं यासि नः सम्प्रयोगात्‌,हमने शत्रुओंको जीतकर (धनरूप) महान्‌ फल प्राप्त किया है। विदुर! तुम हमसे यहाँ कटु वचन न बोलो। तुम शत्रुओंके साथ मेल करके प्रसन्न हो रहे हो और हमारे साथ मेल करके भी अब (हमारे शत्रुओंकी प्रशंसा करके) हमलोगोंके बारंबार द्वेषके पात्र बन रहे हो

শত্রুদের জয় করে আমরা (ধনরূপ) মহৎ ফল লাভ করেছি। ক্ষত্তা বিদুর, এখানে আমাদের প্রতি কঠোর কথা বলো না। তুমি শত্রুপক্ষের সঙ্গে যোগসাজশে আনন্দ পাও, আর আমাদের সঙ্গেও থেকেও—শত্রুদের প্রশংসা করে—বারবার আমাদের বিদ্বেষের পাত্র হয়ে ওঠো।

Verse 5

अमित्रतां याति नरो$क्षमं ब्रुवन्‌ निगूहते गुह्ममित्रसंस्तवे । तदाश्रितो5पत्रप कि नु बाधसे यदिच्छसि त्वं तदिहाभिभाषसे,अक्षम्य कटुवचन बोलनेवाला मनुष्य शत्रु बन जाता है। शत्रुकी प्रशंसा करते समय भी लोग अपने गूढ़ मनोभावको छिपाये रखते हैं। निर्लज्ज विदुर! तुम भी उसी नीतिका आश्रय लेकर चुप क्‍यों नहीं रहते? हमारे काममें बाधा क्‍यों डालते हो? तुम जो मनमें आता है, वही बक जाते हो

যে মানুষ ক্ষমার অযোগ্য কঠোর কথা বলে, সে শত্রুতে পরিণত হয়। শত্রুর প্রশংসা করলেও লোকেরা অন্তরের গোপন ভাব লুকিয়ে রাখে। নির্লজ্জ বিদুর! তুমিও সেই নীতিই অবলম্বন করে চুপ থাকো না কেন? আমাদের কাজে বাধা দাও কেন? যা মনে আসে তাই এখানে বলে ফেলো।

Verse 6

मा नो5वमंस्था विद्य मनस्तवेदं शिक्षस्व बुद्धि स्थविराणां सकाशात्‌ । यशो रक्षस्व विदुर सम्प्रणीतं मा व्यापृत: परकार्येषु भूस्त्वम्‌,विदुर! तुम हमलोगोंका अपमान न करो, तुम्हारे इस मनको हम जान चुके हैं। तुम बड़े-बूढ़ोंके निकट बैठकर बुद्धि सीखो। अपने पूर्वार्जित यशकी रक्षा करो। दूसरोंके कामोंमें हस्तक्षेप न करो

হে জ্ঞানী বিদুর, আমাদের অবমাননা কোরো না; তোমার মনের এই প্রবণতা আমরা জেনে গেছি। প্রবীণদের কাছে বসে বিবেক শিখো। তোমার অর্জিত যশ রক্ষা করো। অন্যের কাজে ব্যস্ত হয়ো না—হস্তক্ষেপ কোরো না।

Verse 7

अहं कर्तेति विदुर मा च मंस्था मा नो नित्यं परुषाणीह वोच: । न त्वां पृच्छामि विदुर यद्धितं मे स्वस्ति क्षत्तर्मा तितिक्षून्‌ क्षिणु त्वम्‌

বিদুর, ‘আমিই কর্তা’—এমন ভাবনা কোরো না, আর এখানে আমাদের প্রতি বারবার কঠোর কথা বলো না। বিদুর, আমার মঙ্গলের জন্য কী উচিত—তা আমি তোমার কাছে জিজ্ঞেস করছি না। ক্ষত্তা, মঙ্গল হোক তোমার—যাও; যারা ধৈর্যশীল ও সহিষ্ণু, তাদেরই সেবা করো।

Verse 8

विदुर! “मैं ही कर्ता-धर्ता हूँ" ऐसा न समझो और हमें प्रतिदिन कड़वी बातें न कहो। मैं अपने हितके सम्बन्धमें तुमसे कोई सलाह नहीं पूछता हूँ। तुम्हारा भला हो। हम तुम्हारी कठोर बातें सहते चले जाते हैं, इसलिये हम क्षमाशीलोंको तुम अपने वचनरूपी बाणोंसे छेदो मत ।। एक: शास्ता न द्वितीयो5स्ति शास्ता गर्भ शयानं पुरुषं शास्ति शास्ता । तेनानुशिष्ट: प्रवणादिवाम्भो यथा नियुक्तोडस्मि तथा भवामि,देखो, इस जगत्‌का शासन करनेवाला एक ही है, दूसरा नहीं। वही शासक माताके गर्भमें सोये हुए शिशुपर भी शासन करता है; उसीके द्वारा मैं भी अनुशासित हूँ। अतः जैसे जल स्वाभाविक ही नीचेकी ओर जाता है, वैसे ही वह जगन्नियन्ता मुझे जिस काममें लगाता है, मैं वैसे ही उसी काममें लगता हूँ

বিদুর, ‘আমিই কর্তা-ধর্তা’—এমন ভাবনা কোরো না, আর প্রতিদিন আমাদের তিক্ত কথা শোনাবে না। আমার লাভ-ক্ষতির বিষয়ে আমি তোমার পরামর্শ চাই না। তোমার মঙ্গল হোক। আমরা তোমার কঠোর বাক্য সহ্য করে এসেছি; তাই আমাদের মতো সহিষ্ণুদের বাক্যরূপ বাণে বিদ্ধ কোরো না। দেখো—এই জগতের শাসক এক জনই, দ্বিতীয় নেই। সেই শাসক মাতৃগর্ভে শয়নরত পুরুষকেও শাসন করেন। তাঁরই শাসনে আমিও নিয়ন্ত্রিত; তাই যেমন জল স্বভাবতই ঢাল বেয়ে নীচে নামে, তেমনি বিশ্বনিয়ন্তা আমাকে যে কাজে নিয়োজিত করেন, আমি তেমনই করি।

Verse 9

भिनत्ति शिरसा शैलमहिं भोजयते च य: । धीरेव कुरुते तस्य कार्याणामनुशासनम्‌ | यो बलादनुशास्तीह सोअमित्रं तेन विन्दति,जिनसे प्रेरित होकर मनुष्य अपने सिरसे पर्वतको विदीर्ण करना चाहता है--अर्थात्‌ पत्थरपर सिर पटककर स्वयं ही अपनेको पीड़ा देता है तथा जिनकी प्रेरणासे मनुष्य सर्पको भी दूध पिलाकर पालता है, उसी सर्वनियन्ताकी बुद्धि समस्त जगत्‌के कार्योंका अनुशासन करती है। जो बलपूर्वक किसीपर अपना उपदेश लादता है, वह अपने उस व्यवहारके द्वारा उसे अपना शत्रु बना लेता है

দুর্যোধন বলল—যে নিজের মাথা দিয়ে পাহাড় ভাঙতে যায়, আর যে সাপকে দুধ খাইয়ে লালন করে, সে ভ্রান্ত প্রেরণায় নিজেকেই আঘাত করে। তবু স্থির, সর্বনিয়ন্তা বুদ্ধিই সকল কাজের বিধান করে। কিন্তু যে এখানে বলপ্রয়োগে অন্যদের শাসন করতে চায়, সে সেই আচরণেই তাদের শত্রু করে তোলে।

Verse 10

मित्रतामनुवृत्तं तु समुपेक्षेतर पण्डित: । प्रदीप्य य: प्रदीप्ताग्निं प्राक्‌ चिरं नाभिधावति । भस्मापि न स विन्देत शिष्टं क्वचन भारत,इस प्रकार मित्रताका अनुसरण करनेवाले मनुष्यको दविद्वान्‌ पुरुष त्याग दे। भारत! जो पहले कपूरमें आग लगाकर उसके प्रज्वलित हो जानेपर देरतक उसे बुझानेके लिये नहीं दौड़ता, वह कहीं उसकी बची हुई राख भी नहीं पाता

যে কেবল বন্ধুত্বের নাম অনুসরণ করে, কিন্তু কাজে উদাসীন থাকে—পণ্ডিতের উচিত তাকে ত্যাগ করা। হে ভারত! যে আগুন জ্বালিয়ে, তা দাউদাউ করে উঠলে সময়মতো নেভাতে ছুটে যায় না, সে কোথাও তার অবশিষ্ট ছাইও পায় না—তেমনি সংকটমুহূর্তে অবহেলা যা বাঁচতে পারত তাকেও নষ্ট করে।

Verse 11

न वासयेत्‌ पारवर्ग्य द्विषन्तं विशेषत: क्षत्तरहितं मनुष्यम्‌ | स यत्रेच्छसि विदुर तत्र गच्छ सुसान्त्विता हासती स्त्री जहाति,विदुर! जो शत्रुका पक्षपाती हो, अपनेसे द्वेष रखता हो और अहित करनेवाला हो, ऐसे मनुष्यको घरमें नहीं रहने देना चाहिये। अतः तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, चले जाओ। कुलटा सत्रीको मीठी-मीठी बातोंद्वारा कितनी ही सान्त्वना दी जाय, वह पतिको छोड़ ही देती है

দুর্যোধন বলল—বিদুর! যে শত্রুপক্ষের পক্ষপাতী, আমাদের প্রতি বিদ্বেষী এবং অনিষ্ট করতে উদ্যত—এমন মানুষকে গৃহে রাখা উচিত নয়। অতএব তুমি যেখানে ইচ্ছা যাও। যেমন চরিত্রহীনা স্ত্রীকে যতই মধুর সান্ত্বনা দেওয়া হোক, সে তবু স্বামীকে ত্যাগ করেই।

Verse 12

विदुर उवाच एतावता पुरुष ये त्यजन्ति तेषां वृत्तं साक्षिवद्‌ ब्रूहि राजन्‌ । राज्ञां हि चित्तानि परिप्लुतानि सान्त्वं दत्त्वा मुसलैर्घातयन्ति,विदुरने कहा--राजन्‌! जो इस प्रकार मनके प्रतिकूल किंतु हितभरी शिक्षा देनेमात्रसे अपने हितैषी पुरुषको त्याग देते हैं, उनका वह बर्ताव कैसा है, यह आप साक्षीकी भाँति पक्षपातरहित होकर बताइये; क्योंकि राजाओंके चित्त द्वेषसे भरे होते हैं, इसलिये वे सामने मीठे वचनोंद्वारा सान्त्वना देकर पीठ-पीछे मूसलोंसे आघात करवाते हैं

বিদুর বললেন—হে রাজন! যারা মনকে অপ্রিয় হলেও কল্যাণকর উপদেশ দেওয়ার মাত্রেই হিতৈষীকে ত্যাগ করে, তাদের সেই আচরণ কেমন—আপনি সাক্ষীর মতো নিরপেক্ষ হয়ে বলুন। কারণ রাজাদের হৃদয় প্রায়ই বিদ্বেষে প্লাবিত থাকে; তারা সামনে মধুর বাক্যে সান্ত্বনা দেয়, আর পেছন থেকে গদার আঘাত করায়।

Verse 13

अबालत्वं मन्यसे राजपुत्र बालो5हमित्येव सुमन्दबुद्धे । यः सौहदे पुरुषं स्थापयित्वा पश्चादेनं दूषयते स बाल:,राजकुमार दुर्योधन! तुम्हारी बुद्धि बड़ी मन्द है। तुम अपनेको विद्वान्‌ और मुझे मूर्ख समझते हो। जो किसी पुरुषको सुहृदके पदपर स्थापित करके फिर स्वयं ही उसपर दोषारोपण करता है, वही मूर्ख है

রাজপুত্র দুর্যোধন, হে মন্দবুদ্ধি! তুমি নিজেকে অশিশু মনে করো আর আমাকে শিশু ভাবো। কিন্তু যে প্রথমে কাউকে সুহৃদ্‌র আসনে বসিয়ে পরে আবার তাকেই দোষারোপ করে, সেই-ই প্রকৃত মূর্খ।

Verse 14

न श्रेयसे नीयते मन्दबुद्धि: स्त्री श्रोत्रियस्थेव गृहे प्रदुष्टा । ध्रुवं न रोचेद्‌ भरतर्षभस्य पति: कुमार्या इव षष्टिवर्ष:,जैसे श्रोत्रियके घरमें दुराचारिणी स्त्री कल्याणमय अग्निहोत्र आदि कार्योंमें नहीं लगायी जा सकती, उसी प्रकार मन्दबुद्धि पुरुषको कल्याणके मार्गपर नहीं लगाया जा सकता। जैसे कुमारी कन्याको साठ वर्षका बूढ़ा पति नहीं पसंद आ सकता, उसी प्रकार भरतवंशशिरोमणि दुर्योधनको निश्चय ही मेरा उपदेश रुचिकर नहीं प्रतीत होता

যেমন শ्रोত্রিয় ব্রাহ্মণের গৃহে দুষ্কর্মপরায়ণা স্ত্রীকে কল্যাণকর অগ্নিহোত্রাদি কর্মে নিয়োজিত করা যায় না, তেমনি মন্দবুদ্ধি পুরুষকে শ্রেয়ের পথে চালিত করা যায় না। আর যেমন কুমারী কন্যার কাছে ষাট বছরের বৃদ্ধ স্বামী রুচিকর নয়, তেমনি ভরতশ্রেষ্ঠ দুর্যোধনের কাছে আমার উপদেশ নিশ্চয়ই মনোরম বলে প্রতীয়মান হয় না।

Verse 15

अतः प्रियं चेदनुकाड्क्षसे त्वं सर्वेषु कार्येषु हिताहितेषु । स्त्रियश्ष राजन्‌ जडपडजुकांश्व पृच्छ त्वं वै तादृशांश्वैव सर्वान्‌,राजन! यदि तुम भले-बुरे सभी कार्योमें केवल चिकनी-चुपड़ी बातें ही सुनना चाहते हो, तो स्त्रियों, मूर्खों, पंगुओं तथा उसी तरहके अन्य सब मनुष्योंसे सलाह लिया करो

রাজন! যদি তুমি হিত-অহিত সকল কাজে কেবল শ্রুতিমধুর কথাই শুনতে চাও, তবে নারীদের, জড়বুদ্ধিদের, পঙ্গুদের এবং সেইরূপ অন্যান্য সকলের কাছেই পরামর্শ গ্রহণ করো।

Verse 16

लभ्यते खलु पापीयान्‌ नरो नु प्रियवागिह । अप्रियस्य हि पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभ:,इस संसारमें सदा मनको प्रिय लगनेवाले वचन बोलनेवाला महापापी मनुष्य भी अवश्य मिल सकता है; परंतु हितकर होते हुए भी अप्रिय वचनको कहने और सुननेवाले दोनों दुर्लभ हैं

এই সংসারে মনোহর কথা বলে এমন মহাপাপী মানুষও নিশ্চয়ই পাওয়া যায়; কিন্তু হিতকর হলেও অপ্রিয় কথা যে বলে, এবং যে তা শোনে—উভয়েই দুর্লভ।

Verse 17

यस्तु धर्मपरश्न स्याद्धित्वा भर्तुः प्रियाप्रिये | अप्रियाण्याह पथ्यानि तेन राजा सहायवान्‌,जो धर्ममें तत्पर रहकर स्वामीके प्रिय-अप्रियका विचार छोड़कर अप्रिय होनेपर भी हितकर वचन बोलता है, वही राजाका सच्चा सहायक है

যে ব্যক্তি ধর্মে নিবিষ্ট থেকে প্রভুর প্রিয়-অপ্রিয়ের চিন্তা ত্যাগ করে, অপ্রিয় হলেও পাথ্য ও হিতকর কথা বলে—সেই-ই রাজার সত্য সহায়; এমন সহায় থাকলে রাজা প্রকৃতই সমর্থ হয়।

Verse 18

अव्याधिजं कटुजं तीक्ष्णमुष्णं यशोमुषं परुष॑ पूतिगन्धि । सतां पेयं यन्न पिबन्त्यसन्तो मन्युं महाराज पिब प्रशाम्य,महाराज! जो पी लेनेपर मानसिक रोगोंका नाश करनेवाला है, कड़वी बातोंसे जिसकी उत्पत्ति होती है, जो तीखा, तापदायक, कीर्तिनाशक, कठोर और दूषित प्रतीत होता है, जिसे दुष्टलोग नहीं पी सकते तथा जो सत्पुरुषोंके पीनेकी वस्तु है, उस क्रोधको पीकर शान्त हो जाइये

মহারাজ! যে পান করলে মানসিক ব্যাধি নাশ হয়, তিক্ত কথার গর্ভে যার জন্ম; যা তীক্ষ্ণ ও দাহক, যশ হরণকারী, কঠোর ও দুর্গন্ধময় বলে প্রতীয়মান; যা অসৎ লোক পান করতে পারে না, আর যা সৎজনের পানীয়—সেই ক্রোধকে পান করে শান্ত হোন।

Verse 19

वैचित्रवीर्यस्थ यशो धनं च वाञ्छाम्यहं सहपुत्रस्य शश्वत्‌ यथा तथा ते>स्तु नमश्न ते<स्तु ममापि च स्वस्ति दिशन्तु विप्रा:,मैं तो चाहता हूँ कि विचित्रवीर्यनन्दन धृतराष्ट्र और उनके पुत्रोंकोी सदा यश और धन दोनों प्राप्त हो, परंतु दुर्योधन! तुम जैसे रहना चाहते हो, वैसे रहो, तुम्हें नमस्कार है। ब्राह्मणलोग मेरे लिये भी कल्याणका आशीर्वाद दें

বিদুর বললেন—বিচিত্রবীর্যনন্দন ধৃতরাষ্ট্র ও তাঁর পুত্রদের জন্য আমি সর্বদা স্থায়ী যশ ও ধনের কামনা করি। তবু, দুর্যোধন, তুমি যেমন ইচ্ছা তেমনই থাকো; তোমাকে প্রণাম। ব্রাহ্মণগণ আমার জন্যও মঙ্গলাশীর্বাদ উচ্চারণ করুন।

Verse 20

आशीविषान्‌ नेत्रविषान्‌ कोपयेन्न च पण्डित: । एवं ते5हं वदामीदं प्रयतः कुरुनन्दन,कुरुनन्दन! मैं एकाग्र हृदयसे तुमसे यह बात बता रहा हूँ, 'विद्वान्‌ पुरुष उन सर्पोंको कुपित न करें, जो दाँतों और नेत्रोंसे भी विष उगलते रहते हैं (अर्थात्‌ ये पाण्डव तुम्हारे लिये सर्पोंसे भी अधिक भयंकर हैं, इन्हें मत छेड़ो)”

কুরুনন্দন! একাগ্রচিত্তে আমি তোমাকে বলছি—পণ্ডিত ব্যক্তি সেই সাপদের ক্রুদ্ধ করে না, যারা দংশনেই নয়, দৃষ্টিতেও বিষ ঢালে।

Verse 63

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत झ्वूतपर्वमें विदुरवाक्यविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের দ্যূতপর্বে বিদুরবাক্য-বিষয়ক তেষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 64

इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि विदुरहितवाक्ये चतुष्षष्टितमो5ध्याय: ।। ६४ ।। इस प्रकार श्रीमह्ाभारत सभापवके अन्तर्गत ट्यूतपर्वमें विदुरके हितकारक वचनविषयक चौसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের দ্যূতপর্বে বিদুরের হিতবাক্য-বিষয়ক চৌষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Frequently Asked Questions

Whether immediate retaliatory force is justified under extreme provocation, or whether restraint within the assembly—preserving procedural legitimacy and preventing uncontrolled escalation—better serves dharma and long-term political stability.

The chapter contrasts reactive anger with disciplined conduct: noble speech avoids corrosive harshness, virtue remembers merit over hostility, and leadership may require restraining even justified rage to protect order and future outcomes.

No explicit phalaśruti appears here; the meta-function is narrative-ethical—using authoritative maxim (Devala) and vivid characterization to frame restraint and speech-ethics as integral to sabhā-dharma and dynastic continuity.