
Cyavana Explains His Tests; Kuśika Seeks Brāhmaṇya for His Line (च्यवन–कुशिक संवादः)
Upa-parva: Dāna-Dharma and Lineage Instruction (Cyavana–Kuśika Episode)
Chapter 55 records King Kuśika questioning sage Cyavana about a sequence of puzzling actions: prolonged one-sided sleep for twenty-one days, sudden disappearances and reappearances, oil-anointed departures, the burning of prepared food, abrupt travel by chariot, displays of wealth, forests, golden mansions, and jeweled couches, followed by vanishing. Cyavana replies that he must explain fully since he was asked directly, and grounds his conduct in a prior prophetic disclosure heard from Pitāmaha (Brahmā) in a divine assembly: a future brahma–kṣatra antagonism would affect Kuśika’s line. To protect his own lineage and to assess Kuśika’s disposition, Cyavana intentionally instituted trials—remaining asleep so the king and queen might be tempted to wake him, creating hunger and fatigue, and provoking possible anger through the burning of food and demands for resources. Kuśika’s consistent restraint, absence of subtle resentment, and compliant service lead Cyavana to declare satisfaction and to offer a boon. Cyavana clarifies that the wondrous vision was a deliberate ‘svarga-sandarśana’ shown briefly to Kuśika embodied, as an instructional demonstration of tapas and dharma and as a response to the king’s aspiration for brāhmaṇya. Kuśika requests that his lineage attain brāhmaṇya through a descendant, and asks further details on how the transformation to vipra-status will occur and who the significant future kinsman will be.
Chapter Arc: युधिष्ठिर जामदग्न्य परशुराम के विषय में कौतूहल प्रकट करते हैं—यह सत्यपराक्रमी राम कैसे उत्पन्न हुए, और ब्रह्मर्षि-वंश में क्षत्रधर्म का उदय कैसे हुआ? → भीष्म च्यवन–कुशिक उपाख्यान का सूत्र पकड़ते हैं: महर्षि च्यवन को अपने वंश में आने वाले गुण-दोष का पूर्वाभास होता है और वे कुशिक-वंश के प्रसंग को लक्ष्य करके कठोर निर्णय-भाव (दग्धुकाम) तक पहुँचते हैं। उधर राजा कुशिक अतिथि-सत्कार में मुनि को महल में ले जाकर आदर देता है, पर संवाद के भीतर भविष्य की कठोरता की छाया बनी रहती है। → सूर्यास्त के साथ अतिथि-धर्म और तपोबल का टकराव तीव्र होता है—राजा अन्न-पान की व्यवस्था करता है, पर च्यवन का अंतर्मन वंश-धर्म, दोष-निवारण और आने वाले परिणामों की ओर खिंचता है; इसी तनाव में राजा (रानी सहित) संभलकर पुनः ‘अन्वेषण’/उपाय-खोज में लगते हैं, मानो किसी अदृश्य संकट ने गृहस्थ-धर्म की परीक्षा ले ली हो। → अध्याय च्यवन–कुशिक संवाद की स्थापना और प्रसंग-भूमि तैयार करके समाप्त होता है—परशुराम-उत्पत्ति के प्रश्न का उत्तर देने हेतु कथा-धारा को अगले चरण के लिए बाँध देता है। → च्यवन ने कुशिक-वंश के संदर्भ में जो ‘दोष’ देखा और जिस कठोर उपाय का मन बनाया—उसका वास्तविक स्वरूप और उससे परशुराम-वंश-परिणति कैसे जुड़ती है?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५० श्लोक हैं) अपने-आप बछ। आर: द्विपञज्चाशत्तमो<ड ध्याय: राजा कुशिक और 8 8 द्वारा महर्षि च्यवनकी वा युधिछिर उवाच संशयो मे महाप्राज्ञ सुमहान् सागरोपम: । त॑ मे शूणु महाबाहो श्रुत्वा व्याख्यातुमहसि
যুধিষ্ঠির বললেন—হে মহাপ্রাজ্ঞ! আমার মনে সমুদ্রসম এক মহাবিশাল সংশয় উদিত হয়েছে। হে মহাবাহো! তা আমার কাছ থেকে শুনুন, এবং শুনে তার ব্যাখ্যা করুন।
Verse 2
कौतूहलं मे सुमहज्जामदग्न्यं प्रति प्रभो । राम॑ धर्मभृतां श्रेष्ठ तन््मे व्याख्यातुमहसि
যুধিষ্ঠির বললেন—হে প্রভু! জামদগ্ন্য রাম (পরশুরাম) সম্বন্ধে আমার মনে অতি বৃহৎ কৌতূহল জেগেছে। হে ধর্মধারীদের শ্রেষ্ঠ রাম! প্রভু, তা আমাকে স্পষ্ট করে ব্যাখ্যা করুন।
Verse 3
कथमेष समुत्पन्नो राम: सत्यपराक्रम: । कथं ब्रद्मर्षिवंशो<यं क्षत्रधर्मा व्यजायत,ये सत्यपराक्रमी परशुरामजी कैसे उत्पन्न हुए? ब्रह्मर्षियोंका यह वंश क्षत्रियधर्मसे सम्पन्न कैसे हो गया?
যুধিষ্ঠির বললেন—সত্যপরাক্রমী এই রাম কীভাবে জন্মগ্রহণ করলেন? আর ব্রহ্মর্ষিদের এই বংশ কীভাবে ক্ষত্রিয়ধর্মে ভূষিত হল?
Verse 4
तदस्य सम्भवं राजन् निखिलेनानुकीर्तय । कौशिकाच्च कथं वंशात् क्षत्राद् वै ब्राह्मणो भवेत्
যুধিষ্ঠির বললেন— হে রাজন! তাঁর জন্মবৃত্তান্ত সম্পূর্ণভাবে আমাকে বলুন। কুশিকের বংশ তো ক্ষত্রিয় ছিল; তবে সেই ক্ষত্রিয় বংশ থেকে ব্রাহ্মণ কীভাবে জন্মাল? অতএব, হে রাজন, পরশুরামের উৎপত্তির পূর্ণ বিবরণ দিন।
Verse 5
अहो प्रभाव: सुमहानासीद् वै सुमहात्मन: । रामस्य च नरव्याप्र विश्वामित्रस्य चैव हि,पुरुषसिंह! महात्मा परशुराम और विश्वामित्रका महान् प्रभाव अदभुत था
যুধিষ্ঠির বললেন— হে নরব্যাঘ্র! মহাত্মা রাম (পরশুরাম) এবং বিশ্বামিত্র—এই দুই মহাপুরুষের প্রভাব সত্যই আশ্চর্য ও অতিমহান ছিল।
Verse 6
कथं पुत्रानतिक्रम्य तेषां नप्तृष्पथाभवत् । एष दोष: सुतान् हित्वा तत्त्वं व्याख्यातुमहसि
যুধিষ্ঠির বললেন— তাঁদের পুত্রদের অতিক্রম করে এই ব্যতিক্রম কীভাবে তাঁদের পৌত্রদের মধ্যে দেখা দিল? পুত্রদের বাদ দিয়ে পৌত্রদের মধ্যেই যেন এই দোষ প্রকাশ পেল। এর প্রকৃত কারণ আপনি ব্যাখ্যা করাই উচিত—অনুগ্রহ করে তা বলুন।
Verse 7
भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । च्यवनस्य च संवादं कुशिकस्य च भारत,भीष्मजीने कहा--भारत! इस विषयमें महर्षि च्यवन और राजा कुशिकके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं
ভীষ্ম বললেন— হে ভারত! এ বিষয়েও এক প্রাচীন ইতিহাসের দৃষ্টান্ত দেওয়া হয়—ঋষি চ্যবন ও রাজা কুশিকের সংলাপ।
Verse 8
एत॑ दोषं पुरा दृष्टवा भार्गवश्ष्यवनस्तदा । आगामिन॑ महाबुद्धि: स्ववंशे मुनिसत्तम:
পূর্বকালে ভার্গব ঋষি চ্যবন এই আসন্ন দোষটি দেখে, মহাবুদ্ধিমান সেই মুনিশ্রেষ্ঠ নিজ বংশের কল্যাণ-অকল্যাণ মনে মনে বিচার করলেন।
Verse 9
निश्चित्य मनसा सर्व गुणदोषबलाबलम् | दग्धुकाम: कुलं सर्व कुशिकानां तपोधन:
ভীষ্ম বললেন—পূর্বেই ভৃগুপুত্র চ্যবন জেনে গিয়েছিলেন যে কুশিক-বংশের কন্যার সঙ্গে বৈবাহিক সম্পর্ক স্থাপিত হলে তাঁর নিজ বংশে ক্ষাত্রত্বের এক মহাদোষ উদ্ভূত হবে। অতএব সেই তপোধন মুনিশ্রেষ্ঠ মনেই সকল গুণ-দোষ ও বল-অবল বিচার করে দৃঢ় সিদ্ধান্ত নিলেন এবং কুশিকদের সমগ্র কুল ভস্মীভূত করার অভিপ্রায়ে কুশিক রাজার নিকট অগ্রসর হলেন।
Verse 10
च्यवन: समनुप्राप्य कुशिकं वाक्यमब्रवीत् | वस्तुमिच्छा समुत्पन्ना त्वया सह ममानघ
চ্যবন মুনি কুশিকের নিকট পৌঁছে বললেন—“নিষ্পাপ নৃপ! তোমার সঙ্গে কিছু কাল বাস করার ইচ্ছা আমার মনে জেগেছে।”
Verse 11
कुशिक उवाच भगवन् सहधर्मो<5यं पण्डितैरिह धार्यते । प्रदानकाले कनन््यानामुच्यते च सदा बुधैः
কুশিক বললেন—“ভগবন্, অতিথিসেবারূপ এই সহধর্ম এখানে পণ্ডিতজন সর্বদা পালন করেন; আর কন্যাদানের সময়েও জ্ঞানীরা সর্বদা এ কথাই উপদেশ দেন।”
Verse 12
यत्तु तावदतिक्रान्तं धर्मद्वारं तपोधन । तत्कार्य प्रकरिष्यामि तदनुज्ञातुमहसि
“কিন্তু, হে তপোধন! যেখানে ধর্মের দ্বার ইতিমধ্যেই অতিক্রান্ত হয়েছে, সে বিষয়ে যা করণীয়, তা আমি এখন সম্পাদন করব; আপনি অনুগ্রহ করে অনুমতি দিন।”
Verse 13
तपोधन! अबतक तो इस धर्मके मार्गका पालन नहीं हुआ और समय निकल गया, परंतु अब आपके सहयोग और कृपासे इसका पालन करूँगा। अत: आप मुझे आज्ञा प्रदान करें कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ ।।
ভীষ্ম বললেন—তখন কুশিক মহর্ষি চ্যবনের জন্য আসন নিয়ে, পত্নীসহ সেই স্থানে গেলেন যেখানে মুনি অবস্থান করছিলেন।
Verse 14
इतना कहकर राजा कुशिकने महामुनि च्यवनको बैठनेके लिये आसन दिया और स्वयं अपनी पत्नीके साथ उस स्थानपर आये, जहाँ वे मुनि विराजमान थे ।।
এ কথা বলে রাজা কুশিক মহামুনি চ্যবনকে বসার জন্য আসন দিলেন এবং নিজে পত্নীসহ সেই স্থানে গেলেন যেখানে মুনি আসীন ছিলেন। তারপর রাজা ভৃঙ্গার হাতে নিয়ে স্বয়ং মুনির পদপ্রক্ষালনের জন্য পাদ্যজল নিবেদন করলেন; অতঃপর অর্ঘ্য প্রভৃতি আতিথ্য-সৎকারের সমস্ত বিধি সেই মহাত্মার জন্য যথাবিধি সম্পন্ন করালেন।
Verse 15
ततः स राजा च्यवनं मधुपर्क यथाविधि । ग्राहयामास चाव्यग्रो महात्मा नियतव्रत:,इसके बाद नियमतः व्रत पालन करनेवाले महामनस्वी राजा कुशिकने शान्तभावसे च्यवन मुनिको विधिपूर्वक मधुपर्क भोजन कराया
তারপর নিয়তব্রত পালনকারী মহামনস্বী রাজা কুশিক শান্তচিত্তে চ্যবন মুনিকে বিধিপূর্বক মধুপর্ক গ্রহণ করালেন।
Verse 16
सत्कृत्य तं तथा विप्रमिदं पुनरथाब्रवीत् । भगवन् परवन्न्तौ स्वो ब्रूहि किं करवावहे
এইভাবে সেই ব্রাহ্মর্ষিকে যথাযথ সৎকার করে তারা আবার বলল—“ভগবন্! আমরা স্বামী-স্ত্রী দু’জনই আপনার অধীন। বলুন, আমরা আপনার কী সেবা করব?”
Verse 17
यदि राज्यं यदि धनं यदि गा: संशितव्रत । यज्ञदानानि च तथा ब्रहि सर्व ददामि ते
“দৃঢ় ও কঠোর ব্রতধারী মহর্ষে! যদি রাজ্য, ধন, গাভী কিংবা যজ্ঞার্থ দান—যা কিছুই আপনি চান—বলুন; আমি সবই আপনাকে দান করব।”
Verse 18
इदं गृहमिदं राज्यमिदं धर्मासनं च ते । राजा त्वमसि शाध्युर्वीमहं तु परवांस्त्वयि
“এই গৃহ, এই রাজ্য এবং ধর্মসম্মত এই সিংহাসন—সবই আপনার। সাধু ঋষে! আপনিই রাজা; পৃথিবীকে রক্ষা করুন। আর আমি চিরকাল আপনার অধীন, আপনার আদেশের দাস।”
Verse 19
एवमुक्ते ततो वाक्ये च्यवनो भार्गवस्तदा । कुशिकं प्रत्युवाचेद॑ मुदा परमया युत:
এভাবে কথা বলা হলে, তখন ভৃগুবংশীয় চ্যবন পরম আনন্দে পরিপূর্ণ হয়ে কুশিককে প্রত্যুত্তর দিলেন।
Verse 20
उनके ऐसा कहनेपर भृगुपुत्र च्यवन मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और कुशिकसे इस प्रकार बोले-- ।।
রাজন! আমি রাজ্য চাই না, ধনও নয়, নারীর কামনাও নয়। গোরু, দেশ কিংবা যজ্ঞও নয়—আমার এই কথা শুনুন।
Verse 21
नियम किंचिदारप्स्ये युवयोर्यदि रोचते । परिचर्योडस्मि यत्ताभ्यां युवाभ्यामविशड्कया
যদি তোমাদের উভয়ের সম্মতি হয়, তবে আমি একটি নিয়ম আরম্ভ করব; সেই নিয়মে তোমরা স্বামী-স্ত্রী দু’জনেই কোনো সন্দেহ বা দ্বিধা না রেখে আমার সেবা করবে।
Verse 22
एवमुक्ते तदा तेन दम्पती तौ जहर्षतु: । प्रत्यब्रूतां च तमृषिमेवमस्त्विति भारत,मुनिकी यह बात सुनकर राजदम्पतिको बड़ा हर्ष हुआ। भारत! उन दोनोंने उन्हें उत्तर दिया, “बहुत अच्छा, हम आपकी सेवा करेंगे”
তিনি এ কথা বললে সেই দম্পতি আনন্দে উল্লসিত হলেন। হে ভারত! তাঁরা সেই ঋষিকে বললেন—“তাই হোক; আমরা আপনার সেবা করব।”
Verse 23
अथ तं कुशिको हृष्ट: प्रावेशयदनुत्तमम् । गृहोद्देशं ततस्तस्य दर्शनीयमदर्शयत्
তখন আনন্দিত কুশিক তাঁকে গৃহের শ্রেষ্ঠ অংশে প্রবেশ করালেন, এবং পরে সেই মুনিকে এক মনোরম, সুসজ্জিত কক্ষ দেখালেন।
Verse 24
इयं शय्या भगवतो यथाकाममिहोष्यताम् । प्रयतिष्यावहे प्रीतिमाहर्तु ते तपोधन
ঘরের দিকে দেখিয়ে তিনি বললেন—“তপোধন! আপনার জন্য এই শয্যা প্রস্তুত। আপনি ইচ্ছামতো এখানে অবস্থান করে বিশ্রাম করুন। আপনাকে সন্তুষ্ট রাখার জন্য আমরা সর্বতোভাবে চেষ্টা করব।”
Verse 25
अथ सूर्योडतिचक्राम तेषां संवदतां तथा । अथर्षिश्षलोदयामास पानमन्नं तथैव च,इस प्रकार उनमें बातें होते-होते सूर्यास्त हो गया। तब महर्षिने राजाको अन्न और जल ले आनेकी आज्ञा दी
এভাবে কথোপকথন চলতে চলতে সূর্য অস্ত গেল। তখন মহর্ষি রাজাকে পানীয় জল এবং আহারও আনতে আদেশ দিলেন।
Verse 26
तमपृच्छत् ततो राजा कुशिक: प्रणतस्तदा । किमन्नजातमिष्टं ते किमुपस्थापयाम्यहम्
তখন রাজা কুশিক প্রণাম করে জিজ্ঞাসা করলেন—“মহর্ষে! আপনার কোন ধরনের আহার প্রিয়? আপনার সেবায় আমি কী কী উপস্থিত করব?”
Verse 27
ततः स परया प्रीत्या प्रत्युवाच नराधिपम् । औपपत्तिकमाहारं प्रयच्छस्वेति भारत,भरतनन्दन! यह सुनकर वे बड़ी प्रसन्नताके साथ राजासे बोले--'तुम्हारे यहाँ जो भोजन तैयार हो, वही ला दो”
এ কথা শুনে তিনি অত্যন্ত প্রসন্ন হয়ে রাজাকে বললেন—“হে ভারতনন্দন! তোমার গৃহে যা আহার প্রস্তুত আছে, তাই এনে দাও।”
Verse 28
तद्बच: पूजयित्वा तु तथेत्याह स पार्थिव: । यथोपपन्नमाहारं तस्मै प्रादाज्जनाधिप
তাঁর বাক্যকে সম্মান করে রাজা বললেন—“যথাস্তু।” তারপর যা আহার প্রস্তুত ছিল, তাই এনে তিনি মুনির সম্মুখে নিবেদন করলেন।
Verse 29
ततः स भुक्त्वा भगवान् दम्पती प्राह धर्मवित् । स्वप्तुमिच्छाम्यहं निद्रा बाधते मामिति प्रभो
তারপর ভোজন করে ধর্মজ্ঞ ভগবান চ্যবন রাজদম্পতিকে বললেন— “এখন আমি শুতে চাই; নিদ্রা আমাকে আচ্ছন্ন করছে, প্রভু! প্রভু!”
Verse 30
ततः शय्यागृहं प्राप्प भगवानृषिसत्तम: । संविवेश नरेशस्तु सपत्नीक: स्थितो5भवत्,इसके बाद मुनिश्रेष्ठ भगवान् च्यवन शयनागारमें जाकर सो गये और पत्नीसहित राजा कुशिक उनकी सेवामें खड़े रहे
এরপর ঋষিশ্রেষ্ঠ ভগবান চ্যবন শয়নগৃহে গিয়ে শুয়ে পড়লেন; আর রাজা কুশিক রাণীসহ সেখানে দাঁড়িয়ে তাঁর সেবা করতে লাগলেন।
Verse 31
न प्रबोध्यो5स्मि संसुप्त इत्युवाचाथ भार्गव: । संवाहितव्यौ मे पादौ जागृतव्यं च तेडनिशम्
তখন ভৃগুপুত্র বললেন— “আমি ঘুমিয়ে পড়লে আমাকে জাগাবে না। আমার দুই পা টিপে দিতে থাকবে, আর তোমরা দু’জনই নিরন্তর জেগে থাকবে।”
Verse 32
अविशड्कस्तु कुशिकस्तथेत्येवाह धर्मवित् | न प्रबोधयतां तौ च दम्पती रजनीक्षये,धर्मज्ञ राज कुशिकने नि:ःशंक होकर कहा, “बहुत अच्छा'। रात बीती, सबेरा हुआ, किंतु उन पति-पत्नीने मुनिको जगाया नहीं
ধর্মজ্ঞ কুশিক নিঃসন্দেহে বললেন— “তথাস্তु, খুব ভালো।” রাত শেষ হয়ে প্রভাত এলো, তবু সেই দম্পতি মুনিকে জাগাল না।
Verse 33
यथादेशं महर्षेस्तु शुश्रूषापरमौ तदा । बभूवतुर्महाराज प्रयतावथ दम्पती,महाराज! वे दोनों दम्पति मन और इन्द्रियोंको वशमें करके महर्षिके आज्ञानुसार उनकी सेवामें लगे रहे
হে মহারাজ, তখন সেই দম্পতি মহর্ষির আদেশমতো সেবাতেই পরম মনোযোগী হলেন; মন ও ইন্দ্রিয় সংযত করে তাঁরা নিষ্ঠায় পরিচর্যা করতে লাগলেন।
Verse 34
ततः स भगवान् विप्र: समादिश्य नराधिपम् | सुष्वापैकेन पाश्वेन दिवसानेकविंशतिम्,उधर ब्रह्मर्षि भगवान् च्यवन राजाको सेवाका आदेश देकर इक्कीस दिनोंतक एक ही करवटसे सोते रह गये
তখন সেই ভগবৎপ্রতিম ব্রহ্মর্ষি নরাধিপতিকে উপদেশ দিয়ে এক পাশ ফিরে একুশ দিন শয়ন করলেন।
Verse 35
स तु राजा निराहार: सभार्य: कुरुनन्दन | पर्युपासत त॑ हृष्टक्ष्यवनाराधने रत:
কুরুনন্দন! সেই রাজা রাণীসহ উপবাসী থেকে আনন্দচিত্তে তাঁর সেবা-উপাসনা করল এবং চ্যবনের আরাধনাতেই নিবিষ্ট রইল।
Verse 36
कुरुनन्दन! राजा और रानी बिना कुछ खाये-पीये हर्षपूर्वक महर्षिकी उपासना और आराधनामें लगे रहे ।।
তারপর তপোধন মহাতপস্বী ভার্গব চ্যবন বাইশতম দিনে স্বয়ং উঠে দাঁড়ালেন এবং রাজাকে কিছু না বলে রাজপ্রাসাদ থেকে বেরিয়ে গেলেন।
Verse 37
तमन्वगच्छतां तौ च क्षुधितौ श्रमकर्शितौ । भार्यापती मुनिश्रेष्ठस्तावेती नावलोकयत्
রাজা-রাণী ক্ষুধায় কাতর ও পরিশ্রমে ক্লান্ত হয়েও মুনির পেছনে পেছনে চললেন; কিন্তু সেই মুনিশ্রেষ্ঠ দম্পতির দিকে চোখ তুলে তাকালেনও না।
Verse 38
एप जाओ ए7र एतएएचछस्सू ५४८22: ४ ५(८/८
রাজেন্দ্র! দেখতে দেখতে ভৃগুকুলশিরোমণি সেই ভার্গব অন্তর্ধান করলেন; তখন গভীর দুঃখে আঘাতপ্রাপ্ত হয়ে রাজা ভূমিতে লুটিয়ে পড়লেন।
Verse 39
स मुहूर्त समाश्वस्य सह देव्या महाद्युति: । पुनरन्वेषणे यत्नमकरोत् परमं तदा
কিছুক্ষণ নিজেকে সামলে সেই মহাতেজস্বী রাজা পুনরায় উঠলেন; রাণীকে সঙ্গে নিয়ে তিনি আবার ঋষিকে অনুসন্ধান করতে সর্বশক্তি প্রয়োগ করলেন।
Verse 51
इस प्रकार श्रीमहद्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्चवनका उपाख्यानविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে চ্যবনোপাখ্যান-বিষয়ক একান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 52
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनकुशिकसंवादे द्विपज्चाशत्तमोडध्याय:
ইতি শ্রীমহাভারতে অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে চ্যবন-কুশিক-সংবাদে বাহান্নতম অধ্যায়।
Kuśika must maintain hospitality and composure despite confusion, deprivation, and apparent provocations—demonstrating restraint rather than retaliatory suspicion toward an ascetic guest.
Ethical steadiness under stress—especially toward those in ascetic disciplines—functions as a measurable criterion for merit, making boons and higher aims contingent on self-control rather than power.
Yes: Cyavana explicitly frames the events as intentional yogic testing and as a demonstrative ‘svarga-sandarśana’ meant to illustrate the efficacy of tapas and dharma and to assess Kuśika’s inner reactions.