Adhyaya 171
Drona ParvaAdhyaya 17172 Versesरात्रि-युद्ध में स्थिति धुँधली; नकुल के कारण कौरव-पक्ष पर दबाव, पर कृपाचार्य के उग्र प्रतिरोध से संतुलन बना रहता है।

Adhyaya 171

नारायणास्त्र-शमनं द्रौणि-प्रहारश्च (Pacification of the Nārāyaṇāstra and Drauni’s Renewed Assault)

Upa-parva: Nārāyaṇāstra-pratīhāra (Pacification of the Nārāyaṇāstra) Episode

Sañjaya reports that Arjuna, seeing Bhīma engulfed by Aśvatthāman’s weapon-force, veils the field with the Vāruṇāstra to blunt the radiance and render Bhīma difficult to perceive. The Nārāyaṇāstra’s pressure induces panic and disarray; Arjuna and Kṛṣṇa urgently move to Bhīma and enforce the prescribed protocol—disarmament and withdrawal from active resistance—so the weapon’s destructive agency does not intensify. Kṛṣṇa admonishes Bhīma’s refusal to desist and compels him down from the chariot; once weapons are abandoned, the astra pacifies and the directions clear, restoring composure to forces and animals. Duryodhana urges Aśvatthāman to redeploy the astra, but Aśvatthāman explains its non-repeatability and the danger of rebound upon the user, noting that Kṛṣṇa has already applied the proper countermeasure. Combat then resumes in conventional mode: Aśvatthāman, enraged by his father’s death, charges Dhṛṣṭadyumna, exchanges volleys, disables his chariot elements, and routs Pāñcāla units. Sātyaki attacks, is gravely wounded and withdrawn; Aśvatthāman continues striking multiple opponents, felling key warriors and pressing the Pāṇḍava-aligned host into flight.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं—रणभूमि में नकुल अपनी तीव्रता से शत्रु-वाहिनी को रौंदते हुए आगे बढ़ते हैं, और उनके सामने सौबलराज शकुनि आ खड़ा होता है। → पुराने वैर से बँधे दोनों वीर एक-दूसरे के वध की आकांक्षा से, समान कौशल का प्रदर्शन करते हुए, बाण-वर्षा से बाण-वर्षा का उत्तर देते हैं—जैसे नकुल छोड़ते हैं, वैसे ही शकुनि भी ‘शिक्षा संदर्शयन्’ युद्ध-विद्या दिखाता है। उधर शिखण्डी और कृपाचार्य का घोर संग्राम भी साथ-साथ भड़कता है; रथ, घोड़े, पैदल—सब दिशाओं में धूल और अंधकार फैलाते हैं। → नकुल के प्रहारों से शकुनि की स्थिति डगमगाती है; ‘विसंज्ञ निपतित’ श्याल को गिरा देख कौरव-पक्ष में क्षणिक स्तब्धता छा जाती है। उसी उन्मादित क्षण में कृपाचार्य क्रोध से दारुण शक्ति फेंकते हैं—और शिखण्डी के साथ उनका युद्ध प्रलय-सा उग्र हो उठता है। → युद्ध का विस्तार इतना बढ़ता है कि रात्रि भी प्रदीपों से दिन-सी हो जाती है; धूल और तम से ढँकी दिशाएँ फिर प्रकाश से चमक उठती हैं। पर उस प्रकाश में भी कोलाहल ऐसा कि योद्धा ‘मैं कौन हूँ’ तक नहीं जान पाते—स्व-चेतना रण-उन्माद में गल जाती है। → प्रदीप्त रात्रि में युद्ध थमता नहीं; पृथ्वी पैदल सैनिकों की धमक से भयभीत-सी काँपती रहती है—अगले क्षण किसका पतन होगा, यह अनिश्चित रह जाता है।

Shlokas

Verse 1

अतड-४--क+ एकोनसप्तत्याधिकशततमो< ध्याय: नकुलके द्वारा शकुनिकी पराजय तथा शिखण्डी और कृपाचार्यका घोर युद्ध संजय उवाच नकुलं॑ रभसं युद्धे निघ्नन्तं वाहिनीं तव । अभ्ययात्‌ सौबल: क्रुद्धस्तिष्ठ तिछेति चाब्रवीत्‌,संजय कहते हैं--राजन्‌! वेगशाली नकुल युद्धमें आपकी सेनाका संहार कर रहे थे। उनका सामना करनेके लिये क्रोधमें भरा हुआ सुबलपुत्र शकुनि आया और बोला “अरे! खड़ा रह, खड़ा रह' इस प्रकार श्रीमह्याभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके समय संकुलयुद्धविषयक एक सौ उनहठत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १६९ ॥/ नस ह्य ४-3 सप्तत्याधेकशततमो< ध्याय: धृष्टद्युम्न और द्रोणाचार्यका युद्ध, धृष्टदय्युम्नद्वारा द्रमसेनका वध, सात्यकि और कर्णका युद्ध, कर्णकी दुर्योधनको सलाह तथा शकुनिका पाण्डव-सेनापर आक्रमण संजय उवाच तस्मिन्‌ सुतुमुले युद्धे वर्तमाने भयावहे । धृष्टद्युम्नो महाराज द्रोणमेवाभ्यवर्तत

সঞ্জয় বললেন—রাজন! বেগবান নকুল যুদ্ধে তোমার সেনাদলকে নিধন করছিলেন। তখন ক্রোধে দগ্ধ সুবলপুত্র শকুনি এগিয়ে এসে মোকাবিলা করল এবং বলল—“থাম! থাম!”

Verse 2

कृतवैरौ तु तौ वीरावन्योन्यवधकाड्क्षिणौ । शरै: पूर्णायतोत्सूष्टैरन्योन्यमभिजष्नतु:,उन दोनों वीरोंने पहलेसे ही आपसमें वैर बाँध रखा था, वे एक-दूसरेका वध करना चाहते थे; इसलिये पूर्णतः: कानतक खींचकर छोड़े हुए बाणोंसे वे एक-दूसरेको घायल करने लगे

সেই দুই বীর পূর্ব থেকেই পরস্পরের সঙ্গে বৈর বেঁধেছিল এবং একে অপরকে বধ করতে চাইত; তাই পূর্ণ টানে ছোড়া তীর দিয়ে তারা পরস্পরকে আঘাত করতে লাগল।

Verse 3

यथैव नकुलो राजन्‌ शरवर्षाण्यमुज्चत । तथैव सौबलश्चापि शिक्षां संदर्शयन्‌ युधि,राजन्‌! नकुल जैसे-जैसे बाणोंकी वर्षा करते, शकुनि भी वैसे-ही-वैसे युद्धविषयक शिक्षाका प्रदर्शन करता हुआ बाण छोड़ता था

রাজন! নকুল যেমন অবিরাম শরবৃষ্টি করছিল, সৌবল (শকুনি)ও তেমনি যুদ্ধে নিজের শিক্ষা ও কৌশল প্রদর্শন করে তীর নিক্ষেপ করছিল।

Verse 4

तावुभौ समरे शूरौ शरकण्टकिनौ तदा । व्यराजेतां महाराज श्वाविधौ शललैरिव,महाराज! वे दोनों शूरवीर समरांगणमें बाणरूपी कंटकोंसे युक्त होकर काँटेदार शरीरवाले साहीके समान सुशोभित हो रहे थे

মহারাজ! সেই দুই বীর যুদ্ধে তীররূপ কণ্টকে আচ্ছন্ন হয়ে এমন দীপ্তিমান দেখাচ্ছিলেন, যেন শলাকা-ঢাকা দুই সজারু।

Verse 5

रुक्मपुड्खैरजिद्ाग्रै: शरैश्छिन्नतनुच्छदौ । रुधिरौघपरिक्लिन्नौ व्यभ्राजेतां महामृथे,सोनेके पंख और सीधे अग्रभागवाले बाणोंसे उन दोनोंके कवच छिन्न-भिन्न हो गये थे। दोनों ही उस महासमरमें खूनसे लथपथ हो सुवर्णके समान विचित्र कान्तिसे सुशोभित हो रहे थे। वे दो कल्पवृक्षों और खिले हुए दो ढाकके पेड़ोंके समान समरांगणमें प्रकाशित हो रहे थे

সোনালি পালকযুক্ত ও অটল, সোজা অগ্রভাগের তীরে তাদের উভয়ের বর্ম ও আবরণ ছিন্নভিন্ন হয়ে গিয়েছিল। রক্তধারায় সিক্ত হয়েও মহাযুদ্ধে তারা অদ্ভুত স্বর্ণাভ দীপ্তিতে ঝলমল করছিল।

Verse 6

तपनीयनिभौ चित्रौ कल्पवृक्षाविव द्रुमौ । किंशुकाविव चोत्फुल्लो प्रकाशेते रणाजिरे,सोनेके पंख और सीधे अग्रभागवाले बाणोंसे उन दोनोंके कवच छिन्न-भिन्न हो गये थे। दोनों ही उस महासमरमें खूनसे लथपथ हो सुवर्णके समान विचित्र कान्तिसे सुशोभित हो रहे थे। वे दो कल्पवृक्षों और खिले हुए दो ढाकके पेड़ोंके समान समरांगणमें प्रकाशित हो रहे थे

তপ্ত স্বর্ণের ন্যায় দীপ্ত ও অপূর্ব শোভাযুক্ত সেই দুজন রণাঙ্গণে দুই কল্পবৃক্ষের মতো ঝলমল করছিলেন; আর পূর্ণ প্রস্ফুটিত দুই কিঞ্চুক (পলাশ) বৃক্ষের মতো উজ্জ্বল হয়ে উঠেছিলেন।

Verse 7

तावुभौ समरे शूरौ शरकण्टकिनौ तदा । व्यराजेतां महाराज कण्टकैरिव शाल्मली,महाराज! जैसे काँटोंसे सेमरका वृक्ष सुशोभित होता है, उसी प्रकार वे दोनों शूरवीर समरभूमिमें बाणरूपी कंटकोंसे युक्त दिखायी देते थे

মহারাজ! সেই দুই বীর সমরভূমিতে তীররূপ কণ্টকে আচ্ছন্ন হয়ে তেমনই শোভিত হচ্ছিলেন, যেমন শাল্মলী (শিমুল) বৃক্ষ তার কাঁটায় শোভা পায়।

Verse 8

सुजिह्दां प्रेक्षमाणी च राजन्‌ विवृतलोचनौ । क्रोधसंरक्तनयनौ निर्दहन्तौ परस्परम्‌,राजन! वे अत्यन्त कुटिलभावसे परस्पर आँखें फाड़-फाड़कर देख रहे थे और क्रोधसे लाल नेत्र करके एक-दूसरेको ऐसे देखते थे, मानो भस्म कर देंगे

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, তারা দু’জন চোখ বিস্ফারিত করে, ক্রোধে রক্তবর্ণ নয়নে পরস্পরের দিকে এমন দৃষ্টিতে তাকিয়ে ছিল যেন একে অপরকে দগ্ধ করে দেবে।

Verse 9

श्यालस्तु तव संक्रुद्धो माद्रीपुत्रं हसन्निव । कर्णिनिकेन विव्याध हृदये निशितेन ह,तदनन्तर अत्यन्त क्रोधमें भरकर हँसते हुए-से आपके सालेने एक तीखे कर्णी नामक बाणसे माद्रीपुत्र नकुलकी छातीमें गहरा आघात किया

সঞ্জয় বললেন—প্রচণ্ড ক্রোধে উন্মত্ত হয়ে, যেন হাসছে এমন ভঙ্গিতে, আপনার শ্যালক কর্ণিনী প্রকারের তীক্ষ্ণ বাণ দিয়ে মাদ্রীপুত্র নকুলের হৃদয়দেশে বিদ্ধ করল।

Verse 10

नकुलस्तु भृशं विद्ध: श्यालेन तव धन्विना । निषसाद रथोपस्थे कश्मलं चाविशन्महत्‌,आपके धनुर्धर सालेके द्वारा अत्यन्त घायल किये हुए नकुल रथके पिछले भागमें बैठ गये और भारी मूर्च्छामें पड़ गये

সঞ্জয় বললেন—আপনার ধনুর্ধর শ্যালকের দ্বারা ভীষণভাবে বিদ্ধ নকুল রথের পশ্চাৎভাগে বসে পড়ল, আর প্রবল মূর্ছা তাকে আচ্ছন্ন করল।

Verse 11

अत्यन्तवैरिणं दृप्तं दृष्टवा शत्रुं तथागतम्‌ । ननाद शकुनी राजंस्तपान्ते जलदो यथा,राजन! अपने अत्यन्त वैरी और अभिमानी शत्रुको वैसी अवस्थामें पड़ा देख शकुनि वर्षाकालके मेघके समान जोर-जोरसे गर्जना करने लगा

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, নিজের অতি বৈরী ও উদ্ধত শত্রুকে সেই অবস্থায় পড়ে থাকতে দেখে শকুনি গ্রীষ্মশেষের বর্ষামেঘের মতো উচ্চস্বরে গর্জে উঠল।

Verse 12

प्रतिलभ्य तत: संज्ञां नकुल: पाण्डुनन्दन: । अभ्ययात्‌ सौबल भूयो व्यात्तानन इवान्तक:,इतनेमें ही पाण्डुनन्दन नकुल होशमें आकर मुँह बाये हुए यमराजके समान पुनः सुबलपुत्रका सामना करनेके लिये आगे बढ़े

সঞ্জয় বললেন—তারপর সংজ্ঞা ফিরে পেয়ে পাণ্ডুনন্দন নকুল, মুখ হা করে মৃত্যুর দেবতার মতো, আবারও সুবলপুত্রের মোকাবিলায় অগ্রসর হল।

Verse 13

संक्रुद्ध: शकुनिं षष्ट्या विव्याध भरतर्षभ | पुनश्चैनं शतेनैव नाराचानां स्तनान्तरे,भरतश्रेष्ठ! इन्होंने कुपित होकर शकुनिको साठ बाणोंसे घायल कर दिया। फिर उसकी छातीमें इन्होंने सौ नाराच मारे

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! ক্রুদ্ধ হয়ে সে ষাটটি বাণে শকুনিকে বিদ্ধ করল। তারপর আবার তার বক্ষে শত নারাচ নিক্ষেপ করল।

Verse 14

अथास्य सशरं चापं मुष्टिदेशेडच्छिनत्‌ तदा । ध्वजं च त्वरितं छित्त्वा रथाद्‌ भूमावपातयत्‌

তখনই সে শকুনির ধনুকটি বাণসহ হাতের মুঠির কাছে কেটে দিল। আর দ্রুত ধ্বজও ছিন্ন করে রথ থেকে ভূমিতে ফেলে দিল।

Verse 15

तत्पश्चात्‌ नकुलने शकुनिके बाणसहित धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे काट दिया और तुरंत ही उसकी ध्वजाको भी काटकर रथसे भूमिपर गिरा दिया ।। विशिखेन च तीक्ष्णेन पीतेन निशितेन च । ऊरू निर्भिद्य चैकेन नकुल: पाण्डुनन्दन:

তারপর পাণ্ডুনন্দন নকুল শকুনির ধনুকটি বাণসহ হাতের মুঠির কাছে কেটে দিল এবং সঙ্গে সঙ্গে তার ধ্বজও ছিন্ন করে রথ থেকে ভূমিতে ফেলে দিল। এরপর তীক্ষ্ণ, পীতবর্ণ, ধারালো একটিমাত্র বাণে নকুল শকুনির ঊরু বিদ্ধ করল।

Verse 16

सो5तिविद्धो महाराज रथोपस्थ उपाविशत्‌

হে মহারাজ! সে গভীরভাবে বিদ্ধ হয়েও রথের আসনে বসে পড়ল।

Verse 17

त॑ विसंज्ञ निपतितं दृष्टवा श्यालं तवानघ

হে অনঘ! তোমার শ্যালককে অচেতন হয়ে পতিত দেখে…

Verse 18

ततः संचुक्रुशुः पार्था ये च तेषां पदानुगा:,फिर तो कुन्तीके पुत्र और उनके सेवक बड़े जोरसे सिंहनाद करने लगे। इस प्रकार रणभूमिमें शत्रुको परास्त करके क्रोधमें भरे हुए शत्रुसंतापी नकुलने अपने सारथिसे कहा --'सूत! मुझे द्रोणाचार्यकी सेनाके पास ले चलो”

তখন পৃথাপুত্র পাণ্ডবেরা এবং তাঁদের অনুচররা উচ্চস্বরে বিজয়ধ্বনি তুলল। রণক্ষেত্রে শত্রুকে পরাস্ত করে, ক্রোধে দগ্ধ শত্রুতাপী নকুল সারথিকে বলল— “হে সূত, আমাকে দ্রোণাচার্যের সেনার দিকে নিয়ে চলো।”

Verse 19

निर्जित्य च रणे शत्रुं नकुल: शत्रुतापन: । अब्रवीत्‌ सारथिं क्रुद्धों द्रोणानीकाय मां वह,फिर तो कुन्तीके पुत्र और उनके सेवक बड़े जोरसे सिंहनाद करने लगे। इस प्रकार रणभूमिमें शत्रुको परास्त करके क्रोधमें भरे हुए शत्रुसंतापी नकुलने अपने सारथिसे कहा --'सूत! मुझे द्रोणाचार्यकी सेनाके पास ले चलो”

রণে শত্রুকে জয় করে শত্রুতাপী নকুল ক্রোধে সারথিকে বলল— “সারথি, আমাকে দ্রোণের যুদ্ধবিন্যাসের দিকে নিয়ে চলো।” তারপর কুন্তীপুত্র নকুল অনুচরদের সঙ্গে প্রবল সিংহনাদ তুলল, যেন প্রতিপক্ষকে আহ্বান জানায়।

Verse 20

तस्य तद्‌ू वचन श्रुत्वा माद्रीपुत्रस्थ सारथि: । प्रायात्‌ तेन तदा राजन्‌ यत्र द्रोणो व्यवस्थित:,राजन! माद्रीकुमारका वह वचन सुनकर सारथि उस रथके द्वारा जहाँ द्रोणाचार्य खड़े थे, वहाँ तत्काल जा पहुँचा

রাজন! মাদ্রীপুত্রের সেই কথা শুনে তার সারথি তৎক্ষণাৎ সেই রথ চালিয়ে সেখানে পৌঁছাল, যেখানে দ্রোণ যুদ্ধবিন্যাসে অবস্থান করছিলেন।

Verse 21

शिखण्डिनं तु समरे द्रोणप्रेप्सुं विशाम्पते । कृप: शारद्वतो यत्त: प्रत्यगच्छत्‌ सवेगित:,प्रजानाथ! द्रोणाचार्यके साथ युद्धकी इच्छावाले शिखण्डीका समरभूमिमें सामना करनेके लिये प्रयत्नशील हो शरद्वानके पुत्र कृपाचार्य बड़े वेगसे आगे बढ़े

প্রজানাথ! সমরে দ্রোণকে আক্রমণ করতে উদ্‌গ্রীব শিখণ্ডীর মোকাবিলায় শারদ্বতপুত্র কৃপাচার্য উদ্যোগী হয়ে প্রবল বেগে এগিয়ে গেলেন।

Verse 22

गौतमं द्रुतमायान्तं द्रोणानीकमरिंदमम्‌ । विव्याध नवभिर्भल्लै: शिखण्डी प्रहसन्निव,शत्रुओंको दमन करनेवाले, द्रोणरक्षक, गौतमगोत्रीय कृपाचार्यको शीघ्रतापूर्वक आते देख हँसते हुए-से शिखण्डीने उन्हें नौ भल्लोंसे बींध डाला

শত্রুদমনকারী, দ্রোণের ব্যূহরক্ষক গৌতমবংশীয় কৃপাচার্যকে দ্রুত এগিয়ে আসতে দেখে শিখণ্ডী যেন হাসতে হাসতে তাঁকে নয়টি ধারালো বাণে বিদ্ধ করল।

Verse 23

तमाचार्यों महाराज विद्ध्वा पठ्चभिराशुगै: । पुनर्विव्याध विंशत्या पुत्राणां प्रियकृत्‌ तव,महाराज! तब आपके पुत्रोंका प्रिय करनेवाले कृपाचार्यने शिखण्डीको पाँच बाणोंसे बींधकर फिर बीस बाणोंसे घायल कर दिया

মহারাজ! আপনার পুত্রদের প্রিয়সাধক কৃপাচার্য তাকে পাঁচটি দ্রুত বাণে বিদ্ধ করে, পরে আবার বিশটি বাণে পুনরায় আঘাত করলেন।

Verse 24

महद्‌ युद्ध तयोरासीद्‌ घोररूपं भयानकम्‌ । यथा देवासुरे युद्धे शम्बरामरराजयो:,पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर शम्बरासुर और इन्द्रमें जैसा युद्ध हुआ था, वैसा ही घोर भयानक एवं महान्‌ युद्ध उन दोनोंमें भी हुआ

তাদের দুজনের মধ্যে ভয়ংকর রূপের, আতঙ্কজনক ও মহান যুদ্ধ উঠল—যেমন প্রাচীন কালে দেবাসুর-সংগ্রামে শম্বর অসুর ও অমররাজ ইন্দ্রের মধ্যে হয়েছিল।

Verse 25

शरजालावृतं व्योम चक्रतुस्ती महारथौ । मेघाविव तपापाये वीरौ समरदुर्मदौ

যুদ্ধোন্মত্ত সেই দুই মহারথী বীর বাণজালের দ্বারা আকাশ ঢেকে দিলেন; দৃশ্যটি যেন গ্রীষ্মের শেষে জমে ওঠা মেঘের মতো।

Verse 26

उन दोनों रणदुर्मद वीर महारथियोंने वर्षाकालके दो मेघोंके समान आकाशको बाणसमूहोंसे व्याप्त कर दिया ।। प्रकृत्या घोररूपं तदासीद्‌ घोरतरं पुन: । रात्रिश्व भरतश्रेष्ठ योधानां युद्शशालिनाम्‌

সে দৃশ্য স্বভাবতই ভয়ংকর ছিল, পরে আরও ভয়াবহ হয়ে উঠল; কারণ, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, যুদ্ধনিপুণ যোদ্ধাদের ওপর রাত্রি নেমে এল।

Verse 27

शिखण्डी तु महाराज गौतमस्य महद्‌ धनु:

মহারাজ! শিখণ্ডীর হাতে ছিল গৌতমের সেই মহাধনুক।

Verse 28

तस्य क्रुद्ध: कृपो राजन्‌ शक्ति चिक्षेप दारुणाम्‌

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! তার প্রতি ক্রুদ্ধ হয়ে কৃপ ভয়ংকর শক্তি-অস্ত্র নিক্ষেপ করলেন।

Verse 29

तामापतन्तीं चिच्छेद शिखण्डी बहुभि: शरै:

সঞ্জয় বললেন—সে যখন ধেয়ে এসে তার উপর পড়তে উদ্যত, তখন শিখণ্ডী বহু শর দিয়ে তাকে ছিন্নভিন্ন করে ফেলল।

Verse 30

अथान्यद्‌ धनुरादाय गौतमो रथिनां वर:

সঞ্জয় বললেন—তখন রথীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ গৌতম (কৃপ) আরেকটি ধনুক তুলে নিলেন।

Verse 31

प्राच्छादयच्छितैर्बाणैमहाराज शिखण्डिनम्‌ । महाराज! तब रथियोंमें श्रेष्ठ कृपाचार्यने दूसरा धनुष हाथमें लेकर पैने बाणोंद्वारा शिखण्डीको ढक दिया ।। स च्छाद्यमान: समरे गौतमेन यशस्विना

সঞ্জয় বললেন—হে মহারাজ! রথীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ কৃপাচার্য অন্য ধনুক ধারণ করে তীক্ষ্ণ বাণে শিখণ্ডীকে আচ্ছন্ন করলেন; আর যুদ্ধে যশস্বী গৌতম (কৃপ) দ্বারা আচ্ছাদিত হতে হতে শিখণ্ডী বিপন্ন হয়ে পড়ল।

Verse 32

सीदन्तं चैनमालोक्य कृप: शारद्वतो युधि

সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধে তাকে শিথিল হতে দেখে কৃপ শারদ্বত তার অবস্থা লক্ষ করলেন।

Verse 33

विमुखं तु रणे दृष्टवा याज्ञसेनिं महारथम्‌

সঞ্জয় বললেন—রণক্ষেত্রে যাজ্ঞসেনীর সেই মহারথীকে বিমুখ হতে দেখে প্রত্যক্ষদর্শীরা বুঝল, সংকল্প টলে গেলে মহাবীর্যও বিচলিত হয়; ধর্ম-নীতি ও কৌশলগত চাপের এই যুদ্ধে তা ছিল অমঙ্গলসূচক লক্ষণ।

Verse 34

पज्चाला: सोमकाश्वैव परिवद्रु: समनन्‍्तत: । राजा द्रुपदके उस महारथी पुत्रको युद्धविमुख हुआ देख पांचालों और सोमकोंने उसे चारों ओरसे घेरकर अपने बीचमें कर लिया ।। ३३ $ || तथैव तव पुत्राश्न परिवद्र॒ुर्द्धिजोत्तमम्‌

সঞ্জয় বললেন—পাঞ্চাল ও সোমকরা চারদিক থেকে তাকে ঘিরে ধরল। রাজা দ্রুপদের সেই মহারথী পুত্রকে যুদ্ধবিমুখ দেখে তারা সর্বদিক থেকে বেষ্টন করে তাকে নিজেদের মাঝখানে টেনে নিল—যাতে পিছু হটা থামে এবং পক্ষধর্মের শৃঙ্খলায় সে আবার স্থিত হয়।

Verse 35

रथानां च रणे राजन्नन्योन्यमभिधावताम्‌

হে রাজন, রণে রথগুলি একে অপরের দিকে সোজা ধেয়ে যাচ্ছিল।

Verse 36

द्रवतां सादिनां चैव गजानां च विशाम्पते

হে প্রজাপতি, পালিয়ে চলা অশ্বারোহী এবং হাতিরাও ছিল।

Verse 37

पत्तीनां द्रवतां चैव पादशब्देन मेदिनी

পলায়মান পদাতিকদের পায়ের শব্দে পৃথিবী গর্জে উঠল।

Verse 38

रथिनो रथमारुहा प्रद्रुता वेगवत्तरम्‌

সঞ্জয় বললেন—রথীরা রথে আরূঢ় হয়ে আরও অধিক বেগে অগ্রসর হল।

Verse 39

तथा गजानू प्रभिन्नांश्व॒ सम्प्रभिन्ना महागजा:

সঞ্জয় বললেন—তেমনি মহাগজরাও মদোন্মত্ত ছিল; কারও কারও কপোলদেশ থেকে মদ ঝরছিল, আর তারা যুদ্ধের কোলাহলে ধেয়ে চলেছিল।

Verse 40

सादी सादिनमासाद्य पत्तयश्न पदातिनम्‌

সঞ্জয় বললেন—অশ্বারোহী অশ্বারোহীর সঙ্গে সংঘর্ষে জড়াল, আর পদাতিক পদাতিকের সঙ্গে লেগে গেল; রথী ও সারথির নিকটে পৌঁছে পদাতিকরাও মুখোমুখি দাঁড়াল।

Verse 41

धावतां द्रवतां चैव पुनरावर्ततामपि

সঞ্জয় বললেন—কোথাও তারা দৌড়াচ্ছিল, কোথাও পালাচ্ছিল, আবার কোথাও ফিরে ঘুরে দাঁড়াচ্ছিল।

Verse 42

दीप्यमाना: प्रदीपाश्च॒ रथवारणवाजिषु

সঞ্জয় বললেন—রথ, হাতি ও ঘোড়ার উপর জ্বলজ্বলে প্রদীপ দেখা যাচ্ছিল।

Verse 43

अदृश्यन्त महाराज महोल्का इव खाच्च्युता: । महाराज! रथों, हाथियों और घोड़ोंपर चलती हुई मशालें आकाशसे गिरी हुई बड़ी-बड़ी उल्काओंके समान दिखायी देती थीं || ४२ $ ।। सा निशा भरतश्रेष्ठ प्रदीपेरवभासिता

সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! রথে, গজে ও অশ্বে বহন করা চলমান সেই মশালাগুলি আকাশ থেকে পতিত বৃহৎ উল্কার ন্যায় প্রতীয়মান হচ্ছিল। হে ভরতশ্রেষ্ঠ! এইভাবে প্রদীপের আলোয় সেই রাত্রি উদ্ভাসিত হয়ে উঠল।

Verse 44

आदित्येन यथा व्याप्तं तमो लोके प्रणश्यति

যেমন সূর্যের ব্যাপ্তিতে জগতে অন্ধকার নাশ হয়, তেমনই আলোর প্রসারে সকল মোহ-অন্ধকার দূরীভূত হয়।

Verse 45

द्यौश्वैव पृथिवी चापि दिशश्व प्रदिशस्तथा

আকাশও পৃথিবীও, তদ্রূপ সকল দিক ও উপদিক।

Verse 46

अस्त्राणां कवचानां च मणीनां च महात्मनाम्‌

মহাত্মা যোদ্ধাদের অস্ত্র, কবচ ও মণির (ঔজ্জ্বল্য)।

Verse 47

अन्तर्दधु: प्रभा: सर्वा दीपैस्तैरव भासिता: । महामनस्वी योद्धाओंके अस्त्रों, कवचों और मणियोंकी सारी प्रभा उन प्रदीपोंके प्रकाशसे तिरोहित हो गयी थी ।। तस्मिन्‌ कोलाहले युद्धे वर्तमाने निशामुखे

সেই প্রদীপগুলির আলোয় সকল জ্যোতি যেন অন্তর্হিত হয়ে গেল। মহামনস্বী যোদ্ধাদের অস্ত্র, কবচ ও মণির যে দীপ্তি ছিল, তা প্রদীপের প্রভায় ঢেকে গেল। আর সেই কোলাহলময় যুদ্ধ চলতেই থাকল, যখন রাত্রির সূচনা মাত্র।

Verse 48

अवधीत्‌ समरे पुत्र पिता भरतसत्तम

সঞ্জয় বললেন—হে ভারতশ্রেষ্ঠ! সেই ঘোর সমরে পুত্র পিতাকে বধ করল; স্বধর্মের উলটপালট ঘটল, যুদ্ধমোহে স্বজনই স্বজনকে নিধন করতে লাগল।

Verse 49

पुत्रश्न पितरं मोहातू सखायं च सखा तथा । स्वस्त्रीयं मातुलश्चापि स्वस्रीयश्चापि मातुलम्‌

সঞ্জয় বললেন—মোহবশে পুত্র পিতাকে মারতে পারে, আর বন্ধু বন্ধুকে। তেমনি মামা ভাগ্নেকে বধ করতে পারে, আর ভাগ্নেও মামাকে—যুদ্ধে বিভ্রমে সম্পর্ক উলটে যায়।

Verse 50

भरतश्रेष्ठ] उस समरांगणमें मोहवश पिताने पुत्रका वध कर डाला और पुत्रने पिताका। मित्रने मित्रके प्राण ले लिये। मामाने भानजेको मार डाला और भानजेने मामाको ।। स्वे स्वान्‌ परे परांश्ञापि निजघ्नुरितरेतरम्‌ । निर्मर्यादम भूद्‌ युद्ध रात्री भीरुभयानकम्‌,अपने पक्षके योद्धा अपने ही सैनिकोंपर तथा शत्रुपक्षेके सैनिक भी अपने ही योद्धाओंपर परस्पर घातक प्रहार करने लगे। इस प्रकार रात्रिमें वह युद्ध मर्यादारहित होकर कायरोंके लिये अत्यन्त भयानक हो उठा

সঞ্জয় বললেন—হে ভারতশ্রেষ্ঠ! সেই রাত্রিযুদ্ধে মোহবশে পিতা পুত্রকে বধ করল, পুত্রও পিতাকে। বন্ধু বন্ধু’র প্রাণ নিল। মামা ভাগ্নেকে মারল, ভাগ্নেও মামাকে। নিজ পক্ষের যোদ্ধারা নিজেদের সৈন্যদের উপর, আর শত্রুপক্ষের সৈন্যরাও নিজেদের যোদ্ধাদের উপর পরস্পর প্রাণঘাতী আঘাত করতে লাগল। এভাবে সেই রাত্রিযুদ্ধ সব সীমা ভেঙে ভীরুদের জন্যও ভয়ংকর হয়ে উঠল।

Verse 153

श्येनं सपक्ष॑ व्याधेन पातयामास तं तदा । इसके बाद एक पानीदार पैने एवं तीखे बाणसे पाण्डुनन्दन नकुलने शकुनिकी दोनों जाँघोंको विदीर्ण करके व्याधद्वारा विद्ध हुए पंखयुक्त बाज पक्षीके समान उसे गिरा दिया

সঞ্জয় বললেন—তখন পাণ্ডুনন্দন নকুল তীক্ষ্ণ, ধারালো বাণে শকুনির উভয় ঊরু বিদীর্ণ করে তাকে ভূমিতে ফেলে দিল—যেমন ব্যাধের বাণে ডানাওয়ালা বাজ পাখি পড়ে যায়।

Verse 163

ध्वजयष्टिं परिक्लिश्य कामुक: कामिनीं यथा । महाराज! उस बाणसे अत्यन्त घायल हुआ शकुनि, जैसे कामी पुरुष कामिनीका आलिंगन करता है, उसी प्रकार ध्वज-यष्टि (ध्वजाके डंडे)-को दोनों भुजाओंसे पकड़कर रथके पिछले भागमें बैठ गया

সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! সেই বাণে ভীষণ আহত শকুনি, কামুক পুরুষ যেমন কামিনীকে আলিঙ্গন করে, তেমনি ধ্বজদণ্ডকে দুই বাহুতে জড়িয়ে ধরে রথের পশ্চাৎভাগে বসে পড়ল।

Verse 169

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे संकुलयुद्धे एकोनसप्तत्यधिकशततमो< ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বে, ঘটোৎকচবধপর্বের অন্তর্গত, রাত্রিযুদ্ধ ও সংকুল (অত্যন্ত জটিল) যুদ্ধবর্ণনায় একশো ঊনসত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 173

अपोवाह रथेनाशु सारथिध्व॑जिनीमुखात्‌ । निष्पाप नरेश! आपके सालेको बेहोश पड़ा देख सारथि रथके द्वारा शीघ्र ही उसे सेनाके आगेसे दूर हटा ले गया

সঞ্জয় বললেন—হে নিষ্পাপ নরেশ! আপনার শ্যালককে অচেতন হয়ে পড়ে থাকতে দেখে সারথি রথে করে তাকে সেনার অগ্রভাগ থেকে দ্রুত সরিয়ে নিল।

Verse 263

कालरात्रिनिभा हासीद्‌ घोररूपा भयानका । भरतश्रेष्ठ) स्वभावसे ही भयंकर दिखायी देनेवाला आकाश उस समय और भी घोरतर हो उठा। युद्धभूमिमें शोभा पानेवाले योद्धाओंके लिये वह घोर एवं भयानक रात्रि कालरात्रिके समान प्रतीत होती थी

সঞ্জয় বললেন—সে রাত্রি কালরাত্রির ন্যায়, ভয়ংকর রূপধারিণী ও আতঙ্কজনক ছিল। হে ভরতশ্রেষ্ঠ! স্বভাবতই ভয়াল আকাশ তখন আরও অধিক ঘোর হয়ে উঠল। যুদ্ধভূমিতে যশ কামনাকারী বীরদের কাছে সে রাত্রি কালরাত্রির সমানই প্রতীয়মান হল।

Verse 273

अर्धचन्द्रेण चिच्छेद सज्यं सविशिखं तदा । महाराज! शिखण्डीने उस समय अर्धचन्द्राकार बाण मारकर प्रत्यंचा और बाणसहित कृपाचार्यके विशाल धनुषको काट दिया

সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! তখন শিখণ্ডী অর্ধচন্দ্রাকার বাণে, ধনুকের প্রত্যঞ্চা ও বাণসহ কৃপাচার্যের বৃহৎ ধনুক কেটে দিল।

Verse 286

स्वर्णदण्डामकुण्ठाग्रां कर्मारपरिमार्जिताम्‌ । राजन्‌! तब कृपाचार्यने कुपित होकर सोनेके दण्ड और अप्रतिहत धारवाली तथा कारीगरके द्वारा साफ की हुई एक भयंकर शक्ति उसके ऊपर चलायी

সঞ্জয় বললেন—রাজন! তখন কৃপাচার্য ক্রুদ্ধ হয়ে, স্বর্ণদণ্ডযুক্ত, অক্ষুণ্ণ তীক্ষ্ণাগ্র এবং কর্মকারের দ্বারা পালিশ-করা এক ভয়ংকর শক্তি তার দিকে নিক্ষেপ করলেন।

Verse 296

सा5पतन्मेदिनीं दीप्ता भासयन्ती महाप्रभा | अपने ऊपर आती हुई उस शक्तिको शिखण्डीने बहुत-से बाण मारकर काट दिया। वह अत्यन्त कान्तिमती एवं प्रकाशमान शक्ति खण्डित हो सब ओर प्रकाश बिखेरती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ी

সঞ্জয় বললেন—অতিশয় দীপ্তিময়, মহাপ্রভা সেই শক্তি চারিদিকে আলো ছড়াতে ছড়াতে পৃথিবীর দিকে পতিত হতে লাগল। শিখণ্ডীর উপর ধেয়ে আসতে দেখে শিখণ্ডী বহু শর নিক্ষেপ করে তাকে আঘাত করে খণ্ডিত করল। ভগ্ন হয়ে সেই অতিশয় উজ্জ্বল অস্ত্র দিক্‌দিগন্তে আলো ছড়িয়ে ভূমিতে পড়ে গেল।

Verse 316

न्यषीदत रथोपस्थे शिखण्डी रथिनां वर: । समरभूमिमें यशस्वी कृपाचार्यद्वारा बाणोंसे आच्छादित किया जाता हुआ रथियोंमें श्रेष्ठ शिखण्डी रथके पिछले भागमें शिथिल होकर बैठ गया

সঞ্জয় বললেন—সমরে কৃপাচার্যের নিক্ষিপ্ত শরসমূহে চারদিক থেকে আচ্ছন্ন হতে হতে রথীদের শ্রেষ্ঠ, যশস্বী শিখণ্ডী রথাসনে ঢলে পড়ল; রথের পশ্চাৎভাগের দিকে শিথিল হয়ে বসে গেল।

Verse 326

आजलेने बहुभिर्बाणर्जिघांसन्निव भारत । भरतनन्दन! युद्धस्थलमें शिखण्डीको शिथिल हुआ देख शरद्वानके पुत्र कृपाचार्यने उसपर बहुत-से बाणोंका प्रहार किया, मानो वे उसे मार डालना चाहते हों

সঞ্জয় বললেন—হে ভারতনন্দন! সমরে শিখণ্ডীকে শিথিল হতে দেখে শরদ্বতের পুত্র কৃপাচার্য যেন তাকে বধ করতে উদ্যত, তার উপর বহু শর বর্ষণ করলেন।

Verse 343

महत्या सेनया सार्ध ततो युद्धमवर्तत । इसी प्रकार आपके पुत्रोंने भी विशाल सेनाके साथ आकर द्विजश्रेष्ठ कृपाचार्यको अपने बीचमें कर लिया। फिर दोनों दलोंमें घोर युद्ध होने लगा

সঞ্জয় বললেন—তখন মহাসেনা সহ যুদ্ধ প্রবৃত্ত হল। তদ্রূপ তোমার পুত্রেরাও বৃহৎ বাহিনী নিয়ে এসে দ্বিজশ্রেষ্ঠ কৃপাচার্যকে মাঝখানে স্থাপন করল; অতঃপর উভয় পক্ষের মধ্যে ভয়ংকর যুদ্ধ শুরু হল।

Verse 353

बभूव तुमुल: शब्दो मेघानां गर्जतामिव । राजन! रणभूमिमें परस्पर धावा करनेवाले रथोंकी घर्घराहटका भयंकर शब्द मेघोंकी गर्जनाके समान जान पड़ता था

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! মেঘগর্জনের ন্যায় এক ভয়ংকর কোলাহল উঠল। পরস্পরের দিকে ধেয়ে আসা রথগুলির ঘর্ঘর ধ্বনি এমন ভয়াল ছিল যে তা যেন মেঘের গর্জনই।

Verse 363

अन्योन्यमभितो राजन्‌ क्रूरमायोधनं बभौ । प्रजापालक नरेश! चारों ओर एक-दूसरेपर आक्रमण करनेवाले घुड़सवारों और हाथीसवारोंके संघर्षसे वह रणभूमि अत्यन्त दारुण प्रतीत होने लगी

সঞ্জয় বললেন—রাজন, চারিদিকে পরস্পরের উপর ঝাঁপিয়ে পড়ায় যুদ্ধ ভয়ংকর ও নির্মম হয়ে উঠল। প্রজাপালক নৃপতি! অশ্বারোহী ও গজারোহীদের সংঘর্ষে সেই রণভূমি অতিশয় দারুণ বলে প্রতীয়মান হল।

Verse 383

अगृह्नन्‌ बहवो राजन्‌ शलभान्‌ वायसा इव | राजन! जैसे कौए दौड़-दौड़कर टिड्डियोंको पकड़ते हैं, उसी प्रकार रथपर बैठकर बड़े वेगसे धावा करनेवाले बहुसंख्यक रथी शत्रुपक्षके सैनिकोंको दबोच लेते थे

সঞ্জয় বললেন—রাজন, যেমন কাক দৌড়ে দৌড়ে পঙ্গপাল ধরে, তেমনি রথারূঢ় দ্রুতগতির বহু রথী শত্রুপক্ষের সৈন্যদের ধরে ফেলত।

Verse 396

तस्मिन्नेव पदे यत्ता निगृह्नन्ति सम भारत । भरतनन्दन! मदस्रावी विशाल हाथी मदकी धारा बहानेवाले दूसरे गजराजोंसे सहसा भिड़कर एक-दूसरेको यत्नपूर्वक काबूमें कर लेते थे

হে ভরতনন্দন! সেই একই স্থানে যুদ্ধে রত মদস্রাবী বিশাল হাতিরা মদের ধারা ঝরানো অন্য গজরাজদের সঙ্গে হঠাৎ সংঘর্ষে লিপ্ত হয়ে পরস্পরকে যত্নসহকারে বশে আনতে চেষ্টা করত।

Verse 403

समासाद्य रणेडन्योन्यं संरब्धा नातिचक्रमु: । रणभूमिमें घुड़सवार घुड़सवारोंसे और पैदल पैदलोंसे भिड़कर परस्पर कुपित होते हुए भी एक-दूसरेको लाँधघकर आगे नहीं बढ़ पाते थे

রণক্ষেত্রে পরস্পরের কাছে এসে, ক্রোধে জ্বললেও তারা প্রতিপক্ষকে অতিক্রম করে এগোতে পারল না। অশ্বারোহী অশ্বারোহীর সঙ্গে এবং পদাতিক পদাতিকের সঙ্গে সংঘর্ষে লিপ্ত রইল; উভয় পক্ষই সমানভাবে স্থির থাকল।

Verse 413

बभूव तत्र सैन्यानां शब्द: सुविपुलो निशि । उस रात्रिके समय दौड़ते, भागते और पुनः लौटते हुए सैनिकोंका महान्‌ कोलाहल सुनायी पड़ता था

সেই রাত্রিতে সেখানে সেনাদের এক বিপুল শব্দ উঠল। দৌড়ানো, পালানো এবং আবার ফিরে আসা সৈন্যদের মহা কোলাহল শোনা যাচ্ছিল।

Verse 436

दिवसप्रतिमा राजन्‌ बभूव रणमूर्थनि । भरतभूषण नरेश! प्रदीपोंसे प्रकाशित हुई वह रात्रि युद्धके मुहानेपर दिनके समान हो गयी थी

সঞ্জয় বললেন—রাজন, রণক্ষেত্রের অগ্রভাগে সেই রাত্রি প্রদীপের আলোয় দিবসসম হয়ে উঠেছিল। ভরতভূষণ নৃপতি, যুদ্ধের মুখে অন্ধকার দূর হয়ে গিয়েছিল—যেন সংগ্রাম নিজেই অবিরাম সতর্কতা ও অটল সংকল্প দাবি করছিল।

Verse 443

तथा नष्ट तमो घोरें दीपैर्दीप्तैरितस्ततः । जैसे सूर्यके प्रकाशसे सम्पूर्ण जगत्‌में फैला हुआ अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार इधर-उधर जलती हुई मशालोंसे वहाँका भयानक अँधेरा नष्ट हो गया था

সঞ্জয় বললেন—যেমন সূর্যের কিরণে সমগ্র জগতে ছড়ানো অন্ধকার নষ্ট হয়, তেমনই এখানে-সেখানে জ্বলা মশালের তেজে সেখানকার ভয়ংকর অন্ধকার দূর হয়ে গেল। যুদ্ধের ভয় ও বিভ্রান্তির মধ্যে এই আলো কেবল রক্ষার উপায় নয়, বিপদের উপর স্পষ্টতার প্রতীকও বটে।

Verse 456

रजसा तमसा व्याप्ता द्योतिता: प्रभया पुन: । धूल और अन्धकारसे व्याप्त आकाश, पृथ्वी, दिशा और विदिशाएँ प्रदीपोंकी प्रभासे पुनः प्रकाशित हो उठी थीं

সঞ্জয় বললেন—ধুলো ও অন্ধকারে আচ্ছন্ন আকাশ, পৃথিবী, দিক ও বিদিক আবার প্রদীপের জ্যোতিতে আলোকিত হয়ে উঠল। যুদ্ধের বিভ্রান্তির মধ্যেও কখনো কখনো স্পষ্টতা ফিরে আসে—এই দৃশ্য যেন সেই কথাই জানাল।

Verse 473

न किंचिद्‌ विदुरात्मानमयमस्मीति भारत । भारत! उस रात्रिके समय जब वह भयंकर कोलाहलपूर्ण संग्राम चल रहा था, तब योद्धाओंको कुछ भी पता नहीं चलता था। वे अपने-आपके विषयमें भी यह नहीं जान पाते थेकि “मैं अमुक हूँ

সঞ্জয় বললেন—হে ভারত, সেই রাত্রিতে যখন ভয়ংকর কোলাহলময় সংগ্রাম চলছিল, তখন যোদ্ধারা কিছুই স্পষ্ট বুঝতে পারছিল না। বিভ্রান্তিতে তারা নিজেদেরও চিনতে পারছিল না—‘আমি অমুক।’

Verse 3736

अकम्पत महाराज भयत्रस्तेव चाड़ना | महाराज! दौड़ते हुए पैदल सैनिकोंके पैरोंकी धमकसे यह पृथ्वी भयभीत अबलाके समान काँपने लगी

সঞ্জয় বললেন—মহারাজ, দৌড়তে থাকা পদাতিকদের পায়ের ধমকে পৃথিবী ভীত, অসহায় নারীর মতো কেঁপে উঠল। তাদের পদাঘাতের গর্জনে আঘাতপ্রাপ্ত ভূমি থরথর করে কাঁপল, যেন ভয় তাকে গ্রাস করেছে।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether heroic persistence (continuing to fight) is ethically valid when a weapon’s injunction requires non-resistance for communal survival; Bhīma’s impulse to continue is checked by Kṛṣṇa’s insistence on protocol.

Power is bounded by rule: even in sanctioned conflict, restraint and procedural compliance can be the highest form of duty when escalation risks indiscriminate harm and compounded karmic consequence.

No explicit phalaśruti appears; the meta-commentary functions implicitly through the narrative logic that correct observance of astra-protocol restores order, whereas defiance amplifies danger and disorder.