Adhyaya 71
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 7136 Verses

Adhyaya 71

Āśvamedha-dīkṣā-nirdeśaḥ — Scheduling the Initiation and Assigning Protection for the Horse

Upa-parva: Aśvamedha-dīkṣā and Aśva-utsarga (Initiation and Release of the Sacrificial Horse)

Vaiśaṃpāyana reports that, after Kṛṣṇa’s prompting, Yudhiṣṭhira consults Vyāsa and requests proper initiation into the Aśvamedha, acknowledging that the rite depends upon Vyāsa’s expertise. Vyāsa affirms that he, Paila, and Yājñavalkya will execute the ritual injunctions at the proper time, and he fixes Yudhiṣṭhira’s dīkṣā on the full moon of Caitra. He instructs that all sacrificial requisites be assembled and that specialists examine a medhya horse suitable for the sacrifice. The horse is to be released according to śāstra to wander the ocean-bounded earth, increasing the king’s fame. Yudhiṣṭhira complies and reports readiness; Vyāsa adds further requirements, including gold-appropriate implements (e.g., sphya and kūrca), and reiterates immediate horse-release under secure escort. Yudhiṣṭhira then asks who should protect the roaming horse; Vyāsa designates Arjuna—praised as foremost among archers and capable of subduing opposition—as the principal guardian, equipped with divine weapons. Additional administrative roles are allocated: Bhīma and Nakula for city defense, Sahadeva for household governance, while Yudhiṣṭhira also acknowledges Dhṛtarāṣṭra’s position within the restored polity.

Chapter Arc: युद्धोत्तर शान्ति के बीच नगर के द्वार पर धूल-धूसरित परन्तु तेजस्वी पाण्डवों का आगमन होता है; उन्हें देखने की उत्कंठा से वृष्णि-वीर और स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण यथान्याय प्रत्युद्गमन करते हैं। → महासैन्य के खुर-नेमि-स्वन से नगर गूँज उठता है; पाण्डव क्रमशः विदुर, वैश्या-पुत्र (संजय) आदि पूज्य जनों का सत्कार करते हुए राजपरिवार से मिलने बढ़ते हैं, और सबके मन में युद्ध के बाद धर्म-राज्य की दिशा को लेकर मौन प्रश्न उठता है। → पाण्डव अपना-अपना नाम बताकर धृतराष्ट्र के चरणों में प्रणाम करते हैं; फिर व्यास के सान्निध्य में बैठकर संवाद होता है और युधिष्ठिर के भीतर ‘अश्वमेध’ के संकल्प का निर्णायक उदय होता है—राजधर्म की पुनर्स्थापना हेतु महाक्रतु का मार्ग। → व्यास के वचन से प्रेरित होकर धर्मात्मा युधिष्ठिर अश्वमेध के आयोजन का निश्चय करता है; वृष्णि-अन्धक वीरों की उपस्थिति में वह प्राप्त रत्न/उपहार को अश्वमेध में उपयोग करने की इच्छा प्रकट करता है। → अश्वमेध की तैयारी आरम्भ होने से पहले—यह महायज्ञ किन-किन परीक्षाओं, विरोधों और अनपेक्षित घटनाओं को जन्म देगा?

Shlokas

Verse 1

ऑपनआक्रात बछ। 2 एकसप्ततितमो<्ध्याय: भगवान्‌ श्रीकृष्ण और उनके साथियोंद्वारा पाण्डवोंका स्वागत, पाण्डवोंका नगरमें आकर सबसे मिलना और व्यासजी तथा श्रीकृष्णका युधिषछिरको यज्ञके लिये आज्ञा देना वैशम्पायन उवाच तान्‌ समीपगतान्‌ श्रुत्वा पाण्डवान्‌ शत्रुकर्शन: । वासुदेव: सहामात्य: प्रययौ ससुह्ृदूगण:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पाण्डवोंके समीप आनेका समाचार सुनकर शत्रुसूदन भगवान्‌ श्रीकृष्ण अपने मित्रों और मन्त्रियोंके साथ उनसे मिलनेके लिये चले

বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! পাণ্ডবরা নিকটে এসেছেন—এই সংবাদ শুনে শত্রুকর্ষণ বাসুদেব শ্রীকৃষ্ণ মন্ত্রীদের ও বন্ধুসমাজকে সঙ্গে নিয়ে তাদের দর্শন ও অভ্যর্থনার জন্য অগ্রসর হলেন।

Verse 2

ते समेत्य यथान्यायं प्रत्युद्याता दिदृक्षया । ते समेत्य यथाधर्म पाण्डवा वृष्णिभि: सह

বৈশম্পায়ন বললেন—তারা দর্শনের আগ্রহে যথানিয়মে একত্র হয়ে অভ্যর্থনার জন্য অগ্রসর হল। এইভাবে পাণ্ডবরাও বৃষ্ণিদের সঙ্গে ধর্মানুসারে সমবেত হয়ে (তাদের) গ্রহণ করতে বেরিয়ে পড়লেন।

Verse 3

महतस्तस्य सैन्यस्य खुरनेमिस्वनेन ह

বৈশম্পায়ন বললেন—সেই মহাসেনার খুর ও রথচক্রের নেমির গর্জনে পৃথিবী যেন প্রতিধ্বনিত হয়ে উঠল, আসন্ন রাজকার্যের বিপুলতা ও প্রবাহের ইঙ্গিত দিচ্ছিল।

Verse 4

ते कोशानग्रत: कृत्वा विविशु: स्वपुरं तदा

বৈশম্পায়ন বললেন—তারা কোষাগার ও ভাণ্ডারকে অগ্রে স্থাপন করে, তারপর নিজ নগরে প্রবেশ করল; শৃঙ্খলিত প্রত্যাবর্তনে প্রথমেই সম্পদ-সংগ্রহের নিরাপত্তা নিশ্চিত হল।

Verse 5

ते समेत्य यथान्यायं धृतराष्ट्र जनाधिपम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—তারা সকলে একত্র হয়ে, ন্যায়-নীতির বিধানমতো, প্রজাধিপতি ধৃতরাষ্ট্রের নিকট গেল এবং বয়োজ্যেষ্ঠ রাজার প্রতি যথাবিধি বিনয় প্রদর্শন করল।

Verse 6

धृतराष्ट्रादनु च ते गान्धारी सुबलात्मजाम्‌

আর ধৃতরাষ্ট্রের পরে তারা সুবলের কন্যা গান্ধারীকেও প্রণাম করতে গেল; রাজবংশের দুই বৃদ্ধজন যথাক্রমে একসঙ্গে অগ্রসর হলেন।

Verse 7

विदुरं पूजयित्वा च वैश्यापुत्र॑ समेत्य च

বৈশম্পায়ন বললেন—তারা বিদুরকে যথাযথ সম্মান জানিয়ে, বৈশ্যার পুত্রের সঙ্গেও সাক্ষাৎ করে, বিধিমতো মর্যাদা রক্ষা করে ধর্মানুসারে অগ্রসর হল; কারণ ধর্মের শুরু জ্ঞানীদের প্রতি শ্রদ্ধা ও সকলের প্রতি সৌজন্যেই।

Verse 8

ततस्तत्‌ परमाश्चर्य विचित्र महदद्भुतम्‌

তখন এক পরম আশ্চর্য—বিচিত্র, বিশাল ও সত্যিই অদ্ভুত—ঘটনা ঘটল; তার অসাধারণত্বে সকলের দৃষ্টি আকৃষ্ট হল।

Verse 9

तदुपश्रुत्य तत्‌ कर्म वासुदेवस्य धीमत:

বৈশম্পায়ন বললেন: প্রজ্ঞাবান বাসুদেবের সেই কর্মের কথা শুনে তারা তার ধর্মগত ভার ও উদ্দেশ্যপূর্ণ অভিপ্রায় বুঝে তা নিয়ে চিন্তা করল।

Verse 10

पूजा पूजयामासु: कृष्णं देवकिनन्दनम्‌ । परम बुद्धिमान्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्ण वह अलौकिक कर्म सुनकर पाण्डवोंने उन पूजनीय देवकीनन्दन श्रीकृष्णका पूजन किया अर्थात्‌ उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की || ९३ || ततः कतिपयाहस्य व्यास: सत्यवतीसुत:,इसके थोड़े दिनों बाद महातेजस्वी सत्यवतीनन्दन व्यासजी हस्तिनापुरमें पधारे। कुरुकुलतिलक समस्त पाण्डवोंने उनका यथोचित पूजन किया

বৈশম্পায়ন বললেন: পাণ্ডবরা দেবকীনন্দন কৃষ্ণকে—পরম বুদ্ধিমান ও ভগবান শ্রীকৃষ্ণকে—পূজা করল, বহুভাবে প্রশংসা করল। তারপর কয়েক দিনের মধ্যে সত্যবতীপুত্র ব্যাস হস্তিনাপুরে এলেন; কুরুবংশের গৌরব পাণ্ডবরা যথাবিধি তাঁকে অভ্যর্থনা ও পূজা করল।

Verse 11

आजगाम महातेजा नगरं नागसाह्दयम्‌ | तस्य सर्वे यथान्यायं पूजांचक्रुः कुरूद्वहा:,इसके थोड़े दिनों बाद महातेजस्वी सत्यवतीनन्दन व्यासजी हस्तिनापुरमें पधारे। कुरुकुलतिलक समस्त पाण्डवोंने उनका यथोचित पूजन किया

বৈশম্পায়ন বললেন: কয়েক দিন পরে মহাতেজস্বী ঋষি নাগসাহ্বয় (হস্তিনাপুর) নগরে এলেন। সেখানে কুরুদের শ্রেষ্ঠ সকলেই ন্যায়ানুযায়ী, ধর্মসম্মত রীতিতে তাঁকে পূজা করল।

Verse 12

सह वृष्ण्यन्धकव्याप्रैरुपासांचक्रिरे तदा | तत्र नानाविधाकारा: कथा: समभिकीरत्त्य वै

বৈশম্পায়ন বললেন: তখন বৃষ্ণি ও অন্ধক বংশের প্রধান বীরদের সঙ্গে তারা শ্রদ্ধাভরে উপাসনা-সেবা করল। সেখানে নানাবিধ কাহিনি ও বৃত্তান্ত যথাযথভাবে উচ্চারিত হল, এবং ধর্মসম্মত পরামর্শের আবহ সৃষ্টি হল।

Verse 13

भवत्प्रसादाद्‌ भगवन्‌ यदिदं रत्नमाहतम्‌

ভগবান! আপনার প্রসাদে এই প্রাপ্ত রত্নটি এখানে আনা হয়েছে এবং তা আমাদের অধিকারে এসেছে।

Verse 14

तमनुज्ञातुमिच्छामि भवता मुनिसत्तम | त्वदधीना वयं सर्वे कृष्णस्य च महात्मन:,“'मुनिश्रेष्ठ! मैं चाहता हूँ कि इसके लिये आपकी आज्ञा प्राप्त हो जाय, क्योंकि हम सब लोग आप और महात्मा श्रीकृष्णके अधीन हैं!

মুনিশ্রেষ্ঠ! আমি এ বিষয়ে আপনার অনুমতি চাই; কারণ আমরা সকলেই আপনার এবং মহাত্মা কৃষ্ণের অধীন।

Verse 15

व्यास उवाच अनुजानामि राजंस्त्वां क्रियतां यदनन्तरम्‌ । यजस्व वाजिमेधेन विधिवत्‌ दक्षिणावता,व्यासजीने कहा--राजन्‌! मैं तुम्हें यज्ञके लिये आज्ञा देता हूँ। अब इसके बाद जो भी आवश्यक कार्य हो, उसे आरम्भ करो। विधिपूर्वक दक्षिणा देते हुए अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करो

ব্যাস বললেন—হে রাজন! আমি তোমাকে অনুমতি দিচ্ছি; এখন পরবর্তী যা করণীয়, তা আরম্ভ করো। বিধিপূর্বক দক্ষিণাসহ অশ্বমেধ যজ্ঞ সম্পাদন করো।

Verse 16

अश्वमेधो हि राजेन्द्र पावन: सर्वपाप्मनाम्‌ । तेनेष्टवा त्वं विपाप्मा वै भविता नात्र संशय:,राजेन्द्र! अश्वमेधयज्ञ समस्त पापोंका नाश करके यजमानको पवित्र बनानेवाला है। उसका अनुष्ठान करके तुम पापसे मुक्त हो जाओगे, इसमें संशय नहीं है

রাজেন্দ্র! অশ্বমেধ যজ্ঞ সর্বপাপ নাশকারী পবিত্র কর্ম। তা সম্পাদন করলে তুমি নিশ্চয়ই পাপমুক্ত হবে—এতে সন্দেহ নেই।

Verse 17

वैशम्पायन उवाच इत्युक्त: स तु धर्मात्मा कुरुराजो युधिष्ठिर: । अश्वमेधस्य कौरव्य चकाराहरणे मतिम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--कुरुनन्दन! व्यासजीके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा कुरुराज युधिष्ठिरने अश्वमेधयज्ञ आरम्भ करनेका विचार किया

বৈশম্পায়ন বললেন—হে কৌরব্য! এ কথা শুনে ধর্মাত্মা কুরু-রাজ যুধিষ্ঠির অশ্বমেধ যজ্ঞ আরম্ভ করার সংকল্প করলেন এবং তার প্রস্তুতিতে মন দিলেন।

Verse 18

समनुज्ञाप्य तत्‌ सर्व कृष्णद्वैपायनं नृप: । वासुदेवमथाभ्येत्य वाग्मी वचनमब्रवीत्‌,श्रीकृष्णद्वैवायन व्याससे सब बातोंके लिये आज्ञा ले प्रवचनकुशल राजा युधिष्छिर भगवान्‌ श्रीकृष्णके पास जाकर इस प्रकार बोले--

কৃষ্ণদ্বৈপায়ন ব্যাসের নিকট সকল বিষয়ে অনুমতি গ্রহণ করে বাক্‌পটু ও সংযত রাজা যুধিষ্ঠির পরে বাসুদেব শ্রীকৃষ্ণের কাছে গিয়ে এই কথা বললেন।

Verse 19

देवकी सुप्रजा देवी त्वया पुरुषसत्तम । यद्‌ ब्रूयां त्वां महाबाहो तत्‌ कृथास्त्वमिहाच्युत,“पुरुषोत्तम! महाबाहु अच्युत! आपको ही पाकर देवकीदेवी उत्तम संतानवाली मानी गयी हैं। मैं आपसे जो कुछ कहूँ, उसे आप यहाँ सम्पन्न करें

পুরুষোত্তম! মহাবাহু অচ্যুত! আপনাকে পুত্ররূপে পেয়ে দেবী দেবকী সত্যই উত্তম সন্তানবতী বলে গণ্য। আমি যা নিবেদন করব, তা আপনি এখানে সম্পন্ন করুন।

Verse 20

त्वत्प्रभावार्जितान्‌ भोगानश्रीम यदुनन्दन । पराक्रमेण बुद्ध्या च त्वयेयं निर्जिता मही,“यदुनन्दन! हम आपके ही प्रभावसे प्राप्त हुई इस पृथ्वीका उपभोग कर रहे हैं। आपने ही अपने पराक्रम और बुद्धिबलसे इस सम्पूर्ण पृथ्वीको जीता है

যদুনন্দন! আপনারই প্রভাবে অর্জিত এই ভোগসম্ভার আমরা ভোগ করছি। আপনার পরাক্রম ও প্রজ্ঞাবলে এই সমগ্র পৃথিবী আপনার দ্বারা জয়ী হয়েছে।

Verse 21

दीक्षयस्व त्वमात्मानं त्वं हि नः परमो गुरु: । त्वयीष्टवति दाशार्ह विपाप्मा भविता हाहम्‌,“दशाहईनन्दन! आप ही इस यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करें; क्योंकि आप हमारे परम गुरु हैं। आपके यज्ञानुष्ठान पूर्ण कर लेनेपर निश्चय ही हमारे सब पाप नष्ट हो जायँगे

দাশার্হনন্দন! আপনি নিজেই এই যজ্ঞের দীক্ষা গ্রহণ করুন; কারণ আপনি আমাদের পরম গুরু। আপনার দ্বারা যজ্ঞ সম্পন্ন হলে আমি নিশ্চয়ই পাপমুক্ত হব।

Verse 22

त्वं हि यज्ञो$क्षर: सर्वस्त्वं धर्मस्त्वं प्रजापति: । त्वं गति: सर्वभूतानामिति मे निश्चिता मतिः,“आप ही यज्ञ, अक्षर, सर्वस्वरूप, धर्म, प्रजापति एवं सम्पूर्ण भूतोंकी गति हैं--यह मेरी निश्चित धारणा है”

আপনিই যজ্ঞ, আপনিই অক্ষর, আপনিই সর্বস্ব। আপনিই ধর্ম, আপনিই প্রজাপতি। সকল ভূতের গতি আপনিই—এটাই আমার স্থির বিশ্বাস।

Verse 23

वायुदेव उवाच त्वमेवैतन्महाबाहो वक्तुमर्हस्थरिंदम । त्वं गति: सर्वभूतानामिति मे निश्चिता मतिः,भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा--महाबाहो! शत्रुदमन नरेश! आप ही ऐसी बात कह सकते हैं। मेरा तो यह दृढ़ विश्वास है कि आप ही सम्पूर्ण भूतोंके अवलम्ब हैं

বায়ুদেব বললেন— হে মহাবাহু, হে শত্রুদমন! এ কথা বলার যোগ্য একমাত্র তুমিই। আমার দৃঢ় বিশ্বাস— তুমিই সকল জীবের আশ্রয় ও অবলম্বন।

Verse 24

त्वं चाद्य कुरुवीराणां धर्मेण हि विराजसे । गुणीभूता: सम ते राजंस्त्वं नो राजा गुरुर्मत:,राजन्‌! समस्त कौरववीरोंमें एकमात्र आप ही धर्मसे सुशोभित होते हैं। हमलोग आपके अनुयायी हैं और आपको अपना राजा एवं गुरु मानते हैं

বায়ু বললেন— রাজন! আজ কুরুবীরদের মধ্যে ধর্মের দীপ্তিতে একমাত্র তুমিই উজ্জ্বল। আমরা সকলেই তোমার পক্ষেই একাত্ম; তোমার অনুগামী। তোমাকেই আমরা রাজা ও গুরু বলে মানি।

Verse 25

यजस्व मदनुज्ञात: प्राप्य एष क्रतुस्त्वया । युनक्तु नो भवान्‌ कार्ये यत्र वाउछसि भारत,इसलिये भारत! आप हमारी अनुमतिसे स्वयं ही इस यज्ञका अनुष्ठान कीजिये तथा हमलोगोंमेंसे जिसको जिस कामपर लगाना चाहते हों, उसे उस कामपर लगनेकी आज्ञा दीजिये

বায়ু বললেন— হে ভারত! আমাদের অনুমতি পেয়ে এই ক্রতু এখন তোমার অধিকারভুক্ত। অতএব তুমি নিজেই যজ্ঞ সম্পাদন করো। আর আমাদের মধ্যে যাকে যে কাজে নিয়োজিত করতে চাও, তাকে সেই কাজেই আদেশ দাও।

Verse 26

विविशु: सहिता राजन्‌ पुरं वारणसाह्नयम्‌ । उन सब लोगोंने पाण्डवोंसे मिलनेके लिये आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और सब यथायोग्य एक-दूसरेसे मिले। राजन! धर्मानुसार पाण्डव वृष्णियोंस मिलकर सब एक साथ हो हस्तिनापुरमें प्रविष्ट हुए,सत्यं ते प्रतिजानामि सर्व कर्तास्मि तेडनघ । भीमसेनार्जुनौ चैव तथा माद्रवतीसुतौ । इष्टवन्तो भविष्यन्ति त्वयीष्टवति पार्थिवे निष्पाप नरेश! मैं आपके सामने सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ कि आप जो कुछ कहेंगे, वह सब करूँगा। आप राजा हैं, आपके द्वारा यज्ञ होनेपर भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवको भी यज्ञानुष्ठानका फल मिल जायगा

বৈশম্পায়ন বললেন— রাজন! তারা সকলে একত্রে বারণসাহ্বয় (হস্তিনাপুর) নগরে প্রবেশ করল। হে নিষ্পাপ! আমি তোমার কাছে সত্য প্রতিজ্ঞা করছি— তুমি যা আদেশ করবে, আমি সবই করব। হে পার্থিব! তুমি যজ্ঞ সম্পন্ন করলে ভীমসেন ও অর্জুন, এবং মাদ্রীর দুই পুত্র (নকুল-সহদেব)ও যজ্ঞফলের অংশীদার হবে।

Verse 33

द्यावापृथिव्यो: खं चैव सर्वमासीत्‌ समावृतम्‌ । उस विशाल सेनाके घोड़ोंकी टापों और रथके पहियोंकी घरघराहटके तुमुल घोषसे पृथ्वी और स्वर्गके बीचका सारा आकाश व्याप्त हो गया था

বৈশম্পায়ন বললেন— সেই বিশাল সেনার ঘোড়ার টাপ ও রথচক্রের গর্জনে ওঠা তুমুল ধ্বনিতে পৃথিবী ও স্বর্গের মধ্যবর্তী সমগ্র আকাশ যেন আচ্ছন্ন হয়ে গিয়েছিল।

Verse 46

पाण्डवा: प्रीतमनस: सामात्या: ससुहृद्गणा: । वे खजानेको आगे करके अपनी राजधानीमें घुसे। उस समय मन्त्रियों एवं सुहृदोंसहित समस्त पाण्डवोंका मन प्रसन्न था

বৈশম্পায়ন বললেন— পাণ্ডবেরা অন্তরে আনন্দিত ছিলেন; মন্ত্রীদের সঙ্গে এবং সুহৃদগণে পরিবৃত হয়ে, রাজকোষকে অগ্রে স্থাপন করে তাঁরা নিজেদের রাজধানীতে প্রবেশ করলেন। সেই সময় মন্ত্রী ও বন্ধুদের সহিত সকল পাণ্ডবের মন শান্ত ও সন্তুষ্ট ছিল।

Verse 56

कीर्तयन्त: स्वनामानि तस्य पादौ ववन्दिरे । वे यथायोग्य सबसे मिलकर राजा धृतराष्ट्रके पास गये। अपना-अपना नाम बताते हुए उनके चरणोंमें प्रणाम करने लगे

নিজ নিজ নাম উচ্চারণ করতে করতে তারা তাঁর চরণে প্রণাম করল। তারপর যথাযোগ্য ক্রমে সকলে একত্রে রাজা ধৃতরাষ্ট্রের কাছে গিয়ে, নিজেদের পরিচয় দিয়ে, ভক্তিভরে চরণবন্দনা করল।

Verse 63

कुन्तीं च राजशार्दूल तदा भरतसत्तम | नृपश्रेष्ठ भरतभूषण! धृतराष्ट्रसे मिलनेके बाद वे सुबलपुत्री गान्धारी और कुन्तीसे मिले

বৈশম্পায়ন বললেন— হে রাজশার্দূল, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, হে নৃপশ্রেষ্ঠ, ভরতবংশের ভূষণ! ধৃতরাষ্ট্রের সঙ্গে সাক্ষাৎ করে তিনি পরে সুবলকন্যা গান্ধারী ও কুন্তীর সঙ্গেও মিলিত হলেন।

Verse 70

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपरववके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें पाण्डवोका आगमनविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের আশ্বমেধিক পর্বের অন্তর্গত অনুগীতা-পর্বে পাণ্ডবদের আগমন-বিষয়ক সত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 71

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि कृष्णव्यासानुज्ञायामेकसप्ततितमो<ध्याय:

ইতি শ্রীমহাভারতের আশ্বমেধিক পর্বে, অনুগীতা-পর্বে, কৃষ্ণদ্বৈপায়ন ব্যাসের অনুমোদনে একসপ্ততিতম (একাত্তরতম) অধ্যায় সমাপ্ত।

Verse 73

पूज्यमाना: सम ते वीरा व्यरोचन्त विशाम्पते । प्रजानाथ! फिर विदुरका सम्मान करके वैश्यापुत्र युयुत्सुसे मिलकर उन सबके द्वारा सम्मानित होते हुए वीर पाण्डव बड़ी शोभा पा रहे थे

বৈশম্পায়ন বললেন—হে প্রজানাথ! যথাযথ পূজিত হয়ে সেই সকল বীর সমান দীপ্তিতে উজ্জ্বল হয়ে উঠলেন। তারপর বিদুরকে সম্মান করে এবং বৈশ্যপুত্র যুযুৎসুর সঙ্গে মিলিত হয়ে, সকলের দ্বারা সমাদৃত পাণ্ডববীরেরা অপূর্ব শোভা লাভ করলেন।

Verse 86

शुश्रुवुस्ते तदा वीरा: पितुस्ते जन्म भारत । भरतनन्दन! तत्पश्चात्‌ उन वीरोंने तुम्हारे पिताके जन्मका वह आश्षर्यपूर्ण विचित्र, महान्‌ एवं अदभुत वृत्तान्त सुना

বৈশম্পায়ন বললেন—তখন, হে ভারত, সেই বীরেরা তোমার পিতার জন্মবৃত্তান্ত শুনল। হে ভরতনন্দন, এরপর সেই যোদ্ধারা তোমাকে তোমার পিতার উৎপত্তি-সম্পর্কিত সেই বিচিত্র, আশ্চর্য, মহান ও অদ্ভুত কাহিনি শোনাল।

Verse 126

युधिष्ठिरो धर्मसुतो व्यासं वचनमत्रवीत्‌ | फिर वृष्णि एवं अन्धकवंशी वीरोंके साथ वे उनकी सेवामें बैठ गये। वहाँ नाना प्रकारकी बातें करके धर्मपुत्र युधिष्ठिरने व्यासजीसे इस प्रकार कहा--

বৈশম্পায়ন বললেন—ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির ব্যাসদেবকে সম্বোধন করে কথা বললেন। তারপর তিনি বৃষ্ণি ও অন্ধকবংশীয় বীরদের সঙ্গে তাঁর সেবায় বসে পড়লেন। সেখানে নানা বিষয়ে আলাপ করে ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির ব্যাসকে এভাবে বললেন—

Verse 133

उपयोक्तुं तदिच्छामि वाजिमेथे महाक्रतौ । “भगवन्‌! आपकी कृपासे जो वह रत्न लाया गया है, उसका अश्वमेध नामक महायज्ञमें मैं उपयोग करना चाहता हूँ

বৈশম্পায়ন বললেন—“ভগবন! আপনার অনুমতিতে আমি সেই রত্নকে অশ্বমেধ নামক মহাক্রতুতে ব্যবহার করতে চাই। আপনার কৃপায় যে রত্ন আনা হয়েছে, তা আমি মহাযজ্ঞে ধর্মার্থে নিবেদন করতে ইচ্ছুক।”

Frequently Asked Questions

The ethical problem is how to assert imperial authority without uncontrolled aggression: the horse must roam freely per rite, yet be protected and potential disputes managed so the sacrificial purpose is preserved with restraint.

Legitimate power is procedural and consultative: dharma is enacted through calendrical discipline, expert oversight, proper materials, and clearly delegated responsibility rather than impulsive personal rule.

No explicit phalaśruti appears here; the meta-function is logistical and institutional—showing how the rite’s efficacy depends on correct timing, authorized officiants, and controlled execution within the epic’s governance arc.