
Vaiśravaṇa-sabhā-varṇanam (Description of Kubera’s Assembly Hall)
Upa-parva: Sabhā-Varnana (Description of the Celestial Assemblies)
Nārada describes to the king the sabhā of Vaiśravaṇa (Kubera/Dhanada) as a luminous, expansive hall—approximately one hundred yojanas in length and seventy in breadth—crafted by Kubera through austerity (tapas). The hall appears aerial and mobile, carried or supported by guhyakas, ornamented with lofty golden trees, radiant like moonlight and sunlike brilliance, and perfumed by winds bearing mandāra and other celestial fragrances, including sandalwood groves. The assembly is continuously animated by divine music and dance performed by gandharvas and numerous apsarases, several named in sequence, indicating an ordered retinue culture. A catalog of yakṣas and attendant beings follows, presenting the court as a structured polity with specialized personnel. Nārada further notes the presence of Śiva (Umāpati, Paśupati, Tryambaka) with hosts of formidable attendants, portrayed as Kubera’s constant companion, reinforcing Kubera’s status and the hall’s sacral authority. The chapter closes with Nārada transitioning from this aerial sabhā to the forthcoming account of Pitāmaha (Brahmā)’s assembly.
Chapter Arc: युधिष्ठिर के प्रश्न के उत्तर में वैशम्पायन/वर्णक कुबेर की दिव्य सभा का स्मरण कराता है—वह सभा जो तपस्या से स्वयं वैश्रवण (कुबेर) द्वारा प्राप्त हुई, चन्द्र-प्रभा-सी आभा और कैलास-शिखर-सी भव्यता लिए हुए। → सभा की अलौकिक गति और वैभव बढ़ता जाता है: गुह्यक-गण उसे उठाकर ले चलते हैं तो वह आकाश से सटी हुई-सी प्रतीत होती है; स्वर्ण-प्रासाद, विद्युत्-सी दमकती दीवारें, और चारों ओर देव-गन्धर्व-अप्सराओं की उपस्थिति वर्णन को क्रमशः अधिक विस्मयकारी बनाती है। → कुबेर की सभा का चरम वैभव तब प्रकट होता है जब असंख्य दिव्य उपस्थितियाँ एक साथ दृश्य में आती हैं—मिश्रकेशी, रम्भा, घृताची, मेनका आदि अप्सराएँ; विश्वावसु, हाहा-हूहू, तुम्बुरु आदि गन्धर्व; हिमवान्, विन्ध्य, कैलास, मन्दर आदि पर्वत-समूहों का संकेत; और शिव-परिषद् (नन्दीश्वर, महाकाल, शंकुकर्ण आदि) की दिव्य छाया—मानो समस्त लोक-सम्पदा एक ही सभा में सन्निहित हो। → वर्णन कुबेर-सभा की स्थिर प्रतिष्ठा पर टिकता है: धनाधिपति की उपासना में यक्ष-गन्धर्व-निशाचर एकत्र हैं; यहाँ तक कि धर्मिष्ठ विभीषण भी अपने भ्राता-प्रभु की सेवा में उपस्थित दिखता है—सभा को ‘धर्म-सम्पन्न वैभव’ का केन्द्र बनाते हुए। → कुबेर-सभा के बाद पितामह (ब्रह्मा) की सभा का वर्णन आरम्भ करने का संकेत—‘अब पितामहसभा कीर्तयिष्ये’—अगले अध्याय के लिए जिज्ञासा छोड़ देता है।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापववके अन्तर्गत लोकपालयभाख्यानपर्वमें वरुणस भा- वर्णनविषयक नवाँ अध्याय प्रा हुआ ॥/ ९ ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ३४ श्लोक हैं) पम्प बछ। अकाल दशमो<ध्याय: कुबेरकी सभाका वर्णन नारद उवाच सभा वैश्रवणी राजज्छतयोजनमायता । विस्तीर्णा सप्ततिश्चैव योजनानि सितप्रभा,नारदजी कहते हैं--राजन्! कुबेरकी सभा सौ योजन लंबी और सत्तर योजन चौड़ी है, वह अत्यन्त श्वैतप्रभासे युक्त है
নারদ বললেন—হে রাজন! বৈশ্রবণ (কুবের)-এর সভা শত যোজন দীর্ঘ ও সত্তর যোজন প্রশস্ত; তা উজ্জ্বল শুভ্র জ্যোতিতে দীপ্ত।
Verse 2
तपसा निर्जिता राजन् स्वयं वैश्रवणेन सा । शशिप्रभा प्रावरणा कैलासशिखरोपमा,युधिष्ठिर! विश्रवाके पुत्र कुबेरने स्वयं ही तपस्या करके उस सभाको प्राप्त किया है। वह अपनी धवल कान्तिसे चन्द्रमाकी चाँदनीको भी तिरस्कृत कर देती है और देखनेमें कैलासशिखर-सी जान पड़ती है
হে রাজন! সেই সভা বৈশ্রবণ নিজ তপস্যাবলে অর্জন করেছেন। তার শুভ্র কান্তি চন্দ্রপ্রভাকেও ম্লান করে এবং তা কৈলাস-শিখরের ন্যায় প্রতীয়মান।
Verse 3
गुहकैरुह्ममाना सा खे विषक्तेव शोभते । दिव्या हेममयैरुच्चै: प्रासादैरुपशोभिता,गुहकगण जब उस सभाको उठाकर ले चलते हैं, उस समय वह आकाशमें सटी हुई- सी सुशोभित होती है। यह दिव्य सभा ऊँचे सुवर्णमय महलोंसे शोभायमान होती है
গুহ্যকগণ যখন সেই সভা তুলে বহন করে, তখন তা যেন আকাশে লেগে আছে—এমনই শোভা পায়। তা দিব্য, উচ্চ স্বর্ণময় প্রাসাদে অলংকৃত।
Verse 4
महारत्नवती चित्रा दिव्यगन्धा मनोरमा । सिता भ्रशिखराकारा प्लवमानेव दृश्यते,महान् रत्नोंसे उसका निर्माण हुआ है। उसकी झाँकी बड़ी विचित्र है। उससे दिव्य सुगन्ध फैलती रहती है और वह दर्शकके मनको अपनी ओर खींच लेती है। श्वेत बादलोंके शिखर-सी प्रतीत होनेवाली वह सभा आकाशकमें तैरती-सी दिखायी देती है
সে সভা মহারত্নে নির্মিত, বিচিত্র শোভাময়, দিব্য সুগন্ধে পরিপূর্ণ ও মনোহর। শুভ্র মেঘশিখরের ন্যায় তা আকাশে ভাসমান বলে মনে হয়।
Verse 5
तस्यां वैश्रवणो राजा विचित्राभरणाम्बर:,उस सभामें सूर्यके समान चमकीले दिव्य बिछौनोंसे ढके हुए तथा दिव्य पादपीठोंसे सुशोभित श्रेष्ठ सिंहासनपर कानोंमें ज्योतिसे जगमगाते कुण्डल और अंगोंमें विचित्र वस्त्र एवं आभूषण धारण करनेवाले श्रीमान् राजा वैश्रवण (कुबेर) सहसौं स्त्रियोंसे घिरे हुए बैठते हैं
সেই সভায় শ্রীমান রাজা বৈশ্রবণ (কুবের) বিচিত্র বস্ত্র ও অলংকার ধারণ করে শ্রেষ্ঠ দিব্য সিংহাসনে আরূঢ় হয়ে সহস্র নারীতে পরিবৃত হয়ে বিরাজ করেন।
Verse 6
स्त्रीसहस्रैर्व॒तः श्रीमानास्ते ज्वलितकुण्डल: । दिवाकरनिभे पुण्य दिव्यास्तरणसंवृते । दिव्यपादोपधाने च निषण्ण: परमासने,उस सभामें सूर्यके समान चमकीले दिव्य बिछौनोंसे ढके हुए तथा दिव्य पादपीठोंसे सुशोभित श्रेष्ठ सिंहासनपर कानोंमें ज्योतिसे जगमगाते कुण्डल और अंगोंमें विचित्र वस्त्र एवं आभूषण धारण करनेवाले श्रीमान् राजा वैश्रवण (कुबेर) सहसौं स्त्रियोंसे घिरे हुए बैठते हैं
নারদ বললেন—সেখানে শ্রীমান বৈশ্রবণ (কুবের) সহস্র নারীতে পরিবৃত হয়ে বিরাজমান। তাঁর কুণ্ডল দীপ্তিতে জ্বলজ্বল করছে। সূর্যসম উজ্জ্বল পবিত্র দিব্য আচ্ছাদনে আবৃত, দিব্য পাদপীঠে শোভিত সেই পরম সিংহাসনে তিনি আসীন।
Verse 7
मन्दाराणामुदाराणां वनानि परिलोडयन् । सौगन्धिकवनानां च गन्ध॑ गन्धवहो वहन्,(अपने पास आये हुए याचककी प्रत्येक इच्छा पूर्ण करनेमें अत्यन्त) उदार मन्दार वृक्षोंक वनोंको आन्दोलित करता तथा सौगन्धिक कानन, अलका नामक पुष्करिणी और नन््दन वनकी सुगन्धका भार वहन करता हुआ हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाला गन्धवाही शीतल समीर उस सभामें कुबेरकी सेवा करता है
নারদ বললেন—সেই দিব্য সভায় শীতল সুগন্ধবাহী বায়ু কুবেরের সেবা করে। সে উদার মন্দার-বৃক্ষের বনকে মৃদু দোলায় এবং সৌগন্ধিক অরণ্যের সুবাস বহন করে হৃদয়কে আনন্দিত করে।
Verse 8
नलिन्याश्वालकाख्याया नन्दनस्य वनस्य च । शीतो हृदयसंह्नवादी वायुस्तमुपसेवते,(अपने पास आये हुए याचककी प्रत्येक इच्छा पूर्ण करनेमें अत्यन्त) उदार मन्दार वृक्षोंक वनोंको आन्दोलित करता तथा सौगन्धिक कानन, अलका नामक पुष्करिणी और नन््दन वनकी सुगन्धका भार वहन करता हुआ हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाला गन्धवाही शीतल समीर उस सभामें कुबेरकी सेवा करता है
নারদ বললেন—আলকা-নামক নলিনী, সৌগন্ধিক কানন ও নন্দন বনের সুবাসের ভার বহনকারী শীতল, হৃদয়-প্রসন্নকারী বায়ু সেই (কুবেরের) সেবা করে; আর উদার মন্দার-বনকে মৃদুভাবে দোলায়।
Verse 9
तत्र देवा: सगन्धर्वा गणैरप्सरसां वृता: । दिव्यतानैर्महाराज गायन्ति सम सभागता:,महाराज! देवता और गन्धर्व अप्सराओंके साथ उस सभामें आकर दिव्य तानोंसे युक्त गीत गाते हैं
মহারাজ! সেখানে দেবগণ গন্ধর্বদের সঙ্গে, অপ্সরাদের দলে পরিবৃত হয়ে, সেই সভায় সমবেত হয়ে দিব্য সুরে গান গায়।
Verse 10
मिश्रकेशी च रम्भा च चित्रसेना शुचिस्मिता । चारनेत्रा घृताची च मेनका पुज्जिकस्थला,मिश्रकेशी, रम्भा, चित्रसेना, शुचिस्मिता, चारनेत्रा, घृताची, मेनका, पुंजिकस्थला, विश्वाची, सहजन्या, प्रम्लोचा, उर्वशी, इरा, वर्गा, सौरभेयी, समीची, बुदुबुदा तथा लता आदि नृत्य और गीतमें कुशल सहस््रों अप्सराओं और गन्धर्वोके गण कुबेरकी सेवामें उपस्थित होते हैं इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि धनदसभावर्णनं नाम दशमो<ध्याय:
নারদ বললেন—মিশ্রকেশী ও রম্ভা, চিত্রসেনা ও শুচিস্মিতা; চারনেত্রা, ঘৃতাচী, মেনকা ও পুঞ্জিকাস্থলা—এরা এবং আরও সহস্র অপ্সরা, গীত-নৃত্যে পারদর্শী, গন্ধর্বগণের সঙ্গে কুবেরের সভায় সেবায় উপস্থিত থাকে।
Verse 11
विश्वाची सहजन्या च प्रम्लोचा उर्वशी इरा । वर्गा च सौरभेयी च समीची बुदबुदा लता,मिश्रकेशी, रम्भा, चित्रसेना, शुचिस्मिता, चारनेत्रा, घृताची, मेनका, पुंजिकस्थला, विश्वाची, सहजन्या, प्रम्लोचा, उर्वशी, इरा, वर्गा, सौरभेयी, समीची, बुदुबुदा तथा लता आदि नृत्य और गीतमें कुशल सहस््रों अप्सराओं और गन्धर्वोके गण कुबेरकी सेवामें उपस्थित होते हैं
নারদ বললেন—বিশ্বাচী, সহজন্যা, প্রম্লোচা, উর্বশী, ইরা, বর্গা, সৌরভেয়ী, সমীচী, বুদ্বুদা, লতা, মিশ্রকেশী, রম্ভা, চিত্রসেনা, শুচিস্মিতা, চারুনেত্রা, ঘৃতাচী, মেনকা ও পুঞ্জিকাস্থলা—এবং নৃত্য-গীতে পারদর্শী আরও সহস্র সহস্র অপ্সরা ও গন্ধর্বগণ—কুবেরের সেবায় সদা উপস্থিত থাকে। এতে তাঁর রাজঐশ্বর্য ও দিব্য সভার শৃঙ্খলিত ব্যবস্থা প্রকাশ পায়।
Verse 12
एता: सहस्नशश्चान्या नृत्यगीतविशारदा: । उपतिष्ठन्ति धनदं गन्धर्वाप्सरसां गणा:,मिश्रकेशी, रम्भा, चित्रसेना, शुचिस्मिता, चारनेत्रा, घृताची, मेनका, पुंजिकस्थला, विश्वाची, सहजन्या, प्रम्लोचा, उर्वशी, इरा, वर्गा, सौरभेयी, समीची, बुदुबुदा तथा लता आदि नृत्य और गीतमें कुशल सहस््रों अप्सराओं और गन्धर्वोके गण कुबेरकी सेवामें उपस्थित होते हैं
নারদ বললেন—এদের ছাড়াও নৃত্য-গীতে পারদর্শী আরও সহস্র সহস্র গন্ধর্ব-অপ্সরার দল ধনদ (কুবের)-এর সেবায় উপস্থিত থাকে; যেমন মিশ্রকেশী, রম্ভা, চিত্রসেনা, শুচিস্মিতা, চারুনেত্রা, ঘৃতাচী, মেনকা, পুঞ্জিকাস্থলা, বিশ্বাচী, সহজন্যা, প্রম্লোচা, উর্বশী, ইরা, বর্গা, সৌরভেয়ী, সমীচী, বুদ্বুদা ও লতা। এই দৃশ্য কুবেরের সমৃদ্ধ সার্বভৌমতা এবং দিব্য জগতের শৃঙ্খলিত সেবাক্রমকে প্রকাশ করে।
Verse 13
अनिशं दिव्यवादिन्रैन॑त्यगीतैश्व सा सभा | अशून्या रुचिरा भाति गन्धर्वाप्सरसां गणै:,गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदायसे भरी तथा दिव्य वाद्य, नृत्य एवं गीतोंसे निरन्तर गूँजती हुई कुबेरकी वह सभा बड़ी मनोहर जान पड़ती है
নারদ বললেন—দিব্য বাদ্য, নৃত্য ও গীতে নিরন্তর ধ্বনিত, গন্ধর্ব-অপ্সরার দলে পরিপূর্ণ সেই সভা কখনও শূন্য হয় না; অপূর্ব মনোহর রূপে তা দীপ্তিমান।
Verse 14
किन्नरा नाम गन्धर्वा नरा नाम तथा परे,किन्नर तथा नर नामवाले गन्धर्व, मणिभद्र, धनद, श्वेतभद्र, गुह्मक, कशेरक, गण्डकण्डू, महाबली प्रद्योत, कुस्तुम्बुरु पिशाच, गजकर्ण, विशालक, वराहकर्ण, ताग्रोष्ठ, फलकक्ष, फलोदक, हंसचूड, शिखावर्त, हेमनेत्र, विभीषण, पुष्पानन, पिंगलक, शोणितोद, प्रवालक, वृक्षवासी, अनिकेत तथा चीरवासा, भारत! ये तथा दूसरे बहुत-से यक्ष लाखोंकी संख्यामें उपस्थित होकर उस सभामें कुबेरकी सेवा करते हैं
নারদ বললেন—কিছু গন্ধর্ব ‘কিন্নর’ নামে পরিচিত, আর কিছু ‘নর’ নামে। তাদের সঙ্গে আছে মণিভদ্র, ধনদ, শ্বেতভদ্র, গুহ্যক, কশেরক, গণ্ডকণ্ডূ, মহাবলী প্রদ্যোত, কুস্তুম্বুরু, পিশাচ, গজকর্ণ, বিশালক, বরাহকর্ণ, তাগ্রোষ্ঠ, ফলকক্ষ, ফলোদক, হংসচূড়, শিখাবর্ত, হেমনেত্র, বিভীষণ, পুষ্পানন, পিঙ্গলক, শোণিতোদ, প্রবালক, বৃক্ষবাসী, অনিকেত ও চীরবাসা। হে ভারত! এরা এবং আরও বহু যক্ষ লক্ষ লক্ষ সংখ্যায় সেই সভায় উপস্থিত থেকে কুবেরের সেবা করে।
Verse 15
मणिभद्रो5थ धनद: श्वेतभद्रश्न गुह्दक: । कशेरको गण्डकण्डू: प्रद्योतश्न महाबल:,किन्नर तथा नर नामवाले गन्धर्व, मणिभद्र, धनद, श्वेतभद्र, गुह्मक, कशेरक, गण्डकण्डू, महाबली प्रद्योत, कुस्तुम्बुरु पिशाच, गजकर्ण, विशालक, वराहकर्ण, ताग्रोष्ठ, फलकक्ष, फलोदक, हंसचूड, शिखावर्त, हेमनेत्र, विभीषण, पुष्पानन, पिंगलक, शोणितोद, प्रवालक, वृक्षवासी, अनिकेत तथा चीरवासा, भारत! ये तथा दूसरे बहुत-से यक्ष लाखोंकी संख्यामें उपस्थित होकर उस सभामें कुबेरकी सेवा करते हैं
নারদ বললেন—মণিভদ্র ও ধনদ (কুবের), শ্বেতভদ্র ও গুহ্যক, কশেরক, গণ্ডকণ্ডূ এবং মহাবলী প্রদ্যোত—এরা এবং আরও বহু যক্ষ বৃহৎ দলে সমবেত হয়ে সেই দিব্য সভায় কুবেরের সেবায় উপস্থিত থাকে।
Verse 16
कुस्तुम्बुरु: पिशाचश्च गजकर्णो विशालक: । वराहकर्णस्ताम्रोष्ठ;: फलकक्ष: फलोदक:,किन्नर तथा नर नामवाले गन्धर्व, मणिभद्र, धनद, श्वेतभद्र, गुह्मक, कशेरक, गण्डकण्डू, महाबली प्रद्योत, कुस्तुम्बुरु पिशाच, गजकर्ण, विशालक, वराहकर्ण, ताग्रोष्ठ, फलकक्ष, फलोदक, हंसचूड, शिखावर्त, हेमनेत्र, विभीषण, पुष्पानन, पिंगलक, शोणितोद, प्रवालक, वृक्षवासी, अनिकेत तथा चीरवासा, भारत! ये तथा दूसरे बहुत-से यक्ष लाखोंकी संख्यामें उपस्थित होकर उस सभामें कुबेरकी सेवा करते हैं
নারদ বললেন—কুস্তুম্বুরু, পিশাচ, গজকর্ণ, বিশালক, বরাহকর্ণ, তাম্রোষ্ঠ, ফলকক্ষ, ফলোদক; কিন্নরগণ; ‘নরনামবান্’ নামে গন্ধর্ব; মণিভদ্র; ধনদ (কুবের); শ্বেতভদ্র; গুহ্মক; কশেরক; গণ্ডকণ্ডূ; মহাবলী প্রদ্যোত; হংসচূড়; শিখাবর্ত; হেমনেত্র; বিভীষণ; পুষ্পানন; পিঙ্গলক; শোণিতোদ; প্রবালক; বৃক্ষবাসী; অনিকেত; এবং চীরবাসা—হে ভারত! এরা ও আরও বহু যক্ষ অগণিত দলে সেই সভায় উপস্থিত থেকে কুবেরের পরিচর্যা করে।
Verse 17
हंसचूड: शिखावर्तो हेमनेत्रो विभीषण: । पुष्पानन: पिड़लक: शोणितोद: प्रवालक:,किन्नर तथा नर नामवाले गन्धर्व, मणिभद्र, धनद, श्वेतभद्र, गुह्मक, कशेरक, गण्डकण्डू, महाबली प्रद्योत, कुस्तुम्बुरु पिशाच, गजकर्ण, विशालक, वराहकर्ण, ताग्रोष्ठ, फलकक्ष, फलोदक, हंसचूड, शिखावर्त, हेमनेत्र, विभीषण, पुष्पानन, पिंगलक, शोणितोद, प्रवालक, वृक्षवासी, अनिकेत तथा चीरवासा, भारत! ये तथा दूसरे बहुत-से यक्ष लाखोंकी संख्यामें उपस्थित होकर उस सभामें कुबेरकी सेवा करते हैं
নারদ বললেন—হংসচূড়, শিখাবর্ত, হেমনেত্র, বিভীষণ, পুষ্পানন, পিঙ্গলক, শোণিতোদ, প্রবালক—এদের সঙ্গে কিন্নর ও ‘নরনামবান্’ প্রভৃতি গন্ধর্ব; আর মণিভদ্র, ধনদ (কুবের), শ্বেতভদ্র, গুহ্মক, কশেরক, গণ্ডকণ্ডূ, মহাবলী প্রদ্যোত, কুস্তুম্বুরু, পিশাচ, গজকর্ণ, বিশালক, বরাহকর্ণ, তাগ্রোষ্ঠ, ফলকক্ষ, ফলোদক, বৃক্ষবাসী, অনিকেত ও চীরবাসা—হে ভারত! এরা ও আরও বহু যক্ষ লক্ষ লক্ষ সংখ্যায় সেই সভায় সমবেত হয়ে কুবেরের পরিচর্যা করে।
Verse 18
वृक्षवास्यनिकेतश्न चीरवासाश्न॒ भारत । एते चान्ये च बहवो यक्षा: शतसहस्रश:,किन्नर तथा नर नामवाले गन्धर्व, मणिभद्र, धनद, श्वेतभद्र, गुह्मक, कशेरक, गण्डकण्डू, महाबली प्रद्योत, कुस्तुम्बुरु पिशाच, गजकर्ण, विशालक, वराहकर्ण, ताग्रोष्ठ, फलकक्ष, फलोदक, हंसचूड, शिखावर्त, हेमनेत्र, विभीषण, पुष्पानन, पिंगलक, शोणितोद, प्रवालक, वृक्षवासी, अनिकेत तथा चीरवासा, भारत! ये तथा दूसरे बहुत-से यक्ष लाखोंकी संख्यामें उपस्थित होकर उस सभामें कुबेरकी सेवा करते हैं
নারদ বললেন—হে ভারত! বৃক্ষবাসী, অনিকেত ও চীরবাসা—এরা এবং আরও বহু যক্ষ শত-সহস্র সংখ্যায়, কিন্নর ও প্রসিদ্ধ গন্ধর্বদের সঙ্গে সেখানে উপস্থিত। মণিভদ্র, ধনদ (কুবের), শ্বেতভদ্র, গুহ্মক, কশেরক, গণ্ডকণ্ডূ, মহাবলী প্রদ্যোত, কুস্তুম্বুরু, পিশাচ, গজকর্ণ, বিশালক, বরাহকর্ণ, তাগ্রোষ্ঠ, ফলকক্ষ, ফলোদক, হংসচূড়, শিখাবর্ত, হেমনেত্র, বিভীষণ, পুষ্পানন, পিঙ্গল, শোণিতোদ, প্রবালক, বৃক্ষবাসী, অনিকেত ও চীরবাসা—এরা ও আরও বহু যক্ষ সেই সভায় সমবেত হয়ে কুবেরের পরিচর্যা করে।
Verse 19
सदा भगवती लक्ष्मीस्तत्रैव नलकूबर: । अहं च बहुशस्तस्यां भवन्त्यन्ये च मद्विधा:,धन-सम्पत्तिकी अधिष्ठात्री देवी भगवती लक्ष्मी, नलकूबर, मैं तथा मेरे-जैसे और भी बहुत-से लोग प्राय: उस सभामें उपस्थित होते हैं
নারদ বললেন—সেই সভাগৃহেই ভগবতী লক্ষ্মী সদা বিরাজ করেন; নলকূবরও সেখানেই থাকে। আমি নিজেও বারংবার সেখানে যাই, আর আমার মতো আরও অনেকেই সেখানে উপস্থিত হন।
Verse 20
ब्रह्मर्षयो भवन्त्यत्र तथा देवर्षयो5परे । क्रव्यादाश्न॒ तथैवान्ये गन्धर्वाश्ष महाबला:
নারদ বললেন—এখানে ব্রহ্মর্ষিগণ বাস করেন, এবং অন্যান্য দেবর্ষিরাও। এখানে ক্রব্যাদ (মাংসাহারী) ও আরও নানা সত্তা আছে; আর মহাবলী গন্ধর্বরাও আছে।
Verse 21
उपासते महात्मानं तस्यां धनदमीश्वरम् । ब्रह्मर्षि, देवर्षि तथा अन्य ऋषिगण उस सभामें विराजमान होते हैं। इनके सिवा बहुत- से पिशाच और महाबली गन्धर्व वहाँ लोकपाल महात्मा धनदकी उपासना करते हैं || २०६ || भगवान् भूतसड्घैश्व वृत: शतसहस्रश:,नृपश्रेष्ठ लाखों भूतसमूहोंसे घिरे हुए उग्र धनुर्थर महाबली पशुपति (जीवोंके स्वामी), शूलधारी, भगदेवताके नेत्र नष्ट करनेवाले तथा त्रिलोचन भगवान् उमापति और क्लेशरहित देवी पार्वती ये दोनों, वामन, विकट, कुब्ज, लाल नेत्रोंवाले, महान् कोलाहल करनेवाले, मेदा और मांस खानेवाले, अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाले तथा वायुके समान महान् वेगशाली भयानक भूत-प्रेतादिके साथ उस सभामें सदैव धन देनेवाले अपने मित्र कुबेरके पास बैठते हैं
নারদ বললেন—সেই সভায় মহাত্মা ধনাধ্যক্ষ কুবেরের উপাসনা চলছিল। ব্রহ্মর্ষি, দেবর্ষি এবং অন্যান্য ঋষিগণ সেখানে মহিমায় আসীন ছিলেন। তাঁদের ছাড়াও বহু পিশাচ ও মহাবলী গন্ধর্ব লোকপাল ধনদ কুবেরকে ভক্তিভরে সম্মান করছিল। তখন ভগবান শিব—শতসহস্র ভূতগণে পরিবৃত, পশুপতি, ত্রিশূলধারী, ত্র্যম্বক, ভগদেবতার চক্ষুনাশকারী উমাপতি—ক্লেশহীন দেবী পার্বতীকে সঙ্গে নিয়ে, নানা রূপ ও অস্ত্রশস্ত্রে সজ্জিত ভয়ংকর ভূত-প্রেতদলের সহিত সেখানে প্রবেশ করে, সদা ধনদাতা বন্ধু কুবেরের পাশে বসিলেন।
Verse 22
उमापति: पशुपति: शूलभृद् भगनेत्रहा । त्रयम्बको राजशार्दूल देवी च विगतक्लमा,नृपश्रेष्ठ लाखों भूतसमूहोंसे घिरे हुए उग्र धनुर्थर महाबली पशुपति (जीवोंके स्वामी), शूलधारी, भगदेवताके नेत्र नष्ट करनेवाले तथा त्रिलोचन भगवान् उमापति और क्लेशरहित देवी पार्वती ये दोनों, वामन, विकट, कुब्ज, लाल नेत्रोंवाले, महान् कोलाहल करनेवाले, मेदा और मांस खानेवाले, अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाले तथा वायुके समान महान् वेगशाली भयानक भूत-प्रेतादिके साथ उस सभामें सदैव धन देनेवाले अपने मित्र कुबेरके पास बैठते हैं
নারদ বললেন—হে রাজশার্দূল! উমাপতি, পশুপতি, ত্রিশূলধারী, ভগদেবতার চক্ষুনাশকারী, ত্রিনয়ন ত্র্যম্বক ভগবান এবং তাঁর সঙ্গে ক্লেশহীন দেবী পার্বতী সেখানে উপস্থিত হলেন। তাঁরা শতসহস্র ভূতগণে পরিবৃত হয়ে সভায় প্রবেশ করলেন। বামন, বিকট, কুব্জ, রক্তনয়ন, মহারবে কলরোলকারী, মেদ-মাংসভোজী, নানাবিধ অস্ত্রধারী, বায়ুর ন্যায় দ্রুতগামী ও ভয়ংকর ভূত-প্রেতদলের সহিত মহাবলী পশুপতি সভায় এসে সদা ধনদাতা বন্ধু কুবেরের পাশে আসন নিলেন।
Verse 23
वामनैर्विकटै: कुब्जै: क्षतजाक्षैर्महारवै: । मेदोमांसाशनैरुग्रैरुग्रधन्चा महाबल:,नृपश्रेष्ठ लाखों भूतसमूहोंसे घिरे हुए उग्र धनुर्थर महाबली पशुपति (जीवोंके स्वामी), शूलधारी, भगदेवताके नेत्र नष्ट करनेवाले तथा त्रिलोचन भगवान् उमापति और क्लेशरहित देवी पार्वती ये दोनों, वामन, विकट, कुब्ज, लाल नेत्रोंवाले, महान् कोलाहल करनेवाले, मेदा और मांस खानेवाले, अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाले तथा वायुके समान महान् वेगशाली भयानक भूत-प्रेतादिके साथ उस सभामें सदैव धन देनेवाले अपने मित्र कुबेरके पास बैठते हैं
নারদ বললেন—তিনি বামন, বিকট, কুব্জ, রক্তনয়ন, মহারবে কলরোলকারী, মেদ-মাংসভোজী উগ্র ভূতগণের দ্বারা পরিবৃত ছিলেন। এমন ভয়ংকর পরিচরদের মাঝে মহাবলী, উগ্র ধনু ধারণকারী তিনি সেখানে দাঁড়িয়ে ছিলেন এবং নিজের তেজে সকলকে অভিভূত করছিলেন।
Verse 24
नानाप्रहरणैरुग्रैर्वातिरिव महाजवै: । वृतः सखायमन्वास्ते सदैव धनदं नूप,नृपश्रेष्ठ लाखों भूतसमूहोंसे घिरे हुए उग्र धनुर्थर महाबली पशुपति (जीवोंके स्वामी), शूलधारी, भगदेवताके नेत्र नष्ट करनेवाले तथा त्रिलोचन भगवान् उमापति और क्लेशरहित देवी पार्वती ये दोनों, वामन, विकट, कुब्ज, लाल नेत्रोंवाले, महान् कोलाहल करनेवाले, मेदा और मांस खानेवाले, अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाले तथा वायुके समान महान् वेगशाली भयानक भूत-प्रेतादिके साथ उस सभामें सदैव धन देनेवाले अपने मित्र कुबेरके पास बैठते हैं
নারদ বললেন—হে নৃপশ্রেষ্ঠ! নানাবিধ উগ্র অস্ত্রধারী, বায়ুর ন্যায় মহাবেগী ভয়ংকর ভূত-প্রেতগণে পরিবৃত হয়ে তিনি সর্বদা তাঁর সখা, সদা ধনদাতা ধনদ কুবেরের নিকটে আসীন থাকেন।
Verse 25
प्रहष्टा: शतशश्चान्ये बहुश: सपरिच्छदा: । गन्धर्वाणां च पतयो विश्वावसुर्हहाहुहू:,एते चान्ये च गन्धर्वा धनेश्वरमुपासते | इनके सिवा और भी विविध वस्त्राभूषणोंसे विभूषित और प्रसन्नचित्त सैकड़ों गन्धर्वपति विश्वावसु, हाहा, हुहू, तुम्बुरु, पर्वत, शैलूष, संगीतज्ञ चित्रसेन तथा चित्ररथ--ये और अन्य गन्धर्व भी धनाध्यक्ष कुबेरकी उपासना करते हैं
নারদ বললেন—আরও অনেকে—শত শত—আনন্দিত চিত্তে, নিজ নিজ পরিচ্ছদে সুশোভিত হয়ে উপস্থিত ছিল। গন্ধর্বদের অধিপতি বিশ্বাবসু, হাহা ও হুহূ—এরা এবং অন্যান্য গন্ধর্বও ধনাধ্যক্ষ ধনেশ্বর কুবেরকে নিরন্তর উপাসনা করে।
Verse 26
तुम्बुरु: पर्वतश्चैव शैलूषश्व॒ तथापर: । चित्रसेनश्न॒ गीतज्ञस्तथा चित्ररथो5पि च
নারদ বললেন—তুম্বুরু, পর্বত ও শৈলূষ, এবং আর-একজনও; গীতবিদ্যায় পারদর্শী চিত্রসেন, আর চিত্ররথও।
Verse 27
विद्याधराधिपश्चनैव चक्रधर्मा सहानुजै:,विद्याधरोंके अधिपति चक्रधर्मा भी अपने छोटे भाइयोंके साथ वहाँ धनेश्वर भगवान् कुबेरकी आराधना करते हैं
নারদ বললেন—বিদ্যাধরদের অধিপতি চক্রধর্মাও তাঁর কনিষ্ঠ ভ্রাতৃগণের সঙ্গে সেখানে ধনেশ্বর দেব কুবেরের আরাধনা করেন।
Verse 28
उपाचरति तत्र सम धनानामीश्वरं प्रभुम्,विद्याधरोंके अधिपति चक्रधर्मा भी अपने छोटे भाइयोंके साथ वहाँ धनेश्वर भगवान् कुबेरकी आराधना करते हैं
নারদ বললেন—সেখানে চক্রধর্মাও তাঁর কনিষ্ঠ ভ্রাতৃগণের সঙ্গে সমধনের অধীশ্বর, প্রভু ধনেশ্বর কুবেরের সেবায় ও উপাসনায় রত।
Verse 29
आसते चापि राजानो भगदत्तपुरोगमा: । ट्रुम: किम्पुरुषेशश्व॒ उपास्ते धनदेश्वरम्,भगदत्त आदि राजा भी उस सभामें बैठते हैं तथा किन्नरोंके स्वामी ट्रुम कुबेरकी उपासना करते हैं
নারদ বললেন—সেখানে ভগদত্তকে অগ্রে রেখে বহু রাজাও আসীন; আর কিম্পুরুষদের অধিপতি ত্রুম ধনেশ্বর (কুবের)-এর উপাসনা করে।
Verse 30
राक्षसाधिपतिकश्रैव महेन्द्रो गन्धमादन: । सह यक्षै: सगन्धर्वै: सह सर्वैर्निशाचरै:
নারদ বললেন—রাক্ষসদের অধিপতিও—গন্ধমাদনের মহেন্দ্র—যক্ষদের সঙ্গে, গন্ধর্বদের সঙ্গে, এবং সকল নিশাচরসহ উপস্থিত হল।
Verse 31
हिमवान् पारियात्रश्न विन्ध्यकैलासमन्दरा:,हिमवान्, पारियात्र, विन्ध्य, कैलास, मन्दराचल, मलय, दर्दुर, महेन्द्र, गन्धमादन और इन्द्रकील तथा सुनाभ नामवाले दोनों दिव्य पर्वत--ये तथा अन्य सब मेरु आदि बहुत-से पर्वत धनके स्वामी महामना प्रभु कुबेरकी उपासना करते हैं
নারদ বললেন—হিমবান, পারিয়াত্র, বিন্ধ্য, কৈলাস ও মন্দর; আর মালয়, দর্দুর, মহেন্দ্র, গন্ধমাদন, ইন্দ্রকীল এবং সুনাভ নামে দুই দিব্য পর্বত—এরা এবং মেরু-প্রমুখ আরও বহু শৃঙ্গ ধনের অধিপতি মহামনা প্রভু কুবেরের উপাসনা করে।
Verse 32
मलयो दर्दुरश्नैव महेन्द्रो गन्धमादन: । इन्द्रकील: सुनाभश्न तथा दिव्यौ च पर्वती,हिमवान्, पारियात्र, विन्ध्य, कैलास, मन्दराचल, मलय, दर्दुर, महेन्द्र, गन्धमादन और इन्द्रकील तथा सुनाभ नामवाले दोनों दिव्य पर्वत--ये तथा अन्य सब मेरु आदि बहुत-से पर्वत धनके स्वामी महामना प्रभु कुबेरकी उपासना करते हैं
নারদ বললেন—মালয় ও দর্দুর, মহেন্দ্র ও গন্ধমাদন, ইন্দ্রকীল ও সুনাভ; আর সেই দিব্য পর্বতসমূহ—হিমবান, পারিয়াত্র, বিন্ধ্য, কৈলাস ও মন্দরাচল—এরা এবং মেরু-প্রমুখ আরও বহু পর্বত মহামনা ধনাধিপতি প্রভু কুবেরের উপাসনা করে।
Verse 33
एते चान्ये च बहव: सर्वे मेरुपुरोगमा: । उपासते महात्मानं धनानामीथश्चरं प्रभुम्,हिमवान्, पारियात्र, विन्ध्य, कैलास, मन्दराचल, मलय, दर्दुर, महेन्द्र, गन्धमादन और इन्द्रकील तथा सुनाभ नामवाले दोनों दिव्य पर्वत--ये तथा अन्य सब मेरु आदि बहुत-से पर्वत धनके स्वामी महामना प्रभु कुबेरकी उपासना करते हैं
নারদ বললেন—এরা এবং আরও বহু পর্বত, মেরুকে অগ্রগণ্য করে সকলেই, ধনের অধীশ্বর মহাত্মা প্রভু কুবেরের উপাসনা করে।
Verse 34
नन्दीश्वरश्न भगवान् महाकालस्तथैव च । शड्कुकर्णमुखा: सर्वे दिव्या: पारिषदास्तथा,भगवान् नन्दीश्वर, महाकाल तथा शंकुकर्ण आदि भगवान् शिवके सभी दिव्य-पार्षद काष्ठ, कुटीमुख, दन्ती, तपस्वी विजय तथा गर्जनशील महाबली श्वेत वृषभ वहाँ उपस्थित रहते हैं
নারদ বললেন—সেখানে ভগবান নন্দীশ্বর ও মহাকালও আছেন; আর শঙ্কুকর্ণ-প্রমুখ সকল দিব্য পার্ষদও উপস্থিত।
Verse 35
काष्ठ: कुटीमुखो दन््ती विजयश्व तपो5धिक: । श्वेतश्न वृषभस्तत्र नर्दन्नास्ते महाबल:,भगवान् नन्दीश्वर, महाकाल तथा शंकुकर्ण आदि भगवान् शिवके सभी दिव्य-पार्षद काष्ठ, कुटीमुख, दन्ती, तपस्वी विजय तथा गर्जनशील महाबली श्वेत वृषभ वहाँ उपस्थित रहते हैं
নারদ বললেন—সেখানে কাষ্ঠ, কুটীমুখ, দন্তী এবং তপস্যায় শ্রেষ্ঠ বিজয়শ্ব আছেন; আর মহাবলী শ্বেত বৃষভও গর্জন করতে করতে সেখানে অবস্থান করছে।
Verse 36
धनदं राक्षसाक्षान्ये पिशाचाक्ष॒ उपासते । पारिषदै: परिवृतमुपायान्तं महेश्वरम्,दूसरे-दूसरे राक्षत और पिशाच भी धनदाता कुबेरकी उपासना करते हैं। पार्षदोंसे घिरे हुए देवदेवेश्वर, त्रिभुवनभावन, बहुरूपधारी, कल्याणस्वरूप, उमावल्लभ भगवान् महेश्वर जब उस सभामें पधारते हैं, तब पुलस्त्यनन्दन धनाध्यक्ष कुबेर उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करते और उनकी आज्ञा ले उन्हींके पास बैठ जाते हैं। उनका सदाका यही नियम है। कुबेरके सखा भगवान् शंकर कभी-कभी उस सभामें पदार्पण किया करते हैं
নারদ বললেন—অন্য রাক্ষস ও পিশাচেরাও ধনদাতা কুবেরকে উপাসনা করে। আর যখন পার্ষদবেষ্টিত দেবদেবেশ্বর, ত্রিলোক-ভাবন, বহুরূপধারী, উমাপতি, কল্যাণস্বরূপ মহেশ্বর সেই সভায় আগমন করেন, তখন পুলস্ত্যনন্দন নিধিপতি কুবের শিবের চরণে মস্তক নত করে প্রণাম জানায়, তাঁর আদেশ গ্রহণ করে, তারপর তাঁরই নিকটে আসন গ্রহণ করে—এটাই তার নিত্য বিধান। কুবেরের সখা ভগবান শঙ্কর কখনও কখনও সেই সভাতেও উপস্থিত হন।
Verse 37
सदा हि देवदेवेशं शिवं त्रैलोक्यभावनम् । प्रणम्य मूर्थ्ना पौलस्त्यो बहुरूपमुमापतिम्,दूसरे-दूसरे राक्षत और पिशाच भी धनदाता कुबेरकी उपासना करते हैं। पार्षदोंसे घिरे हुए देवदेवेश्वर, त्रिभुवनभावन, बहुरूपधारी, कल्याणस्वरूप, उमावल्लभ भगवान् महेश्वर जब उस सभामें पधारते हैं, तब पुलस्त्यनन्दन धनाध्यक्ष कुबेर उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करते और उनकी आज्ञा ले उन्हींके पास बैठ जाते हैं। उनका सदाका यही नियम है। कुबेरके सखा भगवान् शंकर कभी-कभी उस सभामें पदार्पण किया करते हैं
নারদ বললেন—পৌলস্ত্য কুবের সর্বদাই দেবদেবেশ্বর শিবকে—ত্রিলোক-ভাবন, বহুরূপধারী, উমাপতি—মস্তক নত করে প্রণাম করে। এটাই তার নিত্য বিধান: যখনই মহেশ্বর সেই সভায় আসেন, সে তাঁর চরণে প্রণিপাত করে আদেশ গ্রহণ করে, তারপর তাঁরই নিকটে বসে।
Verse 38
ततोअभ्यनुज्ञां सम्प्राप्प महादेवाद् धनेश्वर: । आस्ते कदाचित् भगवान् भवो धनपते: सखा,दूसरे-दूसरे राक्षत और पिशाच भी धनदाता कुबेरकी उपासना करते हैं। पार्षदोंसे घिरे हुए देवदेवेश्वर, त्रिभुवनभावन, बहुरूपधारी, कल्याणस्वरूप, उमावल्लभ भगवान् महेश्वर जब उस सभामें पधारते हैं, तब पुलस्त्यनन्दन धनाध्यक्ष कुबेर उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करते और उनकी आज्ञा ले उन्हींके पास बैठ जाते हैं। उनका सदाका यही नियम है। कुबेरके सखा भगवान् शंकर कभी-कभी उस सभामें पदार्पण किया करते हैं
তারপর ধনেশ্বর কুবের মহাদেবের অনুমতি লাভ করে সেখানেই অবস্থান করে। আর কখনও কখনও ধনপতির সখা ভগবান ভব—অর্থাৎ শিব—সেই সভায়ও উপস্থিত হন। এই অংশটি বোঝায়—যিনি নিজে উপাস্য, সেই কুবেরও মহেশ্বরের সম্মতি ছাড়া কিছু করেন না; বিনয়ই তার ধর্ম।
Verse 39
निधिप्रवरमुख्यौ च शड्खपाझौ धनेश्वरौ । सर्वान् निधीन् प्रगृह्माथ उपासाते धनेश्वरम्,श्रेष्ठ निधियोंमें प्रमुख और धनके अधीश्वर शंख तथा पद्म--ये दोनों (मूर्तिमान् हो) अन्य सब निधियोंको साथ ले धनाध्यक्ष कुबेरकी उपासना करते हैं
শঙ্খ ও পদ্ম—শ্রেষ্ঠ নিধিদের মধ্যে প্রধান এবং নিজেরাও ধনের অধীশ্বর—অন্য সকল নিধিকে সঙ্গে নিয়ে ধনাধিপতি কুবেরকে নিত্য উপাসনা করে।
Verse 40
सा सभा तादृशी रम्या मया दृष्टान्तरिक्षगा । पितामहसभां राजन् कीर्तयिष्ये निबोध ताम्,राजन! कुबेरकी वैसी रमणीय सभा जो आकाशमें विचरनेवाली है, मैंने अपनी आँखों देखी है। अब मैं ब्रह्माजीकी सभाका वर्णन करूँगा, उसे सुनो
হে রাজন, আকাশে বিচরণশীল সেই মনোরম সভা আমি নিজ চোখে দেখেছি। এখন আমি পিতামহ ব্রহ্মার সভার বর্ণনা করব; মনোযোগ দিয়ে শোনো।
Verse 46
दिव्या हेममयैरज्रै्विद्युद्धिरिव चित्रिता । उस दिव्य सभाकी दीवारें विद्युतके समान उद्दीप्त होनेवाले सुनहले रंगोंसे चित्रित की गयी हैं
নারদ বললেন—সেই দিব্য সভাগৃহের প্রাচীরগুলি স্বর্ণময় অলংকারে সুশোভিত ছিল; বিদ্যুতের ঝলকের মতোই তারা দীপ্ত হয়ে উঠত।
Verse 263
एते चान्ये च गन्धर्वा धनेश्वरमुपासते | इनके सिवा और भी विविध वस्त्राभूषणोंसे विभूषित और प्रसन्नचित्त सैकड़ों गन्धर्वपति विश्वावसु, हाहा, हुहू, तुम्बुरु, पर्वत, शैलूष, संगीतज्ञ चित्रसेन तथा चित्ररथ--ये और अन्य गन्धर्व भी धनाध्यक्ष कुबेरकी उपासना करते हैं
নারদ বললেন—এরা এবং আরও বহু গন্ধর্ব, নানা বস্ত্র-অভরণে বিভূষিত ও প্রসন্নচিত্ত—বিশ্বাবসু, হাহা, হুহু, তুম্বুরু, পর্বত, শৈলূষ, সঙ্গীতজ্ঞ চিত্রসেন ও চিত্ররথ—সকলেই ধনাধ্যক্ষ ধনেশ্বর কুবেরের উপাসনা করে।
Verse 306
विभीषणश्च धर्मिष्ठ उपास्ते भ्रातरं प्रभुम् । महेन्द्र, गन्धमादन एवं धर्मनिष्ठ राक्षसराज विभीषण भी यक्षों, गन्धर्वों तथा सम्पूर्ण निशाचरोंके साथ अपने भाई भगवान् कुबेरकी उपासना करते हैं
নারদ বললেন—ধর্মনিষ্ঠ বিভীষণও নিজের ভ্রাতা প্রভু কুবেরের উপাসনা করে। এইভাবে মহেন্দ্র ও গন্ধমাদন পর্বতে সে যক্ষ, গন্ধর্ব এবং সকল নিশাচরের সঙ্গে মিলিত হয়ে দেব কুবেরকে শ্রদ্ধাভরে সেবা করে।
The chapter juxtaposes stability of rule with mobility of power: authority appears anchored in tapas and hierarchy, yet its visible form is portable and performative, implying that legitimacy must be continually maintained through order and sanctioned display.
The passage teaches that prosperity and authority function through coordinated roles—specialized service, regulated aesthetics, and disciplined retinues—presenting governance as an ecosystem rather than a solitary virtue.
No explicit phalaśruti is stated in the provided verses; the meta-function is structural, as Nārada uses the description to authenticate his witness (dṛṣṭa) and to introduce a comparative sequence leading to Pitāmaha’s sabhā.