Adhyaya 27
Sabha ParvaAdhyaya 2729 Versesपाण्डव-पक्ष के पक्ष में निर्णायक; उत्तर-दिग्विजय में निरन्तर अधीनता और कर-प्राप्ति।

Adhyaya 27

Bhīmasena’s Digvijaya and Tribute Return (भीमस्य दिग्विजयः धननिवेदनं च)

Upa-parva: Digvijaya (Bhīma-Digvijaya / Northern-Eastern Campaign Episode)

Vaiśaṃpāyana reports Bhīma’s swift sequence of regional submissions: he overcomes rulers associated with Kośala/Ayodhyā, Malla territories, Himalayan-adjacent polities, Kāśī, and additional kings across varied geographies (including Matsya and other named regions). The narrative repeatedly notes restraint—victory achieved without excessive severity—sometimes explicitly through conciliation (sāntva). Bhīma defeats multiple chiefs, including a notable engagement with Karṇa, after which further mountain-dwelling rulers are subdued. The campaign expands toward coastal and island-associated groups described as sāgara-vāsins and mleccha-gaṇas, from whom taxes and diverse valuables are collected. Enumerated tribute includes sandalwood, aguru, fine cloth, gems and pearls, gold, silver, diamond, and coral, presented as a quantified “rain” of wealth. The chapter closes with Bhīma’s return to Indraprastha and formal presentation of the accumulated wealth to Dharmarāja Yudhiṣṭhira, integrating military-polity outcomes into the ritual economy supporting imperial aspiration.

Chapter Arc: वैशम्पायन जनमेजय से कहते हैं—दिग्विजय की धारा में धनंजय अर्जुन भगदत्त को परास्त कर उत्तर दिशा, कुबेर-पालित प्रदेशों की ओर बढ़ते हैं, जहाँ पर्वत-राज्य और दुर्गम जनपद उनकी परीक्षा लेने को खड़े हैं। → अर्जुन क्रमशः अन्तर्गिरि, बहिर्गिरि और उपगिरि जैसे पर्वतीय प्रदेशों को जीतते हुए स्थानीय नरेशों को अपने पक्ष में करते हैं। उलूकवासी राजा बृहन्त तक पहुँचकर संघर्ष तीव्र होता है—यह केवल युद्ध नहीं, पर्वतीय स्वाभिमान और साम्राज्य-कर की स्वीकृति का टकराव है। → पर्वतेश्वर बृहन्त अर्जुन को ‘असह्य’ मानकर भी रण में टिक नहीं पाते; रत्न समेटकर पीछे हटते हैं। इसके बाद अर्जुन अभिसारी, उरगावासी रोचमान, और युद्धमुख पर ऋषिकों को परास्त कर दुर्लभ अश्वों को कर-रूप में प्राप्त करते हैं—तोते के उदर-से हरे, मयूर-सदृश वर्ण वाले, अत्यन्त शीघ्रगामी जवन अश्व—दिग्विजय का ठोस फल। → अर्जुन विजित प्रदेशों में व्यवस्था स्थापित करते हैं; बृहन्त का राज्य पुनः उसी के हाथ में सौंपकर (अधीनता स्वीकार कराकर) आगे बढ़ते हैं। विजय का उद्देश्य लूट नहीं, युधिष्ठिर के राजसूय हेतु कर-संग्रह और राजनीतिक अधीनता का विस्तार बनता है। → हिमवान् और निष्कुट को पार कर पुरुषर्षभ अर्जुन श्वेतपर्वत की ओर बढ़ते हैं—आगे और भी कठोर भूभाग तथा अनजाने प्रतिद्वन्द्वी प्रतीक्षा में हैं।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माज बक। अकाल सप्तविशो<डध्याय: अर्जुनका अनेक पर्वतीय देशोंपर विजय पाना वैशम्पायन उवाच एवमुक्त: प्रत्युवाच भगदत्तं धनंजय: । अनेनैव कृतं सर्वमनुजानीहि याम्यहम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! उनके ऐसा कहनेपर धनंजयने भगदत्तसे कहा --'राजन्‌! आपने जो कर देना स्वीकार कर लिया, इतनेसे ही मेरा सब सत्कार हो जायगा, अब अज्ञा दीजिये, मैं जाता हूँ"

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! এ কথা শুনে ধনঞ্জয় ভগদত্তকে বলল—“রাজন! আপনি যা করতে সম্মত হয়েছেন, তাতেই আমার সব সিদ্ধ হল। এখন অনুমতি দিন, আমি যাই।”

Verse 2

तं विजित्य महाबाहु: कुन्तीपुत्रो धनंजय: । प्रययावुत्तरां तस्माद्‌ दिशं धनदपालिताम्‌,भगदत्तको जीतकर महाबाह कुन्तीपुत्र अर्जुन वहाँसे कुबेरद्वारा सुरक्षित उत्तर दिशामें गये

তাকে জয় করে মহাবাহু কুন্তীপুত্র ধনঞ্জয় সেখান থেকে উত্তর দিকে রওনা হল—যে দিক ধনদ (কুবের) দ্বারা রক্ষিত।

Verse 3

अन्तर्गिरिं च कौन्तेयस्तथैव च बहिर्गिरिम्‌ तथैवोपगिरिं चैव विजिग्ये पुरुषर्षभ:,कुरुश्रेष्ठ धनंजयने क्रमश: अन्तर्गिरि, बहिर्गिरि और उपगिरि नामक प्रदेशोंपर विजय प्राप्त की

পুরুষশ্রেষ্ঠ কৌন্তেয় ক্রমান্বয়ে অন্তর্গিরি, বহির্গিরি এবং উপগিরি—এই দেশসমূহও জয় করল।

Verse 4

विजित्य पर्वतान्‌ सर्वान्‌ ये च तत्र नराधिपा: । तान्‌ वशे स्थापयित्वा स धनान्यादाय सर्वश:,फिर समस्त पर्वतों और वहाँ निवास करनेवाले राजाओंको अपने अधीन करके उन्होंने सबसे धन वसूल किये

বৈশম্পায়ন বললেন—তিনি সকল পর্বতদেশ জয় করে এবং সেখানে বসবাসকারী রাজাদের বশে স্থাপন করে, সর্বদিক থেকে তাদের নিকট হতে ধন-সম্পদ (কর) সংগ্রহ করলেন।

Verse 5

तैरेव सहित: सर्वैरनुरज्य च तान्‌ नृपान्‌ उलूकवासिनं राजन्‌ बृहन्तमुपजग्मिवान्‌,तत्पश्चात्‌ उन नरेशोंको प्रसन्न करके उन सबके साथ उलूकवासी राजा बृहन्तपर आक्रमण किया

বৈশম্পায়ন বললেন—সেই রাজাদের মন জয় করে এবং তাদের সকলের সঙ্গে মিলিত হয়ে, তিনি উলূকদেশবাসী রাজা বৃহন্তের বিরুদ্ধে অগ্রসর হলেন।

Verse 6

मृदज्भवरनादेन रथनेमिस्वनेन च । हस्तिनां च निनादेन कम्पयन्‌ वसुधामिमाम्‌,जुझाऊ बाजे, श्रेष्ठ मृदृंग आदिकी ध्वनि, रथके पहियोंकी घर्घराहट और हाथियोंकी गर्जनासे वे इस पृथ्वीको कँपाते हुए आगे बढ़ रहे थे

বৈশম্পায়ন বললেন—ঢাক-ঢোল ও মৃদঙ্গের গর্জন, রথচক্রের ঘর্ঘর শব্দ এবং হাতিদের তূর্যনাদে তারা এই পৃথিবীকে কাঁপিয়ে অগ্রসর হচ্ছিল।

Verse 7

ततो बृहन्तस्त्वरितो बलेन चतुरक्लिणा | निष्क्रम्य नगरात्‌ तस्माद्‌ योधयामास फाल्गुनम्‌,तब राजा बृहन्त तुरंत ही चतुरंगिणी सेनाके साथ नगरसे बाहर निकले और अर्जुनसे युद्ध करने लगे

তখন রাজা বৃহন্ত দ্রুত চতুরঙ্গিণী সেনা নিয়ে সেই নগর থেকে বেরিয়ে এসে ফাল্গুন (অর্জুন)-এর সঙ্গে যুদ্ধ আরম্ভ করলেন।

Verse 8

सुमहान्‌ संनिपातो5भूद्‌ धनंजयबृहन्तयो: । न शशाक बृहन्तस्तु सोढुं पाण्डवविक्रमम्‌,उस समय अर्जुन और बृहन्तमें बड़े जोरकी मार-काट शुरू हुई, परंतु बृहन्त पाण्डुपुत्र अर्जुनके पराक्रमको न सह सके

বৈশম্পায়ন বললেন—ধনঞ্জয় (অর্জুন) ও বৃহন্তের মধ্যে মহাভয়ংকর সংঘর্ষ হল; কিন্তু বৃহন্ত পাণ্ডব অর্জুনের বিক্রম সহ্য করতে পারলেন না।

Verse 9

सो<विषद्वतमं मत्वा कौन्तेयं पर्वतेश्वर: । उपावर्तत दुर्थर्षो रत्नान्यादाय सर्वश:,कुन्तीकुमारको असहा मानकर दुर्धर्ष वीर पर्वतराज बृहन्त युद्धसे हट गये और सब प्रकारके रत्नोंकी भेंट लेकर उनकी सेवामें उपस्थित हुए

বৈশম্পায়ন বললেন— কুন্তীপুত্রকে সম্পূর্ণ অটল জেনে দুর্ধর্ষ পর্বতেশ্বর যুদ্ধ থেকে ফিরে গেলেন। তিনি সর্বপ্রকার রত্ন সংগ্রহ করে সেবার উদ্দেশ্যে অগ্রসর হয়ে তা নিবেদন করলেন।

Verse 10

स तद्राज्यमवस्थाप्य उलूकसहितो ययौ । सेनाबिन्दुमथो राजन्‌ राज्यादाशु समाक्षिपत्‌,जनमेजय! अर्जुनने बृहन्तका राज्य पुनः उन्हींके हाथमें सौंपकर उलूकराजके साथ सेनाबिन्दुपर आक्रमण किया और उन्हें शीघ्र ही राज्यच्युत कर दिया

বৈশম্পায়ন বললেন— সেই রাজ্য যথাযথভাবে পুনঃপ্রতিষ্ঠা করে তিনি উলূককে সঙ্গে নিয়ে যাত্রা করলেন। হে রাজা জনমেজয়, তিনি দ্রুতই সেনাবিন্দুকে রাজ্যচ্যুত করলেন।

Verse 11

मोदापुरं वामदेवं सुदामानं सुसंकुलम्‌ । उलूकानुत्तरांश्वैव तांश्व॒ राज्ञ: समानयत्‌,तदनन्तर मोदापुर, वामदेव, सुदामा, सुसंकुल तथा उत्तर उलूक देशों और वहाँके राजाओंको अपने अधीन किया

বৈশম্পায়ন বললেন— তিনি মোদাপুর, বামদেব, সুদামা ও জনবহুল সুসঙ্কুলকে, তদ্রূপ উত্তরের উলূক দেশসমূহ এবং সেখানকার রাজাদেরও বশে আনলেন।

Verse 12

तत्रस्थ: पुरुषैरेव धर्मराजस्य शासनात्‌ । किरीटी जितवान्‌ राजन्‌ देशान्‌ पञ्चगणांस्तत:ः,राजन! धर्मराजकी आज्ञासे किरीटधारी अर्जुनने वहीं रहकर अपने सेवकोंद्वारा पंचगण नामक देशोंको जीत लिया

বৈশম্পায়ন বললেন— হে রাজা, সেখানেই অবস্থান করে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের আদেশে মুকুটধারী অর্জুন নিজের লোকদের দ্বারাই পঞ্চগণ নামে পরিচিত দেশসমূহ জয় করলেন।

Verse 13

स देवप्रस्थमासाद्य सेनाबिन्दो: पुरं प्रति । बलेन चतुरज्जेण निवेशमकरोत्‌ प्रभु:,वहाँसे सेनाबिन्दुकी राजधानी देवप्रस्थमें आकर चतुरंगिणी सेनाके साथ शक्तिशाली अर्जुनने वहीं पड़ाव डाला

বৈশম্পায়ন বললেন— সেনাবিন্দুর নগর দেবপ্রস্থে পৌঁছে সেই পরাক্রমী নায়ক চতুরঙ্গিনী সেনাসহ সেখানেই শিবির স্থাপন করলেন।

Verse 14

स तै: परिवृतः सर्वर्विष्वगश्नचं नराधिपम्‌ । अभ्यगच्छन्महातेजा: पौरवं पुरुषर्षभ,नरश्रेष्ठल उन सभी पराजित राजाओंसे घिरे हुए महातेजस्वी अर्जुनने पौरव राजा विष्वगश्वपर आक्रमण किया

পরাজিত রাজাদের দ্বারা চারদিক থেকে পরিবৃত মহাতেজস্বী পুরুষশ্রেষ্ঠ অর্জুন পৌরব নৃপ বিষ্বগশ্বের সম্মুখে অগ্রসর হয়ে তাকে আক্রমণ করলেন।

Verse 15

विजित्य चाहवे शूरान्‌ पर्वतीयान्‌ महारथान्‌ | जिगाय सेनया राजन्‌ पुरं पौरवरक्षितम्‌,वहाँ संग्राममें शूरवीर पर्वतीय महारथियोंको परास्त करके पौरदद्वारा सुरक्षित उनकी राजधानीको भी सेनाद्वारा जीत लिया

যুদ্ধে পর্বতবাসী বীর মহারথীদের পরাজিত করে, হে রাজন, তিনি সেনাবলে সেই নগরও জয় করলেন, যা পৌরদের দ্বারা রক্ষিত ছিল।

Verse 16

पौरवं युधि निर्जित्य दस्यून्‌ पर्वतवासिन: । गणानुत्सवसंकेतानजयत्‌ सप्त पाण्डव:,पौरवको युद्धमें जीतकर पर्वतनिवासी लुटेरोंके सात दलोंपर, जो “उत्सवसंकेत' कहलाते थे, पाण्डुकुमार अर्जुनने विजय प्राप्त की

পৌরবকে যুদ্ধে পরাজিত করে সপ্তম পাণ্ডব অর্জুন পর্বতবাসী দস্যুদের ‘উৎসবসংকেত’ নামে পরিচিত দলগুলিকেও দমন করলেন।

Verse 17

ततः काश्मीरकान्‌ वीरान्‌ क्षत्रियान्‌ क्षत्रियर्षभ: । व्यजयल्लोदहितं चैव मण्डलैर्दशभि: सह,इसके बाद क्षत्रियशिरोमणि धनंजयने काश्मीरके क्षत्रियवीरोंको तथा दस मण्डलोंके साथ राजा लोहितको भी जीत लिया

এরপর ক্ষত্রিয়শ্রেষ্ঠ ধনঞ্জয় কাশ্মীরের বীর ক্ষত্রিয়দের পরাস্ত করলেন এবং দশ মণ্ডলসহ রাজা লোহিতকেও জয় করলেন।

Verse 18

तत्त्रिगर्ता: कौन्तेयं दार्वा: कोकनदास्तथा । क्षत्रिया बहवो राजन्नुपावर्तन्त सर्वश:,तदनन्तर त्रिगर्त, दार्व और कोकनद आदि बहुत-से क्षत्रियनरेशशण सब ओरसे कुन्तीनन्दन अर्जुनकी शरणमें आये

তারপর, হে রাজন, ত্রিগর্ত, দার্ব ও কোকনদ প্রভৃতি বহু ক্ষত্রিয় নৃপতি সর্বদিক থেকে ফিরে এসে কুন্তীনন্দন অর্জুনের শরণ নিলেন।

Verse 19

अभिसारीं ततो रम्यां विजिग्ये कुरुनन्दन: । उरगावासिनं चैव रोचमानं रणेडजयत्‌,इसके बाद कुरुनन्दन धनंजयने रमणीय अभिसारी नगरीपर विजय पायी और उरगावासी राजा रोचमानको भी युद्धमें परास्त किया

বৈশম্পায়ন বললেন—তারপর কুরু-নন্দন ধনঞ্জয় মনোরম অভিসারী নগরী জয় করলেন; এবং উরগদের দেশে বসবাসকারী রাজা রোচমানকেও রণক্ষেত্রে পরাভূত করলেন।

Verse 20

ततः सिंहपुरं रम्यं चित्रायुधसुरक्षितम्‌ | प्राधमद्‌ बलमास्थाय पाकशासनिराहवे,तदनन्तर इन्द्रकुमार अर्जुनने राजा चित्रायुथके द्वारा सुरक्षित सुरम्य नगर सिंहपुरपर सेना लेकर आक्रमण किया और उसे युद्धमें जीत लिया

বৈশম্পায়ন বললেন—তারপর ইন্দ্রপুত্র পাকশাসনি অর্জুন সেনা নিয়ে চিত্রায়ুধ-রক্ষিত মনোরম সিংহপুরের বিরুদ্ধে যুদ্ধে অগ্রসর হয়ে প্রবল আক্রমণ চালিয়ে তা জয় করলেন।

Verse 21

ततः सुद्यांश्व चोलांश्व किरीटी पाण्डवर्षभ: । सहित: सर्वसैन्येन प्रामथत्‌ कुरुनन्दन:,इसके बाद पाण्डवप्रवर कुरुकुलनन्दन किरीटीने अपनी सारी सेनाके साथ धावा करके सुह्य तथा चोल-देशकी सेनाओंको मथ डाला

তারপর মুকুটধারী, পাণ্ডবশ্রেষ্ঠ কুরু-নন্দন, সমগ্র সেনাবাহিনীসহ অগ্রসর হয়ে সুদ্য ও চোলদের বাহিনীকে চূর্ণ করে দিলেন।

Verse 22

ततः परमविक्रान्तो बाह्लीकान्‌ पाकशासनि: । महता परिमर्देन वशे चक्रे दुरासदान्‌,तत्पश्चात्‌ परम पराक्रमी इन्द्रकुमारने बड़ी भारी मार-काट मचाकर दुर्धर्ष वीर बाह्लीकोंको वशमें किया

তারপর পরম পরাক্রান্ত পাকশাসনি ইন্দ্রপুত্র মহা-সংহারী আঘাতে দুর্জয় বাহ্লীকদের বশে আনলেন।

Verse 23

गृहीत्वा तु बल॑ सारं फाल्गुन: पाण्डुनन्दन: । दरदान्‌ सह काम्बोजैरजयत्‌ पाकशासनि:,पाण्डुनन्दन अर्जुनने अपने साथ शक्तिशालिनी सेना लेकर काम्बोजोंके साथ दरदोंको भी जीत लिया

তারপর পাণ্ডুনন্দন ফাল্গুন শক্তির সার—শ্রেষ্ঠ সেনা—সঙ্গে নিয়ে কাম্বোজদের সহিত দরদদেরও জয় করলেন; শত্রুদমনকারী তিনি ইন্দ্রসম পাকশাসনি।

Verse 24

प्रागुत्तरां दिशं ये च वसन्त्याश्रित्य दस्यव: । निवसन्ति वने ये च तान्‌ सर्वानजयत्‌ प्रभु:,ईशान कोणका आश्रय ले जो लुटेरे या डाकू वनमें निवास करते थे, उन सबको शक्तिशाली धनंजयने जीतकर वशमें कर लिया

যে দস্যুরা প্রাগুত্তর (ঈশান) দিক আশ্রয় করে বাস করত এবং যারা অরণ্যে বসবাসকারী লুণ্ঠনকারী ছিল—সেই সকলকে পরাক্রমশালী প্রভু ধনঞ্জয় জয় করে বশে আনলেন।

Verse 25

लोहान्‌ परमकाम्बोजानृषिकानुनत्तरानपि । सहितांस्‍्तान्‌ महाराज व्यजयत्‌ पाकशासनि:,महाराज! लोह, परमकाम्बोज, ऋषिक तथा उत्तर देशोंको भी अर्जुनने एक साथ जीत लिया

মহারাজ! পাকশাসনি (অর্জুন) লোহ, পরমকাম্বোজ, ঋষিক এবং উত্তরদেশীয়দেরও—সকলকে একসঙ্গে—জয় করলেন।

Verse 26

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें अर्जुनविग्विजयप्रसंगमें भगदत्तपराजयसम्बन्धी छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,ऋषिकेष्वपि संग्रामो बभूवातिभयंकर: । तारकामयसंकाश: परस्त्वृषिकपार्थयो: ऋषिकदेशमें भी ऋषिकराज और अर्जुनमें तारकामय संग्रामके समान बड़ा भयंकर युद्ध हुआ

ঋষিকদেশেও ঋষিকরাজ ও পার্থ (অর্জুন)-এর মধ্যে তারকাময় যুদ্ধের ন্যায় অতিভয়ংকর এক সংগ্রাম সংঘটিত হল।

Verse 27

स विजित्य ततो राजन्नृषिकान्‌ रणमूर्थनि । शुकोदरसमांस्तत्र हयानष्टी समानयत्‌,राजन! युद्धके मुहानेपर ऋषिकोंको हराकर अर्जुनने तोतेके उदरके समान हरे रंगवाले आठ घोड़े उनसे भेंट लिये इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि फाल्गुनदिग्विजये नानादेशजये सप्तविंशोडध्याय:

রাজন! রণাঙ্গনের অগ্রভাগে ঋষিকদের পরাজিত করে অর্জুন সেখানে তোতার উদরের ন্যায় সবুজাভ বর্ণের আটটি অশ্ব উপঢৌকনরূপে লাভ করে সঙ্গে আনলেন।

Verse 28

मयूरसदृशानन्यानुत्तरानपरानपि । जवनानाशुगांश्वैव करार्थ समुपानयत्‌,इनके सिवा मोरके समान रंगवाले उत्तम, गतिशील और शीघ्रगामी दूसरे भी बहुत-से घोड़े वे करके रूपमें वसूल कर लाये

এগুলির অতিরিক্ত তিনি করার্থ (খাজনা/উপঢৌকন) হিসেবে ময়ূরের ন্যায় বর্ণের, উৎকৃষ্ট, বেগবান ও দ্রুতগামী আরও বহু অশ্ব সংগ্রহ করে আনলেন।

Verse 29

स विनिर्जित्य संग्रामे हिमवन्तं सनिष्कुटम्‌ । श्वेतपर्वतमासाद्य न्यविशत्‌ पुरुषर्षभ:,इसके बाद पुरुषोत्तम अर्जुन संग्राममें हिमवान्‌ और निष्कुट प्रदेशके अधिपतियोंको जीतकर धवलगिरिपर आये और वहीं सेनाका पड़ाव डाला

যুদ্ধে হিমবান ও নিষ্কুট-প্রদেশ জয় করে পুরুষশ্রেষ্ঠ অর্জুন শ্বেতপর্বতে উপনীত হয়ে সেখানেই সেনাশিবির স্থাপন করলেন।

Frequently Asked Questions

The tension between Kṣātra obligation to secure political order and the ethical demand for restraint, repeatedly marked by victories achieved without excessive severity and, at points, through conciliation.

Effective sovereignty is portrayed as compatible with measured action—success in state expansion is ideally achieved through proportional force, negotiation, and controlled escalation.

No explicit phalaśruti is presented here; the chapter’s meta-function is archival and political, demonstrating how tribute and submission support ritual legitimacy and court-centered authority.