
Rājasūya-sambhāra: Prosperity under Rājadharma and the Initiation of Yudhiṣṭhira’s Sacrifice
Upa-parva: Rājasūya-ārambha (Preparations for the Rājasūya)
Vaiśaṃpāyana describes the prosperity of Yudhiṣṭhira’s realm as an outcome of protective rule, truthfulness, disciplined taxation, and suppression of predatory disruption. The text links stable governance to environmental regularity (timely rain) and the smooth functioning of agriculture, cattle protection, and trade. Once the treasury and granaries are assessed, Yudhiṣṭhira turns his intent to yajña; allies encourage the timing. Kṛṣṇa arrives visibly, bringing abundant wealth and endorsing Yudhiṣṭhira’s fitness for the imperial rite, offering full assistance. Yudhiṣṭhira then initiates operational planning for the Rājasūya: Sahadeva and ministers are tasked with ritual requisites and auspicious arrangements; provisioning officers are named; artisans construct extensive accommodations. Dvaipāyana (Vyāsa) brings eminent priests, assigns ritual roles (including himself as Brahmā-priest), and the priestly teams execute prescribed preliminaries. Envoys are dispatched to invite brāhmaṇas, kings, and respected social groups. In due course, Yudhiṣṭhira undergoes dīkṣā and proceeds to the yajña enclosure amid large assemblies, with extensive gifting and hospitality marking the rite’s commencement; invitations to Hastināpura elders are also initiated via Nakula.
Chapter Arc: भीमसेन की दिग्विजय-यात्रा का वेग थमता नहीं—पूर्व दिशा के अनेक जनपदों को झुकाकर वह धन-रत्नों के भार सहित इन्द्रप्रस्थ की ओर लौटता है, मानो यज्ञ की सामग्री स्वयं चलकर आ रही हो। → अयोध्या के धर्मज्ञ दीर्घयज्ञ, गोपालकक्ष और उत्तर कोसल, मल्ल-देश, काशी के सुबाहु, दण्ड और दण्डधार, गिरिव्रज की ओर बढ़ते हुए अनेक राजाओं का दमन—हर विजय के साथ कर-आहरण और अधीनता का जाल फैलता जाता है; समुद्र-तट और द्वीपों के म्लेच्छ नृप भी रत्नों सहित कर देने को बाध्य होते हैं। → समुद्र-नूपवासियों और विविध म्लेच्छ राजाओं से रत्न-कर वसूल कर, भीम का वैभव-प्रवाह चरम पर पहुँचता है—यह केवल युद्ध-विजय नहीं, युधिष्ठिर के राजसूय हेतु पृथ्वी की स्वीकृति का उद्घोष बन जाता है। → भीमपराक्रमी भीम इन्द्रप्रस्थ पहुँचकर समस्त संचित धन-सम्पदा धर्मराज युधिष्ठिर को निवेदित करता है—दिग्विजय का फल व्यक्तिगत नहीं, राज्य-धर्म और यज्ञ-उद्देश्य के चरणों में समर्पित होता है। → अब जब पूर्व दिशा भी कर-बंधन में आ गई, राजसूय की तैयारी पूर्णता की ओर बढ़ती है—पर क्या सभी राजाओं का मन सचमुच झुका है, या कहीं अपमान की अग्नि भविष्य का वैर रच रही है?
Verse 1
ऑपन-माज बक। अऑपफि-छऋाज-ज त्रिशो&्थ्याय: भीमका पूर्व दिशाके अनेक देशों तथा राजाओंको जीतकर भारी धन-सम्पत्तिके साथ इन्द्रप्रस्थमें लौटना वैशम्पायन उवाच ततः कुमारविषये श्रेणिमन्तमथाजयत् । कोसलाधिपतिं चैव बृहद्धलमरिंदम:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर शत्रुओंका दमन करनेवाले भीमसेनने कुमारदेशके राजा श्रेणिमान् तथा कोसलराज बृहद्वलको परास्त किया
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! এরপর শত্রুদমনকারী ভীমসেন কুমারদেশের রাজা শ্রেণিমানকে এবং কোসলের অধিপতি বৃহদ্বলকেও পরাজিত করলেন।
Verse 2
अयोध्यायां तु धर्मज्ञं दीर्घयज्ञ महाबलम् । अजयतू पाण्डवश्रेष्ठो नातितीव्रेण कर्मणा,इसके बाद अयोध्याके धर्मज्ञ नरेश महाबली दीर्घयज्ञको पाण्डवश्रेष्ठ भीमने कोमलतापूर्ण बर्तावसे वशमें कर लिया
অযোধ্যায় ধর্মজ্ঞ, মহাবলী দীর্ঘযজ্ঞকে পাণ্ডবশ্রেষ্ঠ ভীম অতিশয় কঠোর উপায়ে নয়, বরং কোমল ও সংযত আচরণে বশে আনলেন।
Verse 3
ततो गोपालकक्षं च सोत्तरानपि कोसलान् | मल्लानामधिपं चैव पार्थिवं चाजयत् प्रभु:,तत्पश्चात् शक्तिशाली पाण्डुकुमारने गोपालकक्ष और उत्तर कोसल देशको जीतकर मल्लराष्ट्रके अधिपति पार्थिवको अपने अधीन कर लिया
তারপর শক্তিশালী পাণ্ডুপুত্র গোপালকক্ষ এবং উত্তরসহ কোসলদেশ জয় করলেন; অতঃপর মল্লদের অধিপতি রাজা পার্থিবকেও পরাস্ত করে অধীন করলেন।
Verse 4
ततो हिमवतः पार्श्व समभ्येत्य जलोद्धवम् । सर्वमल्पेन कालेन देशं चक्रे वशं बली,इसके बाद हिमालयके पास जाकर बलवान भीमने सारे जलोद्धव देशपर थोड़े ही समयमें अधिकार प्राप्त कर लिया
এরপর হিমালয়ের পার্শ্বদেশে গিয়ে বলবান ভীম অল্প সময়ের মধ্যেই জলোদ্ধব নামে সমগ্র দেশকে বশে আনলেন।
Verse 5
एवं बहुविधान् देशान् विजिग्ये भरतर्षभ: । भल्लाटमभितो जिग्ये शुक्तिमन्तं च पर्वतम्,इस प्रकार भरतवंशभूषण भीमसेनने अनेक देश जीते और भल्लाटके समीपतवर्ती देशों तथा शुक्तिमान् पर्वतपर भी विजय प्राप्त की
এইভাবে ভরতশ্রেষ্ঠ ভীমসেন নানাবিধ দেশ জয় করলেন; ভল্লাটের আশপাশের অঞ্চলসমূহ এবং শুক্তিমান পর্বতও তিনি অধিকার করলেন।
Verse 6
पाण्डव: सुमहावीर्यों बलेन बलिनां वर: । स काशिराजं समरे सुबाहुमनिवर्तिनम्
অতিমহাবীর্যবান, বলের দিক থেকে বলবানদের শ্রেষ্ঠ পাণ্ডব রণক্ষেত্রে কাশীরাজ—অটল, পশ্চাদপসরণ না-করা সুভাহুর—সম্মুখীন হলেন।
Verse 7
वशे चक्रे महाबाहुर्भीमो भीमपराक्रम: । बलवानोंमें श्रेष्ठ महापराक्रमी तथा भयंकर पुरुषार्थ प्रकट करनेवाले पाण्डुकुमार महाबाहु भीमसेनने समरमें पीठ न दिखानेवाले काशिराज सुबाहुको बलपूर्वक हराया ।। ६ १ *3॥ ततः सुपार्श्वमभितस्तथा राजपतिं क्रथम्
বৈশম্পায়ন বললেন— মহাবাহু, ভয়ংকর পরাক্রমশালী ভীম সকলকে বশে আনলেন। বলবানদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ পাণ্ডব ভীমসেন যুদ্ধে পিঠ না দেখানো কাশীরাজ সুবাহুকে বলপ্রয়োগে পরাভূত করে অধীন করলেন। তারপর তিনি সুপার্শ্বকে এবং রাজাধিরাজ ক্রথকেও জয় করলেন।
Verse 8
ततो मत्स्यान् महातेजा मलदांश्व महाबलान्,तत्पश्चात् महातेजस्वी कुन्तीकुमारने मत्स्य, महाबली मलद, अनघ और अभय नामक देशोंको जीतकर पशुभूमि (पशुपतिनाथके निकटवर्ती स्थान--नेपाल)-को भी सब ओरसे जीत लिया। वहाँसे लौटकर महाबाहु भीमने मदधार पर्वत और सोमधेयनिवासियों-को परास्त किया। इसके बाद बलवान् भीमने उत्तराभिमुख यात्रा की और वत्सभूमिपर बलपूर्वक अधिकार जमा लिया
বৈশম্পায়ন বললেন— তারপর মহাতেজস্বী, মহাবলী ভীম মৎস্যদের ও শক্তিশালী মালদদের জয় করলেন। এরপর কুন্তীপুত্র মহাতেজস্বী অনঘ ও অভয় নামে দেশদ্বয় জয় করে পশুভূমিকেও সর্বদিক থেকে বশে আনলেন। সেখান থেকে ফিরে মহাবাহু ভীম মদধার পর্বতের পার্শ্ববর্তী জনদের এবং সোমধেয়-নিবাসীদের পরাভূত করলেন। তারপর তিনি উত্তরাভিমুখে অগ্রসর হয়ে বলপ্রয়োগে বৎসভূমিতে অধিকার স্থাপন করলেন।
Verse 9
अनघानभयांश्रैव पशुभूमिं च सर्वश: । निवृत्य च महाबाहुर्मदधारं महीधरम्,तत्पश्चात् महातेजस्वी कुन्तीकुमारने मत्स्य, महाबली मलद, अनघ और अभय नामक देशोंको जीतकर पशुभूमि (पशुपतिनाथके निकटवर्ती स्थान--नेपाल)-को भी सब ओरसे जीत लिया। वहाँसे लौटकर महाबाहु भीमने मदधार पर्वत और सोमधेयनिवासियों-को परास्त किया। इसके बाद बलवान् भीमने उत्तराभिमुख यात्रा की और वत्सभूमिपर बलपूर्वक अधिकार जमा लिया
বৈশম্পায়ন বললেন— কুন্তীপুত্র মহাবাহু ভীম অনঘ ও অভয় দেশদ্বয় এবং পশুভূমিকেও সর্বদিক থেকে জয় করলেন। সেখান থেকে ফিরে তিনি মদধার পর্বত ও সোমধেয়-নিবাসীদের পরাভূত করলেন। তারপর শক্তিমান ভীম উত্তরাভিমুখে অগ্রসর হয়ে বলপ্রয়োগে বৎসভূমিকে নিজের অধিকারে আনলেন।
Verse 10
सोमधथेयांश्व निर्जित्य प्रययावुत्तरामुख: । वत्सभूमिं च कौन्तेयो विजिग्ये बलवान् बलातू,तत्पश्चात् महातेजस्वी कुन्तीकुमारने मत्स्य, महाबली मलद, अनघ और अभय नामक देशोंको जीतकर पशुभूमि (पशुपतिनाथके निकटवर्ती स्थान--नेपाल)-को भी सब ओरसे जीत लिया। वहाँसे लौटकर महाबाहु भीमने मदधार पर्वत और सोमधेयनिवासियों-को परास्त किया। इसके बाद बलवान् भीमने उत्तराभिमुख यात्रा की और वत्सभूमिपर बलपूर्वक अधिकार जमा लिया
বৈশম্পায়ন বললেন— সোমধথেয়দের পরাভূত করে শক্তিমান কুন্তীপুত্র (ভীম) উত্তরাভিমুখে অগ্রসর হলেন। সেই মহাবলী যোদ্ধা বলপ্রয়োগে বৎসভূমি জয় করে অধীন করলেন।
Verse 11
भर्गाणामधिपं चैव निषादाधिपतिं तथा । विजिग्ये भूमिपालांश्व मणिमत्प्रमुखान् बहून्ू,फिर क्रमशः भगर्गोंके स्वामी, निषादोंके अधिपति तथा मणिमान् आदि बहुत-से भूपालोंको अपने अधिकारमें कर लिया। तदनन्तर दक्षिण मल्लदेश तथा भोगवान् पर्वतको भीमसेनने अधिक प्रयास किये बिना ही वेगपूर्वक जीत लिया
বৈশম্পায়ন বললেন— তারপর ভীমসেন ভর্গদের অধিপতি এবং নিষাদদের প্রধানকেও জয় করলেন। মণিমৎ প্রমুখ বহু ভূ-পালকেও তিনি বশে আনলেন। এরপর বিশেষ পরিশ্রম না করেই তিনি দ্রুত দক্ষিণ মল্লদেশ এবং ভোগবান পর্বত জয় করলেন।
Verse 12
ततो दक्षिणमल्लांश्व भोगवन्तं च पर्वतम् । तरसैवाजयद् भीमो नातितीव्रेण कर्मणा,फिर क्रमशः भगर्गोंके स्वामी, निषादोंके अधिपति तथा मणिमान् आदि बहुत-से भूपालोंको अपने अधिकारमें कर लिया। तदनन्तर दक्षिण मल्लदेश तथा भोगवान् पर्वतको भीमसेनने अधिक प्रयास किये बिना ही वेगपूर्वक जीत लिया
বৈশম্পায়ন বললেন—এরপর ভীম দক্ষিণ মল্লদের এবং ভোগবান নামে পর্বতকে অতি দ্রুত বশে আনলেন; অতিরিক্ত কঠোরতা না করে কেবল বল ও বেগে তিনি বিজয় সাধন করলেন। তারপর ক্রমে ভর্গদের অধিপতি, নিষাদদের প্রধান এবং মণিমান প্রভৃতি বহু রাজাকে নিজের অধীন করলেন; অকারণ নিষ্ঠুরতা নয়, শৃঙ্খলিত শাসনেই পাণ্ডবদের কর্তৃত্ব বিস্তার পেল।
Verse 13
शर्मकान् वर्मकांश्वैव व्यजयत् सान्त्वपूर्वकम् । वैदेहक॑ च राजानं जनक॑ जगतीपतिम्,शर्मक और वर्मकोंको उन्होंने समझा-बुझाकर ही जीत लिया। विदेह देशके राजा जनकको भी पुरुषसिंह भीमने अधिक उग्र प्रयास किये बिना ही परास्त किया। फिर शकों और बर्बरोंपर छलसे विजय प्राप्त कर ली
বৈশম্পায়ন বললেন—ভীম প্রথমে সান্ত্বনা ও বোঝাপড়ার দ্বারা শর্মক ও বর্মকদের জয় করলেন। বিদেহের রাজা, পৃথিবীপতি জনককেও তিনি অতিরিক্ত কঠোরতা ছাড়াই পরাভূত করলেন। কিন্তু শক ও বর্বরদের ক্ষেত্রে তিনি কৌশল (ছল) অবলম্বন করে বিজয় লাভ করলেন।
Verse 14
विजिग्ये पुरुषव्यात्रो नातितीव्रेण कर्मणा । शकांश्व॒ बर्बरांश्नेव अजयच्छझञझपूर्वकम्,शर्मक और वर्मकोंको उन्होंने समझा-बुझाकर ही जीत लिया। विदेह देशके राजा जनकको भी पुरुषसिंह भीमने अधिक उग्र प्रयास किये बिना ही परास्त किया। फिर शकों और बर्बरोंपर छलसे विजय प्राप्त कर ली
বৈশম্পায়ন বললেন—পুরুষব্যাঘ্র ভীম অতিরিক্ত কঠোর পরিশ্রম বা নিষ্ঠুরতা ছাড়াই বিজয়ী হলেন; কিন্তু শক ও বর্বরদের তিনি কৌশল (ছল) দ্বারা পরাস্ত করলেন।
Verse 15
वैदेहस्थस्तु कौन्तेय इन्द्रपर्वतमन्तिकात् । किरातानामधिपतीनजयत् सप्त पाण्डव:,विदेह देशमें ही ठहरकर कुन्तीकुमार भीमने इन्द्रपर्वतके निकटवर्ती सात किरातराजोंको जीत लिया। इसके बाद सुह्य और प्रसुह्म देशके राजाओंको, जिनके पक्षमें बहुत लोग थे, अत्यन्त पराक्रमी और बलवान कुन्तीकुमार भीम युद्धमें परास्त करके मगधदेशको चल दिये
বৈশম্পায়ন বললেন—বিদেহ দেশেই অবস্থান করে কুন্তীপুত্র ভীম ইন্দ্রপর্বতের নিকটে বসবাসকারী সাতজন কিরাত-নৃপতিকে জয় করলেন। এরপর মহাবলী, মহাবীর্য ভীম বহু সহায়-সমর্থকসহ সুহ্য ও প্রসুহ্ম দেশের রাজাদের যুদ্ধে পরাস্ত করে মগধের দিকে অগ্রসর হলেন।
Verse 16
ततः सुद्यान् प्रसुद्यांश्ष सपक्षानतिवीर्यवान् | विजित्य युधि कौन्तेयो मागधानभ्यधाद् बली,विदेह देशमें ही ठहरकर कुन्तीकुमार भीमने इन्द्रपर्वतके निकटवर्ती सात किरातराजोंको जीत लिया। इसके बाद सुह्य और प्रसुह्म देशके राजाओंको, जिनके पक्षमें बहुत लोग थे, अत्यन्त पराक्रमी और बलवान कुन्तीकुमार भीम युद्धमें परास्त करके मगधदेशको चल दिये
তারপর অতিশয় পরাক্রমশালী ও বলবান কুন্তীপুত্র ভীম সুদ্য ও প্রসুদ্য দেশের রাজাদের তাদের পক্ষের সহায়দেরসহ যুদ্ধে পরাজিত করে মগধদের বিরুদ্ধে অগ্রসর হলেন।
Verse 17
दण्डं च दण्डधारं च विजित्य पृथिवीपतीन् | तैरेव सहितै: सर्वैर्गिरि्रजमुपाद्रवत्,मार्गमें दण्ड-दण्डधार तथा अन्य राजाओंको जीतकर उन सबके साथ वे गिरिव्रज नगरमें आये
দণ্ডধারী ও অস্ত্রধারী—উভয় প্রকার পৃথিবীপতিদের জয় করে, সেই সকল রাজাকে সঙ্গী করেই তিনি গিরিব্রজের দিকে অগ্রসর হলেন।
Verse 18
जारासंधि सान्त्वयित्वा करे च विनिवेश्य ह । तैरेव सहितै: सर्वे: कर्णमभ्यद्रवद् बली,वहाँ जरासंधकुमार सहदेवको सान्त्वना देकर उसे कर देनेकी शर्तपर उसी राज्यपर प्रतिष्ठित कर दिया और उन सबके साथ बलवान भीमने कर्णपर चढ़ाई की। पाण्डवश्रेष्ठ भीमने पृथ्वीको कम्पित-सी करते हुए चतुरंगिणी सेना साथ ले शत्रुघाती कर्णके साथ युद्ध छेड़ दिया। भारत! उस युद्धमें कर्णको परास्त करके अपने वशमें कर लेनेके पश्चात् बलवान् भीमने पर्वतीय राजाओंपर विजय प्राप्त की। तदनन्तर पाण्डुनन्दन भीमसेनने मोदागिरिके अत्यन्त बलिष्ठ राजाको अपनी भुजाओंके बलसे महासमरमें मार गिराया
জারাসন্ধিকে সান্ত্বনা দিয়ে এবং কর প্রদানের শর্তে তাকে সেই রাজ্যেই প্রতিষ্ঠিত করে, বলবান ভীম সেই সকলের সঙ্গেই কর্ণের বিরুদ্ধে অভিযান করলেন।
Verse 19
स कम्पयन्निव महीं बलेन चतुरज्लिणा । युयुधे पाण्डवश्रेष्ठ: कर्णेनामित्रघातिना,वहाँ जरासंधकुमार सहदेवको सान्त्वना देकर उसे कर देनेकी शर्तपर उसी राज्यपर प्रतिष्ठित कर दिया और उन सबके साथ बलवान भीमने कर्णपर चढ़ाई की। पाण्डवश्रेष्ठ भीमने पृथ्वीको कम्पित-सी करते हुए चतुरंगिणी सेना साथ ले शत्रुघाती कर्णके साथ युद्ध छेड़ दिया। भारत! उस युद्धमें कर्णको परास्त करके अपने वशमें कर लेनेके पश्चात् बलवान् भीमने पर्वतीय राजाओंपर विजय प्राप्त की। तदनन्तर पाण्डुनन्दन भीमसेनने मोदागिरिके अत्यन्त बलिष्ठ राजाको अपनी भुजाओंके बलसे महासमरमें मार गिराया
পাণ্ডবশ্রেষ্ঠ ভীম চতুরঙ্গিনী সেনার বল নিয়ে যেন পৃথিবীকে কাঁপিয়ে, শত্রুঘাতী কর্ণের সঙ্গে যুদ্ধে প্রবৃত্ত হলেন।
Verse 20
स कर्ण युधि निर्जित्य वशे कृत्वा च भारत । ततो विजिग्ये बलवान् राज्ञ: पर्वतवासिन:,वहाँ जरासंधकुमार सहदेवको सान्त्वना देकर उसे कर देनेकी शर्तपर उसी राज्यपर प्रतिष्ठित कर दिया और उन सबके साथ बलवान भीमने कर्णपर चढ़ाई की। पाण्डवश्रेष्ठ भीमने पृथ्वीको कम्पित-सी करते हुए चतुरंगिणी सेना साथ ले शत्रुघाती कर्णके साथ युद्ध छेड़ दिया। भारत! उस युद्धमें कर्णको परास्त करके अपने वशमें कर लेनेके पश्चात् बलवान् भीमने पर्वतीय राजाओंपर विजय प्राप्त की। तदनन्तर पाण्डुनन्दन भीमसेनने मोदागिरिके अत्यन्त बलिष्ठ राजाको अपनी भुजाओंके बलसे महासमरमें मार गिराया
হে ভারত! যুদ্ধে কর্ণকে পরাজিত করে ও বশে এনে, বলবান ভীম এরপর পর্বতবাসী রাজাদেরও জয় করলেন।
Verse 21
अथ मोदागिरौ चैव राजानं बलवत्तरम् | पाण्डवो बाहुवीर्येण निजघान महामृधे,वहाँ जरासंधकुमार सहदेवको सान्त्वना देकर उसे कर देनेकी शर्तपर उसी राज्यपर प्रतिष्ठित कर दिया और उन सबके साथ बलवान भीमने कर्णपर चढ़ाई की। पाण्डवश्रेष्ठ भीमने पृथ्वीको कम्पित-सी करते हुए चतुरंगिणी सेना साथ ले शत्रुघाती कर्णके साथ युद्ध छेड़ दिया। भारत! उस युद्धमें कर्णको परास्त करके अपने वशमें कर लेनेके पश्चात् बलवान् भीमने पर्वतीय राजाओंपर विजय प्राप्त की। तदनन्तर पाण्डुनन्दन भीमसेनने मोदागिरिके अत्यन्त बलिष्ठ राजाको अपनी भुजाओंके बलसे महासमरमें मार गिराया
এরপর মোদাগিরিতে পাণ্ডব ভীম মহাযুদ্ধে নিজের বাহুবলে অতিশয় বলবান এক রাজাকে নিপাত করলেন।
Verse 22
ततः पुण्ड्राधिपं वीरं॑ वासुदेव॑ं महाबलम् | कौशिकीकच्छनिलयं राजानं च महौजसम्,महाराज! तत्पश्चात् भीमसेन पुण्ड्रकदेशके अधिपति महाबली वीर राजा वासुदेवके साथ, जो कोसी नदीके कछारमें रहनेवाले तथा महान् तेजस्वी थे, जा भिड़े। वे दोनों ही बलवान् एवं दुःसह पराक्रमवाले वीर थे। भीमने विपक्षी वासुदेव (पौण्ड्रक)-को युद्धमें हराकर वंगदेशके राजापर आक्रमण किया
বৈশম্পায়ন বললেন—তারপর ভীমসেন পুণ্ড্রদেশের অধিপতি মহাবলী বীর বাসুদেবের সঙ্গে যুদ্ধে প্রবৃত্ত হলেন; তিনি কৌশিকী (কোসি) নদীর জলাভূমি-তটভূমিতে বাস করতেন এবং মহাতেজস্বী ছিলেন। উভয়েই প্রবল শক্তিধর ও দুর্ধর্ষ পরাক্রমী বীর। ভীম রণক্ষেত্রে প্রতিপক্ষ বাসুদেবকে পরাজিত করে পরে বঙ্গদেশের রাজার উপর আক্রমণ করতে অগ্রসর হলেন।
Verse 23
उभौ बलभूतौ वीरावुभौ तीव्रपराक्रमौ । निर्जित्याजी महाराज वज्भराजमुपाद्रवत्,महाराज! तत्पश्चात् भीमसेन पुण्ड्रकदेशके अधिपति महाबली वीर राजा वासुदेवके साथ, जो कोसी नदीके कछारमें रहनेवाले तथा महान् तेजस्वी थे, जा भिड़े। वे दोनों ही बलवान् एवं दुःसह पराक्रमवाले वीर थे। भीमने विपक्षी वासुदेव (पौण्ड्रक)-को युद्धमें हराकर वंगदेशके राजापर आक्रमण किया
বৈশম্পায়ন বললেন—হে মহারাজ, উভয়েই বলবান বীর, উভয়েই তীব্র পরাক্রমশালী। যুদ্ধে জয়লাভ করে ভীমসেন পরে বঙ্গদেশের রাজার উপর আক্রমণ করলেন।
Verse 24
समुद्रसेनं निर्जित्य चन्द्रसेनं च पार्थिवम् । ताम्रलिप्तं च राजानं कर्वटाधिपतिं तथा,तदनन्तर भरतश्रेष्ठ भीमसेनने समुद्रसेन, भूपाल चन्द्रसेन, राजा ताम्रलिप्त, कर्वटाधिपति तथा सुह्यनरेशको जीतकर समुद्रके तटपर निवास करनेवाले समस्त म्लेच्छोंको भी अपने अधीन कर लिया
সমুদ্রসেনকে পরাজিত করে এবং পার্থিব চন্দ্রসেনকেও জয় করে ভীমসেন তাম্রলিপ্তের রাজা ও কর্বটের অধিপতিকেও বশে আনলেন।
Verse 25
सुह्यानामधिपं चैव ये च सागरवासिन: । सर्वान् म्लेच्छगणांश्वैव विजिग्ये भरतर्षभ:,तदनन्तर भरतश्रेष्ठ भीमसेनने समुद्रसेन, भूपाल चन्द्रसेन, राजा ताम्रलिप्त, कर्वटाधिपति तथा सुह्यनरेशको जीतकर समुद्रके तटपर निवास करनेवाले समस्त म्लेच्छोंको भी अपने अधीन कर लिया
তারপর ভরতশ্রেষ্ঠ ভীম সুহ্যদের অধিপতিকেও এবং সাগরতটে বসবাসকারীদেরও—অর্থাৎ সমুদ্রতীরবর্তী সকল ম্লেচ্ছগোষ্ঠীকেই—জয় করলেন।
Verse 26
एवं बहुविधान् देशान् विजित्य पवनात्मज: । वसु तेभ्य उपादाय लौहित्यमगमद् बली,इस प्रकार पवनपुत्र बलवान् भीमने बहुत-से देशोंपर अधिकार प्राप्त करके उन सबसे धन लेकर लौहित्य देशकी यात्रा की
এইভাবে পবনপুত্র বলবান ভীম নানাবিধ দেশ জয় করে সেখান থেকে ধন-সম্পদ গ্রহণ করে লৌহিত্য দেশের দিকে যাত্রা করলেন।
Verse 27
स सर्वान् म्लेच्छनूपतीन् सागरानूपवासिन: । करमाहारयामास रत्नानि विविधानि च,वहाँ उन्होंने समुद्रके टापुओंमें रहनेवाले बहुत-से म्लेच्छ राजाओंको जीतकर उनसे करके रूपमें भाँति-भाँतिके रत्न वसूल किये
বৈশম্পায়ন বললেন—সমুদ্রবেষ্টিত দ্বীপ ও উপকূলীয় অনূপভূমিতে বসবাসকারী সকল ম্লেচ্ছ রাজাকে জয় করে তিনি তাদের থেকে কর-খাজনা হিসেবে নানাবিধ রত্ন আহরণ করালেন।
Verse 28
चन्दनागुरुवस्त्राणि मणिमौक्तिककम्बलम् | काज्चनं रजत चैव विद्रुमं च महाधनम्,इतना ही नहीं, उन राजाओंने भीमसेनको चन्दन, अगुरु, वस्त्र, मणि, मोती, कम्बल, सोना, चाँदी और बहुमूल्य मूँगे भेंट किये। कुन्ती और पाण्डुके पुत्र महात्मा भीमसेनके पास उन्होंने करोड़की संख्यामें धन-रत्नोंकी वर्षा की (करके रूपमें धन-रत्न प्रदान किये)
বৈশম্পায়ন বললেন—সেই রাজারা ভীমসেনকে চন্দন, অগুরু, উৎকৃষ্ট বস্ত্র, মণি-মুক্তায় অলংকৃত কম্বল, এবং স্বর্ণ, রৌপ্য ও অমূল্য প্রবাল—এমন মহাধন নিবেদন করল।
Verse 29
इस प्रकार श्रीमहाभारत यसभापववके अन्तर्गत विग्विजयपर्वमें भीमदिग्विजयविषयक उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,ते कोटिशतसंख्येन कौन्तेयं महता तदा । अभ्यवर्षन् महात्मानं धनवर्षेण पाण्डवम् इतना ही नहीं, उन राजाओंने भीमसेनको चन्दन, अगुरु, वस्त्र, मणि, मोती, कम्बल, सोना, चाँदी और बहुमूल्य मूँगे भेंट किये। कुन्ती और पाण्डुके पुत्र महात्मा भीमसेनके पास उन्होंने करोड़की संख्यामें धन-रत्नोंकी वर्षा की (करके रूपमें धन-रत्न प्रदान किये)
তখন সেই রাজারা কোটি-শত সংখ্যার সমান বিপুল পরিমাণে পাণ্ডুপুত্র মহাত্মা কৌন্তেয় ভীমের উপর ধনবৃষ্টি বর্ষণ করল।
Verse 30
इन्द्रप्रस्थमुपागम्य भीमो भीमपराक्रम: । निवेदयामास तदा धर्मराजाय तद् धनम्,तदनन्तर भयानक पराक्रमी भीमने इन्द्रप्रसथ्थमें आकर वह सारा धन धर्मराजको सौंप दिया इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि भीमप्राचीदिग्विजये त्रिशो5ध्याय: ।। ३० || इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापरव्वके अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें भीमके द्वारा पूर्व दिशाकी विजयसे सम्बन्ध रखनेवाला तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
তারপর ভীম, ভীমপরাক্রমী, ইন্দ্রপ্রস্থে ফিরে এসে সেই সমস্ত ধন ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের নিকট নিবেদন করল।
Verse 76
युध्यमानं बलात् संख्ये विजिग्ये पाण्डवर्षभ: । इसके बाद पाण्बुपुत्र भीमने सुपाश्वके निकट राजराजेश्वर क्रथको, जो युद्धमें बलपूर्वक उनका सामना कर रहे थे, हरा दिया
রণক্ষেত্রে বলপ্রয়োগে যুদ্ধরত সেই প্রতিদ্বন্দ্বীকে পাণ্ডবশ্রেষ্ঠ (ভীম) পরাজিত করল।
It implicitly balances coercive authority (suppression of predation and enforcement of order) with ethical restraint (truthfulness, regulated revenue), presenting sovereignty as legitimate only when power is subordinated to dharma and public welfare.
Material surplus is ethically meaningful when produced through dharmic governance and then redirected toward collective, rule-governed ends—here, yajña—rather than private accumulation.
No explicit phalaśruti formula appears in the provided passage; the meta-function is narrative-structural, establishing that dharmic rule yields prosperity and ritual legitimacy, thereby justifying the Rājasūya’s initiation within the epic’s moral economy.