Adhyaya 161
Anushasana ParvaAdhyaya 16127 Verses

Adhyaya 161

Chapter Arc: पवन (वायु) अर्जुन से दान-धर्म के प्रसंग में एक प्राचीन, विस्मयकारी आख्यान छेड़ते हैं—जब असुरों ने देवताओं को परास्त कर उनके यज्ञ और पितृ-स्वधा तक छीन ली, और स्वर्ग का तेज़ बुझने लगा। → देवता निरुत्साह होकर पृथ्वी पर भटकते हैं; यज्ञ-विधि बाधित, कर्मकाण्ड छिन्न, और देव-लोक की प्रतिष्ठा डगमगाती है। उसी समय वे अग्नि-सदृश तेजस्वी, सूर्य-प्रभा वाले महाव्रती अगस्त्य को देखते हैं; पर संकट टलता नहीं—यज्ञ-दीक्षा से कृश हुए देवताओं को देखकर ‘खलिन’ नामक पर्वत-प्राय दानव उन्हें मारने दौड़ते हैं, जल को ऊँचा उछालते और भयंकर आयुध उठाए। → देवता इन्द्र सहित शरण खोजते हुए वासिष्ठ के पास पहुँचते हैं; स्वयं शक्र भी व्यथित होकर वसिष्ठ की शरण लेते हैं। तब भगवान ऋषि वसिष्ठ अपने ब्रह्म-तेज और ब्रह्मदत्त वर-बल से दैत्यों का संहार कर देवताओं की रक्षा करते हैं। → वसिष्ठ के संरक्षण से त्रिदिववासी सुरक्षित होते हैं और दानव-विघ्न का अंत होता है; आख्यान का निष्कर्ष यह कि क्षत्र-बल भी जब धर्म-मार्ग से विचलित हो, तब ब्रह्म-तेज (तप, सत्य, संयम) ही लोक-रक्षा का अंतिम आश्रय बनता है। → पवन संकेत करते हैं कि वसिष्ठ के इस कर्म का वर्णन कहकर अब वे ‘वसिष्ठात् क्षत्रियं वरम्’—वसिष्ठ से सम्बद्ध किसी श्रेष्ठ क्षत्रिय/राजा के प्रसंग की ओर कथा मोड़ेंगे।

Shlokas

Verse 1

अपना छा | अप्-४#-रात जा - कुछ लोग 'घट्सहस्रशतह्ृदम्‌” का अर्थ यों करते हैं--वहाँ छः लाख तालाब शोभा पा रहे थे; परंतु 'शतह्ृददा” शब्द बिजलीका वाचक है; अतः उपर्युक्त अर्थ किया गया है। पजञ्चपज्चाशर्दाधिकशततमो< ध्याय: ब्रद्मर्षि अगस्त्य और वसिष्ठके प्रभावका वर्णन भीष्म उवाच इत्युक्त: स नृपस्तूष्णीम भूद्‌ वायुस्ततो<ब्रवीत्‌ । शृणु राजन्नगस्त्यस्य माहात्म्यं ब्राह्मणस्य ह

ভীষ্ম বললেন—এ কথা শুনে রাজা নীরব রইলেন, কোনো উত্তর দিতে পারলেন না। তখন বায়ুদেব বললেন—“হে রাজন, এখন ব্রাহ্মণ অগস্ত্যের মাহাত্ম্য শোন।”

Verse 2

असुरैर्निर्जिता देवा निरुत्साहाश्व ते कृता: | यज्ञाश्वैषां हृता: सर्वे पितृणां च स्वधास्तथा

ভীষ্ম বললেন—প্রাচীন কালে অসুরেরা দেবতাদের পরাজিত করে তাদের উৎসাহ নিঃশেষ করেছিল। তারা দেবতাদের যজ্ঞ এবং পিতৃগণের স্বধা-অর্ঘ্যও হরণ করল; ফলে পূজা ও কর্তব্যের ধারা ছিন্ন হয়ে ধর্মব্যবস্থা কেঁপে উঠল, আর ঐশ্বর্যচ্যুত দেবতারা দুঃখে পৃথিবীতে ঘুরে বেড়াল—এমনই শোনা যায়।

Verse 3

कर्मेज्या मानवानां च दानवैहैंहयर्षभ । भ्रष्टैश्चर्यास्ततो देवाश्चेरु: पृथ्वीमिति श्रुति:

ভীষ্ম বললেন—হে হৈহয়দের মধ্যে শ্রেষ্ঠ! পরম্পরায় শোনা যায়, দানবেরা মানুষের কর্ম-যজ্ঞ ও আচার-বিধানও লুপ্ত করেছিল। তখন বিধি-বিধানহীন ও ঐশ্বর্যচ্যুত দেবতারা দুঃখে পৃথিবীতে বিচরণ করতে লাগল।

Verse 4

ततः कदाचित्‌ ते राजन्‌ दीप्तमादित्यवर्चसम्‌ | ददृशुस्तेजसा युक्तमगस्त्यं विपुलव्रतम्‌,“राजन! तदनन्तर एक दिन देवताओंने सूर्यके समान प्रकाशमान, तेजस्वी, दीप्तिमान्‌ और महान व्रतधारी अगस्त्यको देखा

তারপর, হে রাজন, এক সময় তারা সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান, তেজে সমৃদ্ধ ও মহাব্রতধারী অগস্ত্য মুনিকে দেখল।

Verse 5

अभिवाद्य तु तं देवा: पृष्टवा कुशलमेव च । इदमूचुर्महात्मानं वाक्यं काले जनाधिप,'जनेश्वर! उन्हें प्रणाम करके देवताओंने उनका कुशल-समाचार पूछा और समयपर उन महात्मासे इस प्रकार कहा--

দেবতারা তাঁকে প্রণাম করে তাঁর কুশল জিজ্ঞাসা করল; তারপর, হে জনাধিপ, যথাসময়ে সেই মহাত্মাকে এই বাক্য বলল।

Verse 6

दानवैर्युधि भग्ना: सम तथैश्वर्याच्च भ्रंशिता: । तदस्मान्नो भयात्‌ तीव्रात्‌ त्राहि त्वं मुनिपुड्व,“मुनिवर! दानवोंने हमें युद्धमें हटाकर हमारा ऐश्वर्य छीन लिया है। इस तीव्र भयसे आप हमारी रक्षा करें"

‘মুনিশ্রেষ্ঠ! দানবেরা যুদ্ধে আমাদের ভেঙে দিয়েছে এবং আমাদের ঐশ্বর্যও কেড়ে নিয়েছে; অতএব এই তীব্র ভয় থেকে আমাদের রক্ষা করুন।’

Verse 7

इत्युक्तः स तदा देवैरगस्त्य: कुपितो5भवत्‌ | प्रजज्वाल च तेजस्वी कालाग्निरिव संक्षये,“देवताओंके ऐसा कहनेपर तेजस्वी अगस्त्य मुनि कुपित हो गये और प्रलयकालके अग्निकी भाँति रोषसे जल उठे

দেবতারা এভাবে বললে তেজস্বী ঋষি অগস্ত্য ক্রুদ্ধ হলেন; প্রলয়কালের কালাগ্নির মতো রোষে জ্বলে উঠলেন।

Verse 8

तेन दीप्तांशुजालेन निर्दग्धा दानवास्तदा । अन्तरिक्षान्महाराज निपेतुस्ते सहस्रशः,“महाराज! उनकी प्रज्वलित किरणोंके स्पर्शसे उस समय सहस्रों दानव दग्ध होकर आकाशसे पृथ्वीपर गिरने लगे

মহারাজ! সেই দীপ্ত কিরণজালের স্পর্শে দগ্ধ হয়ে তখন দানবরা সহস্র সহস্র করে আকাশ থেকে ভূমিতে পতিত হতে লাগল।

Verse 9

दह्ामानास्तु ते दैत्यास्तस्यागस्त्यस्य तेजसा । उभौ लोकौ परित्यज्य गताः काष्ठां तु दक्षिणाम्‌,“अगस्त्यके तेजसे दग्ध होते हुए दैत्य दोनों लोकोंका परित्याग करके दक्षिण दिशाकी ओर चले गये

অগস্ত্যের তেজে দগ্ধ হতে হতে সেই দৈত্যরা উভয় লোক ত্যাগ করে দক্ষিণ দিগন্তের দিকে পালিয়ে গেল।

Verse 10

बलिस्तु यजते यज्ञमश्चवमेधं महीं गतः । येडन्येडधस्था महीस्थाश्व ते न दग्धा महासुरा:

তখন রাজা বলি ভূলোকে উঠে এসে অশ্বমেধ যজ্ঞ করছিলেন; অতএব যেসব মহাসুর তাঁর সঙ্গে পৃথিবীতে ছিল এবং অন্য যারা পাতালে অবস্থান করছিল, তারাই দগ্ধ হওয়া থেকে রক্ষা পেল।

Verse 11

ततो लोका: पुनः प्राप्ता: सुरैः शान्तभयैर्न॒प । अथैनमन्रुवन्‌ देवा भूमिष्ठानसुरान्‌ जहि

নরেশ্বর! তারপর দেবতাদের ভয় শান্ত হলে তারা পুনরায় নিজ নিজ লোকধামে ফিরে গেল। অতঃপর দেবগণ তাঁকে আবার বলল—“এখন পৃথিবীতে অবস্থানকারী অসুরদেরও বিনাশ কর।”

Verse 12

इत्युक्त: प्राह देवान्‌ स न शक्तोडस्मि महीगतान्‌ । दग्धुं तपो हि क्षीयेन्मे न शक्‍्यामीति पार्थिव

দেবতারা এ কথা বললে তিনি বললেন— “হে রাজন! পৃথিবীতে বসবাসকারী অসুরদের দগ্ধ করতে আমি সক্ষম নই; কারণ তাদের দগ্ধ করলে আমার তপস্যা ক্ষয়প্রাপ্ত হবে। অতএব এ কাজ আমার পক্ষে অসম্ভব।”

Verse 13

एवं दग्धा भगवता दानवा: स्वेन तेजेसा । अगस्त्येन तदा राज॑ंस्तपसा भावितात्मना,'“राजन्‌! इस प्रकार शुद्ध अन्तःकरणवाले भगवान्‌ अगस्त्यने अपने तप और तेजसे दानवोंको दग्ध कर दिया था

হে রাজন! এইভাবে তপস্যায় সংবর্ধিত ও শুদ্ধ অন্তঃকরণধারী ভগবান অগস্ত্য নিজের তেজের শক্তিতে দানবদের দগ্ধ করেছিলেন।

Verse 14

ईदृशश्वाप्यगस्त्यो हि कथितस्ते मयानघ । ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वमगस्त्यात्‌ क्षत्रियं वरम्‌

হে নিষ্পাপ! আমি তোমাকে অগস্ত্যকে এমনই অসাধারণ প্রভাবশালী ব্রাহ্মণরূপে বর্ণনা করেছি। আমি স্পষ্ট বলছি; অথবা তুমি যদি অগস্ত্যের চেয়ে শ্রেষ্ঠ কোনো ক্ষত্রিয়কে জানো, তবে বলো।

Verse 15

भीष्म उवाच इत्युक्त: स तदा तूष्णीमभूद्‌ वायुस्ततो<ब्रवीत्‌ । शृणु राजन्‌ वसिष्ठस्य मुख्यं कर्म यशस्विन:

ভীষ্ম বললেন— এ কথা বলা হলে সে তখন নীরবই রইল। তখন বায়ুদেব বললেন— “হে রাজন! এখন যশস্বী ঋষি বশিষ্ঠের শ্রেষ্ঠ কর্ম শোনো।”

Verse 16

आदित्या: सत्रमासन्त सरो वै मानसं प्रति । वसिष्ठ॑ मनसा गत्वा ज्ञात्वा तत्‌ तस्य गौरवम्‌,“एक समय देवताओंने वसिष्ठ मुनिके गौरवको जानकर मन-ही-मन उनकी शरण जाकर मानसरोवरके तटपर यज्ञ आरम्भ किया

এক সময় আদিত্যগণ মানসসরোবরের তীরে সত্রযজ্ঞে প্রবৃত্ত হলেন। ঋষি বশিষ্ঠের গৌরব জেনে তাঁরা মনে মনে তাঁর শরণ নিলেন এবং তাঁর সম্মানে সেখানেই সেই যজ্ঞ আরম্ভ করলেন।

Verse 17

यजमानांस्तु तान्‌ दृष्टवा सर्वान्‌ दीक्षानुकर्शितान्‌ । हन्तुमैच्छन्त शैलाभा: खलिनो नाम दानवा:

দীক্ষাব্রতে কৃশ হয়ে পড়া সেই সকল যজমানকে দেখে পর্বতসম দেহধারী ‘খলিন’ নামক দানবেরা তাদের বধ করতে উদ্যত হল।

Verse 18

अदूरात्‌ तु ततस्तेषां ब्रह्म॒दत्तवरं सर: । हताहता वै तत्रैते जीवन्त्याप्लुत्य दानवा:

তাদের নিকটেই ব্রহ্মার বরপ্রাপ্ত এক সরোবর ছিল; সেখানে সেই দানবেরা বারবার নিহত হয়েও তাতে ডুব দিলেই পুনরায় জীবিত হয়ে উঠত।

Verse 19

ते प्रगृह्ा महाघोरान्‌ पर्वतान्‌ परिघान्‌ द्रुमान्‌ विक्षोभयन्त: सलिलमुत्थितं शतयोजनम्‌

তারা ভয়ংকর পর্বত, পরিঘ ও বৃক্ষ হাতে নিয়ে জলকে এমনভাবে আলোড়িত করল যে তা শত যোজন উচ্চে উথলে উঠল; তারপর সেই ভয়ানক অস্ত্রসম্ভার নিয়ে দেবতাদের ওপর ঝাঁপিয়ে পড়ল।

Verse 20

अभ्यद्रवन्त देवांस्ते सहस्नाणि दशैव हि । ततस्तैरदिता देवा: शरणं वासवं ययु:

তারা—সংখ্যায় দশ সহস্র—দেবতাদের ওপর ধেয়ে এল; তাদের দ্বারা পীড়িত হয়ে দেবতারা পালিয়ে গিয়ে বাসব (ইন্দ্র)-এর শরণ নিল।

Verse 21

स च तैव्यथित: शक्रो वसिष्ठं शरणं ययौ । ततो<5भयं ददौ तेभ्यो वसिष्ठो भगवानृषि:

তাদের দ্বারা ব্যথিত হয়ে শক্র (ইন্দ্র) বশিষ্ঠের শরণ নিলেন; তখন ভগবান ঋষি বশিষ্ঠ দেবতাদের অভয় দান করলেন।

Verse 22

तदा तान्‌ दुःखितान्‌ ज्ञात्वा आनृशंस्यपरो मुनि: । अयत्नेनादहत्‌ सर्वान्‌ खलिन: स्वेन तेजसा

তখন দেবতাদের দুঃখিত দেখে করুণায় শ্রেষ্ঠ মুনি বশিষ্ঠ তাঁদের অভয় দান করলেন; এবং কোনো প্রচেষ্টা ছাড়াই নিজের তেজে ‘খলিন’ নামে পরিচিত সকল দানবকে দগ্ধ করে দিলেন।

Verse 23

कैलासं प्रस्थितां चैव नदीं गड्जां महातपा: । आनयत्‌ तत्सरो दिव्यं तया भिन्न च तत्सर:

মহাতপস্বী ঋষিরা কৈলাসের দিকে যাত্রারত গঙ্গা নদীকে সেই দিব্য সরোবরে নিয়ে এলেন। গঙ্গা প্রবেশ করামাত্রই সরোবরের বাঁধ ভেঙে গেল।

Verse 24

सरो भिन्न तया नद्या सरयू: सा ततो5भवत्‌ | हताश्च खलिनो यत्र स देश: खलिनो5भवत्‌

সেই নদীর দ্বারা সরোবর ভেদিত হলে যে স্রোত বেরিয়ে এল, তা-ই পরে সরযূ নামে খ্যাত হল। আর যেখানে ‘খলিন’ দানবরা নিহত হয়েছিল, সেই দেশ ‘খলিন’ নামে প্রসিদ্ধ হল।

Verse 25

एवं सेन्द्रा वसिष्ठेन रक्षितास्त्रिदिवौकस: । ब्रह्मदत्तवराश्चैव हता दैत्या महात्मना

এইভাবে ইন্দ্রসহ ত্রিদিববাসী দেবতারা বশিষ্ঠের দ্বারা রক্ষিত হলেন; এবং সেই মহাত্মা ব্রহ্মার বরপ্রাপ্ত দৈত্যদেরও বধ করলেন।

Verse 26

एतत्‌ कर्म वसिष्ठस्थ कथितं हि मयानघ । ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वं वसिष्ठात्‌ क्षत्रियं वरम्‌

হে নিষ্পাপ! আমি বশিষ্ঠের এই কর্মের বর্ণনা করেছি। আমি বলি—ব্রাহ্মণই শ্রেষ্ঠ; নতুবা তুমি বলো, বশিষ্ঠের চেয়ে শ্রেষ্ঠ কোনো ক্ষত্রিয় আছে কি না।

Verse 155

इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादे पड्चपञ्चाशदधिकशततमो<ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে পবন (বায়ুদেব) ও অর্জুনের সংলাপের একশো পঞ্চান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।