Adhyaya 41
Sabha ParvaAdhyaya 4141 Verses

Adhyaya 41

Bhīṣma–Śiśupāla-saṃvādaḥ (Bhishma and Shishupala’s exchange in the assembly)

Upa-parva: Rājasūya-sabhā: Śiśupāla–Bhīṣma dispute (within the assembly proceedings)

The chapter opens with Bhīṣma interpreting Śiśupāla’s challenge as operating under a larger inevitability tied to Kṛṣṇa’s will, framing the confrontation as more than personal rivalry (1–4). Vaiśaṃpāyana narrates Śiśupāla’s immediate refusal to tolerate Bhīṣma’s assessment, leading to a sustained verbal attack that accuses Bhīṣma of improper praise and urges him instead to laud other eminent warriors and kings (5–13). Śiśupāla then turns the critique into a moralizing indictment of rhetorical misconduct—self-deprecation, self-praise, blaming others, and praising others—presented as a fourfold pattern outside ārya conduct (14–16). He illustrates his point with the Bhūliṅga bird analogy, warning against reckless speech and misread devotion (18–23). Bhīṣma replies with uncompromising stance: he claims he does not depend on the approval of earthly rulers and treats their hostility as inconsequential (24–31). He closes by pointing to Govinda present and honored in the assembly, and calls for Kṛṣṇa to be summoned in combat, presenting the dispute as reaching a decisive threshold (32–33).

Chapter Arc: राजसूय-यज्ञ की सभा में, कृष्ण के अग्रपूजन से जली हुई शिशुपाल की वाणी अचानक भीष्म पर टूट पड़ती है—वह पूछता है कि भीष्म इतने राजाओं के सामने निर्लज्ज होकर कृष्ण की प्रशंसा क्यों कर रहे हैं। → शिशुपाल भीष्म को अपमानित करने के लिए कटु उपमाएँ और आरोपों की वर्षा करता है—भीष्म को ‘तीसरी प्रकृति’ में स्थित कहकर तिरस्कृत करता, कौरवों को अंधों की तरह अंधे का अनुसरण करने वाला बताता, और कृष्ण के पूतना-वध आदि कर्मों का उल्लेख कर यह जताता है कि ऐसी कथाएँ सुनकर उसका मन और अधिक व्यथित होता है। सभा में बैठे राजाओं का क्रोध और असहजता बढ़ती जाती है। → शिशुपाल का चरम प्रहार तब आता है जब वह भीष्म को ‘कौरवाधम’ कहकर संबोधित करता और यह आरोप लगाता है कि भीष्म सत्पुरुषों के मार्ग से गिर चुके हैं—जिनके लिए कृष्ण परम पूजनीय हैं, उनके ‘प्रदर्शक’ होकर भीष्म धर्मज्ञ होने का ढोंग कर रहे हैं। वह पुराण-गाथाओं और दृष्टांतों का सहारा लेकर भीष्म की प्रतिष्ठा को सार्वजनिक रूप से तोड़ने का प्रयास करता। → अध्याय का अंत शिशुपाल के वाक्य-प्रवाह पर ही होता है—यह एक ‘आरोप-पर्व’ की तरह सभा को विषाक्त कर देता है, पर तत्काल दंड/प्रतिउत्तर का वर्णन यहाँ नहीं आता; केवल यह स्पष्ट होता है कि शिशुपाल ने मर्यादा-रेखा लांघ दी है और सभा का संतुलन डगमगा गया है। → शिशुपाल की यह निर्भीक निंदा अब किस सीमा तक जाएगी—और कृष्ण/भीष्म/सभा इसका उत्तर कैसे देंगे—यह तनाव अगले प्रसंग पर छोड़ दिया जाता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन- माल बछ। अकाल एकचत्वारिशो< ध्याय: शिशुपालद्दारा भीष्मकी निन्दा शिशुपाल उवाच विभीषिकाभिर्बलद्वीभिभभीषयन्‌ सर्वपार्थिवान्‌ । न व्यपत्रपसे कस्माद्‌ वृद्ध: सन्‌ कुलपांसन,शिशुपाल बोला--कुलको कलंकित करनेवाले भीष्म! तुम अनेक प्रकारकी विभीषिकाओंद्वारा इन सब राजाओंको डरानेकी चेष्टा कर रहे हो। बड़े-बूढ़े होकर भी तुम्हें अपने इस कृत्यपर लज्जा क्‍यों नहीं आती?

শিশুপাল বলল—হে ভীষ্ম, বংশের কলঙ্ক! ভয়ংকর হুমকি ও বলপ্রয়োগে তুমি এই সকল রাজাকে ভীত করতে চাইছ। বৃদ্ধ হয়েও এমন আচরণে তোমার লজ্জা হয় না কেন?

Verse 2

युक्तमेतत्‌ तृतीयायां प्रकृतौ वर्तता त्वया । दक्तुं धर्मादपेतार्थ त्वं हि सर्वकुरूत्तम:,तुम तीसरी प्रकृतिमें स्थित (नपुंसक) हो, अतः तुम्हारे लिये इस प्रकार धर्मविरुद्ध बातें कहना उचित ही है। फिर भी यह आश्चर्य है कि तुम समूचे कुरुकुलके श्रेष्ठ पुरुष कहे जाते हो

তুমি তৃতীয় প্রকৃতিতে (নপুংসকত্বে) অবস্থান কর, তাই ধর্মবিরুদ্ধ কথা বলা যেন তোমার পক্ষে স্বাভাবিকই। তবু আশ্চর্য—তোমাকেই নাকি সমগ্র কুরুবংশের শ্রেষ্ঠ পুরুষ বলা হয়!

Verse 3

नावि नौरिव सम्बद्धा यथान्धो बान्धमन्वियात्‌ | तथाभूता हि कौरव्या येषां भीष्म त्वमग्रणी:,भीष्म! जैसे एक नाव दूसरी नावमें बाँध दी जाय, एक अंधा दूसरे अंधेके पीछे चले; वही दशा इन सब कौरवोंकी है, जिन्हें तुम-जैसा अगुआ मिला है

হে ভীষ্ম! যেমন এক নৌকা আরেক নৌকার সঙ্গে বেঁধে রাখা হয়, কিংবা যেমন এক অন্ধ আরেক অন্ধের পেছনে চলে—তেমনি দশা এই কৌরবদের, যাদের অগ্রণী তুমি।

Verse 4

पूतनाघातपूर्वाणि कर्माण्यस्य विशेषत: । त्वया कीर्तयतास्माकं भूय: प्रव्यथितं मन:,तुमने श्रीकृष्णके पूतना-वध आदि कर्मोका जो विशेषरूपसे वर्णन किया है, उससे हमारे मनको पुन: बहुत बड़ी चोट पहुँची है

পূতনা-বধ থেকে আরম্ভ করে তার কর্মসমূহ তুমি বিশেষভাবে যে বর্ণনা করেছ, তাতে আমাদের মন আবারও গভীরভাবে ব্যথিত হয়েছে।

Verse 5

अवलिप्तस्य मूर्खस्य केशवं स्तोतुमिच्छत: । कथं भीष्म न ते जिह्ला शतधेयं विदीर्यते,भीष्म! तुम्हें अपने ज्ञानीपनका बड़ा घमंड है, परंतु तुम हो वास्तवमें बड़े मूर्ख! ओह! इस केशवकी स्तुति करनेकी इच्छा होते ही तुम्हारी जीभके सैकड़ों टुकड़े क्यों नहीं हो जाते?

হে ভীষ্ম! জ্ঞানের অহংকারে তুমি আসলে মূর্খ। কেশবের স্তব করতে ইচ্ছা জাগলেই তোমার জিহ্বা কেন শত খণ্ডে বিদীর্ণ হয় না?

Verse 6

यत्र कुत्सा प्रयोक्तव्या भीष्म बालतरैनरै: | तमिमं ज्ञानवृद्धः सन्‌ गोपं संस्तोतुमिच्छसि,भीष्म! जिसके प्रति मूर्ख-से-मूर्ख मनुष्योंको भी घृणा करनी चाहिये, उसी ग्वालियेकी तुम ज्ञानवृद्ध होकर भी स्तुति करना चाहते हो (यह आश्चर्य है!)

ভীষ্ম! যাঁর প্রতি অতি শিশুসুলভ ও মূর্খ লোকেরও কেবল ঘৃণাই করা উচিত, সেই গোপালকে তুমি জ্ঞানবৃদ্ধ হয়েও প্রশংসা করতে চাও—এ তো বিস্ময়কর।

Verse 7

यद्यनेन हतो बाल्ये शकुनिश्ित्रमत्र किम्‌ । तौ वाश्ववृषभौ भीष्म यौ न युद्धविशारदौ,भीष्म! यदि इसने बचपनमें एक पक्षी (बकासुर)-को अथवा जो युद्धकी कलासे सर्वथा अनभिज्ञ थे, उन अश्व (केशी) और वृषभ (अरिष्टासुर) नामक पशुओंको मार डाला तो इसमें क्या आश्वर्यकी बात हो गयी?

ভীষ্ম! যদি সে শৈশবে কোনো পাখিকে মেরে ফেলে, কিংবা যুদ্ধবিদ্যায় সম্পূর্ণ অনভিজ্ঞ কেশী নামের অশ্ব ও অরিষ্ট নামের বৃষকে বধ করে—তাতে আশ্চর্য কী?

Verse 8

चेतनारहितं काष्ठं यद्यनेन निपातितम्‌ । पादेन शकटं भीष्म तत्र कि कृतमद्भुतम्‌,भीष्म! छकड़ा क्या है, चेतनाशून्य लकड़ियोंका ढेर ही तो, यदि इसने पैरसे उसको उलट ही दिया तो कौन अनोखी करामात कर डाली?

ভীষ্ম! গাড়িটা তো চেতনাহীন কাঠের স্তূপমাত্র; যদি সে পায়ে ঠেলে উল্টে দেয়, তবে তাতে কী আশ্চর্য কৃতিত্ব হল?

Verse 9

(अर्कप्रमाणौ तौ वृक्षौ यद्यनेन निपातितौ । नागश्न पातितो$नेन तत्र को विस्मय: कृत: ।।) आकके पौधोंके बराबर दो अर्जुन वृक्षोंको यदि श्रीकृष्णने गिरा दिया अथवा एक नागको ही मार गिराया तो कौन बड़े आश्वर्यका काम कर डाला?। वल्मीकमात्र: सप्ताहं यद्यनेन धृतो5चल: । तदा गोवर्धनो भीष्म न तच्चित्रं मतं मम,भीष्म! यदि इसने गोवर्धनपर्वतको सात दिनतक अपने हाथपर उठाये रखा तो उसमें भी मुझे कोई आश्वर्यकी बात नहीं जान पड़ती; क्योंकि गोवर्धन तो दीमकोंकी खोदी हुई मिट्टीका ढेरमात्र है

যদি সে অর্ক-গাছের মতো ক্ষুদ্র সেই দুই বৃক্ষ ফেলে দেয়, কিংবা কোনো নাগকে মাত্র বধ করে—তাতে বিস্ময় কী? আর যদি সে সাত দিন ধরে এক পর্বত তুলে রাখে, তবুও, ভীষ্ম, আমার কাছে তা বিচিত্র নয়; কারণ আমার মতে গোবর্ধন তো উইঢিবির মতো মাটির ঢিবিমাত্র।

Verse 10

भुक्तमेतेन बद्धन्नं क्रीडता नगमूर्थनि । इति ते भीष्म शृण्वाना: परे विस्मयमागता:,भीष्म! कृष्णने गोवर्धनपर्वतके शिखरपर खेलते हुए अकेले ही बहुत-सा अन्न खा लिया, यह बात भी तुम्हारे मुँहले सुनकर दूसरे लोगोंको ही आश्चर्य हुआ होगा (मुझे नहीं)

ভীষ্ম! ‘পর্বতশিখরে খেলতে খেলতে সে একাই অনেক রান্না করা অন্ন খেয়ে ফেলেছে’—তোমার মুখে এ কথা শুনে অন্যরাই বিস্মিত হয়েছে; আমি নই।

Verse 11

यस्य चानेन धर्मज्ञ भुक्तमन्नं बलीयस: । स चानेन हतः कंस इत्येतन्न महाद्भुतम्‌,धर्मज्ञ भीष्म! जिस महाबली कंसका अन्न खाकर यह पला था, उसीको इसने मार डाला। यह भी इसके लिये कोई बड़ी अदभुत बात नहीं है

শিশুপাল বলল—হে ধর্মজ্ঞ! যে মহাবলী কংসের অন্ন খেয়ে এ লালিত-পালিত হয়েছিল, সেই কংসকেই এ বধ করেছে; হে ধর্মজ্ঞ ভীষ্ম! এতে বিশেষ কোনো আশ্চর্য নেই।

Verse 12

न ते श्रुतमिदं भीष्म नूनं कथयतां सताम्‌ | यद्‌ वक्ष्ये त्वामधर्मज्ञं वाक्यं कुरुकुलाधम,कुरुकुलाधम भीष्म! तुम धर्मको बिलकुल नहीं जानते। मैं तुमसे धर्मकी जो बात कहूँगा, वह तुमने संत-महात्माओंके मुखसे भी नहीं सुनी होगी

শিশুপাল বলল—হে ভীষ্ম! নিশ্চয়ই তুমি সজ্জনদের মুখে এ কথা শোনোনি। হে অধর্মজ্ঞ, কুরু-কুলাধম! আমি তোমাকে এমন বাক্য বলব যা তোমারই উপযুক্ত।

Verse 13

स्त्रीषु गोषु न शस्त्राणि पातयेद्‌ ब्राह्मणेषु च । यस्य चान्नानि भुञ्जीत यत्र च स्यात्‌ प्रतिश्रयः,स्त्रीपर, गौपर, ब्राह्मणोंपर तथा जिसका अन्न खाय अथवा जिनके यहाँ अपनेको आश्रय मिला हो, उनपर भी हथियार न चलाये

নারীদের উপর, গাভীদের উপর এবং ব্রাহ্মণদের উপর অস্ত্র প্রয়োগ করা উচিত নয়; আর যার অন্ন খেয়েছে, কিংবা যেখানে আশ্রয় পেয়েছে, সেখানেও অস্ত্র তোলা উচিত নয়।

Verse 14

इति सन्तो5नुशासन्ति सज्जन धर्मिण: सदा । भीष्म लोके हि तत्‌ सर्व वितथं त्वयि दृश्यते,भीष्म! जगत्‌में साधु धर्मात्मा पुरुष सज्जनोंको सदा इसी धर्मका उपदेश देते रहते हैं; किंतु तुम्हारे निकट यह सब धर्म मिथ्या दिखायी देता है

সজ্জন ধর্মাত্মারা সর্বদা এইভাবেই উপদেশ দেন; কিন্তু হে ভীষ্ম! লোকের দৃষ্টিতে তোমার ক্ষেত্রে সে সব ধর্মবচনই মিথ্যা বলে প্রতীয়মান হয়।

Verse 15

ज्ञानवृद्धं च वृद्धं च भूयांसं केशवं मम । अजानत इवाख्यासि संस्तुवन्‌ कौरवाधम,कौरवाधम! तुम मेरे सामने इस कृष्णकी स्तुति करते हुए इसे ज्ञानवृद्ध और वयोवृद्ध बता रहे हो, मानो मैं इसके विषयमें कुछ जानता ही न होऊँ

হে কৌরবাধম! তুমি আমার সামনে কেশবের প্রশংসা করে তাকে জ্ঞানেও পরিণত ও বয়সেও প্রবীণ বলে ঘোষণা করছ, যেন আমি তার বিষয়ে কিছুই জানি না।

Verse 16

गोघ्नः स्त्रीघ्नश्व सन्‌ भीष्म त्वद्वाक्याद्‌ यदि पूज्यते । एवंभूतश्न यो भीष्म कथं संस्तवमहति,भीष्म! यदि तुम्हारे कहनेसे गोघाती और स्त्रीहन्ता होते हुए भी इस कृष्णकी पूजा हो रही है तो तुम्हारी धर्मज्ञताकी हद हो गयी। तुम्हीं बताओ, जो इन दोनों ही प्रकारकी हत्याओंका अपराधी है, वह स्तुतिका अधिकारी कैसे हो सकता है?

শিশুপাল বলল—হে ভীষ্ম! তোমার কথার জোরে যদি গোহন্তা ও স্ত্রীহন্তা হয়েও এই কৃষ্ণ পূজিত হয়, তবে তোমার ধর্মবিবেচনার সীমা এসে গেছে। বলো ভীষ্ম, যে এমন অপরাধ বহন করে, সে কীভাবে স্তবের যোগ্য হতে পারে?

Verse 17

असोौ मतिमतां श्रेष्ठी य एब जगत: प्रभु: । सम्भावयति चाप्येवं त्वद्वाक्याच्च जनार्दन: । एवमेतत्‌ सर्वमिति तत्‌ सर्व वितथं ध्रुवम्‌,तुम कहते हो--ये बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं, ये ही सम्पूर्ण जगतके ईश्वर हैं” और तुम्हारे ही कहनेसे यह कृष्ण अपनेको ऐसा ही समझने भी लगा है। वह इन सभी बातोंको ज्यों-की त्यों ठीक मानता है; परंतु मेरी दृष्टिमें कृष्णके सम्बन्धमें तुम्हारे द्वारा जो कुछ कहा गया है, वह सब निश्चय ही झूठा है

শিশুপাল বলল—তুমি বলছ, ‘এ-ই বুদ্ধিমানদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, এ-ই সমগ্র জগতের প্রভু’; আর তোমার কথার জোরেই জনার্দন (কৃষ্ণ) নিজেকেও তেমনই ভাবতে শুরু করেছে। সে এসব কথাকে অবিকল সত্য বলে মানে; কিন্তু আমার দৃষ্টিতে কৃষ্ণ সম্বন্ধে তোমার বলা সবই নিশ্চিত মিথ্যা।

Verse 18

न गाथागाथिनं शास्ति बहु चेदपि गायति । प्रकृतिं यान्ति भूतानि भूलिड्गशकुनिर्यथा,कोई भी गीत गानेवालेको कुछ सिखा नहीं सकता, चाहे वह कितनी ही बार क्‍यों न गाता हो। भूलिंग पक्षीकी भाँति सब प्राणी अपनी प्रकृतिका ही अनुसरण करते हैं

গান গাইতে থাকা লোককে কেউ সত্যিকার শিক্ষা দিতে পারে না, সে যতবারই গাইুক না কেন। ভূূলিঙ্গ পাখির মতো সকল প্রাণীই নিজের স্বভাবের পথেই চলে।

Verse 19

नूनं प्रकृतिरेषा ते जघन्या नात्र संशय: । अति पापीयसी चैषा पाण्डवानामपीष्यते,निश्चय ही तुम्हारी यह प्रकृति बड़ी अधम है, इसमें संशय नहीं है। अतएव इन पाण्डवोंकी प्रकृति भी तुम्हारे ही समान अत्यन्त पापमयी होती जा रही है

শিশুপাল বলল—নিশ্চয়ই এটাই তোমার স্বভাব—নীচ ও অধম; এতে সন্দেহ নেই। আর এখন সেই অতিশয় পাপময় প্রবৃত্তিই পাণ্ডবদের ক্ষেত্রেও সমর্থিত হচ্ছে।

Verse 20

येषामर्च्यतम: कृष्णस्त्वं च येषां प्रदर्शक: । धर्मवांस्त्वमधर्मज्ञ: सतां मार्गादवप्लुत:,अथवा क्‍यों न हो, जिनका परम पूजनीय कृष्ण है और सत्पुरुषोंके मार्गसे गिरा हुआ तुम-जैसा धर्मज्ञानशून्य धर्मात्मा जिनका मार्गदर्शक है

যাদের পরম পূজ্য কৃষ্ণ, আর যাদের জন্য সৎপুরুষদের পথ থেকে বিচ্যুত তোমার মতো অধর্ম-অজ্ঞ লোককে ‘ধার্মিক’ বলে পথপ্রদর্শক করা হয়—তাদের অবস্থা এমনই হবে, এতে আর কী আশ্চর্য? তুমি ধার্মিক বলে প্রচারিত, অথচ অধর্মের জ্ঞানহীন; তুমি সাধুজনের পথ থেকে সরে পড়েছ।

Verse 21

को हि धर्मिणमात्मानं जानन्‌ ज्ञानविदां वर: | कुर्याद्‌ यथा त्वया भीष्म कृतं धर्ममवेक्षता,भीष्म! कौन ऐसा पुरुष होगा, जो अपनेको ज्ञानवानोंमें श्रेष्ठ और धर्मात्मा जानते हुए भी ऐसे नीच कर्म करेगा, जो धर्मपर दृष्टि रखते हुए भी तुम्हारे द्वारा किये गये हैं

শিশুপাল বলল—ভীষ্ম! যে নিজেকে ধর্মাত্মা ও জ্ঞানীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ বলে জানে, সে ধর্মের দৃষ্টি রেখে তোমার দ্বারা কৃত এমন নীচ কর্ম কীভাবে করতে পারে?

Verse 22

चेत्‌ त्वं धर्म विजानासि यदि प्राज्ञा मतिस्तव । अन्यकामा हि धर्मज्ञा कन्यका प्राज्ञमानिना । अम्बा नामेति भद्रं ते कथं सापहता त्वया,यदि तुम धर्मको जानते हो, यदि तुम्हारी बुद्धि उत्तम ज्ञान और विवेकसे सम्पन्न है तो तुम्हारा भला हो, बताओ, काशिराजकी जो धर्मज्ञ कन्या अम्बा दूसरे पुरुषमें अनुरक्त थी, उसका अपनेको पण्डित माननेवाले तुमने क्यों अपहरण किया?

শিশুপাল বলল—যদি তুমি সত্যিই ধর্ম জানো এবং তোমার বুদ্ধি প্রজ্ঞায় পরিপূর্ণ হয়, তবে মঙ্গল হোক তোমার—বল তো, কাশীরাজার সেই ধর্মজ্ঞ কন্যা অম্বা, যার মন অন্য পুরুষে আসক্ত ছিল, তাকে তুমি—নিজেকে পণ্ডিত মনে করে—কেন অপহরণ করলে?

Verse 23

तां त्वयापि हतां भीष्म कन्यां नैषितवान्‌ यतः । भ्राता विचित्रवीर्यस्ते सतां मार्गमनुछित:,भीष्म! तुम्हारे द्वारा अपहरण की गयी उस काशिराजकी कन्याको तुम्हारे भाई विचित्रवीर्यने अपनानेकी इच्छा नहीं की, क्योंकि वे सन्मार्गपर स्थित रहनेवाले थे

ভীষ্ম! তোমার দ্বারা অপহৃত সেই কন্যাকে তোমার ভ্রাতা বিচিত্রবীর্য স্ত্রীরূপে গ্রহণ করেননি, কারণ তিনি সজ্জনদের ধর্মপথে অবিচল ছিলেন।

Verse 24

दारयोर्यस्य चान्येन मिषत:ः प्राज्ञमानिन: । तव जातान्यपत्यानि सज्जनाचरिते पथि,उन्हींकी दोनों विधवा पत्नियोंके गर्भसे तुम-जैसे पण्डितमानीके देखते-देखते दूसरे पुरुषद्वारा संतानें उत्पन्न की गयीं, फिर भी तुम अपनेको साधु पुरुषोंके मार्गपर स्थिर मानते हो

তোমার মতো নিজেকে পণ্ডিত মনে করা ব্যক্তির চোখের সামনেই, তোমার দুই বিধবা পত্নীর গর্ভে অন্য পুরুষের দ্বারা সন্তান উৎপন্ন হলো; তবু তুমি নিজেকে সজ্জনদের আচরণ-পথে স্থিত বলে মানো।

Verse 25

को हि धर्मोडस्ति ते भीष्म ब्रह्म॒चर्यमिदं वृथा । यद्‌ धारयसि मोहाद्‌ वा क्लीबत्वाद्‌ वा न संशय:,भीष्म! तुम्हारा धर्म कया है! तुम्हारा यह ब्रह्मचर्य भी व्यर्थका ढकोसलामात्र है, जिसे तुमने मोहवश अथवा नपुंसकताके कारण धारण कर रखा है, इसमें संशय नहीं

ভীষ্ম! তোমার ধর্মই বা কী? তোমার এই ব্রহ্মচর্য বৃথা—নিছক ভান—যা তুমি হয় মোহবশত ধারণ করেছ, নয়তো নপুংসকতার কারণে; এতে কোনো সন্দেহ নেই।

Verse 26

न त्वहं तव धर्मज्ञ पश्याम्युपचयं क्वचित्‌ | नहि ते सेविता वृद्धा य एवं धर्ममब्रवी:,धर्मज्ञ भीष्म! मैं तुम्हारी कहीं कोई उन्नति भी तो नहीं देख रहा हूँ। मेरा तो विश्वास है, तुमने ज्ञानवृद्ध पुरुषोंका कभी संग नहीं किया है। तभी तो तुम ऐसे धर्मका उपदेश करते हो

ধর্মজ্ঞ ভীষ্ম! তোমার মধ্যে আমি কোথাও প্রকৃত উন্নতি দেখি না। নিশ্চয়ই তুমি জ্ঞানবৃদ্ধ মহাজনদের সেবা-সঙ্গ করনি; তাই তুমি এভাবে ধর্মের কথা বলছ।

Verse 27

इष्टं दत्तमधीतं च यज्ञाश्व बहुदक्षिणा: । सर्वमेतदपत्यस्य कलां नाहन्ति षोडशीम्‌,यज्ञ, दान, स्वाध्याय तथा बहुत दक्षिणावाले बड़े-बड़े यज्ञ--ये सब संतानकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते

যজ্ঞ, দান, স্বাধ্যায় এবং বহু দক্ষিণাসহ মহাযজ্ঞ—এসবের কোনোটিই সন্তানের মূল্যমানের ষোড়শাংশেরও সমান নয়।

Verse 28

ब्रतोपवासैर्बहुभि: कृतं भवति भीष्म यत्‌ | सर्व तदनपत्यस्य मोघं भवति निश्चयात्‌,भीष्म! अनेक व्रतों और उपवासोंद्वारा जो पुण्य कार्य किया जाता है, वह सब संतानहीन पुरुषके लिये निश्चय ही व्यर्थ हो जाता है

ভীষ্ম! বহু ব্রত ও উপবাসে যে পুণ্য সঞ্চিত হয়, সন্তানহীন পুরুষের জন্য তা নিশ্চিতই নিষ্ফল হয়ে যায়।

Verse 29

सो<नपत्यश्व वृद्धश्न॒ मिथ्याधर्मानुसारक: । हंसवत्‌ त्वमपीदानी ज्ञातिभ्य: प्राप्तुया वधम्‌,तुम संतानहीन, वृद्ध और मिथ्याधर्मका अनुसरण करनेवाले हो; अत: इस समय हंसकी भाँति तुम भी अपने जातिभाइयोंके हाथसे ही मारे जाओगे

তুমি সন্তানহীন, বৃদ্ধ এবং মিথ্যা-ধর্মের অনুসারী; তাই এখন হাঁসের মতো তুমিও নিজেরই স্বজনদের হাতে নিহত হবে।

Verse 30

एवं हि कथयन्त्यन्ये नरा ज्ञानविद: पुरा । भीष्म यत्‌ तदहं सम्यग्‌ वक्ष्यामि तव शृण्वतः,भीष्म! पहलेके विवेकी मनुष्य एक प्राचीन वृत्तान्त सुनाया करते हैं, वही मैं ज्यों-का- त्यों तुम्हारे सामने उपस्थित करता हूँ, सुनो

ভীষ্ম! প্রাচীনকালে জ্ঞানী লোকেরা এমনই এক পুরাতন বৃত্তান্ত বলে থাকত; তুমি শুনতে থাকো—আমি সেটাই যথাযথভাবে বলছি।

Verse 31

वृद्ध: किल समुद्रान्ते कश्चिद्धंसो5भवत्‌ पुरा । धर्मवागन्यथावृत्त: पक्षिण: सोडनुशास्ति च,पूर्वकालकी बात है, समुद्रके निकट कोई बूढ़ा हंस रहता था। वह धर्मकी बातें करता; परंतु उसका आचरण ठीक उसके विपरीत होता था। वह पक्षियोंको सदा यह उपदेश किया करता कि धर्म करो, अधर्मसे दूर रहो। सदा सत्य बोलनेवाले उस हंसके मुखसे दूसरे-दूसरे पक्षी यही उपदेश सुना करते थे

অনেক আগে সমুদ্রতটে এক বৃদ্ধ হাঁস বাস করত। সে ধর্মের মহৎ কথা বলত, কিন্তু তার আচরণ ছিল তার সম্পূর্ণ বিপরীত। তবু সে অন্য পাখিদের সর্বদা উপদেশ দিত—“ধর্ম পালন করো, অধর্ম থেকে দূরে থাকো।”

Verse 32

धर्म चरत माधर्ममिति तस्य वच: किल । पक्षिण: शुश्रुवुर्भीष्म सततं सत्यवादिन:,पूर्वकालकी बात है, समुद्रके निकट कोई बूढ़ा हंस रहता था। वह धर्मकी बातें करता; परंतु उसका आचरण ठीक उसके विपरीत होता था। वह पक्षियोंको सदा यह उपदेश किया करता कि धर्म करो, अधर्मसे दूर रहो। सदा सत्य बोलनेवाले उस हंसके मुखसे दूसरे-दूसरे पक्षी यही उपदेश सुना करते थे

“ধর্ম পালন করো, অধর্ম করো না”—এটাই ছিল তার কথা। হে ভীষ্ম, সত্যভাষী সেই হাঁসের মুখ থেকে পাখিরা বারবার এই উপদেশই শুনত।

Verse 33

अथास्य भक्ष्यमाजहु: समुद्रजलचारिण: । अण्डजा भीष्म तस्यान्ये धर्मार्थमिति शुश्रुम,भीष्म! ऐसा सुननेमें आया है कि वे समुद्रके जलमें विचरनेवाले पक्षी धर्म समझकर उसके लिये भोजन जुटा दिया करते थे

হে ভীষ্ম, শোনা যায়—সমুদ্রজলে বিচরণকারী অন্য ডিমজাত পাখিরা ‘এটাই ধর্ম’ মনে করে তার জন্য খাদ্য জোগাড় করে আনত।

Verse 34

ते च तस्य समभ्याशे निक्षिप्याण्डानि सर्वश: । समुद्राम्भस्यमज्जन्त चरन्तो भीष्म पक्षिण: । तेषामण्डानि सर्वेषां भक्षयामास पापकृत्‌,भीष्म! हंसपर विश्वास हो जानेके कारण वे सभी पक्षी अपने अण्डे उसके पास ही रखकर समुद्रके जलमें गोते लगाते और विचरते थे; परंतु वह पापी हंस उन सबके अण्डे खा जाता था

হে ভীষ্ম, তার ওপর বিশ্বাস করে সেই পাখিরা তাদের সব ডিম তার কাছেই রেখে সমুদ্রজলে ডুব দিয়ে বিচরণ করত। কিন্তু সেই পাপী হাঁস তাদের সকলের ডিমই খেয়ে ফেলত।

Verse 35

स हंस: सम्प्रमत्तानामप्रमत्त: स्वकर्मणि । ततः प्रक्षीयमाणेषु तेषु तेष्वण्डजो5पर: । अशड्कत महाप्राज्ञ: स कदाचिद्‌ ददर्श ह,वे बेचारे पक्षी असावधान थे और वह अपना काम बनानेके लिये सदा चौकन्ना रहता था। तदनन्तर जब वे अण्डे नष्ट होने लगे, तब एक बुद्धिमान्‌ पक्षीको हंसपर कुछ संदेह हुआ और एक दिन उसने उसकी सारी करतूत देख भी ली

ওরা ছিল নির্ভার, আর সেই হাঁস ছিল নিজের কাজে সদা সতর্ক। তারপর যখন তাদের ডিম একে একে নষ্ট হতে লাগল, তখন এক মহাবুদ্ধিমান পাখির মনে সন্দেহ জাগল; একদিন সে তার কুকর্ম স্বচক্ষে দেখে ফেলল।

Verse 36

ततः स कथयामास दृष्टवा हंसस्य किल्बिषम्‌ | तेषां परमदु:खार्त: स पक्षी सर्वपक्षिणाम्‌,हंसका यह पापपूर्ण कृत्य देखकर वह पक्षी दुःखसे अत्यन्त आतुर हो उठा और उसने अन्य सब पक्षियोंसे सारा हाल कह सुनाया

তখন হাঁসের পাপাচার প্রত্যক্ষ করে সেই পাখিটি তাদের জন্য গভীর শোকে ব্যাকুল হয়ে উঠল এবং সকল অন্য পাখির কাছে সমগ্র ঘটনা জানিয়ে দিল।

Verse 37

ततः प्रत्यक्षतो दृष्टवा पक्षिणस्ते समीपगा: । निजलघ्नुस्तं तदा हंसं मिथ्यावृत्तं कुरूद्वह,कुरुवंशी भीष्म! तब उन पक्षियोंने निकट जाकर सब कुछ प्रत्यक्ष देख लिया और धर्मात्माका मिथ्या ढोंग बनाये हुए उस हंसको मार डाला

তারপর সেই পাখিরা কাছে গিয়ে সবকিছু নিজের চোখে প্রত্যক্ষ করে, ধর্মের ভান করা সেই মিথ্যাচারী হাঁসটিকে বধ করল—হে কুরুশ্রেষ্ঠ।

Verse 38

ते त्वां हंससधर्माणमपीमे वसुधाधिपा: । निहन्युर्भीष्म संक्रुद्धा: पक्षिणस्तं यथाण्डजम्‌,तुम भी उस हंसके ही समान हो, अतः ये सब नरेश अत्यन्त कुपित होकर आज तुम्हें उसी तरह मार डालेंगे, जैसे उन पक्षियोंने हंसकी हत्या कर डाली थी। भीष्म! इस विषयमें पुराणवेत्ता विद्वान्‌ एक गाथा गाया करते हैं। भरतकुलभूषण! मैं उसे भी तुमको भलीभाँति सुनाये देता हूँ

তুমিও স্বভাবে সেই হাঁসেরই সদৃশ; অতএব এই সব রাজা ক্রুদ্ধ হয়ে আজ তোমাকে তেমনই বধ করবে, যেমন পাখিরা সেই অণ্ডজ হাঁসটিকে বধ করেছিল—হে ভীষ্ম।

Verse 39

गाथामप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जना: । भीष्म यां तां च ते सम्यक्‌ कथयिष्यामि भारत,तुम भी उस हंसके ही समान हो, अतः ये सब नरेश अत्यन्त कुपित होकर आज तुम्हें उसी तरह मार डालेंगे, जैसे उन पक्षियोंने हंसकी हत्या कर डाली थी। भीष्म! इस विषयमें पुराणवेत्ता विद्वान्‌ एक गाथा गाया करते हैं। भरतकुलभूषण! मैं उसे भी तुमको भलीभाँति सुनाये देता हूँ

এ বিষয়ে পুরাণজ্ঞ লোকেরা একটি গাথাও গেয়ে থাকেন; হে ভীষ্ম—হে ভারতবংশীয়—আমি সেই গাথাই তোমাকে যথাযথভাবে বলছি।

Verse 40

इस प्रकार श्रीमह्या भारत सभापव॑के अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें युधिष्ठिरको आश्वासन नामक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,अन्तरात्मन्यभिहते रौषि पत्ररथाशुचि । अण्डभक्षणकर्मतत्‌ तव वाचमतीयते “हंस! तुम्हारी अन्तरात्मा रागादि दोषोंसे दूषित है, तुम्हारा यह अण्डभक्षणरूप अपवित्र कर्म तुम्हारी इस धर्मोपदेशमयी वाणीके सर्वथा विरुद्ध है”

হে হাঁস! তোমার অন্তরাত্মা রাগাদি দোষে কলুষিত; ডিমভক্ষণরূপ এই অপবিত্র কর্ম তোমার ধর্মোপদেশময় বাক্যের সম্পূর্ণ বিরোধী।

Verse 41

इति श्रीमहा भारते समापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि शिशुपालवाक्ये एकचत्वारिंशो5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ााभारत सभापव॑के अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वनें शिशुपालवाक्यविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত শিশুপালবধপর্বে শিশুপালের বাক্যবিষয়ক একচল্লিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns legitimate dissent versus corrosive invective: whether public criticism in a royal assembly can be ethically grounded when it targets the person and the institution of honor-allocation rather than the merits of policy or conduct.

Speech is a governance instrument: praise and blame must be regulated by discernment (viveka) and proportionality, because rhetorical excess can destabilize institutions and convert deliberation into factional conflict.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-commentary is implicit in the narrative framing—Vaiśaṃpāyana’s report of polarized reactions and Bhīṣma’s self-positioning—highlighting how assemblies reveal collective ethics under pressure.