
Āśvamedhika Parva, Adhyāya 77 — Saindhava resistance, Arjuna’s restraint, and Duḥśalā’s supplication
Upa-parva: Aśvamedha-anuyātrā (Arjuna’s escort of the sacrificial horse) — Saindhava-śamana episode
Vaiśaṃpāyana describes Arjuna standing formidable in battle as Saindhava fighters re-form and discharge dense volleys of arrows. Arjuna addresses them with controlled speech, urging them to exert their full strength while indicating he will subdue their arrogance; however, he simultaneously recalls Yudhiṣṭhira’s injunction that rival kṣatriyas seeking victory should be conquered rather than killed. He frames a conditional surrender logic: he will not harm women and children, and any combatant who declares submission is to be treated as defeated rather than destroyed. The Saindhavas escalate with arrows, spears, and śaktis; Arjuna neutralizes the projectiles mid-flight and disables many opponents with precise strikes, producing disorder and retreat. Observing her forces exhausted, Duḥśalā (daughter of Dhṛtarāṣṭra) arrives with her grandson to seek peace; Arjuna lowers his bow and receives her formally. She explains that her son Suratha died from grief upon hearing of Arjuna’s approach and his father’s death; she appeals for compassion, invoking familial ties, Gandhārī and Dhṛtarāṣṭra, and the innocence of the child. Arjuna, grieving and condemning the prior political greed that led to mass destruction, grants reconciliation, consoles Duḥśalā, and releases her. The Saindhava conflict is thus resolved without annihilation, and Arjuna resumes the Aśvamedha horse’s onward course, eventually approaching Maṇipūra’s region.
Chapter Arc: यज्ञ का अश्व, श्वेतवाहन अर्जुन के संरक्षण में, सैन्धव-देश की सीमा में प्रवेश करता है—और पुराने अपमान की ज्वाला से क्षत्रिय-राजा क्रोध में उठ खड़े होते हैं। → सैन्धव नरेश, जो पहले अर्जुन से पराजित हो चुके थे, इस बार संगठित होकर उसे चारों ओर से घेर लेते हैं। वे ऐसे तीक्ष्ण बाण-वर्षा करते हैं जो हाथियों की गति भी रोक दे; अर्जुन क्षण-क्षण शर-जाल में ढँकता जाता है और रणभूमि में हाहाकार फैलता है। → अर्जुन, शरों से आच्छादित होकर भी, पिंजरे में फुदकते पक्षी-सा मार्ग खोजता हुआ, अपनी दिव्य धनुर्विद्या से मेघ-जाल समान सेना को शर-वृष्टि से विदीर्ण कर देता है—और शरत्कालीन सूर्य की भाँति पुनः प्रकाशमान होकर घेरा तोड़ देता है। → सैन्धवों की संयुक्त घेराबंदी टूटती है; अर्जुन का पराक्रम पुनः स्थापित होता है और यज्ञाश्व सुरक्षित आगे बढ़ता है। → पराजित सैन्धव-राजा और उनके सहयोगी आगे कौन-सा छल या नया संघटन करेंगे—यह प्रश्न अगले प्रसंग की ओर धकेलता है।
Verse 1
ऑपन-माज बछ। डे सप्तसप्ततितमो<ध्याय: अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध वैशम्पायन उवाच (जित्वा प्रसाद्य राजानं भगदत्तसुतं तदा । विसृज्य याते तुरगे सैन्धवान् प्रति भारत ।।) सैन्धवैरभवद् युद्ध ततस्तस्य किरीटिन: । हतशेषैर्महाराज हतानां च सुतैरपि,वैशम्पायनजी कहते हैं--भरतनन्दन! महाराज भगदत्तके पुत्र राजा वज्रदत्तको पराजित और प्रसन्न करनेके पश्चात् उसे विदा करके जब अर्जुनका घोड़ा सिंधुदेशमें गया, तब महाभारत-युद्धमें मरनेसे बचे हुए सिंधुदेशीय योद्धाओं तथा मारे गये राजाओंके पुत्रोंके साथ किरीटधारी अर्जुनका घोर संग्राम हुआ
বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভারতনন্দন! ভগদত্তপুত্র রাজা বজ্রদত্তকে জয় করে পরে সান্ত্বনা দিয়ে বিদায় দেওয়ার পর, যখন (অশ্বমেধের) অশ্ব সিন্ধুদেশের দিকে অগ্রসর হল, তখন কিরীটধারী অর্জুনের সঙ্গে সিন্ধুর সেই যোদ্ধাদের—যারা মহাভারত-যুদ্ধে অবশিষ্ট ছিল—এবং নিহত রাজাদের পুত্রদেরও, ভয়ংকর যুদ্ধ সংঘটিত হল।
Verse 2
तेडवतीर्णमुपश्रुत्य विषयं श्वेतवाहनम् । प्रत्युद्ययुरमृष्यन्तो राजान: पाण्डवर्षभम्,यज्ञके घोड़ेको और श्वेतवाहन अर्जुनको अपने राज्यके भीतर आया हुआ सुनकर वे सिंधुदेशीय क्षत्रिय अमर्षमें भरकर उन पाण्डवप्रवर अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े
যজ্ঞাশ্ব এবং শ্বেতবাহন অর্জুনকে নিজেদের রাজ্যে প্রবেশ করেছে শুনে, সিন্ধুদেশীয় ক্ষত্রিয় রাজারা ক্রোধে ফেটে পড়ে পাণ্ডবশ্রেষ্ঠ অর্জুনের মোকাবিলায় অগ্রসর হল।
Verse 3
अश्वृं च तं परामृश्य विषयान्ते विषोपमा: । न भयं चक्रिरे पार्थाद् भीमसेनादनन्तरात्,वे विषके समान भयंकर क्षत्रिय अपने राज्यके भीतर आये हुए उस घोड़ेकी पकड़कर भीमसेनके छोटे भाई अर्जुनसे तनिक भी भयभीत नहीं हुए
বৈশম্পায়ন বললেন—নিজেদের রাজ্যসীমার মধ্যে সেই যজ্ঞীয় অশ্বকে ধরে বিষের মতো ভয়ংকর সেই ক্ষত্রিয়েরা ভীমসেনের অনুজ পার্থ অর্জুনকে একেবারেই ভয় করল না।
Verse 4
तेडविदूराद् धनुष्पाणिं यज्ञियस्थ हयस्य च । बीभत्सुं प्रत्यपद्यन्त पदातिनमवस्थितम्,यज्ञसम्बन्धी घोड़ेसे थोड़ी ही दूरपर अर्जुन हाथमें धनुष लिये पैदल ही खड़े थे। वे सभी क्षत्रिय उनके पास जा पहुँचे
বৈশম্পায়ন বললেন—যজ্ঞীয় অশ্বের অল্প দূরেই ধনুক হাতে পদাতিকরূপে স্থিত ভীভৎসু অর্জুনকে দেখে সেই ক্ষত্রিয়েরা তাঁর নিকট উপস্থিত হল।
Verse 5
ततस्ते त॑ं महावीर्या राजान: पर्यवारयन् । जिगीषन्तो नरव्याप्रं पूर्व विनिकृता युधि,वे महापराक्रमी क्षत्रिय पहले युद्धमें अर्जुनसे परास्त हो चुके थे और अब उन पुरुषसिंह पार्थको जीतना चाहते थे। अतः उन सबने उन्हें घेर लिया
বৈশম্পায়ন বললেন—তখন মহাবীর্য সেই রাজারা, যারা পূর্বে যুদ্ধে পরাভূত হয়েছিল, মানুষ-ব্যাঘ্র পার্থকে জয় করতে উদ্যত হয়ে তাকে চারিদিক থেকে ঘিরে ফেলল।
Verse 6
ते नामान्यपि गोत्राणि कर्माणि विविधानि च । कीर्तयन्तस्तदा पार्थ शरवर्षैरवाकिरन्,वे अर्जुनसे अपने नाम, गोत्र और नाना प्रकारके कर्म बताते हुए उनपर बाणोंकी बौछार करने लगे
বৈশম্পায়ন বললেন—হে পার্থ! তারা নিজেদের নাম, গোত্র ও নানাবিধ কীর্তি উচ্চারণ করতে করতে তখনই তোমার উপর তীরের বর্ষা নিক্ষেপ করল।
Verse 7
ते किरन्त: शरव्रातान् वारणप्रतिवारणान् । रणे जयमभीप्सन्त: कौन्तेयं पर्यवारयन् ७ ।। वे ऐसे बाणसमूहोंकी वर्षा करते थे, जो हाथियोंको भी आगे बढ़नेसे रोक देनेवाले थे। उन्होंने रणभूमिमें विजयकी अभिलाषा रखकर कुन्तीकुमारको घेर लिया
বৈশম্পায়ন বললেন—তারা এমন তীরসমূহ বর্ষণ করছিল যা হাতির অগ্রগমনও রোধ করতে পারে; রণে জয়ের বাসনায় তারা কুন্তীপুত্রকে চারিদিক থেকে ঘিরে ফেলল।
Verse 8
ते समीक्ष्य च तं कृष्णमुग्रकर्माणमाहवे । सर्वे युयुधिरे वीरा रथस्थास्तं पदातिनम्,युद्धमें भयानक कर्म करनेवाले अर्जुनको पैदल देखकर वे सभी वीर रथपर आरूढ़ हो उनके साथ युद्ध करने लगे
যুদ্ধে ভয়ংকর কর্মে প্রবৃত্ত সেই কৃষ্ণ (অর্জুন)-কে পদাতিক দেখে, সকল বীর রথারূঢ় হয়ে তার সঙ্গে যুদ্ধ করতে লাগল।
Verse 9
ते तमाजध्निरे वीर॑ं निवातकवचान्तकम् | संशप्तकनिहन्तारं हन्तारं सैन्धवस्य च,निवातकवचोंका विनाश, संशप्तकोंका संहार और जयद्रथका वध करनेवाले वीर अर्जुनपर स्वैन्धवोंने सब ओरसे प्रहार आरम्भ कर दिया
তখন তারা চারদিক থেকে সেই বীর অর্জুনের উপর আঘাত হানতে লাগল—যিনি নিবাতকবচদের অন্তকারী, সংশপ্তকদের সংহারক এবং সৈন্ধব জয়দ্রথের বধকারী।
Verse 10
ततो रथसहस्रेण हयानामयुतेन च । कोष्ठकीकृत्य बीभत्सुं प्रहषष्टमनमसो 5 भवन्,एक हजार रथ और दस हजार घोड़ोंसे अर्जुनको घेरकर उन्हें कोष्ठबद्ध-सा करके वे मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हो रहे थे
তারপর এক হাজার রথ ও দশ হাজার ঘোড়া দিয়ে বিভৎসু অর্জুনকে ঘিরে, যেন তাকে কুঠুরিবদ্ধ করল; আর তারা মনে মনে অত্যন্ত প্রফুল্ল হল।
Verse 11
त॑ स्मरन्तो वर्ध वीरा: सिन्धुराजस्य चाहवे । जयद्रथस्य कौरव्य समरे सव्यसाचिना,कुरुनन्दन! कुरुक्षेत्रके समराड़णमें सव्यसाची अर्जुनके द्वारा जो सिंधुराज जयद्रथका वध हुआ था, उसकी याद उन वीरोंको कभी भूलती नहीं थी
হে কৌরব্য! সেই বীরেরা যুদ্ধে সব্যসাচী অর্জুনের হাতে সিন্ধুরাজ জয়দ্রথের বধ বারবার স্মরণ করত; সেই স্মৃতি তাদের মন থেকে মুছে যেত না।
Verse 12
ततः पर्जन्यवत् सर्वे शरवृष्टीरवासृजन् । तै: कीर्ण: शुशुभे पार्थो रविरमेघान्तरे यथा,वे सब योद्धा मेघके समान अर्जुनपर बाणोंकी वर्षा करने लगे। उन बाणोंसे आच्छादित होकर कुन्ती-नन्दन अर्जुन बादलोंमें छिपे हुए सूर्यकी भाँति शोभा पा रहे थे
তারপর বর্ষাধারী মেঘের মতো তারা সকলেই বাণবর্ষণ করতে লাগল। সেই শরে আচ্ছন্ন পার্থ অর্জুন, মেঘান্তরে সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান হয়ে উঠল।
Verse 13
स शरै: समवच्छन्नक्षुकाशे पाण्डवर्षभ: । पञड्चरान्तरसंचारी शकुन्त इव भारत,भरतनन्दन! बाणोंसे आच्छादित हुए पाण्डवप्रवर अर्जुन पींजड़ेके भीतर फुदकनेवाले पक्षीकी भाँति जान पड़ते थे
শরে সর্বাঙ্গ আচ্ছন্ন ও যেন সংকীর্ণ স্থানে আবদ্ধ পাণ্ডবশ্রেষ্ঠ অর্জুন, হে ভারত, হে ভরতনন্দন, খাঁচার ভিতরে ছটফট করা পাখির ন্যায় প্রতীয়মান হলেন।
Verse 14
ततो हाहाकृतं सर्व कौन्तेये शरपीडिते । त्रैलोक्यम भवद् राजन् रविरासीच्च निष्प्रभ:,राजन! कुन्तीकुमार अर्जुन जब इस प्रकार बाणोंसे पीड़ित हो गये, तब उनकी ऐसी अवस्था देख त्रिलोकी हाहाकार कर उठी और सूर्यदेवकी प्रभा फीकी पड़ गयी
তখন, হে রাজন, কুন্তীপুত্র অর্জুন শরপীড়িত হলে সর্বত্র হাহাকার উঠল। তাঁর অবস্থা দেখে ত্রিলোক উদ্বিগ্ন হয়ে উঠল, আর সূর্যদেবের জ্যোতিও ম্লান হয়ে গেল।
Verse 15
ततो ववौ महाराज मारुतो लोमहर्षण: । राहुरग्रसदादित्यं युगपत् सोममेव च,महाराज! उस समय रोंगटे खड़े कर देनेवाली प्रचण्ड वायु चलने लगी। राहुने एक ही समय सूर्य और चन्द्रमा दोनोंको ग्रस लिये
তখন, হে মহারাজ, রোমাঞ্চকর ভয়ংকর বায়ু প্রবল বেগে বইতে লাগল। সেই মুহূর্তেই রাহু একসঙ্গে সূর্যকে এবং চন্দ্রকেও গ্রাস করল।
Verse 16
उल्काश्न जच्निरे सूर्य विकीर्यन्त्य:ः समन्ततः । वेपथुश्चा भवद् राजन् कैलासस्य महागिरे:,चारों ओर बिखरकर गिरती हुई उल्काएँ सूर्यसे टकराने लगीं। राजन! उस समय महापर्वत कैलास भी काँपने लगा
চারদিকে ছিটকে পড়া উল্কাগুলি সূর্যের সঙ্গে সংঘর্ষ করতে লাগল। হে রাজন, সেই সময় মহাপর্বত কৈলাসও কাঁপতে শুরু করল।
Verse 17
मुमुचु: श्वासमत्युष्णं दु:ः:खशोकसमन्विता: । सप्तर्षयो जातभयास्तथा देवर्षयोडपि च,सप्तर्षियों और देवर्षियोंको भी भय होने लगा। वे दुःख और शोकसे संतप्त हो अत्यन्त गरम-गरम साँस छोड़ने लगे
দুঃখ ও শোকে দগ্ধ হয়ে তারা অত্যন্ত উষ্ণ নিশ্বাস ফেলতে লাগল। সপ্তর্ষি এবং দেবর্ষিদের মধ্যেও ভয় জাগ্রত হল।
Verse 18
शशं चाशु विनिर्भिद्य मण्डलं शशिनो5पतत् । विपरीता दिशश्वापि सर्वा धूमाकुलास्तथा,पूर्वोक्त उल्काएँ चन्द्रमामें स्थित हुए शश-चिह्नका भेदन करके चन्द्रमण्डलके चारों ओर गिरने लगीं । सम्पूर्ण दिशाएँ धूमाच्छन्न होकर विपरीत प्रतीत होने लगीं
বৈশম্পায়ন বললেন—উল্কাগুলি দ্রুত চাঁদের শশচিহ্ন বিদীর্ণ করে চন্দ্রমণ্ডলের চারদিকে পতিত হল। সমস্ত দিক ধোঁয়ায় আচ্ছন্ন হয়ে উল্টো-উল্টো মনে হতে লাগল—এ ছিল জগতে অনিষ্ট ও ধর্মবিচ্যুতির ভয়ংকর লক্ষণ।
Verse 19
रासभारुणसंकाशा धनुष्मन्त: सविद्युतः । आवृत्य गगन मेघा मुमुचुर्मासशोणितम्,गधेके समान रंग और लाल रंगके सम्मिश्रणसे जो रंग हो सकता है, वैसे वर्णवाले मेघ आकाशको घेरकर रक्त और मांसकी वर्षा करने लगे। उनमें इन्द्रधनुषका भी दर्शन होता था और बिजलियाँ भी कौंधती थीं
বৈশম্পায়ন বললেন—গাধার মতো গাঢ় বর্ণে রঞ্জিত, লালচে আভায় মিশ্রিত, ধনুকাকৃতি রেখা বহনকারী ও বিদ্যুৎঝলকে দীপ্ত মেঘ আকাশ ঢেকে মাংস ও রক্তের বৃষ্টি ঝরাতে লাগল। এ ছিল ভয়ংকর অশুভ লক্ষণ—প্রকৃতির নিয়ম ভাঙার ও সর্বনাশের পূর্বাভাস।
Verse 20
एवमासीत् तदा वीरे शरवर्षेण संवृते । फाल्गुने भरतश्रेष्ठ तदद्भुतमिवाभवत्,भरतश्रेष्ठ] वीर अर्जुनके उस समय शत्रुओंकी बाण-वर्षसे आच्छादित हो जानेपर ऐसे-ऐसे उत्पात प्रकट होने लगे। वह अद्भुत-सी बात हुई
বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! সেই সময় বীর ফাল্গুন (অর্জুন) যখন শত্রুর বাণবৃষ্টিতে আচ্ছন্ন হলেন, তখন নানা উৎপাত প্রকাশ পেতে লাগল; দৃশ্যটি যেন আশ্চর্যরূপ ধারণ করল।
Verse 21
तस्य तेनावकीर्णस्य शरजालेन सर्वतः । मोहात् पपात गाण्डीवमावापश्न करादपि,उस बाणसमूहके द्वारा सब ओरसे आच्छादित हुए अर्जुनपर मोह छा गया। उस समय उनके हाथसे गाण्डीव धनुष और दस्ताने गिर पड़े
বৈশম্পায়ন বললেন—সর্বদিক থেকে সেই বাণজালে আচ্ছন্ন অর্জুনকে মোহ গ্রাস করল। তখন তাঁর হাত থেকে গাণ্ডীব ধনুক এবং হাতের রক্ষাকবচও সরে পড়ে গেল।
Verse 22
तस्मिन् मोहमनुप्राप्ते शरजालं महत् तदा । सैन्धवा मुमुचुस्तूर्ण गतसत्त्वे महारथे,महारथी अर्जुन जब मोहग्रस्त एवं अचेत हो गये, उस समय भी सिंधुदेशीय योद्धा उनपर वेगपूर्वक महान् बाणसमूहकी वर्षा करते रहे
বৈশম্পায়ন বললেন—মহারথী অর্জুন যখন মোহগ্রস্ত হয়ে চেতনার বল হারালেন, তখনও সিন্ধুদেশীয় যোদ্ধারা দ্রুত তাঁর উপর বিরাট বাণজাল নিক্ষেপ করতে থাকল।
Verse 23
ततो मोहसमापन्न॑ ज्ञात्वा पार्थ दिवौकस: । सर्वे वित्रस्तमनसस्तस्य शान्तिकृतो5भवन्,अर्जुनको मोहके वशीभूत हुआ जान सम्पूर्ण देवता मन-ही-मन संत्रस्त हो गये और उनके लिये शान्तिका उपाय करने लगे
তখন পার্থ (অর্জুন) মোহগ্রস্ত হয়েছেন জেনে স্বর্গলোকের দেবতারা সকলেই অন্তরে সন্ত্রস্ত হলেন। উদ্বিগ্নচিত্তে তারা তাঁর শান্তি-প্রতিষ্ঠার উপায় ভাবতে লাগলেন, যাতে বিভ্রম নিবারিত হয়ে বুদ্ধি পুনরায় স্থির হয়।
Verse 24
ततो देवर्षय: सर्वे तथा सप्तर्षयोडपि च । ब्रह्मर्षयश्च विजयं जेपु: पार्थस्य धीमत:,फिर तो समस्त देवर्षि, सप्तर्षि और ब्रह्मर्षि मिलकर बुद्धिमान् अर्जुनकी विजयके लिये मन्त्र-जप करने लगे
তারপর সকল দেবর্ষি, সপ্তর্ষি এবং ব্রহ্মর্ষিরাও একত্র হয়ে বুদ্ধিমান পার্থ (অর্জুন)-এর বিজয়ের জন্য মন্ত্রজপ করতে লাগলেন।
Verse 25
ततः प्रदीपिते देवै: पार्थतेजसि पार्थिव । तस्थावचलवद्ू धीमान् संग्रामे परमास्त्रवित्,पृथ्वीनाथ! तदनन्तर देवताओंके प्रयत्नसे अर्जुनका तेज पुनः उद्दीप्त हो उठा और उत्तम अस्त्र-विद्याके ज्ञाता परम बुद्धिमान् धनंजय संग्रामभूमिमें पर्वतके समान अविचल भावसे खड़े हो गये
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! দেবতাদের প্রচেষ্টায় পার্থের তেজ পুনরায় প্রজ্বলিত হলে, পরম অস্ত্রবিদ্যায় পারদর্শী সেই মহাবুদ্ধিমান ধনঞ্জয় রণক্ষেত্রে পর্বতের ন্যায় অচল হয়ে দাঁড়ালেন।
Verse 26
विचकर्ष धर्नुर्दिव्यं ततः कौरवनन्दन: । यन्त्रस्येवेह शब्दो5 भून्महांस्तस्य पुनः पुन:,फिर तो कौरवनन्दन अर्जुनने अपने दिव्य धनुषकी प्रत्यंचा खींची। उस समय उससे बार-बार मशीनकी तरह बड़े जोर-जोरसे टंकार-ध्वनि होने लगी
বৈশম্পায়ন বললেন—তখন কৌরবনন্দন অর্জুন তাঁর দিব্য ধনুকের প্রত্যঞ্চা টানলেন। তখন তা থেকে বারংবার যন্ত্রের ন্যায় প্রবল টংকারধ্বনি উঠতে লাগল।
Verse 27
ततः स शरवर्षाणि प्रत्यमित्रान् प्रति प्रभु: । ववर्ष धनुषा पार्थो वर्षाणीव पुरंदर:,इसके बाद जैसे इन्द्र पानीकी वर्षा करते हैं, उसी तरह प्रभावशाली पार्थने अपने धनुषद्वारा शत्रुओंपर बाणोंकी झड़ी लगा दी
বৈশম্পায়ন বললেন—তারপর সেই পরাক্রমী পার্থ ধনুক থেকে শত্রুদের উপর শরবৃষ্টি বর্ষণ করলেন—যেমন পুরন্দর ইন্দ্র মেঘ থেকে জলধারা বর্ষণ করেন।
Verse 28
ततस्ते सैन्धवा योधा: सर्व एव सराजका: । नादृश्यन्त शरै: कीर्णा: शलभैरिव पादपा:,फिर तो पार्थके बाणोंसे आच्छादित हो समस्त सैन्धव योद्धा टिडिियोंसे ढँके हुए वृक्षोंकी भाँति अपने राजासहित अदृश्य हो गये
তখন সেই সকল সৈন্ধব যোদ্ধা, রাজাসহ, পার্থের শরবৃষ্টিতে এমনভাবে আচ্ছন্ন হল যে পঙ্গপালে ঢেকে যাওয়া বৃক্ষের মতো তারা আর দৃষ্টিগোচর রইল না।
Verse 29
तस्य शब्देन वित्रेसुर्भयार्ताश्च विदुद्र॒ुवु: । मुमुचुश्नाश्रु शोकार्ता: शुशुचुश्चापि सैन्धवा:,कितने ही गाण्डीवकी टंकार-ध्वनिसे ही थर्रा उठे। बहुतेरे भयसे व्याकुल होकर भाग गये और अनेक सैन्धव योद्धा शोकसे आतुर होकर आँसू बहाने एवं शोक करने लगे
তার (গাণ্ডীবের) ধ্বনিতে তারা ভয়ে কেঁপে উঠল; ভীত-ব্যাকুল হয়ে অনেকে দিগ্বিদিক ছুটে পালাল। আর বহু সৈন্ধব যোদ্ধা শোকে আচ্ছন্ন হয়ে অশ্রুপাত করে বিলাপ করতে লাগল।
Verse 30
तांस्तु सर्वान् नरव्याप्र:सैन्धवान् व्यचरद् बली । अलातचक्रवद् राजन् शरजालै: समार्पयत्,राजन! उस समय महाबली पुरुषसिंह अर्जुन अलातचक्रकी भाँति घूम-घूमकर सारे सैन्धवोंपर बाण-समूहोंकी वर्षा करने लगे
হে রাজন! তখন মহাবলী নরব্যাঘ্র অর্জুন সেই সকল সৈন্ধবদের মধ্যে বিচরণ করে, জ্বলন্ত আলাতচক্রের মতো ঘুরে ঘুরে শরজাল বর্ষণ করতে লাগল।
Verse 31
तदिन्द्रजालप्रतिमं बाणजालममित्रहा । विसृज्य दिक्षु सर्वासु महेन्द्र इव वज्रभूत्,शत्रुसूदन अर्जुनने वज्रधारी महेन्द्रकी भाँति सम्पूर्ण दिशाओंसे इन्द्रजालके समान बाणोंका जाल-सा फैला दिया
তখন অমিত্রহা অর্জুন বজ্রধারী মহেন্দ্রের ন্যায়, ইন্দ্রজালের মতো এক শরজাল সর্বদিকেই বিস্তার করে দিল।
Verse 32
मेघजालनिभ सैन्यं विदार्य शरवृष्टिभि: । विबभौ कौरवश्रेष्ठ; शरदीव दिवाकर:,जैसे शरत्कालके सूर्य मेघोंकी घटाको छिन्न-भिन्न करके प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार कौरवश्रेष्ठ अर्जुन अपने बाणोंकी वृष्टिसे शत्रुसेनाको विदीर्ण करके अत्यन्त शोभा पाने लगे
যেমন শরৎকালের সূর্য মেঘপুঞ্জ ছিন্নভিন্ন করে দীপ্ত হয়, তেমনই কৌরবশ্রেষ্ঠ অর্জুন শরবৃষ্টিতে শত্রুসেনাকে বিদীর্ণ করে অপূর্ব শোভা লাভ করল।
Verse 76
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वगेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें वज़दत्तकी पराजयविषयक छिह्वत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে পবিত্র মহাভারতের অশ্বমেধিক পর্বের অন্তর্গত অনুগীতা পর্বে বজ্রদত্তের পরাজয়-বিষয়ক ছিয়াত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 77
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि सैन्धवयुद्धे सप्तसप्ततितमो<ध्याय:
ইতি শ্রীমহাভারতের অশ্বমেধিক পর্বের অনুগীতা পর্বে ‘সৈন্ধবযুদ্ধ’ বিষয়ক সাতাত্তরতম অধ্যায়।
Arjuna must reconcile battlefield capability with Dharmarāja’s directive: whether to eliminate hostile kṣatriya opponents or to compel submission while limiting fatalities, especially when noncombatants and kinship claims enter the encounter.
Power is ethically validated by restraint: legitimate victory aims at restoring order and reducing future harm, and compassion toward supplicants and innocents functions as a dharmic constraint on coercive force.
No explicit phalaśruti appears in this adhyāya; its meta-significance is narrative-ethical, illustrating how post-war sovereignty is stabilized through controlled force, sanctuary, and reconciliation rather than total destruction.