
Chapter 84: Brahmā’s Counsel on Tāraka, the Search for Agni, and the Genesis of Skanda (Kārttikeya)
Upa-parva: Agni–Gaṅgā–Skanda (Tārakavadha-upāya) Narrative Unit
The gods petition Brahmā to address the asura Tāraka, empowered by a boon and afflicting devas and ṛṣis. Brahmā affirms impartiality yet rejects adharma, declaring Tāraka’s destruction necessary for the preservation of Veda and dharma, and reveals a prior arrangement: Agni will generate an offspring capable of slaying the enemy despite constraints created by Rudrāṇī’s curse that deprives the gods of progeny. The devas and sages search the three worlds for the concealed Agni. A frog from Rasātala discloses Agni’s watery concealment; Agni curses the frog’s taste (rasa) and the gods grant compensatory boons (vocalization, nocturnal movement, earth’s support). An elephant indicates Agni’s presence in an aśvattha; Agni curses elephants with an adverse tongue, then hides in the śamī. A parrot reveals this; Agni curses it with impaired speech, mitigated by the gods into a sweet but indistinct voice. The gods establish the śamī as a sacred locus for fire-production. Agni agrees to their request and proceeds to Gaṅgā, producing a tejas-laden embryo. Overwhelmed, Gaṅgā releases it on Meru; the embryo’s radiance transforms surrounding matter into gold (jātarūpa), and the child grows in a divine reed-bed, nurtured by the Kṛttikās, becoming Skanda/Kārttikeya/Guhā. The chapter concludes with an explicit valuation of gold as supremely purifying and auspicious, described as Agni–Soma in essence.
Chapter Arc: Yudhishthira, ever hungry for the surest purifier, asks of that which is most pavitra among all gifts—what act lifts a mortal beyond stain and fear. → Bhishma answers with sweeping certainty: nothing surpasses the cow in sanctity and benefit. The narration gathers force—cows sustain sacrifice through havis, nourish through milk, uphold prosperity, and become a bridge for humans across peril. → Veda-Vyasa’s voice crowns the teaching: cows are the very ‘pratishtha’ and ‘parayana’ of beings; their forms and wondrous horns appear as if shaped by desire itself, and the giver of cows attains the radiant, flower-and-fruit-laden realm of cows—Goloka—deemed difficult even for gods. → The chapter seals the promise of Go-dana with exemplars—kings famed for gifting lakhs of cows (Mandhata, Nahusha, Yayati and others) who reached the supreme station. The listener is left with a clear ladder of merit: reverence for cows, gifting with faith, and ascent to blessed worlds. → The discourse implies further gradations—how, when, and with what intention gifts should be made—inviting the next instruction in the chain of Danadharma.
Verse 1
ऑपन-माज बक। अत एकाशीतितमो<ध्याय: गौओंका माहात्म्य तथा व्यासजीके द्वारा शुकदेवसे गौओंकी, गोलोककी और गोदानकी महत्ताका वर्णन युधिछिर उवाच पवित्राणां पवित्र यच्छिष्टं लोके च यद् भवेत् । पावन परमं चैव तनमे ब्रूहि पितामह,युधिष्ठिरने कहा--पितामह! संसारमें जो वस्तु पवित्रोंमें भी पवित्र तथा लोकमें पवित्र कहकर अनुमोदित एवं परम पावन हो, उसका मुझसे वर्णन कीजिये
যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! জগতে যা পবিত্রদের মধ্যেও সর্বাপেক্ষা পবিত্র, জ্ঞানী ও শিষ্টজন যাকে সত্য পবিত্র বলে মান্য করেন, এবং যা সর্বোচ্চ পবনকারী—তা আমাকে বলুন।
Verse 2
भीष्म उवाच गावो महार्था: पुण्याश्ष॒ तारयन्ति च मानवान् | धारयन्ति प्रजाश्षेमा हविषा पयसा तथा,भीष्मजीने कहा--राजन! गौएँ महान प्रयोजन सिद्धू करनेवाली तथा परम पवित्र हैं। ये मनुष्योंको तारनेवाली हैं और अपने दूध-घीसे प्रजावर्गके जीवनकी रक्षा करती हैं
ভীষ্ম বললেন—রাজন! গাভী মহৎ উপকারসাধিনী ও পরম পুণ্যময়। তারা মানুষকে উদ্ধার করে; আর দুধ ও যজ্ঞে ব্যবহৃত ঘৃতের দ্বারা প্রজাদের কল্যাণ ও নিরাপত্তা ধারণ করে।
Verse 3
न हि पुण्यतमं किंचिद् गो भ्यो भरतसत्तम । एता: पुण्या: पवित्राश्न त्रिषु लोकेषु सत्तमा:,भरतश्रेष्ठ। गौओंसे बढ़कर परम पवित्र दूसरी कोई वस्तु नहीं है। ये पुण्यजनक, पवित्र तथा तीनों लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं
ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! গাভীর চেয়ে অধিক পুণ্যদায়ক আর কিছুই নেই। তারা নিজেই পুণ্য ও পবিত্রতার উৎস, এবং ত্রিলোকে সর্বশ্রেষ্ঠ বলে গণ্য।
Verse 4
देवानामुपरिष्टाच्च गाव: प्रतिवसन्ति वै । दत्त्वा चैतास्तारयन्ते यान्ति स्वर्ग मनीषिण:,गौएँ देवताओंसे भी ऊपरके लोकोंमें निवास करती हैं। जो मनीषी पुरुष इनका दान करते हैं, वे अपने आपको तारते हैं और स्वर्गमें जाते हैं
ভীষ্ম বললেন—গাভী দেবলোকেরও ঊর্ধ্বতর লোকসমূহে বাস করে। যে মনীষী পুরুষ তাদের দান করেন, তিনি নিজেকে উদ্ধার করে স্বর্গে গমন করেন।
Verse 5
मान्धाता यौवनाश्रवश्व ययातिर्नहुषस्तथा । गा वै ददनत: सततं सहस्रशतसम्मिता:
ভীষ্ম বললেন— মান্ধাতা, যুবনাশ্ব, যযাতি এবং নহুষ—প্রাচীন কীর্তিতে প্রসিদ্ধ এই রাজারা নিরন্তর গোধন দান করতেন; তাঁদের দান লক্ষাধিকেরও সমান ছিল।
Verse 6
अपि चात्र पुरागीतां कथयिष्यामि तेडनघ,निष्पाप नरेश! इस विषयमें मैं तुम्हें एक पुराना वृत्तान्त सुना रहा हूँ। एक समयकी बात है, परम बुद्धिमान् शुकदेवजीने नित्यकर्मका अनुष्ठान करके पवित्र एवं शुद्धचित्त होकर अपने पिता--ऋषियोंमें उत्तम श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासको, जो लोकके भूत और भविष्यको प्रत्यक्ष देखनेवाले हैं, प्रणाम करके पूछा--'पिताजी! सम्पूर्ण यज्ञोंमें कौन-सा यज्ञ सबसे श्रेष्ठ देखा जाता है?
ভীষ্ম বললেন— হে নিষ্পাপ রাজা, এ বিষয়ে আমি তোমাকে এক প্রাচীন কাহিনি বলছি। একদা পরম জ্ঞানী শুকদেব নিত্যকর্ম সম্পন্ন করে শুচি ও সংযতচিত্ত হয়ে, ঋষিদের শ্রেষ্ঠ, অতীত-ভবিষ্যৎ প্রত্যক্ষদর্শী শ্রীকৃষ্ণদ্বৈপায়ন ব্যাসকে প্রণাম করে জিজ্ঞাসা করলেন— “পিতঃ, সকল যজ্ঞের মধ্যে কোন যজ্ঞ সর্বশ্রেষ্ঠ বলে গণ্য?”
Verse 7
ऋषीणामुत्तमं धीमान् कृष्णद्वैपायनं शुक: । अभिवाद्याह्विककृतः शुचि: प्रयतमानस:,निष्पाप नरेश! इस विषयमें मैं तुम्हें एक पुराना वृत्तान्त सुना रहा हूँ। एक समयकी बात है, परम बुद्धिमान् शुकदेवजीने नित्यकर्मका अनुष्ठान करके पवित्र एवं शुद्धचित्त होकर अपने पिता--ऋषियोंमें उत्तम श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासको, जो लोकके भूत और भविष्यको प्रत्यक्ष देखनेवाले हैं, प्रणाम करके पूछा--'पिताजी! सम्पूर्ण यज्ञोंमें कौन-सा यज्ञ सबसे श्रेष्ठ देखा जाता है?
ভীষ্ম বললেন— পরম বুদ্ধিমান শুক নিত্যকর্ম সম্পন্ন করে শুচি ও সংযতচিত্ত হয়ে, ঋষিদের শ্রেষ্ঠ শ্রীকৃষ্ণদ্বৈপায়ন ব্যাসকে প্রণাম করে জিজ্ঞাসা করলেন— “পিতঃ, সকল যজ্ঞের মধ্যে কোন যজ্ঞ সর্বশ্রেষ্ঠ?”
Verse 8
पितरं परिपप्रच्छ दृष्टलोकपरावरम् | को यज्ञ: सर्वयज्ञानां वरिष्ठोडभ्युपलक्ष्यते,निष्पाप नरेश! इस विषयमें मैं तुम्हें एक पुराना वृत्तान्त सुना रहा हूँ। एक समयकी बात है, परम बुद्धिमान् शुकदेवजीने नित्यकर्मका अनुष्ठान करके पवित्र एवं शुद्धचित्त होकर अपने पिता--ऋषियोंमें उत्तम श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासको, जो लोकके भूत और भविष्यको प्रत्यक्ष देखनेवाले हैं, प्रणाम करके पूछा--'पिताजी! सम्पूर्ण यज्ञोंमें कौन-सा यज्ञ सबसे श्रेष्ठ देखा जाता है?
তিনি তাঁর পিতাকে—যিনি লোকের উচ্চ-নীচ (অতীত-ভবিষ্যৎ) প্রত্যক্ষ দেখেন—জিজ্ঞাসা করলেন: “সকল যজ্ঞের মধ্যে কোন যজ্ঞ সর্বাগ্রে গণ্য?”
Verse 9
किं च कृत्वा पर स्थान प्राप्रुवन्ति मनीषिण: । केन देवा: पवित्रेण स्वर्गमश्नन्ति वा विभो,'प्रभो! मनीषी पुरुष कौन-सा कर्म करके उत्तम स्थानको प्राप्त होते हैं तथा किस पवित्र कार्यके द्वारा देवता स्वर्गलोकका उपभोग करते हैं?
আর কোন কর্ম করে জ্ঞানীরা পরম পদ লাভ করেন? এবং হে প্রভু, কোন পবিত্র কর্মের দ্বারা দেবতারা স্বর্গলোক ভোগ করেন?
Verse 10
किं च यज्ञस्य यज्ञत्वं क्व च यज्ञ: प्रतिष्ठित: । देवानामुत्तमं कि च कि च सत्रमित: परम्,'यज्ञका यज्ञत्व क्या है? यज्ञ किसमें प्रतिष्ठित है? देवताओंके लिये कौन-सी वस्तु उत्तम है? इससे श्रेष्ठ यज्ञ क्या है?
যজ্ঞের যজ্ঞত্ব কী? যজ্ঞ কোথায় প্রতিষ্ঠিত? দেবতাদের জন্য সর্বোত্তম বস্তু কোনটি? আর এর চেয়েও শ্রেষ্ঠ কোন সত্র-যজ্ঞ?
Verse 11
पवित्राणां पवित्र च यत् तद् ब्रूहि पितर्मम । एतच्छुत्वा तु वचन व्यास: परमधर्मवित् पुत्रायाकथयत् सर्व तत्त्वेन भरतर्षभ,“पिताजी! पवित्रोंमें पवित्र वस्तु क्या है? इन सारी बातोंका मुझसे वर्णन कीजिये।” भरतश्रेष्ठ! पुत्र शुकदेवका यह वचन सुनकर परम धर्मज्ञ व्यासने उससे सब बातें ठीक-ठीक बतायीं
পিতাজি! পবিত্রদের মধ্যে যা পরম পবিত্র, তা আমাকে বলুন। হে ভরতশ্রেষ্ঠ! পুত্রের এই বাক্য শুনে পরম ধর্মজ্ঞ ব্যাস তত্ত্বসহ সব কথা তাকে বললেন।
Verse 12
व्यास उवाच गाव: प्रतिष्ठा भूतानां तथा गाव: परायणम् । गाव: पुण्या: पवित्राश्व गोधनं पावनं तथा
ব্যাস বললেন—গরুসমূহ সকল জীবের ভিত্তি, এবং তারাই পরম আশ্রয়। গরু পুণ্যময় ও পবিত্র; গোধনও তেমনি পবনকারী।
Verse 13
व्यासजी बोले--बेटा! गौएँ सम्पूर्ण भूतोंकी प्रतिष्ठा हैं। गौएँ परम आश्रय हैं। गौएँ पुण्यमयी एवं पवित्र होती हैं तथा गोधन सबको पवित्र करनेवाला है ।। पूर्वमासन्नशृंगा वै गाव इत्यनुशुश्रुम शंगार्थे समुपासन्त ता: किल प्रभुमव्ययम्,हमने सुना है कि गौएँ पहले बिना सींगकी ही थीं। उन्होंने सींगके लिये अविनाशी भगवान् ब्रह्माकी उपासना की
ব্যাস বললেন—বৎস! গরুসমূহ সকল জীবের ভিত্তি; গরুই পরম আশ্রয়। গরু পুণ্যময় ও পবিত্র, আর গোধন সকলকে পবন করে। আমরা শুনেছি, প্রাচীনকালে গরুদের শিং ছিল না; শিং লাভের জন্য তারা অবিনাশী প্রভু ব্রহ্মার উপাসনা করেছিল।
Verse 14
ततो ब्रह्मा तु गा: प्रायमुपविष्टा: समीक्ष्य ह । ईप्सितं प्रददौ ताभ्यो गोभ्य: प्रत्येकश: प्रभु:,भगवान् ब्रह्माजीने गौओंको प्रायोपवेशन (आमरण उपवास) करते देख उन गौओंमेंसे प्रत्येकको उनकी अभीष्ट वस्तु दी
তখন প্রভু ব্রহ্মা গরুদের প্রায়োপবেশন করতে বসে থাকতে দেখে, সেই গরুদের প্রত্যেককে একে একে তাদের অভীষ্ট বর দান করলেন।
Verse 15
तासां शृंगाण्यजायन्त यस्या यादृड़मनोगतम् । नानावर्णा: शृंगवन्त्यस्ता व्यरोचन्त पुत्रक
ব্যাস বললেন— সেই গাভীগুলির শিং জন্মাল; যার মনে যেমন রূপ কল্পিত ছিল, তার শিংও তেমনই হল। নানা বর্ণের শিং ধারণ করে তারা অপূর্ব দীপ্তিতে ঝলমল করল, বৎস!
Verse 16
बेटा! वरदान मिलनेके पश्चात् गौओंके सींग प्रकट हो गये। जिसके मनमें जैसे सींगकी इच्छा थी, उसके वैसे ही हो गये। नाना प्रकारके रूप-रंग और सींगसे युक्त हुई उन गौओंकी बड़ी शोभा होने लगी ।। ब्रह्मणा वरदत्तास्ता हव्यकव्यप्रदा: शुभा: | पुण्या: पवित्रा: सुभगा दिव्यसंस्थानलक्षणा:,ब्रह्माजीका वरदान पाकर गौएँ मंगलमयी, हव्य-कव्य प्रदान करनेवाली, पुण्यजनक, पवित्र, सौभाग्यवती तथा दिव्य अंगों एवं लक्षणोंसे सम्पन्न हुईं
ব্যাস বললেন— ব্রহ্মার বর লাভ করে সেই গাভীগুলি মঙ্গলময় হল, দেবতার হব্য ও পিতৃদের কব্য অর্পণে উপযুক্ত হল। তারা পুণ্যদায়িনী, পবিত্র, সৌভাগ্যবতী এবং দিব্য অঙ্গ-লক্ষণে বিভূষিত হল।
Verse 17
गावस्तेजो महद् दिव्यं गवां दान॑ प्रशस्यते । ये चैता: सम्प्रयच्छन्ति साधवो वीतमत्सरा:,गौएँ दिव्य एवं महान् तेज हैं। उनके दानकी प्रशंसा की जाती है। जो सत्पुरुष मात्सर्यका त्याग करके गौओंका दान करते हैं, वे पुण्यात्मा कहे गये हैं। वे सम्पूर्ण दानोंके दाता माने गये हैं। निष्पाप शुकदेव! उन्हें पुण्यमय गोलोककी प्राप्ति होती है
ব্যাস বললেন— গাভীদের মধ্যে মহান দিব্য তেজ আছে; তাই গোধন দান প্রশংসিত। যারা ঈর্ষা-বিদ্বেষ ত্যাগ করে এই গাভীগুলি দান করেন, সেই সাধুগণ পুণ্যবান বলে গণ্য হন।
Verse 18
ते वै सुकृतिन: प्रोक्ता: सर्वदानप्रदाश्न ते । गवां लोकं तथा पुण्यमाप्रुवन्ति च तेडनघ,गौएँ दिव्य एवं महान् तेज हैं। उनके दानकी प्रशंसा की जाती है। जो सत्पुरुष मात्सर्यका त्याग करके गौओंका दान करते हैं, वे पुण्यात्मा कहे गये हैं। वे सम्पूर्ण दानोंके दाता माने गये हैं। निष्पाप शुकदेव! उन्हें पुण्यमय गोलोककी प्राप्ति होती है
ব্যাস বললেন— তারা নিঃসন্দেহে সুকৃতী বলে ঘোষিত; তারা সর্বদানের দাতা বলে গণ্য। হে নিষ্পাপ, তারা পুণ্যময় গবলোক (গোলোক) লাভ করে।
Verse 19
यत्र वृक्षा मधुफला दिव्यपुष्पफलोपगा: । पुष्पाणि च सुगन्धीनि दिव्यानि द्विजसत्तम,द्विजश्रेष्ठ] गोलोकके सभी वृक्ष मधुर एवं सुस्वादु फल देनेवाले हैं। वे दिव्य फल- फूलोंसे सम्पन्न होते हैं। उन वृक्षोंके पुष्प दिव्य एवं मनोहर गन्धसे युक्त होते हैं
ব্যাস বললেন— হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ, সেখানে বৃক্ষগুলি মধুমধুর ফলধারী, দিব্য ফুল-ফলে সমৃদ্ধ। তাদের পুষ্প দিব্য এবং মনোহর সুগন্ধে পরিপূর্ণ।
Verse 20
सर्वा मणिमयी भूमि: सर्वकाज्चनवालुका । सर्वर्तुसुखसंस्पर्शा निष्पड़का निरजा: शुभा:,वहाँकी भूमि मणिमयी है। वहाँकी बालुका कांचनचूर्णरूप है। उस भूमिका स्पर्श सभी ऋतुओंमें सुखद होता है। वहाँ धूल और कीचड़का नाम भी नहीं है। वह भूमि सर्वथा मंगलमयी है
সেখানে ভূমি মণিময়, আর বালুকা যেন স্বর্ণচূর্ণ। সকল ঋতুতেই তার স্পর্শ সুখদ; সেখানে ধুলোও নেই, কাদাও নেই—সমগ্র ভূমি সম্পূর্ণ নির্মল ও মঙ্গলময়।
Verse 21
रक्तोत्पलवनैश्वैव मणिखण्डैर्हिरण्मयै: । तरुणादित्यसंकाशैर्भान्ति तत्र जलाशया:,वहाँके जलाशय लाल कमलवनोंसे तथा प्रातः-कालीन सूर्यके समान प्रकाशमान मणिजटित सुवर्णमय सोपानोंसे सुशोभित होते हैं
সেখানে সরোবর ও পুকুরগুলি লাল পদ্মবনের শোভায় এবং মণিখচিত স্বর্ণময় সোপানের অলংকারে দীপ্ত; তারা উদীয়মান সূর্যের মতোই জ্যোতির্ময়।
Verse 22
महार्हमणिपत्रैश्न काउचनप्रभकेसरै: । नीलोत्पलविमिश्रैश्व सरोभिर्बहुपड्कजै:,वहाँकी भूमि कितने ही सरोवरोंसे शोभा पाती है। उन सरोवरोंमें नीलोत्पलमिश्रित बहुत-से कमल खिले रहते हैं। उन कमलोंके दल बहुमूल्य मणिमय होते हैं और उनके केसर अपनी स्वर्णमयी प्रभासे प्रकाशित होते हैं
সেই ভূমি বহু সরোবরের শোভায় বিভূষিত। সেই সরোবরগুলিতে নীল উৎপলের সঙ্গে মিশে অসংখ্য পদ্ম প্রস্ফুটিত; তাদের পাপড়ি অমূল্য মণিময় এবং কেশর স্বর্ণাভ দীপ্তিতে ঝলমল করে।
Verse 23
करवीरवनै: फुल्लै: सहस्रावर्तसंवृतै: । संतानकवनै: फुल्लैर्वक्षैश्ष समलंकृता:,उस लोकमें बहुत-सी नदियाँ हैं, जिनके तटोंपर खिले हुए कनेरोंके वन तथा विकसितसंतानक (कल्पवृक्ष-विशेष) के वन एवं अन्यान्य वृक्ष उनकी शोभा बढ़ाते हैं। वे वृक्ष और वन अपने मूल भागमें सहस्रों आवर्तोंसे घिरे हुए हैं
সেই লোকেতে বহু নদী আছে। তাদের তীরে প্রস্ফুটিত করবীর (কনের) বন, বিকশিত সন্তানক (কল্পবৃক্ষবিশেষ) বন এবং অন্যান্য বৃক্ষরাজি শোভা বাড়ায়; আর সেই বৃক্ষ ও বনগুলির মূলদেশ সহস্র আবর্তে পরিবেষ্টিত।
Verse 24
निर्मलाभिश्न मुक्ताभिमणिभिश्न महाप्रभै: | उद्भूतपुलिनास्तत्र जातरूपैश्न निम्नगा:,उन नदियोंके तटोंपर निर्मल मोती, अत्यन्त प्रकाशमान मणिरत्न तथा सुवर्ण प्रकट होते हैं
সেখানে নদীগুলির তীরে নতুন নতুন বালুচর জেগে ওঠে, আর সেই স্রোতে নির্মল মুক্তা, অতিশয় দীপ্তিমান মণিরত্ন এবং স্বর্ণ প্রকাশ পায়।
Verse 25
सर्वरत्नमयैश्रित्रैरवगाढा द्रुमोत्तमै: । जातरूपमयैश्चान्यैहुताशनसमप्रभै:,कितने ही उत्तम वृक्ष अपने मूलभागके द्वारा उन नदियोंके जलमें प्रविष्ट दिखायी देते हैं। वे सर्वरत्नमय विचित्र देखे जाते हैं। कितने ही सुवर्णमय होते हैं और दूसरे बहुत-से वृक्ष प्रज्ज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होते हैं
ব্যাস বললেন—সেই নদীগুলির জলে শিকড় গভীরভাবে নিমজ্জিত বহু উৎকৃষ্ট বৃক্ষ দেখা যায়। কতকগুলি সর্বপ্রকার রত্নে নির্মিত বিচিত্র ও আশ্চর্যরূপে দীপ্ত; কতকগুলি স্বর্ণময়; আর আরও অনেক বৃক্ষ প্রজ্বলিত অগ্নির ন্যায় তেজে জ্যোতির্ময়।
Verse 26
सौवर्णा गिरयस्तत्र मणिरत्नशिलोच्चया: । सर्वरत्नमयैर्भान्ति शंगैश्वारुभिरुच्छितै:,वहाँ सोनेके पर्वत तथा मणि और रत्नोंके शैलसमूह हैं, जो अपने मनोहर, ऊँचे तथा सर्वरत्नमय शिखरोंसे सुशोभित होते हैं
ব্যাস বললেন—সেখানে স্বর্ণময় পর্বত আছে এবং মণি-রত্নের শিলাসমূহের উচ্চ স্তূপ আছে। তাদের মনোহর, উচ্চ ও সর্বরত্নময় শিখরগুলি অপূর্ব দীপ্তিতে ঝলমল করে।
Verse 27
नित्यपुष्पफलास्तत्र नगा: पत्ररथाकुला: | दिव्यगन्धरसै: पुष्पै: फलैश्न भरतर्षभ
ব্যাস বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! সেখানে বৃক্ষগুলি চিরকাল পুষ্প-ফলে ভরা এবং পাখিদের ঝাঁকে পরিপূর্ণ। তাদের ফুল ও ফলে দিব্য সুগন্ধ এবং দিব্য মধুর রস বিদ্যমান।
Verse 28
भरतश्रेष्ठ! वहाँके वृक्षोंमें सदा ही फ़ूल और फल लगे रहते हैं। वे वृक्ष पक्षियोंसे भरे होते हैं तथा उनके फूलों और फलोंमें दिव्य सुगन्ध और दिव्य रस होते हैं ।। रमन्ते पुण्यकर्माणस्तत्र नित्यं युधिष्ठिर । सर्वकामसमृद्धार्था नि:शोका गतमन्यव:,युधिष्ठिर! वहाँ पुण्यात्मा पुरुष ही सदा निवास करते हैं। गोलोकवासी शोक और क्रोधसे रहित, पूर्णकाम एवं सफलमनोरथ होते हैं
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! সেখানে বৃক্ষগুলিতে সর্বদা ফুল ও ফল থাকে; তারা পাখিদের ঝাঁকে ভরা, এবং তাদের ফুল-ফলে দিব্য সুগন্ধ ও দিব্য রস বিদ্যমান। হে যুধিষ্ঠির! সেখানে পুণ্যকর্মা জনেরা নিত্য আনন্দে রমণ করে—সকল কামনা ও উদ্দেশ্যে পরিপূর্ণ, শোকহীন এবং ক্রোধমুক্ত।
Verse 29
विमानेषु विचित्रेषु रमणीयेषु भारत । मोदन्ते पुण्यकर्माणो विहरन्तो यशस्विन:,भरतनन्दन! वहाँके यशस्वी एवं पुण्यकर्मा मनुष्य विचित्र एवं रमणीय विमानोंमें बैठकर यथेष्ट विहार करते हुए आनन्दका अनुभव करते हैं
ব্যাস বললেন—হে ভারত! সেখানে পুণ্যকর্মা ও যশস্বী জনেরা বিচিত্র ও মনোরম বিমানে আরোহন করে ইচ্ছামতো বিচরণ করতে করতে আনন্দে মেতে থাকে।
Verse 30
उपक्रीडन्ति तान् राजन् शुभाश्चाप्सरसां गणा: । एताल्लोॉकानवाप्रोति गां दत्त्वा वै युधिष्ठिर,राजन्! उनके साथ सुन्दरी अप्सराएँ क्रीड़ा करती हैं। युधिष्ठिर! गोदान करके मनुष्य इन्हीं लोकोंमें जाते हैं
ব্যাস বললেন—হে রাজন, সেখানে শুভ্র দীপ্তিময় অপ্সরাগণ তাদের সঙ্গে ক্রীড়া করে। হে যুধিষ্ঠির, গোধন দান করলে মানুষ নিশ্চয়ই এই সকল লোকই লাভ করে।
Verse 31
येषामधिपति: पूषा मारुतो बलवान् बली । ऐश्वर्ये वरुणो राजा नाममात्र युगन्धरा:,नरेन्द्र! शक्तिशाली सूर्य और बलवान् वायु जिन लोकोंके अधिपति हैं, एवं राजा वरुण जिन लोकोंके ऐश्वर्यपर प्रतिष्ठित हैं, मनुष्य गोदान करके उन्हीं लोकोंमें जाता है। गौएँ युगन्धरा, सुरूपा, बहुरूपा, विश्वरूपा तथा सबकी माताएँ हैं। शुकदेव! मनुष्य संयम- नियमके साथ रहकर गौओंके इन प्रजापतिकथित नामोंका प्रतिदिन जप करे
ব্যাস বললেন—হে নরেন্দ্র, যে সকল লোকের অধিপতি পূষা (সূর্য) ও বলবান মারুত (বায়ু), এবং যে সকল লোকের ঐশ্বর্য রাজা বরুণের অধীনে প্রতিষ্ঠিত—গোদান করলে মানুষ সেই লোকসমূহই লাভ করে। গাভীগণ ‘যুগন্ধরা’, ‘সুরূপা’, ‘বহুরূপা’, ‘বিশ্বরূপা’ এবং ‘সকলের মাতা’ নামে খ্যাত। হে শুকদেব, সংযম-নিয়মে স্থিত হয়ে প্রজাপতি-কথিত এই নামগুলি প্রতিদিন জপ কর।
Verse 32
सुरूपा बहुरूपाश्न विश्वरूपाश्व मातर: । प्राजापत्यमिति ब्रह्मन् जपेन्नित्यं यतव्रतः,नरेन्द्र! शक्तिशाली सूर्य और बलवान् वायु जिन लोकोंके अधिपति हैं, एवं राजा वरुण जिन लोकोंके ऐश्वर्यपर प्रतिष्ठित हैं, मनुष्य गोदान करके उन्हीं लोकोंमें जाता है। गौएँ युगन्धरा, सुरूपा, बहुरूपा, विश्वरूपा तथा सबकी माताएँ हैं। शुकदेव! मनुष्य संयम- नियमके साथ रहकर गौओंके इन प्रजापतिकथित नामोंका प्रतिदिन जप करे
ব্যাস বললেন—হে ব্রাহ্মণ, যিনি ব্রতসংযমে স্থিত, তিনি প্রজাপতি-প্রদত্ত গাভীর নামগুলি নিত্য জপ করুন—‘সুরূপা’, ‘বহুরূপা’, ‘বিশ্বরূপা’ এবং ‘মাতরঃ’ (সকলের মাতা)। এভাবে গো-সম্মান ও গোদান দ্বারা মানুষ সূর্য ও বায়ুর অধিপত্যযুক্ত এবং রাজা বরুণের ঐশ্বর্যে প্রতিষ্ঠিত সেই উৎকৃষ্ট লোকসমূহ লাভ করে।
Verse 33
गाश्च शुश्रूषते यश्व समन्वेति च सर्वश: । तस्मै तुष्टा: प्रयच्छन्ति वरानपि सुदुर्लभान्,जो पुरुष गौओंकी सेवा और सब प्रकारसे उनका अनुगमन करता है, उसपर संतुष्ट होकर गौएँ उसे अत्यन्त दुर्लभ वर प्रदान करती हैं
ব্যাস বললেন—যে ব্যক্তি গাভীদের সেবা করে এবং সর্বতোভাবে তাদের অনুসরণ করে, তার প্রতি প্রসন্ন হয়ে গাভীগণ তাকে অতি দুর্লভ বরও প্রদান করে।
Verse 34
द्रहोन्न मनसा वापि गोषु नित्यं सुखप्रद: । अर्चयेत सदा चैव नमस्कारैश्व पूजयेत्,गौओंके साथ मनसे भी कभी द्रोह न करे, उन्हें सदा सुख पहुँचाये, उनका यथोचित सत्कार करे और नमस्कार आदिके द्वारा उनका पूजन करता रहे
ব্যাস বললেন—গাভীদের প্রতি মনে-মনেও কখনো বিদ্বেষ না রাখবে; সর্বদা তাদের সুখ-কল্যাণ সাধন করবে। তাদের নিত্য যথোচিত সম্মান করবে এবং প্রণামাদি দ্বারা পূজা করবে।
Verse 35
दान्तः प्रीतमना नित्यं गवां व्युष्टिं तथाश्रुते । त्र्यहमुष्णं पिबेन्मूत्रं 5यहमुष्णं पिबेत् पय:,जो मनुष्य जितेन्द्रिय और प्रसन्नचित्त होकर नित्य गौओंकी सेवा करता है, वह समृद्धिका भागी होता है। मनुष्य तीन दिनोंतक गरम गोमूत्र पीकर रहे, फिर तीन दिनतक गरम गोदुग्ध पीकर रहे
ব্যাস বললেন— যে ব্যক্তি ইন্দ্রিয়সংযমী ও সদা প্রফুল্লচিত্ত হয়ে নিয়মিত গোর সেবা করে এবং বিধিবদ্ধ আচারের কথা শ্রদ্ধায় শোনে, সে সমৃদ্ধির অংশীদার হয়। তপস্যার ক্রমে তিন দিন উষ্ণ গোমূত্র পান করবে, তারপর তিন দিন উষ্ণ গোধুগ্ধ পান করবে।
Verse 36
गवामुष्णं पय: पीत्वा ऋयहमुष्णं घृतं पिबेत् । त्रयहमुष्णं घृतं पीत्वा वायुभक्षो भवेत् ऋ यहम्,गरम गोदुग्ध पीनेके पश्चात् तीन दिनोंतक गरम-गरम गोघृत पीये। तीन दिनतक गरम घी पीकर फिर तीन दिनोंतक वह वायु पीकर रहे
ব্যাস বললেন— উষ্ণ গোধুগ্ধ পান করার পরে তিন দিন উষ্ণ ঘৃত পান করবে। তিন দিন উষ্ণ ঘৃত পান করে তারপর তিন দিন কেবল বায়ুকে আহার করে থাকবে।
Verse 37
येन देवा: पवित्रेण भुज्जते लोकमुत्तमम् । यत् पवित्र पवित्राणां तद् घृतं शिरसा वहेत्,देवगण भी जिस पवित्र घृतके प्रभावसे उत्तम-उत्तम लोकका पालन करते हैं तथा जो पवित्र वस्तुओंमें सबसे बढ़कर पवित्र है, उससे घृतको शिरोधार्य करे
ব্যাস বললেন— যে পবিত্র দ্রব্যের দ্বারা দেবগণ উত্তম লোকসমূহ ভোগ ও ধারণ করেন, এবং যা পবিত্র বস্তুর মধ্যেও সর্বাধিক পবিত্র— সেই ঘৃতকে শ্রদ্ধাভরে শিরে ধারণ করবে।
Verse 38
घृतेन जुहुयादग्निं घृतेन स्वस्ति वाचयेत् । घृतं प्राशेद् घृतं दद्याद् गवां पुष्टि तथाश्रुते,गायके घीके द्वारा अग्निमें आहुति दे। घृतकी दक्षिणा देकर ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराये। घृत भोजन करे तथा गोघृतका ही दान करे। ऐसा करनेसे मनुष्य गौओंकी समृद्धि एवं अपनी पुष्टिका अनुभव करता है
ব্যাস বললেন— ঘৃত দিয়ে অগ্নিতে আহুতি দেবে, এবং ঘৃতকেই দক্ষিণা করে স্বস্তিবাচন করাবে। ঘৃত গ্রহণ করবে এবং ঘৃতই দান করবে। শ্রুতি অনুযায়ী, এতে গোর সমৃদ্ধি ও নিজের পুষ্টি লাভ হয়।
Verse 39
नि्तैश्व यवैगोभिमासं प्रश्नितयावक: । ब्रह्महत्यासमं पाप॑ सर्वमेतेन शुध्यते,गौओंके गोबरसे निकाले हुए जौकी लप्सीका एक मासतक भक्षण करे। इससे मनुष्य ब्रह्महत्या-जैसे पापसे भी छुटकारा पा जाता है
ব্যাস বলেন— নিয়ত শৃঙ্খলায় গোর উৎপন্ন দ্রব্য দিয়ে প্রস্তুত যবের লেপসি এক মাস ভক্ষণ করবে। এতে ব্রহ্মহত্যার সমান গুরুতর পাপ থেকেও সে শুদ্ধ হয়।
Verse 40
पराभवाच्च दैत्यानां देवैः शौचमिदं कृतम् । ते देवत्वमपि प्राप्ता: संसिद्धाक्ष महाबला:,जब दैत्योंने देवताओंको पराजित कर दिया, तब देवताओंने इसी प्रायश्चित्तका अनुष्ठान किया। इससे उन्हें पुनः (नष्ट हुए) देवत्वकी प्राप्ति हुई तथा वे महाबलवान् और परम सिद्ध हो गये
দৈত্যদের পরাভবে দেবতারা এই শৌচ-প্রায়শ্চিত্ত পালন করেছিলেন। তার ফলে তারা পুনরায় দেবত্ব লাভ করে মহাবলবান ও পরম সিদ্ধ হয়ে উঠলেন।
Verse 41
गाव: पवित्रा: पुण्याश्व॒ पावनं परमं महत् | ताश्च दत्त्वा द्विजातिभ्यो नर: स्वर्गमुपाशुते,गौएँ परम पावन, पवित्र और पुण्यस्वरूपा हैं। वे महान् देवता हैं। उन्हें ब्राह्मणोंको देकर मनुष्य स्वर्गका सुख भोगता है
গাভী পরম পবিত্র, পুণ্যময় এবং সর্বোচ্চ শুদ্ধিদায়িনী। তাদের দ্বিজদের (বিশেষত ব্রাহ্মণদের) দান করলে মানুষ স্বর্গসুখ ভোগ করে।
Verse 42
गवां मध्ये शुचिर्भूत्वा गोमतीं मनसा जपेत् । पुताभिरद्धिराचम्य शुचिर्भवति निर्मल:,पवित्र जलसे आचमन करके पवित्र होकर गौओंके बीचमें गोमतीमन्त्र (गोमाँ अग्नेविमाँ अश्वि इत्यादि) का मन-ही-मन जप करे। ऐसा करनेसे वह अत्यन्त शुद्ध एवं निर्मल (पापमुक्त) हो जाता है
পবিত্র জলে আচমন করে শুচি হয়ে গাভীদের মধ্যে বসে মনে মনে ‘গোমতী’ মন্ত্র জপ করুক। এতে সে অত্যন্ত শুদ্ধ ও নির্মল (পাপমুক্ত) হয়।
Verse 43
अग्निमध्ये गवां मध्ये ब्राह्मणानां च संसदि | विद्यावेदव्रतस्नाता ब्राह्मुणा: पुण्यकर्मिण:,विद्या और वेददव्रतमें निष्णात पुण्यात्मा ब्राह्मणोंको चाहिये कि वे अग्नियों और गौओंके बीचमें तथा ब्राह्मणोंकी सभामें शिष्योंको यज्ञतुल्य गोमतीविद्याकी शिक्षा दें। जो तीन राततक उपवास करके गोमती-मन्त्रका जप करता है, उसे गौओंका वरदान प्राप्त होता है
অগ্নির মধ্যে, গাভীদের মধ্যে এবং ব্রাহ্মণদের সভায়—বিদ্যা, বেদ ও ব্রতে স্নাত, পুণ্যকর্মা ব্রাহ্মণগণ (উপদেশে প্রবৃত্ত হোন)।
Verse 44
अध्यापयेरन् शिष्यान् वै गोमतीं यज्ञसम्मिताम् | त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा गोमतीं लभते वरम्,विद्या और वेददव्रतमें निष्णात पुण्यात्मा ब्राह्मणोंको चाहिये कि वे अग्नियों और गौओंके बीचमें तथा ब्राह्मणोंकी सभामें शिष्योंको यज्ञतुल्य गोमतीविद्याकी शिक्षा दें। जो तीन राततक उपवास करके गोमती-मन्त्रका जप करता है, उसे गौओंका वरदान प्राप्त होता है
তাঁরা শিষ্যদের যজ্ঞসম গোমতী-বিদ্যা শিক্ষা দিন। যে তিন রাত্রি উপবাস করে গোমতী-মন্ত্র জপ করে, সে গোধনের বর লাভ করে।
Verse 45
पुत्रकामश्न लभते पुत्रं धनमथापि वा | पतिकामा च भर्तरं सर्वकामांश्ष मानव: । गावस्तुष्टा: प्रयच्छन्ति सेविता वै न संशय:,पुत्रकी इच्छावाला पुत्र और धन चाहनेवाला धन पाता है। पतिकी इच्छा रखनेवाली सत्रीको मनके अनुकूल पति मिलता है। सारांश यह है कि गौओंकी आराधना करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। गौएँ मनुष्योंद्वारा सेवित और संतुष्ट होकर उन्हें सब कुछ देती हैं, इसमें संशय नहीं है
ব্যাস বললেন— পুত্রকাম ব্যক্তি পুত্র লাভ করে, ধনকাম ব্যক্তি ধন লাভ করে। স্বামীর আকাঙ্ক্ষা যাঁর, সেই নারী হৃদয়ের ইচ্ছামতো স্বামী পায়। সংক্ষেপে, গোরুদের সম্মান ও সেবা করলে মানুষ সকল কাম্য ফল লাভ করে। গাভীরা সেবায় সন্তুষ্ট হলে সব বর দান করে—এ বিষয়ে সন্দেহ নেই।
Verse 46
एवमेता महाभागा यज्ञिया: सर्वकामदा: । रोहिण्य इति जानीहि नैताभ्यो विद्यते परम्,इस प्रकार ये महाभाग्यशालिनी गौएँ यज्ञका प्रधान अंग हैं और सबको सम्पूर्ण कामनाएँ देनेवाली हैं। तुम इन्हें रोहिणी समझो। इनसे बढ़कर दूसरा कुछ नहीं है
ব্যাস বললেন— এইভাবে এই মহাভাগ্যশালিনী গাভীরা যজ্ঞের অঙ্গ এবং সকল কাম্য ফলদাত্রী। এদের ‘রোহিণী’ বলে জেনো; এদের চেয়ে শ্রেষ্ঠ আর কিছু নেই।
Verse 47
इत्युक्त: स महातेजा: शुक: पित्रा महात्मना । पूजयामास गां नित्यं तस्मात् त्वमपि पूजय,युधिष्ठिर! अपने महात्मा पिता व्यासजीके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी शुकदेवजी प्रतिदिन गौकी सेवा-पूजा करने लगे; इसलिये तुम भी गौओंकी सेवा-पूजा करो
ব্যাস বললেন— মহাত্মা পিতার এমন বাক্য শুনে মহাতেজস্বী শুক প্রতিদিন গাভীর পূজা ও সেবা করতে লাগলেন। অতএব তুমিও, যুধিষ্ঠির, নিত্য গাভীদের সম্মান করো এবং তাদের রক্ষা-সেবা করো।
Verse 53
गता: परमकं स्थान देवैरपि सुदुर्लभम् । युवनाश्वके पुत्र राजा मान्धाता, (सोमवंशी) नहुष और ययाति--ये सदा लाखों गौओंका दान किया करते थे; इससे वे उन उत्तम स्थानोंको प्राप्त हुए हैं, जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ हैं
ভীষ্ম বললেন— তারা পরম স্থান লাভ করেছিল, যা দেবতাদের পক্ষেও অতি দুর্লভ। যুবনাশ্বর পুত্র রাজা মান্ধাতা এবং সোমবংশীয় নহুষ ও যযাতি—এরা সর্বদা লক্ষ লক্ষ গাভী দান করত। সেই অবিরত দানের শক্তিতে তারা সেই উৎকৃষ্ট লোকসমূহে পৌঁছেছিল, যা দেবতাদেরও দুর্লভ।
Verse 80
इस प्रकार श्रीमह्ााभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে গোদান-বিষয়ক আশিতিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 81
इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके एकाशीतितमो<ध्याय:
এইভাবে পবিত্র মহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বের অন্তর্গত গোপ্রদানিকের একাশি-তম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
The dilemma is how to neutralize a harmful agent protected by a legitimate boon without violating cosmic fairness: the solution must both restrain adharma and respect the rule-structure of boons, curses, and authorized means.
Efficacy is not merely force-based; it is procedure-based. When direct action is barred, dharmic outcomes emerge through sanctioned intermediaries, disciplined intention (saṃkalpa), and alignment with cosmic order.
Yes, the concluding valuation of jātarūpa (gold) functions as a normative meta-statement: gold is declared supremely purifying and auspicious, framed as Agni–Soma in nature, thereby linking the narrative to ritual theology and ethical valuation.