Adhyaya 22
Anushasana ParvaAdhyaya 2227 Verses

Adhyaya 22

Aṣṭāvakra and the Woman: Disclosure, Permission, and Marital Resolution (अनुशासन पर्व, अध्याय २२)

Upa-parva: Anuśāsana-parva (Didactic Dialogues on Conduct and Social Dharma)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma how a particular woman does not fear the curse of a supremely radiant authority and how that authority’s restraint/withdrawal occurred. Bhīṣma recounts that Aṣṭāvakra questioned the woman about the alteration of her form, instructing that no falsehood should be spoken. The woman replies that her conduct is to be understood directionally (she identifies herself with the northern quarter) and frames her interaction as a deliberate test intended to stabilize or instruct; she also generalizes that sexual desire can trouble even elderly women, presenting it as a recognized condition rather than mere individual fault. She states that higher beings are satisfied and that she was sent by a Brahmin—identified as the girl’s father—to deliver instruction and complete the task. She grants Aṣṭāvakra leave, promises safe return without hardship, and states he will obtain the maiden, who will become a mother of sons. Aṣṭāvakra departs, returns home, reports the encounter, and is then asked to accept the Brahmin’s daughter in marriage at an auspicious conjunction of nakṣatra and tithi; he agrees, accepts the maiden, and resides contentedly in his āśrama.

Chapter Arc: भीष्म राजन् को एक विचित्र उपाख्यान में ले जाते हैं—अष्टावक्र ऋषि और उत्तर दिशा की एक रहस्यमयी स्त्री का संवाद, जहाँ सेवा-धर्म और काम-धर्म आमने-सामने खड़े हैं। → स्त्री ‘बहुत अच्छा’ कहकर दिव्य तेल, वस्त्र और स्नान-सामग्री लाती है; ऋषि को स्नानगृह तक ले जाकर विधिपूर्वक, सोपचार सेवा करती है। ऋषि उस सुखोष्ण स्नान और स्त्री के हाथों के स्पर्श-सुख में डूबते हैं—और समय का बोध खो बैठते हैं। → रात्रि के मध्य स्त्री काम-आकांक्षा से व्याकुल होकर ऋषि से मैथुन की माँग करती है और चेतावनी देती है कि अस्वीकार करने पर ‘अधर्म’ लगेगा—यहीं तपस्वी की मर्यादा और गृहस्थ-धर्म का दावा तीखे संघर्ष में बदल जाता है। → ऋषि अपनी संयम-शक्ति और सत्य-प्रतिज्ञा का आधार लेकर काम-प्रवृत्ति को स्वीकार नहीं करते; स्त्री के रूप-परिवर्तन (कन्या-रूप बनाम जरा-जीर्णता) का रहस्य प्रश्न बनकर उभरता है, और कथा संकेत देती है कि यह परीक्षा/माया/नियमबद्ध वरदान का परिणाम है—सेवा का प्रतिदान देह-सुख नहीं, आत्म-नियंत्रण की सिद्धि है। → स्त्री के रूप-परिवर्तन का कारण क्या है, और ‘भक्ति’ बनाम ‘काम’ के इस विवाद में धर्म का अंतिम निर्णय किसके पक्ष में जाएगा?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १०५ श्लोक हैं) नल्लजा5 >> 7 जा विशो<ध्याय: अष्टावक्र और उत्तर दिशाका संवाद भीष्म उवाच अथ सा स्त्री तमुवाच बाढमेवं भवत्विति । तैलं दिव्यमुपादाय स्नानशाटीमुपानयत्‌

ভীষ্ম বললেন—তখন সেই নারী তাকে বলল—“বাঢ়ম্, যেমন বলছ তেমনই হোক।” এই বলে সে দিব্য তেল নিয়ে স্নানের বস্ত্র এনে দিল।

Verse 2

भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! ऋषिकी बात सुनकर उस स्त्रीने कहा--“बहुत अच्छा, ऐसा ही हो” यों कहकर वह दिव्य तेल और स्नानोपयोगी वस्त्र ले आयी ।।

ভীষ্ম বললেন—রাজন! ঋষির কথা শুনে সেই নারী বলল—“বাঢ়ম্, ঠিক তেমনই হোক।” এই বলে সে দিব্য তেল ও স্নানের উপযোগী বস্ত্র এনে দিল। তারপর মহাত্মা মুনির অনুমতি পেয়ে সে তেল দিয়ে তাঁর সর্বাঙ্গে অনুলেপন করল।

Verse 3

शनैश्वोत्सादितस्तत्र स्‍स्नानशालामुपागमत्‌ | भद्रासनं तततश्रित्रमृषिरन्वगमन्नवम्‌,फिर उसके उठानेपर वे धीरेसे वहाँ स्नानगृहमें गये। वहाँ ऋषिको एक विचित्र एवं नूतन चौकी प्राप्त हुई

তারপর তাকে আলতো করে উঠিয়ে দিলে তিনি ধীরে ধীরে স্নানগৃহে গেলেন। সেখানে ঋষির জন্য এক সুন্দর আসন প্রস্তুত ছিল—দেখতে বিচিত্র, নবনির্মিত—সম্মানজনক আতিথ্যের উপযুক্ত।

Verse 4

अथोपविष्टश्न यदा तस्मिन्‌ भद्रासने तदा । स्नापयामास शनकैस्तमृषिं सुखहस्तवत्‌,जब वे उस सुन्दर चौकीपर बैठ गये तब उस स्त्रीने धीरे-धीरे हाथोंके कोमल स्पर्शसे उन्हें नहलाया

মুনি যখন সেই শুভ আসনে উপবিষ্ট হলেন, তখন সেই নারী ধীরে ধীরে কোমল ও স্নিগ্ধ স্পর্শযুক্ত হাতে শ্রদ্ধাভরে তাঁকে স্নান করালেন।

Verse 5

दिव्यं च विधिवच्चक्रे सोपचारं मुनेस्तदा । स तेन सुसुखोष्णेन तस्या हस्तसुखेन च

তখন সে বিধিপূর্বক ও দিব্যরূপে মুনির সৎকার করল। সেই মনোরম উষ্ণ সেবায় এবং তার হাতের স্নিগ্ধ স্পর্শে তিনি পরম আরাম লাভ করলেন।

Verse 6

तत उत्थाय स मुनिस्तदा परमविस्मित:

এরপর সেই মুনি পরম বিস্ময়ে উঠে বসলেন। তিনি দেখলেন—পূর্ব দিগন্তের আকাশে সূর্যদেব উদিত হয়েছেন। তখন মনে মনে ভাবলেন, “এ কি আমার মোহ, না কি সত্যিই সূর্যোদয় হয়েছে?”

Verse 7

पूर्वस्यां दिशि सूर्य च सो5पश्यदुदितं दिवि | तस्य बुद्धिरियं कि नु मोहस्तत्त्वमिदं भवेत्‌

তারপর তিনি পূর্ব দিশার আকাশে সূর্যকে উদিত দেখলেন। তাঁর মনে সন্দেহ জাগল—“এ কী? কেবল মোহ, না সত্যিই সূর্য উঠেছে?”

Verse 8

अथोपास्य सहस्रांशुं कि करोमीत्युवाच ताम्‌ । सा चामृतरसप्रख्यं ऋषेरन्नमुपाहरत्‌

তারপর সহস্ররশ্মি সূর্যের উপাসনা করে তিনি তাকে বললেন, “এখন আমি কী করব?” তখন সেই নারী ঋষির সামনে অমৃতরসসম মধুর অন্ন এনে পরিবেশন করল।

Verse 9

तस्य स्वादुतयान्नस्य न प्रभूतं चकार सः । व्यगमच्चाप्यह:शेषं ततः संध्यागमत्‌ पुन:

ভীষ্ম বললেন—সেই অন্নের মাধুর্যে সে এমন মোহিত হল যে তাকে যথেষ্ট বলে মানতে পারল না; “এবার যথেষ্ট, সম্পূর্ণ হল” বলতে পারল না। এই আসক্তিতেই দিনের অবশিষ্ট সময় কেটে গেল, আর আবার সন্ধ্যাতারা উপস্থিত হল।

Verse 10

अथ सा स्त्री भगवन्तं सुप्यतामित्यचोदयत्‌ । तत्र वै शयने दिव्ये तस्य तस्याश्ष कल्पिते

ভীষ্ম বললেন—তারপর সেই নারী ভগবান অষ্টাবক্রকে বলল, “এখন আপনি বিশ্রাম করুন।” সেই স্থানেই এক দিব্য শয্যায় তাঁর জন্য এবং সেই নারীর জন্য পৃথক দুটি শয্যা প্রস্তুত করা হল।

Verse 11

पृथक्‌ चैव तथा सुप्तौ सा स्त्री स च मुनिस्तदा । तथार्धात्रे सा स्त्री तु शयनं तदुपागमत्‌,उस समय वह स्त्री और मुनि दोनों अलग-अलग सो गये। जब आधी रात हुई तब वह स्त्री उठकर मुनिकी शय्यापर आ बैठी

ভীষ্ম বললেন—তখন সেই নারী ও মুনি পৃথক পৃথক শয্যায় শয়ন করলেন। মধ্যরাত্রি হলে সেই নারী উঠে মুনির শয্যার কাছে এসে তাঁর শয্যাতেই বসে পড়ল।

Verse 12

अष्टावक्र उवाच न भठद्रे परदारेषु मनो मे सम्प्रसज्जति । उत्तिष्ठ भद्रे भद्रं ते स्वयं वै विरमस्व च

অষ্টাবক্র বললেন—ভদ্রে, পরস্ত্রীতে আমার মন আসক্ত হয় না। তোমার মঙ্গল হোক; এখান থেকে ওঠো এবং নিজে থেকেই এই পাপকর্ম থেকে বিরত হও।

Verse 13

भीष्य उवाच सा तदा तेन विप्रेण तथा तेन निवर्तिता । स्वतन्त्रास्मीत्युवाचर्षि न धर्मच्छलमस्ति ते

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, সেই ব্রহ্মর্ষি যখন তাকে এভাবে নিবৃত্ত করলেন, তখন সে বলল, “আমি স্বতন্ত্র; হে ঋষি, আমার সঙ্গে মিলনে আপনার ধর্মের কোনো ছলনা বা লঙ্ঘন হবে না।”

Verse 14

अष्टावक्र उवाच नास्ति स्वतन्त्रता स्त्रीणामस्वतन्त्रा हि योषित: । प्रजापतिमतं होतन्न स्त्री स्वातन्तद्रयमहति

অষ্টাবক্র বললেন— ভদ্রে! নারীদের স্বাতন্ত্র্য নেই; কারণ নারীরা পরাধীন বলেই গণ্য। প্রজাপতির মতও এই যে, নারী সম্পূর্ণ স্বাধীনভাবে বাস করার যোগ্য নন।

Verse 15

रूयुवाच बाधते मैथुन विप्र मम भक्ति च पश्य वै । अधर्म प्राप्स्यसे विप्र यन्मां त्वं नाभिनन्दसि

স্ত্রী বলল— হে ব্রাহ্মণ! মিলনের কামনা আমাকে ব্যাকুল করছে; আমার যে ভক্তি আপনার প্রতি, তাও দেখুন। হে শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণ! আপনি যদি আমাকে গ্রহণ করে তৃপ্ত না করেন, তবে আপনি পাপের ভাগী হবেন।

Verse 16

अद्टावक्र उवाच हरन्ति दोषजातानि नरं जात॑ यथेच्छकम्‌ | प्रभवामि सदा धृत्या भद्रे स्वशयनं व्रज

অষ্টাবক্র বললেন— ভদ্রে! যে মানুষ খেয়ালখুশিমতো চলে, দোষ ও পাপের দল তাকেই গ্রাস করে। আমি ধৈর্য ও সংযমে সর্বদা নিজেকে বশে রাখি; অতএব তুমি তোমার শয্যায় ফিরে যাও।

Verse 17

रूयुवाच शिरसा प्रणमे विप्र प्रसादं कर्तुमहसि । भूमौ निपतमानाया: शरणं भव मेडनघ

স্ত্রী বলল— হে অনঘ, হে শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণ! আমি মাথা নত করে আপনাকে প্রণাম করছি; অনুগ্রহ করুন। আমি আপনার সামনে ভূমিতে লুটিয়ে পড়েছি— দয়া করে আমাকে আশ্রয় দিন।

Verse 18

यदि वा दोषजातं त्वं परदारेषु पश्यसि । आत्मानं स्पर्शयाम्यद्य पार्णिं गृह्ीष्व मे द्विज

অষ্টাবক্র বললেন— যদি পরস্ত্রীর সঙ্গে মিলনে তুমি দোষ দেখ, তবে আজ আমি নিজেকে তোমার কাছে সমর্পণ করছি; হে দ্বিজ, আমার হাত গ্রহণ করো।

Verse 19

न दोषो भविता चैव सत्येनैतद्‌ ब्रवीम्यहम्‌ । स्वतन्त्रां मां विजानीहि यो<धर्म: सो<सस्‍्तु वै मयि । त्वय्यावेशितचित्ता च स्वतन्त्रास्मि भजस्व माम्‌

আমি সত্য বলছি—আপনার কোনো দোষ হবে না। আমাকে স্বেচ্ছায় কর্মরত বলে জানুন; এই কাজে যদি কোনো অধর্ম থাকে, সে দোষ একমাত্র আমারই হোক। আমার চিত্ত সম্পূর্ণ আপনার মধ্যেই নিবিষ্ট। আমি এই সিদ্ধান্তে স্বাধীন; অতএব আমাকে গ্রহণ করুন।

Verse 20

सअद्टावक्र उवाच स्वतन्त्रा त्वं कथं भद्रे ब्रूहि कारणमत्र वै नास्ति त्रिलोके स्त्री काचिद्‌ या वै स्वातन्त्रयमहति

অষ্টাবক্র বললেন—ভদ্রে, তুমি কীভাবে স্বাধীন? এর কারণ এখানে বলো। তিন লোকের মধ্যে এমন কোনো নারী নেই যে সম্পূর্ণ স্বাতন্ত্র্যের যোগ্য।

Verse 21

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने । पुत्राश्न॒ स्थाविरे काले नास्ति स्त्रीणां स्वतन्त्रता

শৈশবে পিতা তাকে রক্ষা করেন, যৌবনে স্বামী রক্ষা করেন, আর বার্ধক্যে পুত্রেরা রক্ষা করে; এইভাবে বলা হয়, নারীদের স্বাতন্ত্র্য নেই।

Verse 22

रूयुवाच कौमार ब्रह्मचर्य मे कन्यैवास्मि न संशय: । पत्नीं कुरुष्व मां विप्र श्रद्धां विजहि मा मम

রূয়ু বলল—কুমারীকাল থেকে আমার ব্রহ্মচর্য অক্ষুণ্ণ; আমি যে কন্যাই, এতে সন্দেহ নেই। হে বিপ্র, আমাকে পত্নী করো; আমার প্রতি তোমার শ্রদ্ধা ত্যাগ কোরো না।

Verse 23

स्‍त्री बोली--विप्रवर! मैं कुमारावस्थासे ही ब्रह्मचारिणी हूँ; अतः कन्या ही हूँ--इसमें संशय नहीं है। अब आप मुझे पत्नी बनाइये। मेरी श्रद्धाका नाश न कीजिये ।।

স্ত্রী বলল—হে বিপ্রশ্রেষ্ঠ, কুমারীকাল থেকেই আমি ব্রহ্মচারিণী; অতএব আমি কন্যাই—এতে সন্দেহ নেই। এখন আমাকে পত্নী করো; আমার বিশ্বাস নষ্ট কোরো না। অষ্টাবক্র বললেন—যেমন আমার অবস্থা, তেমনই তোমার; আর যেমন তোমার, তেমনই আমার। আমি ভাবছি—এ কি সেই দানশীল ঋষির রচিত পরীক্ষা, না সত্যিই কোনো বিঘ্ন উপস্থিত হয়েছে?

Verse 24

आश्चर्य परम हीदं कि नु श्रेयो हि मे भवेत्‌ । दिव्याभरणवत्त्रा हि कन्येयं मामुपस्थिता

অষ্টাবক্র বললেন—এ তো পরম আশ্চর্য! এতে আমার কী মঙ্গল হবে? এই কন্যা দিব্য অলংকার ও বস্ত্রে ভূষিতা হয়ে আমার সেবায় উপস্থিত হয়েছে। যে পূর্বে বৃদ্ধা ছিল, সে-ই আজ কন্যারূপে এসে দাঁড়িয়েছে—এ মহাবিস্ময়। এ কি আমার কল্যাণকর হবে?

Verse 25

कि त्वस्था: परमं रूपं जीर्णमासीत्‌ कथ॑ं पुनः । कन्यारूपमिहाद्यैवं किमिवात्रोत्तरं भवेत्‌

অষ্টাবক্র বললেন—কিন্তু তার এই পরম সুন্দর রূপ পূর্বে জরা-জীর্ণ হল কীভাবে? আর এখন এখানে সে কেমন করে কন্যারূপে প্রকাশ পেল? এমন অবস্থায় এখানে কী উত্তরই বা দেওয়া সম্ভব?

Verse 26

यथा पर शक्तिधुतेर्न व्युत्थास्ये कथंचन । न रोचते हि व्युत्थानं सत्येनासादयाम्यहम्‌

যতক্ষণ আমি পরম অন্তঃশক্তি ও অচল ধৈর্যে স্থিত থাকি, ততক্ষণ কোনোভাবেই বিচলিত হব না। ধর্মপথ থেকে সরে যাওয়া আমার মনঃপূত নয়; অতএব সত্য ও বিধিসম্মত উপায়েই আমি আমার অভিপ্রেত পত্নীকে লাভ করব।

Verse 56

व्यतीतां रजनीं कृत्स्नां नाजानात्‌ स महाव्रतः । उसने मुनिके लिये विधिपूर्वक सम्पूर्ण दिव्य सामग्री प्रस्तुत की। वे महाव्रतधारी मुनि उसके दिये हुए कुछ-कुछ गरम होनेके कारण सुखदायक जलसे नहाकर उसके हाथोंके सुखद स्पर्शसे सेवित होकर इतने आनन्दविभोर हो गये कि कब सारी रात बीत गयी? इसका उन्हें ज्ञान ही नहीं हुआ

ভীষ্ম বললেন—মহাব্রতধারী সেই মুনি বুঝতেই পারলেন না যে সমগ্র রজনী অতিবাহিত হয়ে গেছে। বিধিপূর্বক উৎকৃষ্ট দিব্য উপকরণে তাঁকে সেবা করা হল; সুখকর উষ্ণ জলে স্নান করানো হল এবং গৃহস্থের হাতের স্নিগ্ধ স্পর্শে পরিচর্যা করা হল। সন্তোষে তিনি এমন নিমগ্ন হলেন যে সময়ের গতি তাঁর অগোচরই রইল।

Frequently Asked Questions

The tension is between inquiry and propriety: Aṣṭāvakra demands truthful disclosure about a transformed form while the woman frames the interaction as a controlled test, raising questions about speech ethics, intention, and social boundaries.

The chapter models dharma as practice: speak truthfully under constraint, recognize desire as a force requiring regulation, and resolve social outcomes (such as marriage) through consent, legitimate intermediaries, and ritually appropriate timing.

No explicit phalaśruti formula appears in the provided verses; the chapter’s function is exemplary and normative, embedding its significance in conduct-guidance rather than stated salvific reward.