
Śrāddha-Kalpa: Pitṛ-Pūjā and Tithi-Phala (श्राद्धकल्पः पितृपूजा च तिथिफलम्)
Upa-parva: Śrāddha-Vidhi Anuśāsana (Pitṛyajña and Tithi-Phala Discourse)
This chapter opens with Yudhiṣṭhira requesting that Bhīṣma, having explained the dharma of the four varṇas, now teach the complete śrāddha procedure. Vaiśaṃpāyana narrates Bhīṣma’s readiness to expound the śrāddha-kalpa, characterizing it as auspicious and as a form of pitṛyajña. Bhīṣma asserts the universal venerability of the Pitṛs—honored across categories of beings—and states a priority order: after worshiping the Pitṛs, one then satisfies the Devas, implying an ancestral foundation for ritual hierarchy. The chapter identifies śrāddha as an anvāhārya offering and notes an early (prathama-kalpita) association with offerings involving meat (āmiṣa) as a procedural form. Bhīṣma then introduces a tithi-by-tithi merit schema: specific lunar days yield distinct results, ranging from domestic prosperity and progeny-related outcomes to gains in agriculture and commerce; it also includes cautionary notes (e.g., an adverse consequence associated with the thirteenth day). The discourse privileges certain days in the dark fortnight (kṛṣṇa-pakṣa) while excluding the fourteenth in that range for śrāddha, and it concludes with a timing preference: the afternoon (aparāhṇa) is superior to the forenoon (pūrvāhṇa) for śrāddha performance.
Chapter Arc: शरशय्या पर स्थित भीष्म युधिष्ठिर को राजधर्म के दुःख-स्वरूप का स्मरण कराते हैं—अकृतात्मा के लिए राज्य भार नहीं, शोक का कारण है। → भीष्म दान-धर्म की ओर कथा-सेतु बाँधते हैं: पितृ-तर्पण में ‘पिण्ड’ के स्थान पर ‘कुश’ देने की विधि, और फिर सुवर्ण-दान की महिमा को प्रमाणित करने हेतु वसिष्ठ–परशुराम संवाद का प्रवाह खोलते हैं। परशुराम को वेद-प्रामाण्य और ऋषि-परंपरा से प्रश्न करने का आग्रह होता है; जगत्-रचना, योनियाँ, और स्मृति-परंपरा के विचित्र विधान (विविध प्राणियों की उत्पत्ति/अंश) कथा को गूढ़ बनाते हैं। → पुराण-स्मृति के आधार पर प्रजापति-कथित न्याय और रुद्र के ‘अनुपम तेज’ को धारण करने तथा उसके अंश के पृथ्वी पर पतन का प्रसंग आता है—यहाँ तप, तेज, और सृष्टि-व्यवस्था का रहस्य दान-धर्म की पृष्ठभूमि में चरम पर पहुँचता है; फिर भीष्म सुवर्ण के ‘स्वरूप’ और ‘दान-फल’ को सर्वोत्तम घोषित कर निर्णायक उपदेश देते हैं। → भीष्म निष्कर्ष बाँधते हैं: महर्षियों के बताए कर्म-योग/दान-विधान का प्रसन्नतापूर्वक पालन करो; सुवर्ण-दान श्रेष्ठ है, और पितृ-कार्य में नियत विधि (कुश-प्रदान आदि) श्रद्धा सहित करने से पुण्य-प्राप्ति होती है। → सुवर्ण के स्वरूप-वर्णन और दान के सूक्ष्म नियमों का विस्तार आगे भी चलता है—कौन-सा सुवर्ण, किस पात्र को, किस काल में, किस संकल्प से दिया जाए, इसका क्रम आगे उद्घाटित होने का संकेत रहता है।
Verse 1
अपना | अं चतुरशीतितमो< ध्याय: भीष्मजीका अपने पिता ४ कह के हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना
যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! আপনি সকল মানুষের জন্য, আর বিশেষত ধর্মে দৃষ্টি স্থির রাখা রাজাদের জন্য, গোধনের এই অতুল দানের মহিমা বর্ণনা করেছেন।
Verse 2
राज्यं हि सततं दुःखं दुर्धरं चाकृतात्मभि: । भूयिष्ठं च नरेन्द्राणां विद्यते न शुभा गति:
রাজ্য সর্বদাই দুঃখময়; যাদের আত্মসংযম নেই, তাদের পক্ষে তা ধারণ করা অতি দুরূহ। তাই অধিকাংশ নৃপতির শুভ গতি লাভ হয় না।
Verse 3
पूयन्ते तत्र नियतं प्रयच्छन्तो वसुन्धराम् । सर्वे च कथिता धर्मास्त्वया मे कुरुनन्दन,उनमें वे ही पवित्र होते हैं जो नियमपूर्वक पृथ्वीका दान करते हैं। कुरुनन्दन! आपने मुझसे समस्त धर्मोंका वर्णन किया है
সেখানে যারা নিয়মিতভাবে ভূমিদান করে, তারাই নিশ্চিতভাবে পবিত্র হয়। হে কুরুনন্দন! আপনি আমাকে সকল ধর্মকর্তব্য বর্ণনা করেছেন।
Verse 4
एवमेव गवामुक्तं प्रदानं ते नृगेण ह । ऋषिणा नाचिकेतेन पूर्वमेव निदर्शितम्,इसी तरह राजा नृगने जो गोदान किया था तथा नाचिकेत ऋषिने जो गौओंका दान और पूजन किया था, वह सब आपने पहले ही कहा और निर्देश किया है
তদ্রূপ রাজা নৃগের গোধনের বৃত্তান্ত এবং ঋষি নাচিকেতের পূর্বপ্রদত্ত দৃষ্টান্ত—এসবই আপনি আগেই ব্যাখ্যা ও নির্দেশ করেছেন।
Verse 5
वेदोपनिषदश्वैव सर्वकर्मसु दक्षिणा: । सर्वक्रतुषु चोद्दिष्टं भूमिगावो5थ काउचनम्,वेद और उपनिषदोंने भी प्रत्येक कर्ममें दक्षिणाका विधान किया है। सभी यज्ञोंमें भूमि, गौ और सुवर्णकी दक्षिणा बतायी गयी है
বেদ ও উপনিষদ সকল কর্মে দক্ষিণার বিধান করে; আর সর্ব যজ্ঞে ভূমি, গাভী ও স্বর্ণকে দক্ষিণা হিসেবে দানের নির্দেশ দেওয়া হয়েছে।
Verse 6
तत्र श्रुतिस्तु परमा सुवर्ण दक्षिणेति वै । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं पितामह यथातथम्,इनमें सुवर्ण सबसे उत्तम दक्षिणा है--ऐसा श्रुतिका वचन है, अतः पितामह! मैं इस विषयको यथार्थ रूपसे सुनना चाहता हूँ
যুধিষ্ঠির বললেন— এ বিষয়ে শ্রুতির পরম বচন এই যে, স্বর্ণই সর্বোত্তম দক্ষিণা। পিতামহ, আমি এর সত্যটি যেমন আছে তেমনই শুনতে চাই।
Verse 7
कि सुवर्ण कथं जात॑ कस्मिन् काले किमात्मकम् | कि दैवं कि फलं चैव कस्माच्च परमुच्यते
যুধিষ্ঠির জিজ্ঞাসা করলেন— স্বর্ণ কী? কীভাবে ও কখন তার উৎপত্তি? তার স্বরূপ বা তত্ত্ব কী? তার অধিদেবতা কে? তা দান করলে কী ফল হয়? আর কেন স্বর্ণকে সর্বোচ্চ বলা হয়?
Verse 8
कस्माद् दानं सुवर्णस्य पूजयन्ति मनीषिण: । कस्माच्च दक्षिणार्थ तद् यज्ञकर्मसु शस्यते
যুধিষ্ঠির বললেন— জ্ঞানীরা কেন স্বর্ণদানকে বিশেষ সম্মান করেন? আর যজ্ঞকর্মে দক্ষিণা হিসেবে কেন স্বর্ণই বিশেষভাবে প্রশংসিত?
Verse 9
कस्माच्च पावन श्रेष्ठ भूमेगों भ्यक्ष काउ्चनम् । परम॑ दक्षिणार्थ च तद् ब्रवीहि पितामह
যুধিষ্ঠির বললেন— পিতামহ, কেন স্বর্ণকে পৃথিবী ও গাভীর চেয়েও অধিক পবিত্র ও শ্রেষ্ঠ বলা হয়? আর দক্ষিণা হিসেবে কেন সেটিকেই সর্বোত্তম গণ্য করা হয়? দয়া করে বলুন।
Verse 10
भीष्म उवाच शृणु राजन्नवहितो बहुकारणविस्तरम् । जातरूपसमुत्पत्तिमनुभूतं च यन््मया
ভীষ্ম বললেন— রাজন, মনোযোগ দিয়ে শোনো। স্বর্ণ (জাতরূপ)-এর উৎপত্তির কারণ বহু এবং তার বিস্তারও বৃহৎ। আমি যা যেমনভাবে উপলব্ধি করেছি, সেই ক্রমে তোমাকে বর্ণনা করছি।
Verse 11
पिता मम महातेजा: शान्लनुर्निधनं गतः । तस्य दित्सुरहं श्राद्ध गंगाद्वारमुपागमम्
ভীষ্ম বললেন— আমার মহাতেজস্বী পিতা রাজা শান্তনু পরলোকগত হলে, তাঁর শ্রাদ্ধ ও পিতৃতর্পণ নিবেদন করতে উদ্যত হয়ে আমি গঙ্গাদ্বারে গমন করলাম।
Verse 12
तत्रागम्य पितुः पुत्र श्राद्धकर्म समारभम् | माता मे जाह्नवी चात्र साहाय्यमकरोत् तदा,बेटा! वहाँ पहुँचकर मैंने पिताका श्राद्धकर्म आरम्भ किया। इस कार्यमें वहाँ उस समय मेरी माता गंगाने भी बड़ी सहायता की
হে পুত্র! সেখানে পৌঁছে আমি পিতার শ্রাদ্ধকর্ম আরম্ভ করলাম। তখন সেখানেই আমার মাতা জাহ্নবী (গঙ্গা) উপস্থিত ছিলেন এবং তিনি সেই কর্মে মহৎ সহায়তা করলেন।
Verse 13
ततोडग्रतस्ततः सिद्धानुपवेश्य बहूनूषीन् | तोयप्रदानात् प्रभृति कार्याण्यहमथारभम्,तदनन्तर अपने सामने बहुत-से सिद्ध-महर्षियोंको बिठाकर मैंने जलदान आदि सारे कार्य आरम्भ किये
তারপর আমি আমার সম্মুখে বহু সিদ্ধ ঋষিকে বসিয়ে জলদান থেকে আরম্ভ করে বিধিসম্মত সকল কর্ম ক্রমান্বয়ে শুরু করলাম।
Verse 14
तत् समाप्य यथोटद्विष्ट॑ पूर्वकर्म समाहित: । दातुं निर्वप्णं सम्यग् यथावदहमारभम्,एकाग्रचित्त होकर शास्त्रोक्तविधिसे पिण्डदानके पहलेके सब कार्य समाप्त करके मैंने विधिवत् पिण्डदान देना आरम्भ किया
একাগ্রচিত্তে শাস্ত্রবিধি অনুসারে পিণ্ডদানের পূর্ববর্তী সকল কর্ম সম্পন্ন করে, আমি যথাযথভাবে নির্বপণ—অর্থাৎ পিণ্ডদান—আরম্ভ করলাম।
Verse 15
ततस्तं दर्भविन्यासं भित्त्वा सुरुचिरांगद: । प्रलम्बाभरणो बाहुरुदतिष्ठद् विशाम्पते
হে প্রজানাথ! তখন পিণ্ডদানের জন্য বিছানো কুশের বিন্যাস ভেদ করে এক অপূর্ব সুন্দর বাহু উঠে এল; তাতে মনোহর অঙ্গদ ও দীর্ঘ ঝুলন্ত অলংকার শোভা পাচ্ছিল।
Verse 16
0/ जे ; कं गम तमुत्थितमहं दृष्टवा परं विस्मयमागमम् | प्रतिग्रहीता साक्षान्मे पितेति भरतर्षभ
ভীষ্ম বললেন— তাঁকে উঠতে ও আমার দিকে এগিয়ে আসতে দেখে আমি পরম বিস্ময়ে অভিভূত হলাম। কারণ যিনি নিজে পিণ্ড গ্রহণ করতে এসেছিলেন, তিনিই স্পষ্ট করে আমাকে বললেন— ‘আমি তোমার পিতা’, হে ভরতশ্রেষ্ঠ।
Verse 17
ततो मे पुनरेवासीत् संज्ञा संचिन्त्य शास्त्रत: । नायं वेदेषु विहितो विधिहस्त इति प्रभो
তারপর শাস্ত্রানুসারে চিন্তা করতেই আমার চেতনা আবার ফিরে এল। আমি স্থির করলাম— ‘হে প্রভু, এই “হাতে দিয়ে দেওয়ার বিধি” বেদে বিধৃত নয়।’
Verse 18
पिण्डो देयो नरेणेह ततो मतिरभून्मम । साक्षान्नेह मनुष्यस्य पिण्डं हि पितर: क्वचित्
ভীষ্ম বললেন— এই জগতে মানুষের অবশ্যই পিণ্ড দান করা উচিত— আমার বুদ্ধি এভাবেই স্থির হল। এতে আমার দৃঢ় বিশ্বাস জন্মাল যে এই সংসারে পিণ্ড প্রত্যক্ষভাবে পিতৃগণেরই কল্যাণার্থ।
Verse 19
गृह्नन्ति विहितं चेत्थं पिण्डो देय: कुशेष्विति । उसे ऊपर उठी देख मुझे बड़ा आश्वर्य हुआ। भरतश्रेष्ठ! साक्षात् मेरे पिता ही पिण्डका दान लेनेके लिये उपस्थित थे। प्रभो! किंतु जब मैंने शास्त्रीय विधिपर विचार किया
ভীষ্ম বললেন— ‘যদি বিধি অনুসারেই কর্ম করতে হয়, তবে পিণ্ড কুশের উপরেই দিতে হবে।’ এই ভেবে, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, আমি পিতার প্রত্যক্ষ প্রসারিত হাতকেও মান্য করিনি। শাস্ত্রকেই প্রমাণ ধরে, পিণ্ডদানের সূক্ষ্ম বিধি স্মরণ করে, আমি সব পিণ্ড কেবল কুশের উপরেই স্থাপন করলাম।
Verse 20
शास्त्रप्रामाण्यसूक्ष्मं तु विधिं पिण्डस्य संस्मरन् | ततो दर्भेषु तत् सर्वमदर्द भरतर्षभ
ভীষ্ম বললেন— শাস্ত্রপ্রমাণিত পিণ্ডদানের সূক্ষ্ম বিধি স্মরণ করে, হে ভরতবৃষভ, আমি প্রত্যক্ষ দৃশ্যের কাছে নত হইনি; এবং বিধি অনুসারে সব পিণ্ড দর্ভা-কুশের উপরেই অর্পণ করলাম।
Verse 21
शास्त्रमार्गनुसारेण तद् विद्धि मनुजर्षभ । ततः सोडन््तर्हितो बाहुः पितुर्मम जनाधिप
ভীষ্ম বললেন—হে মনুষ্যশ্রেষ্ঠ! জেনে রেখো, আমি শাস্ত্রনির্দিষ্ট পথ অনুসারেই সব করেছি। হে রাজন! তারপর আমার পিতার সেই বাহু দৃষ্টির আড়ালে অদৃশ্য হয়ে গেল।
Verse 22
ततो मां दर्शयामासु: स्वप्नान्ते पितरस्तथा । प्रीयमाणास्तु मामूचु: प्रीता: सम भरतर्षभ
তারপর স্বপ্নের অন্তে পিতৃগণ প্রকাশিত হয়ে আমাকে দর্শন দিলেন। সন্তুষ্ট হয়ে তাঁরা বললেন—‘হে ভরতশ্রেষ্ঠ! আমরা তৃপ্ত।’
Verse 23
त्वया हि कुर्वता शास्त्र प्रमाणमिह पार्थिव
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! তুমি এখানে শাস্ত্রকে প্রমাণ করে আচরণ করেছ; এতে প্রামাণ্যতার মর্যাদা প্রতিষ্ঠিত হয়েছে, আর যারা ধর্মে স্থিত, তারা তোমার আদর্শে বিচলিত হয়নি।
Verse 24
आत्मा धर्म: श्रुतं वेदा: पितरश्नर्षिभि: सह । साक्षात् पितामहो ब्रह्मा गुरवो5थ प्रजापति:
ভীষ্ম বললেন—আত্মা, ধর্ম, শ্রুতি ও বেদ; ঋষিদের সঙ্গে পিতৃগণ; স্বয়ং পিতামহ ব্রহ্মা; গুরুজন এবং প্রজাপতি—এরা সকলেই ধর্মের পরম আশ্রয় ও সর্বোচ্চ প্রমাণ।
Verse 25
तदिदं सम्यगारब्धं त्वयाद्य भरतर्षभ
ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! আজ তুমি যে কর্ম আরম্ভ করেছ, তা যথাযথভাবে—ধর্মানুসারে—আরম্ভ হয়েছে।
Verse 26
एवं वयं च धर्मज्ञ सर्वे चास्मत्पितामहा:
হে ধর্মজ্ঞ! এইরূপেই আমরাও এবং আমাদের সকল পিতামহ-পুরুষ (পূর্বপুরুষগণ) এই কথাই মান্য করি।
Verse 27
दशपूर्वान् दशैवान्यांस्तथा संतारयन्ति ते,सुवर्णदानेडकरवं मतिं च भरतर्षभ | 'जो सुवर्ण दान करते हैं, वे अपने पहले और पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंका उद्धार कर देते हैं।।
ভীষ্ম বললেন—যারা স্বর্ণ দান করে, তারা নিজেদের পূর্বের দশ পুরুষকে এবং তদ্রূপ পরের দশ পুরুষকেও উদ্ধার করে। অতএব, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, স্বর্ণদানে দৃঢ় সংকল্প স্থির কর।
Verse 28
सुवर्ण ये प्रयच्छन्ति एवं मत्पितरो<ब्रुवन् । ततोऊहं विस्मितो राजन प्रतिबुद्धो विशाम्पते
ভীষ্ম বললেন—“যারা স্বর্ণ দান করে”—এমনই আমার পিতৃপুরুষেরা বলেছিলেন। তা শুনে, হে রাজন, আমি বিস্মিত হলাম এবং হে প্রজাপতি, আমার বোধ জাগ্রত হল।
Verse 29
इतिहासमिमं चापि शूणु राजन् पुरातनम्
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, এই প্রাচীন ইতিহাসটিও শোন।
Verse 30
जामदग्न्येन रामेण तीव्ररोषान्वितेन वै
ভীষ্ম বললেন—জমদগ্নিপুত্র রাম দ্বারা, যিনি নিশ্চয়ই তীব্র ক্রোধে আবিষ্ট ছিলেন…
Verse 31
ततो जित्वा महीं कृत्स्नां रामो राजीवलोचन:
তারপর, হে মহারাজ! সমগ্র পৃথিবী জয় করে বীর পদ্মনয়ন পরশুরাম ব্রাহ্মণ ও ক্ষত্রিয়দের দ্বারা পূজিত এবং সকল কামনা পূর্ণকারী অশ্বমেধ যজ্ঞ সম্পাদন করলেন।
Verse 32
आजहार क्रतु वीरो ब्रद्मक्षत्रेण पूजितम् । वाजिमेधं महाराज सर्वकामसमन्वितम्
হে মহারাজ! সেই বীর ব্রাহ্মণ ও ক্ষত্রিয়দের দ্বারা পূজিত, সকল কামনা-সমন্বিত অশ্বমেধ যজ্ঞ সম্পাদন করলেন।
Verse 33
पावन सर्वभूतानां तेजोद्युतिविवर्धनम् । विपाप्मा च स तेजस्वी तेन क्रतुफलेन च
সে (যজ্ঞফল) সকল জীবকে পবিত্র করে এবং তেজ ও দীপ্তি বৃদ্ধি করে। সেই যজ্ঞের ফলে তিনি পাপমুক্ত ও তেজস্বী হলেন।
Verse 34
स तु क्रतुवरेणेष्टवा महात्मा दक्षिणावता
প্রচুর দক্ষিণাসহ সেই শ্রেষ্ঠ যজ্ঞ সম্পন্ন করে মহাত্মা ভৃগুবংশীয় পরশুরামের হৃদয়ে করুণা জাগল। তখন তিনি শাস্ত্রজ্ঞ ঋষি ও দেবতাদের জিজ্ঞাসা করলেন—“মহাভাগ মহাত্মাগণ! উগ্র কর্মে রত মানুষের জন্য যে পরম পবিত্র উপায়, তা আমাকে বলুন।” এভাবে প্রশ্ন করলে বেদ-শাস্ত্রবিদ মহর্ষিরা উত্তর দিলেন।
Verse 35
पप्रच्छागमसम्पन्नानूषीन् देवांश्व॒ भार्गव: । पावन यत् परं नृणामुग्रे कर्मणि वर्तताम्
ভৃগুবংশীয় পরশুরাম আগম-সম্পন্ন ঋষি ও দেবতাদের জিজ্ঞাসা করলেন—“উগ্র কর্মে রত মানুষের জন্য পরম পবিত্র উপায় কী?”
Verse 36
तदुच्यतां महाभागा इति जातघृणोड<ब्रवीत् । इत्युक्ता वेदशास्त्रज्ञास्तमूचुस्ते महर्षय:
ভীষ্ম বললেন—করুণায় কোমলচিত্ত পরশুরাম বললেন, “হে মহাভাগ মহাত্মাগণ, তা আমাকে বলুন।” এভাবে জিজ্ঞাসা করলে বেদ ও শাস্ত্রে পারদর্শী মহর্ষিগণ তাঁকে প্রত্যুত্তর দিলেন এবং উপদেশের সূত্রপাত করলেন—উগ্র ও হিংস্র কর্মে নিয়োজিত মানুষের জন্য কোনটি পরম পবিত্র ও ধর্মধারক।
Verse 37
राम विप्रा: सत्क्रियन्तां वेदप्रामाण्यदर्शनात् | भूयश्व विप्रर्षिगणा: प्रष्टव्या: पावन प्रति
ভীষ্ম বললেন—“হে রাম (পরশুরাম), বেদকে পরম প্রমাণ জেনে ব্রাহ্মণদের সৎকার করো; আর এই পবিত্র বিষয়ে ব্রাহ্মর্ষিদের সমবেত সমাজকে পুনরায় প্রশ্ন করো।”
Verse 38
ते यद् ब्रूयुर्महाप्राज्ञास्तच्चैव समुदाचर । ततो वसिष्ठ देवर्षिमगस्त्यमथ काश्यपम्
ভীষ্ম বললেন—“মহাপ্রাজ্ঞ মহর্ষিগণ যা বলেন, তাই যথাযথভাবে আচরণ করো।” তারপর তেজস্বী ভৃগুনন্দন পরশুরাম বসিষ্ঠ, অগস্ত্য ও কাশ্যপ (এবং দেবর্ষি) নিকট গিয়ে বললেন—“হে শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণগণ! আমি পবিত্র হতে চাই। বলুন—কোন কর্মযোগের সাধনায়, অথবা এই জগতে কোন দানে শুদ্ধি লাভ হয়?”
Verse 39
तमेवार्थ महातेजा: पप्रच्छ भृूगुनन्दन: । जाता मतिर्मे विप्रेन्द्रा: कथथं पूयेयमित्युत
ভীষ্ম বললেন—তখন মহাতেজস্বী ভৃগুনন্দন সেই বিষয়েই জিজ্ঞাসা করলেন—“হে বিপ্রেন্দ্রগণ! আমার মনে এই সংকল্প জেগেছে—আমি কীভাবে পবিত্র হব?”
Verse 40
(४230५ 4७६ 2“ ५. यदि वो«नुग्रहकृता बुद्धिर्मा प्रति सत्तमा: । प्रत्रूत पावनं कि मे भवेदिति तपोधना:
ভীষ্ম বললেন—“হে সত্তমগণ! হে তপোধন মহাত্মাগণ! যদি আপনারা আমার প্রতি অনুগ্রহ করতে চান, তবে বলুন—আমাকে পবিত্র করার উপায় কী হবে?”
Verse 41
ऋषय ऊचुर गाश्व भूमिं च वित्त च दत्त्वेह भूगुनन्दन । पापकृत् पूयते मर्त्य इति भार्गव शुश्रुम
ঋষিরা বললেন—ভৃগুনন্দন! হে ভার্গব, আমরা শুনেছি যে পাপকারী মর্ত্য এই লোকেই গাভী, অশ্ব, ভূমি ও ধন দান করলে পবিত্র হয়।
Verse 42
अन्यद् दानं तु विप्रर्षे श्रूयतां पावनं महत् । दिव्यमत्यद्भुताकारमपत्यं जातवेदस:
ভীষ্ম বললেন—হে ব্রাহ্মণঋষিদের শ্রেষ্ঠ! আর-এক প্রকার দান শোনো—মহান ও পবিত্রকারী। তা জাতবেদস্ (অগ্নি) থেকে জন্ম নেওয়া, দিব্য এবং অতিশয় আশ্চর্যাকার এক সন্তান।
Verse 43
ब्रह्मर्ष! एक दूसरी वस्तुका दान भी सुनो। वह वस्तु सबसे बढ़कर पावन है। उसका आकार अत्यन्त अद्भुत और दिव्य है तथा वह अग्निसे उत्पन्न हुई है ।।
হে ব্রহ্মর্ষি, আর-এক দানও শোনো। তা সকল দানের মধ্যে সর্বোচ্চ পবিত্রকারী। তার রূপ অতিশয় আশ্চর্য ও দিব্য, এবং তা অগ্নিজ। আমরা শুনেছি, প্রাচীন কালে অগ্নি লোকসমূহ দগ্ধ করে নিজের তেজে ‘সুবর্ণ’ নামে খ্যাত বস্তুটিকে প্রকাশ করেছিল। সেটি দান করলে তুমি সিদ্ধি লাভ করবে।
Verse 44
ततोअब्रवीद् वसिष्ठस्तं भगवान् संशितव्रतः । शृणु राम यथोत्पन्नं सुवर्णमनलप्रभम्
তখন কঠোর ব্রতপরায়ণ ভগবান বশিষ্ঠ তাঁকে বললেন—হে রাম, শোনো, অগ্নির ন্যায় দীপ্তিমান সুবর্ণ কীভাবে উৎপন্ন হয়েছিল।
Verse 45
तदनन्तर कठोर व्रतका पालन करनेवाले भगवान् वसिष्ठने कहा--*परशुराम! अग्निके समान प्रकाशित होनेवाला सुवर्ण जिस प्रकार प्रकट हुआ है, वह सुनो ।।
তারপর কঠোর ব্রতপালনে স্থিত ভগবান বশিষ্ঠ বললেন—পরশুরাম, শোনো, অগ্নির ন্যায় দীপ্তিমান সুবর্ণ কীভাবে প্রকাশিত হয়েছিল। আমি তোমাকে সেই দানের কথা বলব, যা এখানে দানে সর্বোচ্চ ফলদায়ক বলা হয়েছে—সুবর্ণ কী, তা কিসে থেকে জন্মায়, এবং কীভাবে গুণে সর্বোত্তম হয়।
Verse 46
अग्नीषोमात्मकमिदं सुवर्ण विद्धि निश्चये
ভীষ্ম বললেন—“নিশ্চয় জেনে রাখো, এই স্বর্ণ অগ্নি ও সোমের স্বভাবস্বরূপ।”
Verse 47
अजोडन्निर्वरुणो मेष: सूर्यो5श्व॒ इति दर्शनम् “यह सुवर्ण अग्नि और सोमरूप है। इस बातको तुम निश्चितरूपसे जान लो। बकरा, अग्नि, भेड़, वरुण तथा घोड़ा सूर्यका अंश है। ऐसी दृष्टि रखनी चाहिये ।।
ভীষ্ম বললেন—“ঋষিদের এই দৃষ্টি: ছাগলকে অগ্নি, মেষকে বরুণ, আর অশ্বকে সূর্যরূপে ভাবতে হবে। আর নিশ্চিত জেনে রাখো—স্বর্ণ অগ্নি ও সোমের স্বভাবস্বরূপ। হে ভৃগুনন্দন, হাতি, হরিণ ও নাগ—নাগ-স্বভাবের অংশ; মহিষেরা অসুর-স্বভাবের অংশ; কুক্কুট ও বরাহ রাক্ষস-স্বভাবের অংশ। আর স্মৃতিমতে ইড়া, গাভী, দুধ ও সোম—এ সবই ভূমিরূপ বলে স্মরণ করা হয়।”
Verse 48
कुक्कुटाश्व वराहाश्न राक्षसा भृगुनन्दन । इडा गाव: पय: सोमो भूमिरित्येव च स्मृति:
ভীষ্ম বললেন—“হে ভৃগুনন্দন, কুক্কুট, অশ্ব ও বরাহ রাক্ষস-স্বভাবের বলে কথিত। আর স্মৃতিমতে ইড়া, গাভী, দুধ ও সোম—এ সবই ভূমিরূপ।”
Verse 49
जगत सर्व च निर्मथ्य तेजोराशि: समुत्थित: । सुवर्णमे भ्यो विप्रर्षे रत्नं परममुत्तमम्
ভীষ্ম বললেন—“সমগ্র জগতকে যেন মন্থন করলে যে তেজের পুঞ্জ উদ্ভূত হয়, সেই তেজই স্বর্ণ। অতএব, হে শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণ, এটি পরম ও সর্বোত্তম রত্ন।”
Verse 50
एतस्मात् कारणाद् देवा गन्धर्वोरगराक्षसा: । मनुष्याश्न पिशाचाश्व प्रयता धारयन्ति तत्
ভীষ্ম বললেন—“এই কারণেই দেব, গন্ধর্ব, উরগ (নাগ) ও রাক্ষস—এবং মানুষ ও পিশাচরাও—সতর্কভাবে সেই বিধানকে ধারণ ও পালন করে।”
Verse 51
“इसीलिये देवता, गन्धर्व, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच--ये सब प्रयत्नपूर्वक सुवर्ण धारण करते हैं ।। मुकुटैरज़रदयुतैरलंकारै: पृथग्विधै: । सुवर्णविकृतैस्तत्र विराजन्ते भृगूत्तम
ভীষ্ম বললেন—এই কারণেই দেবতা, গন্ধর্ব, নাগ, রাক্ষস, মানুষ ও পিশাচ—সকলেই যত্নসহকারে স্বর্ণ ধারণ করে। অজর দীপ্তির মুকুট ও স্বর্ণনির্মিত নানাবিধ অলংকারে বিভূষিত হয়ে তারা সেখানে উজ্জ্বল হয়ে ওঠে, হে ভৃগুশ্রেষ্ঠ।
Verse 52
'भृगुश्रेष्ठ! वे सोनेके बने हुए मुकुट, बाजूबंद तथा अन्य नाना प्रकारके अलंकारोंसे सुशोभित होते हैं ।।
হে ভৃগুশ্রেষ্ঠ! তারা স্বর্ণনির্মিত মুকুট, বাহুবন্ধ এবং আরও নানাবিধ অলংকারে সুসজ্জিত হয়। অতএব সকল পবিত্র বস্তুর মধ্যে স্বর্ণকেই পরম পবিত্র বলা হয়েছে। হে মনুষ্যশ্রেষ্ঠ! ভূমি, গাভী ও রত্নাদি থেকেও তাকে অধিক পবিত্র বলে জেনে রাখো।
Verse 53
पृथिवीं गाश्च दत्त्वेह यच्चान्यदपि किंचन । विशिष्यते सुवर्णस्य दानं परमकं॑ विभो
এখানে পৃথিবী ও গাভী দান করলেও, এবং আর যা কিছুই দান করা যায়—সকল দানের মধ্যে স্বর্ণদানই সর্বোত্তম, হে বিভো।
Verse 54
“विभो! पृथ्वी, गौ तथा और जो कुछ भी दान किया जाता है, उन सबसे बढ़कर सुवर्णका दान है ।।
হে বিভো! ভূমি, গাভী এবং যা কিছুই দান করা হয়—সকল দানের মধ্যে স্বর্ণদান শ্রেষ্ঠ। হে দেবসম দীপ্তিমান পরশুরাম! স্বর্ণ অক্ষয় ফলদায়ী ও পবিত্র; অতএব তুমি শ্রেষ্ঠ দ্বিজদের—ব্রাহ্মণদের—এই উত্তম, পবিত্র বস্তুই দান করো।
Verse 55
सुवर्णमेव सर्वासु दक्षिणासु विधीयते । सुवर्ण ये प्रयच्छन्ति सर्वदास्ते भवन्त्युत
সকল দক্ষিণার মধ্যে স্বর্ণই বিশেষভাবে বিধেয়। যারা স্বর্ণ দান করে, তারা নিশ্চয়ই সর্বদা দাতা হয়ে থাকে।
Verse 56
सब दक्षिणाओंमें सुवर्णका ही विधान है; अतः जो सुवर्ण दान करते हैं, वे सब कुछ दान करनेवाले होते हैं ।।
ভীষ্ম বললেন— সকল দক্ষিণা ও দানের মধ্যে বিশেষভাবে স্বর্ণদানেরই বিধান আছে; অতএব যারা স্বর্ণ দান করে, তারা যেন সর্বদ্রব্যই দান করল বলে গণ্য হয়। যারা স্বর্ণ দেয়, তারা দেবতাদেরই অর্ঘ্য দেয়; কারণ অগ্নি সর্বদেবতাময়, আর স্বর্ণ অগ্নিরই স্বরূপ।
Verse 57
तस्मात् सुवर्ण ददता दत्ता: सर्वाः सम देवता: । भवन्ति पुरुषव्याप्र न हतः परमं विदुः
অতএব, হে পুরুষব্যাঘ্র! যে স্বর্ণ দান করে, তার দ্বারা সকল দেবতাকেই সমভাবে দান করা হয়েছে বলে ধরা হয়। তাই জ্ঞানীরা স্বর্ণদানের চেয়ে শ্রেষ্ঠ আর কোনো দান মানেন না।
Verse 58
भूय एव च माहात्म्यं सुवर्णस्य निबोध मे । गदतो मम वित्रर्षे सर्वशस्त्रभृतां वर,“सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ विप्ररषे! मैं पुनः सुवर्णका माहात्म्य बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो
হে বিপ্রর্ষে, সকল অস্ত্রধারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ! আবারও আমার মুখে স্বর্ণের মাহাত্ম্য জানো; আমি যা বলছি, মনোযোগ দিয়ে শোনো।
Verse 59
मया श्रुतमिदं पूर्व पुराणे भूगुनन्दन । प्रजापते: कथयतो यथान्यायं तु तस्य वै,'भुगुनन्दन! मैंने पहले पुराणमें प्रजापतिकी कही हुई यह न्यायोचित बात सुन रखी है
হে ভৃগুনন্দন! আমি পূর্বে এক পুরাণে এ কথা শুনেছি—প্রজাপতি ন্যায় ও বিধির অনুরূপ করে তা বলেছিলেন।
Verse 60
शूलपाणेर्भगवतो रुद्रस्य च महात्मन: । गिरौ हिमवति श्रेष्ठे तदा भूगुकुलोद्वह
হে ভৃগুকুলশ্রেষ্ঠ! এ কথা সেই সময়ের, যখন শ্রেষ্ঠ হিমালয় পর্বতে শূলপাণি মহাত্মা ভগবান রুদ্রের প্রসঙ্গ ঘটেছিল।
Verse 61
देव्या विवाहे निर्वेत्ते रुद्राण्या भुगुनन्दन । समागमे भगवतो देव्या सह महात्मन:
ভীষ্ম বললেন— হে ভৃগুনন্দন! দেবী রুদ্রাণীর বিবাহ-সংস্কার যথাবিধি সম্পন্ন হলে, এবং মহাত্মা ভগবান রুদ্র (শিব) দেবীর সঙ্গে অন্তরঙ্গ সান্নিধ্যে যুক্ত থাকাকালে—সেই সময়েই এই ঘটনা ঘটেছিল।
Verse 62
तत: सर्वे समुद्विग्ना देवा रुद्रमुपागमन् । ते महादेवमासीनं देवीं च वरदामुमाम्,“उस समय सब देवता उद्विग्न होकर कैलास-शिखरपर बैठे हुए महान् देवता रुद्र और वरदायिनी देवी उमाके पास गये
তখন সকল দেবতা উদ্বিগ্ন হয়ে রুদ্রের কাছে গেলেন। তাঁরা কৈলাসশিখরে আসীন মহাদেবের এবং বরদায়িনী দেবী উমার নিকট উপস্থিত হলেন।
Verse 63
प्रसाद्य शिरसा सर्वे रुद्रमूचुर्भगूद्वह । अयं॑ समागमो देव देव्या सह तवानघ
তাঁরা সকলে মস্তক নত করে রুদ্রকে প্রসন্ন করে বললেন—“হে দেব! হে নিষ্পাপ! দেবীর সঙ্গে আপনার উদ্দেশ্যেই এই সমাবেশ ঘটেছে।”
Verse 64
अमोघतेजास्त्वं देव देवी चेयमुमा तथा
হে দেব! আপনার তেজ অমোঘ; এবং এই দেবী উমাও তেমনই।
Verse 65
अपत्यं युवयोदेव बलवद् भविता विभो | तन्ूनं त्रिषु लोकेषु न किज्चिच्छेषयिष्यति
হে বিভো! আপনাদের উভয়ের সন্তান অতিশয় বলবান হবে; নিশ্চয়ই সে ত্রিলোকে কিছুই অবশিষ্ট রাখবে না (সবই বশ করবে)।
Verse 66
'देव! प्रभो! आपका तेज अमोघ है। ये देवी उमा भी ऐसी ही अमोघ तेजस्विनी हैं। आप दोनोंकी जो संतान होगी वह अत्यन्त प्रबल होगी। निश्चय ही वह तीनों लोकोंमें किसीको शेष नहीं रहने देगी ।।
ভীষ্ম বললেন— হে দেব, হে প্রভু! আপনার তেজ অমোঘ। এই দেবী উমাও তেমনি অপ্রতিরোধ্য তেজস্বিনী। আপনাদের দু’জনের যে সন্তান জন্মাবে, সে হবে অতিশয় প্রবল; নিশ্চয়ই সে ত্রিলোকে কাউকেই অবশিষ্ট রাখবে না। অতএব, হে প্রশস্তনয়ন, এই প্রণত দেবগণের প্রতি, হে লোকেশ্বর, ত্রিলোকের মঙ্গলকামনায় এক বর প্রদান করুন। হে বিশালনয়ন লোকেশ্বর! আমরা সকল দেবতা আপনার চরণে লুটিয়ে পড়েছি; ত্রিলোকের কল্যাণের জন্য আমাদের বর দিন।
Verse 67
अपत्यार्थ निगृह्लीष्व तेज: परमकं विभो | त्रैलोक्यसारौ हि युवां लोक॑ संतापयिष्यथ:
প্রভু! সন্তানের জন্য যে আপনার পরম উৎকৃষ্ট তেজ প্রকাশিত হচ্ছে, তা আপনি নিজের অন্তরেই সংযত করুন। আপনারা দু’জনই ত্রিলোকের সারস্বরূপ; অতএব আপনাদের সন্তানের দ্বারা সমগ্র জগৎ দগ্ধ-সন্তপ্ত হয়ে উঠবে।
Verse 68
तदपत्यं हि युवयोर्देवानभिभवेद् ध्रुवम् । नहि ते पृथिवी देवी न च द्यौर्न दिवं विभो
আপনাদের দু’জনের যে পুত্র জন্মাবে, সে নিশ্চয়ই দেবতাদেরও পরাভূত করবে। প্রভু! আমাদের দৃঢ় বিশ্বাস—না পৃথিবীদেবী, না আকাশ, না স্বর্গ—কেউই আপনার তেজ ধারণ করতে পারবে না। এরা সকলেই একত্র হলেও এই তেজ বহন করতে অক্ষম। আপনার তেজের প্রভাবে সমগ্র জগৎ ভস্মীভূত হয়ে যাবে।
Verse 69
नेदं धारयितुं शक्ता: समस्ता इति मे मतिः । तेज:प्रभावनिर्दग्धं॑ तस्मात् सर्वमिदं जगत्
আমার মতে, এরা সকলেই একত্র হলেও এই (আপনার) তেজ ধারণ করতে সক্ষম নয়। অতএব সেই তেজের দাহক প্রভাবে এই সমগ্র জগৎ দগ্ধ হয়ে ভস্মীভূত হবে।
Verse 70
तस्मात् प्रसाद भगवन् कर्तुमहसि नः प्रभो । न देव्यां सम्भवेत् पुत्रो भवत: सुरसत्तम । धैयदिव निगृह्लीष्व तेजो ज्वलितमुत्तमम्
অতএব, হে ভগবান, হে প্রভু! আমাদের প্রতি প্রসন্ন হোন। হে দেবশ্রেষ্ঠ! আমরা এটাই চাই—দেবীর গর্ভে আপনার কোনো পুত্র যেন জন্ম না নেয়। ধৈর্যসহকারে আপনার সেই প্রজ্বলিত উৎকৃষ্ট তেজ অন্তরে সংযত করুন।
Verse 71
इति तेषां कथयतां भगवान् वृषभध्वज: । एवमस्त्विति देवांस्तान् विप्रर्षे प्रत्यभाषत,“विप्रर्ष! देवताओंके ऐसा कहनेपर भगवान् वृषभध्वजने उनसे 'एवमस्तु” कह दिया
দেবতারা এভাবে বলছিলেন, তখন ভগবান বৃষভধ্বজ, হে মহর্ষি, তাঁদের প্রতি উত্তর দিলেন—“এবমস্তু”—“তাই হোক।”
Verse 72
इत्युक्त्वा चोर्ध्वमनयद् रेतो वृषभवाहन: । ऊर्ध्वरेता: समभवत् तत: प्रभूति चापि सः
দেবতাদের প্রতি এ কথা বলে বৃষভবাহন শঙ্কর তাঁর রেতস্ (বীর্য) ঊর্ধ্বদিকে সংযত করলেন; সেই সময় থেকেই তিনি ‘ঊর্ধ্বরেতা’ নামে প্রসিদ্ধ হলেন।
Verse 73
रुद्राणीति ततः क्रुद्धा प्रजोच्छेदे तदा कृते । देवानथाब्रवीत् तत्र स्त्रीभावात् परुषं वच:
তখন নিজের সন্তানের বিনাশ ঘটানো হয়েছে ভেবে রুদ্রাণী ক্রুদ্ধ হলেন এবং নারীর স্বভাববশত সেখানে দেবতাদের প্রতি কঠোর বাক্য উচ্চারণ করলেন।
Verse 74
यस्मादपत्यकामो वै भर्ता मे विनिवर्तित: । तस्मात् सर्वे सुरा यूयमनपत्या भविष्यथ
যেহেতু সন্তানকামী আমার স্বামীকে তোমরা নিবৃত্ত করেছ, তাই তোমরা সকল দেবতাই নিঃসন্তান হবে।
Verse 75
“देवताओ! मेरे पतिदेव मुझसे संतान उत्पन्न करना चाहते थे, किंतु तुमलोगोंने इन्हें इस कार्यसे निवृत्त कर दिया; इसलिये तुम सभी देवता निर्वश हो जाओगे ।।
হে আকাশচারী দেবগণ! আজ তোমরা সকলে মিলিত হয়ে আমার সন্ততির উচ্ছেদ করেছ; অতএব তোমাদের সকলেরও কোনো সন্তান হবে না।
Verse 76
पावकस्तु न तत्रासीच्छापकाले भृगूद्धह | देवा देव्यास्तथा शापादनपत्यास्ततो5भवन्,भुगुश्रेष्ठ उस शापके समय वहाँ अग्निदेव नहीं थे; अतः उनपर यह शाप लागू नहीं हुआ। अन्य सब देवता देवीके शापसे संतानहीन हो गये
ভীষ্ম বললেন— হে ভৃগুশ্রেষ্ঠ! শাপ উচ্চারিত হওয়ার সময় সেখানে পাবক (অগ্নিদেব) উপস্থিত ছিলেন না; তাই সেই শাপ তাঁর উপর কার্যকর হয়নি। কিন্তু অন্যান্য সকল দেবতা দেবীর শাপে পরে নিঃসন্তান হয়ে গেলেন।
Verse 77
रुद्रस्तु तेजो5प्रतिमं धारयामास वै तदा । प्रस्कन्नं तु ततस्तस्मात् किंचित्तत्रापतद् भुवि
ভীষ্ম বললেন— সেই সময় রুদ্রদেব তাঁর অতুল তেজ (বীর্য) সংযত করেছিলেন; তবু তার সামান্য অংশ স্খলিত হয়ে সেখানেই পৃথিবীতে পতিত হল।
Verse 78
उत्पपात तदा वह्नौ ववृधे चादूभुतोपमम् । तेजस्तेजसि संयुक्तमात्मयोनित्वमागतम्
ভীষ্ম বললেন— তখন সেই তেজ অগ্নির মধ্যে পতিত হয়ে উচ্ছ্বসিত হল এবং আশ্চর্যরূপে বৃদ্ধি পেল। অগ্নির তেজের সঙ্গে যুক্ত হয়ে সেই তেজ স্বয়ম্ভূ পুরুষরূপে প্রকাশ পেতে লাগল।
Verse 79
एतस्मिन्नेव काले तु देवा: शक्रपुरोगमा: । असुरस्तारको नाम तेन संतापिता भृशम्,इसी समय तारक नामक एक असुर उत्पन्न हुआ था, जिसने इन्द्र आदि देवताओंको अत्यन्त संतप्त कर दिया था
ভীষ্ম বললেন— ঠিক সেই সময় শক্র (ইন্দ্র) অগ্রগণ্য দেবতারা তারক নামক এক অসুরের দ্বারা ভীষণভাবে পীড়িত হলেন।
Verse 80
आदित्या वसवो रुद्रा मरुतो5थाश्चिनावपि | साध्याश्च सर्वे संत्रस्ता दैतेयस्य पराक्रमात्,आदित्य, वसु, रुद्र, मरुदगण, अश्विनीकुमार तथा साध्य--सभी देवता उस दैत्यके पराक्रमसे संत्रस्त हो उठे थे
ভীষ্ম বললেন— আদিত্যগণ, বসুগণ, রুদ্রগণ, মরুতগণ, এমনকি অশ্বিনীকুমারদ্বয়—সাধ্যসহ সকল দেবতাই সেই দৈত্যের পরাক্রমে আতঙ্কিত হয়ে উঠলেন।
Verse 81
स्थानानि देवतानां हि विमानानि पुराणि च । ऋषीणां चाश्रमाश्वचैव बभूवुरसुरैर््वता:,असुरोंने देवताओंके स्थान, विमान, नगर तथा ऋषियोंके आश्रम भी छीन लिये थे
ভীষ্ম বললেন—অসুরেরা দেবতাদের পবিত্র আবাসস্থান, তাদের প্রাচীন বিমান ও নগর, এমনকি ঋষিদের আশ্রমও দখল করে নিল। এতে বোঝা যায়, অধর্ম কেবল হিংসায় নয়—উপাসনা, তপস্যা ও বিশ্বব্যবস্থার রক্ষার জন্য প্রতিষ্ঠিত পবিত্র স্থান দখল ও অপবিত্র করার মধ্য দিয়েও প্রকাশ পায়।
Verse 82
ते दीनमनस: सर्वे देवता ऋषयश्न ये । प्रजग्मु: शरण देवं ब्रह्माणमजरं विभुम्,वे सब देवता और ऋषि दीनचित्त हो अजर-अमर एवं सर्वव्यापी देवता भगवान् ब्रह्माकी शरणमें गये
ভীষ্ম বললেন—সকল দেবতা ও ঋষি মন বিষণ্ণ করে অজর, সর্বব্যাপী দেব ব্রহ্মার শরণে গেলেন, বিপদের মুহূর্তে রক্ষা ও পথনির্দেশ প্রার্থনা করতে।
Verse 83
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपवके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोलोकका वर्णनविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে গোলোক-বর্ণন বিষয়ক তিরাশি-তম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 84
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सुवर्णोत्पत्तिर्नाम चतुरशीतितमो<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে ‘সুবর্ণোৎপত্তি’ নামক চুরাশি-তম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 226
विज्ञानेन तवानेन यन्न मुहा[सि धर्मतः । तदनन्तर स्वप्नमें पितरोंने मुझे दर्शन दिया और प्रसन्नतापूर्वक मुझसे कहा --'भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे इस शास्त्रीय ज्ञानसे हम बहुत प्रसन्न हैं; क्योंकि उसके कारण तुम्हें धर्मके विषयमें मोह नहीं हुआ
ভীষ্ম বললেন—“তোমার এই বিবেচনাশক্তির ফলে তুমি ধর্ম বিষয়ে মোহগ্রস্ত হওনি। তারপর স্বপ্নে পিতৃগণ আমাকে দর্শন দিলেন এবং প্রসন্ন হয়ে বললেন—‘ভরতশ্রেষ্ঠ! তোমার এই শাস্ত্রজ্ঞান আমাদের অত্যন্ত সন্তুষ্ট করেছে; কারণ এর দ্বারা তুমি ধর্ম সম্পর্কে বিভ্রান্ত হওনি।’”
Verse 246
प्रमाणमुपनीता वै स्थिताश्व न विचालिता: । 'पृथ्वीनाथ! तुमने यहाँ शास्त्रको प्रमाण मानकर आत्मा
হে পৃথিবীনাথ! তুমি এখানে শাস্ত্রকে প্রমাণরূপে গ্রহণ করে আত্মা, ধর্ম, শাস্ত্র, বেদ, পিতৃগণ, ঋষিগণ, গুরু, প্রজাপতি ও ব্রহ্মাজী—এ সকলের মর্যাদা বৃদ্ধি করেছ; আর যারা ধর্মে প্রতিষ্ঠিত, তাদেরও তুমি নিজের আদর্শ দেখিয়ে বিচলিত হতে দাওনি।
Verse 253
किं तु भूमेर्गवां चार्थे सुवर्ण दीयतामिति । “भरतश्रेष्ठ यह सब कार्य तो तुमने बहुत उत्तम किया है; किंतु अब हमारे कहनेसे भूमिदान और गोदानके निष्क्रयरूपसे कुछ सुवर्णदान भी करो
“হে ভরতশ্রেষ্ঠ! এ সকল কর্ম তুমি অতি উত্তমভাবে সম্পন্ন করেছ; কিন্তু এখন আমাদের কথামতো ভূমিদান ও গোদানের নিষ্ক্রয়রূপে কিছু স্বর্ণদানও করো।”
Verse 266
पाविता वै भविष्यन्ति पावन हि परं हि तत् | “धर्मज्ञ! ऐसा करनेसे हम और हमारे सभी पितामह पवित्र हो जायूँगे; क्योंकि सुवर्ण सबसे अधिक पावन वस्तु है
“হে ধর্মজ্ঞ! এভাবে করলে আমরা এবং আমাদের সকল পিতামহ পবিত্র হব; কারণ স্বর্ণকে সর্বাধিক পবিত্র বস্তু বলে মানা হয়।”
Verse 283
सुवर्णदानेडकरवं मतिं च भरतर्षभ | 'जो सुवर्ण दान करते हैं, वे अपने पहले और पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंका उद्धार कर देते हैं।।
“হে ভরতবৃষভ! তখন আমার মন স্বর্ণদানের দিকে প্রবৃত্ত হল। যারা স্বর্ণ দান করে, তারা নিজেদের পূর্বের দশ এবং পরের দশ প্রজন্মকে উদ্ধার করে। রাজন! আমার পিতৃগণ যখন এ কথা বললেন, তখন আমার নিদ্রা ভেঙে গেল। সেই সময় স্বপ্নের স্মরণে আমি গভীর বিস্ময়ে অভিভূত হলাম। হে প্রজানাথ, ভরতশ্রেষ্ঠ! তখনই আমি স্বর্ণদান করার দৃঢ় সংকল্প করলাম।”
Verse 293
जामदग्न्यं प्रति विभो धन्यमायुष्यमेव च । राजन्! अब (सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके माहात्म्यके विषयमें) एक प्राचीन इतिहास सुनो जो जमदग्निनन्दन परशुरामजीसे सम्बन्ध रखनेवाला है। विभो! यह आख्यान धन तथा आयुकी वृद्धि करनेवाला है
“রাজন! এখন স্বর্ণের উৎপত্তি ও তার মাহাত্ম্য বিষয়ে জামদগ্নিনন্দন পরশুরামের সঙ্গে সম্পর্কিত এক প্রাচীন ইতিহাস শোনো। হে বিভো! এই আখ্যান ধন ও আয়ু বৃদ্ধি করে বলে কথিত।”
Verse 303
त्रि:सप्तकृत्वः पृथिवी कृता निः:क्षत्रिया पुरा । पूर्वकालकी बात है, जमदग्निकुमार परशुरामजीने तीव्र रोषमें भरकर इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य कर दिया था
ভীষ্ম বললেন—প্রাচীন কালে একুশবার পৃথিবী ক্ষত্রিয়শূন্য করা হয়েছিল। জমদগ্নিপুত্র পরশুরাম তীব্র ক্রোধে উদ্দীপ্ত হয়ে বারংবার ক্ষত্রিয়দের নিঃশেষ করেছিলেন।
Verse 336
नैवात्मनो5थ लघुतां जामदग्न्यो5ध्यगच्छत । यद्यपि अश्वमेध यज्ञ समस्त प्राणियोंको पवित्र करनेवाला तथा तेज और कान्तिको बढ़ानेवाला है तथापि उसके फलसे तेजस्वी परशुरामजी सर्वथा पापमुक्त न हो सके। इससे उन्होंने अपनी लघुताका अनुभव किया
ভীষ্ম বললেন—জমদগ্নিপুত্র পরশুরাম আত্মার প্রকৃত লঘুতা লাভ করতে পারেননি। যদিও অশ্বমেধ যজ্ঞ সর্বপ্রাণীকে পবিত্র করে এবং তেজ ও কান্তি বৃদ্ধি করে বলে খ্যাত, তবু তার ফলেও তেজস্বী পরশুরাম সম্পূর্ণ পাপমুক্ত হতে পারলেন না; তখন তিনি নিজের ক্ষুদ্রতা উপলব্ধি করলেন।
Verse 396
केन वा कर्मयोगेन प्रदानेनेह केन वा । “और वे महाज्ञानी महर्षिगण जो कुछ बतावें
ভীষ্ম বললেন—“কোন কর্মযোগে, অথবা এখানে কোন দানে মানুষ শুদ্ধ হয়?” এই উপদেশ শুনে যে “মহাজ্ঞানী মহর্ষিগণ যা বলেন, তা আনন্দচিত্তে পালন করো”, মহাতেজস্বী ভৃগুনন্দন পরশুরাম বশিষ্ঠ, নারদ, অগস্ত্য ও কশ্যপের নিকট গিয়ে জিজ্ঞাসা করলেন—“বিপ্রশ্রেষ্ঠগণ! আমি শুদ্ধ হতে চাই; কোন কর্মানুষ্ঠানে বা কোন দানে আমি পবিত্র হতে পারি?”
Verse 453
तन्निबोध महाबाहो सर्व निगदतो मम । 'सुवर्णका दान तुम्हें उत्तम फल देगा; क्योंकि वह दानके लिये सर्वोत्तम बताया जाता है। महाबाहो! सुवर्णका जो स्वरूप है
ভীষ্ম বললেন—হে মহাবাহো, আমি যা বলছি তা মনোযোগ দিয়ে বোঝো। স্বর্ণদান তোমাকে শ্রেষ্ঠ ফল দেবে, কারণ দানসমূহের মধ্যে একে সর্বোত্তম বলা হয়েছে। হে মহাবাহো, স্বর্ণের স্বরূপ কী, তা কোথা থেকে উৎপন্ন, এবং কীভাবে তা বিশেষ গুণদায়ক—সবই আমি বলছি; শোনো।
Verse 636
तपस्विनस्तपस्विन्या तेजस्विन्याउइतितेजस: । भुगुश्रेष्ठ॒ वहाँ उन सबने उन दोनोंके चरणोंमें मस्तक झुकाकर उन्हें प्रसन्न करके भगवान् रुद्रसे कहा--*पापरहित महादेव! यह जो देवी पार्ववीके साथ आपका समागम हुआ है
ভীষ্ম বললেন—ভৃগুশ্রেষ্ঠ প্রমুখ সকলে “তপস্বীর সঙ্গে তপস্বিনী, তেজস্বীর সঙ্গে তেজস্বিনী” বলে সেই দিব্য যুগলের চরণে মস্তক নত করে তাঁদের প্রসন্ন করলেন। তারপর তাঁরা ভগবান রুদ্রকে বললেন—“পাপরহিত মহাদেব! দেবী পার্বতীর সঙ্গে আপনার এই মিলন তপস্যার সঙ্গে তপস্যার, এবং মহাতেজের সঙ্গে তেজের যথাযথ সংযোগ।”
The chapter addresses the practical dharma-question of how to correctly perform śrāddha—especially which times (tithi and time-of-day) are considered efficacious or unsuitable—so that lineage obligations are met within an ordered ritual hierarchy.
Dharma is operationalized as disciplined remembrance and obligation to ancestors: pitṛ-pūjā is treated as universally valid and socially stabilizing, and correct ritual timing is framed as a means to align intention, act, and outcome.
Yes. It provides a structured tithi-phala mapping that links śrāddha performed on specific lunar days to particular results (guṇa/aguṇa), and it adds a kāla-valuation by stating aparāhṇa as superior for śrāddha performance.