Mahabharata Adhyaya 145
Drona ParvaAdhyaya 14578 Versesपाण्डव पक्ष को तात्कालिक राहत; पर नैतिक विवाद और प्रतिशोध की आग से युद्ध का ताप और बढ़ता है।

Adhyaya 145

धृष्टद्युम्नस्य द्रोणाभिमुख्यं तथा सात्यकि-कर्ण-समागमः (Dhṛṣṭadyumna’s advance toward Droṇa and the Sātyaki–Karṇa confrontation)

Upa-parva: Droṇa-vadha-prasaṅga (Night engagement around Droṇa’s protection and counter-assaults)

Sañjaya reports that, amid an intensely tumultuous and fear-inducing engagement, Dhṛṣṭadyumna repeatedly draws and readies his bow, advancing upon Droṇa’s ornamented chariot with the explicit intention of ending the ācārya’s command. The Pāñcālas and Pāṇḍavas move to support and encircle him, while Droṇa’s side responds by surrounding and defending Droṇa with coordinated missile fire. Dhṛṣṭadyumna strikes Droṇa with five arrows and roars; Droṇa answers with a heavier volley, cutting Dhṛṣṭadyumna’s bow, forcing a re-armament. Dhṛṣṭadyumna launches a formidable arrow toward Droṇa, but Karṇa intercepts and slices it into multiple parts before it reaches the chariot, then joins others in concentrated attacks on Dhṛṣṭadyumna. Dhṛṣṭadyumna retaliates under pressure, kills Drumasena by decapitation, and breaks Karṇa’s bow, provoking Karṇa’s intensified counter-barrage. As multiple Kaurava champions converge, Sātyaki arrives to relieve Dhṛṣṭadyumna’s crisis, initiating a fierce, balanced duel with Karṇa. Sātyaki wounds Vṛṣasena; Karṇa, believing his son incapacitated, increases pressure on Sātyaki. The chapter closes with the broader battlefield swelling in violence and sound—especially the distant, unmistakable resonance of Arjuna’s Gāṇḍīva—prompting Karṇa to counsel Duryodhana on exploiting the moment by targeting Sātyaki and Dhṛṣṭadyumna and dispatching Śakuni (Saubala) with a large force against the Pāṇḍavas.

Chapter Arc: रणभूमि में भूरिश्रवा सात्यकि को पकड़ कर वध के लिए उद्यत है; उसी क्षण अदृश्य-वेग से किरीटी अर्जुन का बाण उठता है और प्रहार करने को उठी भुजा कटकर भूमि पर सर्प-सी गिरती है। → एकभुज भूरिश्रवा क्रोध और अपमान से दहक उठता है—वह सात्यकि को छोड़कर अर्जुन को धिक्कारता है कि यह ‘वार्ष्णेय’ (सात्यकि) को बचाने हेतु किया गया क्षुद्र कर्म है, जो वासुदेव-मत के अनुरूप नहीं। क्षत्रिय-समाज और रथी-समूह इस विवाद को सुनते हैं; युद्ध का नियम, प्रतिज्ञा और मित्र-रक्षा—तीनों टकराते हैं। → भूरिश्रवा, प्रतिज्ञा-भंग और अपमान की आग में, युद्ध से विरत होकर प्रायोपवेशन/योग-ध्यान का आश्रय लेता है—नेत्र सूर्य में, मन शीतल जल में समाहित कर ‘महोपनिषद्’ के भाव में स्थित होता है; उसी समय सात्यकि, अपने पूर्व अपमान/प्रतिज्ञा की स्मृति से प्रेरित होकर, उस विरक्त-स्थित शत्रु का वध कर देता है। → देव, सिद्ध, चारण और मनुष्य विस्मित होते हैं—एक ओर भूरिश्रवा का तपोमय अंत, दूसरी ओर रण-धर्म की कठोरता। अर्जुन की प्रतिज्ञा-रक्षा (सात्यकि की रक्षा) और सात्यकि का प्रतिशोध—दोनों के कारण यह वध ‘धर्म’ के प्रश्न को और तीखा कर देता है; युद्ध का नैतिक ध्रुव डगमगाता है। → भूरिश्रवा-वध के बाद प्रतिज्ञाओं की श्रृंखला और तीव्र होती है—अपमान का बदला लेने की प्रतिज्ञा और अगले प्रतिशोध की छाया रणभूमि पर उतर आती है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६ श्लोक मिलाकर कुल ७३ ३ “लोक हैं।) #.१०3८६>-> हु #+ ३. पृथ्वीपर घुमाना। २. प्रतिद्वन्द्यीकी ओर बढ़ना। 3. पीछे लौटना। ४. पछाड़ना। ५. पृथ्वीपर पटकना। ६. उछलकर खड़ा होना। ७. पीठ लगाना। त्रिचत्वारिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: भूरिश्रवाका अर्जुनको उपालम्भ देना

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! ভুরিশ্রবার সেই উৎকৃষ্ট বাহু, শোভন বাহুবন্ধে ভূষিত, তলোয়ারসহ ছিন্ন হয়ে ভূমিতে পতিত হল। তার পতনে জীবসমূহের হৃদয়ে এক আশ্চর্য ও গভীর শোক সঞ্চারিত হল—যেন যুদ্ধে বীরত্ব ও সম্মানের বিধানও নির্মম পরিণতিতে ভেঙে পড়ল।

Verse 2

प्रहरिष्यन्‌ हृतो बाहुरदृश्येन किरीटिना । वेगेन न्‍न्यपतद्‌ भूमौ पठ्चास्य इव पन्नग:

আঘাত করতে উদ্যত সেই বাহু, অদৃশ্যপ্রায় কিরীটধারী অর্জুনের বাণে ছিন্ন হয়ে, পঞ্চফণ সাপের মতো প্রবল বেগে ভূমিতে আছড়ে পড়ল।

Verse 3

स मोघं कृतमात्मानं दृष्टवा पार्थेन कौरव: । उत्सृज्य सात्यकिं क्रोधाद्‌ गर्हयामास पाण्डवम्‌

পার্থ অর্জুনের দ্বারা নিজের প্রচেষ্টা নিষ্ফল হয়েছে দেখে, কৌরব ভুরিশ্রবা ক্রোধে সাত্যকিকে ছেড়ে দিয়ে পাণ্ডব অর্জুনকে তিরস্কার করতে লাগল।

Verse 4

(स विबाहुर्महाराज एकपक्ष इवाण्डज: । एकचक्रो रथो यद्धद्‌ धरणीमास्थितो नृपः । उवाच पाण्डवं चैव सर्वक्षत्रस्थ शृण्वतः ।।

ভুরিশ্রবা বলল—হে কুন্তীপুত্র! তুমি নিতান্ত নিষ্ঠুর কাজ করেছ। আমি তোমাকে দেখছিলাম না, অন্যের সঙ্গে যুদ্ধে আসক্ত ছিলাম—সেই অবস্থায় তুমি আমার বাহু কেটে দিলে।

Verse 5

कि नु वक्ष्यसि राजानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम्‌ । कि कुर्वाणो मया संख्ये हतो भूरिश्रवा रणे

ধর্মপুত্র রাজা যুধিষ্ঠিরকে তুমি কী বলবে? এটাই কি বলবে—“ভুরিশ্রবা অন্য কাজে আসক্ত ছিলেন, আর সেই অবস্থাতেই আমি তাঁকে রণে হত্যা করেছি”?

Verse 6

इदमिन्द्रेण ते साक्षादुपदिष्टं महात्मना । अस्त्रं रुद्रेण वा पार्थ द्रोणेनाथ कृपेण वा,पार्थ! इस अस्त्र-विद्याका उपदेश तुम्हें साक्षात्‌ महात्मा इन्द्रने दिया है, या रुद्र, द्रोण अथवा कृपाचार्यने?

পার্থ! এই অস্ত্রবিদ্যা কি তোমাকে স্বয়ং মহাত্মা ইন্দ্র উপদেশ দিয়েছেন, না রুদ্র, না দ্রোণ, কিংবা কৃপাচার্য?

Verse 7

ननु नामास्त्रधर्मज्ञस्त्वं लोके5 भ्यधिक: परै: । सोथ्युध्यमानस्य कथं रणे प्रहृतवानसि

তুমি তো এই জগতে অন্যদের চেয়ে অধিক অস্ত্রধর্মের জ্ঞাতা বলে প্রসিদ্ধ; তবে যে তোমার সঙ্গে যুদ্ধ করছিল না, তাকে রণে তুমি কীভাবে আঘাত করলে?

Verse 8

न प्रमत्ताय भीताय विरथाय प्रयाचते । व्यसने वर्तमानाय प्रहरन्ति मनस्विन:,मनस्वी पुरुष असावधान, डरे हुए, रथहीन, प्राणों-की भिक्षा माँगनेवाले तथा संकटमें पड़े हुए मनुष्यपर प्रहार नहीं करते हैं

সাহসী ও মহৎচিত্ত পুরুষেরা অসতর্ক, ভীত, রথহীন, প্রাণভিক্ষা প্রার্থনাকারী কিংবা বিপদগ্রস্ত মানুষের উপর আঘাত করেন না।

Verse 9

इदं तु नीचाचरितमसत्पुरुषसेवितम्‌ | कथमाचरितं पार्थ पापकर्म सुदुष्करम्‌,पार्थ! यह नीच पुरुषोंद्वारा आचरित और दुष्ट पुरुषोंद्वारा सेवित अत्यन्त दुष्कर पापकर्म तुमने कैसे किया?

পার্থ! এ তো নীচদের আচরণ, দুষ্কৃতিদের আশ্রিত কর্ম; এমন অত্যন্ত দুষ্কর পাপকর্ম তুমি কীভাবে করলে?

Verse 10

आर्येण सुकरं त्वाहुरार्यकर्म धनंजय । अनार्यकर्म त्वार्येण सुदुष्करतमं भुवि

ধনঞ্জয়! আর্যজনের পক্ষে আর্যকর্মই সহজ বলা হয়; কিন্তু সেই আর্যজনের পক্ষেই এই পৃথিবীতে অনার্যকর্ম করা সর্বাধিক দুষ্কর।

Verse 11

येषु येषु नरव्यात्र यत्र यत्र च वर्तते । आशु तच्छीलतामेति तदिदं त्वयि दृश्यते

হে নরব্যাঘ্র! মানুষ যেখানে-যেখানে থাকে এবং যাদের সঙ্গে মিশে চলে, সে অচিরেই তাদেরই স্বভাব-আচরণ গ্রহণ করে; সেই সত্যই তোমার মধ্যেও দেখা যাচ্ছে, হে নরব্যাঘ্র।

Verse 12

कथं हि राजवंश्यस्त्वं कौरवेयो विशेषत: । क्षत्रधर्मादपक्रान्त: सुवृत्तश्नरितव्रत:

তুমি তো রাজবংশজাত, বিশেষত কৌরবকুলে জন্ম নিয়ে কীভাবে ক্ষত্রধর্ম থেকে বিচ্যুত হলে? হে নরশ্রেষ্ঠ! তোমার আচরণ তো ছিল অতি উত্তম।

Verse 13

इदं तु यदत्तिक्षुद्रं वार्ष्णेयार्थे कृतं त्वया । वासुदेवमतं नूनं नैतत्‌ त्वय्युपपद्यते

কিন্তু বার্ষ্ণেয়ের (সাত্যকির) স্বার্থে তুমি যে এই অতিশয় নীচ কর্ম করেছ, তা নিশ্চয়ই বাসুদেবপুত্র শ্রীকৃষ্ণের মতানুসারেই; কারণ এমন নীচ ভাবনা তোমার সঙ্গে মানায় না।

Verse 14

को हि नाम प्रमत्ताय परेण सह युध्यते । ईदृशं व्यसन दद्यादू यो न कृष्णसखो भवेत्‌

কে এমন আছে যে অসতর্ক অবস্থায় যুদ্ধরত প্রতিপক্ষের সঙ্গে যুদ্ধ করে, তারপর তার ওপর এমন বিপর্যয় চাপিয়ে দেয়? যে শ্রীকৃষ্ণের বন্ধু নয়, তার দ্বারা এমন কাজ সম্ভব নয়।

Verse 15

व्रात्या: संक्लिष्टकर्माण: प्रकृत्यैव च गर्लहिता: । वृष्ण्यन्धका: कथं पार्थ प्रमाणं भवता कृता:

হে পার্থ! বৃষ্ণি ও অন্ধকরা তো ব্রাত্যসদৃশ, কলুষিত কর্মে লিপ্ত এবং স্বভাবতই নিন্দিত; তবে তুমি কীভাবে তাদেরকে প্রমাণ বলে গ্রহণ করলে?

Verse 16

अर्जुन उवाच व्यक्त हि जीर्यमाणो<5पि बुद्धि जरयते नर:

অর্জুন বললেন—প্রভো! স্পষ্টই দেখা যায়, মানুষ বার্ধক্যে পৌঁছালে তার বুদ্ধিও জীর্ণ ও ক্ষীণ হয়ে পড়ে। অতএব আপনি এইমাত্র যা বললেন, তা বৃথা। আপনি ইন্দ্রিয়নিয়ন্তা হৃষীকেশ শ্রীকৃষ্ণকে এবং আমাকে—পাণ্ডুপুত্র অর্জুনকেও—জানেন; তবু আমাদের নিন্দা করছেন।

Verse 17

अनर्थकमिदं सर्व यत्‌ त्वया व्यादह्वतं प्रभो । जानन्नेव हषीकेशं गर्हसे मां च पाण्डवम्‌

অর্জুন বললেন—প্রভো! আপনি যা উচ্চারণ করলেন, তা সবই নিরর্থক। হৃষীকেশকে জেনেও এবং আমাকে পাণ্ডব অর্জুনকে জেনেও আপনি আমাদের নিন্দা করছেন।

Verse 18

संग्रामाणां हि धर्मज्ञ: सर्वशास्त्रार्थपारग: । न चाधर्ममहं कुर्या जानंश्वैव हि मुहासे

আমি যুদ্ধের ধর্ম জানি এবং সকল শাস্ত্রার্থে পারদর্শী। আমি কখনও অধর্ম করব না; তা জেনেও তুমি আমার বিষয়ে মোহগ্রস্ত হচ্ছ।

Verse 19

युध्यन्ति क्षत्रिया: शत्रून्‌ स्वै: स्वैः परिवृता नरा: । भ्रातृभि: पितृभि: पुत्रैस्तथा सम्बन्धिबान्धवै:

ক্ষত্রিয়েরা শত্রুর সঙ্গে যুদ্ধ করে নিজেদের লোকজন দ্বারা পরিবেষ্টিত হয়ে—ভাই, পিতা, পুত্র, এবং আত্মীয়-স্বজন ও কুটুম্ববর্গসহ।

Verse 20

स कथं सात्यकिं शिष्यं सुखसम्बन्धमेव च,(निकृष्यमाणं तं दृष्टवा कथं शत्रुवशं गतम्‌ । त्वया विकृष्यमाणं च दृष्टवानस्मि निष्क्रियम्‌ ।।

সাত্যকি আমার শিষ্য এবং প্রিয় আত্মীয়। তাকে টেনে নিয়ে যাওয়া হচ্ছে, শত্রুর বশে পড়ে নিস্তেজ হয়ে গেছে—এ দৃশ্য দেখে আমি তাকে কীভাবে ত্যাগ করতাম? আমি নিজেই দেখেছি, তুমি তাকে টানছিলে এবং সে অসহায় হয়ে স্থির ও নিশ্চল হয়ে পড়েছিল। সে আমারই জন্য দুর্লভ-ত্যাজ্য প্রাণের আসক্তিও ত্যাগ করে যুদ্ধ করছে; রণোন্মত্ত সাত্যকি যুদ্ধক্ষেত্রে আমার ডান বাহুর মতো। তোমার হাতে তাকে কষ্ট পেতে দেখে আমি কীভাবে উপেক্ষা করতাম?

Verse 21

अस्मदर्थ च युध्यन्तं त्यक्त्वा प्राणान्‌ सुदुस्त्यजान्‌ । मम बाहुं रणे राजन्‌ दक्षिण युद्धदुर्मदम्‌,(निकृष्यमाणं तं दृष्टवा कथं शत्रुवशं गतम्‌ । त्वया विकृष्यमाणं च दृष्टवानस्मि निष्क्रियम्‌ ।।

অর্জুন বললেন— আমারই জন্য সাত্যকি সেই দুর্লভ-ত্যাজ্য প্রাণের আসক্তিও ত্যাগ করে যুদ্ধ করছে। রাজন, রণোন্মাদনায় সে যেন রণক্ষেত্রে আমার ডান বাহু। তোমার টানে তাকে টেনে নিয়ে যেতে দেখে, শত্রুবশে পড়ে নিস্তেজ হয়ে যেতে দেখে, তার দুঃখ আমি কীভাবে উপেক্ষা করতাম?

Verse 22

न चात्मा रक्षितव्यो वै राजन्‌ रणगतेन हि । यो यस्य युज्यते<र्थेषु स वै रक्ष्यो नराधिप

রাজন, যিনি রণক্ষেত্রে প্রবেশ করেছেন, তাঁর পক্ষে কেবল আত্মরক্ষাই ভাবা শোভন নয়। নরাধিপ, যে যার কাজ ও উদ্দেশ্যে নিয়োজিত থাকে, সে সেই ব্যক্তির দ্বারাই অবশ্যই রক্ষিত হওয়ার যোগ্য।

Verse 23

तै रक्ष्यममाणै: स नृपो रक्षितव्यो महामृधे । यद्यहं सात्यकिं पश्ये वध्यमानं महारणे

এইরূপে যাঁরা রক্ষিত হন, সেই সুহৃদদেরও কর্তব্য—মহাসমরে তাঁদের রাজাকে রক্ষা করা। যদি এই মহাযুদ্ধে আমি আমার চোখের সামনে সাত্যকিকে নিহত হতে দেখতাম, তবে তার বিচ্ছেদজনিত শোক আমার ওপর সর্বনাশ-আনয়নকারী পাপের মতো ভারী হতো। তাই আমি তাকে রক্ষা করেছি—তবে তুমি কেন আমার ওপর ক্রুদ্ধ হও?

Verse 24

ततस्तस्य वियोगेन पाप॑ मेडनर्थतो भवेत्‌ | रक्षितश्न मया यस्मात्‌ तस्मात्‌ क्रुध्यसि कि मयि

তবে তার বিচ্ছেদে আমার ওপর সর্বনাশ-আনয়নকারী পাপ এসে পড়ত। যেহেতু আমি তাকে রক্ষা করেছি, সেই কারণেই তুমি কেন আমার ওপর ক্রুদ্ধ হও?

Verse 25

यच्च मे गर्हसे राजन्नन्येन सह संगतम्‌ | अहं त्वया विनिकृतस्तत्र मे बुद्धिविभ्रम:

রাজন, তুমি আমাকে এই বলে নিন্দা করছ যে—‘তুমি অন্যের সঙ্গে যুদ্ধে ব্যস্ত ছিলে, আর আমি তোমার সঙ্গে ছল করেছি’—তোমার এই অভিযোগে আমার বুদ্ধি বিভ্রান্ত হয়ে পড়েছে।

Verse 26

कवचं धुन्वतस्तुभ्यं रथं चारोहत: स्वयम्‌ । धनुर्ज्या कर्षतश्चैव युध्यतः सह शत्रुभि:

অর্জুন বললেন—তুমি নিজেই বর্ম ঝাঁকিয়ে রথে উঠেছিলে, ধনুকের জ্যা টেনে শত্রুসেনার মাঝখানে যুদ্ধ করছিলে। রথ, হাতি, অশ্বারোহী ও পদাতিকের ভিড়ে গম্ভীর সেই সেনা-সমুদ্রে—যেখানে উভয় পক্ষের সমবেত যোদ্ধারা পরস্পরকে নিধন করছিল—সেখানে কীভাবে বলা যায় যে এটি এক যোদ্ধার সঙ্গে এক যোদ্ধার ‘একক দ্বন্দ্ব’, যেন চারপাশের সংঘর্ষ থেকে বিচ্ছিন্ন?

Verse 27

एवं रथगजाकीर्णे हयपत्तिसमाकुले । सिंहनादोद्धतरवे गम्भीरे सैन्यसागरे

অর্জুন বললেন—রথ ও হাতিতে আচ্ছন্ন, অশ্বারোহী ও পদাতিকে গিজগিজ করা, সিংহনাদের মতো যুদ্ধঘোষের ভয়ংকর গর্জনে মুখর সেই গম্ভীর সেনা-সমুদ্রে—যেখানে স্বপক্ষ ও বিপক্ষের সমবেত বীরেরা পরস্পর ঘোর সংহারে লিপ্ত—সেখানেই তোমার সাত্বত সাত্যকির সঙ্গে প্রত্যক্ষ সংঘর্ষ হয়েছিল। এমন তুমুল যুদ্ধে কীভাবে বলা যায়, এটি ‘একজনের সঙ্গে একজনের’ একক দ্বন্দ্ব?

Verse 28

स्वै: परैश्न समेतेभ्य: सात्वतेन च संगमे । एकस्यैकेन हि कथं संग्राम: सम्भविष्यति

অর্জুন বললেন—যখন স্বজন ও শত্রু—উভয় পক্ষই একত্র ছিল, আর সেই সংঘর্ষেই তোমার সাত্বত সাত্যকির সঙ্গে মুখোমুখি হওয়া ঘটেছিল, তখন কীভাবে বলা যায় ‘একজনের সঙ্গে একজনের’ যুদ্ধ? এতজনের সমাবেশে চলা রণকোলাহলে ‘একক দ্বন্দ্ব’ কথাটি যুক্তিযুক্ত নয়।

Verse 29

बहुभि: सह संगम्य निर्जित्य च महारथान्‌ | श्रान्तश्न श्रान्तवाहश्न विमना: शस्त्रपीडित:

অর্জুন বললেন—অনেক যোদ্ধার সঙ্গে লড়ে এবং বহু মহারথীকে পরাজিত করে সাত্যকি ক্লান্ত হয়ে পড়েছে। তার ঘোড়ারাও পরিশ্রমে অবসন্ন, আর অস্ত্রাঘাতে জর্জরিত হয়ে সে বিমর্ষ ও বিষণ্ণ হয়েছে।

Verse 30

ईदृशं सात्यकिं संख्ये निर्जित्य च महारथम्‌ । अधिकत्वं विजानीषे स्ववीर्यवशमागतम्‌

অর্জুন বললেন—যুদ্ধক্ষেত্রে এমন অবস্থায় থাকা মহারথী সাত্যকিকে পরাজিত করে তুমি নিজেকে শ্রেষ্ঠ ভাবছ, যেন সে তোমারই বীর্য-পরাক্রমে বশীভূত হয়েছে।

Verse 31

यदिच्छसि शिरश्नलास्य असिना हन्तुमाहवे | तथा कृच्छूगतं चैव सात्यकिं क: क्षमिष्यति,इसलिये तुम युद्धस्थलमें तलवारसे उसका सिर काट लेना चाहते थे। सात्यकिको वैसे संकटमें देखकर मेरे पक्षका कौन वीर सहन करेगा?

যদি তুমি সত্যিই যুদ্ধে তলোয়ার দিয়ে তার শিরচ্ছেদ করে তাকে বধ করতে চাইতে, তবে সাত্যকিকে এমন বিপদে পড়তে দেখে আমাদের পক্ষের কোন বীর তা সহ্য করতে পারত?

Verse 32

त्वं वै विगर्हयात्मानमात्मानं यो न रक्षसि । कथं करिष्यसे वीर यो वा त्वां संश्रयेज्जन:

তুমি তো নিজেকেই নিন্দা করছ—যে নিজের রক্ষাও করতে পারে না। হে বীর, তবে যে তোমার আশ্রয়ে আসবে, তাকে তুমি কীভাবে রক্ষা করবে?

Verse 33

संजय उवाच एवमुक्तो महाबाहुर्यूपकेतुर्महायशा: । युयुधानं समुत्सृज्य रणे प्रायमुपाविशत्‌

সঞ্জয় বললেন—রাজন! অর্জুনের এমন কথা শুনে যূপচিহ্নধ্বজ মহাযশস্বী মহাবাহু ভূরিশ্রবা যুযুধান (সাত্যকি)-কে ছেড়ে দিয়ে যুদ্ধক্ষেত্রেই প্রায়—আমরণ অনশন—ব্রত গ্রহণ করে বসে পড়লেন।

Verse 34

शरानास्तीर्य सव्येन पाणिना पुण्यलक्षण: । यियासुर्ब्रह्य लोकाय प्राणान्‌ प्राणेष्वधाजुहोत्‌

পুণ্যলক্ষণ ভূরিশ্রবা বাম হাতে তীর বিছিয়ে, ব্রহ্মলোকে গমনেচ্ছায়, প্রাণায়ামের দ্বারা প্রাণকে প্রাণেই হোম করলেন।

Verse 35

सूर्य चक्षु: समाधाय प्रसन्न सलिले मन: । ध्यायन्‌ महोपनिषदं योगयुक्तो5भवन्मुनि:

তিনি দৃষ্টি সূর্যে স্থির করলেন এবং শান্ত মন নির্মল জলে নিবিষ্ট করলেন; মহোপনিষদে প্রতিপাদিত পরব্রহ্মকে ধ্যান করতে করতে তিনি যোগযুক্ত মুনি হয়ে উঠলেন।

Verse 36

ततः स सर्वसेनायां जन: कृष्णधनंजयौ । गर्हयामास तं॑ चापि शशंस पुरुषर्षभम्‌,तदनन्तर सारी कौरव-सेनाके लोग श्रीकृष्ण और अर्जुनकी निन्दा तथा नरश्रेष्ठ भूरिश्रवाकी प्रशंसा करने लगे

তখন সমগ্র সেনার মধ্যে লোকেরা শ্রীকৃষ্ণ ও ধনঞ্জয় (অর্জুন)-কে নিন্দা করতে লাগল, আর অপরদিকে সেই নরশ্রেষ্ঠকে প্রশংসা করতে লাগল।

Verse 37

निन्द्यमानौ तथा कृष्णौ नोचतु: किंचिदप्रियम्‌ । ततः प्रशस्यमानश्नव नाहृष्यद्‌ यूपकेतन:

এভাবে নিন্দিত হলেও সেই দুই কৃষ্ণ (শ্রীকৃষ্ণ ও অর্জুন) কোনো অপ্রিয় বাক্য উচ্চারণ করলেন না; আর প্রশংসিত হলেও ইউপকেতন (ভূরিশ্রবা) আনন্দে উচ্ছ্বসিত হলেন না।

Verse 38

उनके द्वारा निन्दित होनेपर भी श्रीकृष्ण और अर्जुनने कोई अप्रिय बात नहीं कही तथा प्रशंसित होनेपर भी यूपकेतु भूरिश्रवाने हर्ष नहीं प्रकट किया ।।

তাদের দ্বারা নিন্দিত হলেও শ্রীকৃষ্ণ ও অর্জুন কোনো অপ্রিয় কথা বললেন না; আর প্রশংসিত হলেও ইউপকেতু ভূরিশ্রবা আনন্দ প্রকাশ করলেন না। কিন্তু রাজন্, যখন আপনার পুত্ররাও ভূরিশ্রবার মতো নিন্দার বাক্য বলতে লাগল, তখন ধনঞ্জয় (অর্জুন) তাদের ও ভূরিশ্রবার সেই কথাগুলি মনে মনে সহ্য করতে পারলেন না।

Verse 39

असंक्रुद्धमना वाच: स्मारयन्निव भारत | उवाच पाण्डुतनय: साक्षेपमिव फाल्गुन:

হে ভারতনন্দন! পাণ্ডুপুত্র ফাল্গুন (অর্জুন) ক্রুদ্ধচিত্ত ছিলেন না; তিনি যেন পূর্বকথা স্মরণ করিয়ে কৌরবদের প্রতি তিরস্কারসূচকভাবে বললেন।

Verse 40

मम सर्वेडपि राजानो जानन्त्येव महाव्रतम्‌ । न शक्‍यो मामको हन्तुं यो मे स्थादू बाणगोचरे

“সমস্ত রাজাই আমার এই মহাব্রত জানেন—আমার তীরের পরিসরের মধ্যে যে আমার আপনজন থাকবে, তাকে কোনো শত্রু বধ করতে পারবে না।”

Verse 41

यूपकेतो निरीक्ष्यैतन्न मार्महसि गर्लितुम्‌ न हि धर्ममविज्ञाय युक्त गर्हयितुं परम्‌

সঞ্জয় বললেন— “হে ইউপকেতু! এ বিষয়টি ভেবে দেখো, আমাকে নিন্দা করা তোমার উচিত নয়। ধর্মের তত্ত্ব না জেনে অন্যকে দোষারোপ করা শোভন নয়।”

Verse 42

आत्तशस्त्रस्य हि रणे वृष्णिवीरं जिघांसत: । यदहं बाहुमच्छैत्सं न स धर्मो विगर्हित:

সঞ্জয় বললেন— “যুদ্ধে অস্ত্র হাতে তুমি বৃষ্ণিবীর সাত্যকিকে হত্যা করতে উদ্যত ছিলে। সেই অবস্থায় আমি যে তোমার বাহু কেটে দিয়েছি, তা নিন্দনীয় নয়; আশ্রয়প্রার্থীর রক্ষার্থে করা ধর্ম্য কর্ম।”

Verse 43

न्यस्तशस्त्रस्य बालस्य विरथस्य विवर्मण: । अभिमन्योर्व॑धं तात धार्मिक: को नु पूजयेत्‌

সঞ্জয় বললেন— “হে প্রিয়! বালক অভিমন্যু অস্ত্র ত্যাগ করেছিল, রথহীন ও বর্মহীন ছিল; এমন অবস্থায় তার বধকে কোন ধর্মাত্মা প্রশংসা করতে পারে?”

Verse 44

(दुर्योधनस्य क्षुद्रस्यथ न प्रमाणेडवतिष्ठत: । सौमदत्तेरव॑ध: साधु: स वै साहाय्यकारिण: ।।

অর্জুন বললেন— “যে ক্ষুদ্রচিত্ত দুর্যোধন শাস্ত্রসম্মত মর্যাদায় স্থিত নয়, তার সহায় ভেবে সোমদত্ত-পুত্র ভুরিশ্রবার এইরূপ বধ হওয়া যথার্থই হয়েছে। প্রাণসঙ্কট উপস্থিত হলে নিজের লোকদের রক্ষা করাই আমার দৃঢ় সংকল্প—বিশেষত সেই বীরদের, যারা আমার চোখের সামনে আঘাতে আঘাতে নিপতিত হচ্ছে। কুরুবংশীয় মহাত্মা ভুরিশ্রবা সাত্যকিকে বশে এনেছিল; তাই প্রতিজ্ঞা রক্ষার্থে আমি এই কর্ম করেছি।” সঞ্জয় বললেন— “হে রাজন! তখন পার্থ করুণায় বিগলিত, শোকে পীড়িত, নানা কথা ভেবে আবার কুরু ভুরিশ্রবাকে বললেন— ‘ধিক সেই ক্ষাত্রধর্ম, যার ফলে তুমি—পুরুষেশ্বর, শরণ্য ও শরণদাতা—এমন অবস্থায় পতিত হলে। যদি পূর্বপ্রতিজ্ঞা না থাকত, তবে আজ আমার মতো কোন পুরুষোত্তম তোমার মতো গুরুজনের উপর আঘাত করত?’ পার্থের এ কথা শুনে ভুরিশ্রবা মাথা দিয়ে ভূমি স্পর্শ করল এবং বাম হাতে নিজের ডান বাহু তুলে অর্জুনের দিকে নিক্ষেপ করল।”

Verse 45

एतत्‌ पार्थस्य तु वचस्तत: श्र॒ुत्वा महाद्युति: । यूपकेतुर्महाराज तूष्णीमासीदवाड्मुख:,महाराज! पार्थकी उपर्युक्त बात सुनकर यूप-चिह्लित ध्वजावाले महातेजस्वी भूरिश्रवा नीचे मुँह किये मौन रह गये

হে মহারাজ! পার্থের এই বাক্য শুনে ইউপকেতু—মহাতেজস্বী ভুরিশ্রবা—মুখ নত করে নীরব রইল।

Verse 46

अर्जुन उवाच या प्रीतिर्थर्मराजे मे भीमे च बलिनां वरे । नकुले सहदेवे च सा मे त्वयि शलाग्रज

অর্জুন বললেন—ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির, বলবানদের শ্রেষ্ঠ ভীম, এবং নকুল-সহদেবের প্রতি আমার যে স্নেহ, হে শালার অগ্রজ, সেই স্নেহই তোমার প্রতিও আমার আছে। যুদ্ধের উন্মত্ততার মধ্যেও আমি আত্মীয়সম মর্যাদা ও ক্ষত্রিয়-সম্মানের বন্ধন স্বীকার করি।

Verse 47

मया त्वं समनुज्ञात: कृष्णेन च महात्मना । गच्छ पुण्यकृताललोकान्‌ शिबिरौशीनरो यथा,मैं और महात्मा भगवान्‌ श्रीकृष्ण आपको यह आज्ञा देते हैं कि आप उशीनरपुत्र शिबिके समान पुण्यात्मा पुरुषोंके लोकोंमे जायेँ

অর্জুন বললেন—আমি এবং মহাত্মা কৃষ্ণ তোমাকে বিদায়ের অনুমতি দিলাম। এখন তুমি পুণ্যকর্মীদের লোকসমূহে গমন করো—উশীনরপুত্র শিবির ন্যায়।

Verse 48

वासुदेव उवाच ये लोका मम विमला: सकृद्‌ विभाता ब्रह्माद्ये: सुरवृषभैरपीष्यमाणा: । तान्‌ क्षिप्रं ब्रज सतताग्निहोत्रयाजिन्‌ मत्तुल्यो भव गरुडोत्तमाड्यान:

বাসুদেব বললেন—হে নিরন্তর অগ্নিহোত্রকারী! আমার সেই নির্মল লোকসমূহ চিরপ্রভাময়, যেগুলি লাভ করতে ব্রহ্মা প্রভৃতি দেবেশ্বর ও দেবশ্রেষ্ঠরাও সদা আকাঙ্ক্ষা করেন। তুমি শীঘ্রই সেই লোকসমূহে গমন করো; আমারই সমান হও—উত্তম গরুড়ের পৃষ্ঠে আরূঢ় হয়ে বিচরণকারী।

Verse 49

संजय उवाच उत्थित: स तु शैनेयो विमुक्त: सौमदत्तिना । खड्गमादाय चिच्छित्सु: शिरस्तस्य महात्मन:

সঞ্জয় বললেন—রাজন! সৌমদত্তপুত্র যখন শৈনেয় সাত্যকিকে ছেড়ে দিল, তখন সে উঠে দাঁড়াল। তারপর তলোয়ার হাতে নিয়ে সেই মহাত্মার মস্তক ছেদন করার সংকল্প করল।

Verse 50

निहतं पाण्डुपुत्रेण प्रसक्त भूरिदक्षिणम्‌ इयेष सात्यकिह्न्तुं शलाग्रजमकल्मषम्‌

সঞ্জয় বললেন—পাণ্ডুপুত্রের হাতে যুদ্ধে নিমগ্ন ভুরিদক্ষিণ নিহত হলে, শালার নিষ্কলঙ্ক অগ্রজ (ভুরিশ্রবা) সাত্যকিকে বধ করতে উদ্যত হল।

Verse 51

निकृत्तभुजमासीनं छिन्नहस्तमिव द्विपम्‌ । शलके बड़े भाई प्रचुर दक्षिणा देनेवाले भूरिश्रवा सर्वथा निष्पाप थे। पाण्डुपुत्र अर्जुनने उनकी बाँह काटकर उनका वध-सा ही कर दिया था और इसीलिये वे आमरण अनशनका निश्चय लेकर ध्यान आदि अन्य कार्योमें आसक्त हो गये थे। उस अवस्थामें सात्यकिने बाँह कट जानेसे सूँड़ कटे हाथीके समान बैठे हुए भूरिश्रवाको मार डालनेकी इच्छा की || ५०६ || क्रोशतां सर्वसैन्यानां निन्द्यमान: सुदुर्मना:

সঞ্জয় বললেন— যুদ্ধক্ষেত্রে ভুজা কর্তিত ভূরিশ্রবা শুঁড় কাটা হাতির মতো বসে ছিলেন। সমগ্র সেনা চিৎকার করে সেই কর্মের নিন্দা করতে লাগল; কিন্তু সাত্যকির মন ক্রোধে অন্ধকারাচ্ছন্ন হয়ে তাঁকে বধ করার সংকল্পে অগ্রসর হলেন। কৃষ্ণ, অর্জুন এবং উভয় পক্ষের বহু বীর তাঁকে নিবৃত্ত করতে চাইলেন, তবু সাত্যকি সমগ্র বাহিনীর আর্তনাদ উপেক্ষা করে নিরস্ত্র, ব্রতধারী ভূরিশ্রবাকে বধ করলেন—যা সর্বত্র নিন্দিত বলে গণ্য হল।

Verse 52

वार्यमाण: स कृष्णेन पार्थेन च महात्मना । भीमेन चक्ररक्षाभ्याम श्वत्थाम्ना कृपेण च

সঞ্জয় বললেন— কৃষ্ণ, মহাত্মা পার্থ (অর্জুন), ভীম, রথচক্রের দুই রক্ষক (যুধামন্যু ও উত্তমৌজা), অশ্বত্থামা এবং কৃপ—এঁরা সকলেই বাধা দিলেন, তবু সে নিবৃত্ত হল না। এ ছিল যুদ্ধধর্মের এক কঠোর সংকট: যেখানে মহাবীরেরা সংযমের কথা বলেন, সেখানেও ক্রোধের বেগ ও জনতার আর্তচিৎকার যোদ্ধাকে নিন্দিত কর্মের দিকে ঠেলে দেয়—বিশেষত যখন প্রতিপক্ষ ব্রতস্থ ও অসহায়।

Verse 53

कर्णेन वृषसेनेन सैन्धवेन तथैव च । विक्रोशतां च सैन्यानामवधीत्‌ तं धृतव्रतम्‌

সঞ্জয় বললেন— কর্ণ, বৃষসেন এবং সিন্ধুরাজ জয়দ্রথ প্রতিবাদ করলেও, আর সেনাবাহিনী আর্তচিৎকার করলেও, সাত্যকি তবু সেই দৃঢ়ব্রত ভূরিশ্রবাকে বধ করলেন। যুদ্ধক্ষেত্রে সকলেই দেখল—ক্রোধের বেগ কীভাবে ধর্মের বাঁধনও ছিন্ন করে।

Verse 54

प्रायोपविष्टाय रणे पार्थेन छिन्नबाहवे । सात्यकि: कौरवेयाय खड्गेनापाहरच्छिर:

সঞ্জয় বললেন— যুদ্ধক্ষেত্রে পার্থ (অর্জুন) যার বাহু কেটে দিয়েছিলেন এবং যে প্রায়োপবেশ (মৃত্যু পর্যন্ত উপবাস) ব্রত নিয়ে বসেছিল, সেই ভূরিশ্রবাকে সাত্যকি খড়্গাঘাতে শিরচ্ছেদ করলেন। মৃত্যুব্রতে স্থিত শত্রুকে বধ করা যুদ্ধধর্মের সীমা নিয়ে কঠোর প্রশ্ন তুলল।

Verse 55

-7““«मन्धनी0 ५ पी एक /ि ” कक कक * ब्की . नाभ्यनन्दन्त सैन्यानि सात्यकिं तेन कर्मणा । अर्जुनेन हतं॑ पूर्व यज्जघान कुरूद्गबहम्‌

সঞ্জয় বললেন— সেই কর্মের জন্য সেনারা সাত্যকিকে অভিনন্দন জানায়নি; কারণ তিনি কুরুদের শ্রেষ্ঠ ভূরিশ্রবাকে—যাকে অর্জুন আগেই প্রায় নিহত করে ফেলেছিলেন—পুনরায় বধ করেছিলেন। তাই এ বধকে বিজয়লাভ নয়, নিন্দিত কর্ম বলেই গণ্য করা হল।

Verse 56

सहस्राक्षसमं चैव सिद्धचारणमानवा: । भूरिश्रवसमालोक्य युद्धे प्रायगतं हतम्‌

সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধে প্রায় মৃত্যুর মুখে পৌঁছে নিহত ভুরিশ্রবাকে দেখে সিদ্ধ, চারণ, মানুষ এবং ইন্দ্রসম দেবগণও বিস্ময়ে তাকিয়ে রইল।

Verse 57

पक्षवादांश्व सुबहून्‌ प्रावदंस्तव सैनिका:

সঞ্জয় বললেন—আপনার সৈন্যরা সাত্যকির পক্ষে-বিপক্ষে বহু কথা বলল। শেষে তারা বলল—“এতে সাত্যকির কোনো দোষ নেই; যা হওয়ার তাই হয়েছে। অতএব মনে ক্রোধ রেখো না, কারণ ক্রোধই মানুষের জন্য সর্বাধিক দুঃখদায়ক।”

Verse 58

न वार्ष्णेयस्यापराधो भवितव्यं हि तत्‌ तथा । तस्मान्मन्युर्न व: कार्य: क्रोधो दुः:खतरो नृणाम्‌

সঞ্জয় বললেন—“বার্ষ্ণেয় সাত্যকির এতে কোনো অপরাধ নেই; এমনটাই হওয়ার ছিল। অতএব তোমরা রোষ কোরো না; কারণ ক্রোধ মানুষের জন্য অধিক দুঃখদায়ক।”

Verse 59

हन्तव्यश्वैव वीरेण नात्र कार्या विचारणा । विहितो हास्य धात्रैव मृत्यु: सात्यकिराहवे

সঞ্জয় বললেন—“বীরের হাতেই তার বধ হওয়ার ছিল; এতে বিচার-বিবেচনার অবকাশ নেই। বিধাতা যুদ্ধক্ষেত্রেই তার জন্য মৃত্যু নির্ধারিত করেছিলেন।”

Verse 60

सात्यकिरुवाच न हन्तव्यो न हन्तव्य इति यन्मां प्रभाषत । धर्मवादैरधर्मिष्ठा धर्मकज्चुकमास्थिता:

সাত্যকি বললেন—“অধর্মে স্থিত হয়েও ধর্মের আবরণ ধারণকারী পাপাত্মারা! তোমরা ধর্মের কথা সাজিয়ে বারবার আমাকে বলছ—‘মারো না, মারো না’—এখন আমার উত্তর শোনো।”

Verse 61

यदा बाल: सुभद्राया: सुतः शस्त्रविना कृत: । युष्माभिनििहतो युद्धे तदा धर्म: क्व वो गत:

সঞ্জয় বললেন—যখন তোমরা সুভদ্রার কিশোর পুত্র অভিমন্যুকে যুদ্ধে অস্ত্রহীন করে হত্যা করেছিলে, তখন তোমাদের ধর্ম কোথায় গিয়েছিল?

Verse 62

मया त्वेतत्‌ प्रतिज्ञातं क्षेपे कस्मिंश्षिदेव हि । यो मां निष्पिष्य संग्रामे जीवन्‌ हन्यात्‌ पदा रुषा

সঞ্জয় বললেন—আমি সত্যিই এই প্রতিজ্ঞা করেছিলাম—কোনো এক সময়—যে ব্যক্তি যুদ্ধে আমাকে পদদলিত করে তবু জীবিত থেকে ক্রোধে পা দিয়ে আমাকে আঘাত করবে…

Verse 63

चेष्टमानं प्रतीघाते सभुजं मां सचक्षुष:

সঞ্জয় বললেন—আমার বাহু এখনও আছে, আর আমার উপর যে আঘাত করা হয়েছে তার প্রতিশোধ নিতে আমি অবিরত চেষ্টা করে এসেছি। তবু তোমরা চোখ থাকা সত্ত্বেও যদি আমাকে মৃত বলে মনে করো, তবে তা তোমাদের বুদ্ধির জড়তাই প্রকাশ করে। হে কুরুশ্রেষ্ঠ বীরগণ! ভুরিশ্রবাকে বধ করে আমি প্রতিশোধ সম্পন্ন করেছি—আমার মতে তা সম্পূর্ণই যথোচিত।

Verse 64

मन्यध्वं मृत इत्येवमेतद्‌ वो बुद्धिलाघवम्‌ । युक्तो हास्य प्रतीघात: कृतो मे कुरुपुड्रवा:

সঞ্জয় বললেন—যদি তোমরা ভাবো, ‘এ তো নিশ্চয়ই মৃত’, তবে তা তোমাদের বিচারের অগভীরতাই। হে কুরুপুঙ্গবগণ! এখানে প্রতিঘাত যথার্থ ছিল; আমি ন্যায়সঙ্গতভাবে প্রতিশোধ নিয়েছি।

Verse 65

यत्‌ तु पार्थन मां दृष्टवा प्रतिज्ञामभिरक्षता | सखडूगो<स्य हतो बाहुरेतेनैवास्मि वज्चित:

কিন্তু পার্থ (অর্জুন) আমাকে বিপদে দেখে নিজের প্রতিজ্ঞা রক্ষা করতে ভুরিশ্রবার তলোয়ারসহ বাহু কেটে ফেলল। সেই কাজের ফলেই ভুরিশ্রবাকে নিজ হাতে বধ করার যশ থেকে আমি বঞ্চিত হলাম।

Verse 66

भवितव्यं हि यद्‌ भावि दैवं चेष्टयतीव च । सो<यं हतो विमर्देडस्मिन्‌ किमत्राधर्मचेष्टितम्‌

যা ঘটবার, তা-ই ঘটে; বিধিও যেন সেই অনুসারেই কর্মকে চালিত করে। সেই নিয়তি অনুসারেই এই সংঘর্ষে ভূরিশ্রবা নিহত হয়েছেন। তবে এতে অধর্মের চেষ্টাই বা কোথায়?

Verse 67

अपि चायं पुरा गीत: श्लोको वाल्मीकिना भुवि । न हन्तव्या: स्त्रिय इति यद्‌ ब्रवीषि प्लवड्भम

আরও, এই ভূমিতেই প্রাচীনকালে মহর্ষি বাল্মীকি এক শ্লোক গেয়েছিলেন—‘স্ত্রীদের হত্যা করা উচিত নয়।’ হে বানরযোদ্ধা! তুমি যখন এ কথা বলছ—

Verse 68

सर्वकालं मनुष्येण व्यवसायवता सदा । पीडाकरममित्राणां यत्‌ स्यात्‌ कर्तव्यमेव तत्‌

দৃঢ়প্রতিজ্ঞ ও উদ্যোগী মানুষের জন্য সর্বদা, সর্বকালে সেই কাজই কর্তব্য—যা শত্রুকে পীড়া দেয়।

Verse 69

संजय उवाच एवमुक्ते महाराज सर्वे कौरवपुड्रवा: । न सम किंचिदभाषन्त मनसा समपूजयन्‌

সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! এ কথা বলা হলে কৌরবদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ সকলেই কোনো উত্তর দিল না; তারা মনে মনে তাকে সম্মান করে প্রশংসা করল।

Verse 70

मन्त्राभिपूतस्य महाध्वरेषु यशस्विनो भूरिसहस्रदस्य च । मुनेरिवारण्यगतस्य तस्य न तत्र कश्चिद्‌ वधमभ्यनन्दत

মহাযজ্ঞে মন্ত্রাভিষেকে পবিত্র, যজ্ঞে সহস্র সহস্র দানদাতা, সর্বত্র খ্যাতিমান, এবং অরণ্যবাসী মুনির ন্যায় আসীন সেই ভূরিশ্রবার বধকে সেখানে কেউই অভিনন্দন করল না।

Verse 71

वर देनेवाले भूरिश्रवाका नीले केशोंसे अलंकृत तथा कबूतरके समान लाल नेत्रोंवाला वह कटा हुआ सिर ऐसा जान पड़ता था, मानो अश्वमेधके मेध्य अश्वका कटा हुआ मस्तक अग्निकुण्डके भीतर रखा गया हो

সঞ্জয় বললেন—বরদাতা ভূরিশ্রবার সেই কর্তিত মস্তক, নীলকেশে অলংকৃত এবং কবুতরের মতো লালচে নয়নবিশিষ্ট, এমনই প্রতীয়মান হচ্ছিল যেন অশ্বমেধযজ্ঞের মেধ্য অশ্বের কর্তিত শির অগ্নিকুণ্ডের মধ্যে স্থাপিত হয়েছে।

Verse 72

स तेजसा शस्त्रकृतेन पूतो महाहवे देहवरं विसृज्य । आक्रामदूर्ध्व वरदो वराहों व्यावृत्त्य धर्मेण परेण रोदसी

অস্ত্রের তেজে পবিত্র হয়ে সেই মহাযুদ্ধে তিনি উৎকৃষ্ট দেহ ত্যাগ করলেন। বরদাতা ও বরলাভের যোগ্য ভূরিশ্রবা পরম ধর্মের বলে পৃথিবী ও আকাশ অতিক্রম করে ঊর্ধ্বলোকের পথে উঠলেন।

Verse 73

सुनीलकेशं वरदस्य तस्य शूरस्य पारावतलोहिताक्षम्‌ | अश्वस्य मेध्यस्य शिरो निकृत्तं न्यस्तं हविर्धानमिवान्तरेण

সঞ্জয় বললেন—সেই বীর, বরদাতা ভূরিশ্রবার নীলকেশযুক্ত ও পারাবতের মতো লালচে নয়নবিশিষ্ট মস্তকটি, মেধ্য অশ্বের কর্তিত শিরের ন্যায় পৃথক করে রাখা ছিল—যেন হব্যধানে হব্য স্থাপিত হয়েছে।

Verse 143

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि भूरिश्रवोवधे त्रिचत्वारिंशदधिकशततमो< ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বে জয়দ্রথবধপর্বের অন্তর্গত ভূরিশ্রববধ-প্রসঙ্গে একশ তেতাল্লিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 153

एवमुक्तो रणे पार्थों भूरिश्रवसमब्रवीत्‌ | रणभूमिमें भूरिश्रवाके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उससे कहा

রণক্ষেত্রে এভাবে সম্বোধিত হয়ে পার্থ (অর্জুন) ভূরিশ্রবাকে বললেন।

Verse 196

वयस्यैरथ मित्रैश्व ते च बाहुं समाश्रिता: । क्षत्रियलोग अपने-अपने भाई

অর্জুন বললেন— নিজ নিজ ভাই, পিতা, পুত্র, আত্মীয়-স্বজন, কুলজন, সমবয়সী সঙ্গী ও বন্ধুদের দ্বারা পরিবেষ্টিত হয়ে ক্ষত্রিয়েরা শত্রুদের সঙ্গে রণক্ষেত্রে প্রবেশ করে যুদ্ধ করে। কিন্তু তারা সকলেই সেই শ্রেষ্ঠ যোদ্ধার বাহুবলের উপর নির্ভর করে, তাঁর পরাক্রমকেই আশ্রয় করে।

Verse 563

अपूजयन्त त॑ देवा विस्मितास्ते5स्य कर्मभि: । युद्धमें प्रायोपवेशन करनेवाले

সঞ্জয় বললেন— তাঁর কর্ম দেখে বিস্মিত হয়ে দেবতারা তাঁকে সম্মান জানালেন। রণক্ষেত্রে প্রায়োপবেশন গ্রহণ করে ইন্দ্রসম পরাক্রমী ভূরিশ্রবাকে নিহত হতে দেখে সিদ্ধ, চারণ, মানুষ ও দেবতারা তাঁর গুণগান করল; কারণ তাঁর মহান আচরণের মহিমায় তারা বিস্ময়ে অভিভূত হয়েছিল।

Verse 623

स मे वध्यो भवेच्छत्रुर्यद्यपि स्यान्मुनिव्रत: । मैंने तो पहलेसे ही यह प्रतिज्ञा कर रखी है कि जिसके द्वारा कभी भी मेरा तिरस्कार हो जायगा अथवा जो संग्रामभूमिमें मुझे पटककर जीते-जी रोषपूर्वक मुझे लात मारेगा

সঞ্জয় বললেন— “সে শত্রু আমার দ্বারা নিহত হবেই, সে মুনিদের ন্যায় মৌনব্রত পালন করে বসে থাকলেও। আমি পূর্বেই এই দৃঢ় প্রতিজ্ঞা করেছি—যে কেউ কখনও আমাকে অপমান করবে, অথবা রণক্ষেত্রে আমাকে ফেলে দিয়ে, আমি জীবিত থাকতেই ক্রোধে আমাকে লাথি মারবে—সে অবশ্যই আমার বধ্য।”

Frequently Asked Questions

The narrative frames the tension between eliminating a decisive commander for strategic necessity and the ethical weight of targeting a revered teacher-figure (ācārya), while both sides justify escalation through duty-based reasoning.

Collective outcomes in crisis are shaped less by isolated prowess than by coordination, timely intervention, and the cascading effects of intent; agency operates within networks of protection, counsel, and consequence.

No explicit phalaśruti is presented here; the chapter functions as narrative-ethical documentation, where significance arises from situating tactical decisions within the epic’s broader inquiry into duty, leadership, and moral cost.

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