Adhyaya 65
Anushasana ParvaAdhyaya 6596 Verses

Adhyaya 65

दानफलप्रकरणम् — उपानहदानं, तिलदानं, भूमिदानं, गोदानं, अन्नदानं च (Gifts and Their Stated Results: Footwear, Sesame, Land, Cows, and Food)

Upa-parva: Dāna-Dharma (Charitable Gifts) Discourse — Footwear, Sesame, Land, Cows, and Food

Chapter 13.65 is structured as a question-and-answer exchange. Yudhiṣṭhira first asks Bhīṣma about the result of giving footwear (upānahau) to a brāhmaṇa in distress; Bhīṣma replies with imagery of overcoming thorns and rough terrain, and adds a symbolic reward of conveyances and equipment. The dialogue then broadens: Yudhiṣṭhira requests further clarification on the fruits of tiladāna, bhūmidāna, godāna, and annadāna. Bhīṣma describes sesame as primordial and especially effective for ancestral satisfaction, including time-specific merit (e.g., gifting in Māgha) and warnings against improper motivation. He then narrates a brief cosmological-ritual episode of the gods requesting a sacrificial site from Brahmā, segueing into bhūmidāna: even small land gifts are praised, while unsuitable land and offering śrāddha in another’s land are discouraged; purchasing land for gifting is recommended to secure lasting ritual benefit. Next, godāna is elevated through claims of utility (milk, ghee, dung, hides, etc.), association with higher realms, and strict prohibitions against gifting cows for harmful ends or to unethical recipients; quality criteria for the cow are specified. Finally, annadāna is asserted as primary, linked to hospitality, vitality, and overcoming adversity, with references to exemplary figures (e.g., Rantideva) and a concluding recap of the discussed gift-fruits.

Chapter Arc: शरशय्या पर लेटे भीष्म युधिष्ठिर को दान-धर्म का शिखर दिखाते हैं—सब दानों में ‘पृथ्वीदान’ को अतिदान कहकर, अचल-अक्षय भूमि को इस लोक के उत्तम भोगों की ‘दोग्ध्री’ (दूध देने वाली) बताते हैं। → भीष्म भूमि के महत्त्व को केवल संपत्ति नहीं, जीवन-व्यवस्था के आधार के रूप में स्थापित करते हैं—मनुष्य इह-परत्र अपने कर्म से जीते हैं, और भूमि ‘महादेवी’ होकर दाता को प्रिय बनाती है। फिर वे दान की मात्रा/उद्देश्य के सूक्ष्म भेद उठाते हैं: एक घर के लिए दी गई भूमि से लेकर राज्य-धर्म तक, फल और दण्ड दोनों का विस्तार। → भूमिदान के फल-दण्ड का तीखा शिखर: ‘एकागारकरीं’ भूमि-दान करने वाला दीर्घ पुण्य पाता है, और उतनी ही भूमि का हरण करने वाला उससे भी बढ़कर नरक-यातना भोगता है—दान की महिमा के साथ अपहरण का भयावह प्रतिफल एक साथ उद्घाटित होता है। → भूमिदाता के लिए अभय-प्रतिज्ञा: काल-प्रेरित मृत्यु, दण्ड, तम, दारुण अग्नि और घोर पाश भी भूमिदाता के निकट नहीं आते; और जिस राजा के शुभ राज्य/कर्म से प्रजा योगक्षेम, वृष्टि और स्वकर्म-समृद्धि से बढ़ती है, वह भूमि-धर्म का सामाजिक रूप है। श्राद्ध-प्रसंग में इस माहात्म्य के श्रवण से राक्षस/असुर-भाग का निषेध और पितरों के निमित्त दान की अक्षयता बताकर उपदेश पूर्ण होता है। → भीष्म का समापन-प्रश्न—‘अब और क्या सुनना चाहते हो?’—अगले अध्याय के लिए युधिष्ठिर की जिज्ञासा को खुला छोड़ देता है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६ शलोक मिलाकर कुल ३९३ “लोक हैं) द्विषष्टितमो< ध्याय: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद युधिछिर उवाच इदं देयमिदं देयमितीयं श्रुतिरादरात्‌ । बहुदेयाश्व राजान: किंस्विद्‌ दानमनुत्तमम्‌

যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! শ্রুতি গভীর আদরে বারবার বলে—‘এ দাও, ও দাও’; আর শাস্ত্রে রাজাদের জন্য নানাবিধ দানের বিধান আছে। তবে সকল দানের মধ্যে কোন দানটি সত্যিই অনুত্তম—তা আমাকে বলুন।

Verse 2

भीष्म उवाच अतिदानानि सर्वाणि पृथिवीदानमुच्यते । अचला ह्ाक्षया भूमिद्दोग्ध्री कामानिहोत्तमान्‌

ভীষ্ম বললেন—সমস্ত দানের মধ্যে মহাদান বলে ‘পৃথিবীদানের’ কথাই বলা হয়। ভূমি অচল ও অক্ষয়; এই লোকেতে সে দোহনযোগ্য গাভীর মতো সর্বোত্তম কাম্য ফল প্রদান করে।

Verse 3

भीष्मजीने कहा--बेटा! सब दानोंसे बढ़कर पृथ्वीदान बताया गया है। पृथ्वी अचल और अक्षय है। वह इस लोकमें समस्त उत्तम भोगोंको देनेवाली है ।।

পৃথিবী দোহনযোগ্য গাভীর মতো বস্ত্র, রত্ন, পশু এবং ধান-যব প্রভৃতি অন্ন প্রদান করে; অতএব ভূমিদানকারী ব্যক্তি সকল প্রাণীর মধ্যে চিরস্থায়ী সমৃদ্ধিতে উন্নীত হয়।

Verse 4

यावद्‌ भूमेरायुरिह तावद्‌ भूमिद एधते । न भूमिदानादस्तीह परं किंचिद्‌ युधिष्ठिर

হে যুধিষ্ঠির! এই জগতে যতদিন পৃথিবী স্থায়ী, ততদিন ভূমিদানকারী সমৃদ্ধ হয়। এ লোকেতে ভূমিদানের চেয়ে উচ্চতর কোনো দান নেই।

Verse 5

अप्यल्पं प्रददुः सर्वे पृथिव्या इति नः श्रुतम्‌ । भूमिमेव ददुः सर्वे भूमिं ते भुञज्जते जना:

ভীষ্ম বললেন—আমরা শুনেছি, যে কেউ পৃথিবীর সামান্য অংশও দান করে, সে-ও ভূমিদানের পূর্ণ ফল লাভ করে। সত্যই, যারা ভূমি দান করে তারা যেন সমগ্র পৃথিবীই দান করে; আর পরলোকে মানুষ সেই ভূমিরই ভোগ পায়।

Verse 6

स्वकर्मवोपजीवन्ति नरा इह परत्र च । भूमिर्भूतिर्महादेवी दातारं कुरुते प्रियम्‌

ভীষ্ম বললেন—মানুষ ইহলোক ও পরলোকে নিজের ধর্মসম্মত কর্মের দ্বারাই জীবন ধারণ করে। ভূমি—ঐশ্বর্যরূপা মহাদেবী—দাতাকে আপন প্রিয় করে নেন।

Verse 7

मनुष्य इहलोक और परलोकमें अपने कर्मके अनुसार ही जीवन-निर्वाह करते हैं। भूमि ऐश्वर्यस्वरूपा महादेवी है। वह दाताको अपना प्रिय बना लेती है ।।

ভীষ্ম বললেন—মানুষ ইহলোক ও পরলোকে নিজের কর্মানুসারেই জীবন ধারণ করে। ভূমি ঐশ্বর্যরূপা মহাদেবী; তিনি দাতাকে আপন প্রিয় করে নেন। হে রাজশ্রেষ্ঠ! যে এই অক্ষয় দক্ষিণা—ভূমি—দান করে, সে পুনরায় মানবজন্ম লাভ করে পৃথিবীর অধিপতি হয়।

Verse 8

यथा दानं तथा भोग इति थधर्मेषु निश्चय: । संग्रामे वा तनुं जहायाद्‌ दद्याच्च पृथिवीमिमाम्‌

ভীষ্ম বললেন—ধর্মবিষয়ে এটাই স্থির সিদ্ধান্ত: যেমন দান, তেমনই ভোগ। অতএব, যুদ্ধক্ষেত্রে দেহ ত্যাগ করতে হোক বা এই পৃথিবী দান করতে হোক—এই নীতির অনুসারেই আচরণ করা উচিত।

Verse 9

पुनाति दत्ता पृथिवी दातारमिति शुश्रुम

ভীষ্ম বললেন—আমরা শুনেছি, দানে প্রদত্ত ভূমি দাতাকে পবিত্র করে। কেউ যত বড় পাপীই হোক—ব্রাহ্মণহত্যার দোষী ও অসত্যে আসক্ত—দানকৃত ভূমি তার পাপ ধুয়ে দেয় এবং তাকে সম্পূর্ণ পাপমুক্ত করে।

Verse 10

अपि पापसमाचारं ब्रह्म॒घ्नमपि चानृतम्‌ । सैव पाप॑ प्लावयति सैव पापात्‌ प्रमोचयेत्‌

ভীষ্ম বললেন—কেউ যদি পাপাচারে লিপ্ত হয়, ব্রাহ্মণহন্তা হয়, কিংবা মিথ্যাবাদীও হয়, তবু দানে প্রদত্ত সেই ভূমিই তার পাপ ধুয়ে ভাসিয়ে দেয় এবং তাকে সম্পূর্ণ পাপমুক্ত করতে পারে। পরম্পরা ঘোষণা করে—দানরূপে প্রদত্ত পৃথিবী দাতাকে পবিত্র করে, পূর্বের অপরাধ যতই গুরুতর হোক না কেন।

Verse 11

अपि पापकृतां राज्ञां प्रतिगृह्लन्ति साधव: । पृथिवीं नान्यदिच्छन्ति पावनं जननी यथा

ভীষ্ম বললেন—পাপকর্মে লিপ্ত রাজাদের কাছ থেকেও সাধুগণ ভূমিদান গ্রহণ করেন; কিন্তু অন্য কোনো দান গ্রহণ করতে চান না। কারণ পৃথিবী মাতার মতোই পবিত্র—পাবন দান।

Verse 12

नामास्या: प्रियदत्तेति गुहां देव्या: सनातनम्‌ | दानं वाप्यथवा5<दानं नामास्या: प्रथमं प्रियम्‌

ভীষ্ম বললেন—এই পৃথিবী-দেবীর এক সনাতন গোপন নাম আছে—‘প্রিয়দত্তা’, অর্থাৎ ‘প্রিয় দান’। তাকে দান করা এবং তাকে গ্রহণ করা—উভয়ই দাতা ও গ্রহীতার কাছে প্রিয়; তাই এটাই তার প্রথম ও সর্বাধিক প্রিয় নাম।

Verse 13

य एतां विदुषे दद्यात्‌ पृथिवीं पृथिवीपति: । पृथिव्यामेतदिष्टं स राजा राज्यमितो व्रजेत्‌

ভীষ্ম বললেন—যে পৃথিবীপতি রাজা কোনো বিদ্বান ব্রাহ্মণকে এই ভূমি দান করেন, সেই রাজা—কারণ ভূমিদান পৃথিবীতে সর্বাধিক প্রিয় বলে মান্য—এই দানের প্রভাবে এখান থেকে প্রস্থানকালে পুনরায় রাজ্য লাভ করে গমন করেন।

Verse 14

पुनश्चासौ जनिं प्राप्पय राजवत्‌ स्यान्न संशय: । तस्मात्‌ प्राप्यैव पृथिवीं दद्यात्‌ विप्राय पार्थिव:

ভীষ্ম বললেন—আর সে পুনর্জন্ম লাভ করেও রাজার মতোই হয়—এতে কোনো সন্দেহ নেই। অতএব রাজা পৃথিবীর অধিকার লাভ করামাত্রই তার একটি অংশ ব্রাহ্মণকে দান করুক।

Verse 15

नाभूमिपतिना भूमिरधिष्ठेया कथंचन । नचापात्रेण वा ग्राह्मा दत्तदाने न चाचरेत्‌

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি ভূমির প্রকৃত অধিপতি নয়, সে কোনোভাবেই সেই ভূমি অধিকার করবে না। আর অযোগ্য পাত্রের উচিত নয় ভূমিদান গ্রহণ করা; এবং যে ভূমি দানে অর্পিত হয়েছে, তা পুনরায় নিজের ব্যবহারে আনা উচিত নয়। পিতৃদের উদ্দেশ্যে প্রদত্ত দান অক্ষয় হয়—এ বিষয়ে সন্দেহ নেই। অতএব শ্রাদ্ধকালে জ্ঞানী ব্যক্তি ক্রিয়ার সময় দ্বিজ ব্রাহ্মণদের এই বিধান শ্রবণ করাবে।

Verse 16

ये चान्ये भूमिमिच्छेयु: कुर्युरेवं न संशय: । यः साधोर्भूमिमादत्ते न भूमिं विन्दते तु सः

ভীষ্ম বললেন—আর যারা ভবিষ্যৎ জন্মে ভূমি লাভ করতে চায়, তাদেরও এই জীবনেই এইরূপে ভূমিদান করা উচিত—এতে সন্দেহ নেই। কিন্তু যে ব্যক্তি ছল বা বলপ্রয়োগে কোনো সাধুজনের ভূমি কেড়ে নেয়, সে প্রকৃত অর্থে ভূমিলাভ করে না।

Verse 17

भूमिं दत्त्वा तु साधुभ्यो विन्दते भूमिमुत्तमाम्‌ । प्रेत्य चेह च धर्मात्मा सम्प्राप्रोति महद्‌ यश:

ভীষ্ম বললেন—সাধুজনকে ভূমিদান করলে দাতা উত্তম ভূমি লাভ করে। আর সেই ধর্মাত্মা ব্যক্তি ইহলোকেও এবং পরলোকেও মহৎ যশ অর্জন করে।

Verse 18

(एकागारकरीं दत्त्वा षष्टिसाहस्रमूर्थध्वग: । तावत्या हरणे पृथ्व्या नरकं द्विगुणोत्तरम्‌ ।।

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি একটি ঘর নির্মাণের পরিমাণ ভূমি দান করে, সে ঊর্ধ্বলোক লাভ করে ষাট হাজার বছর সেখানে বাস করে। কিন্তু যে সমপরিমাণ ভূমি হরণ করে, তাকে তার দ্বিগুণ সময় নরকে বাস করতে হয়। হে রাজন, যে সাধুপুরুষের দানকৃত ভূমির প্রশংসা ব্রাহ্মণেরা সর্বদা করে, তার সেই বসুন্ধরার প্রশংসা শত্রুরা করে না; ধর্মজ্ঞদের অনুমোদনই তার পুণ্যের মানদণ্ড।

Verse 19

यत्‌ किंचित्‌ पुरुष: पापं कुरुते वृत्तिकर्शित: । अपि गोचर्ममात्रेण भूमिदानेन पूयते

ভীষ্ম বললেন—জীবিকার কষ্টে পীড়িত হয়ে মানুষ যে কোনো পাপই করে ফেলুক, গোচর্ম-পরিমাণ ভূমিদান করলেও সে পাপ শুদ্ধ হয়ে যায়।

Verse 20

येडपि संकीर्णकर्माणो राजानो रौद्रकर्मिण: । तेभ्य: पवित्रमाख्येयं भूमिदानमनुत्तमम्‌

ভীষ্ম বললেন— যেসব রাজাদের কর্ম মিশ্র ও বিশৃঙ্খল, এবং যারা কঠোর ও রৌদ্র কর্মে আসক্ত, তাদেরও পাপমুক্তির জন্য সর্বোত্তম ও পরম পবিত্র ভূমিদানের কথা ঘোষণা করা উচিত।

Verse 21

अल्पान्तरमिदं शश्वत्‌ पुराणा मेनिरे जना: । यो यजेताश्वमेधेन दद्याद्‌ वा साधवे महीम्‌

ভীষ্ম বললেন— প্রাচীন লোকেরা চিরকাল মনে করেছেন, অশ্বমেধ যজ্ঞ করা আর কোনো সাধু-সজ্জনকে ভূমি দান করা—এই দুটির মধ্যে পার্থক্য অতি সামান্য।

Verse 22

प्राचीनकालके लोग सदा यह मानते रहे हैं कि जो अश्वमेधयज्ञ करता है अथवा जो श्रेष्ठ पुरुषको पृथ्वीदान करता है, इन दोनोंमें बहुत कम अन्तर है ।।

ভীষ্ম বললেন— প্রাচীন লোকেরা সর্বদা মনে করেছেন যে অশ্বমেধ যজ্ঞ করা এবং যোগ্য শ্রেষ্ঠ পুরুষকে ভূমি দান করা—এই দুটির মধ্যে পার্থক্য অতি সামান্য। তবু অন্য কোনো পুণ্যকর্ম সম্পন্ন করার পর তার ফল নিয়ে পণ্ডিতদেরও সন্দেহ জাগতে পারে; কিন্তু এই একটিই—অনুত্তম ভূমিদান—এমন কর্ম, যার ফল নিয়ে কারও সন্দেহ থাকতে পারে না।

Verse 23

सुवर्ण रजतं वस्त्र मणिमुक्तावसूनि च । सर्वमेतन्महाप्राज्ञो ददाति वसुधां ददत्‌

ভীষ্ম বললেন— সোনা, রূপা, বস্ত্র, মণি-মুক্তা ও অন্যান্য ধনরত্ন—যে মহাপ্রাজ্ঞ ব্যক্তি ভূমি দান করে, সে যেন এ সবকিছুরই দান করে।

Verse 24

तपो यज्ञ: श्रुते शीलमलोभ: सत्यसंधता । गुरुदैवतपूजा च एता वर्तन्ति भूमिदम्‌

ভীষ্ম বললেন— যে ব্যক্তি ভূমি দান করে, তার মধ্যে তপস্যা, যজ্ঞ, শ্রুতি-বিদ্যা, সদাচার, নির্লোভতা, সত্যনিষ্ঠা, গুরুশুশ্রূষা ও দেবপূজার ফল—এই সবই এসে প্রতিষ্ঠিত হয়।

Verse 25

भर्त॒नि:श्रेयसे युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हता: । ब्रह्मलोकगता: सिद्धा नातिक्रामन्ति भूमिदम्‌

ভীষ্ম বললেন—যারা প্রভুর কল্যাণের জন্য প্রাণ ত্যাগ করে রণক্ষেত্রে নিহত হয়, আর যারা সিদ্ধ হয়ে ব্রহ্মলোকে গমন করে—তারাও ভূমিদানকারী পুরুষের পুণ্যকে অতিক্রম করতে পারে না।

Verse 26

यथा जनित्री स्वं पुत्र क्षीरेण भरते सदा । अनुगृह्नाति दातारं तथा सर्वरसैर्मही,जैसे माता अपने बच्चेको सदा दूध पिलाकर पालती है, उसी प्रकार पृथ्वी सब प्रकारके रस देकर भूमिदातापर अनुग्रह करती है

ভীষ্ম বললেন—যেমন জননী সর্বদা দুধ দিয়ে নিজের পুত্রকে লালন করে, তেমনই পৃথিবী নানাবিধ রস ও ফলন দান করে ভূমিদাতার প্রতি অনুগ্রহ করে।

Verse 27

मृत्युरवैकिड्करो दण्डस्तमो वह्नि: सुदारुण: | घोराश्न॒ दारुणा: पाशा नोपसर्पन्ति भूमिदम्‌

ভীষ্ম বললেন—কালের প্রেরিত মৃত্যু, দণ্ড, অন্ধকার, নির্মম অগ্নি এবং অতিভয়ংকর পাশ—এরা ভূমিদানকারী পুরুষের কাছে আসে না।

Verse 28

पितृश्व पितृलोकस्थान्‌ देवलोकाच्च देवता: । संतर्पयति शान्तात्मा यो ददाति वसुन्धराम्‌

ভীষ্ম বললেন—যে শান্তচিত্ত পুরুষ বসুন্ধরা দান করে, সে পিতৃলোকে অবস্থানকারী পিতৃগণকে এবং দেবলোকে অধিষ্ঠিত দেবতাদেরও তৃপ্ত করে।

Verse 29

कृशाय मप्रियमाणाय वृत्तिग्लानाय सीदते । भूमिं वृत्तिकरीं दत्त्वा सत्री भवति मानव:,दुर्बल, जीविकाके बिना दुखी और भूखके कष्टसे मरते हुए ब्राह्मणको उपजाऊ भूमिदान करनेवाला मनुष्य यज्ञका फल पाता है

ভীষ্ম বললেন—যে ক্ষীণ, জীবিকার অভাবে কাতর ও ক্ষুধায় নিঃশেষ হয়ে পড়া (ব্রাহ্মণ)কে জীবিকা-দায়িনী উর্বর ভূমি দান করে, সে যেন যজ্ঞকারী হয়ে যজ্ঞফল লাভ করে।

Verse 30

यथा धावति गौर्वत्सं स्रवन्ती वत्सला पय: । एवमेव महाभाग भूमिर्भवति भूमिदम्‌

যেমন স্নেহে উথলে ওঠা গাভী দুধ ঝরাতে ঝরাতে বাছুরকে দুধ পান করাতে ছুটে যায়, তেমনি হে মহাভাগ, ভূমিদাতা জনের মঙ্গল সাধনে এই পৃথিবীও ত্বরিত ধাবিত হয়।

Verse 31

फालकृष्टां महीं दत्त्वा सबीजां सफलामपि । उदीर्ण वापि शरणं यथा भवति कामद:

যে ব্যক্তি হালচাষ-করা—বীজসহ এবং ফল-ফসলসমৃদ্ধ—ভূমি দান করে, অথবা প্রশস্ত আশ্রয়গৃহ প্রদান করে, তার সেই দান কামদ হয়ে সকল অভিলাষ পূর্ণ করে।

Verse 32

ब्राह्माणं वृत्तिसम्पन्नमाहिताग्निं शुचिव्रतम्‌ । नर: प्रतिग्राह्म महीं न याति परमापदम्‌

যে ব্যক্তি সদাচারসম্পন্ন, আহিতাগ্নি ও শুচিব্রত ব্রাহ্মণকে ভূমি দান করে, সে কখনও পরম বিপদে পতিত হয় না।

Verse 33

यथा चन्द्रमसो वृद्धिरहन्यहनि जायते । तथा भूमिकृतं दानं सस्ये सस्ये विवर्धते

যেমন চন্দ্রের বৃদ্ধি দিন দিন ঘটে, তেমনই ভূমিদানের পুণ্যও ফসলের পর ফসল জন্মালে জন্মালে ক্রমে বৃদ্ধি পায়।

Verse 34

अत्र गाथा भूमिगीता: कीर्तयन्ति पुराविद: । या: श्रुत्वा जामदग्न्येन दत्ता भू: काश्यपाय वै

এখানে প্রাচীনবিদরা ‘ভূমিগীতা’ নামে পরিচিত গাথাগুলি কীর্তন করেন; সেগুলি শুনে জামদগ্ন্য পরশুরাম সত্যই কাশ্যপকে সমগ্র পৃথিবী দান করেছিলেন।

Verse 35

मामेवादत्त मां दत्त मां दत्त्वा मामवाप्स्थथ | अस्मिल्लॉँके परे चैव तद्‌ दत्तं जायते पुन:

ভীষ্ম বললেন— “আমাকেই দান করো, আমাকেই গ্রহণ করো। আমাকে দান করলে আমাকেই আবার লাভ করবে; কারণ মানুষ এই লোকেতে যা দান করে, সেই দানই ইহলোকে ও পরলোকে তার কাছে ফিরে আসে।” (উদ্ধৃত গাথায় পৃথিবী দানধর্মের নীতি শিক্ষা দেয়।)

Verse 36

य इमां व्याद्वतिं वेद ब्राह्मणो वेदसम्मिताम्‌ । भ्राद्धस्य क्रियमाणस्य ब्रह्म भूयं स गच्छति,जो ब्राह्मण श्राद्धकालमें पृथ्वीकी गायी हुई वेदसम्मत इस गाथाका पाठ करता है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त होता है

ভীষ্ম বললেন— যে ব্রাহ্মণ শ্রাদ্ধকালে পৃথিবীর গীত, বেদসম্মত ‘ব্যাদ্বতী’ নামক এই গাথা জানে এবং পাঠ করে, সে ব্রহ্মভাব লাভ করে।

Verse 37

कृत्यानामधिशस्तानामरिष्टशमनं महत्‌ | प्रायश्षित्तं महीं दत्त्वा पुनात्युभयतो दश

ভীষ্ম বললেন— ভয়ংকর কৃত্যা ও বিধ্বংসী কর্ম থেকে যে অনিষ্ট-ভয় ওঠে, তা শান্ত করার সর্বশ্রেষ্ঠ উপায় হলো ভূমিদানরূপ প্রায়শ্চিত্ত। পৃথিবী দান করলে মানুষ পূর্বপুরুষ ও উত্তরসূরি—উভয় দিকের দশ পুরুষকে পবিত্র করে।

Verse 38

पुनाति य इदं वेद वेदवादं तथैव च । प्रकृति: सर्वभूतानां भूमिर्वैश्वानरी मता

ভীষ্ম বললেন— যে এই বেদবাণীরূপ উপদেশ এবং বেদবাদ যথার্থভাবে জানে, সে পবিত্রকারী হয়। পৃথিবীই সকল প্রাণীর প্রকৃতি (উৎপত্তিস্থান), এবং তাকে ‘বৈশ্বানরী’ বলা হয়—যার অধিষ্ঠাতা দেবতা অগ্নি।

Verse 39

अभिषिच्यैव नृपतिं श्राववेदिममागमम्‌ । यथा श्रुत्वा महीं दद्यान्नादद्यात्‌ साधुतश्न॒ ताम्‌

ভীষ্ম বললেন— রাজসিংহাসনে রাজাকে অভিষিক্ত করামাত্রই তাকে পৃথিবীর গীত এই প্রাচীন বিধান শোনানো উচিত; যাতে সে তা শুনে ন্যায়ভাবে ভূমিদান করে এবং সৎপুরুষদের হাতে দেওয়া ভূমি অধর্মে কেড়ে না নেয়।

Verse 40

सो<यं कृत्स्नो ब्राह्मणार्थो राजार्थश्वाप्पसंशय: । राजा हि धर्मकुशल: प्रथमं भूतिलक्षणम्‌

ভীষ্ম বললেন—এই সমগ্র বৃত্তান্ত ব্রাহ্মণের কল্যাণ ও রাজার কল্যাণের জন্যই; এতে কোনো সন্দেহ নেই। কারণ রাজা ধর্মে কুশলী হলে তা প্রজার ঐশ্বর্য ও সমৃদ্ধির প্রথম লক্ষণ।

Verse 41

अथ येषामधर्मज्ञो राजा भवति नास्तिक: । न ते सुखं प्रबुध्यन्ति न सुखं प्रस्वपन्ति च

ভীষ্ম বললেন—যাদের রাজা অধর্মজ্ঞ ও নাস্তিক, তাদের প্রজারা সুখ পায় না; জাগরণেও আনন্দ নেই, নিদ্রাতেও শান্তি নেই।

Verse 42

सदा भवन्‍न्ति चोद्विग्नास्तस्य दुश्चरितैर्नरा: । योगक्षेमा हि बहवो राष्ट्र नास्थाविशन्ति तत्‌

ভীষ্ম বললেন—তার দুষ্কর্মের ফলে মানুষ সর্বদা উদ্বিগ্ন থাকে। আর যারা যোগক্ষেম—নিরাপত্তা ও কল্যাণ—চায়, তাদের অনেকেই সেই রাজ্যে স্থিরভাবে বসবাস করতে পারে না।

Verse 43

जिनका राजा धर्मको न जाननेवाला और नास्तिक होता है, वे लोग न तो सुखसे सोते हैं और न सुखसे जागते ही हैं; अपितु उस राजाके दुराचारसे सदैव उद्विग्न रहते है। ऐसे राजाके राज्यमें बहुधा योगक्षेम नहीं प्राप्त होते ।।

ভীষ্ম বললেন—কিন্তু যাদের রাজা প্রাজ্ঞ ও ধর্মনিষ্ঠ, তাদের প্রজারা স্থায়ী ভয় থেকে মুক্ত থাকে। তারা শান্তিতে জাগে এবং গভীর স্বস্তিতে ঘুমায়; কারণ ধর্মসম্মত শাসন তাদের যোগক্ষেম রক্ষা করে এবং রাজ্যকে স্থিত করে।

Verse 44

तस्य राज्ञ: शुभै राज्यै: कर्मभिननिर्वृता नरा: । योगक्षेमेण वृष्टया च विवर्धन्ते स्वकर्मभि:

ভীষ্ম বললেন—সেই রাজার শুভ শাসনব্যবস্থা ও ধর্মসম্মত কর্মের ফলে প্রজারা সন্তুষ্ট থাকে। সেই রাজ্যে যোগক্ষেম রক্ষিত হয়, সময়মতো বৃষ্টি হয়, এবং প্রজারা নিজেদের শুভ কর্মে সমৃদ্ধ হয়।

Verse 45

स कुलीन: स पुरुष: स बन्धु: स च पुण्यकृत्‌ । स दाता स च विक्रान्तो यो ददाति वसुन्धराम्‌,जो पृथ्वीका दान करता है, वही कुलीन, वही पुरुष, वही बन्धु, वही पुण्यात्मा, वही दाता और वही पराक्रमी है

যে ব্যক্তি পৃথিবী দান করে, সেই-ই কুলীন, সেই-ই প্রকৃত পুরুষ, সেই-ই বन्धু এবং সেই-ই পুণ্যকর্মা। সেই-ই দাতা, সেই-ই বিক্রান্ত—যে বসুন্ধরা দান করে।

Verse 46

आदित्या इव दीप्यन्ते तेजसा भुवि मानवा: । ददन्ति वसुधां स्फीतां ये वेदविदुषि द्विजे

যেমন আদিত্যগণ তেজে দীপ্তিমান, তেমনি মানুষও পৃথিবীতে নিজের তেজে উজ্জ্বল হয়—বিশেষত যারা বেদজ্ঞ দ্বিজকে সমৃদ্ধ, উর্বর ভূমি দান করে।

Verse 47

यथा सस्यानि रोहन्ति प्रकीर्णानि महीतले । तथा कामा: प्ररोहन्ति भूमिदानसमार्जिता:

যেমন মাটিতে ছড়ানো বীজ অঙ্কুরিত হয়ে ওঠে, তেমনি ভূমিদান থেকে অর্জিত পুণ্য-সমৃদ্ধির দ্বারা কামনাও আবার অঙ্কুরিত হয়।

Verse 48

जैसे भूमिमें बोये हुए बीज खेतीके रूपमें अंकुरित होते और अधिक अन्न पैदा करते हैं, उसी प्रकार भूमिदान करनेसे सम्पूर्ण कामनाएँ सफल होती हैं ।।

যেমন মাটিতে বোনা বীজ অঙ্কুরিত হয়ে শস্য হয়ে ওঠে এবং প্রচুর অন্ন দেয়, তেমনি ভূমিদানের প্রভাবে সকল কামনা সিদ্ধ হয়। সূর্য, বরুণ, বিষ্ণু, ব্রহ্মা, সোম, অগ্নি এবং ভগবান শূলপাণি (শঙ্কর)—এরা সকলেই ভূমিদাতাকে অভিনন্দন করেন।

Verse 49

भूमौ जायन्ति पुरुषा भूमौ निष्ठां व्रजन्ति च | चतुर्विधो हि लोको5यं यो5यं भूमिगुणात्मक:

মানুষ ভূমিতেই জন্মায় এবং ভূমিতেই শেষে স্থিতি (অবসান) লাভ করে। এই লোক চার প্রকার; এবং এ লোক পৃথিবীর গুণেই গঠিত।

Verse 50

सब लोग पृथ्वीपर ही जन्म लेते और पृथ्वीमें ही लीन हो जाते हैं। अण्डज, जरायुज, स्वेदज और उद्धिज्ज--इन चारों प्रकारके प्राणियोंका शरीर पृथ्वीका ही कार्य है ।।

ভীষ্ম বললেন—সমস্ত প্রাণী পৃথিবীতেই জন্ম নেয় এবং শেষে পৃথিবীতেই লীন হয়ে যায়। অণ্ডজ, জরায়ুজ, স্বেদজ ও উদ্ভিজ্জ—এই চার প্রকার জীবের দেহই কেবল পৃথিবীরই কার্য। অতএব, হে পৃথিবীপতি! এই পৃথিবীই জগতের মাতা ও পিতা; হে জনাধিপ! তাঁর সমতুল্য আর কোনো সত্তা নেই।

Verse 51

पृथ्वीनाथ! नरेश्वर! यह पृथ्वी ही जगत्‌की माता और पिता है। इसके समान दूसरा कोई भूत नहीं है ।।

ভীষ্ম বললেন—হে পৃথিবীনাথ, হে নরেশ্বর! এই পৃথিবীই জগতের মাতা ও পিতা; তাঁর সমান আর কোনো সত্তা নেই। এ বিষয়ে জ্ঞানীরা এক প্রাচীন ইতিবৃত্ত উদাহরণ দেন—ইন্দ্র ও বৃহস্পতির সংলাপ, হে যুধিষ্ঠির।

Verse 52

इष्टवा क्रतुशतेनाथ महता दक्षिणावता । मघवा वागििदां श्रेष्ठ पप्रच्छेदं बृहस्पतिम्‌

ভীষ্ম বললেন—মহান দক্ষিণাসহ শত যজ্ঞ সম্পন্ন করে মঘবান (ইন্দ্র) বাক্‌বিদ্যায় শ্রেষ্ঠ বৃহস্পতিকে এই বিষয়ে প্রশ্ন করলেন।

Verse 53

मघवोवाच भगवन्‌ केन दानेन स्वर्गत: सुखमेधते । यदक्षयं महार्घ च तद्‌ ब्रूहि वदतां वर

ইন্দ্র বললেন—হে ভগবন, বক্তাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ! কোন দানে দাতার সুখ স্বর্গের সুখকেও অতিক্রম করে বৃদ্ধি পায়? যার ফল অক্ষয় ও সর্বোচ্চ মূল্যবান, সেই দানের কথা বলুন।

Verse 54

भीष्म उवाच इत्युक्तः स सुरेन्द्रेण ततो देवपुरोहिता: । बृहस्पतिर्बहत्तेजा: प्रत्युवाच शतक्रतुम्‌

ভীষ্ম বললেন—হে ভারত! দেবরাজ ইন্দ্র এ কথা বললে দেবতাদের পুরোহিত মহাতেজস্বী বৃহস্পতি শতক্রতু (ইন্দ্র)-কে এইভাবে উত্তর দিলেন।

Verse 55

ब॒हस्पतिर्वाच सुवर्णदानं गोदानं भूमिदानं च वृत्रहन्‌ (विद्यादानं च कन्यानां दानं पापहरं परम्‌ ।) दददेतान्‌ महाप्राज्ञ: सर्वपापै: प्रमुच्यते

বৃহস্পতি বললেন—হে বৃত্রহন্তা ইন্দ্র! স্বর্ণদান, গোদান, ভূমিদান, তদুপরি বিদ্যাদান ও কন্যাদান—এসবকে সর্বোচ্চ পাপহর বলা হয়। যে মহাপ্রাজ্ঞ ব্যক্তি এই দানসমূহ করেন, তিনি সকল পাপ থেকে মুক্ত হন।

Verse 56

न भूमिदानाद्‌ देवेन्द्र परं किंचिदिति प्रभो । विशिष्टमिति मन्यामि यथा प्राहुर्मनीषिण:,प्रभो! देवेन्द्र! जैसा कि मनीषी पुरुष कहते हैं, मैं भूमिदानसे बढ़कर दूसरे किसी दानको नहीं मानता हूँ

ভীষ্ম বললেন—প্রভু, দেবেন্দ্র! মুনিজনের বচন অনুসারে আমি ভূমিদানের চেয়ে শ্রেষ্ঠ আর কোনো দান মানি না। দানসমূহের মধ্যে এটিই সর্বাধিক বিশিষ্ট বলে গণ্য।

Verse 57

(ब्राह्माणार्थे गवार्थे वा राष्ट्रघातेडथ स्वामिन: । कुलस्त्रीणां परिभवे मृतास्ते भूमिदै: समा: ।।

ভীষ্ম বললেন—যারা ব্রাহ্মণদের রক্ষার্থে, গোরক্ষার্থে, রাষ্ট্রবিনাশের আশঙ্কায়, স্বামীর পক্ষে, এবং কুলনারীদের অপমান রোধ করতে যুদ্ধে প্রাণ ত্যাগ করে—তারা পুণ্যে ভূমিদাতার সমান। হে বিদ্বৎশ্রেষ্ঠ! যুদ্ধক্ষেত্রে নিহত সেই সকল রণপ্রিয় বীর স্বর্গে গমন করে এবং ভূমিদানের ফল থেকে কম হয় না।

Verse 58

विबुधश्रेष्ठ! मनमें युद्धके लिये उत्साह रखनेवाले जो शूरवीर रणभूमिमें मारे जाकर स्वर्गलोकमें जाते हैं, वे सब-के-सब भूमिदाताका उल्लंघन नहीं कर सकते ।।

ভীষ্ম বললেন—হে বিদ্বৎশ্রেষ্ঠ! যারা স্বামীর পরম মঙ্গল সাধনে নিবেদিত হয়ে দেহাসক্তি ত্যাগ করে রণে নিহত হয়, তারা পাপমুক্ত হয়ে ব্রহ্মলোকে গমন করে; তবু তারাও ভূমিদাতার পুণ্যকে অতিক্রম করতে পারে না।

Verse 59

पज्च पूर्वा हि पुरुषा: षडन्ये वसुधां गता: । एकादश दददभूमिं परित्रातीह मानव:

ভীষ্ম বললেন—এই জগতে যে ব্যক্তি ভূমিদান করে, সে পাঁচ পুরুষ পূর্বপুরুষকে এবং পৃথিবীতে আগতব্য ছয় পুরুষ বংশধরকে—এইভাবে মোট এগারো পুরুষকে উদ্ধার করে।

Verse 60

रत्नोपकीर्णा वसुधां यो ददाति पुरंदर | स मुक्त: सर्वकलुषै: स्वर्गलोके महीयते,पुरंदर! जो रत्नयुक्त पृथ्वीका दान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है

হে পুরন্দর! যে রত্নবিক্ষিপ্ত পৃথিবী দান করে, সে সকল কলুষ (পাপ) থেকে মুক্ত হয়ে স্বর্গলোকে সম্মানিত হয়।

Verse 61

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

হে রাজন! যে ধন-ধান্যে সমৃদ্ধ ও সকল কাম্য গুণে ভূষিত পৃথিবী দান করে, সে পরজন্মে রাজাধিরাজ হয়; কারণ এ দান অনুত্তম বলে ঘোষিত।

Verse 62

सर्वकामसमायुक्तां काश्यपीं य: प्रयच्छति । सर्वभूतानि मन्यन्ते मां ददातीति वासव

হে বাসব (ইন্দ্র)! যে সর্বভোগসমন্বিত কাশ্যপী পৃথিবী দান করে, সকল প্রাণীই মনে করে—‘সে আমাকেই দান করছে’।

Verse 63

सर्वकामदुघां धेनुं सर्वकामगुणान्विताम्‌ । ददाति य: सहस्राक्ष स्वर्ग याति स मानव:

হে সহস্রাক্ষ! যে সকল কামনা পূরণকারী, সকল কাম্য গুণে সমন্বিত কামধেনু-স্বরূপা পৃথিবী দান করে, সে মানুষ স্বর্গে গমন করে।

Verse 64

मधुसर्पि:प्रवाहिण्य: पयोदधिवहास्तथा । सरितस्तर्पयन्तीह सुरेन्द्र वसुधाप्रदम्‌,देवेन्द्र! यहाँ पृथ्वीदान करनेवाले पुरुषको परलोकमें मधु, घी, दूध और दहीकी धारा बहानेवाली नदियाँ तृप्त करती हैं

হে সুরেন্দ্র! পরলোকে ভূমিদানকারী পুরুষকে মধু ও ঘৃতধারা প্রবাহিতকারী এবং দুধ ও দধি বহনকারী নদীগুলি তৃপ্ত করে।

Verse 65

भूमिप्रदानान्नपतिर्मुच्यते सर्वकिल्बिषात्‌ । न हि भूमिप्रदानेन दानमन्यद्‌ विशिष्यते,राजा भूमिदान करनेसे समस्त पापोंसे छुटकारा पा जाता है। भूमिदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है

ভূমিদান করলে রাজা সকল পাপকলুষ থেকে মুক্ত হন। ভূমিদানের চেয়ে শ্রেষ্ঠ দান আর নেই।

Verse 66

ददाति य: समुद्रान्तां पृथिवीं शस्त्रनिर्जिताम्‌ । त॑ जना: कथयन्तीह यावद्‌ भवति गौरियम्‌

যে ব্যক্তি অস্ত্রবলে জয় করা সমুদ্রপর্যন্ত পৃথিবী দান করে, এই জগতে যতদিন পৃথিবী স্থির থাকে ততদিন লোকেরা তার কীর্তি গেয়ে চলে।

Verse 67

पुण्यामृद्धिरसां भूमिं यो ददाति पुरंदर । न तस्य लोकाः: क्षीयन्ते भूमिदानगुणान्विता:

হে পুরন্দর! যে ব্যক্তি পুণ্যময় ও সমৃদ্ধির রসে পরিপূর্ণ পৃথিবী দান করে, ভূমিদানের গুণে তার প্রাপ্ত লোকসমূহ ক্ষয় হয় না।

Verse 68

सर्वदा पार्थिवेनेह सततं भूतिमिच्छता । भू्देया विधिवच्छक्र पाये सुखमभीप्सुना,इन्द्र! जो राजा सदा ऐश्वर्य चाहता हो और सुख पानेकी इच्छा रखता हो, वह विधिपूर्वक सुपात्रको भूमिदान दे

হে শক্র (ইন্দ্র)! যে রাজা সর্বদা ঐশ্বর্য কামনা করে এবং সুখ লাভ করতে চায়, তার উচিত বিধিপূর্বক সর্বদা যোগ্য পাত্রকে ভূমিদান করা।

Verse 69

अपि कृत्वा नर: पापं भूमिं दत्त्वा द्विजातये । समुत्सूजति तत्‌ पापं जीर्णा त्वचमिवोरग:

মানুষ পাপ করলেও যদি দ্বিজ (ব্রাহ্মণ)-কে ভূমিদান করে, তবে সে সেই পাপ ত্যাগ করে—যেমন সাপ জীর্ণ খোলস ত্যাগ করে।

Verse 70

सागरान्‌ सरित: शैलान्‌ काननानि च सर्वश: । सर्वमेतन्नर: शक्र ददाति वसुधां ददत्‌

ভীষ্ম বললেন—হে শক্র! যে ব্যক্তি ভূমিদান করে, সে যেন তার সঙ্গে সমুদ্র, নদী, পর্বত ও সর্বপ্রকার অরণ্যও সর্বতোভাবে দান করে; কারণ ভূমির দানে এ সবই অন্তর্ভুক্ত।

Verse 71

इन्द्र! मनुष्य पृथ्वीका दान करनेके साथ ही समुद्र, नदी, पर्वत और सम्पूर्ण वन--इन सबका दान कर देता है (अर्थात्‌ इन सबके दानका फल प्राप्त कर लेता है) ।।

ভীষ্ম বললেন—হে ইন্দ্র! যে ব্যক্তি ভূমিদান করে, সে সমুদ্র, নদী, পর্বত ও সকল অরণ্য দান করার সমান পুণ্য লাভ করে। তদুপরি, ভূমিদাতা যেন পুকুর, কূপ, ঝরনা-ধারা, সরোবর, ঘৃতাদি স্নেহদ্রব্য এবং সর্বপ্রকার রস-সারও দান করেছে—এমনই ফল প্রাপ্ত হয়।

Verse 72

ओषधीर्वीर्यसम्पन्ना नगान्‌ पुष्पफलान्वितान्‌ । काननोपलशैलांश्व ददाति वसुधां ददत्‌

ভীষ্ম বললেন—ভূমিদান করলে মানুষ শক্তিসম্পন্ন ঔষধি, ফুল-ফলে ভরা বৃক্ষ, অরণ্য, শিলা ও পর্বতও যেন দান করে দেয়।

Verse 73

अग्निष्टोमप्र भूतिभिरिष्टवा च स्वाप्तदक्षिणै: । न तत्फलमवाप्रोति भूमिदानाद्‌ यदश्षुते

ভীষ্ম বললেন—অগ্নিষ্টোম প্রভৃতি যজ্ঞ বহু দক্ষিণাসহ সম্পন্ন করলেও মানুষ সেই ফল লাভ করে না, যা ভূমিদান থেকে লাভ হয়।

Verse 74

दाता दशानुगृह्नाति दश हन्ति तथा क्षिपन्‌ | पूर्वदत्ता हरन्‌ भूमिं नरकायोपगच्छति

ভীষ্ম বললেন—যে ভূমিদান করে, সে তার দশ পুরুষকে অনুগ্রহ করে; কিন্তু যে দান করে আবার কেড়ে নেয়, সে দশ পুরুষকে বিনাশ করে। যে পূর্বে দানকৃত ভূমি হরণ করে, সে নরকে গমন করে।

Verse 75

न ददाति प्रतिश्रुत्य दत्त्वापि च हरेत्‌ तु यः । स बद्धो वारुणौ: पाशैस्तप्यते मृत्युशासनात्‌

যে দানের প্রতিশ্রুতি দিয়ে দান করে না, অথবা দান করেও পরে তা কেড়ে নেয়, সে বরুণের পাশে আবদ্ধ হয়ে মৃত্যুর বিধানে দুঃখ ভোগ করে।

Verse 76

आहितागग्निं सदायज्ञं कृशवृत्तिं प्रियातिथिम्‌ । ये भजन्ति द्विजश्रेष्ठ नोपसर्पन्ति ते यमम्‌

যাঁরা আহিতাগ্নি, নিত্য যজ্ঞকর্মে রত, কৃশবৃত্তিতে জীবনধারণকারী এবং অতিথিপ্রিয় শ্রেষ্ঠ দ্বিজকে ভজনা-সেবা করেন, তাঁরা যমের অধীন হন না।

Verse 77

ब्राह्मणेष्वनृणी भूत: पार्थिव: स्यात्‌ पुरंदर | इतरेषां तु वर्णानां तारयेत्‌ कृशदुर्बलान्‌

হে পুরন্দর! রাজা ব্রাহ্মণদের প্রতি ঋণমুক্ত থাকুক—অর্থাৎ সেবা করে তাঁদের সন্তুষ্ট রাখুক; আর অন্যান্য বর্ণের মধ্যে যারা কৃশ ও দুর্বল, তাদেরও বিপদ থেকে উদ্ধার করুক।

Verse 78

नाच्छिन्द्यात्‌ स्पर्शितां भूमिं परेण त्रिदशाधिप । ब्राह्मणस्य सुरश्रेष्ठ कृशवृत्ते: कदाचन

হে ত্রিদশাধিপ, হে সুরশ্রেষ্ঠ! কৃশবৃত্তি ব্রাহ্মণের যে ভূমি অন্যের দানে প্রাপ্ত, তা কখনও কেড়ে নেওয়া উচিত নয়।

Verse 79

यथाश्रु पतितं तेषां दीनानामथ सीदताम्‌ । ब्राह्मणानां द्वते क्षेत्रे हन्यात्‌ त्रिपुरुषं कुलम्‌

ক্ষেত কেড়ে নেওয়ায় দুঃখে কাতর দরিদ্র ব্রাহ্মণদের যে অশ্রু ঝরে, তা কেড়ে নেওয়ালার বংশের তিন পুরুষকে বিনাশ করে।

Verse 80

भूमिपालं च्युतं राष्ट्राद्‌ यस्तु संस्थापयेन्नर: । तस्य वास: सहस्राक्ष नाकपृष्ठे महीयते

ভীষ্ম বললেন—হে সহস্রনেত্র ইন্দ্র! যে ব্যক্তি রাজ্যচ্যুত রাজাকে পুনরায় সিংহাসনে প্রতিষ্ঠা করে, সে স্বর্গের উচ্চ লোকসমূহে বাস লাভ করে এবং সেখানে মহাসম্মানে ভূষিত হয়।

Verse 81

इक्षुभि: संततां भूमिं यवगोधूमशालिनीम्‌ । गो<श्ववाहनपूर्णा वा बाहुवीर्यादुपार्जिताम्‌

ভীষ্ম বললেন—যে ভূমি আখে আচ্ছাদিত, যব ও গমে সমৃদ্ধ, অথবা গোরু-ঘোড়া ও নানা বাহনে পরিপূর্ণ—সে ভূমি রাজা নিজের বাহুবলে জয় করে যদি দান করেন, তবে তিনি অক্ষয় লোক লাভ করেন। এই দানকে ‘ভূমিযজ্ঞ’ বলা হয়।

Verse 82

निधिगर्भा ददद्‌ भूमिं सर्वरत्नपरिच्छदाम्‌ | अक्षयॉल्लभते लोकान्‌ भूमिंसत्र हि तस्य तत्‌

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি গুপ্তধনে পূর্ণ এবং সর্বপ্রকার রত্ন ও মূল্যবান উপকরণে সজ্জিত ভূমি দান করে, সে অক্ষয় লোক লাভ করে। তার জন্য সেই দানই ‘ভূমিসত্র’ হয়ে ওঠে।

Verse 83

इत्येतत्‌ क्षत्रबन्धूनां वदन्ति परमां श्रियम्‌ धर्मशास्त्रोंका सिद्धान्त है कि जैसा दान किया जाता है

ভীষ্ম বললেন—ক্ষত্রিয় বংশের জন্য এটাই পরম শ্রী বলে ঘোষিত। যে বসুন্ধরা দান করে, সে সকল কলুষ ঝেড়ে নির্মল হয়, সজ্জনদের অনুমোদন লাভ করে এবং জগতে সাধুজনের দ্বারা সম্মানিত হয়।

Verse 84

यथाप्सु पतित: शक्र तैलबिन्दुर्विसर्पति । तथा भूमिकृतं दानं सस्ये सस्ये विवर्धते

ভীষ্ম বললেন—হে শক্র! যেমন জলে পড়া তেলের এক ফোঁটা চারদিকে ছড়িয়ে পড়ে, তেমনই ভূমিদান শস্যে শস্যে বৃদ্ধি পায়; যতবার ফসল ফলে, ততবার সেই দানের পুণ্য বিস্তার লাভ করে।

Verse 85

ये रणाग्रे महीपाला: शूरा: समितिशोभना: । वध्यन्तेडभिमुखा: शक्र ब्रह्मलोकं॑ व्रजन्ति ते

দেবরাজ ইন্দ্র! যাঁরা রণাঙ্গনের অগ্রভাগে শত্রুর সম্মুখে দাঁড়িয়ে বীরত্বে যুদ্ধ করতে করতে নিহত হন—সেই সংগ্রামশোভিত বীর রাজারা ব্রহ্মলোক লাভ করেন।

Verse 86

नृत्यगीतपरा नार्यो दिव्यमाल्यविभूषिता: । उपतिष्ठ न्ति देवेन्द्र तथा भूमिप्रदं दिवि,देवेन्द्र! दिव्य मालाओंसे विभूषित हो नाच और गानमें लगी हुई देवांगनाएँ स्वर्गमें भूमिदाताकी सेवामें उपस्थित होती हैं

দেবেন্দ্র! দিব্য মালায় ভূষিতা, নৃত্য ও গীতে নিমগ্ন অপ্সরাগণ স্বর্গে ভূমিদাতার সেবায় উপস্থিত থাকে।

Verse 87

मोदते च सुखं स्वर्गे देवगन्धर्वपूजित: । यो ददाति महीं सम्यग्‌ विधिनेह द्विजातये,जो यहाँ उत्तम विधिसे ब्राह्मणको भूमिका दान करता है, वह स्वर्गमें देवताओं और गन्धर्वोंसे पूजित हो सुख और आनन्द भोगता है

যে ব্যক্তি এখানে বিধিপূর্বক যথাযথভাবে দ্বিজ (ব্রাহ্মণ)-কে ভূমিদান করে, সে স্বর্গে দেবতা ও গন্ধর্বদের দ্বারা পূজিত হয়ে সুখে আনন্দে মগ্ন থাকে।

Verse 88

शतमप्सरसश्रैव दिव्यमाल्यविभूषिता: । उपतिष्ठ न्ति देवेन्द्र ब्रह्मलोके धराप्रदम्‌,देवराज! भूदान करनेवाले पुरुषकी सेवामें ब्रह्मलोकमें दिव्य मालाओंसे विभूषित सैकड़ों अप्सराएँ उपस्थित होती हैं

দেবরাজ! ব্রহ্মলোকে দিব্য মালায় ভূষিতা শত শত অপ্সরা ভূমিদাতার সেবায় উপস্থিত থাকে।

Verse 89

उपतिष्ठन्ति पुण्यानि सदा भूमिप्रदं नरम्‌ । शड्खभद्रासनं छत्र॑ वराश्वा वरवाहनम्‌,भूमिदान करनेवाले मनुष्यके यहाँ सदा पुण्यके फलस्वरूप शंख, सिंहासन, छत्र, उत्तम घोड़े और श्रेष्ठ वाहन उपस्थित होते हैं

ভূমিদানকারী মানুষের কাছে পুণ্যফল সদা উপস্থিত থাকে—শঙ্খ, উৎকৃষ্ট সিংহাসন, রাজছত্র, শ্রেষ্ঠ অশ্ব এবং উৎকৃষ্ট বাহন।

Verse 90

भूमिप्रदानात्‌ पुष्पाणि हिरण्यनिचयास्तथा । आज्ञा सदाप्रतिहता जयशब्दा वसूनि च

ভূমিদান করলে পুরুষ সুন্দর পুষ্প, স্বর্ণের সঞ্চয়, সদা অপ্রতিহত আদেশ-ক্ষমতা, বিজয়ধ্বনি এবং নানা প্রকার ধনরত্ন লাভ করে।

Verse 91

भूमिदानस्य पुण्यानि फल स्वर्ग: पुरंदर । हिरण्यपुष्पाश्नौीषध्य: कुशकाञ्चनशाद्धला:

হে পুরন্দর! ভূমিদানের পুণ্যের ফলস্বরূপ স্বর্গ লাভ হয়; সেখানে ঔষধিগণ সোনালি পুষ্প ফোটায়, আর কুশঘাস ও তৃণভূমি যেন স্বর্ণময়।

Verse 92

अमृतप्रसवां भूमिं प्राप्नोति पुरुषो ददत्‌ । नास्ति भूमिसमं दान॑ नास्ति मातृसमो गुरु: । नास्ति सत्यसमो धर्मो नास्ति दानसमो निधि:

ভূমিদানকারী পুরুষ অমৃতপ্রসবা ভূমি লাভ করে। ভূমিদানের সমান কোনো দান নেই; মাতার সমান কোনো গুরু নেই; সত্যের সমান কোনো ধর্ম নেই; আর দানের সমান কোনো নিধি নেই।

Verse 93

भीष्म उवाच एतदांगिरसाच्छुत्वा वासवो वसुधामिमाम्‌ | वसुरत्नसमाकीर्णा ददावांगिरसे तदा

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! আঙ্গিরস (বৃহস্পতি)-এর মুখে ভূমিদানের এই মাহাত্ম্য শুনে বাসব ইন্দ্র তখন ধনরত্নে পরিপূর্ণ এই পৃথিবী তাঁকে দান করলেন।

Verse 94

य इदं श्रावयेच्छाद्धे भूमिदानस्य सम्भवम्‌ | न तस्य रक्षसां भागो नासुराणां भवत्युत

যে ব্যক্তি শ্রাদ্ধকালে ভূমিদানের এই উৎপত্তি-সহ মাহাত্ম্য পাঠ করায়, তার অর্পিত ভাগ রাক্ষস বা অসুরেরা লাভ করতে পারে না।

Verse 95

पितरोंके निमित्त उसका दिया हुआ सारा दान अक्षय होता है, इसमें संशय नहीं है; इसलिये विद्वान्‌ पुरुषको चाहिये कि वह श्राद्धमें भोजन करते हुए ब्राह्मणोंको यह भूमिदानका माहात्म्य अवश्य सुनाये

পিতৃদের উদ্দেশ্যে যে দান করা হয়, সেই দান সম্পূর্ণই অক্ষয় হয়—এতে কোনো সংশয় নেই। অতএব বিদ্বান পুরুষের উচিত, শ্রাদ্ধে ভোজনরত ব্রাহ্মণদের ভূমিদানের মাহাত্ম্য অবশ্যই শ্রবণ করানো।

Verse 96

इत्येतत्‌ सर्वदानानां श्रेष्ठमुक्ते तवानघ । मया भरतशार्दूल कि भूय: श्रोतुमिच्छसि

হে নিষ্পাপ! এইভাবে আমি তোমাকে সকল দানের মধ্যে শ্রেষ্ঠ দানের কথা বললাম। হে ভারতশার্দূল, হে নির্দোষ ভারতশ্রেষ্ঠ! আর কী শুনতে ইচ্ছা কর?

Frequently Asked Questions

It examines how specific gifts (footwear, sesame, land, cows, food) are evaluated in dharma discourse—what outcomes are attributed to them and what conditions (intent and recipient) govern their legitimacy.

Dāna is presented as a disciplined practice: give what alleviates real need (e.g., food, shelter, footwear), prioritize ritual-social efficacy (e.g., sesame for pitṛ rites), and avoid gifts that enable harm or violate ethical/ritual propriety.

Yes. It repeatedly states outcomes (e.g., avoiding severe adversity, attaining favorable realms, overcoming obstacles) and ends with an explicit recap that the fruits of annadāna, tiladāna, bhūmidāna, and godāna have been described.