
धृतराष्ट्रस्य मूर्च्छा तथा द्रोणविषयकप्रश्नाः (Dhṛtarāṣṭra’s Fainting and Questions Concerning Droṇa)
Upa-parva: Droṇābhimukha-prayāṇa (Encirclement Queries and Approaches toward Droṇa)
Vaiśaṃpāyana narrates that Dhṛtarāṣṭra, overwhelmed by grief after questioning Sañjaya, collapses and is revived by attendants with cold water and fanning; palace women lift him and seat him. Regaining consciousness, the trembling king resumes interrogation, repeatedly asking who could restrain specific Pāṇḍava-aligned champions advancing toward Droṇa. The chapter builds a rhetorical inventory: Arjuna’s approach is described through storm-and-thunder imagery (Gāṇḍīva’s roar; arrow-rain; chariot-sound), while other figures—Bhīma, the twins, Sātyaki, Dhṛṣṭadyumna, Śikhaṇḍin, Abhimanyu, the Draupadeyas, allied kings, and Ghaṭotkaca—are praised via epithets stressing discipline, courage, and near-invincibility. The sequence culminates in a theological reassurance: Nārāyaṇa/Kṛṣṇa as the Pāṇḍavas’ support, implying that defeat is improbable when divine guidance aligns with their cause, and foreshadowing continued narration of Kṛṣṇa’s “divine deeds” for inner steadiness.
Chapter Arc: धृतराष्ट्र को रणभूमि से यह असह्य समाचार मिलता है कि आचार्य द्रोण—जिन्हें वह अजेय मानता था—मारे गए। राजा का हृदय शोक और अविश्वास से भर उठता है और वह संजय से बार-बार पूछता है: यह कैसे संभव हुआ? → धृतराष्ट्र द्रोण की अपराजेयता का स्मरण करता है—उनके दिव्यास्त्र, स्वर्ण-पंखों वाले बाणों की वर्षा, और शत्रुओं को रौंदती उनकी रथ-चाल। वह संभावनाएँ गिनता है: क्या रथ टूट गया, क्या धनुष खंडित हुआ, क्या वे प्रमत्त हुए? फिर वह युद्ध-व्यवस्था पर प्रश्न उठाता है—कौन-कौन वीर उनके आगे-पीछे रक्षा में लगे थे, और वे कैसे हटे? → राजा का शोक क्रोध में बदलता है: ‘सिंह-हाथी समान पराक्रमी द्रोण का वध मैं नहीं सह सकता।’ वह द्रोण-वध को केवल पराक्रम का नहीं, व्यवस्था-भंग और भाग्य-प्रहार का परिणाम मानने लगता है—और पुरुषार्थ को भी अनर्थ का कारण कहकर दैव को श्रेष्ठ ठहराता है। → अध्याय का निष्कर्ष धृतराष्ट्र के भीतर टूटते भरोसे में है: द्रोण के गिरने से कौरव-सेना की ढाल टूट गई, और राजा का मन भविष्य के अनिष्ट की ओर झुक जाता है। संजय के उत्तर की प्रतीक्षा में धृतराष्ट्र का विलाप और प्रश्न-श्रृंखला ही इस अध्याय का स्थायी स्वर बनती है। → संजय से धृतराष्ट्र का आग्रह बना रहता है—‘विस्तार से बताओ: द्रोण के निकट कौन थे, अर्जुन ने किसे रोका, और पार्षत (धृष्टद्युम्न) कैसे द्रोण तक पहुँचा?’
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३७ “लोक हैं।) नवमो<्ध्याय: द्रोणाचार्यकी मृत्युका समाचार सुनकर धृतराष्ट्रका शोक करना धृतराष्ट उवाच कि कुर्वाणं रणे द्रोणं जघ्नु: पाण्डवसूंजया: । तथा निपुणमस्त्रेषु सर्वशस्त्रभूतामपि
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সঞ্জয়! রণক্ষেত্রে দ্রোণাচার্য কী করছিলেন যে পাণ্ডব ও সৃঞ্জয়রা তাঁকে আঘাত করতে পারল? তিনি তো অস্ত্রবিদ্যায় অতিনিপুণ এবং সকল অস্ত্রধারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ।
Verse 2
रथभज़ो बभूवास्य थनुर्वाशीर्यतास्यत: । प्रमत्तो वाभवद् द्रोणस्ततो मृत्युमुपेयिवान्
তাঁর রথ কি ভেঙে গিয়েছিল, না কি বাণ নিক্ষেপ করতে করতে তাঁর ধনুক ভেঙে পড়েছিল? অথবা দ্রোণাচার্য কি অসতর্ক হয়েছিলেন, যার ফলে তিনি মৃত্যুকে বরণ করলেন?
Verse 3
कथं नु पार्षतस्तात शत्रुभिर्दुष्प्रधर्षणम् किरन्तमिषुसंघातान् रुक्मपुड्खाननेकश:
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—বৎস! শত্রুদের পক্ষে যিনি অদম্য, যিনি সোনালি পালকযুক্ত অসংখ্য বাণের ঝড় বর্ষণ করছিলেন—সেই দ্রোণাচার্যকে পার্ষতপুত্র ধৃষ্টদ্যুম্ন কীভাবে বধ করল?
Verse 4
क्षिप्रहस्तं द्विजश्रेष्ठ कृतिनं चित्रयोधिनम् दूरेषुपातिनं दान्तमस्त्रयुद्धेषु पारगम्
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! দ্রোণাচার্য ছিলেন ক্ষিপ্রহস্ত, কৃতী ও বিচিত্র কৌশলে যুদ্ধকারী। তিনি দূর থেকে বাণ নিক্ষেপে নিপুণ, সংযতচিত্ত এবং অস্ত্রযুদ্ধে পারদর্শী ছিলেন। যিনি শত্রুদের কাছে সর্বতোভাবে অজেয়, রণে অটল, বিজয়ের জন্য সদা প্রয়াসী ও মহারথী বীর—সেই দ্বিজোত্তম দ্রোণকে পাঞ্চালরাজপুত্র ধৃষ্টদ্যুম্ন কীভাবে বধ করল?
Verse 5
पाज्चालपुत्रो न्यवधीद् दिव्यास्त्रधरमच्युतम् । कुर्वाणं दारुणं कर्म रणे यत्तं महारथम्
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— পাঞ্চালপুত্র কীভাবে দ্রোণকে বধ করল—যিনি ব্রতে অচ্যুত, দিব্যাস্ত্রধারী, রণে ভয়ংকর কর্মে রত এবং যুদ্ধপ্রয়াসে নিমগ্ন মহারথী? শত্রুদের কাছে যিনি অজেয় বলে প্রতীয়মান—এমন সংযত, ভয়ংকর আচার্য কী উপায়ে পতিত হলেন?
Verse 6
व्यक्त हि दैवं बलवत् पौरुषादिति मे मति: । यद् द्रोणो निहतः शूर: पार्षतेन महात्मना
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— আমার কাছে স্পষ্ট যে পুরুষকারের চেয়ে দৈবই অধিক বলবান; কারণ দ্রোণ—এমন শূর বীরও মহাত্মা পার্ষত (ধৃষ্টদ্যুম্ন)-এর হাতে নিহত হলেন।
Verse 7
अस्त्र॑ चतुर्विधं वीरे यस्मिन्नासीत् प्रतिष्तितम् तमिष्वस्त्रधराचार्य द्रोणं शंससि मे हतम्
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— যে বীরের মধ্যে চতুর্বিধ অস্ত্রবিদ্যা সুদৃঢ়ভাবে প্রতিষ্ঠিত ছিল, ধনুর্ধর ও ক্ষেপণাস্ত্রধারীদের আচার্য সেই দ্রোণকে তুমি আমাকে নিহত বলে জানাচ্ছ?
Verse 8
श्रुत्वा हतं रुक्मरथं वैयातच्रपरिवारितम् । जातरूपशिरस्त्राणं नाद्य शोकमपानुदे
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— ব্যাঘ্রচর্মে আবৃত স্বর্ণরথে আরূঢ়, স্বর্ণশিরস্ত্রাণধারী দ্রোণাচার্যের নিহত হওয়ার সংবাদ শুনে আজ আমি কোনোভাবেই আমার শোক দূর করতে পারছি না।
Verse 9
न नूनं परदु:खेन प्रियते कोडपि संजय । यत्र द्रोणमहं श्रुत्वा हतं जीवामि मन्दधी:,संजय! निश्चय ही कोई भी दूसरेके दुःखसे नहीं मरता है, तभी तो मैं मन्दबुद्धि मनुष्य द्रोणाचार्यको मारा गया सुनकर भी जी रहा हूँ इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि धृतराष्ट्रशोके नवमो<ध्याय: ।।
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সঞ্জয়! নিশ্চয়ই অন্যের দুঃখে কেউ মরে না; তাই তো আমি মন্দবুদ্ধি হয়েও দ্রোণাচার্য নিহত হয়েছেন শুনে এখনও বেঁচে আছি।
Verse 10
दैवमेव परं मन्ये नन्वनर्थ हि पौरुषम् | अश्मसारमयं नून॑ हृदयं सुदृढे मम
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—এখন আমি কেবল ভাগ্যকেই পরম মনে করি; কারণ মানবপ্রচেষ্টা সত্যিই নিষ্ফল বলে মনে হয়। নিশ্চয়ই আমার হৃদয় পাথরের সার দিয়ে গড়া—অত্যন্ত কঠোর—যে এই সর্বনাশেও টিকে আছে।
Verse 11
ब्राह्मे दैवे तथेष्वस्त्रे यमुपासन् गुणार्थिन:
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—গুণ ও সিদ্ধি লাভের আকাঙ্ক্ষায় তারা ব্রাহ্মণীয় ক্রিয়া, দৈব অনুষ্ঠান এবং অস্ত্রবিদ্যার শৃঙ্খলার দ্বারা তাঁর উপাসনা করত।
Verse 12
शोषणं सागरस्येव मेरोरिव विसर्पणम्
যেন সমুদ্র শুকিয়ে যাওয়া, কিংবা মেরু পর্বত নিজের স্থান থেকে সরে যাওয়া—তেমনই এক অসম্ভব ঘটনা ঘটতে চলেছে।
Verse 13
दुष्टानां प्रतिषेद्धा5डसीद् धार्मिकाणां च रक्षिता
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—তিনি দুষ্টদের দমনকারী এবং ধার্মিকদের রক্ষক ছিলেন।
Verse 14
यो5हासीत् कृपणस्यार्थे प्राणानपि परंतप: । शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोणाचार्य दुष्टोंको दण्ड देनेवाले और धार्मिकोंके रक्षक थे। उन्होंने मुझ कृपणके लिये अपने प्राणतक दे दिये ।।
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— হে শত্রুদমনকারী! এই দীন আমার জন্য তিনি প্রাণ পর্যন্ত ত্যাগ করতে প্রস্তুত ছিলেন। দ্রোণাচার্য শত্রুদের দুঃখদাতা, দুষ্টদের দণ্ডদাতা এবং ধার্মিকদের রক্ষক—আমারই কারণে তিনি নিজের প্রাণও উৎসর্গ করলেন। আমার মন্দবুদ্ধি পুত্রদের জয়ের আশা ছিল তাঁরই পরাক্রমের উপর।
Verse 15
बृहस्पत्युशनस्तुल्यो बुद्धथया स निहतः कथम् | मेरे मूर्ख पुत्रोंकोी जिनके ही पराक्रमके भरोसे विजयकी आशा बनी हुई थी तथा जो बुद्धिमें बृहस्पति और शुक्राचार्यके समान थे, वे द्रोणाचार्य कैसे मारे गये? ।।
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— যাঁর বুদ্ধি বৃহস্পতি ও শুক্রাচার্যের তুল্য, তিনি কীভাবে নিহত হলেন? যাঁর পরাক্রমের ভরসায় আমার মূঢ় পুত্রেরা জয়ের আশা ধরে ছিল—সেই দ্রোণাচার্য কীভাবে বধ হলেন?
Verse 16
रथे वातजवा युक्ता: सर्वशस्त्रातिगा रणे । बलिनो ह्वेषिणो दान्ता: सैन्धवा: साधुवाहिन:
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— রথে যুক্ত, বায়ুর মতো দ্রুত, যুদ্ধে সর্বপ্রকার অস্ত্রাঘাত এড়িয়ে যেতে সক্ষম—সিন্ধুদেশীয় সেই অশ্বেরা, বলবান, সুপ্রশিক্ষিত, বশীভূত এবং রথ বহনে দক্ষ—তারা কি যুদ্ধে অক্ষত ছিল? তাদের সাহস কি অটুট ছিল?
Verse 17
दृढा: संग्राममध्येषु कच्चिदासन्नविह्नला: । करिणां बूंहतां युद्धे शड्खदुन्दुभिनि:स्वनै:
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— যুদ্ধের মাঝখানে তারা কি দৃঢ় ও অচঞ্চল ছিল? যখন রণে মহাহস্তীরা গর্জন করছিল এবং শঙ্খ ও দুন্দুভির ধ্বনি প্রতিধ্বনিত হচ্ছিল—তারা কি ভীত হয়নি?
Verse 18
ज्याक्षेपशरवर्षाणां शस्त्राणां च सहिष्णव: । आशंसन्त: पराज्जेतुं जितश्वासा जितव्यथा:
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— ধনুকের টংকার, তীরবৃষ্টি এবং অস্ত্রাঘাত সহ্য করতে সক্ষম, শত্রুকে পরাজিত করার আশা পোষণকারী, শ্বাস ও ব্যথা জয়কারী—তারা কি রণভূমিতে নিরুৎসাহ হয়নি?
Verse 19
हया: पराजिता: शीघ्रा भारद्वाजरथोद्वहा: । ते सम रुक्मरथे युक्ता नरवीरसमास्थिता:
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— ভারদ্বাজের রথ টানত যে দ্রুতগামী অশ্বগুলি, তারা পরাজিত হয়েছিল। কিন্তু সেই অশ্বরাই স্বর্ণালংকৃত রুক্মরথে পুনরায় যোজিত হয়ে, বীর যোদ্ধাদের নিয়ন্ত্রণে স্থিরভাবে অবস্থান করছে।
Verse 20
जातरूपपरिष्कारमास्थाय रथमुत्तमम्
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— কারুকার্যখচিত স্বর্ণালংকারে সুসজ্জিত সেই উৎকৃষ্ট রথে আরূঢ় হয়ে,
Verse 21
विद्यां यस्पोपजीवन्ति सर्वलोकधनुर्धरा:
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— সকল লোকজুড়ে খ্যাত সেই ধনুর্ধররা নিজেদের বিদ্যার বলেই জীবিকা নির্বাহ করে।
Verse 22
दिवि शक्रमिव श्रेष्ठ महामात्र धनुर्भुताम्
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— ধনুর্ধারীদের মধ্যে সেই শ্রেষ্ঠ মহামাত্রকে তারা স্বর্গে শক্র (ইন্দ্র)-এর ন্যায় মনে করে।
Verse 23
ननु रुक्मरथं दृष्टवा प्राद्रवन्ति सम पाण्डवा:
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— নিশ্চয়ই রুক্মরথকে দেখামাত্র পাণ্ডবরা একযোগে ধেয়ে গেল।
Verse 24
दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणं रणे तस्मिन् महाबलम् | उस समरांगणमें दिव्य अस्त्रोंका प्रयोग करनेवाले तथा सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हुए महाबली द्रोणाचार्यको देखकर तो समस्त पाण्डव-योद्धा भाग खड़े होते थे ।।
সেই রণক্ষেত্রে মহাবলী দ্রোণাচার্য যখন দিব্যাস্ত্রের প্রবল প্রয়োগ করছিলেন এবং স্বর্ণময় রথে আরূঢ় ছিলেন, তখন তাঁকে দেখে পাণ্ডবদের বহু যোদ্ধাই পলায়ন করত। এমনকি সমগ্র সেনাবাহিনীসহ, অনুজদের সঙ্গে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরও বিচলিত হয়ে পড়তেন।
Verse 25
नूनमावारयत् पार्थों रथिनो<न्यानजिह्ागै:
নিশ্চয়ই পার্থ অর্জুন অন্য রথীদের রোধ করে রেখেছেন—যেন দ্রুত, নির্ভুল সাপের মতো বাণে তাদের বেঁধে ফেলেছেন।
Verse 26
न हाहं परिपश्यामि वधे कज्चन शुष्मिण:
হায়! আমি এমন কোনো তেজস্বী পুরুষকে দেখছি না, যে তার বধ করতে পারে।
Verse 27
तैर्वतः सर्वतः शूर: पाउ्चाल्यापसदस्तत:
তখন সেই বীরকে পাঞ্চালদের অধম লোকেরা চারদিক থেকে ঘিরে ফেলল।
Verse 28
केक्यैश्रेदिकारूषैर्मस्स्यैरन्यैश्व भूमिपै: । व्याकुलीकृतमाचार्य पिपीलैरुरगं यथा
হে আচার্য! কেকয়, চেদি, কারূষ, মৎস্য এবং অন্যান্য রাজারা আপনাকে এমনভাবে ব্যাকুল করে তুলেছে, যেমন পিঁপড়েরা সাপকে ঘিরে তাকে ছটফট করায়।
Verse 29
कर्मण्यसुकरे सक्तं जघानेति मतिर्मम । केकय
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—আমার মনে এই কথাই উদিত হয় যে, দুষ্কর কর্মে নিমগ্ন দ্রোণাচার্যকে কেকয়, চেদি, কারূষ, মৎস্যদেশীয় সৈন্য এবং অন্যান্য ভূ-পাল চারদিক থেকে এমনভাবে ব্যাকুল করে তুলেছিল, যেমন অসংখ্য পিঁপড়ে সাপকে বিভ্রান্ত করে। সেই অবস্থায় পাণ্ডবসেনায় সর্বদিক থেকে পরিবেষ্টিত হয়ে, নীচ ধৃষ্টদ্যুম্ন দুষ্কর কর্তব্যে রত দ্রোণাচার্যকে বধ করেছিল—এ কথাই আমার মনে আসে।
Verse 30
ब्राह्मणानां प्रतिष्ठा35सीत् स्रोतसामिव सागर: । क्षत्रं च ब्रह्म चैवेह यो5भ्यतिष्ठत् परंतप:
তিনি ব্রাহ্মণদের দৃঢ় আশ্রয় ছিলেন—যেমন নদীর স্রোতসমূহের স্থিতি-দাতা সমুদ্র। এখানে তিনি ক্ষাত্রশক্তি ও ব্রহ্মবিদ্যা—উভয়কেই একসঙ্গে প্রতিষ্ঠা করেছিলেন; তিনি শত্রু-তাপকারী।
Verse 31
स कथं ब्राह्म॒णो वृद्ध: शस्त्रेण वधमाप्तवान् । जो छहों अंगों तथा पंचम वेदस्थानीय इतिहास-पुराणोंसहित चारों वेदोंका अध्ययन करके ब्राह्मणोंके लिये उसी प्रकार आश्रय बने हुए थे
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সে বৃদ্ধ ব্রাহ্মণ অস্ত্রের দ্বারা কীভাবে নিহত হলেন? যিনি ছয় অঙ্গসহ এবং পঞ্চম ‘বেদ’স্বরূপ ইতিহাস-পুরাণসহ চার বেদ অধ্যয়ন করেছিলেন; যিনি ব্রাহ্মণদের আশ্রয় ছিলেন, যেমন নদীদের আশ্রয় সমুদ্র; যিনি শত্রুদের দগ্ধ করতেন, তবু ব্রাহ্মণ ও ক্ষত্রিয়—উভয় ধর্মই পালন করতেন—সে বৃদ্ধ ব্রাহ্মণ দ্রোণাচার্য অস্ত্রের দ্বারা কীভাবে পতিত হলেন? আর আমি, ক্রোধপ্রবণ নই তবু, এই ক্লেশ দীর্ঘকাল সহ্য করে এসেছি।
Verse 32
यस्य कर्मानुजीवन्ति लोके सर्वधनुर्भुतः
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—যাঁর কর্মের আশ্রয়ে এই জগতে সকল ধনুর্ধর যোদ্ধা জীবিকা ধারণ করে।
Verse 33
स सत्यसंध: सुकृती श्रीकामैर्निहत: कथम् । जगतके सम्पूर्ण धनुर्धर जिनके शिक्षणरूपी कर्मका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं, उन सत्यप्रतिज्ञ पुण्यात्मा द्रोणाचार्यको राजलक्ष्मीके लोभियोंने कैसे मार डाला? ।।
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সত্যপ্রতিজ্ঞ, পুণ্যবান সেই দ্রোণাচার্য রাজলক্ষ্মীর লোভীদের হাতে কীভাবে নিহত হলেন?
Verse 34
क्षिप्रहस्तश्न बलवान् दृढ्धन्वारिमर्दन:
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— তিনি ছিলেন ক্ষিপ্রহস্ত, বলবান, দৃঢ়ধন্বা ও শত্রুনাশক। যাঁরা পবিত্র বিদ্যার আকাঙ্ক্ষী, তাঁদের সামনে তিনি যেন স্বয়ং বেদের ধ্বনি; আর ধনুর্ধরদের মাঝে ধনুকের জ্যার টংকার—শৃঙ্খলিত দক্ষতার চিরচিহ্ন। তাঁর বাণের লক্ষ্য হলে বিজয়কামী কোনো বীরেরই প্রায় জীবিত ফেরার আশা থাকত না।
Verse 35
न यस्य विजयाकाडूभक्षी विषयं प्राप्प जीवति । यं द्ौन जहत: शब्दौ जीवमानं कदाचन
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— যে ব্যক্তি কাম্য বস্তু লাভ করেও বিজয়ের ক্ষুধায় বাঁচে না, তাকে দ্রোণ জীবিত থাকা পর্যন্ত কখনো ত্যাগ করেন না; যাকে তিনি জীবদ্দশায় কখনো পরিত্যাগ করেন না।
Verse 36
अदीनं पुरुषव्याघत्रं हवीमनतमपराजितम्
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— আমি দেখছি সেই অদীন পুরুষব্যাঘ্রকে—যে চিত্তে অবনত নয় এবং অপরাজিত।
Verse 37
कथं संजय दुर्धर्षमनाधृष्यशोबलम्
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— হে সঞ্জয়, সেই দুর্ধর্ষ, অপ্রতিহত দীপ্তিসম্পন্ন বীরকে কীভাবে সামলানো হল?
Verse 38
पश्यतां पुरुषेन्द्राणां समरे पार्षतो5वधीत् । संजय! जिनके यश और बलका तिरस्कार होना असम्भव था, उन दुर्धर्ष वीर द्रोणाचार्यको समरभूमिमें सम्पूर्ण नरेशोंके देखते-देखते धृष्टद्युम्नने कैसे मार डाला? ।।
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— সঞ্জয়, সমরে পুরুষেন্দ্রদের চোখের সামনেই পার্ষত (ধৃষ্টদ্যুম্ন) দ্রোণাচার্যকে বধ করল। যার যশ ও বলকে অবজ্ঞা করা অসম্ভব, সেই দুর্ধর্ষ দ্রোণকে ধৃষ্টদ্যুম্ন কীভাবে রণক্ষেত্রে সকল রাজাদের সামনে হত্যা করল? আর কারা সম্মুখে যুদ্ধ করে নিকট থেকে দ্রোণকে রক্ষা করছিল?
Verse 39
केडरक्षन् दक्षिणं चक्रं सव्यं के च महात्मन:
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—হে মহাত্মন! সেই ব্যূহের দক্ষিণ চক্র কে রক্ষা করছিল, আর বাম চক্র কে? যুদ্ধপরায়ণ দ্রোণাচার্যের সম্মুখে রণক্ষেত্রে কোন কোন বীর দাঁড়িয়েছিল? আর কারা দেহ-মোহ ত্যাগ করে প্রতিপক্ষের মুখোমুখি হয়ে সেই রণভূমিতে মৃত্যুকে বরণ করেছিল?
Verse 40
पुरस्तात् के च वीरस्य युध्यमानस्य संयुगे | के च तस्मिंस्तनूंस्त्यकत्वा प्रतीपं मृत्युमाव्रजन्
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—যুদ্ধের ঘোর সংঘাতে লড়তে থাকা সেই বীরের সম্মুখে কারা দাঁড়িয়েছিল? হে মহাত্মন! তার ডান চক্র কে রক্ষা করছিল, আর বাম চক্র কে? এবং কারা দেহ-মোহ ত্যাগ করে প্রতিপক্ষের মুখোমুখি হয়ে সেই রণভূমিতে মৃত্যুকে বরণ করেছিল?
Verse 41
द्रोणस्य समरे वीरा: के5कुर्वन्त परां धृतिम् कच्चिन्नैनं भयान्मन्दा: क्षत्रिया व्यजहन् रणे
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—দ্রোণের যুদ্ধে কোন কোন বীর সর্বোচ্চ স্থৈর্য প্রদর্শন করছে? ভয়ে দুর্বল হয়ে ক্ষত্রিয়রা কি রণক্ষেত্রে তাঁকে পরিত্যাগ করেনি তো?
Verse 42
रक्षितारस्तत: शून्ये कच्चित् तैर्न हतः परै: । किन वीरोंने युद्धमें द्रोणाचार्यको उत्तम धैर्य प्रदान किया? उनकी रक्षा करनेवाले मूर्ख क्षत्रियोंने भयभीत होकर युद्धस्थलमें उन्हें अकेला तो नहीं छोड़ दिया? और इस प्रकार शत्रुओंने सूनेमें तो उन्हें नहीं मार डाला? ।।
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—যখন তাঁর রক্ষীরা সরে গিয়ে তিনি একা পড়লেন, তখন কি শত্রুরা তাঁকে নির্জনে আঘাত করে হত্যা করেনি? কারণ বীর পুরুষ শত্রুভয়ে রণক্ষেত্রে পিঠ দেখায় না; সে তো বীরত্বই প্রকাশ করে।
Verse 43
परामप्यापदं प्राप्प स कथं निहत: परै: । जो बड़ी-से-बड़ी आपत्ति पड़नेपर भी रणमें अपने शौर्यके कारण शत्रुको भयवश पीठ नहीं दिखा सकते थे, वे विपक्षियोंद्वारा किस प्रकार मारे गये? || ४२ ई ।।
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—অতিভয়ংকর বিপদে পড়েও তিনি শত্রুদের হাতে কীভাবে নিহত হলেন? যিনি বীরত্বের বলে ভয়ে রণক্ষেত্রে পিঠ দেখাতে পারতেন না, তাঁকে প্রতিপক্ষ কীভাবে হত্যা করল? সঞ্জয়, কঠিন ও নিরুপায় সংকটে আর্যপুরুষের কী করা উচিত—আমাকে বলো।
Verse 44
पराक्रमेद् यथाशक्त्या तच्च तस्मिन् प्रतिष्ठितम् । संजय! बड़े भारी संकटमें पड़नेपर श्रेष्ठ पुरुषको यही करना चाहिये कि वह यथाशक्ति पराक्रम दिखावे; यह बात द्रोणाचार्यमें पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित थी ।।
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— সঞ্জয়! মহা সংকটে পড়লে শ্রেষ্ঠ পুরুষের কর্তব্য, সাধ্য অনুযায়ী বীর্য প্রদর্শন করা; এই নীতি দ্রোণাচার্যের মধ্যে দৃঢ়ভাবে প্রতিষ্ঠিত ছিল। কিন্তু প্রিয় বৎস, এখন আমার মন মোহাচ্ছন্ন—এই বৃত্তান্তটি আপাতত থামাও। সংজ্ঞা ফিরে পেলে, সঞ্জয়, আমি আবার তোমাকে এই ঘটনার কথা জিজ্ঞাসা করব।
Verse 103
यच्छुत्वा निहतं द्रोणं शतधा न विदीर्यते । मैं तो दैवको ही श्रेष्ठ मानता हूँ। पुरुषार्थ तो अनर्थका ही कारण है। निश्चय ही मेरा यह अत्यन्त सुदृढ़ हृदय लोहेका बना हुआ है
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— দ্রোণাচার্য নিহত হয়েছেন—এ কথা শুনেও আমার হৃদয় শতখণ্ডে বিদীর্ণ হয় না। আমি ভাগ্যকেই পরম বলে মানি; মানব-প্রচেষ্টা যেন অনর্থেরই কারণ। নিশ্চয়ই আমার হৃদয় অত্যন্ত কঠিন—লোহার মতো—যে দ্রোণ-বধের সংবাদ শুনেও শতধা ভাঙে না।
Verse 116
ब्राह्मणा राजपुत्राश्न स कथं मृत्युना हृत: । गुणार्थी ब्राह्मण तथा राजकुमार ब्राह्म और दैव अस्त्रोंके लिये जिनकी उपासना करते थे, उन्हें मृत्यु कैसे हर ले गयी?
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— যাঁকে ব্রাহ্মণ ও রাজপুত্রেরা সমানভাবে কামনা করত, গুণসাধক সেই ব্রাহ্মণ দ্রোণকে মৃত্যু কীভাবে হরণ করল? যাঁর তপস্যা ও আরাধনা করে লোকেরা দিব্যাস্ত্র লাভ করতে চাইত, এমন পূজ্য পুরুষকে মৃত্যু কীভাবে পরাভূত করল—সঞ্জয়, বলো।
Verse 123
पतनं भास्करस्यथेव न मृष्ये द्रोणपातनम् । द्रोणका रणभूमिमें गिराया जाना समुद्रके सूखने, मेरु पर्वतके चलने-फिरने और सूर्यके आकाशसे टूटकर गिरनेके समान है। मैं इसे किसी प्रकार सहन नहीं कर पाता
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— আমি দ্রোণাচার্যের পতন সহ্য করতে পারি না—যেন সূর্যই পতিত হয়েছে। রণক্ষেত্রে দ্রোণকে ভূমিতে ফেলে দেওয়া আমার কাছে সমুদ্র শুকিয়ে যাওয়া, মেরু পর্বত স্থানচ্যুত হওয়া, কিংবা আকাশ থেকে সূর্য ভেঙে পড়ার মতো। সঞ্জয়, আমি কোনোভাবেই এটি সহ্য করতে পারি না।
Verse 193
कथं नाभ्यतरंस्तात पाण्डवानामनीकिनीम् । क्या द्रोणाचार्यके रथको वहन करनेवाले वे शीघ्रगामी अश्व पराजित हो गये थे? तात! द्रोणाचार्यके सुवर्णमय रथमें जुते हुए और उन्हीं नरवीर आचार्यकी सवारीमें काम आनेवाले वे घोड़े पाण्डव-सेनाको पार कैसे नहीं कर सके?
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— বৎস! তারা পাণ্ডবদের সৈন্যবিন্যাস ভেদ করে পার হতে পারল না কেন? দ্রোণাচার্যের রথ বহনকারী সেই দ্রুতগামী অশ্বগুলি কি পরাভূত হয়েছিল? সঞ্জয়! দ্রোণাচার্যের স্বর্ণময় রথে যুক্ত, সেই বীর আচার্যের বাহনরূপে নিয়োজিত ঘোড়াগুলি পাণ্ডব-সেনাকে কেন অতিক্রম করতে পারল না?
Verse 206
भारद्वाज: किमकरोद् युधि सत्यपराक्रम: । उस सुवर्णभूषित उत्तम रथपर आरूढ़ हो सत्यपराक्रमी द्रोणाचार्यने युद्धस्थलमें क्या किया?
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— ভরদ্বাজপুত্র সত্যপরাক্রমী দ্রোণাচার্য যুদ্ধক্ষেত্রে কী করলেন? স্বর্ণভূষিত শ্রেষ্ঠ রথে আরূঢ় হয়ে, সত্যনিষ্ঠ মহাবলী আচার্য রণভূমিতে কোন কর্ম সাধন করলেন?
Verse 213
स सत्यसंधो बलवान् द्रोण: किमकरोदू युधि । समस्त जगतके धनुर्धर जिनकी विद्याका आश्रय लेकर जीवननिर्वाह करते हैं, उन सत्यपराक्रमी बलवान द्रोणाचार्यने युद्धमें क्या किया?
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— সত্যসন্ধ ও বলবান দ্রোণাচার্য যুদ্ধের মধ্যে কী করলেন? যাঁর ধনুর্বিদ্যার আশ্রয়ে সমগ্র জগতের ধনুর্ধররা জীবিকা নির্বাহ করে, সেই সত্যপরাক্রমী মহাচার্য রণে কী সাধন করলেন?
Verse 226
के नुतं रौद्रकर्माणं युद्धे प्रत्युद्ययू रथा: । स्वर्गमें देवराज इन्द्रके समान जो इस लोकमें श्रेष्ठ और समस्त धनुर्धरोंमें महान् थे
ধৃতরাষ্ট্র জিজ্ঞাসা করলেন— রৌদ্রকর্মা দ্রোণাচার্যের মোকাবিলায় যুদ্ধে কোন কোন রথী অগ্রসর হয়েছিল? যিনি এই লোকের সকল ধনুর্ধরের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ও মহান, আর স্বর্গে দেবরাজ ইন্দ্রের সমতুল্য বলে গণ্য— সেই রণভূমিতে তাঁর সম্মুখে কোন কোন বীর গিয়েছিল?
Verse 246
पाज्चाल्यप्रग्रहो द्रोणं सर्वतः समवारयत् । भाइयोंसहित धर्मराज युधिष्ठिरने अपनी सारी सेनाके साथ जाकर धृष्टद्युम्नरूपी डोरीकी सहायतासे द्रोणाचार्यको घेर तो नहीं लिया था?
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— পাঞ্চাল বাহিনী কি দ্রোণাচার্যকে চারদিক থেকে ঘিরে ফেলেনি? ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির কি ভ্রাতৃগণসহ সমগ্র সেনা নিয়ে অগ্রসর হয়ে, ধৃষ্টদ্যুম্নকে যেন দড়ি করে দ্রোণাচার্যকে বেঁধে রাখার মতো করে আবদ্ধ করেননি?
Verse 266
धृष्टय्युम्नादृते रौद्रात् पाल्यमानात् किरीटिना । किरीटथधारी अर्जुनके द्वारा सुरक्षित भयंकर स्वभाववाले धृष्टद्युम्नको छोड़कर दूसरे किसीको मैं ऐसा नहीं देखता
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— কিরীটধারী অর্জুনের দ্বারা রক্ষিত সেই রৌদ্রস্বভাব ধৃষ্টদ্যুম্নকে বাদ দিলে, আমি আর কাউকে দেখি না যে অতিশয় তেজস্বী দ্রোণাচার্যকে বধ করতে সক্ষম। সেই ভয়ংকর ধৃষ্টদ্যুম্ন ছাড়া দ্রোণবধের যোগ্য আর কেউ নেই।
Verse 313
अनर्हमाणान् कौन्तेयान् कर्मणस्तस्य तत् फलम् | मैंने अमर्षमें भरकर सदा कष्ट भोगनेके अयोग्य कुन्तीकुमारोंको क्लेश ही दिया है; परंतु मेरे इस बर्तावको द्रोणाचार्यने चुपचाप सह लिया था। उनके उसी कर्मका यह वधरूपी फल प्राप्त हुआ है
অযোগ্য দুঃখভোগের যোগ্য নন—এমন কুন্তীপুত্রদের ওপর আমি দীর্ঘকাল অন্তরে জ্বলে-ওঠা অমর্ষের বশে কেবল ক্লেশই চাপিয়েছি। দ্রোণাচার্য সেই আচরণ নীরবে সহ্য করেছিলেন; আজ যুদ্ধের মাঝখানে তাঁর মৃত্যু আমাকে সেই অন্যায় কর্মেরই ভয়ংকর ফল বলে মনে হচ্ছে—যেন তা ফিরে এসে আমারই সামনে দাঁড়িয়েছে।
Verse 336
स कथं निहतः: पार्थ: क्षुद्रमत्स्यैर्यथा तिमि: । स्वर्गलोकमें इन्द्रके समान जो इस लोकमें सबसे श्रेष्ठ थे
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—পার্থ কীভাবে নিহত হলেন, যেন ক্ষুদ্র ক্ষুদ্র মাছ একত্র হয়ে তিমি নামক মহামৎস্যকে বধ করে? যিনি স্বর্গে ইন্দ্রসম, এই জগতে মানবদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ—সেই মহাবলী, মহাত্মা দ্রোণাচার্যকে কুন্তীপুত্ররা কীভাবে সেইরূপে হত্যা করল? এ কীভাবে সম্ভব?
Verse 353
ब्राह्मश्व वेदकामानां ज्याघोषश्न धनुष्मताम् । जो शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—বেদাধ্যয়নে অনুরাগীদের জন্য ছিল ব্রাহ্মস্বর, বেদপাঠের ধ্বনি; আর ধনুর্ধরদের জন্য ছিল জ্যাঘোষ, প্রত্যঞ্চার টংকার। যিনি দ্রুতহস্ত, বলবান, দৃঢ়ধন্বা, শত্রুমর্দন; যার বাণের লক্ষ্য হলে বিজয়কামী বীরও বাঁচত না—তিনি জীবিত থাকাকালে এই দুই শব্দ কখনও থামেনি: এক, বেদের ধ্বনি; আর দুই, ধনুকের টংকার।
Verse 366
नाहं मृष्ये हतं द्रोणं सिंहद्विरदविक्रमम् । सिंह और हाथीके समान पराक्रमी, उदार, लज्जाशील और किसीसे पराजित न होनेवाले पुरुषसिंह द्रोणका वध मैं नहीं सहन कर सकता
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—আমি দ্রোণের নিহত হওয়া সহ্য করতে পারি না। সিংহ ও গজের ন্যায় পরাক্রমী, উদার, লজ্জাশীল এবং অপরাজেয় সেই পুরুষসিংহ দ্রোণের পতন আমার কাছে অসহনীয়।
Verse 383
के नु पश्चादवर्तन्त गच्छन्तो दुर्गमां गतिम् कौन-कौनसे वीर उस समय निकटसे द्रोणाचार्यकी रक्षा करते हुए उनके आगे रहकर युद्ध करते थे और कौन-कौन योद्धा दुर्गम मार्गपर पैर बढ़ाते हुए उनके पीछे रहकर रक्षा करते थे?
ধৃতরাষ্ট্র জিজ্ঞাসা করলেন—যখন তারা সেই দুর্গম পথে অগ্রসর হচ্ছিল, তখন কারা কারা বীর দ্রোণাচার্যের রক্ষার্থে সামনে থেকে যুদ্ধ করছিল, আর কারা কারা পিছনে থেকে অবস্থান করে তাঁর পশ্চাদরক্ষা করছিল?
Verse 2536
ततो द्रोणं समारोहत् पार्षत: पापकर्मकृत् । निश्चय ही अर्जुनने अपने सीधे जानेवाले बाणोंके द्वारा अन्य रथियोंको आगे बढ़नेसे रोक दिया था। इसीलिये पापकर्मा धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्यपर चढ़ाई कर सका
তখন পৃষতপুত্র ধৃষ্টদ্যুম্ন—যার কর্ম পাপময় বলে নিন্দিত—দ্রোণাচার্যের প্রতি অগ্রসর হল। কারণ অর্জুন তার সোজা-উড়ন্ত শর দ্বারা অন্য রথীদের অগ্রসর হওয়া দৃঢ়ভাবে রোধ করেছিল; সেই সুযোগে ধৃষ্টদ্যুম্ন দ্রোণাচার্যের উপর আক্রমণ করতে পারল।
The dilemma is interpretive and ethical: Dhṛtarāṣṭra’s paternal attachment drives him to seek assurances of Kaurava resistance, while the narrative exposes how emotional dependence can distort a ruler’s capacity to face consequences of prior choices.
The chapter illustrates that mental steadiness (dhṛti) is tested by adverse reports; disciplined inquiry must be paired with detachment, and reliance on higher principles (dharma/refuge in Nārāyaṇa) is presented as a stabilizing orientation.
A direct phalaśruti formula is not stated; however, a meta-narrative signal appears when the speaker indicates an intent to recount Nārāyaṇa’s divine deeds “with devotion” for personal steadiness, framing remembrance as spiritually and psychologically beneficial.