
मयेन सभानिर्माणम् (Maya’s Construction of the Assembly Hall)
Upa-parva: Maya-sabhā-nirmāṇa (The Construction of Maya’s Assembly Hall Episode)
Vaiśaṃpāyana narrates Maya’s address to Arjuna: he takes leave, promising a swift return (1). Maya describes a northern locale beyond Kailāsa toward Maināka and the pleasant Bindusaras region, where he had earlier fashioned a jewel-made architectural treasury and where the former assembly resources of Vṛṣaparvan are said to remain (2–4). He identifies specific items: a superior mace stored near Bindusaras, once deposited by King Yauvanāśva after battlefield victories, heavy, durable, and suited to Bhīma (5–6); and the great Varuṇa-conch Devadatta, which he vows to bestow upon Arjuna (7). The narrative then details the northern terrain—Hiraṇyaśṛṅga, the gem-like mountain, and Bindusaras associated with Bhagīratha and major sacrificial histories (8–15). Maya reaches the site, collects the mace, conch, and crystalline sabhā materials linked to Vṛṣaparvan, aided by attendants and rākṣasa helpers (16). He constructs an incomparable, widely renowned, divine, gem-built assembly hall, and distributes the mace to Bhīma and Devadatta to Arjuna (17–18). The hall’s dimensions, radiance, and materials are described with cosmic similes (19–24). Eight thousand formidable Kiṃkara rākṣasas are assigned as carriers and guardians (25–26). Maya further creates an illusion-like lotus-lake with gem-stems and rich fauna, causing some visiting kings to misperceive it and stumble (27–30). Surrounding groves, ponds, birds, and fragrant winds complete the courtly environment (31–33). The construction is completed in fourteen months and formally presented to Dharmarāja Yudhiṣṭhira (34).
Chapter Arc: वैशम्पायन जनमेजय को बताते हैं कि खाण्डव-दाह के बाद पाण्डवों के यश और वैभव का नया अध्याय खुलता है—और उसी क्षण मयासुर, जो अग्नि से बचाया गया था, कृतज्ञता का ऋण चुकाने को आगे आता है। → मयासुर पाण्डवों के लिए ऐसी सभा रचने का संकल्प करता है जो तीनों लोकों में विख्यात हो; वह पूर्वकाल के दिव्य-दैत्य-निर्मित वैभव, बिन्दुसर तीर्थ और मणिमय सामग्री का स्मरण कराता है, मानो कह रहा हो कि यह केवल भवन नहीं, प्रतिष्ठा का सिंहासन होगा। साथ ही वह संकेत देता है कि यदि वह अद्भुत सामग्री अब भी सुरक्षित है तो उसे लाकर पाण्डव-यश को स्थायी रूप देगा। → मयासुर का वरदान मूर्त रूप लेता है—भीमसेन को श्रेष्ठ गदा और अर्जुन को ‘देवदत्त’ नामक उत्तम शंख प्रदान किए जाते हैं; फिर उसी दिव्य कौशल से चौदह महीनों में मणि-रत्नों से जड़ी, मायावी जल-सरिताओं और नलिनियों वाली अप्रतिम सभा का निर्माण होता है, जिसमें भीतर ही भीतर वैदूर्य-पत्रों और मणि-नालों वाली कमलिनी तक रची जाती है। → निर्माण पूर्ण होने पर मय धर्मराज युधिष्ठिर को उस ‘यशस्विनी’ सभा का निवेदन करता है—सभा अब पाण्डव-राज्य की नई पहचान बनती है, और कृतज्ञता का ऋण स्थापत्य-वैभव में परिणत हो जाता है। → यह अद्भुत सभा, जो अभी गौरव का कारण है, आगे चलकर किसके लिए भ्रम, अहंकार और विनाश का द्वार बनेगी—यह प्रश्न हवा में टँगा रह जाता है।
Verse 1
जब अल श््मु # तृतीयो<थध्याय: मयासुरका भीमसेन और अर्जुनको गदा और शंख लाकर देना तथा उसके द्वारा अद्भुत सभाका निर्माण वैशम्पायन उवाच अथाब्रवीन्मय: पार्थमर्जुनं जयतां वरम् | आपूृच्छे त्वां गमिष्यामि पुनरेष्यामि चाप्यहम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर मयासुरने विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ अर्जुनसे कहा--'भारत! मैं आपकी आज्ञा चाहता हूँ। मैं एक जगह जाऊँगा और फिर शीघ्र ही लौट आऊँगा
বৈশম্পায়ন বললেন—তারপর ময়াসুর বিজয়ীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ পার্থ অর্জুনকে বলল—“হে ভারত! আপনার অনুমতি চাই। আমি এক স্থানে যাব, এবং শীঘ্রই আবার ফিরে আসব।”
Verse 2
इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत सभाक्रियापर्वमें भगवान् श्रीकृष्णकी द्वारकायात्राविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ,(विश्रुतां त्रिषु लोकेषु पार्थ दिव्यां सभां तव । प्राणिनां विस्मयकरीं तव प्रीतिविवर्धिनीम् । पाण्डवानां च सर्वेषां करिष्यामि धनंजय ।।) “कुन्तीकुमार धनंजय! मैं आपके लिये तीनों लोकोंमें विख्यात एक दिव्य सभाभवनका निर्माण करूँगा। जो समस्त प्राणियोंको आश्वर्यमें डालनेवाली तथा आपके साथ ही समस्त पाण्डवोंकी प्रसन्नता बढ़ानेवाली होगी। उत्तरेण तु कैलासं मैनाकं पर्वत प्रति । यियक्षमाणेषु पुरा दानवेषु मया कृतम् 'पूर्वकालमें जब दैत्यलोग कैलास पर्वतसे उत्तर दिशामें स्थित मैनाक पर्वतपर यज्ञ करना चाहते थे, उस समय मैंने एक विचित्र एवं रमणीय मणिमय भाण्ड तैयार किया था, जो बिन्दुसरके समीप सत्यप्रतिज्ञ राजा वृषपर्वाकी सभामें रखा गया था
বৈশম্পায়ন বললেন—“হে পার্থ, হে ধনঞ্জয়! আমি তোমার জন্য তিন লোকেই খ্যাত এক দিব্য সভাগৃহ নির্মাণ করব—যা সকল প্রাণীকে বিস্ময়ে নিমগ্ন করবে এবং তোমার ও সকল পাণ্ডবের আনন্দ বৃদ্ধি করবে। প্রাচীনকালে, কৈলাসের উত্তরে মৈনাক পর্বতে দানবরা যখন যজ্ঞ করতে উদ্যত হয়েছিল, তখন আমি (সেই উদ্দেশ্যে) এক আশ্চর্য নির্মাণ করেছিলাম।”
Verse 3
चित्र मणिमयं भाण्डं रम्यं बिन्दुसर: प्रति । सभायां सत्यसंधस्य यदासीद् वृषपर्वण:,'पूर्वकालमें जब दैत्यलोग कैलास पर्वतसे उत्तर दिशामें स्थित मैनाक पर्वतपर यज्ञ करना चाहते थे, उस समय मैंने एक विचित्र एवं रमणीय मणिमय भाण्ड तैयार किया था, जो बिन्दुसरके समीप सत्यप्रतिज्ञ राजा वृषपर्वाकी सभामें रखा गया था इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि सभाक्रियापर्वणि सभानिर्माणे तृतीयो5ध्याय:
বৈশম্পায়ন বললেন—বিন্দুসরসের নিকটে সত্যসংকল্প রাজা বৃষপর্বণের সভায় নানাবিধ রত্নে নির্মিত এক আশ্চর্য ও মনোহর মণিময় পাত্র স্থাপিত ছিল।
Verse 4
आगमिष्यामि तद् गृह यदि तिष्ठति भारत । ततः सभां करिष्यामि पाण्डवस्य यशस्विनीम्,“भारत! यदि वह अबतक वहीं होगा तो उसे लेकर पुनः लौट आऊँगा। फिर उसीसे पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके यशको बढ़ानेवाली सभा तैयार करूँगा
বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভারত! যদি সে এখনও সেখানে থাকে, তবে আমি সেই গৃহে গিয়ে তাকে নিয়ে আসব; তারপর পাণ্ডব (যুধিষ্ঠির)-এর যশ বৃদ্ধি করে এমন এক মহিমান্বিত সভা নির্মাণ করাব।
Verse 5
मन: प्रह्लादिनीं चित्रां सर्वरत्नविभूषिताम् । अस्ति बिन्दुसरस्युग्रा गदा च कुरुनन्दन,“जो सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित, विचित्र एवं मनको आह्लाद प्रदान करनेवाली होगी। कुरुनन्दन! बिन्दुसरमें एक भयंकर गदा भी है
বৈশম্পায়ন বললেন—তা হবে সর্বরত্নে বিভূষিত, বিচিত্র ও মন-প্রসন্নকারী। আর হে কুরুনন্দন! বিন্দুসরসে একটি উগ্র, ভয়ংকর গদাও আছে।
Verse 6
निहिता भावयाम्ेवं राज्ञा हत्वा रणे रिपून् । सुवर्णबिन्दुभिश्षित्रा गुर्वी भारसहा दृढा,“मैं समझता हूँ, राजा वृषपववनि युद्धमें शत्रुओंका संहार करके वह गदा वहीं रख दी थी। वह गदा बड़ी भारी है, विशेष भार या आघात सहन करनेमें समर्थ एवं सुदृढ़ है। उसमें सोनेकी फूलियाँ लगी हुई हैं, जिनसे वह बड़ी विचित्र दिखायी देती है
বৈশম্পায়ন বললেন—আমি এমনই মনে করি, রাজা রণে শত্রুদের বধ করে সেই গদাটি সেখানে রেখে দিয়েছিলেন। সোনার বোঁটা-সদৃশ খচিত অলংকারে তা বিচিত্র দেখায়; তা অতিশয় ভারী, আঘাত ও ভার বহনে সক্ষম এবং দৃঢ়।
Verse 7
सा वै शतसहस्नस्य सम्मिता शत्रुधातिनी । अनुरूपा च भीमस्य गाण्डीवं भवतो यथा,'शत्रुओंका संहार करनेवाली वह गदा अकेली ही एक लाख गदाओंके बराबर है। जैसे गाण्डीव धनुष आपके योग्य है, वैसे ही वह गदा भीमसेनके योग्य होगी
বৈশম্পায়ন বললেন—শত্রুনাশিনী সেই গদা একাই লক্ষ গদার সমান। যেমন গাণ্ডীব ধনুক আপনার উপযুক্ত, তেমনি সেই গদা ভীমসেনের উপযুক্ত হবে।
Verse 8
वारुणश्र महाशड्खो देवदत्त: सुघोषवान् | सर्वमेतत् प्रदास्यामि भवते नात्र संशय:,“वहाँ वरुणदेवका देवदत्त नामक महान् शंख भी है, जो बड़ी भारी आवाज करनेवाला है। ये सब वस्तुएँ लाकर मैं आपको भेंट करूँगा, इसमें संशय नहीं है”
বৈশম্পায়ন বললেন—সেখানে বরুণদেবের ‘দেবদত্ত’ নামে এক মহাশঙ্খও আছে, যার ধ্বনি অতি গম্ভীর। এই সমস্ত বস্তু এনে আমি আপনাকে নিবেদন করব—এ বিষয়ে কোনো সংশয় নেই।
Verse 9
इत्युक्त्वा सो5सुर: पार्थ प्रागुदीचीं दिशं गत: । अथोत्तरेण कैलासान्मैनाकं पर्वतं प्रति,अर्जुनसे ऐसा कहकर मयासुर पूर्वोत्तर दिशा (ईशानकोण)-में कैलाससे उत्तर मैनाक पर्वतके पास गया
বৈশম্পায়ন বললেন—এ কথা বলে, হে পার্থ, সেই অসুর উত্তর-পূর্ব দিকের দিকে রওনা হল। তারপর কৈলাসের উত্তরে দিয়ে অগ্রসর হয়ে মৈনাক পর্বতের দিকে গেল।
Verse 10
हिरण्यशूज्र: सुमहान् महामणिमयो गिरि: । रम्यं बिन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथ:
বৈশম্পায়ন বললেন—সেখানে ‘হিরণ্যশৃঙ্গ’ নামে এক অতি বৃহৎ পর্বত ছিল, যেন মহামণিতে গঠিত এবং স্বর্ণের মতো দীপ্তিমান। সেখানেই ‘বিন্দুসর’ নামে এক মনোরম সরোবর ছিল, যা রাজা ভগীরথের স্মৃতির সঙ্গে যুক্ত।
Verse 11
यत्रेष्ट सर्वभूतानामी श्वरेण महात्मना,भरतश्रेष्ठ! वहीं सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी महात्मा प्रजापतिने मुख्य-मुख्य सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया था, जिनमें सोनेकी वेदियाँ और मणियोंके खंभे बने थे
বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! সেই স্থানেই সর্বভূতের অধীশ্বর মহাত্মা প্রজাপতি প্রধান প্রধান একশো যজ্ঞ সম্পন্ন করেছিলেন।
Verse 12
आद्वता: क्रतवो मुख्या: शतं भरतसत्तम । यत्र यूपा मणिमय श्रैत्याश्वापि हिरण्मया:,भरतश्रेष्ठ! वहीं सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी महात्मा प्रजापतिने मुख्य-मुख्य सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया था, जिनमें सोनेकी वेदियाँ और मणियोंके खंभे बने थे
বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভরতসত্তম! সেখানে বিধিপূর্বক প্রধান প্রধান একশো ক্রতু সম্পন্ন হয়েছিল; যেখানে যজ্ঞস্তম্ভ (যূপ) ছিল মণিময় এবং বেদী ও অন্যান্য শ্রৌত সামগ্রী ছিল স্বর্ণময়।
Verse 13
शोभार्थ विहितास्तत्र न तु दृष्टान्तत: कृता: । अन्रेष्टवा स गत: सिद्धि सहस््राक्ष: शचीपति:,यह सब शोभाके लिये बनाया गया था, शास्त्रीय विधि अथवा सिद्धान्तके अनुसार नहीं। सहस्र नेत्रोंवाले शचीपति इन्द्रने भी वहीं यज्ञ करके सिद्धि प्राप्त की थी
বৈশম্পায়ন বললেন— সেখানে যে আয়োজন ছিল, তা কেবল শোভা ও ঐশ্বর্যের জন্য; কোনো শাস্ত্রীয় দৃষ্টান্ত বা প্রমাণরূপে নির্মিত নয়। তবু সহস্রনেত্র শচীপতি ইন্দ্রও সিদ্ধির অন্বেষণে সেখানে গিয়ে যজ্ঞ করে সিদ্ধি লাভ করেছিলেন।
Verse 14
यत्र भूतपति: सृष्टवा सर्वान् लोकान् सनातन: । उपास्यते तिग्मतेजा: स्थितो भूत: सहस्रशः,सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा और समस्त प्राणियोंके अधिपति उग्रतेजस्वी सनातन देवता महादेवजी वहीं रहकर सहसोरों भूतोंसे सेवित होते हैं
যেখানে সনাতন, তীক্ষ্ণতেজস্বী ভূতপতি—সমস্ত লোকের স্রষ্টা—মহাদেব অবস্থান করেন এবং সহস্র সহস্র ভূতগণের দ্বারা উপাসিত হন।
Verse 15
नरनारायणोौ ब्रह्मा यम: स्थाणुश्न॒ पठचम: । उपासते यत्र सत्र॑ सहस्रयुगपर्यये,एक हजार युग बीतनेपर वहीं नर-नारायण ऋषि, ब्रह्मा, यमराज और पाँचवें महादेवजी यज्ञका अनुष्ठान करते हैं
যেখানে সহস্র যুগ পরিপূর্ণ হলে নর-নারায়ণ ঋষি, ব্রহ্মা, যম এবং পঞ্চম স্থাণু (মহাদেব) সত্র-যজ্ঞের অনुष্ঠান ও উপাসনা করেন।
Verse 16
यत्रेष्टं वासुदेवेन सत्रैर्वर्षणणान् बहून् । श्रद्दधानेन सततं धर्मसम्प्रतिपत्तये,यह वही स्थान है, जहाँ भगवान् वासुदेवने धर्मपरम्पराकी रक्षाके लिये बहुत वर्षोतक निरंतर श्रद्धापूर्वक यज्ञ किया था
সেই স্থানেই ধর্মের যথার্থ প্রতিষ্ঠার জন্য বাসুদেব শ্রদ্ধাসহকারে বহু শত বছর অবিরত সত্র-যজ্ঞ সম্পাদন করেছিলেন।
Verse 17
सुवर्णमालिनो यूपाश्रैत्याश्वाप्पतिभास्वरा: । ददौ यत्र सहस्राणि प्रयुतानि च केशव:,उस यज्ञमें स्वर्णणालाओंसे मण्डित खंभे और अत्यन्त चमकीली वेदियाँ बनी थीं। भगवान् केशवने उस यज्ञमें सहस्रों-लाखों वस्तुएँ दानमें दी थीं
সেই যজ্ঞে যূপগুলি স্বর্ণমালায় ভূষিত ছিল এবং বেদিগুলিও দীপ্তিময় ছিল। সেখানেই কেশব সহস্র সহস্র ও প্রয়ুত (দশ-দশ হাজার) পরিমাণ দান প্রদান করেছিলেন।
Verse 18
तत्र गत्वा स जग्राह गदां शड्खं च भारत । स्फाटिकं च सभाद्रव्यं यदासीद् वृषपर्वण:,भारत! तदनन्तर मयासुरने वहाँ जाकर वह गदा, शंख और सभाभवन बनानेके लिये स्फटिक मणिमय द्रव्य ले लिया, जो पहले वृषपर्वाके अधिकारमें था
সেখানে গিয়ে, হে ভারত, সে গদা ও শঙ্খ এবং সভাগৃহ নির্মাণের জন্য স্ফটিকময় দ্রব্যও অধিকার করল—যা পূর্বে বৃষপর্বণের ছিল।
Verse 19
किंकरै: सह रक्षोभियदरक्षन्महद् धनम् । तदगृह्लान्मयस्तत्र गत्वा सर्व महासुर:,बहुत-से किंकर तथा राक्षस जिस महान् धनकी रक्षा करते थे, वहाँ जाकर महान् असुर मयने वह सब ले लिया
কিংকর ও রাক্ষসেরা যে মহাধন রক্ষা করত, সেখানে গিয়ে মহাবলী অসুর ময় সে সবই অধিকার করল।
Verse 20
तदाह्ृत्य च तां चक्रे सो5सुरोडप्रतिमां सभाम् । विश्रुतां त्रिषु लोकेषु दिव्यां मणिमयीं शुभाम्,वे सब वस्तुएँ लाकर उस असुरने वह अनुपम सभाभवन तैयार की, जो तीनों लोकोंमें विख्यात, दिव्य, मणिमयी और शुभ एवं सुन्दर थी
সে সব বস্তু এনে সেই অসুর এক অনুপম সভাগৃহ নির্মাণ করল—যা ত্রিলোকে প্রসিদ্ধ, দিব্য, মণিময় ও মঙ্গলময় ছিল।
Verse 21
गदां च भीमसेनाय प्रवरां प्रददौ तदा । देवदत्तं चार्जुनाय शड्खप्रवरमुत्तमम्,उसने उस समय वह श्रेष्ठ गदा भीमसेनको और देवदत्त नामक उत्तम शंख अर्जुनको भेंट कर दिया
তখন সে ভীমসেনকে শ্রেষ্ঠ গদা দিল, আর অর্জুনকে ‘দেবদত্ত’ নামে উত্তম—শঙ্খসমূহের মধ্যে শ্রেষ্ঠ—শঙ্খ প্রদান করল।
Verse 22
यस्य शड्खस्य नादेन भूतानि प्रचकम्पिरे । सभा च सा महाराज शातकुम्भमयद्रुमा,उस शंखकी आवाज सुनकर समस्त प्राणी काँप उठते थे। महाराज! उस सभामें सुवर्णमय वृक्ष शोभा पाते थे
যে শঙ্খের নাদে সকল প্রাণী কেঁপে উঠত; আর হে মহারাজ, সেই সভাগৃহে শাতকুম্ভ—বিশুদ্ধ স্বর্ণ—নির্মিত বৃক্ষ শোভা পেত।
Verse 23
दशकिष्कुसहस्राणि समन्तादायताभवत् । यथा बल्लेर्यथार्कस्य सोमस्यथ च यथा सभा
বৈশম্পায়ন বললেন—সেই সভাগৃহ চারদিকে দশ হাজার কিষ্কু পর্যন্ত বিস্তৃত ছিল। তার দীপ্তি সূর্য ও চন্দ্রের জ্যোতির তুল্য; আশ্চর্য ও আদর্শ রাজসভা-সদৃশ সে গৃহ অতুল কারুকার্যে প্রকাশিত রাজশক্তির প্রতীক হয়ে দণ্ডায়মান ছিল।
Verse 24
अभिष्नतीव प्रभया प्रभामर्कस्य भास्वराम्,वह अपनी प्रभाद्वारा सूर्यदेवकी तेजोमयी प्रभासे टक्कर लेती थी
বৈশম্পায়ন বললেন—তার দীপ্তি যেন সূর্যের দগ্ধ জ্যোতিকে আঘাত করে, এমনকি তার সঙ্গে প্রতিদ্বন্দ্বিতা করে। তার দেহ থেকে নির্গত আলো এতই প্রখর ছিল যে দর্শকদের মনে বিস্ময় ও ভক্তিভীতির সঞ্চার হতো।
Verse 25
प्रबभौ ज्वलमानेव दिव्या दिव्येन वर्चसा । नवमेघप्रतीकाशा दिवमावृत्य विछिता । आयता विपुला रम्या विपाप्मा विगतक््लमा,वह दिव्य सभाभवन अपने अलौकिक तेजसे निरंतर प्रदीप्त-तसी जान पड़ती थी। उसकी ऊँचाई इतनी अधिक थी कि नूतन मेघोंकी घटाके समान वह आकाशको घेरकर खड़ी थी। उसका विस्तार भी बहुत था। वह रमणीय सभाभवन पाप-तापका नाश करनेवाली थी
বৈশম্পায়ন বললেন—সেই দিব্য সভাগৃহ যেন সদা জ্বলন্ত, অলৌকিক তেজে দীপ্ত ছিল। নবীন মেঘপুঞ্জের ন্যায় তা আকাশ আচ্ছাদিত করে উচ্চ হয়ে দাঁড়িয়েছিল। তা দীর্ঘ, বিস্তৃত ও মনোহর; পাপ ও তাপ নাশকারী, এবং ক্লান্তি-ক্লেশহীন ছিল।
Verse 26
उत्तमद्रव्यसम्पन्ना रत्नप्राकारतोरणा । बहुचित्रा बहुधना सुकृता विश्वकर्मणा,उत्तमोत्तम द्रव्योंसे उसका निर्माण किया गया था। उसके परकोटे और फाटक रत्नोंसे बने हुए थे। उसमें अनेक प्रकारके अद्भुत चित्र अंकित थे। वह बहुत धनसे पूर्ण थी। दानवोंके विश्वकर्मा मयासुरने उस सभाभवनको बहुत सुन्दरतासे बनाया था
বৈশম্পায়ন বললেন—সেই সভা উৎকৃষ্টতম উপকরণে সমৃদ্ধ ছিল; তার প্রাচীর ও তোরণদ্বার রত্নে নির্মিত। নানাবিধ আশ্চর্য চিত্র ও অলংকরণে তা শোভিত, এবং বিপুল ধনসম্পদে পূর্ণ ছিল। দানবশিল্পী ময়াসুর—বিশ্বকর্মার তুল্য—অতিশয় সৌন্দর্যে তা নির্মাণ করেছিলেন।
Verse 27
न दाशार्ही सुधर्मा वा ब्रह्मणो वाथ तादृशी । सभा रूपेण सम्पन्ना यां चक्रे मतिमान् मय:,बुद्धिमान मयने जिस सभाका निर्माण किया था, उसके समान सुन्दर यादवोंकी सुधर्मा सभा अथवा ब्रह्माजीकी सभा भी नहीं थी
বৈশম্পায়ন বললেন—বুদ্ধিমান ময় যে সভা নির্মাণ করেছিলেন, রূপ-ঐশ্বর্যে তার তুল্য ছিল না দাশার্হদের (যাদবদের) সুধর্মা সভা, আর না ব্রহ্মার সভাও।
Verse 28
तां सम तत्र मयेनोक्ता रक्षन्ति च वहन्ति च । सभामष्टौ सहस्राणि किंकरा नाम राक्षसा:,मयासुरकी आज्ञाके अनुसार आठ हजार किंकर नामक राक्षस उस सभाकी रक्षा करते और उसे एक स्थानसे दूसरे स्थानपर उठाकर ले जाते थे
সেই স্থানে ময়াসুরের আদেশ অনুসারে ‘কিঙ্কর’ নামে আট হাজার রাক্ষস সেই সভাগৃহকে রক্ষা করত এবং প্রয়োজনে তুলে এক স্থান থেকে অন্য স্থানে বহন করত।
Verse 29
अन्तरिक्षचरा घोरा महाकाया महाबला: । रक्ताक्षा: पिड़लाक्षाश्न शुक्तिकर्णा: प्रहारिण:,वे राक्षस भयंकर आकृतिवाले, आकाशमें विचरने-वाले, विशालकाय और महाबली थे। उनकी आँखें लाल और पिंगलवर्णकी थीं तथा कान सीपीके समान जान पड़ते थे। वे सब-के-सब प्रहार करनेमें कुशल थे
সেই রাক্ষসেরা আকাশচারী, ভয়ংকর, বিশালদেহী ও মহাবলবান ছিল। তাদের চোখ লাল ও পিঙ্গলবর্ণ; কান শুক্তি (ঝিনুকের খোল)-সদৃশ দেখাত। সকলেই আঘাত হানতে অত্যন্ত দক্ষ ছিল।
Verse 30
तस्यां सभायां नलिनीं चकाराप्रतिमां मय: । वैदूर्यपत्रविततां मणिनालमयाम्बुजाम्,मयासुरने उस सभाभवनके भीतर एक बड़ी सुन्दर पुष्करिणी बना रखी थी, जिसकी कहीं तुलना नहीं थी। उसमें इन्द्रनीलमणिमय कमलके पत्ते फैले हुए थे। उन कमलोंके मृणाल मणियोंके बने थे
সেই সভাগৃহের ভিতরে ময়াসুর এক অতুলনীয় নলিনী (পুষ্করিণী) নির্মাণ করেছিলেন। সেখানে বৈদূর্য-মণির ন্যায় দীপ্ত কমলপাতা বিস্তৃত ছিল, আর পদ্মগুলির ডাঁটাও মণি দিয়ে গঠিত ছিল।
Verse 31
॥! । ५ ॥ ८7 ऋ# पद्मसौगन्धिकवतीं नानाद्विजगणायुताम् | पुष्पितै: पड़कजैश्षित्रां कूर्मैर्मत्स्यैश्न काउचनै: । चित्रस्फटिकसोपानां निष्पड़कसलिलां शुभाम्,उसमें पद्मरागमणिमय कमलोंकी मनोहर सुगंध छा रही थी। अनेक प्रकारके पक्षी उसमें रहते थे। खिले हुए कमलों और सुनहली मछलियों तथा कछुओंसे उसकी विचित्र शोभा हो रही थी। उस पोखरीमें उतरनेके लिये स्फटिकमणिकी विचित्र सीढ़ियाँ बनी थीं। उसमें पंकरहित स्वच्छ जल भरा हुआ था। वह देखनेमें बड़ी सुन्दर थी
সেখানে পদ্মরাগ-মণিনির্মিত পদ্মের মনোহর সুবাস ছড়িয়ে থাকত এবং নানা জাতের পাখির দল সেখানে ভিড় করত। প্রস্ফুটিত পদ্ম, কচ্ছপ ও সোনালি মাছের কারণে তার শোভা বিচিত্র হয়ে উঠত। নামার জন্য ছিল বিচিত্র স্ফটিকমণির সিঁড়ি, আর জল ছিল কাদাহীন স্বচ্ছ—সমগ্র দৃশ্যই মঙ্গলময় ও মনোরম।
Verse 32
मन्दानिलसमुद्धूतां मुक्ताबिन्दुभिराचिताम् । महामणिशिलापट्टबद्धपर्यन्तवेदिकाम्,मन्द वायुसे उद्वेलित हो जब जलकी बूँदें उछलकर कमलके पत्तोंपर बिखर जाती थीं, उस समय वह सारी पुष्करिणी मौक्तिकबिन्दुओंसे व्याप्त जान पड़ती थी। उसके चारों ओरके घाटोंपर बड़ी-बड़ी मणियोंकी चौकोर शिलाखण्डोंसे पक्की वेदियाँ बनायी गयी थीं
মৃদু বাতাসে জল আন্দোলিত হলে ফোঁটাগুলি ছিটকে পদ্মপাতায় ছড়িয়ে পড়ত; তখন সমগ্র পুষ্করিণী যেন মুক্তাবিন্দুতে আচ্ছাদিত বলে মনে হতো। তার চারদিকে বৃহৎ বৃহৎ মণিসদৃশ শিলাপট্ট দিয়ে বাঁধানো পাকা বেদিকা ও ঘাট ছিল।
Verse 33
मणिरत्नचितां तां तु केचिदश्येत्य पार्थिवा: । दृष्टवापि नाभ्यजानन्त तेऊज्ञानात् प्रपतन्त्युत,मणियों तथा रत्नोंसे व्याप्त होनेके कारण कुछ राजालोग उस पुष्करिणीके पास आकर और उसे देखकर भी उसकी यथार्थतापर विश्वास नहीं करते थे और भ्रमसे उसे स्थल समझकर उसमें गिर पड़ते थे
বৈশম্পায়ন বললেন—মণি-রত্নে বিছানো সেই পুষ্করিণীর কাছে কতক রাজা এসে পৌঁছালেন। দেখেও তারা তার প্রকৃত স্বরূপ চিনতে পারল না; অজ্ঞতার মোহে তাকে স্থল ভেবে তাতেই পড়ে গেল।
Verse 34
तां सभामभितो नित्यं पुष्पवन्तो महाद्रुमा: । आसन् नानाविधा लोला: शीतच्छाया मनोरमा:,उस सभाभवनके सब ओर अनेक प्रकारके बड़े-बड़े वृक्ष लहलहा रहे थे, जो सदा फूलोंसे भरे रहते थे। उनकी छाया बड़ी शीतल थी। वे मनोरम वृक्ष सदा हवाके झोंकोंसे हिलते रहते थे
সেই সভাগৃহের চারদিকে নানাবিধ মহাবৃক্ষ সর্বদা পুষ্পে ভরা ছিল। তাদের ছায়া ছিল শীতল ও স্নিগ্ধ; মনোহর বৃক্ষগুলি বাতাসের ঝাপটায় নিত্য দুলতে থাকত।
Verse 35
काननानि सुगन्धीनि पुष्करिण्यश्व सर्वश: । हंसकारण्डवोपेताशक्षक्रवाकोपशोभिता:,केवल वृक्ष ही नहीं; उस भवनके चारों ओर अनेक सुगन्धित वन, उपवन और बावलियाँ भी थीं, जो हंस, कारण्डव तथा चक्रवाक आदि पक्षियोंसे युक्त होनेके कारण बड़ी शोभा पा रही थीं
বৈশম্পায়ন বললেন—চারদিকে সুগন্ধি কানন ও উপবন ছিল, আর সর্বত্র পুষ্করিণী; সেগুলি রাজহাঁস ও কারণ্ডব হাঁসে পরিপূর্ণ এবং চক্রবাক পাখিতে শোভিত ছিল।
Verse 36
जलजानां च पद्मानां स्थलजानां च सर्वश: । मारुतो गन्धमादाय पाण्डवान् सम निषेवते,वहाँ जल और स्थलमें होनेवाले कमलोंकी सुगन्ध लेकर वायु सदा पाण्डवोंकी सेवा किया करती थी
জলে জন্মানো ও স্থলে জন্মানো পদ্মের সুগন্ধ বহন করে বায়ু যেন সর্বদা পাণ্ডবদের সেবা করত।
Verse 37
ईदृशीं तां सभां कृत्वा मासै: परिचतुर्दशै: । निछितां धर्मराजाय मयो राजन् न््यवेदयत्,मयासुरने पूरे चौदह महीनोंमें इस प्रकारकी उस अद्भुत सभाभवनका निर्माण किया था। राजन! जब वह बनकर तैयार हो गयी, तब उसने धर्मराजको इस बातकी सूचना दी
বৈশম্পায়ন বললেন—চৌদ্দ মাসে এমন আশ্চর্য সভাগৃহ নির্মাণ করে, হে রাজন, ময় ধর্মরাজকে জানাল যে তা সম্পূর্ণ হয়েছে।
Verse 103
द्रष्ट भागीरथी गद्भामुवास बहुला: समा: । “वहीं हिरण्यशृंग नामक महामणिमय विशाल पर्वत है, जहाँ रमणीय बिन्दुसर नामक तीर्थ है। वहीं राजा भगीरथने भागीरथी गंगाका दर्शन करनेके लिये बहुत वर्षोतक (तपस्या करते हुए) निवास किया था
বৈশম্পায়ন বললেন—সেখানে ভাগীরথী গঙ্গা প্রবাহিত, আর সেখানেই রাজা ভাগীরথ বহু বছর কঠোর তপস্যায় বাস করেছিলেন। সেই অঞ্চলেই হিরণ্যশৃঙ্গ নামে মহামণিময় বিরাট পর্বত দাঁড়িয়ে আছে, এবং সেখানেই বিন্দুসর নামে মনোহর তীর্থ বিদ্যমান। ভাগীরথী গঙ্গার সান্নিধ্য ও দর্শন লাভের জন্য রাজা ভাগীরথ দীর্ঘকাল তপস্যা করেছিলেন।
Verse 233
भ्राजमाना तथात्यर्थ दधार परमं वपु: । वह सब ओरसे दस हजार हाथ विस्तृत थी (अर्थात् उसकी लंबाई और चौड़ाई भी दस- दस हजार हाथ थी)। जैसे अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाकी सभाभवन प्रकाशित होती है, उसी प्रकार अत्यन्त उद्धासित होनेवाली उस सभाने बड़ा मनोहर रूप धारण किया
বৈশম্পায়ন বললেন—সেই সভা অতিশয় দীপ্তিময় হয়ে পরম শোভা ধারণ করল। শোনা যায়, চারদিকে তার বিস্তার দশ হাজার হাত। অগ্নি, সূর্য ও চন্দ্রের আলোয় যেমন প্রাসাদ উদ্ভাসিত হয়, তেমনি সেই সভাও অসাধারণ জ্যোতিতে ঝলমল করে মন হরণ করল।
The chapter foregrounds an implicit ethical tension: political authority is reinforced through extraordinary splendor and engineered marvels, yet such splendor can distort perception and judgment, as shown by visitors misreading the constructed lotus-lake.
Institution-building and public legitimacy are powerful tools of governance, but perception is fallible; discernment (viveka) is necessary to prevent prestige, novelty, and aesthetic force from becoming sources of error or rivalry.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter functions as narrative groundwork, explaining the material and symbolic foundations of Yudhiṣṭhira’s court that later become consequential in the epic’s political and ethical developments.