
Chapter Arc: युधिष्ठिर, धर्म-चिन्तन के बीच, एक तीखा प्रश्न उठाते हैं—यदि विद्या, बल और बुद्धि होते हुए भी मनुष्य को फल न मिले, तो क्या भाग्य ही प्रधान है? → वे उदाहरणों से उलझन बढ़ाते हैं: प्रयत्न करके भी लाभ न होना, अयत्न से समृद्धि मिल जाना; नीति-शास्त्र पढ़कर भी नीति का आचरण न दिखना; और समय (काल) के आगे मानवीय योजना का बार-बार विफल होना। → भीष्म का निर्णायक प्रतिपादन ‘काल’ के नियम से होता है—“नाप्राप्तकालो म्रियते विद्धः शरशतैरपि… प्राप्तकालो न जीवति”; अर्थात् समय न आया हो तो सैकड़ों बाण भी नहीं मारते, और समय आ गया हो तो तृणाग्र-स्पर्श भी प्राण ले लेता है। → भीष्म भाग्य/काल की प्रधानता स्वीकारते हुए भी निष्कर्ष को निराशावादी नहीं बनने देते—विद्या और नीति का त्याग नहीं; क्योंकि विद्या स्वभावतः साध्य-सिद्धि का साधन है, और पुरुषार्थ धर्मसम्मत मार्ग को स्थिर रखता है, भले फल का क्षण काल के अधीन हो। → युधिष्ठिर के मन में अगला स्वाभाविक प्रश्न उभरता है—जब फल कालाधीन है, तब पुरुषार्थ और धर्माचरण का वास्तविक प्रयोजन क्या है?
Verse 1
/ अपर बक। ] अत्णऑकाड त्रेषष्ट्याधिकशततमोब<् ध्याय: युधिष्ठटिरका विद्या
যুধিষ্ঠির বললেন— যার ভাগ্যে অংশ নেই, সে মহাবলবান হলেও ধন লাভ করে না। কিন্তু যার সঙ্গে সৌভাগ্য থাকে, সে ক্ষীণ ও বালক হলেও সমৃদ্ধি অর্জন করে।
Verse 2
7 नालाभकाले लभते प्रयत्नेडपि कृते सति । लाभकाले<प्रयत्नेन लभते विपुलं धनम्
যুধিষ্ঠির বললেন— লাভের সময় না এলে, বহু চেষ্টা করেও কিছু মেলে না। আর লাভের কাল এলে, অল্প চেষ্টা করেও বিপুল ধন লাভ হয়।
Verse 3
कृतयत्नाफलाश्रैव दृश्यन्ते शतशो नरा: । अयत्नेनैधमानाश्र दृश्यन्ते बहवो जना:
যুধিষ্ঠির বললেন— শত শত মানুষ দেখা যায়, যাদের চেষ্টা ফলহীন হয়। আবার বহু লোকও দেখা যায়, যাদের ধন পরিশ্রম ছাড়াই দিন দিন বৃদ্ধি পায়।
Verse 4
यदि यत्नो भवेन्मर्त्य: स सर्व फलमाप्नुयात् नालभ्यं चोपलभ्येत नृणां भरतसत्तम
যুধিষ্ঠির বললেন— হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যদি কেবল মানব-প্রচেষ্টাই নির্ণায়ক হতো, তবে মানুষ সব ফলই অবশ্যম্ভাবীভাবে পেত। কিন্তু যা ভাগ্যের বশে মানুষের জন্য অপ্রাপ্য, তা কঠোর সাধনাতেও প্রাপ্য হয় না।
Verse 5
प्रयत्नं कृतवन्तो5पि दृश्यन्ते ह्फला नरा: । मार्गत्यायशतैरर्थानमार्गश्वापर: सुखी
যুধিষ্ঠির বললেন— প্রচেষ্টা করেও মানুষকে নিষ্ফল দেখা যায়। কেউ শত শত ধর্মসম্মত উপায়ে অর্থের সন্ধান করে, আর কেউ কুমার্গে চলেও ধনের জোরে সুখী বলে প্রতীয়মান হয়।
Verse 6
युधिष्ठिरने कहा--पितामह! भाग्यहीन मनुष्य बलवान हो तो भी उसे धन नहीं मिलता और जो भाग्यवान् है
যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! আমরা দেখি, অনেক মানুষ বারবার অধর্মকর্ম করেও ধনহীনই থাকে; আবার অনেকে নিজের ধর্মানুগ কর্তব্যে প্রতিষ্ঠিত থেকেও ধনসম্পন্ন হয়—তবু কেউ কেউ তেমন করেও দরিদ্রই রয়ে যায়। তবে সমৃদ্ধি লাভের নিয়ন্তা কী—ভাগ্য, আচরণ, না অন্য কিছু?
Verse 7
अधीत्य नीतिशास्त्राणि नीतियुक्तो न दृश्यते । अनभिशनज्ञश्न साचिव्यं गमित: केन हेतुना
যুধিষ্ঠির বললেন—নীতিশাস্ত্র অধ্যয়ন করেও কাউকে নীতিতে প্রতিষ্ঠিত দেখা যায় না; আবার নীতিতে অনভিজ্ঞ কেউ কখনও মন্ত্রিত্বপদে উন্নীত হয়। এ কী কারণে ঘটে?
Verse 8
विद्यायुक्तो हाविद्यश्न धनवान् दुर्मतिस्तथा । यदि विद्यामुपाश्रित्य नर: सुखमवाप्लुयात्
যুধিষ্ঠির বললেন—বিদ্যায় সমৃদ্ধ হয়েও মানুষ আচরণে অজ্ঞই থেকে যায়; আর ধনী হয়েও তার বিচারবুদ্ধি বিকৃত হতে পারে। যদি কেবল ‘বিদ্যা’র আশ্রয় নিলেই মানুষ সুখ লাভ করত…
Verse 9
यथा पिपासां जयति पुरुष: प्राप्प वै जलम्
যেমন মানুষ জল পেয়ে তৃষ্ণাকে জয় করে।
Verse 10
नाप्राप्तकालो म्रियते विद्ध: शरशतैरपि । तृणाग्रेणापि संस्पृष्ट: प्राप्तकालो न जीवति
যুধিষ্ঠির বললেন—যার মৃত্যুকাল এখনও আসেনি, সে শত শত বাণে বিদ্ধ হলেও মরে না; কিন্তু যার নির্ধারিত কাল এসে গেছে, সে তৃণশীর্ষের সামান্য স্পর্শেও বাঁচে না।
Verse 11
भीष्म उवाच ईहमान: समारम्भान् यदि नासादयेद् धनम् । उग्र॑ तप: समारोहेन्न हानुप्तं प्ररोहति
ভীষ্ম বললেন—বৎস! নানা প্রকার চেষ্টা ও উদ্যোগ করেও যদি মানুষ ধন লাভ না করতে পারে, তবে তাকে তীব্র তপস্যার আশ্রয় নিতে উচিত; কারণ বীজ না বুনলে অঙ্কুর গজায় না।
Verse 12
दानेन भोगी भवति मेधावी वृद्धसेवया । अहिंसया च दीर्घायुरिति प्राहुमनीषिण:
মনীষীরা বলেন—দানে মানুষ ভোগের উপকরণ লাভ করে; বয়োজ্যেষ্ঠদের সেবায় সে মেধাবী হয়; আর অহিংসা পালনে দীর্ঘায়ু লাভ করে।
Verse 13
तस्माद् दद्यान्न याचेत पूजयेद् धार्मिकानपि । सुभाषी प्रियकृच्छान्त: सर्वसत्त्वाविहिंसक:
অতএব নিজে দান করুক, অন্যের কাছে ভিক্ষা না চাইুক; ধার্মিকদের সম্মান করুক; মধুর বাক্য বলুক; সকলের প্রিয় ও হিতসাধক হোক; শান্ত স্বভাব ধারণ করুক; এবং কোনো প্রাণীর প্রতি হিংসা না করুক।
Verse 14
यदा प्रमाणं प्रसव: स्वभावश्च सुखासुखे । दंशकीटपिपीलानां स्थिरो भव युधिछिर
যুধিষ্ঠির! ডাঁশ, কীট ও পিঁপড়ে প্রভৃতি জীবকে যে যে যোনিতে জন্ম দেয় এবং তাদের সুখ-দুঃখের ভাগ্য নির্ধারণ করে—তার প্রমাণ ও কারণ তাদের নিজ কর্মানুসারে গঠিত স্বভাবই। এ কথা ভেবে স্থির হও।
Verse 83
न विद्वान् विद्यया हीन॑ वृत्त्यर्थमुपसंश्रयेत् । कभी-कभी विद्वान् और मूर्ख दोनों एक-जैसे धनी दिखायी देते हैं। कभी खोटी बुद्धिवाले मनुष्य तो धनवान् हो जाते हैं (और अच्छी बुद्धि रखनेवाले मनुष्यको थोड़ा-सा धन भी नहीं मिलता)। यदि विद्या पढ़कर मनुष्य अवश्य ही सुख पा लेता तो विद्वानको जीविकाके लिये किसी मूर्ख धनीका आश्रय नहीं लेना पड़ता
যুধিষ্ঠির বললেন—জীবিকার জন্য বিদ্বান ব্যক্তির উচিত নয় বিদ্যাহীন কারও আশ্রয় নেওয়া। তবু জগতে দেখা যায়, জ্ঞানী ও মূর্খ উভয়েই কখনও সমান ধনী বলে প্রতীয়মান হয়; কখনও কুবুদ্ধিসম্পন্ন লোক ধনী হয়ে ওঠে, আর বুদ্ধিমান অল্পও পায় না। যদি কেবল বিদ্যা অধ্যয়ন করলেই নিশ্চিত সুখ মিলত, তবে জীবিকা নির্বাহে কোনো বিদ্বানকে ধনী মূর্খের উপর নির্ভর করতে হতো না।
Verse 93
इष्टार्थो विद्यया होव न विद्यां प्रजह्ेन्नर: । जिस प्रकार पानी पीनेसे मनुष्यकी प्यास अवश्य बुझ जाती है
যুধিষ্ঠির বললেন—যদি বিদ্যার দ্বারা মানুষের অভীষ্ট লক্ষ্য সর্বদাই অবশ্যম্ভাবীভাবে সিদ্ধ হতো, তবে কেউ কখনও বিদ্যাকে ত্যাগ বা অবহেলা করত না। যেমন জল পান করলে নিশ্চিতই তৃষ্ণা নিবারিত হয়, তেমনি যদি বিদ্যা অনিবার্যভাবে কাম্য ফল দিত, তবে সকলেই তাকে আঁকড়ে ধরত।
Verse 162
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें धर्मके प्रमाणका वर्णनविषयक एक सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে ধর্মের প্রমাণসমূহের বিবরণবিষয়ক একশো বাষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 163
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि धर्मप्रशंसायां त्रिषष्ट्यधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें धर्मकी प्रशंशाविषयक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
ইতি শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে ধর্মপ্রশংসাবিষয়ক একশো তেষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।