
Go-dāna-phala-nirdeśa (Merit and Destinations from the Gift of Cows)
Upa-parva: Dānadharma (Go-dāna Praśaṃsā) — Discourse on the Merit of Cow-Gifts
This chapter, voiced by Vasiṣṭha, presents cows as ‘parama-pavitra’ (supremely purifying) and frames their sanctity through an etiological account: cows undertake severe austerity and receive a boon from Brahmā, establishing their elevated status and the salvific potential of their donors. The discourse then systematizes go-dāna by specifying types and attributes of cows—color, presence of calf, milkfulness, and proper adornment/covering—and correlates each donation with a distinct posthumous ‘loka’ (e.g., Brahma-, Sūrya-, Soma-, Indra-, Agni-, Yama-, Varuṇa-, Vāyu-, Kubera-, Pitṛ-, Vasū-, Sādhya-worlds, and other divine residences). The text also introduces an intention-based caution: moral taint persists or is avoided depending on the donor’s mental disposition, and even cow-dung is referenced as an instrument of purification in human and divine contexts. The chapter concludes with an expansive phalaśruti-style reward: the donor travels in a radiant aerial vehicle, enjoys celestial honors, and later is reborn among prosperous cattle-owning lineages, with duration of heavenly esteem poetically linked to the number of hairs on the donated cow.
Chapter Arc: धर्मोपदेश से दृढ़ हुए युधिष्ठिर भीष्म से विनयपूर्वक कहते हैं कि अब भी उनके मन में एक सूक्ष्म संदेह शेष है—व्रत, नियम, स्वाध्याय, दान, वेद-धारण, अध्यापन और माता-पिता-गुरु-सेवा का वास्तविक फल क्या है। → प्रश्नों की शृंखला बढ़ती जाती है: बाह्य कर्म (दान, व्रत) और आन्तरिक संयम (दम, सत्य, ब्रह्मचर्य) में कौन श्रेष्ठ है? क्या केवल कर्म से फल मिलता है, या भाव और संयम ही कर्म का प्राण हैं? → भीष्म निर्णायक स्वर में बताते हैं कि सत्य और दम का फल स्वर्ग-सुख है; ब्रह्मचर्य सर्वपाप-दाहक है; और दान का फल भी क्रोध/असंयम से नष्ट हो सकता है—इसलिए दान से भी परे ‘दम’ (क्रोध-निग्रह, इन्द्रिय-निग्रह) की महिमा है। → भीष्म माता-पिता, बड़े भाई, गुरु और आचार्य की सेवा को नरक-निवारक और लोक-प्रतिष्ठा/उत्तम स्थान-प्रदायक बताते हैं; साथ ही यह स्थापित करते हैं कि कर्म का फल तभी स्थिर है जब वह सत्य, करुणा और संयम से संयुक्त हो। → युधिष्ठिर के प्रश्नों का विस्तार आगे भी संकेतित है—धर्म के विविध अंगों में ‘श्रेष्ठता’ का क्रम और उनके सूक्ष्म भेदों पर भीष्म का उपदेश आगे के अध्यायों में और गहराएगा।
Verse 1
युधिष्ठिरने कहा--प्रभो! आपने धर्मका उपदेश करके उसमें मेरा दृढ़ विश्वास उत्पन्न कर दिया है। पितामह! अब मैं आपसे एक और संदेह पूछ रहा हूँ, उसके विषयमें मुझे बताइये
যুধিষ্ঠির বললেন—প্রভু! আপনার ধর্মোপদেশে ধর্মে আমার দৃঢ় বিশ্বাস জন্মেছে। পিতামহ! এখন আমি আপনার কাছে আর একটি সংশয় জিজ্ঞাসা করছি; অনুগ্রহ করে তার ব্যাখ্যা করুন।
Verse 2
व्रतानां कि फल प्रोक्त कीदृशं वा महाद्युते । नियमानां फलं कि च स्वधीतस्य च कि फलम्,महाद्युते! व्रतोंका क्या और कैसा फल बताया गया है? नियमोंके पालन और स्वाध्यायका भी क्या फल है?
যুধিষ্ঠির বললেন— হে মহাদ্যুতে! ব্রত পালনের ফল কী বলা হয়েছে, এবং তার স্বরূপই বা কেমন? নিয়ম পালনের ফল কী, আর স্বাধ্যায়ের ফলই বা কী, হে দীপ্তিমান?
Verse 3
दत्तस्येह फलं कि च वेदानां धारणे च किम् | अध्यापने फलं॑ कि च सर्वमिच्छामि वेदितुम्,दान देने, वेदोंको धारण करने और उन्हें पढ़ानेका क्या फल होता है? यह सब मैं जानना चाहता हूँ
যুধিষ্ঠির বললেন— দান দিলে এ লোকেই কী ফল হয়? বেদ ধারণের ফল কী? আর বেদ অধ্যাপনের ফল কী? এ সবই আমি জানতে চাই।
Verse 4
अप्रतिग्राहके कि च फलं लोके पितामह । तस्य किं च फल दृष्टं श्रुतं यस्तु प्रयच्छति
যুধিষ্ঠির বললেন— হে পিতামহ! যে এ জগতে প্রতিগ্রহ গ্রহণ করে না, তার ফল কী? আর যে দান করে—যার ফল দেখা গেছে বা শাস্ত্রে শ্রুত হয়েছে—তার ফলই বা কী?
Verse 5
स्वकर्मनिरतानां च शूराणां चापि कि फलम् । शौचे च कि फल प्रोक्त ब्रह्मचर्यें च कि फलम्
যুধিষ্ঠির জিজ্ঞাসা করলেন— নিজ নিজ কর্তব্যকর্মে অবিচল বীরদের ফল কী? শৌচ (পবিত্র আচরণ)-এর ফল কী বলা হয়েছে, আর ব্রহ্মচর্য পালনের ফলই বা কী?
Verse 6
पितृशुश्रूषणे कि च मातृशुश्रूषणे तथा । आचार्यगुरुशुश्रूषास्वनुक्रोशानुकम्पने
যুধিষ্ঠির বললেন— পিতৃসেবায় কী ফল, এবং মাতৃসেবায়ও কী ফল? আচার্য ও গুরুর সেবায়, আর প্রাণীদের প্রতি অনুক্রোশ ও অনুকম্পা ধারণ করলে কী ফল লাভ হয়?
Verse 7
एतत् सर्वमशेषेण पितामह यथातथम् | वेत्तुमिच्छामि धर्मज्ञ परं कौतूहलं हि मे
যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ, এ সবকিছু অবশিষ্ট না রেখে যথাযথভাবে, যেমন সত্যিই আছে তেমন করেই আমি জানতে চাই। হে ধর্মজ্ঞ, আমার কৌতূহল গভীর; সম্পূর্ণ ও নির্ভুল বিবরণ আমি প্রার্থনা করি।
Verse 8
धर्मज्ञ पितामह! यह सब मैं यथावत् रूपसे जानना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ।।
ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির, যে ব্যক্তি শাস্ত্রে যেমন নির্দিষ্ট আছে তেমনই ব্রত গ্রহণ করে, এবং যথাযথভাবে আরম্ভ করে তা অখণ্ডভাবে পালন করে—সে চিরন্তন লোকসমূহ লাভ করে।
Verse 9
नियमानां फल राजन प्रत्यक्षमिह दृश्यते | नियमानां क्रतूनां च त्वयावाप्तमिदं फलम्,राजन! संसारमें नियमोंके पालनका फल तो प्रत्यक्ष देखा जाता है। तुमने भी यह नियमों और यज्ञोंका ही फल प्राप्त किया है
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, নিয়ম-আচরণের ফল এই লোকেই প্রত্যক্ষ দেখা যায়। হে রাজন, তুমিও তোমার নিয়মপালন ও যজ্ঞকর্মের ফলস্বরূপই এই ফল লাভ করেছ।
Verse 10
स्वधीतस्यापि च फल दृश्यतेअमुत्र चेह च । इहलोके<थवा नित्यं ब्रह्मलोके च मोदते,वेदोंके स्वाध्यायका फल भी इहलोक और परलोकमें भी देखा जाता है। स्वाध्यायशील द्विज इहलोक और ब्रह्मलोकमें भी सदा आनन्द भोगता है
ভীষ্ম বললেন—বেদের স্বাধ্যায়ের ফলও এ লোক ও পরলোক—উভয়ত্রই দেখা যায়। স্বাধ্যায়ে নিবিষ্ট দ্বিজ এই পৃথিবীলোকে এবং ব্রহ্মলোকে—উভয় স্থানেই সদা আনন্দ ভোগ করে।
Verse 11
दमस्य तु फलं राजन् शृणु त्वं विस्तरेण मे । दान्ता: सर्वत्र सुखिनो दान्ता: सर्वत्र निर्वुता:
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, এখন আমার কাছ থেকে দম অর্থাৎ ইন্দ্রিয়সংযমের ফল বিস্তারে শোনো। যাঁরা ইন্দ্রিয়জয়ী, তাঁরা সর্বত্র সুখী; সংযমী জন সর্বাবস্থায় শান্ত ও তৃপ্ত থাকে।
Verse 12
यत्रेच्छागामिनो दान्ता: सर्वशत्रुनिषूदना: । प्रार्थयन्ति च यद् दान्ता लभन्ते तन्न संशय:
ভীষ্ম বললেন—যে সংযতাত্মারা ইচ্ছামতো যেখানেই যেতে পারেন। যা কিছু তারা কামনা করে প্রার্থনা করে, তা নিঃসন্দেহে লাভ করে। সেই সংযম-শক্তিতে তারা সকল শত্রুর বিনাশকারী হয়ে ওঠে।
Verse 13
युज्यन्ते सर्वकामैहिं दान्ता: सर्वत्र पाण्डव | स्वर्गे यथा प्रमोदन््ते तपसा विक्रमेण च
ভীষ্ম বললেন—হে পাণ্ডব, সংযতাত্মারা সর্বত্রই সকল কাম্য ভোগে সমৃদ্ধ হয়। স্বর্গে যেমন প্রাণীরা আনন্দ করে, তেমনি তারা তপস্যা ও পরাক্রমের শক্তিতে—আত্মসংযম সিদ্ধ করে—আনন্দিত হয়।
Verse 14
दानैर्यज्ैश्ष विविधैस्तथा दान्ता: क्षमान्विता: | पाण्डुनन्दन! जितेन्द्रिय पुरुष सर्वत्र सम्पूर्ण मनचाही वस्तुएँ प्राप्त कर लेते हैं। वे अपनी तपस्या, पराक्रम, दान तथा नाना प्रकारके यज्ञोंसे स्वर्गलोकमें आनन्द भोगते हैं। इन्द्रियोंका दमन करनेवाले पुरुष क्षमाशील होते हैं ।।
ভীষ্ম বললেন—দান অপেক্ষা ‘দম’ (ইন্দ্রিয়-সংযম) শ্রেষ্ঠ; কারণ কেউ দ্বিজকে (ব্রাহ্মণকে) সামান্য দান করতেও ক্রুদ্ধ হয়ে উঠতে পারে।
Verse 15
दाता कुप्यति नो दान्तस्तस्माद् दानात् परं दम: । यस्तु दद्यादकुप्यन् हि तस्य लोका: सनातना:
ভীষ্ম বললেন—দাতা ক্রুদ্ধ হতে পারে, কিন্তু সংযত ব্যক্তি ক্রুদ্ধ হয় না। তাই দানের চেয়ে দম শ্রেষ্ঠ। আর যে ক্রোধ না করে দান করে, সে সনাতন লোক লাভ করে।
Verse 16
क्रोधो हन्ति हि यद् दानं तस्माद् दानातू परं दम: । अदृश्यानि महाराज स्थानान्ययुतशो दिवि
ভীষ্ম বললেন—দানকালে ক্রোধ উঠলে তা দানের ফল নষ্ট করে; তাই দানের চেয়ে দম শ্রেষ্ঠ। হে মহারাজ, স্বর্গে অগণিত অদৃশ্য আবাস আছে; মহৎ অবস্থার আকাঙ্ক্ষী ঋষি ও দেবগণ দম পালন করে এই লোক থেকে সেই লোকসমূহে গমন করেন। অতএব দানের চেয়ে দম শ্রেষ্ঠ।
Verse 17
ऋषीणां सर्वलोकेषु यानि ते यान्ति देवता: । दमेन यानि नृपते गच्छन्ति परमर्षय:
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, সর্বলোকের মধ্যে দেবতারা যে দিব্য অবস্থায় পৌঁছায়, পরম ঋষিরাও সংযমের বলেই সেই একই অবস্থায় পৌঁছান। অতএব ইন্দ্রিয়-নিগ্রহ ও শৃঙ্খলিত আচরণই পরম গতি লাভের প্রত্যক্ষ উপায় বলে ঘোষিত।
Verse 18
अध्यापक: परिक्क्लेशादक्षयं फलमश्लुते
ভীষ্ম বললেন—শিক্ষক শিক্ষাদানের পরিশ্রম ও কষ্টের দ্বারাই অক্ষয় ফল লাভ করেন; শিক্ষাদানই তাঁর জন্য স্থায়ী পুণ্যের উৎস হয়ে ওঠে।
Verse 19
विधिवत पावकं हुत्वा ब्रह्मलोके नराधिप । नरेन्द्र! शिष्योंको वेद पढ़ानेवाला अध्यापक क्लेश सहन करनेके कारण अक्षय फलका भागी होता है। अग्निमें विधिपूर्वक हवन करके ब्राह्मण ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।।
হে নরাধিপ, যে বিধিপূর্বক অগ্নিতে হোম করে, সে ব্রহ্মলোকে প্রতিষ্ঠিত হয়। আর যে নিজে বেদ অধ্যয়ন করে ন্যায়পরায়ণ শিষ্যদের বেদবিদ্যা দান করে, সেও অক্ষয় ফলের অধিকারী হয়।
Verse 20
गुरुकर्मप्रशंसी तु सो5पि स्वर्गे महीयते । जो वेदोंका अध्ययन करके न्यायपरायण शिष्योंको विद्यादान करता है तथा गुरुके कर्मोकी प्रशंसा करनेवाला है, वह भी स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।।
যে গুরুর কর্মের প্রশংসা করে, সেও স্বর্গে সম্মানিত হয়। আর যে ক্ষত্রিয় অধ্যয়ন, যজ্ঞ ও দানকর্মে নিয়োজিত থাকে এবং যুদ্ধে অন্যদের রক্ষা করে, সেও স্বর্গলোকে পূজিত হয়।
Verse 21
वैश्य: स्वकर्मनिरत: प्रदानाल्लभते महत् । शूद्र: स्वकर्मनिरत: स्वर्ग शुश्रूषयारच्छति
নিজ কর্মে নিবিষ্ট বৈশ্য দান দ্বারা মহান পদ লাভ করে। নিজ কর্মে স্থির শূদ্র সেবাভাবের দ্বারা স্বর্গে গমন করে।
Verse 22
शूरा बहुविधा: प्रोक्तास्तेषामर्थास्तु मे शृणु । शूरान्वयानां निर्दिष्ट फलं शूरस्य चैव हि
ভীষ্ম বললেন—শূরের নানা প্রকার বর্ণিত হয়েছে; এখন তাদের অন্তর্নিহিত অর্থ আমার কাছ থেকে শোনো। এমন শূরদের বংশধরদের জন্য এবং স্বয়ং শূরের জন্য যে ফল নির্ধারিত, তা আমি বলছি।
Verse 23
यज्ञशूरा दमे शूरा: सत्यशूरास्तथापरे । युद्धशूरास्तथैवोक्ता दानशूराश्ष मानवा:
ভীষ্ম বললেন—মানুষদের মধ্যে কেউ যজ্ঞে শূর, কেউ ইন্দ্রিয়-সংযমে শূর বলে দমশূর। তদ্রূপ কেউ সত্যশূর, কেউ যুদ্ধশূর, কেউ দানশূর; আবার কেউ বুদ্ধিশূর ও কেউ ক্ষমাশূর বলে খ্যাত।
Verse 24
सांख्यशूराश्व॒ बहवो योगशूरास्तथापरे । अरण्ये गृहवासे च त्यागे शूरास्तथापरे,बहुत-से मनुष्य सांख्यशूर, योगशूर, वनवासशूर, गृहवासशूर तथा त्यागशूर हैं
ভীষ্ম বললেন—অনেকে সাংখ্য-মার্গে শূর, আবার অনেকে যোগে শূর। কেউ অরণ্যবাসে, কেউ গৃহস্থধর্মে, আর কেউ ত্যাগে (সন্ন্যাসে) নিজের শৌর্য প্রকাশ করে।
Verse 25
आर्जवे च तथा शूरा: शमे वर्तन्ति मानवा: । तैस्तैश्न नियमै: शूरा बहव: सन्ति चापरे । वेदाध्ययनशूराश्व शूराश्षाध्यापने रता:
ভীষ্ম বললেন—কেউ আর্জব (সরলতা)-তে শূর, কেউ শম (মনোনিগ্রহ)-এ শূর। নানা নিয়ম-সংযম পালনে অনেকেই শূর বলে পরিচিত। কেউ বেদ অধ্যয়নে শূর, আবার কেউ বেদ শিক্ষাদানে রত হয়ে শূর।
Verse 26
गुरुशुश्रूषया शूरा: पितृशुश्रूषयापरे | मातृशुश्रूषया शूरा भैक्ष्यशूरास्तथापरे
ভীষ্ম বললেন—কেউ গুরুশুশ্রূষায় শূর, কেউ পিতৃসেবায় শূর। কেউ মাতৃসেবায় শূর, আর কেউ ভিক্ষাবৃত্তিতে জীবনধারণে ‘ভৈক্ষ্যশূর’ নামে খ্যাত।
Verse 27
अरण्ये गृहवासे च शूराश्वातिथिपूजने । सर्वे यान्ति पराललोंकान् स्वकर्मफलनिर्जितान्
কেউ অরণ্যবাস ও তপস্যায় বীর, কেউ গৃহস্থধর্ম রক্ষায়, আর কেউ অতিথি-সেবা ও পূজায় বীর। এ সকলেই নিজ নিজ কর্মফলের দ্বারা অর্জিত উত্তম পরলোক লাভ করে।
Verse 28
धारणं सर्ववेदानां सर्वतीर्थावगाहनम् | सत्यं च ब्रुवतो नित्यं सम॑ वा स्यान्न वा समम्
সমস্ত বেদ ধারণ করা এবং সকল তীর্থে স্নান করা—এই কর্মগুলির পুণ্য সদা সত্যভাষী পুরুষের পুণ্যের সমান হয় কি না, তাতেই সন্দেহ আছে। অর্থাৎ, এ সবের চেয়েও সত্য শ্রেষ্ঠ।
Verse 29
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते
যদি এক পাল্লায় সহস্র অশ্বমেধ যজ্ঞের পুণ্য আর অন্য পাল্লায় কেবল সত্য রাখা হয়, তবে সহস্র অশ্বমেধের চেয়েও সত্যের পাল্লাই ভারী হবে; কারণ সত্যই শ্রেষ্ঠ।
Verse 30
सत्येन सूर्यस्तपति सत्येनाग्नि: प्रदीप्यते । सत्येन मरुतो वान्ति सर्व सत्ये प्रतिेष्ठितम्
সত্যের দ্বারা সূর্য তাপ দেয়, সত্যের দ্বারা অগ্নি প্রজ্বলিত হয়। সত্যের দ্বারাই বায়ু প্রবাহিত হয়; সত্যের উপরেই সর্ব কিছু প্রতিষ্ঠিত।
Verse 31
सत्यके प्रभावसे सूर्य तपते हैं, सत्यसे अग्नि प्रजजलित होती है और सत्यसे ही वायुका सर्वत्र संचार होता है; क्योंकि सब कुछ सत्यपर ही टिका हुआ है ।।
সত্যে দেবগণ প্রসন্ন হন, পিতৃগণও এবং ব্রাহ্মণগণও। সত্যকে পরম ধর্ম বলা হয়েছে; অতএব সত্য কখনও লঙ্ঘন করা উচিত নয়।
Verse 32
मुनयः सत्यनिरता मुनयः सत्यविक्रमा: । मुनय: सत्यशपथास्तस्मात् सत्यं विशिष्यते,ऋषि-मुनि सत्यपरायण, सत्यपराक्रमी और सत्यप्रतिज्ञ होते हैं। इसलिये सत्य सबसे श्रेष्ठ है
ঋষি-মুনিরা সত্যে অবিচল, সত্যের বলেই পরাক্রমী, এবং সত্যব্রতে আবদ্ধ; অতএব সত্যই সর্বশ্রেষ্ঠ।
Verse 33
सत्यवन्तः स्वर्गलोके मोदन्ते भरतर्षभ । दम: सत्यफलावाप्तिरुक्ता सर्वात्मना मया
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! সত্যবাদীরা স্বর্গলোকে আনন্দ ভোগ করে; কিন্তু ইন্দ্রিয়সংযম—দম—ই সত্যের ফল লাভের উপায়—এ কথা আমি অন্তর থেকে বলছি।
Verse 34
असंशयं विनीतात्मा स वै स्वर्गे महीयते । ब्रह्मचर्यस्य च गुणं शृणु त्वं वसुधाधिप
যিনি মনকে বশে এনে বিনয়ী হয়েছেন, তিনি নিঃসন্দেহে স্বর্গলোকে সম্মানিত হন। হে পৃথিবীপতি, এখন ব্রহ্মচর্যের গুণাবলি শোনো।
Verse 35
आजन्ममरणाद् यस्तु ब्रह्मचारी भवेदिह । न तस्य किंचिदप्राप्यमिति विद्धि नराधिप,नरेश्वर! जो जन्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त यहाँ ब्रह्मचारी ही रह जाता है, उसके लिये कुछ भी अलभ्य नहीं है, इस बातको जान लो
হে নরাধিপ! যে ব্যক্তি জন্ম থেকে মৃত্যু পর্যন্ত এ জগতে ব্রহ্মচারীই থাকে, তার কাছে কিছুই অপ্রাপ্য নয়—এ কথা জেনে রাখো।
Verse 36
बहूव्य:कोट्यस्त्वृषीणां तु ब्रह्मलोके वसन्त्युत । सत्ये रतानां सतत दान्तानामूर्ध्वरेतसाम्
ব্রহ্মলোকে এমন অগণিত কোটি ঋষি বাস করেন, যারা এ লোকেতে সদা সত্যনিষ্ঠ, ইন্দ্রিয়জয়ী এবং ঊর্ধ্বরেতা (নৈষ্ঠিক ব্রহ্মচারী) ছিলেন।
Verse 37
ब्रह्मचर्य दहेद् राजन् सर्वपापान्युपासितम् । ब्राह्मणेन विशेषेण ब्राह्मणो हाग्निरुच्यते
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, ব্রহ্মচর্যের সংযত অনুশীলন সঞ্চিত সকল পাপ দগ্ধ করে। বিশেষত ব্রাহ্মণের ক্ষেত্রে; কারণ ব্রহ্মচারী ব্রাহ্মণকে অগ্নিস্বরূপ বলা হয়।
Verse 38
प्रत्यक्ष हि तथा होतद् ब्राह्म॒णेषु तपस्विषु । बिभेति हि यथा शक्रो ब्रह्मचारिप्रधर्षित:
ভীষ্ম বললেন—তপস্বী ব্রাহ্মণদের মধ্যে এ কথা প্রত্যক্ষ দেখা যায়; যেমন দৃঢ় ব্রহ্মচারীর আক্রমণে স্বয়ং শক্র (ইন্দ্র) পর্যন্ত ভীত হয়ে পড়েন। ঋষিদের মধ্যে ব্রহ্মচর্যের এই ফল এখানে দৃশ্যমান।
Verse 39
तद् ब्रह्म॒चर्यस्य फलमृषीणामिह दृश्यते । मातापित्रो: पूजने यो धर्मस्तमपि मे शृणु
ভীষ্ম বললেন—এখানে ঋষিদের মধ্যে ব্রহ্মচর্যের ফল স্পষ্ট দেখা যায়। এখন মাতা-পিতার পূজায় যে ধর্ম নিহিত, তাও আমার কাছ থেকে শোনো।
Verse 40
शुश्रूषते यः पितरं न चासूयेत् कदाचन । मातरं भ्रातरं वापि गुरुमाचार्यमेव च
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! যে ব্যক্তি পিতার সেবা করে এবং কখনও তাঁর প্রতি দোষদৃষ্টি বা ঈর্ষা পোষণ করে না, এবং তদ্রূপ মাতার, জ্যেষ্ঠ ভ্রাতার, গুরু ও আচার্যেরও সেবা করে—
Verse 41
तस्य राजन् फल विद्धि स्वलोके स्थानमर्चितम् | न च पश्येत नरकं गुरुशुश्रूषया55त्मवान्
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, এমন আচরণের ফল জেনে রাখো: স্বর্গলোকে সে পূজিত ও সম্মানিত আসন লাভ করে। আর আত্মসংযমী ব্যক্তি গুরু-শুশ্রূষার প্রভাবে কখনও নরক দর্শন করে না।
Verse 75
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पञचसप्ततितमो<ध्याय: ॥। ७५ || इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पचद्तत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে পঁচাত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 173
कामयाना महत्स्थानं तस्माद् दानात् परं दम: | दान करते समय यदि क्रोध आ जाय तो वह दानके फलको नष्ट कर देता है; इसलिये उस क्रोधको दबानेवाला जो दमनामक गुण है
ভীষ্ম বললেন—যে মহান ও উচ্চ অবস্থার কামনা করে, তার জন্য দানের চেয়েও শ্রেষ্ঠ ‘দম’ (আত্মসংযম)। দানকালে যদি ক্রোধ জাগে, তবে তা দানের ফল নষ্ট করে; অতএব ক্রোধ দমন ও ইন্দ্রিয়সংযমরূপ যে গুণ ‘দম’, তা দানের ঊর্ধ্বে গণ্য। হে মহারাজ, নরেশ্বর! ঋষিদের স্বর্গলোকে অসংখ্য সূক্ষ্ম ও অদৃশ্য স্থান আছে; দম পালন করেই মহর্ষি ও দেবতারা, মহৎ লোকের আকাঙ্ক্ষায়, এই লোক ত্যাগ করে সেগুলি লাভ করেন। তাই ‘দম’ দানের চেয়ে শ্রেষ্ঠ।
The dilemma concerns whether merit arises solely from the external act of giving or whether inner intention governs moral residue: the chapter explicitly emphasizes cetas (mental orientation) as capable of sustaining or removing doṣa even when the outward act appears meritorious.
Ethical action is both procedural and psychological: proper dāna requires appropriate objects (well-kept, life-sustaining gifts) and a disciplined intention, linking personal virtue to social welfare and to a cosmological framework of consequences.
Yes. The text provides an explicit reward schema—travel by radiant vimāna, celestial enjoyment, and favorable rebirth among affluent cattle-owning families—culminating in a quantitative hyperbole that heavenly honor lasts as many years as the hairs on the donated cow.