
Droṇa’s Conditional Boon: The Plan to Capture Yudhiṣṭhira (द्रोणेन युधिष्ठिरग्रहणोपायः)
Upa-parva: Droṇābhiṣeka (Droṇa’s appointment as commander) — strategic objective of capturing Yudhiṣṭhira
Sañjaya reports to Dhṛtarāṣṭra the circumstances surrounding Droṇa’s rise to commander and the strategic deliberation that follows. Droṇa, honored with senāpati authority, offers Duryodhana a boon commensurate with the honor received. Duryodhana, consulting with allies, requests that Yudhiṣṭhira be brought alive. Droṇa interrogates the rationale—why capture rather than kill—implicitly acknowledging Yudhiṣṭhira’s reputation for non-hostility (ajātaśatru) and the political value of preserving a rival for negotiation or control. Duryodhana reveals a pragmatic calculus: killing Yudhiṣṭhira would provoke Arjuna into decisive retaliation, whereas capturing him could force a settlement or renewed exile through oath-bound mechanisms. Droṇa, recognizing the strategic intent, grants a conditional promise: Yudhiṣṭhira can be seized only if Arjuna is diverted from the field or separated from protective proximity. The chapter ends with Sañjaya noting that Duryodhana publicizes this objective across the army positions to reinforce resolve, despite the condition that makes the plan operationally complex.
Chapter Arc: धृतराष्ट्र, युद्ध-समाचार सुनते-सुनते, संजय से कहते हैं—अब मुझे बताओ: वह कौन-सा बल है जिसके सहारे पाण्डवों की आशा बढ़ती जाती है? और क्यों कौरवों की विजय किसी उपाय से दिखाई नहीं देती? → संजय धृतराष्ट्र के भय और जिज्ञासा को शांत करने के लिए श्रीकृष्ण की संक्षिप्त लीलाओं का स्मरण कराते हैं—गोपकुल में बाल्यकाल से ही उनकी अद्भुत शक्ति, यमुना-वन में अश्वराज का वध, और दूर-दूर के प्रदेशों (अवन्ती, दाक्षिणात्य, पर्वतीय, दशेरक, काश्मीरक, पिशाच, समुद्गल आदि) पर उनके प्रभाव/विजय का वर्णन। साथ ही अर्जुन की अपराजेयता और केशव के अमेय गुणों का प्रतिपादन होता है। → धृतराष्ट्र का निष्कर्ष कठोर होकर फूट पड़ता है—“किसी भी उपाय से कुरुओं की जय नहीं दिखती; हृषीकेश के कर्मों का अंत बुद्धि-पराक्रम से भी नहीं जाना जा सकता।” इसी बोध के साथ पराजय का छाया-निर्णय अध्याय का शिखर बनता है। → वृत्तांत युद्ध-रणनीति से अधिक ‘कारण’ पर टिकता है: कृष्ण-अर्जुन की महिमा के सामने कौरव-पक्ष की आशा क्षीण पड़ती है। धृतराष्ट्र के भीतर आत्मस्वीकृति उभरती है कि विनाश का बीज उनके ही पक्ष के अहं/द्वेष में था, और जो काल से परिपक्व है उसका वध तिनके से भी हो जाता है। → धृतराष्ट्र संजय से आग्रह करते हैं कि अब युद्ध का यथार्थ क्रम बताओ—आगे रणभूमि में क्या घटा, किस प्रकार घटनाएँ दैवयोग से ‘अन्यथा’ हो रही हैं?
Verse 1
भीकम (2 अमान एकादशोब< ध्याय: धृतराष्ट्रका भगवान् श्रीकृष्णकी संक्षिप्त लीलाओंका वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बताना धृतराष्ट्र रवाच शृणु दिव्यानि कर्माणि वासुदेवस्य संजय । कृतवान् यानि गोविन्दो यथा नान्य: पुमान् क्वचित्
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সঞ্জয়, বাসুদেবের পুত্র ভগবান শ্রীকৃষ্ণের দিব্য কর্মসমূহ শোনাও। গোবিন্দ যে যে কর্ম সম্পন্ন করেছেন, তেমন কর্ম আর কোনো মানুষ কোথাও করতে পারে না।
Verse 2
संवर्धता गोपकुले बालेनैव महात्मना । विख्यापितं बल बाद्दोस्त्रिषु लोकेषु संजय
বৈশম্পায়ন বললেন— গোপকুলে লালিত-পালিত হতে হতে, সেই মহাত্মা শৈশবেই, হে সঞ্জয়, নিজের বাহুবল ও বীর্যকে ত্রিলোকে প্রসিদ্ধ করে তুলেছিলেন।
Verse 3
उच्चै:श्रवस्तुल्यबलं वायुवेगसमं जवे । जघान हयराजं तं यमुनावनवासिनम्,यमुनाके तटवर्ती वनमें उच्चै:श्रवाकें समान बलशाली और वायुके समान वेगवान् अश्वराज केशी रहता था। उसे श्रीकृष्णने मार डाला
বৈশম্পায়ন বললেন— যমুনাতীরবর্তী বনে বাস করা সেই অশ্বরাজ কেশী উচ্চৈঃশ্রবার তুল্য বলবান এবং বায়ুর ন্যায় দ্রুতগামী ছিল; শ্রীকৃষ্ণ তাকে বধ করলেন।
Verse 4
दानवं घोरकर्माणं गवां मृत्युमिवोत्थितम् । वृषरूपधरं बाल्ये भुजाभ्यां निजघान ह
আরও এক দানব ছিল— ভয়ংকর কর্মে রত, গাভীদের জন্য যেন মৃত্যুরূপে উদিত; সে ষাঁড়ের রূপ ধারণ করে থাকত। শৈশবেই শ্রীকৃষ্ণ নিজের বাহুবলেই তাকে বধ করলেন।
Verse 5
प्रलम्बं नरकं जम्भं पीठं चापि महासुरम् | मुरं चान्तकसंकाशमवधीत् पुष्करेक्षण:,तत्पश्चात् कमलनयन श्रीकृष्णने प्रलम्ब, नरकासुर, जम्भासुर, पीठ नामक महान् असुर और यमराजसदृश मुरका भी संहार किया
তারপর পদ্মনয়ন পুষ্করেক্ষণ শ্রীকৃষ্ণ প্রলম্ব, নরক, জম্ভ, পীঠ নামক মহাসুর এবং অন্তকসম ভয়ংকর মুরকেও বধ করলেন।
Verse 6
तथा कंसो महातेजा जरासंधेन पालित: । विक्रमेणैव कृष्णेन सगण: पातितो रणे,इसी प्रकार श्रीकृष्णने पराक्रम करके ही जरासंधके द्वारा सुरक्षित महातेजस्वी कंसको उसके गणोंसहित रणभूमिमें मार गिराया
তেমনি জরাসন্ধের আশ্রয়ে রক্ষিত মহাতেজস্বী কংসকেও শ্রীকৃষ্ণ নিজের পরাক্রমে, তার অনুচরদেরসহ, রণক্ষেত্রে নিপাতিত করলেন।
Verse 7
सुनामा रणविक्रान्त: समग्राक्षीहिणीपति: । भोजराजस्य मध्यस्थो भ्राता कंसस्य वीर्यवान्
বৈশম্পায়ন বললেন—সুনামা নামে এক যোদ্ধা ছিলেন, যুদ্ধে অতি বিক্রান্ত; তিনি সম্পূর্ণ অক্ষৌহিণী সেনার অধিপতি, ভোজরাজের বিশ্বস্ত মধ্যস্থ, এবং কংসের পরাক্রমশালী ভ্রাতা।
Verse 8
बलदेवद्वितीयेन कृष्णेनामित्रघातिना । तरस्वी समरे दग्ध: ससैन्य: शूरसेनराट्
বৈশম্পায়ন বললেন—বলদেবকে সঙ্গে নিয়ে, শত্রুনাশক শ্রীকৃষ্ণ যুদ্ধক্ষেত্রে অপ্রতিরোধ্য তেজে দহন করলেন; আর শূরসেনদের রাজা সেনাসহ ভস্মীভূত হল।
Verse 9
शत्रुहन्ता श्रीकृष्णने बलरामजीके साथ जाकर युद्धमें पराक्रम दिखानेवाले, बलवान, वेगवान्, सम्पूर्ण अक्षौहिणी सेनाओंके अधिपति, भोजराज कंसके मझले भाई शूरसेन देशके राजा सुनामाको समरमें सेनासहित दग्ध कर डाला ।।
বৈশম্পায়ন বললেন—শত্রুহন্তা শ্রীকৃষ্ণ বলরামের সঙ্গে যুদ্ধে গিয়ে পরাক্রম প্রদর্শন করলেন। সমরে তিনি বলবান, দ্রুতগামী, সমগ্র অক্ষৌহিণী সেনার অধিপতি, ভোজরাজ কংসের মধ্যম ভ্রাতা ও শূরসেন দেশের রাজা সুনামাকে তার সেনাসহ দগ্ধ করে দিলেন। পরে পরম ক্রোধী ব্রহ্মর্ষি দুর্বাসাকে শ্রীকৃষ্ণ পত্নীসহ ভক্তিভরে সেবা-আরাধনা করলেন; সন্তুষ্ট হয়ে তিনি বহু বর দান করলেন।
Verse 10
तथा गान्धारराजस्य सुतां वीर: स्वयंवरे । निर्जित्य पृथिवीपालानावहत् पुष्करेक्षण:
বৈশম্পায়ন বললেন—তদ্রূপ, কমলনয়ন বীর পুষ্করেক্ষণ গন্ধাররাজের স্বয়ংবরে তাঁর কন্যাকে লাভ করলেন; এবং সমবেত রাজাদের পরাজিত করে তাঁকে বধূরূপে সঙ্গে নিয়ে গেলেন।
Verse 11
अमृष्यमाणा राजानो यस्य जात्या हया इव | रथे वैवाहिके युक्ता: प्रतोदेन कृतव्रणा:
বৈশম্পায়ন বললেন—অপমান সহ্য করতে না-পারা সেই রাজারা, স্বভাবতই উত্তম জাতের অশ্বের ন্যায়, তাঁর বিবাহ-রথে জোতা পড়ল এবং চাবুকের আঘাতে ক্ষতবিক্ষত হল।
Verse 12
जरासंध॑ महाबाहुमुपायेन जनार्दन: । परेण घातयामास समग्राक्षीहिणीपतिम्,जनार्दन श्रीकृष्णने समस्त अक्षौहिणी सेनाओंके अधिपति महाबाहु जरासंधको उपायपूर्वक दूसरे योद्धा (भीमसेन)-के द्वारा मरवा दिया
বৈশম্পায়ন বললেন— জনার্দন শ্রীকৃষ্ণ সরাসরি বলপ্রয়োগ না করে কৌশলে মহাবাহু, সমগ্র অক্ষৌহিণীর অধিপতি জরাসন্ধকে অন্য যোদ্ধা ভীমসেনের দ্বারা নিহত করালেন।
Verse 13
चेदिराजं च विक्रान्तं राजसेनापतिं बली । अर्घ्ये विवदमानं च जघान पशुवत् तदा,बलवान् श्रीकृष्णने राजाओंकी सेनाके अधिपति पराक्रमी चेदिराज शिशुपालको अग्रपूजनके समय विवाद करनेके कारण पशुकी भाँति मार डाला
বৈশম্পায়ন বললেন— তখন বলবান শ্রীকৃষ্ণ অর্ঘ্য-অর্পণের (অগ্রপূজা) সময় কলহ বাধানোর অপরাধে রাজসেনাপতি, বীর চেদিরাজ শিশুপালকে পশুর মতো বধ করলেন।
Verse 14
सौभ दैत्यपुरं खस्थं शाल्वगुप्तं दुरासदम् । समुद्रकुक्षौ विक्रम्य पातयामास माधव:
বৈশম্পায়ন বললেন— মাধব (শ্রীকৃষ্ণ) সমুদ্রের অন্তঃস্থলে প্রবেশ করে পরাক্রমে, শাল্ব-রক্ষিত, আকাশস্থিত দুরাসদ দানবনগর সৌভকে ভূপাতিত করলেন।
Verse 15
तत्पश्चात् माधवने आकाशमें स्थित रहनेवाले सौभ नामक दुर्धर्ष दैत्य-नगरको, जो राजा शाल्दद्वारा सुरक्षित था, समुद्रके बीच पराक्रम करके मार गिराया ।।
তারপর মাধব (শ্রীকৃষ্ণ) সমুদ্রের মাঝখানে পরাক্রম করে, শাল্ব-রক্ষিত, আকাশস্থিত দুর্ধর্ষ দানবনগর সৌভকে ধ্বংস করলেন। আর যুদ্ধে তিনি অঙ্গ, বঙ্গ, কলিঙ্গ, মগধ, কাশী, কোসল, এবং বৎস, গার্গ্য, করূষ ও পৌণ্ড্র প্রভৃতি জনপদকেও পরাজিত করলেন।
Verse 16
आन्न्त्यान् दाक्षिणात्यांश्न॒ पर्वतीयान् दशेरकान् । काश्मीरकानौरसिकान् पिशाचांश्व समुद्गलान्
বৈশম্পায়ন বললেন— হে সঞ্জয়, কমলনয়ন শ্রীকৃষ্ণ আান্ত্য, দক্ষিণদেশীয়, পার্বত্য, দশেরক, কাশ্মীর, ঔরসিক, পিশাচ ও মুদ্গল প্রভৃতি জনসমূহকে বশে আনলেন।
Verse 17
काम्बोजान् वाटधानांश्व चोलान् पाण्ड्यांश्व॒ संजय । त्रिगर्तान् मालवांश्वैव दरदांश्व॒ सुदुर्जयान्
বৈশম্পায়ন বললেন— হে সঞ্জয়! (শ্রীকৃষ্ণ) কাম্বোজ, বাটধান, চোল ও পাণ্ড্যদের; ত্রিগর্ত, মালব এবং অতিদুর্জয় দরদদেরও বশে আনলেন।
Verse 18
नानादिग्भ्यश्न सम्प्राप्तान् खशांश्चैव शकांस्तथा । जितवान् पुण्डरीकाक्षो यवनं च सहानुगम्
বৈশম্পায়ন বললেন— হে সঞ্জয়! নানা দিক থেকে আগত খশ ও শকগণকে পদ্মনয়ন (শ্রীকৃষ্ণ) জয় করলেন; আর অনুচরসহ যবনদেরও বশে আনলেন।
Verse 19
प्रविश्य मकरावासं यादोगणनिषेवितम् । जिगाय वरुणं संख्ये सलिलान्तर्गतं पुरा,पूर्वकालमें श्रीकृष्णने जल-जन्तुओंसे भरे हुए समुद्रमें प्रवेश करके जलके भीतर निवास करनेवाले वरुण देवताको युद्धमें परास्त किया
বৈশম্পায়ন বললেন— পূর্বকালে শ্রীকৃষ্ণ মকরদের আবাস, জলচরগণের দ্বারা পরিসেবিত সমুদ্রে প্রবেশ করে, জলের অন্তর্গত বরুণদেবকে যুদ্ধে পরাজিত করেছিলেন।
Verse 20
युधि पञ्चजन हत्वा दैत्यं पातालवासिनम् | पाज्चजन्यं हृषीकेशो दिव्यं शड्खमवाप्तवान्
বৈশম্পায়ন বললেন— যুদ্ধে পাতালবাসী পঞ্চজন নামক দৈত্যকে বধ করে হৃষীকেশ (শ্রীকৃষ্ণ) পাঞ্চজন্য নামক দিব্য শঙ্খ লাভ করেছিলেন।
Verse 21
इसी प्रकार हृषीकेशने पाताल-निवासी पंचजन नामक दैत्यको युद्धमें मारकर दिव्य पाज्चजन्य शंख प्राप्त किया ।।
বৈশম্পায়ন বললেন— খাণ্ডব বনে পার্থ (অর্জুন)-সহ হুতাশন (অগ্নিদেব)-কে সন্তুষ্ট করে মহাবলী হৃষীকেশ (শ্রীকৃষ্ণ) দুর্ধর্ষ আগ্নেয় অস্ত্র—চক্র—লাভ করেছিলেন।
Verse 22
वैनतेयं समारुह्य त्रासयित्वामरावतीम् | महेन्द्रभवनाद् वीर: पारिजातमुपानयत्,वीर श्रीकृष्ण गरुड़पर आरूढ़ हो अमरावती पुरीमें जाकर वहाँके निवासियोंको भयभीत करके महेन्द्रभवनसे पारिजात वृक्ष उठा ले आये
বীর শ্রীকৃষ্ণ বৈনতেয় (গরুড়) আরোহন করে অমরাবতীতে গিয়ে সেখানকার অধিবাসীদের মধ্যে ভয় সঞ্চার করলেন; তারপর মহেন্দ্রের প্রাসাদ থেকে পারিজাত বৃক্ষ নিয়ে এলেন।
Verse 23
तच्च मर्षितवान् शक्रो जानंस्तस्य पराक्रमम् | राज्ञां चाप्यजितं कज्चित् कृष्णेनेह न शुश्रुम
ইন্দ্র (শক্র) তাঁর পরাক্রম ভালোই জানতেন, তাই তিনি সবই নীরবে সহ্য করলেন। আর রাজাদের মধ্যে এমন কাউকে আমি শুনিনি, যাকে শ্রীকৃষ্ণ জয় করেননি।
Verse 24
यच्च तन्महदाक्षर्य सभायां मम संजय । कृतवान् पुण्डरीकाक्ष: कस्तदन्य इहाहति,संजय! उस दिन मेरी सभामें कमलनयन श्रीकृष्णने जो महान् आश्चर्य प्रकट किया था, उसे इस संसारमें उनके सिवा दूसरा कौन कर सकता है?
সঞ্জয়! সেদিন আমার সভায় পদ্মনয়ন শ্রীকৃষ্ণ যে মহা আশ্চর্য প্রকাশ করেছিলেন, এ জগতে তাঁকে ছাড়া আর কে তা করতে পারে?
Verse 25
यच्च भकक्त्या प्रसन्नो5हमद्राक्ष॑ कृष्णमी श्वरम् । तन्मे सुविदितं सर्व प्रत्यक्षमिव चागमम्
ভক্তিভাবে প্রসন্ন হয়ে আমি ভগবান শ্রীকৃষ্ণের যে ঐশ্বরিক রূপ দর্শন করেছিলাম, তা সবই আমার সুস্পষ্টভাবে জানা—আজও যেন প্রত্যক্ষের মতোই স্মরণে আছে।
Verse 26
नान्तो विक्रमयुक्तस्य बुद्धया युक्तस्य वा पुनः । कर्मणां शक््यते गन्तुं हृषीकेशस्थ संजय,संजय! बुद्धि और पराक्रमसे युक्त भगवान् हृषीकेशके कर्मोका अन्त नहीं जाना जा सकता
সঞ্জয়! বুদ্ধি ও পরাক্রমে সমন্বিত ভগবান হৃষীকেশের কর্মের শেষ সীমা জানা যায় না।
Verse 27
तथा गदश्न साम्बश्न प्रद्युम्नोडथ विदूरथ: । अगावहोडनिरुद्धश्ष चारुदेष्ण: ससारण:
বৈশম্পায়ন বললেন—তদ্রূপ গদ, সাম্ব; তারপর প্রদ্যুম্ন ও বিদূরথ; আগাবহ, অনিরুদ্ধ এবং সারণসহ চারুদেষ্ণ—এঁরাও সেই সমরে সমবেত হয়ে অবস্থান করলেন।
Verse 28
उल्मुको निशठश्वैव झिल्ली बश्रुश्न वीर्यवान् पृथुश्न विपृथुश्नमेव शमीको5थारिमेजय:
বৈশম্পায়ন বললেন—উল্মুক, নিষঠ এবং ঝিল্লী; পরাক্রমশালী বশ্রুশ্ন; পৃথুশ্ন ও বিপৃথুশ্ন; তারপর শমীক ও অরিমেজয়—এঁদের নাম ক্রমান্বয়ে উচ্চারিত হল।
Verse 29
एते<न्ये बलवन्तश्न वृष्णिवीरा: प्रहारिण: । कथंचित् पाण्डवानीकं श्रयेयु: समरे स्थिता:
বৈশম্পায়ন বললেন—এঁরা অন্যরাও বলবান, আঘাত-নিপুণ বৃষ্ণিবীর; সমরে স্থিত হয়ে কোনোভাবে পাণ্ডব-সেনার আশ্রয় নিতে পারেন।
Verse 30
आहूता वृष्णिवीरेण केशवेन महात्मना | ततः संशयितं सर्व भवेदिति मतिर्मम
বৈশম্পায়ন বললেন—বৃষ্ণিবীর মহাত্মা কেশব আমাকে আহ্বান করলে আমার মনে স্থির হল—এরপর সবই সংশয়ময় হয়ে উঠবে।
Verse 31
वनमाला और हल धारण करनेवाले वीर बलराम कैलास-शिखरके समान गौरवर्ण हैं। उनमें दस हजार हाथियोंका बल है। वे भी उसी पक्षमें रहेंगे, जहाँ श्रीकृष्ण हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—বনমালা-ভূষিত, হালধারী বীর বলরাম কৈলাস-শিখরের ন্যায় গৌরবর্ণ। তাঁর মধ্যে দশ হাজার হাতির বল। তিনিও যে পক্ষেই শ্রীকৃষ্ণ থাকবেন, সেই পক্ষেই অবস্থান করবেন।
Verse 32
यमाहु: सर्वपितरं वासुदेव॑ द्विजातय: । अपि वा होष पाण्डूनां योत्स्यते<र्थाय संजय
বৈশম্পায়ন বললেন— দ্বিজগণ বাসুদেবকে সকলের সর্বপিতা বলেন। অথবা, হে সংজয়, তিনি পাণ্ডবদের কল্যাণার্থে স্বয়ং যুদ্ধ করবেন।
Verse 33
संजय! जिन भगवान् वासुदेवको द्विजगण सबका पिता बताते हैं, क्या वे पाण्डवोंके लिये स्वयं युद्ध करेंगे? ।।
বৈশম্পায়ন বললেন— সংজয়, দ্বিজঋষিরা ভগবান বাসুদেবকে সকলের পিতা বলেন। তিনি যদি পাণ্ডবদের জন্য অস্ত্র ধারণ করেন, তবে কি তিনি নিজে যুদ্ধ করবেন না? কারণ, প্রিয় সংজয়, যখন শ্রীকৃষ্ণ পাণ্ডবদের হিতার্থে কবচ বেঁধে যুদ্ধে প্রস্তুত হন, তখন সেখানে কোনো যোদ্ধাই তাঁর বিরুদ্ধে দাঁড়াতে সক্ষম—বা দাঁড়াতে সাহসী—হয় না।
Verse 34
यदि सम कुरव: सर्वे जयेयुर्नाम पाण्डवान् | वार्ष्णेयो<र्थाय तेषां वै गृह्नीयाच्छस्त्रमुत्तमम्
বৈশম্পায়ন বললেন— যদি সকল কৌরব পাণ্ডবদের জয়ও করে ফেলে, তবু তাদের মঙ্গলার্থে বার্ষ্ণেয় শ্রীকৃষ্ণ নিশ্চয়ই শ্রেষ্ঠ অস্ত্র ধারণ করবেন।
Verse 35
ततः सर्वान् नरव्याप्रो हत्वा नरपतीन् रणे | कौरवांश्व महाबाहु: कुन्त्यै दद्यात् स मेदिनीम्,उस दशामें पुरुषसिंह महाबाहु श्रीकृष्ण सब राजाओं तथा कौरवोंको रणभूमिमें मारकर सारी पृथ्वी कुन्तीको दे देंगे
বৈশম্পায়ন বললেন— তখন সেই মহাবাহু নরসিংহ রণক্ষেত্রে সকল রাজা ও কৌরবদের বধ করে এই সমগ্র পৃথিবী কুন্তীকে দান করবেন।
Verse 36
यस्य यन्ता हृषीकेशो योद्धा यस्य धनंजय: । रथस्य तस्य कः संख्ये प्रत्यनीको भवेद् रथ:
যার সারথি হৃষীকেশ—ইন্দ্রিয়নিয়ন্তা—শ্রীকৃষ্ণ, আর যার যোদ্ধা ধনঞ্জয় অর্জুন, সেই রথের বিরুদ্ধে রণক্ষেত্রে আর কোন রথ প্রতিপক্ষ হয়ে দাঁড়াতে পারে?
Verse 37
न केनचिदुपायेन कुरूणां दृश्यते जय: । तस्मान्मे सर्वमाचक्ष्व यथा युद्धमवर्तत,किसी भी उपायसे कौरवोंकी जय होती नहीं दिखायी देती। इसलिये तुम मुझसे सब समाचार कहो। वह युद्ध किस प्रकार हुआ?
কোনো উপায়েই কৌরবদের জয় সম্ভব বলে দেখা যাচ্ছে না। অতএব তুমি আমাকে সব কথা সম্পূর্ণভাবে বলো—সে যুদ্ধ কীভাবে সংঘটিত হয়েছিল?
Verse 38
अर्जुन: केशवस्यात्मा कृष्णो5प्यात्मा किरीटिन: । अर्जुने विजयो नित्यं कृष्णे कीर्तिश्व शाश्वती
অর্জুন যেন কেশবেরই আত্মা, আর কৃষ্ণও যেন মুকুটধারী অর্জুনেরই আত্মা। অর্জুনে বিজয় চিরস্থায়ী; কৃষ্ণে কীর্তি অক্ষয় ও শাশ্বত।
Verse 39
सर्वेष्वपि च लोकेषु बीभत्सुरपराजित: । प्राधान्येनेव भूयिष्ठममेया: केशवे गुणा:
সমস্ত লোকেই বীভৎসু (অর্জুন) কোথাও পরাজিত হননি। কেশব (শ্রীকৃষ্ণ)-এর গুণ অপরিমেয়; এখানে যেন কেবল প্রধান গুণগুলিরই নাম করা হয়েছে।
Verse 40
मोहाद् दुर्योधन: कृष्णं यो न वेत्तीह केशवम् | मोहितो दैवयोगेन मृत्युपाशपुरस्कृत:,दुर्योधन मोहवश सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् केशवको नहीं जानता है, वह दैवयोगसे मोहित हो मौतके फंदेमें फँस गया
মোহের বশে দুর্যোধন এখানে কেশব কৃষ্ণকে চিনতে পারে না। ভাগ্যের যোগে বিভ্রান্ত হয়ে সে মৃত্যুর ফাঁস সামনে রেখে এগিয়ে চলেছে।
Verse 41
न वेद कृष्णं दाशार्हमर्जुनं चैव पाण्डवम् । पूर्वदेवी महात्मानौ नरनारायणावुभौ
সে দাশার্হবংশীয় কৃষ্ণকে এবং পাণ্ডব অর্জুনকেও চিনতে পারেনি—এই দুই মহাত্মা, যারা পূর্বকালে নর-নারায়ণ নামে দিব্য যুগল ছিলেন।
Verse 42
यह दशा्कुलभूषण श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुनको नहीं जानता है, वे दोनों पूर्वदेवता महात्मा नर और नारायण हैं ।। एकात्मानौ द्विधाभूतौ दृश्येते मानवैर्भुवि । मनसा5पि हि दुर्धर्षा सेनामेतां यशस्विनौ
বৈশম্পায়ন বললেন—যে যাদবকুল-ভূষণ শ্রীকৃষ্ণ ও পাণ্ডুপুত্র অর্জুনকে চিনতে পারে না, সে তাদের প্রকৃত তত্ত্ব জানে না। তারা দু’জনই প্রাচীন দিব্য সত্তা, মহাত্মা নর ও নারায়ণ। এক আত্মা হয়েও তারা পৃথিবীতে মানুষের চোখে দুই রূপে প্রকাশিত; আর সেই যশস্বী যুগল কেবল মনঃসংকল্পেই এই সমগ্র সেনার পক্ষে অদম্য।
Verse 43
युगस्येव विपर्यासो लोकानामिव मोहनम्
যেন যুগধর্মই উল্টে গেল—আর লোকসমাজ মোহে আচ্ছন্ন হলো।
Verse 44
न होव ब्रह्मचर्येण न वेदाध्यपयनेन च
না কেবল ব্রহ্মচর্য পালনে, না-ই বা বেদ অধ্যাপনে…
Verse 45
लोकसम्भावितौ वीरीौ कृतास्त्रौ युद्धदुर्मदौ
সেই দুই বীর লোকের কাছে খ্যাত ও সম্মানিত ছিলেন; অস্ত্রবিদ্যায় সম্পূর্ণ প্রশিক্ষিত, আর যুদ্ধের দম্ভে উন্মত্ত—রণে প্রখর, দমন করা দুঃসাধ্য।
Verse 46
यां तां श्रियमसूयाम: पुरा दृष्टवा युधिषछ्टिरे
হে যুধিষ্ঠির, সেই ঐশ্বর্য ও শ্রীই—যা একদা দেখে আমরা ঈর্ষাও করেছিলাম—
Verse 47
मत्कृते चाप्यनुप्राप्त: कुरूणामेष संक्षय:
আর আমার কারণেও কুরুদের এই সংহার উপস্থিত হয়েছে।
Verse 48
अनन्तमिदमैश्वर्य लोके प्राप्तो युधिष्ठिर:
যুধিষ্ঠির এই জগতে অনন্ত ঐশ্বর্য লাভ করেছেন।
Verse 49
यस्य कोपान्महात्मानौ भीष्मद्रोणौ निपातितौ । युधिष्ठिर इस संसारमें अनन्त ऐश्वर्यके भागी हुए हैं। जिनके कोपसे महात्मा भीष्म और द्रोण मार गिराये गये ।। प्राप्त: प्रकृतितो धर्मो न धर्मो मामकान् प्रति
যাঁর ক্রোধে মহাত্মা ভীষ্ম ও দ্রোণ পতিত হলেন, সেই যুধিষ্ঠিরই এই জগতে অনন্ত ঐশ্বর্যের অংশী হলেন। কিন্তু যে ধর্ম স্বভাবতই প্রাপ্ত, তা আমার আপনজনদের প্রতি ধর্ম হয়ে দাঁড়ায় না।
Verse 50
क्रूर: सर्वविनाशाय कालो5सौ नातिवर्तते । युधिष्ठटिरको धर्मका स्वाभाविक फल प्राप्त हुआ है, किंतु मेरे पुत्रोंकी उसका फल नहीं मिल रहा है। सबका विनाश करनेके लिये प्राप्त हुआ यह क्रूर काल बीत नहीं रहा है ।।
সকলের বিনাশ সাধনের জন্য উপস্থিত এই নিষ্ঠুর কাল অতিক্রান্ত হচ্ছে না। যুধিষ্ঠির ধর্মের স্বাভাবিক ফল লাভ করেছেন, কিন্তু আমার পুত্রেরা তার ফল পাচ্ছে না। সর্বনাশের জন্য আগত এই নিষ্ঠুর কাল সরে যায় না। নচেৎ, হে তাত, মনস্বী মানুষেরা যে ফল কল্পনা করেছিল, তা অন্যরূপ হতো।
Verse 51
तस्मादपरिहार्ये<र्थे सम्प्राप्ते कृच्छू उत्तमे । अपारणीये दुश्निन्त्ये यथाभूत॑ प्रचक्ष्य मे,अतः इस अनिवार्य, अपार, दुश्निन्त्य एवं महान् संकटके प्राप्त होनेपर जो घटना जिस प्रकार हुई हो, वह मुझे बताओ
অতএব, যখন এই অনিবার্য বিষয়—অত্যন্ত কঠিন সংকট, অপরিমেয় ও দুর্বোধ্য—উপস্থিত হয়েছে, তখন যা যেমন ঘটেছে, ঠিক তেমনই আমাকে বলো।
Verse 331
यदि गद, साम्ब, प्रद्युम्न, विदूरथ, अगावह, अनिरुद्ध, चारुदेष्ण, सारण, उल्मुक, निशठ, झिल्ली, पराक्रमी बश्रु, पृथु, विपृथु, शमीक तथा अरिमेजय--ये तथा दूसरे भी बलवान एवं प्रहारकुशल वृष्णिवंशी योद्धा वृष्णिवंशके प्रमुख वीर महात्मा केशवके बुलानेपर पाण्डव-सेनामें आ जायेँ और समरभूमिमें खड़े हो जायेँ तो हमारा सारा उद्योग संशयमें पड़ जाय; ऐसा मेरा विश्वास है ।। नागायुतबलो वीर: कैलासशिखरोपम: । वनमाली हली रामस्तत्र यत्र जनार्दन:
বৈশম্পায়ন বললেন— যদি গদ, সাম্ব, প্রদ্যুম্ন, বিদূরথ, আগাবহ, অনিরুদ্ধ, চারুদেষ্ণ, সারণ, উল্মুক, নিশঠ, ঝিল্লী, পরাক্রমী বশ্রু, পৃথু, বিপৃথু, শমীক ও আরিমেজয়—এবং আরও অন্যান্য বলবান, আঘাত-কুশলী বৃষ্ণিবংশীয় যোদ্ধারা—মহাত্মা কেশবের আহ্বানে পাণ্ডব-সেনায় এসে রণক্ষেত্রে দাঁড়ায়, তবে আমাদের সমস্ত উদ্যোগই সংশয়ে পড়বে; এ আমার দৃঢ় বিশ্বাস। দশ সহস্র নাগের ন্যায় বলবান, বীর, কৈলাস-শিখরের তুল্য—বনমালাধারী, হলধারী রাম সেখানে আছেন, যেখানে জনার্দন আছেন।
Verse 423
नाशयेतामिहेच्छन्तौ मानुषत्वाच्च नेच्छत: । उनकी आत्मा तो एक है; परंतु इस भूतलके मनुष्योंको वे शरीरसे दो होकर दिखायी देते हैं। उन्हें मनसे भी पराजित नहीं किया जा सकता। वे यशस्वी श्रीकृष्ण और अर्जुन यदि इच्छा करें तो मेरी सेनाको तत्काल नष्ट कर सकते हैं; परंतु मानवभावका अनुसरण करनेके कारण ये वैसी इच्छा नहीं करते हैं
বৈশম্পায়ন বললেন— তাঁরা ইচ্ছা করলে এখানেই সবকিছু ধ্বংস করতে পারেন; কিন্তু মানব-ধর্মের অনুগামী হওয়ায় তাঁরা তেমন ইচ্ছা করেন না। প্রকৃতপক্ষে তাঁদের আত্মা এক, কিন্তু এই পৃথিবীতে মানুষ তাঁদের দুই দেহরূপে দেখে। মন দিয়েও তাঁদের পরাজিত করা যায় না। সেই যশস্বী শ্রীকৃষ্ণ ও অর্জুন ইচ্ছা করলে মুহূর্তেই আমার সেনাকে বিনাশ করতে পারেন; কিন্তু মানব-আচরণ অনুসরণ করে তাঁরা তেমন ইচ্ছা পোষণ করেন না।
Verse 436
भीष्मस्य च वधस्तात द्रोणस्य च महात्मन: । तात! भीष्म तथा महात्मा द्रोणका वध युगके उलट जानेकी-सी बात है। सम्पूर्ण लोकोंको यह घटना मानो मोहमें डालनेवाली है
বৈশম্পায়ন বললেন— হে প্রিয়, ভীষ্মের এবং মহাত্মা দ্রোণের বধ যেন যুগ উল্টে যাওয়ার মতো। এই ঘটনা সমস্ত লোককে মোহাচ্ছন্ন করে দেয়।
Verse 443
न क्रियाभिरनन चास्त्रेण मृत्यो: कश्षिन्निवार्यते जान पड़ता है, कोई भी न तो ब्रह्मचर्यके पालनसे, न वेदोंके स्वाध्यायसे, न कर्मोके अनुष्ठानसे और न अस्त्रोंके प्रयोगसे ही अपनेको मृत्युसे बचा सकता है
বৈশম্পায়ন বললেন— কেউই মৃত্যুকে ঠেকাতে পারে না—না যজ্ঞাদি ক্রিয়ায়, না অস্ত্রের প্রয়োগে। না ব্রহ্মচর্য পালনে, না বেদের স্বাধ্যায়ে, না কর্মানুষ্ঠানে—কোনো উপায়েই প্রাণের নির্ধারিত অন্ত রোধ করা যায় না; কালের বিধান কেউ অতিক্রম করতে পারে না।
Verse 453
भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा कि नु जीवामि संजय । संजय! लोकसम्मानित, अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा युद्धदुर्मद वीरवर भीष्म और द्रोणाचार्यके मारे जानेका समाचार सुनकर मैं किसलिये जीवित रहूँ?
বৈশম্পায়ন বললেন— সঞ্জয়! ভীষ্ম ও দ্রোণ নিহত হয়েছেন—এ সংবাদ শুনে আমি কেন বেঁচে থাকব? সঞ্জয়, তাঁরা দু’জনই লোকসম্মানিত, অস্ত্রবিদ্যায় পারদর্শী, এবং যুদ্ধগর্বে উন্মত্ত শ্রেষ্ঠ বীর—তাঁদের বধের কথা শুনে আমি আর কী কারণে প্রাণ ধারণ করব?
Verse 463
अद्य तामनुजानीमो भीष्मद्रोणवधेन ह । पूर्वकालमें राजा युधिष्ठिरके पास जिस प्रसिद्ध राजलक्ष्मीको देखकर हमलोग उनसे डाह करने लगे थे, आज भीष्म और द्रोणाचार्यके वधसे हम उसके कटु फलका अनुभव कर रहे हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—আজ আমাদের তা মেনে নিতেই হবে—ভীষ্ম ও দ্রোণের বধের ফলে। একদা রাজা যুধিষ্ঠিরের প্রসিদ্ধ রাজলক্ষ্মী দেখে আমরা ঈর্ষায় দগ্ধ হয়েছিলাম; আজ সেই ঈর্ষার তিক্ত ফল ভীষ্ম ও দ্রোণাচার্যের মৃত্যুর দ্বারা আমরা আস্বাদন করছি।
Verse 473
पक्वानां हि वधे सूत वज्ायन्ते तृणान्युत । सूत! मेरे ही कारण यह कौरवोंका विनाश प्राप्त हुआ है। जो कालसे परिपक्व हो गये हैं, उनके वधके लिये तिनके भी वज्रका काम करते हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—হে সূত! যারা মৃত্যুর জন্য পরিপক্ব, তাদের বিনাশে তৃণও বজ্রসম হয়ে ওঠে। সত্যই আমার কারণেই কৌরবদের সর্বনাশ এসে পড়েছে; যাদের কাল পরিপক্ব করেছে, তাদের জন্য সামান্যতম কারণও অপ্রতিরোধ্য নিয়তির অস্ত্র হয়ে দাঁড়ায়।
Verse 506
अन्यथैव प्रपद्यन्ते दैवादिति मतिर्मम । तात! मनस्वी पुरुषोंद्वारा अन्य प्रकारसे सोचे हुए कार्य भी दैवयोगसे कुछ और ही प्रकारके हो जाते हैं; ऐसा मेरा अनुभव है
বৈশম্পায়ন বললেন—আমার বিশ্বাস, দৈববলে সবই অন্যরূপে ঘটে। বৎস! দৃঢ়চিত্ত পুরুষ যে কর্ম যেমনভাবে ভেবে রাখে, দৈবযোগে তা প্রায়ই সম্পূর্ণ ভিন্নভাবে পরিণত হয়—এটাই আমার অভিজ্ঞতা।
The dilemma concerns legitimizing an objective framed as restraint (capture alive) while still instrumentalizing a righteous king for political control, raising the question of whether a less-lethal aim is ethically sound when pursued for coercive ends.
The passage teaches that power must acknowledge constraints: even the most celebrated warrior cannot guarantee outcomes against superior counter-force (Arjuna), and policy claims must be conditional on real capacities rather than on prestige or desire.
No explicit phalaśruti appears; the meta-commentary is structural—Sañjaya’s framing emphasizes how stated intentions, conditional promises, and public proclamations shape collective action and foreshadow later consequences.
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