Adhyaya 2
Sabha ParvaAdhyaya 239 Verses

Adhyaya 2

Kṛṣṇasya Khāṇḍavaprasthāt Dvārakā-prayāṇaḥ | Krishna’s Departure for Dvārakā

Upa-parva: Kṛṣṇa-Dvārakāgamanam (Departure from Khāṇḍavaprastha to Dvārakā)

Vaiśaṃpāyana narrates Kṛṣṇa’s conclusion of a peaceful stay at Khāṇḍavaprastha, where he has been honored by the Pāṇḍavas. Desiring to see his father, Kṛṣṇa consults Dharmarāja (Yudhiṣṭhira) and Kuntī, then offers reverential greetings to elders and kin. He meets Subhadrā with visible affection, receives messages oriented to family obligations, and proceeds to acknowledge Draupadī and the household priest Dhaumya according to custom. The departure is framed as a public, ritually ordered act: worship of deities and brāhmaṇas, benedictions with auspicious substances, and gifts (vasu) before circumambulation. Kṛṣṇa mounts a swift golden chariot bearing the Garuḍa emblem, armed with his characteristic weapons, and departs at an auspicious tithi, nakṣatra, and muhūrta. Yudhiṣṭhira briefly takes the reins in a gesture of devotion; Arjuna, Bhīma, and the twins accompany him in procession. After mutual embraces and formal leave-taking, Kṛṣṇa sends them back and reaches Dvārakā in due time, while the Pāṇḍavas remain emotionally drawn to him even after he vanishes from sight.

Chapter Arc: खाण्डवप्रस्थ में अतिथि-सा ठहरकर, फिर पिता के दर्शन की लालसा से श्रीकृष्ण का द्वारका लौटने का निश्चय—और धर्मराज युधिष्ठिर व माता कुन्ती से विदा लेने की तैयारी। → कृष्ण का प्रणाम, आलिंगन, अनुमति-याचना—कुन्ती, युधिष्ठिर, द्रौपदी, धौम्य आदि के साथ विदाई के संस्कार; पाण्डवों और नगरवासियों का मन कृष्ण के साथ खिंचता चला जाता है, विदाई का क्षण भारी होता जाता है। → जगद्वन्द्य केशव का कुन्ती के चरणों में मस्तक रखकर प्रणाम और कुन्ती द्वारा शिर पर आशीर्वाद—इसके बाद कृष्ण का रथारूढ़ होकर प्रस्थान, और पाण्डवों का नेत्रों से उन्हें तब तक अनुगमन करना जब तक वे दृष्टिपथ से ओझल न हो जाएँ। → कृष्ण शीघ्र द्वारका पहुँचते हैं; पाण्डव अपने नगर लौटते हैं, पर मन गोविन्द में अटका रहता है—विदाई के बाद भी संबंध की डोर और वचन-बंध बना रहता है। → द्वारका में कृष्ण का स्वजनों (रुक्मिणी तथा पुत्रों/यादवों) से मिलन—और आगे के प्रसंगों के लिए मंच तैयार: यह प्रस्थान किस नए राजनैतिक/धार्मिक घटनाक्रम की भूमिका बनेगा?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं) अपन क्ात छा आर: द्वितीयो<्थ्याय: श्रीकृष्णकी द्वाराकायात्रा वैशम्पायन उवाच उषित्वा खाण्डवप्रस्थे सुखवासं जनार्दन: । पार्थ: प्रीतिसमायुक्तै: पूजनाहोंडभिपूजित:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! परम पूजनीय भगवान्‌ श्रीकृष्ण खाण्डवप्रस्थमें सुखपूर्वक रहकर प्रेमी पाण्डवोंके द्वारा नित्य पूजित होते रहे

বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! খাণ্ডবপ্রস্থে সুখে অবস্থান করতে করতে, পূজনীয় জনার্দন শ্রীকৃষ্ণকে প্রেমে পরিপূর্ণ পাণ্ডবেরা নিরন্তর ভক্তিভরে পূজা করত।

Verse 2

गमनाय मतिं चक्रे पितुर्दर्शनलालस: । धर्मराजमथामन्त्रय पृथां च पृुथुलोचन:,तदनन्तर पिताके दर्शनके लिये उत्सुक होकर विशाल नेत्रोंवाले श्रीकृष्णने धर्मराज युधिष्ठिर और कुन्तीकी आज्ञा लेकर वहाँसे द्वारका जानेका विचार किया इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि सभाक्रियापर्वणि भगवद्याने द्वितीयोडध्याय:

পিতৃদর্শনের আকাঙ্ক্ষায় বৃহৎ-নয়ন শ্রীকৃষ্ণ প্রস্থান করার সংকল্প করলেন। ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির ও পৃথা (কুন্তী)-র অনুমতি নিয়ে তিনি সেখান থেকে দ্বারকায় গমন করার অভিপ্রায় স্থির করলেন—বয়োজ্যেষ্ঠদের সম্মান ও শিষ্টাচার রক্ষা করে।

Verse 3

ववन्दे चरणौ मूर्ध्ना जगद्वन्द्य: पितृष्वसु: । स तया मूर्ध्न्युपाच्रात: परिष्वक्तश्न केशव:,जगद्वन्द्ध केशवने अपनी बुआ कुन्तीके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और कुन्तीने उनका मस्तक सूँघकर उन्हें हृदयसे लगा लिया

জগদ্বন্দ্য কেশব পিতৃ-ভগিনী কুন্তী (পৃথা)-র চরণে মস্তক রেখে প্রণাম করলেন। কুন্তী স্নেহভরে তাঁর মস্তক শুঁকে তাঁকে বুকে জড়িয়ে ধরলেন।

Verse 4

ददर्शानन्तरं कृष्णो भगिनीं स्वां महायशा: । तामुपेत्य हृषीकेश: प्रीत्या बाष्पसमन्वित:,तत्पश्चात्‌ महायशस्वी हृषीकेश अपनी बहिन सुभद्रासे मिले। उसके पास जानेपर स्नेहवश उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये

এরপর মহাযশস্বী কৃষ্ণ নিজের ভগিনী সুভদ্রাকে দেখলেন। তাঁর কাছে যেতেই হৃষীকেশ স্নেহানন্দে আপ্লুত হলেন, আর তাঁর নয়নে অশ্রু ভরে উঠল।

Verse 5

अर्थ्य तथ्यं हितं वाक्‍्यं लघु युक्तमनुत्तरम्‌ । उवाच भगवान्‌ भद्रां सुभद्रां भद्रभाषिणीम्‌,भगवानने मंगलमय वचन बोलनेवाली कल्याणमयी सुभद्रासे बहुत थोड़े, सत्य, प्रयोजनपूर्ण, हितकारी, युक्तियुक्त एवं अकाट्य वचनोंद्वारा अपने जानेकी आवश्यकता बतायी (और उसे ढाढ़स बँधाया)

বৈশম্পায়ন বললেন—ভগবান শুভভাষিণী কল্যাণময়ী সুভদ্রাকে সংক্ষিপ্ত অথচ গম্ভীর বাক্যে সম্বোধন করলেন—যা সত্য, উদ্দেশ্যপূর্ণ, হিতকর, যুক্তিসঙ্গত এবং অখণ্ডনীয়। সেই উপদেশে তিনি নিজের প্রস্থানের প্রয়োজন জানিয়ে তার হৃদয়কে আশ্বস্ত করলেন।

Verse 6

तया स्वजनगामीनि श्रावितो वचनानि स: । सम्पूजितश्चाप्पसकृच्छिरसा चाभिवादित:,सुभद्राने बार-बार भाईकी पूजा करके मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और माता- पिता आदि स्वजनोंसे कहनेके लिये संदेश दिये

সুভদ্রা স্বজনদের—মাতা-পিতা প্রভৃতি—জন্য যে বার্তা দিলেন, তিনি তা শুনে নিলেন। তারপর সুভদ্রা বারংবার তাঁকে সম্মান করে পূজা করলেন এবং মাথা নত করে বারবার প্রণাম জানালেন।

Verse 7

तामनुज्ञाय वार्ष्णेय: प्रतिनन्द्य च भामिनीम्‌ । ददर्शानन्तरं कृष्णां धौम्यं चापि जनार्दन:,भामिनी सुभद्राको प्रसन्न करके उससे जानेकी अनुमति लेकर वृष्णिकुलभूषण जनार्दन द्रौपदी तथा धौम्यमुनिसे मिले

ভামিনী সুভদ্রার অনুমতি নিয়ে এবং যথোচিতভাবে তাকে সম্ভাষণ করে বৃষ্ণিকুলভূষণ জনার্দন শ্রীকৃষ্ণ পরে কৃষ্ণা (দ্রৌপদী) ও মুনি ধৌম্যের সঙ্গে সাক্ষাৎ করলেন।

Verse 8

ववन्दे च यथान्यायं धौम्यं पुरुषसत्तम: । द्रौपदी सान्त्वयित्वा च आमन्त्रय च जनार्दन:,पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने यथोचित रीतिसे धौम्यजीको प्रणाम किया और द्रौपदीको सान्त्वना दे उसकी अनुमति लेकर वे अर्जुनके साथ अन्य भाइयोंके पास गये। पाँचों भाई पाण्डवोंसे घिरे हुए विद्वान्‌ एवं बलवान्‌ श्रीकृष्ण देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति सुशोभित हुए

পুরুষশ্রেষ্ঠ শ্রীকৃষ্ণ বিধিমতো ধৌম্য মুনিকে প্রণাম করলেন। তারপর দ্রৌপদীকে সান্ত্বনা দিয়ে এবং তার অনুমতি নিয়ে জনার্দন প্রস্থান করলেন।

Verse 9

भ्रातृनभ्यगमद्‌ दिद्वान्‌ पार्थेन सहितो बली । भ्रातृभि: पञ्चभि: कृष्णो वृत: शक्र इवामरै:,पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने यथोचित रीतिसे धौम्यजीको प्रणाम किया और द्रौपदीको सान्त्वना दे उसकी अनुमति लेकर वे अर्जुनके साथ अन्य भाइयोंके पास गये। पाँचों भाई पाण्डवोंसे घिरे हुए विद्वान्‌ एवं बलवान्‌ श्रीकृष्ण देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति सुशोभित हुए

তখন জ্ঞানী ও পরাক্রমী শ্রীকৃষ্ণ পার্থ (অর্জুন)-সহ ভ্রাতৃগণের কাছে গেলেন। পাঁচ পাণ্ডব ভ্রাতার দ্বারা পরিবৃত কৃষ্ণ দেবতাদের দ্বারা পরিবৃত শক্র (ইন্দ্র)-এর ন্যায় দীপ্তিমান হলেন।

Verse 10

यात्राकालस्य योग्यानि कर्माणि गरुडथ्वज: । कर्तुकाम: शुचिर्भूत्वा स्नातवान्‌ समलंकृत:,तदनन्तर गरुडध्वज श्रीकृष्णने यात्राकालोचित कर्म करनेके लिये पवित्र हो स्नान करके अलंकार धारण किया

তারপর গরুড়ধ্বজ শ্রীকৃষ্ণ যাত্রাকালের উপযুক্ত কর্ম সম্পাদন করতে ইচ্ছুক হয়ে শুচি হয়ে স্নান করলেন এবং অলংকার ধারণ করলেন।

Verse 11

अर्चयामास देवांश्र द्विजांश्व॒ यदुपुड्भव: । माल्यजाप्यनमस्कारैर्गन्धैरुच्चावचैरपि,फिर उन यदुश्रेष्ठने प्रचुर पुष्प-माला, जप, नमस्कार और चन्दन आदि अनेक प्रकारके सुगन्धित पदार्थोद्वारा देवताओं और ब्राह्मणोंकी पूजा की

তারপর যদুকুলশ্রেষ্ঠ শ্রীকৃষ্ণ পুষ্পমালা, জপ, নমস্কার এবং চন্দনাদি নানা সুগন্ধি দ্রব্য দ্বারা দেবতা ও দ্বিজদের (ব্রাহ্মণদের) যথাবিধি পূজা করলেন।

Verse 12

स कृत्वा सर्वकार्याणि प्रतस्थे तस्थुषां वर: | उपेत्य स यदुश्रेष्ठो बाह्मुकक्षाद्‌ विनिर्गत:,प्रतिष्ठित पुरुषोंमें श्रेष्ठ यदुप्रवर श्रीकृष्ण यात्राकालोचित सब कार्य पूर्ण करके प्रस्थित हुए और भीतरसे चलकर बाहरी ड्योढ़ीको पार करते हुए राजभवनसे बाहर निकले

প্রতিষ্ঠিত পুরুষদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ যদুপ্রবর শ্রীকৃষ্ণ যাত্রাকালোপযোগী সকল কার্য সম্পন্ন করে রওনা হলেন; অন্তঃপুর থেকে অগ্রসর হয়ে বাহিরের দ্বারপ্রাঙ্গণ অতিক্রম করে রাজভবন থেকে বাইরে বেরিয়ে এলেন।

Verse 13

स्वस्तिवाच्याहतो विप्रान्‌ दधिपात्रफलाक्षतै: । वसु प्रदाय च ततः प्रदक्षिणमथाकरोत्‌,उस समय सुयोग्य ब्राह्मणोंने स्वस्तिवाचन किया और भगवानने दहीसे भरे पात्र, अक्षत, फल आदिके साथ जन ब्राह्मणोंको धन देकर उन सबकी परिक्रमा की

সেই সময় যোগ্য ব্রাহ্মণেরা স্বস্তিবাচন করলেন; ভগবান দধিভর্তি পাত্র, অক্ষত ও ফল প্রভৃতি সহ তাদের ধন দান করে, পরে সকলের প্রদক্ষিণা করলেন।

Verse 14

काज्चनं रथमास्थाय तार्ष्यकेतनमाशुगम्‌ | गदाचक्रासिशार्ड्रद्यिरायुधैरावृतं शुभम्‌,इसके बाद गरुडचिह्वनित ध्वजासे सुशोभित और गदा, चक्र, खड्ग एवं शाड्र्गधनुष आदि आयुधोंसे सम्पन्न शैब्य, सुग्रीव आदि घोड़ोंसे युक्त शुभ सुवर्णमय रथपर आखरूढ़ हो कमलनयन श्रीकृष्णने उत्तम तिथि, शुभ नक्षत्र एवं गुणयुक्त मुहूर्तमें यात्रा आरम्भ की

এরপর গরুড়চিহ্নিত ধ্বজে শোভিত, গদা-চক্র-খড়্গ ও শার্ঙ্গধনু প্রভৃতি অস্ত্রে সজ্জিত, শুভ স্বর্ণময় দ্রুত রথে আরোহণ করে কমলনয়ন শ্রীকৃষ্ণ উত্তম তিথি, শুভ নক্ষত্র ও গুণযুক্ত মুহূর্তে যাত্রা আরম্ভ করলেন।

Verse 15

तिथावप्यथ नक्षत्रे मुहूर्ते च गुणान्विते । प्रययौ पुण्डरीकाक्ष: शैब्यसुग्रीववाहन:,इसके बाद गरुडचिह्वनित ध्वजासे सुशोभित और गदा, चक्र, खड्ग एवं शाड्र्गधनुष आदि आयुधोंसे सम्पन्न शैब्य, सुग्रीव आदि घोड़ोंसे युक्त शुभ सुवर्णमय रथपर आखरूढ़ हो कमलनयन श्रीकृष्णने उत्तम तिथि, शुभ नक्षत्र एवं गुणयुक्त मुहूर्तमें यात्रा आरम्भ की

এরপর উত্তম তিথি, শুভ নক্ষত্র ও গুণযুক্ত মুহূর্তে শৈব্য ও সুগ্রীব প্রভৃতি অশ্বযুক্ত রথে আরূঢ় কমলনয়ন পুণ্ডরীকাক্ষ শ্রীকৃষ্ণ যাত্রায় অগ্রসর হলেন।

Verse 16

अन्वारुरोह चाप्येनं प्रेम्णा राजा युधिष्ठिर: । अपास्य चास्य यन्तारं दारुक॑ यन्तृसत्तमम्‌,उस समय श्रीकृष्णका रथ हाँकनेवाले सारथियोंमें श्रेष्ठ दारुकको हटाकर उसके स्थानमें राजा युधिष्ठिर प्रेमपूर्वक भगवान्‌के साथ रथपर जा बैठे

সেই সময় শ্রীকৃষ্ণের রথচালকদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ দারুককে সরিয়ে দিয়ে, তার স্থানে রাজা যুধিষ্ঠির প্রেমভরে ভগবানের সঙ্গে রথে আরোহণ করলেন।

Verse 17

अभीषून्‌ सम्प्रजग्राह स्वयं कुरुपतिस्तदा । उपारुह्ार्जुनश्वापि चामरव्यजनं सितम्‌

তখন কুরুপতি নিজেই লাগাম হাতে নিলেন। অর্জুনও রথে উঠল এবং পরিচারকের কর্তব্যরূপে শুভ্র চামর-ব্যজন ধারণ করল—রাজসভায় শৃঙ্খলিত সেবার এক রাজকীয় দৃশ্য।

Verse 18

तथैव भीमसेनो5पि यमाभ्यां सहितो बली,अन्वीयमान: शुशुभे शिष्यैरिव गुरु: प्रियै: इसी प्रकार नकुल-सहदेवसहित बलवान्‌ भीमसेन भी ऋत्विजों और पुरवासियोंके साथ भगवान्‌ श्रीकृष्णके पीछे-पीछे चल रहे थे। उन्होंने वेगपूर्वक आगे बढ़कर शाड््गधनुष धारण करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्णके ऊपर दिव्य मालाओंसे सुशोभित एवं सौ शलाकाओं (तिल्लियों)-से युक्त स्वर्णविभूषित छत्र लगाया। उस छत्रमें वैदूर्ययमणिका डंडा लगा हुआ था। नकुल और सहदेव भी शीजघ्रतापूर्वक रथपर आरूढ़ हो श्वेत चँवर और व्यजन डुलाते हुए जनार्दनकी सेवा करने लगे। उस समय अपने समस्त फुफेरे भाइयोंसे संयुक्त शत्रुदमन केशव ऐसी शोभा पाने लगे, मानो अपने प्रिय शिष्योंके साथ गुरु यात्रा कर रहे हों

তেমনি শক্তিমান ভীমসেনও মাদ্রীপুত্র যমজ (নকুল-সহদেব)-সহ অনুসরণ করতে করতে দীপ্তিমান হয়ে উঠল—যেন প্রিয় শিষ্যদের বেষ্টিত এক গুরু অগ্রসর হচ্ছেন।

Verse 19

पृष्ठतोडनुययौ कृष्णमृत्विक्पौरजनै: सह । (छत्रं शतशलाकं च दिव्यमाल्योपशोभितम्‌ । वैडूर्यमणिदण्डं च चामीकरविभूषितम्‌ ।। दधार तरसा भीमश्छत्र तच्छार््डधन्वने । उपारुहा[ रथं शीघ्रं चामरव्यजने सिते ।। नकुल: सहदेवश्न धूयमानौ जनार्दनम्‌ ।) स तथा क्रातृभि: सर्वे: केशव: परवीरहा

কৃষ্ণের পশ্চাতে ঋত্বিজ ও নগরবাসীরা চলল। ভীম দ্রুত শার্ঙ্গধনুর্ধর কৃষ্ণের উপর শত-শলাকা বিশিষ্ট, দিব্য মালায় অলংকৃত, বৈদূর্যমণি-দণ্ডযুক্ত ও স্বর্ণভূষিত ছত্র ধারণ করল। নকুল ও সহদেব তৎক্ষণাৎ রথে উঠে জনার্দনের উপর শুভ্র চামর-ব্যজন দোলাতে লাগল। এভাবে সকল ভ্রাতৃগণের সেবায় কেশব—শত্রুবীর-সংহারক—অগ্রসর হলেন।

Verse 20

पार्थमामन्त्रय गोविन्द: परिष्वज्य सुपीडितम्‌,श्रीकृष्णके बिछोहसे अर्जुनको बड़ी व्यथा हो रही थी। गोविन्दने उन्हें हृदयसे लगाकर उनसे जानेकी अनुमति ली। फिर उन्होंने युधिष्ठिर और भीमसेनका चरणस्पर्श किया। युधिष्ठिर, भीम और अर्जुनने भगवान्‌को छातीसे लगा लिया और नकुल-सहदेवने उनके चरणोंमें प्रणाम किया (तब भगवानने भी उन दोनोंको छातीसे लगा लिया)

গোবিন্দ পার্থের বিদায়-অনুমতি চেয়ে, বিচ্ছেদের বেদনায় কাতর অর্জুনকে বুকে জড়িয়ে দৃঢ়ভাবে আলিঙ্গন করলেন। তারপর তিনি যুধিষ্ঠির ও ভীমসেনের চরণ স্পর্শ করলেন। তখন যুধিষ্ঠির, ভীম ও অর্জুন প্রভুকে বক্ষে টেনে নিলেন; আর নকুল-সহদেব তাঁর চরণে প্রণাম করল—যার উত্তরে তিনি তাঁদের দুজনকেও স্নেহে আলিঙ্গন করলেন।

Verse 21

युधिष्ठिरं पूजयित्वा भीमसेनं यमौ तथा । परिष्वक्तो भृशं तैस्तु यमाभ्यामभिवादित:,श्रीकृष्णके बिछोहसे अर्जुनको बड़ी व्यथा हो रही थी। गोविन्दने उन्हें हृदयसे लगाकर उनसे जानेकी अनुमति ली। फिर उन्होंने युधिष्ठिर और भीमसेनका चरणस्पर्श किया। युधिष्ठिर, भीम और अर्जुनने भगवान्‌को छातीसे लगा लिया और नकुल-सहदेवने उनके चरणोंमें प्रणाम किया (तब भगवानने भी उन दोनोंको छातीसे लगा लिया)

যুধিষ্ঠির, ভীমসেন এবং যমজ ভ্রাতৃদ্বয়কে যথোচিত সম্মান জানিয়ে তিনি তাঁদের দ্বারা স্নেহভরে আলিঙ্গিত হলেন; আর যমজেরা তাঁকে শ্রদ্ধায় প্রণাম করল।

Verse 22

योजनार्धमथो गत्वा कृष्ण: परपुरंजय: । युधिष्ठिरं समामन्त्रय निवर्तस्वेति भारत,भारत! शत्रुविजयी श्रीकृष्णने दो कोस दूर चले जानेपर युधिष्ठिरसे जानेकी अनुमति ले यह अनुरोध किया कि 'अब आप लौट जाइये'

অর্ধ যোজন অগ্রসর হয়ে পরপুরজয়ী শ্রীকৃষ্ণ যুধিষ্ঠিরকে সম্বোধন করে বিদায় নিয়ে বললেন—“হে ভারত, এখন আপনি প্রত্যাবর্তন করুন।”

Verse 23

ततो<5भिवाद्य गोविन्द: पादौ जग्राह धर्मवित्‌ | उत्थाप्य धर्मराजस्तु मूर्थ्न्युपाप्राय केशवम्‌,तदनन्तर धर्मज्ञ गोविन्दने प्रणाम करके युधिष्ठिरके पैर पकड़ लिये। फिर पाण्डुकुमार धर्मराज युधिष्छिरने यादवश्रेष्ठ कमलनयन केशवको दोनों हाथोंसे उठाकर उनका मस्तक सूँघा और “जाओ” कहकर उन्हें जानेकी आज्ञा दी

তখন ধর্মজ্ঞ গোবিন্দ প্রণাম করে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের চরণ ধারণ করলেন। ধর্মরাজ কেশবকে তুলে স্নেহভরে তাঁর মস্তক শুঁকে “যাও” বলে বিদায় দিলেন।

Verse 24

पाण्डवो यादवश्रेष्ठ कृष्णं कमललोचनम्‌ । गम्यतामित्यनुज्ञाप्य धर्मराजो युधिष्ठटिर:,तदनन्तर धर्मज्ञ गोविन्दने प्रणाम करके युधिष्ठिरके पैर पकड़ लिये। फिर पाण्डुकुमार धर्मराज युधिष्छिरने यादवश्रेष्ठ कमलनयन केशवको दोनों हाथोंसे उठाकर उनका मस्तक सूँघा और “जाओ” कहकर उन्हें जानेकी आज्ञा दी

তখন ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির যাদবশ্রেষ্ঠ কমলনয়ন শ্রীকৃষ্ণকে “আপনি যান” বলে বিদায় দিলেন।

Verse 25

ततस्तै: संविदं कृत्वा यथावन्मधुसूदन: । निवर्त्य च तथा कृच्छात्‌ पाण्डवान्‌ सपदानुगान्‌,तत्पश्चात्‌ उनके साथ पुनः आनेका निश्चित वादा करके भगवान्‌ मधुसूदनने पैदल आये हुए नागरिकों-सहित पाण्डवोंको बड़ी कठिनाईसे लौटाया और प्रसन्नतापूर्वक अपनी पुरी द्वारकाको गये, मानो इन्द्र अमरावतीको जा रहे हों। जबतक वे दिखायी दिये, तबतक पाण्डव अपने नेत्रोंद्वारा उनका अनुसरण करते रहे

তারপর মধুসূদন তাঁদের সঙ্গে যথোচিত প্রতিজ্ঞা-সমঝোতা স্থির করে, পদযাত্রী নাগরিকদেরসহ পাণ্ডবদের বহু কষ্টে ফিরিয়ে দিলেন।

Verse 26

स्वां पुरी प्रययौ हृष्टो यथा शक्रो5मरावतीम्‌ | लोचनैरनुजग्मुस्ते तमादृष्टिपथात्‌ तदा,तत्पश्चात्‌ उनके साथ पुनः आनेका निश्चित वादा करके भगवान्‌ मधुसूदनने पैदल आये हुए नागरिकों-सहित पाण्डवोंको बड़ी कठिनाईसे लौटाया और प्रसन्नतापूर्वक अपनी पुरी द्वारकाको गये, मानो इन्द्र अमरावतीको जा रहे हों। जबतक वे दिखायी दिये, तबतक पाण्डव अपने नेत्रोंद्वारा उनका अनुसरण करते रहे

তিনি হর্ষিত হয়ে নিজের নগরীতে রওনা হলেন, যেমন শক্র অমরাবতীতে যান। তখন পাণ্ডবেরা যতক্ষণ তিনি দৃষ্টিপথে ছিলেন, ততক্ষণ চোখে চোখে তাঁকে অনুসরণ করলেন; পরে তিনি দৃষ্টির আড়ালে চলে গেলেন।

Verse 27

मनोभिरनुजग्मुस्ते कृष्णं प्रीतिसमन्वयात्‌ | अतृप्तमनसामेव तेषां केशवदर्शने,अत्यन्त प्रेमके कारण उनका मन श्रीकृष्णके साथ ही चला गया। अभी केशवके दर्शनसे पाण्डवोंका मन तृप्त नहीं हुआ था, तभी नयनाभिराम भगवान्‌ श्रीकृष्ण सहसा अदृश्य हो गये। पाण्डवोंकी श्रीकृष्णदर्शनविषयक कामना अधूरी ही रह गयी। उन सबका मन भगवान्‌ गोविन्दके साथ ही चला गया

বৈশম্পায়ন বললেন— গভীর স্নেহের বন্ধনে তাদের মন কৃষ্ণের পেছনে পেছনে চলল। কেশবকে দর্শন করেও তাদের হৃদয় তৃপ্ত হল না; এত প্রবল ছিল তাঁর সান্নিধ্যের প্রতি তাদের প্রেম ও আকাঙ্ক্ষা।

Verse 28

क्षिप्रमन्तर्दथे शौरिश्वक्षुषां प्रियदर्शन: । अकामा एव पार्थास्ति गोविन्दगतमानसा:,अत्यन्त प्रेमके कारण उनका मन श्रीकृष्णके साथ ही चला गया। अभी केशवके दर्शनसे पाण्डवोंका मन तृप्त नहीं हुआ था, तभी नयनाभिराम भगवान्‌ श्रीकृष्ण सहसा अदृश्य हो गये। पाण्डवोंकी श्रीकृष्णदर्शनविषयक कामना अधूरी ही रह गयी। उन सबका मन भगवान्‌ गोविन्दके साथ ही चला गया

সকলের নয়নের প্রিয় দর্শন শৌরি মুহূর্তেই অদৃশ্য হয়ে গেলেন। পার্থদের দর্শন-আকাঙ্ক্ষা অপূর্ণই রইল, তবু তারা যেন নিষ্কাম হয়ে পড়ল—কারণ তাদের মন গোবিন্দের পেছনে চলে গিয়েছিল।

Verse 29

निवृत्योपययुस्तर्ण स्वं पुरं पुरुषर्षभा: । स्यन्दनेनाथ कृष्णो5पि त्वरितं द्वारकामगात्‌,अब वे पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव मार्गसे लौटकर तुरंत अपने नगरकी ओर चल पड़े। उधर श्रीकृष्ण भी रथके द्वारा शीघ्र ही द्वारका जा पहुँचे

সেই পুরুষশ্রেষ্ঠ পাণ্ডবেরা পথ থেকে ফিরে দ্রুত নিজেদের নগরের দিকে অগ্রসর হলেন। আর কৃষ্ণও রথে আরোহণ করে ত্বরিতে দ্বারকায় পৌঁছালেন।

Verse 30

सात्वतेन च वीरेण पृष्ठतो यायिना तदा । दारुकेण च सूतेन सहितो देवकीसुत: । स गतो द्वारकां विष्णुर्गरुत्मानिव वेगवान्‌,सात्वतवंशी वीर सात्यकि भगवान्‌ श्रीकृष्णके पीछे बैठकर यात्रा कर रहे थे और सारथि दारुक आगे था। उन दोनोंके साथ देवकीनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्ण वेगशाली गरुड़की भाँति द्वारकामें पहुँच गये

তখন দেবকীনন্দন, বিষ্ণু-স্বরূপ শ্রীকৃষ্ণের সঙ্গে বীর সাত্বত সাত্যকি পেছনে বসে যাত্রা করছিলেন, আর সারথি দারুক রথ চালাচ্ছিলেন। তাঁদের সহিত তিনি গরুড়ের ন্যায় বেগবান হয়ে দ্বারকায় পৌঁছালেন।

Verse 31

वैशम्पायन उवाच निवृत्य धर्मराजस्तु सह भ्रातृभिरच्युत: । सुहृत्परिवृतो राजा प्रविवेश पुरोत्तमम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले धर्मराज युधिष्ठिर भाइयों-सहित मार्गसे लौटकर सुहृदोंके साथ अपने श्रेष्ठ नगरके भीतर प्रविष्ट हुए

বৈশম্পায়ন বললেন— ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির, যিনি ধর্মপথ থেকে বিচ্যুত হন না, ভ্রাতৃগণের সঙ্গে পথ থেকে ফিরে সুহৃদদের পরিবেষ্টিত হয়ে শ্রেষ্ঠ নগরে প্রবেশ করলেন।

Verse 32

विसृज्य सुहृद: सर्वान्‌ भ्रातृन्‌ पुत्रांश्च धर्मराट्‌ । मुमोद पुरुषव्याप्रो द्रौपद्या सहितो नूप,राजन! वहाँ पुरुषसिंह धर्मराजने समस्त सुहृदों, भाइयों और पुत्रोंको विदा करके राजमहलमें द्रौपदीके साथ बैठकर प्रसन्नताका अनुभव किया

ধর্মরাজ সকল সুহৃদ, ভ্রাতা ও পুত্রদের বিদায় দিয়ে, পুরুষব্যাঘ্র সেই নৃপ দ্রৌপদীর সহিত রাজপ্রাসাদে উপবিষ্ট হয়ে অন্তরের শান্ত আনন্দ অনুভব করলেন।

Verse 33

केशवो<पि मुदा युक्त: प्रविवेश पुरोत्तमम्‌ । पूज्यमानो यदुश्रेष्ठैरुग्रसेनमुखैस्तथा,इधर भगवान्‌ केशव भी उग्रसेन आदि श्रेष्ठ यादवोंसे सम्मानित हो प्रसन्नतापूर्वक द्वारकापुरीके भीतर गये

কেশবও আনন্দে পরিপূর্ণ হয়ে শ্রেষ্ঠ নগরীতে প্রবেশ করলেন; উগ্রসেন-প্রমুখ শ্রেষ্ঠ যাদবদের দ্বারা পূজিত ও সম্মানিত হয়ে তিনি অন্তরে প্রবিষ্ট হলেন।

Verse 34

आहुकं पितरं वृद्ध मातरं च यशस्विनीम्‌ । अभिवाद्य बल॑ चैव स्थित: कमललोचन:,कमलनयन श्रीकृष्णने राजा उम्रसेन, बूढ़े पिता वसुदेव और यशस्विनी माता देवकीको प्रणाम करके बलरामजीके चरणोंमें मस्तक झुकाया

কমলনয়ন শ্রীকৃষ্ণ বৃদ্ধ পিতা আহুক (উগ্রসেন) ও যশস্বিনী মাতাকে প্রণাম করলেন; পরে বলকেও (বলরামকে) অভিবাদন জানিয়ে তাঁদের সম্মুখে স্থির হয়ে দাঁড়ালেন।

Verse 35

प्रद्युम्नसाम्बनिशठां श्वारुदेष्णं गद॑ तथा । अनिरुद्धं च भानुं च परिष्वज्य जनार्दन:

জনার্দন প্রদ্যুম্ন, সাম্ব, নিষঠ, শ্বারুদেষ্ণ, গদ, অনিরুদ্ধ ও ভানু—এ সকলকে আলিঙ্গন করে আপন সান্নিধ্যে টেনে নিলেন; যেন কুলবন্ধন ও পারস্পরিক দায়বদ্ধতা দৃঢ় করলেন।

Verse 36

मयो5पि स महाभाग: सर्वरत्नविभूषिताम्‌ । विधिवत्‌ कल्पयामास सभां धर्मसुताय वै,इधर महाभाग मयने भी धर्मपुत्र युधिष्ठिरके लिये विधिपूर्वक सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित सभामण्डप बनानेकी मन-ही-मन कल्पना की

অপরদিকে মহাভাগ ময়ও ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠিরের জন্য বিধিপূর্বক সর্বরত্নবিভূষিত এক সভাগৃহ নির্মাণের পরিকল্পনা করে তা প্রস্তুত করতে উদ্যোগী হলেন।

Verse 173

रुक्मदण्डं बृहद्वाहुर्विदुधाव प्रदक्षिणम्‌ । कुरुराज युधिष्ठिरने घोड़ोंकी बागडोर स्वयं अपने हाथमें ले ली। फिर महाबाहु अर्जुन भी रथपर बैठ गये और सुवर्णमय दण्डसे विभूषित श्वेत चँवर और व्यजन लेकर दाहिनी ओरसे उनके ऊपर डुलाने लगे

বৈশম্পায়ন বললেন—সুবর্ণদণ্ড হাতে নিয়ে মহাবাহু শ্রদ্ধাভরে দক্ষিণাবর্তে প্রদক্ষিণ করলেন। কুরুরাজ যুধিষ্ঠির নিজ হাতে অশ্বদের রশ্মি ধরলেন। তারপর মহাবাহু অর্জুনও রথে উঠে সোনার দণ্ডে শোভিত শ্বেত চামর ও ব্যজন নিয়ে ডানদিকে দাঁড়িয়ে তাঁর উপর পাখা দোলাতে লাগলেন—এ ছিল সম্মান ও স্বেচ্ছাসেবার লক্ষণ।

Verse 193

अन्वीयमान: शुशुभे शिष्यैरिव गुरु: प्रियै: इसी प्रकार नकुल-सहदेवसहित बलवान्‌ भीमसेन भी ऋत्विजों और पुरवासियोंके साथ भगवान्‌ श्रीकृष्णके पीछे-पीछे चल रहे थे। उन्होंने वेगपूर्वक आगे बढ़कर शाड््गधनुष धारण करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्णके ऊपर दिव्य मालाओंसे सुशोभित एवं सौ शलाकाओं (तिल्लियों)-से युक्त स्वर्णविभूषित छत्र लगाया। उस छत्रमें वैदूर्ययमणिका डंडा लगा हुआ था। नकुल और सहदेव भी शीजघ्रतापूर्वक रथपर आरूढ़ हो श्वेत चँवर और व्यजन डुलाते हुए जनार्दनकी सेवा करने लगे। उस समय अपने समस्त फुफेरे भाइयोंसे संयुक्त शत्रुदमन केशव ऐसी शोभा पाने लगे, मानो अपने प्रिय शिष्योंके साथ गुरु यात्रा कर रहे हों

বৈশম্পায়ন বললেন—অনুসরণকারীদের মধ্যে কেশব এমন দীপ্তিমান ছিলেন, যেন প্রিয় শিষ্যদের পরিবেষ্টিত গুরু। সেই যাত্রায় বলবান ভীমসেন, নকুল-সহদেবসহ, ঋত্বিক ও নগরবাসীদের সঙ্গে শ্রীকৃষ্ণের পেছনে পেছনে চললেন। তারা দ্রুত এগিয়ে গিয়ে শাড্গধনু ধারণকারী জনার্দনের উপর দিব্য মালায় সুশোভিত, শত শলাকাযুক্ত, স্বর্ণালঙ্কৃত ছত্র ধারণ করল; সেই ছত্রে বৈদূর্যমণির দণ্ড ছিল। নকুল ও সহদেবও তৎক্ষণাৎ রথে উঠে শ্বেত চামর ও ব্যজন দোলাতে দোলাতে জনার্দনের সেবা করতে লাগল। তখন পিতৃব্য-ভ্রাতৃসম সকল ভাইয়ে যুক্ত শত্রুদমন কেশব এমন শোভা পেলেন, যেন প্রিয় শিষ্যদের সঙ্গে গুরু যাত্রা করছেন।

Verse 356

स वृद्धैरभ्यनुज्ञातो रुक्मिण्या भवन ययौ । तत्पश्चात्‌ जनार्दनने प्रद्यम्न, साम्ब, निशठ, चारुदेष्ण, गद, अनिरुद्ध तथा भानु आदिको स्नेहपूर्वक हृदयसे लगाया और बड़े-बूढ़ोंकी आज्ञा लेकर रुक्मिणीजीके महलमें प्रवेश किया

বৃদ্ধদের অনুমতি পেয়ে তিনি রুক্মিণীর ভবনে গেলেন। তারপর জনার্দন প্রদ্যুম্ন, সাম্ব, নিশঠ, চারুদেষ্ণ, গদ, অনিরুদ্ধ, ভানু প্রভৃতিকে স্নেহভরে বুকে জড়িয়ে ধরলেন এবং পুনরায় বৃদ্ধদের সম্মতি নিয়ে রুক্মিণীর প্রাসাদে প্রবেশ করলেন।

Frequently Asked Questions

The chapter emphasizes dharma as correct relational conduct—seeking permission, honoring elders and priests, and aligning personal affection with public responsibility during political travel.

That orderly transitions of power and movement are stabilized by ritualized courtesy: consultation, respectful farewells, gifts and blessings, and public signals of alliance reduce ambiguity in political relationships.

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter operates as narrative-ethnographic documentation of protocol, with its significance arising from how these norms support legitimacy and cohesion in the epic’s political world.