Adhyaya 165
Anushasana ParvaAdhyaya 16566 Verses

Adhyaya 165

Chapter Arc: वायुदेव (भीष्म-वचन के रूप में) राजन् युधिष्ठिर को द्विजों की तत्त्व-गुण-महिमा सुनाने को कहते हैं और श्रीकृष्ण द्वारा प्रद्युम्न को सुनाया गया एक पुरातन प्रसंग आरम्भ होता है—जहाँ ब्राह्मण-कोप स्वयं देव-शक्ति की तरह प्रकट होता है। → द्वारका में ब्राह्मणों से परिकोपित प्रद्युम्न का प्रश्न उठता है—ब्राह्मणों का तेज इतना प्रचण्ड क्यों है कि वे लोक-लोकान्तर और लोकपालों तक की सृष्टि-समर्थता रखते प्रतीत होते हैं, और फिर भी उनके प्रति असावधानी कैसे विनाश बन जाती है। कथा में दुर्वासा का आगमन/चरित्र-प्रसंग जुड़ता है; गृहस्थ-जीवन की छोटी-सी चूक भी ऋषि-कोप को आमंत्रित कर सकती है। → दुर्वासा के निकट प्रसंग में ‘पायस’ और माता के मुस्कराते हुए निकट खड़े होने का दृश्य निर्णायक बनता है—क्षण-भर की स्थिति से ऋषि की परीक्षा, गृहस्थ का संकोच/भय, और ब्राह्मण-तेज का दाहक-रूप एक साथ उभरता है; फिर वही तेज क्षण में ‘भंग/दग्ध’ वस्तुओं को पुनः ‘नूतन और सुदृढ़’ कर देने वाली अद्भुत सिद्धि के रूप में भी प्रकट होता है। → कथावाचक (श्रीकृष्ण) अनुभव से निष्कर्ष देता है—ब्राह्मणों का अपमान मन से भी न हो; उनकी वाणी/आज्ञा को ‘सर्वं करिष्यामि’ भाव से ग्रहण करना चाहिए। अदृश्य हो जाने के बाद भी उनकी अस्पष्ट वाणी का आदेश-भाव बना रहता है; गृह में प्रवेश कर सब वस्तुओं का पुनर्निर्माण देख कर श्रद्धा दृढ़ होती है।

Shlokas

Verse 1

अपना बछ। अफड-ण क्र एकोनषष्टर्याधेकशततमो< ध्याय: श्रीकृष्णका प्रद्मुम्नको ब्राह्मणोंकी महिमा बताते हुए दुर्वासाके चरित्रका वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिरको सुनाना युधिछिर उवाच ब्रृहि ब्राह्मणपूजायां व्युष्टिं त्वं मधुसूदन । वेत्ता त्वमस्य चार्थस्य वेद त्वां हि पितामह:

যুধিষ্ঠির বললেন—হে মধুসূদন, ব্রাহ্মণদের পূজা-সেবায় যে প্রকৃত ফল ও লাভ হয়, তা আমাকে বলুন। আপনি এ বিষয়ের অর্থ সম্পূর্ণ জানেন; আর আমার পিতামহও আপনাকেই এর জ্ঞানী বলে মানেন।

Verse 2

वायुदेव उवाच शृणुष्वावहितो राजन्‌ द्विजानां भरतर्षभ | यथा तत्त्वेन वदतो गुणान्‌ वै कुरुसत्तम

বায়ুদেব বললেন—হে রাজন, ভরতশ্রেষ্ঠ! মনোযোগ দিয়ে শোনো। হে কুরুশ্রেষ্ঠ! আমি সত্য অনুযায়ী দ্বিজদের (ব্রাহ্মণদের) গুণাবলি বর্ণনা করছি।

Verse 3

द्वारवत्यां समासीन पुरा मां कुरुनन्दन । प्रद्युम्न: परिपप्रच्छ ब्राह्म॒णैः परिकोपित:

বায়ু বললেন—হে কুরুনন্দন! বহু আগে, আমি যখন দ্বারবতীতে অবস্থান করছিলাম, তখন কয়েকজন ব্রাহ্মণের উসকানিতে আমার পুত্র প্রদ্যুম্ন ক্রুদ্ধ হয়ে আমার কাছে এসে আমাকে প্রশ্ন করেছিল।

Verse 4

कि फल ब्राह्मुणेष्वस्ति पूजायां मधुसूदन । ईश्वरत्वं कुतस्तेषामिहैव च परत्र च

বায়ু বললেন— “মধুসূদন, ব্রাহ্মণদের পূজা করলে কী ফল লাভ হয়? আর কোন কারণে তারা ইহলোকে ও পরলোকে দেবসম গণ্য হয়?”

Verse 5

सदा द्विजातीन्‌ सम्पूज्य कि फलं तत्र मानद । एतद्‌ ब्रूहि स्फुटं सर्व सुमहान्‌ संशयोत्र मे

বায়ু বললেন— “হে মানদ, সদা দ্বিজদের শ্রদ্ধাভরে পূজা করলে কী ফল লাভ হয়? এ কথা সম্পূর্ণ ও স্পষ্ট করে বলো; এ বিষয়ে আমার মনে মহাসন্দেহ জেগেছে।”

Verse 6

इत्युक्ते वचने तस्मिन्‌ प्रद्युम्नेन तथा त्वहम्‌ । प्रत्यत्रुवं महाराज यत्‌ तच्छुणु समाहित:

প্রদ্যুম্ন এ কথা বললে, হে মহারাজ, আমি তাকে উত্তর দিলাম— “একাগ্রচিত্তে শোনো যা বলছি। হে রুক্মিণীনন্দন, বৎস, ব্রাহ্মণপূজার ফল আমি বলছি। ব্রাহ্মণদের রাজা সোম—চন্দ্র; অতএব তারা ইহলোকে ও পরলোকে সুখ-দুঃখ দান করতে সক্ষম।”

Verse 7

व्युष्टि ब्राह्मणपूजायां रौक्मिणेय निबोध मे । एते हि सोमराजान ईश्वरा: सुखदुःखयो:

বায়ু বললেন— “হে রুক্মিণীনন্দন, ব্রাহ্মণপূজার বিধি-শৃঙ্খলা আমার কাছ থেকে জানো। এ ব্রাহ্মণগণ সোমরাজের ন্যায় অধীশ্বর; সুখ-দুঃখ দানে সক্ষম।”

Verse 8

ब्राह्मणप्रमुखं सौम्यं न मे5त्रास्ति विचारणा

বায়ু বললেন— “হে সৌম্য, ব্রাহ্মণই সর্বাগ্রে—এ বিষয়ে আমার মনে কোনো দ্বিধা নেই। ব্রাহ্মণদের মধ্যে শান্ত স্বভাবই প্রধান; অতএব এতে সন্দেহ নেই। ব্রাহ্মণপূজায় আয়ু, কীর্তি, যশ ও বল লাভ হয়। সমগ্র লোকসমূহ এবং লোকেশ্বরগণ পর্যন্ত ব্রাহ্মণদের উপাসক।”

Verse 9

ब्राह्मणप्रतिपूजायामायु: कीर्तिययशो बलम्‌ । लोका लोकेश्चराश्वैव सर्वे ब्राह्मणपूजका:

বায়ু বললেন—ব্রাহ্মণদের যথাযথ সম্মান ও পূজা করলে আয়ু, কীর্তি, যশ ও বল লাভ হয়। সকল লোক এবং লোকাধিপতিরাও ব্রাহ্মণদের পূজক।

Verse 10

त्रिवर्गे चापवर्गे च यश:श्रीरोगशान्तिषु । देवतापितृपूजासु संतोष्याश्चैव नो द्विजा:

বায়ুদেব বললেন—ধর্ম, অর্থ ও কাম—এই ত্রিবর্গের সিদ্ধির জন্য, এবং মোক্ষলাভের জন্য; যশ, লক্ষ্মী, আরোগ্য ও রোগশান্তির জন্য; আর দেবতা ও পিতৃপুরুষদের পূজার সময়—এসব সকল উপলক্ষে আমাদের দ্বিজ ব্রাহ্মণদের সম্পূর্ণ সন্তুষ্ট করা উচিত।

Verse 11

तत्कथं वै नाद्रियेयमी श्वरोडस्मीति पुत्रक । मा ते मन्युर्महाबाहो भवत्वत्र द्विजान्‌ प्रति

হে পুত্র! তবে আমি কীভাবে ব্রাহ্মণদের সম্মান না করি, এই ভেবে যে ‘আমি ঈশ্বর, সর্বকর্মে সক্ষম’? হে মহাবাহু! এখানে দ্বিজদের প্রতি তোমার ক্রোধ যেন না জাগে।

Verse 12

ब्राह्मणा हि महद्भूतमस्मिललोके परत्र च । भस्म कुर्युर्जगदिदं क्रुद्धा: प्रत्यक्षदर्शिन:

বায়ুদেব বললেন—ব্রাহ্মণরা এ লোকেও এবং পরলোকেও মহাশক্তি বলে গণ্য। তাঁরা প্রত্যক্ষদর্শী; আর যদি ক্রোধে উদ্দীপ্ত হন, তবে এই সমগ্র জগতকে ভস্ম করতে পারেন।

Verse 13

अन्यानपि सूृजेयुश्न लोकॉल्लोकेश्वरांस्तथा । कथं तेषु न वर्तेरन्‌ सम्यग्‌ ज्ञानातू सुतेजस:

তাঁরা অন্য অন্য লোক এবং সেই লোকগুলির অধিপতিদেরও সৃষ্টি করতে সক্ষম। অতএব, ব্রাহ্মণদের মহত্ত্ব সম্যক জ্ঞানে জেনেও তেজস্বী পুরুষেরা তাঁদের সঙ্গে সদাচরণ করবে না কেন?

Verse 14

अवसन्मदगहे तात ब्राह्मणो हरिपिड्रल: । चीरवासा बिल्वदण्डी दीर्घश्मश्रु: कृशो महान्‌

বায়ু বললেন—বৎস, বহু পূর্বে আমার গৃহে এক হরিত-পিঙ্গলবর্ণ ব্রাহ্মণ বাস করত। সে ছেঁড়া বস্ত্র পরত এবং বিল্বকাষ্ঠের দণ্ড বহন করত। তার গোঁফ-দাড়ি দীর্ঘ ছিল; দেহে কৃশ হলেও মহাপ্রভাবশালী ছিল।

Verse 15

दीर्घेभ्यश्व मनुष्येभ्य: प्रमाणादधिको भुवि । स स्वैरं चरते लोकान्‌ ये दिव्या ये च मानुषा:

বায়ু বললেন—এই পৃথিবীতে যে-সব মানুষ সর্বোচ্চ, কদে সে তাদেরও অতিক্রম করত। সে নিজের ইচ্ছামতো দিব্য ও মানব—উভয় লোকেই অবাধে বিচরণ করত।

Verse 16

इमां गाथां गायमानश्चत्वरेषु सभासु च । दुर्वाससं वासयेत्‌ को ब्राह्मुणं सत्कृतं गृहे

যখন সেই ব্রাহ্মণ-দেবতা এখানে এসেছিলেন, তখন তিনি ধর্মশালা ও চৌমাথায় এই গাথা গাইতে গাইতে ঘুরতেন—“কে আমাকে, দুর্বাসা ব্রাহ্মণকে, নিজ গৃহে সৎকারসহ আশ্রয় দেবে?”

Verse 17

रोषण: सर्वभूतानां सूक्ष्मेडप्यपकृते कृते । परिभाषां च मे श्रुत्वा को नु दद्यात्‌ प्रतिश्रयम्‌

বায়ু বললেন—“অতি সামান্য অপকার হলেও সকল প্রাণীর প্রতি ক্রোধ জাগে। আর আমার এই সতর্কবাণী শুনে কে-ই বা (এমন জনকে) আশ্রয় দেবে?”

Verse 18

यस्माजन्नाद्रियते कश्नचित्‌ ततो5हं समवासयम्‌

বায়ু বললেন—বৎস, যখন কেউই তাকে সম্মান করতে পারল না, তখন আমি তাকে আমারই গৃহে আশ্রয় দিলাম। কখনও সে এক বসাতেই এত অন্ন ভক্ষণ করত যে হাজার হাজার মানুষ তৃপ্ত হতে পারত; আবার কখনও অল্পই খেয়ে গৃহ ত্যাগ করত—সেদিন আর ফিরে আসত না।

Verse 19

स सम्भुड्क्ते सहस्राणां बहूनामन्नमेकदा । एकदा सोअल्पकं भुड्धक्ते न चैवैति पुनर्गहान्‌

কখনও তিনি একবারেই এত অন্ন ভোজন করতেন যে তাতে সহস্র সহস্র লোক তৃপ্ত হতে পারত; আবার কখনও অল্পই খেয়ে বেরিয়ে যেতেন, আর সেদিন আর গৃহে ফিরতেন না।

Verse 20

अकस्माच्च प्रहसति तथाकस्मात्‌ प्ररोदिति । न चास्य वयसा तुल्य: पृथिव्यामभवत्‌ तदा,वे अकस्मात्‌ जोर-जोरसे हँसने लगते और अचानक फूट-फूटकर रो पड़ते थे। उस समय इस पृथ्वीपर उनका समवयस्क कोई नहीं था

তিনি হঠাৎ অকারণে উচ্চহাস্যে ফেটে পড়তেন, আবার হঠাৎই অশ্রুপাত করতেন। তখন এই পৃথিবীতে তাঁর সমবয়সী ও সমতুল্য কেউ ছিল না।

Verse 21

अथ स्वावसथं गत्वा स शय्यास्तरणानि च । कन्याश्वालंकृता दग्ध्वा ततो व्यपगत: पुन:

তারপর তিনি নিজের আবাসস্থলে গিয়ে সেখানে থাকা শয্যা-আস্তরণাদি এবং বস্ত্র-অলংকারে সজ্জিত কন্যাদের দগ্ধ করে ভস্ম করে দিলেন; তারপর সেখান থেকে আবার সরে গেলেন।

Verse 22

अथ मामब्रवीद्‌ भूय: स मुनि: संशितव्रत: । कृष्ण पायसमिच्छामि भोक्तुमित्येव सत्वर:

তারপর কঠোর ব্রতধারী সেই মুনি আবার ত্বরিত আমার কাছে এসে বললেন—“কৃষ্ণ! আমি এখনই পায়স ভোজন করতে চাই।”

Verse 23

तदैव तु मया तस्य चित्तज्ञेन गृहे जनः । सर्वाण्यन्नानि पानानि भक्ष्याश्नोच्चावचास्तथा

আমি তাঁর মনের কথা জানতাম; তাই গৃহস্থদের আগেই আদেশ দিয়েছিলাম—উত্তম ও মধ্যম প্রকারের সকল অন্ন-পানীয় এবং নানা ভক্ষ্য-ভোজ্য শ্রদ্ধার সঙ্গে প্রস্তুত রাখতে। সবই প্রস্তুত ছিল; অতএব আমি মুনিকে গরম গরম পায়স নিবেদন করলাম।

Verse 24

भवन्तु सत्कृतानीह पूर्वमेव प्रचोदित: । ततोऊहं ज्वलमानं वै पायसं प्रत्यवेदयम्‌

বায়ু বললেন—তাদের অভিপ্রায় আমি আগেই জেনে গিয়েছিলাম; তাই গৃহস্থদের পূর্বেই আদেশ দিয়েছিলাম—‘সম্মানসহকারে উৎকৃষ্ট ও মধ্যম সকল প্রকার অন্ন-পানীয় এবং ভক্ষ্য-ভোজ্য প্রস্তুত করো।’ আমার নির্দেশমতো সবই প্রস্তুত ছিল; অতঃপর আমি মুনিকে ধোঁয়া-ওঠা গরম পায়স নিবেদন করলাম।

Verse 25

त॑ भूक्त्वैव स तु क्षिप्रं ततो वचनमत्रवीत्‌ । क्षिप्रमड्गानि लिम्पस्व पायसेनेति स सम ह,उसको थोड़ा-सा ही खाकर वे तुरंत मुझसे बोले--“कृष्ण! इस खीरको शीघ्र ही अपने सारे अंगोंमें पोत लो"

তিনি তার সামান্যই খেয়ে সঙ্গে সঙ্গে আমাকে বললেন—“কৃষ্ণ! এই পায়সটি তৎক্ষণাৎ তোমার সর্বাঙ্গে মেখে নাও।”

Verse 26

अविमृश्यैव च ततः कृतवानस्मि तत्‌ तथा । तेनोच्छिष्टेन गात्राणि शिरश्वैवा भ्यमृक्षयम्‌,मैंने बिना विचारे ही उनकी इस आज्ञाका पालन किया। वही जूठी खीर मैंने अपने सिरपर तथा अन्य सारे अंगोंमें पोत ली

আমি একটুও না ভেবে তাঁর আদেশমতোই করলাম। সেই উচ্ছিষ্ট পায়স দিয়ে আমি মাথাসহ আমার সমস্ত অঙ্গে মেখে নিলাম।

Verse 27

स ददर्श तदाभ्याशे मातरं ते शुभाननाम्‌ | तामपि स्मयमानां स पायसेनाभ्यलेपयम्‌

এমন সময় তিনি কাছে তোমার সুমুখী মাতাকে দেখলেন—তিনি দাঁড়িয়ে মৃদু হাসছিলেন। মুনির আদেশে আমি হাস্যমুখী তোমার মাতার অঙ্গেও পায়স মেখে দিলাম।

Verse 28

मुनि: पायसदिग्धाज़ीं रथे तूर्णमयोजयत्‌ । तमारुहाय रथं चैव निर्ययौ स गृहान्मम

যাঁর সর্বাঙ্গে পায়স লেপা ছিল, সেই মহারানীকে মুনি তৎক্ষণাৎ রথে যুক্ত করলেন; এবং সেই রথেই আরোহণ করে তিনি আমার গৃহ থেকে প্রস্থান করলেন।

Verse 29

अग्निवर्णो ज्वलन्‌ धीमान्‌ स द्विजो रथधुर्यवत्‌ । प्रतोदेनातुदद्‌ बालां रुक्मिणीं मम पश्यत:

অগ্নিবর্ণ, জ্বলন্ত ও প্রজ্ঞাবান সেই দ্বিজ দুর্বাসা আমার চোখের সামনেই নিষ্পাপ রুক্মিণীকে চাবুক দিয়ে আঘাত করতে লাগল—যেমন রথে জোতা ঘোড়াদের চাবুক মারা হয়।

Verse 30

न च मे स्तोकमप्यासीद्‌ दुःखमीकष्याकृतं तदा । तथा स राजमार्गेण महता निर्ययौ बहि:,उस समय मेरे मनमें थोड़ा-सा भी ईर्ष्याजनित दुःख नहीं हुआ। इसी अवस्थामें वे महलसे बाहर आकर विशाल राजमार्गसे चलने लगे

সেই সময় ঈর্ষাজনিত সামান্যতম দুঃখও আমার মনে জাগেনি। তারপর সে প্রাসাদ থেকে বেরিয়ে প্রশস্ত রাজপথ ধরে অগ্রসর হল।

Verse 31

तद्‌ दृष्टवा महदाश्चर्य दाशार्हा जातमन्यव: । तत्राजल्पन्‌ मिथ: केचित्‌ समाभाष्य परस्परम्‌

সে মহা আশ্চর্য দেখে দাশার্হ যাদবরা ক্রোধে ফেটে পড়ল। সেখানে তাদের মধ্যে কয়েকজন পরস্পরের সঙ্গে কথা বলতে লাগল।

Verse 32

ब्राह्मणा एव जायेरन्‌ नान्यो वर्ण: कथंचन । को होन॑ रथमास्थाय जीवेदन्य: पुमानिह

“শুধু ব্রাহ্মণই জন্মাক, অন্য কোনো বর্ণ যেন কোনোভাবেই জন্ম না নেয়। কারণ এই জগতে এই মহাত্মা ছাড়া আর কোন পুরুষ এই রথে উঠে জীবিত থাকতে পারে?”

Verse 33

आशीविषदिषं तीक्ष्णं ततस्तीक्ष्णतरो द्विज: । ब्रह्माशीविषदग्धस्य नास्ति कश्चिच्चिकित्सक:

“বিষধর সাপের বিষ তীক্ষ্ণ—এ কথা সত্য; কিন্তু ব্রাহ্মণ আরও তীক্ষ্ণ। ব্রাহ্মণরূপী বিষধরের দংশনে যে দগ্ধ হয়েছে, তার জন্য এই জগতে কোনো চিকিৎসক নেই।”

Verse 34

तस्मिन्‌ व्रजति दुर्धर्षे प्रास्खलद्‌ रुक्मिणी पथि । तन्नामर्षयत श्रीमांस्ततस्तूर्णमचोदयत्‌

সেই দুর্ধর্ষ দুর্বাসা মুনি রথে যাত্রা করতে করতে রুক্মিণী পথে হোঁচট খেয়ে পড়ে গেলেন। শ্রীমান দুর্বাসা তা সহ্য করতে না পেরে ক্রোধে সঙ্গে সঙ্গে নির্মমভাবে তাঁকে তাড়াতে লাগলেন।

Verse 35

ततः परमसंक्रुद्धो रथात्‌ प्रस्कन्द्य स द्विज: । पदातिरुत्पथेनैव प्राद्रवद्‌ दक्षिणामुख:

সে বারবার হোঁচট খেতে থাকলে তিনি আরও ক্রুদ্ধ হলেন। রথ থেকে লাফিয়ে নেমে পথ ছেড়ে দক্ষিণমুখে পায়ে হেঁটে দৌড়ে গেলেন।

Verse 36

तमुत्पथेन धावन्तमन्वधावं द्विजोत्तमम्‌ तथैव पायसादिग्ध: प्रसीद भगवज्निति

এভাবে পথ ছেড়ে দৌড়াতে থাকা সেই শ্রেষ্ঠ দ্বিজের পেছনে আমিও তেমনি দৌড়ালাম—সারা শরীরে পায়েস লেগে—আর চিৎকার করে বললাম, “ভগবান, প্রসন্ন হন!”

Verse 37

ततो विलोक्य तेजस्वी ब्राह्मणो मामुवाच ह । जित: क्रोधस्त्वया कृष्ण प्रकृत्यैव महाभुज

তখন সেই তেজস্বী ব্রাহ্মণ আমার দিকে তাকিয়ে বললেন—“হে মহাবাহু কৃষ্ণ, তুমি স্বভাবতই ক্রোধকে জয় করেছ।”

Verse 38

न ते5पराधमिह वै दृष्टवानस्मि सुव्रत । प्रीतो5स्मि तव गोविन्द वृणु कामान्‌ यथेप्सितान्‌

“হে সুব্রত, এখানে তোমার কোনো অপরাধ আমি দেখিনি। হে গোবিন্দ, আমি তোমার প্রতি প্রসন্ন; তোমার ইচ্ছামতো যা যা কামনা, বর চেয়ে নাও।”

Verse 39

प्रसन्नस्य च मे तात पश्य व्युष्टिं यथाविधि । यावदेव मनुष्याणामन्ने भावो भविष्यति

বায়ু বললেন—বৎস, আমি প্রসন্ন; বিধিমতো এর যথোচিত ফল দেখো। যতদিন মানুষের মধ্যে অন্নের প্রতি শ্রদ্ধা-ভাব থাকবে, ততদিন এই নির্ধারিত ফল স্থির থাকবে।

Verse 40

यावच्च पुण्या लोकेषु त्वयि कीर्तिर्भविष्यति,“तीनों लोकोंमें जबतक तुम्हारी पुण्यकीर्ति रहेगी, तबतक त्रिभुवनमें तुम प्रधान बने रहोगे। जनार्दन! तुम सब लोगोंके परम प्रिय होओगे

বায়ু বললেন—যতদিন লোকসমূহে তোমার পুণ্যকীর্তি স্থির থাকবে, ততদিন ত্রিভুবনে তুমি অগ্রগণ্য থাকবে। হে জনার্দন, তুমি সকল প্রাণীর পরম প্রিয় হবে।

Verse 41

त्रिषु लोकेषु तावच्च वैशिष्ट्यं प्रतिपत्स्यसे । सुप्रिय: सर्वलोकस्य भविष्यसि जनार्दन

বায়ু বললেন—তিন লোকের মধ্যে যতদিন তোমার পুণ্যকীর্তি থাকবে, ততদিন তুমি সেখানে বিশেষ শ্রেষ্ঠতা লাভ করবে। হে জনার্দন, তুমি সকল লোকের পরম প্রিয় হবে।

Verse 42

यत्ते भिन्नं च दग्धं च यच्च किंचिद्‌ विनाशितम्‌ । सर्व तथैव द्रष्टासि विशिष्ट वा जनार्दन

বায়ু বললেন—হে জনার্দন! তোমার যা-কিছু আমি ভেঙেছি, পুড়িয়েছি বা যে-কোনোভাবে নষ্ট করেছি—সবই তুমি পূর্বের মতোই, কিংবা আরও উৎকৃষ্ট অবস্থায়, অক্ষত দেখতে পাবে।

Verse 43

यावदेतत्‌ प्रलिप्तं ते गात्रेषु मधुसूदन । अतो मृत्युभयं नास्ति यावदिच्छसि चाच्युत

বায়ু বললেন—হে মধুসূদন! তোমার অঙ্গে যতদূর এই প্রলেপ লেগে আছে, ততদূর অঙ্গে আঘাত লাগলেও তোমার মৃত্যুভয় থাকবে না। হে অচ্যুত! তুমি যতদিন ইচ্ছা করবে, ততদিন এখানে অমর থাকবে।

Verse 44

न तु पादतले लिप्ते कस्मात्ते पुत्रकाद्य वै । नैतन्मे प्रियमित्येवं स मां प्रीतो5ब्रवीत्‌ तदा

বায়ু বললেন— “কিন্তু তোমার পায়ের তলা লেপটে গেলে তুমি কেন আমাকে ‘পুত্র’ ইত্যাদি বলে সম্বোধন করলে? ‘এটা আমার প্রিয় নয়’—এ কথা বলে সে তখন স্নেহভরে আমাকে বলল।”

Verse 45

रुक्मिणीं चाब्रवीत्‌ प्रीत: सर्वस्त्रीणां वरं यश:

তখন প্রসন্ন হয়ে তিনি রুক্মিণীকে বললেন— “শুভলক্ষ্মী! তুমি সকল নারীর মধ্যে শ্রেষ্ঠ যশ লাভ করবে। পুণ্য সুগন্ধ তোমাকে স্পর্শ করবে, আর তুমি শ্রীকৃষ্ণের আরাধনায় রত থাকবে।”

Verse 46

कीर्ति चानुत्तमां लोके समवाप्स्यसि शोभने । न त्वां जरा वा रोगो वा वैवर्ण्य चापि भाविनि

“শোভনে! তুমি জগতে অতুলনীয় খ্যাতি লাভ করবে। ভবিনী! না বার্ধক্য, না রোগ, না বর্ণহানি—কোনোটাই তোমাকে স্পর্শ করবে না।”

Verse 47

षोडशानां सहस््राणां वधूनां केशवस्य ह

“কেশবের ষোলো সহস্র পত্নী ছিলেন।”

Verse 48

तव मातरमित्युक्त्वा ततो मां पुनरब्रवीत्‌

“‘এ তোমার মাতা’—এ কথা বলে তিনি আবার আমাকে বললেন। হে প্রদ্যুম্ন! তোমার মাতার বিষয়ে এমন বলে, অগ্নির মতো দীপ্তিমান মহাতেজস্বী দুর্বাসা এখান থেকে প্রস্থানকালে পুনরায় আমাকে বললেন— ‘কেশব! ব্রাহ্মণদের প্রতি তোমার মনোভাব সর্বদা এমনই থাকুক।’”

Verse 49

प्रस्थित: सुमहातेजा दुर्वासाग्निरिव ज्वलन्‌ | एषैव ते बुद्धिरस्तु ब्राह्मणान्प्रति केशव

অগ্নির ন্যায় জ্বলন্ত অতিমহাতেজস্বী দুর্বাসা প্রস্থানকালে আবার বললেন—“কেশব! ব্রাহ্মণদের প্রতি তোমার এই মনোভাবই চিরকাল স্থির থাকুক।”

Verse 50

इत्युक्त्वा स तदा पुत्र तत्रैवान्तरधीयत । तस्मिन्नन्तर्हिते चाहमुपांशुव्रतमाचरम्‌

এ কথা বলে, হে পুত্র, তিনি সেখানেই অন্তর্ধান করলেন। আর তিনি অদৃশ্য হতেই আমি উপাংশু-ব্রত পালন করলাম।

Verse 51

एतद्‌ व्रतमहं कृत्वा मात्रा ते सह पुत्रक

এই ব্রত আমি তোমার মাতা ও শিশুসহ পালন করেছিলাম।

Verse 52

प्रविष्टमात्रश्न गृहे सर्व पश्यामि तन्नवम्‌

ঘরে প্রবেশ করামাত্রই দেখলাম—সেখানে সবই নতুন।

Verse 53

यद्‌ भिजन्नं यच्च वै दग्धं तेन विप्रेण पुत्रक । पुत्र! घरमें प्रवेश करके मैं देखता हूँ तो उन ब्राह्मणने जो कुछ तोड़-फोड़ या जला दिया था, वह सब नूतनरूपसे प्रस्तुत दिखायी दिया ।।

পুত্র! সেই ব্রাহ্মণ যা কিছু ভেঙেছিল এবং যা কিছু পুড়িয়েছিল—ঘরে প্রবেশ করে দেখলাম, সবই নবীন রূপে পুনঃস্থাপিত। সবকিছু নতুন ও দৃঢ় দেখে আমি বিস্ময়ে অভিভূত হলাম।

Verse 54

अपूजयं च मनसा रौक्मिणेय सदा द्विजान्‌ | रुक्मिणीनन्दन! वे सारी वस्तुएँ नूतन और सुदृढ़ रूपमें उपलब्ध हैं, यह देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ और मैंने मन-ही-मन द्विजोंकी सदा ही पूजा की ।।

বায়ু বললেন—হে রুক্মিণীনন্দন রৌক্মিণেয়! আমি মনে মনে সর্বদা দ্বিজদের পূজা করতাম। সমস্ত বস্তু যেন নবনির্মিত ও সুদৃঢ়ভাবে অক্ষত—এ দেখে আমি মহা বিস্ময়ে অভিভূত হলাম, এবং অন্তরে দ্বিজদের প্রতি নিত্য নমস্কার নিবেদন করলাম। হে ভরতশ্রেষ্ঠ, রৌক্মিণেয় জিজ্ঞাসা করলে আমি এই কথাই বলেছিলাম।

Verse 55

माहात्म्यं द्विजमुख्यस्य सर्वमाख्यातवांस्तदा । भरतभूषण! रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नके पूछनेपर इस तरह मैंने उनसे विप्रवर दुर्वासाका सारा माहात्म्य कहा था ।।

তখন আমি সেই শ্রেষ্ঠ দ্বিজের সমস্ত মাহাত্ম্য বর্ণনা করেছিলাম। হে ভরতভূষণ! রুক্মিণীপুত্র প্রদ্যুম্ন জিজ্ঞাসা করলে আমি বিপ্রশ্রেষ্ঠ দুর্বাসার সমগ্র গৌরব এভাবেই তাকে বলেছিলাম। তদ্রূপ, হে কৌন্তেয়, হে প্রভু, তুমিও সর্বদা ব্রাহ্মণদের সম্মান ও সেবা করো।

Verse 56

एवं व्युष्टिमहं प्राप्तो ब्राह्मणस्य प्रसादजाम्‌ । यच्च मामाह भीष्मो<यं तत्सत्यं भरतर्षभ

এভাবে ব্রাহ্মণের প্রসাদজাত উৎকৃষ্ট ফল আমি লাভ করলাম। আর এই ভীষ্ম আমার সম্বন্ধে যা বলেন, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, তা সম্পূর্ণ সত্য।

Verse 76

अस्मिल्लोके रौक्मिणेय तथामुष्षिंश्व पुत्रक महाराज! प्रद्युम्नके ऐसा कहनेपर मैंने उसको उत्तर दिया। रुक्मिणीनन्दन! ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे क्या फल मिलता है

বায়ু বললেন—হে রুক্মিণীনন্দন, হে বৎস, হে মহারাজ! প্রদ্যুম্ন এভাবে বললে আমি তাকে উত্তর দিলাম। হে রুক্মিণীর পুত্র, ব্রাহ্মণদের পূজা করলে কী ফল লাভ হয়, তা আমি বলছি; একাগ্রচিত্তে শোনো। বৎস! ব্রাহ্মণদের রাজা সোম (চন্দ্র); অতএব তারা এই লোক ও পরলোকে সুখ-দুঃখ দান করতে সক্ষম।

Verse 159

इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानथधर्मपर्वणि दुर्वासोभिक्षा नाम एकोनषष्ट्यधिकशततमो<ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে ‘দুর্বাসা-ভিক্ষা’ নামক একশো ঊনষাটতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 173

यो मां कश्चिद्‌ वासयीत न स मां कोपयेदिति । “यदि मेरा थोड़ा-सा भी अपराध बन जाय तो मैं समस्त प्राणियोंपर अत्यन्त कुपित हो उठता हूँ। मेरे इस भाषणको सुनकर कौन मेरे लिये ठहरनेका स्थान देगा? जो कोई मुझे अपने घरमें ठहराये

বায়ু বললেন— “আমার কথা শুনে কে-ই বা আমাকে আশ্রয় দেবে? আমার প্রতি সামান্যতম অপরাধ হলেও আমি সকল প্রাণীর প্রতি প্রবল ক্রোধে জ্বলে উঠি। অতএব যে আমাকে নিজের গৃহে বাস করতে দেবে, সে যেন আমার ক্রোধ উদ্দীপিত না করে; এ বিষয়ে তাকে সর্বদা সতর্ক থাকতে হবে।”

Verse 396

यथैवान्ने तथा तेषां त्वयि भावो भविष्यति । “तात! मेरे प्रसन्न होनेका जो भावी फल है

বায়ু বললেন— “বৎস, বিধিপূর্বক শোনো— যেমন তাদের ভাব ও আসক্তি অন্নের প্রতি থাকে, তেমনই তোমার প্রতিও থাকবে। যতদিন দেবতা ও মানুষ অন্নকে ভালোবাসবে এবং তার ওপর নির্ভর করবে, ততদিন তোমার প্রতিও তাদের শ্রদ্ধা সেই পরিমাণেই স্থির থাকবে।”

Verse 443

इत्युक्तो5हं शरीरं स्वं ददर्श श्रीसमायुतम्‌ । 'परंतु यह खीर तुमने अपने पैरोंके तलवोंमें नहीं लगायी है। बेटा! तुमने ऐसा क्‍यों किया? तुम्हारा यह कार्य मुझे प्रिय नहीं लगा।” इस प्रकार जब उन्होंने मुझसे प्रसन्नतापूर्वक कहा

এইভাবে সম্বোধিত হয়ে আমি আমার দেহকে আশ্চর্য মঙ্গলশ্রী ও দীপ্তিতে সমন্বিত দেখলাম।

Verse 463

स्प्रक्ष्यन्ति पुण्यगन्धा च कृष्णमाराधयिष्यसि । फिर मुनिने रुक्मिणीसे भी प्रसन्नतापूर्वक कहा--“शोभने! तुम सम्पूर्ण स्त्रियोंमें उत्तम यश और लोकमें सर्वोत्तम कीर्ति प्राप्त करोगी। भामिनि! तुम्हें बुढ़ापा या रोग अथवा कान्तिहीनता आदि दोष नहीं छू सकेंगे। तुम पवित्र सुगन्धसे सुवासित होकर श्रीकृष्णकी आराधना करोगी

পবিত্র সুগন্ধ তোমাকে স্পর্শ করবে, আর তুমি ভক্তিভরে কৃষ্ণের আরাধনা করবে।

Verse 473

वरिष्ठा च सलोक्या च केशवस्य भविष्यसि । “श्रीकृष्णकी जो सोलह हजार रानियाँ हैं, उन सबमें तुम श्रेष्ठ और पतिके सालोक्यकी अधिकारिणी होओगी”

তুমি কেশবের রাণীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠা হবে, এবং তাঁরই লোকের সহবাস-সৌভাগ্য (সালোক্য) লাভ করবে।

Verse 503

यक्किंचिद्‌ ब्राह्मुणो ब्रूयात्‌ सर्व कुर्यामिति प्रभो । प्रभावशाली पुत्र! ऐसा कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके अदृश्य हो जानेपर मैंने अस्पष्ट वाणीमें धीरेसे यह व्रत लिया कि “आजसे कोई ब्राह्मण मुझसे जो कुछ कहेगा

বায়ু বললেন— “প্রভু, কোনো ব্রাহ্মণ যা-ই বলুন, আমি সবই করব।” এ কথা বলে তিনি সেখানেই অন্তর্ধান করলেন। তিনি অদৃশ্য হয়ে গেলে আমি অস্পষ্ট স্বরে ধীরে ধীরে এই ব্রত গ্রহণ করলাম— “আজ থেকে কোনো ব্রাহ্মণ আমার কাছে যা-ই চাইবেন, আমি তা সম্পূর্ণভাবে পূরণ করব।”

Verse 516

ततः परमद्दृष्टात्मा प्राविशं गृहमेव च । बेटा! ऐसी प्रतिज्ञा करके परम प्रसन्नचित्त होकर मैंने तुम्हारी माताके साथ घरमें प्रवेश किया

তারপর সেই প্রতিজ্ঞা করে, অন্তরে পরম স্বচ্ছতা ও প্রসন্নতা ধারণ করে, আমি তোমার মায়ের সঙ্গে গৃহে প্রবেশ করলাম।

Verse 553

पूजयस्व महाभागान्‌ वाम्भिदनिश्व नित्यदा | प्रभो! कुन्तीनन्दन! इसी प्रकार आप भी सदा मीठे वचन बोलकर और नाना प्रकारके दान देकर महाभाग ब्राह्मणोंकी सर्वदा पूजा करते रहें

বায়ুদেব বললেন— “মহাভাগ ব্রাহ্মণদের নিত্য সম্মান করো। প্রভু, কুন্তীনন্দন! তুমিও সদা মধুর বাক্য বলে এবং নানা প্রকার দান করে সেই শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণদের সর্বদা পূজা ও সেবা করতে থাকো।”