Adhyaya 104
Anushasana ParvaAdhyaya 10436 Verses

Adhyaya 104

ब्रह्मस्वहरण-निषेधः — Prohibition of Appropriating Brahmin Property (Brahmasva)

Upa-parva: Dāna-Dharma & Brahmasva-Rakṣaṇa (Instruction on Gifts and Protection of Brahmin Property)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma where those who forcibly take brāhmaṇa property go after death. Bhīṣma cites an ancient exemplum: a rājanya confronts an aged caṇḍāla whose behavior appears anomalous and questions his fear of cattle and his handling of water affected by cow-dust. The caṇḍāla explains a karmic history: a king and ritual participants benefited from brahmasva and suffered descent into hell; even those who consumed associated dairy products are described as incurring grave consequences. He draws a further caution against the commodification of soma, stating that buying and selling soma leads to punitive afterlife states (including Raurava), and he describes moral degradation tied to arrogance and harmful conduct. The caṇḍāla, possessing memory of prior births, seeks a definitive means of release from his condition; the rājanya prescribes self-sacrifice in a battlefield context ‘for the sake of brahmasva.’ Bhīṣma concludes by advising Yudhiṣṭhira to protect brahmasva if he seeks an enduring, elevated destiny.

Chapter Arc: युधिष्ठिर का प्रश्न धर्मसभा में गूंजता है—जो क्रूर और मंदबुद्धि मनुष्य ब्राह्मणों के धन का अपहरण करते हैं, वे किस लोक में गिरते हैं? यह प्रश्न केवल दंड का नहीं, समाज-धर्म की जड़ का है। → भीष्म उपाख्यान के रूप में क्षत्रिय और चाण्डाल का संवाद उठाते हैं। क्षत्रिय बूढ़े-से चाण्डाल को तिरस्कार से टोकता है—‘श्व-गर्दभों की धूल में रहने वाला तू गौओं की ओर क्यों दौड़ता है?’ चाण्डाल अपने जन्म को ‘पापयोनि’ कहकर स्वीकारता है, पर मुक्ति का मार्ग पूछकर कथा को आत्म-शुद्धि की ओर मोड़ देता है। फिर ब्राह्मण-धनहरण के नरक-फल, घोर यंत्रणाएँ, और पतन की परतें एक-एक कर खुलती जाती हैं; पाप का मानो लेखा-जोखा नहीं, एक भयावह भूगोल बनता है। → क्षत्रिय का कठोर आदेश-सा उपदेश—‘ब्राह्मणार्थे त्यजन् प्राणान्’—ब्राह्मण-स्व (ब्रह्मास्व) की रक्षा में प्राणोत्सर्ग ही ‘इष्ट गति’ का द्वार है। इसी के साथ नरकों का चरम वर्णन आता है: धर्म को तौलने-तोलने वाला अभिमानी, ब्राह्मण-धन का अपहर्ता, तीस नरकों में गिरकर अंततः अपनी ही विष्ठा पर जीने वाला कीट बनता है—यह पतन-चित्र अध्याय की सबसे तीखी चोट है। → अंत में भीष्म प्रायश्चित्त और शुद्धि के उपायों की ओर ले जाते हैं—स्वाध्याय, विविध दान, और गृहस्थ-धर्म के भीतर रहकर भी पाप-क्षालन की संभावना। साथ ही वैराग्य, आसक्ति-त्याग, और वेद-पाठ करने वाले ब्राह्मणों के प्रति अपराध की विशेष गंभीरता रेखांकित होती है—धर्म का मार्ग दंड से आगे, आत्म-संस्कार तक फैलता है। → ब्राह्मण-धन के अपराधी के लिए प्रायश्चित्त की सीमाएँ और ‘किस पाप का कौन-सा उपाय’—यह प्रश्न अगले प्रसंगों की ओर संकेत करता है।

Shlokas

Verse 1

/ एकाधिकशततमो< ध्याय: ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करनेसे प्राप्त होनेवाले दोषके विषयमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवाद तथा ब्रह्मास्वकी रक्षामें प्राणोत्सर्ग करनेसे चाण्डालको मोक्षकी प्राप्ति युधिछिर उवाच ब्राह्मणस्वानि ये मंदा हरन्ति भरतर्षभ । नृशंसकारिणो मूढा: क्व ते गच्छन्ति मानवा:

যুধিষ্ঠির বললেন— হে ভারতশ্রেষ্ঠ! যারা নীচ, মোহগ্রস্ত ও নিষ্ঠুরকর্মী মানুষ ব্রাহ্মণের ধন হরণ করে, তারা কোথায় গমন করে?

Verse 2

युधिष्ठिरने पूछा--भरतश्रेष्ठ! जो मूर्ख और मंदबुद्धि मानव क्रूरतापूर्ण कर्ममें संलग्न रहकर ब्राह्मणोंके धनका अपहरण करते हैं, वे किस लोकमें जाते हैं? ।। भीष्य उवाच (पातकानां परं होतद्‌ ब्रह्मस्वहरणं बलात्‌ | सान्वयास्ते विनश्यन्ति चण्डाला: प्रेत्य चेह च ।।) भीष्मजीने कहा--राजन! ब्राह्मणोंके धनका बलपूर्वक अपहरण--यह सबसे बड़ा पातक है। ब्राह्मणोंका धन लूटनेवाले चाण्डाल-स्वभावयुक्त मनुष्य अपने कुल- परिवारसहित नष्ट हो जाते हैं ।। अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । चाण्डालस्य च संवाद क्षत्रबंधोश्व॒ भारत,भारत! इस विषयमें जानकार मनुष्य एक चाण्डाल और क्षत्रियबंधुका संवादविषयक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं

ভীষ্ম বললেন— রাজন! ব্রাহ্মণের ধন বলপূর্বক হরণ করা পাপসমূহের মধ্যে সর্বোচ্চ পাপ। যারা চাণ্ডাল-স্বভাবের মানুষ হয়ে ব্রাহ্মণের ধন লুণ্ঠন করে, তারা বংশ-পরিবারসহ এ লোকেও এবং পরলোকেও বিনষ্ট হয়। এই বিষয়েই বিদ্বানেরা এক প্রাচীন উপাখ্যান উদ্ধৃত করেন—হে ভারত! চাণ্ডাল ও ‘ক্ষত্রিয়-নামমাত্র’ ব্যক্তির সংলাপ।

Verse 3

राजन्य उवाच वृद्धरूपोडसि चाण्डाल बालवच्च विचेष्टसे । श्वखराणां रज:सेवी कस्मादुद्धिजसे गवाम्‌,क्षत्रियने पूछा--चाण्डाल! तू बूढ़ा हो गया है तो भी बालकों-जैसी चेष्टा करता है। कुत्तों और गधोंकी धूलिका सेवन करनेवाला होकर भी तू इन गौओंकी धूलिसे क्यों इतना उद्विग्न हो रहा है

ক্ষত্রিয় বলল— হে চাণ্ডাল! তুমি বৃদ্ধ হয়েও শিশুর মতো আচরণ করছ। কুকুর ও গাধার ধুলোয় অভ্যস্ত হয়েও গোর ধুলোতে তুমি কেন এত বিচলিত?

Verse 4

साधुभिर्गहितं कर्म चाण्डालस्य विधीयते । कस्माद्‌ गोरजसा ध्वस्तमपां कुण्डे निषिउचसि,चाण्डालके लिये विहित कर्मकी श्रेष्ठ पुरुष निंदा करते हैं। तू गोधूलिसे ध्वस्त हुए अपने शरीरको क्यों जलके कुण्डमें डालकर धो रहा है?

ক্ষত্রিয় বলল— চাণ্ডালের জন্য যে কর্ম বিধেয়, সজ্জনেরা তা নিন্দিত বলে মানে। তবে গোর ধুলোয় আচ্ছন্ন দেহকে তুমি কেন জলকুণ্ডে ধুয়ে ফেলছ?

Verse 5

चाण्डाल उवाच ब्राह्मणस्य गवां राजन्‌ द्वियतीनां रज: पुरा । सोममुध्वंसयामास त॑ सोम॑ येडपिबन्‌ द्विजा:,चाण्डालने कहा--राजन्‌! पहलेकी बात है--एक ब्राह्मणकी कुछ गौओंका अपहरण किया गया था। जिस समय वे गौएँ हरकर ले जायी जा रही थीं, उस समय उनकी दुग्धकणमिश्रित चरणधूलिने सोमरसपर पड़कर उसे दूषित कर दिया। उस सोमरसको जिन ब्राह्मणोंने पीया, वे तथा उस यज्ञकी दीक्षा लेनेवाले राजा भी शीघ्र ही नरकमें जा गिरे। उन यज्ञ करानेवाले समस्त ब्राह्मणोंसहित राजा ब्राह्मणके अपहृत धनका उपयोग करके नरकगामी हुए

চাণ্ডাল বলল— রাজন! প্রাচীন কালে এক ব্রাহ্মণের কয়েকটি গাভী অপহৃত হয়েছিল। সেগুলো হাঁকিয়ে নিয়ে যাওয়ার সময় তাদের খুরের ধুলো—দুধকণ মিশ্রিত—সোমরসে পড়ে তাকে কলুষিত করেছিল। যে দ্বিজেরা সেই সোম পান করেছিল এবং যে রাজা সেই যজ্ঞের জন্য দীক্ষা গ্রহণ করেছিলেন—তাঁরা সকলেই দ্রুত নরকে পতিত হয়েছিলেন। ব্রাহ্মণের অপহৃত ধনে পরিচালিত সেই যজ্ঞের ফলে রাজা ঋত্বিজদেরসহ নরকগামী হয়েছিলেন।

Verse 6

दीक्षितश्न स राजापि क्षिप्रं नरकमाविशत्‌ | सह तैर्याजकै: सर्वर्त्रद्यस्वमुपजीव्य तत्‌,चाण्डालने कहा--राजन्‌! पहलेकी बात है--एक ब्राह्मणकी कुछ गौओंका अपहरण किया गया था। जिस समय वे गौएँ हरकर ले जायी जा रही थीं, उस समय उनकी दुग्धकणमिश्रित चरणधूलिने सोमरसपर पड़कर उसे दूषित कर दिया। उस सोमरसको जिन ब्राह्मणोंने पीया, वे तथा उस यज्ञकी दीक्षा लेनेवाले राजा भी शीघ्र ही नरकमें जा गिरे। उन यज्ञ करानेवाले समस्त ब्राह्मणोंसहित राजा ब्राह्मणके अपहृत धनका उपयोग करके नरकगामी हुए

চাণ্ডাল বলল—রাজন! যজ্ঞদীক্ষিত হয়েও সেই রাজা অচিরেই নরকে পতিত হল—সমস্ত যাজক পুরোহিতদের সঙ্গেই—কারণ তারা অপহৃত ধনের উপরেই জীবিকা নির্বাহ করেছিল, সেই সম্পদই ভোগ করেছিল। যজ্ঞে অংশগ্রহণ চোরাই ধনের কলুষ দূর করে না; জেনে-শুনে যে তার লাভ ভোগ করে, সেও সেই পাপফলের অংশীদার হয়।

Verse 7

येडपि तत्रापिबन क्षीरं घृतं दधि च मानवा: । ब्राह्मणा: सहराजन्या: सर्वे नरकमाविशन्‌,जहाँ वे गौएँ हरकर लायी गयी थीं, वहाँ जिन मनुष्योंने उनके दूध, दही और घीका उपभोग किया, वे सभी ब्राह्मण और क्षत्रिय आदि नरकमें पड़े

যেখানে সেই গাভীগুলি হরণ করে আনা হয়েছিল, সেখানে যে মানুষরা তাদের দুধ, ঘি ও দই পান বা ভক্ষণ করেছিল—ব্রাহ্মণ হোক বা ক্ষত্রিয় প্রভৃতি—তারা সকলেই নরকে পতিত হল। এই বাক্য জানায়, চুরি বা বলপ্রয়োগে অর্জিত দ্রব্য ভোগকারীও অপরাধে অংশী হয়ে একই পাপভার বহন করে।

Verse 8

जघ्नुस्ता: पयसा पुत्रांस्तथा पौत्रान्‌ विधुन्वती: । पशूनवेक्षमाणाश्च साधुवृत्तेन दम्पती,वे अपहृत हुई गौएँ जब दूसरे पशुओंको देखतीं और अपने स्वामी तथा बछड़ोंको नहीं देखती थीं, तब पीड़ासे अपने शरीरको कँपाने लगती थीं। उन दिनों सद्धावसे ही दूध देकर उन्होंने अपहरणकारी पति-पत्नीको तथा उनके पुत्रों और पौत्रोंको भी नष्ट कर दिया

অপহৃত গাভীগুলি যখন অন্য পশুদের দেখে, কিন্তু নিজের প্রকৃত স্বামী ও বাছুরদের দেখতে পায় না, তখন দুঃখে কাঁপতে থাকে। আর সেই দিনগুলিতেই, ধার্মিকতার মুখোশ পরে চৌর্যবৃত্তিতে বেঁচে থাকা সেই দম্পতিকে—তাদের পুত্র ও পৌত্রসহ—নিজেদেরই দুধের দ্বারা বিনাশ করল।

Verse 9

अहं तत्रावसं राजन ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय: । तासां मे रजसा ध्वस्तं भैक्षमासीन्नराधिप,राजन! मैं भी उसी गाँवमें ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक जितेन्द्रियभावसे निवास करता था। नरेश्वर! एक दिन उन्हीं गौओंके दूध एवं धूलके कणसे मेरा भिक्षात्र भी दूषित हो गया

চাণ্ডাল বলল—রাজন! আমিও সেই গ্রামেই ব্রহ্মচারী ও ইন্দ্রিয়সংযমী হয়ে বাস করতাম। নরাধিপ! একদিন সেই গাভীগুলির উড়ে-ওঠা ধূলিকণায় আমার ভিক্ষান্নও কলুষিত হয়ে গেল।

Verse 10

चाण्डालो<हं ततो राजन्‌ भुक्त्वा तदभवं नृप । ब्रह्मस्वहारी च नृप: सो<प्रतिष्ठां गतिं ययौ,महाराज! उस भिक्षान्नको खाकर मैं चाण्डाल हो गया और ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाले वे राजा भी नरकगामी हो गये

চাণ্ডাল বলল—মহারাজ! সেই কলুষিত ভিক্ষান্ন ভক্ষণ করে আমি চাণ্ডাল হয়ে গেলাম। আর ব্রাহ্মণের ধন অপহরণকারী সেই রাজাও অপযশে পতিত হয়ে বিনাশময় গতিতে গেল। অতএব, কলুষিত অন্নভোজী এবং ব্রাহ্মণ-ধনহর্তা—উভয়েরই মহাপতন অনিবার্য।

Verse 11

इसलिये कभी किंचिन्मात्र भी ब्राह्मणके धनका अपहरण न करे। ब्राह्मणके धूल- धूसरित दुग्धरूप धनको खाकर मेरी जो दशा हुई है, उसे आप प्रत्यक्ष देख लें

অতএব কখনও সামান্যতমও ব্রাহ্মণের ধন হরণ করা উচিত নয়। ধূলিধূসরিত, দুধের মতো অথচ কলুষিত সেই ব্রাহ্মণ-ধন ভোগ করে আমার যে দুর্দশা হয়েছে, তা তোমরা নিজের চোখে প্রত্যক্ষ দেখো।

Verse 12

तस्मात्‌ सोमो<प्यविक्रेय: पुरुषेण विपश्चिता । विक्रयं त्विह सोमस्य गर्हयन्ति मनीषिण:,इसीलिये विद्वान्‌ पुरुषको सोमरसका विक्रय भी नहीं करना चाहिये। मनीषी पुरुष इस जगत्‌में सोमरसके विक्रयकी बड़ी निंदा करते हैं

অতএব বিচক্ষণ পুরুষের সোমরসও বিক্রি করা উচিত নয়। কারণ এই জগতে জ্ঞানীরা সোমের বাণিজ্যকে কঠোরভাবে নিন্দা করেন।

Verse 13

तस्माद्धरेन्न विप्रस्व॑ं कदाचिदपि किंचन । ब्रह्मस्वं रजसा ध्वस्तं भुक्त्वा मां पश्य यादृशम्‌,ये चैनं क्रीणते तात ये च विक्रीणते जना: । ते तु वैवस्वतं प्राप्य रौरवं यान्ति सर्वश: तात! जो लोग सोमरसको खरीदते हैं और जो लोग उसे बेचते हैं, वे सभी यमलोकमें जाकर रौरव नरकमें पड़ते हैं

অতএব কখনও ব্রাহ্মণের সম্পত্তির সামান্যও হরণ করো না। রজসে কলুষিত ব্রহ্মস্ব ভোগ করে আমি যেমন হয়েছি, আমাকে দেখো। আর হে বৎস! যারা সোমরস কেনে এবং যারা তা বিক্রি করে—তারা সকলেই বৈবস্বত (যম)-এর কাছে গিয়ে অবশ্যম্ভাবীভাবে রৌরব নরকে পতিত হয়।

Verse 14

सोम॑ तु रजसा ध्वस्तं विक्रीणन्‌ विधिपूर्वकम्‌ | श्रोत्रियो वार्धुषी भूत्वा न चिरं स विनश्यति,वेदवेत्ता ब्राह्मण यदि गौओंके चरणोंकी धूलि और दूधसे दूषित सोमको विधिपूर्वक बेचता है अथवा व्याजपर रुपये चलाता है तो वह जल्दी ही नष्ट हो जाता है

ধূলিতে কলুষিত সোম যদি কোনো শ্রোত্রিয়, বেদজ্ঞ ব্রাহ্মণ বিধিপূর্বকও বিক্রি করে, অথবা সুদে টাকা ধার দিয়ে সুদখোরিতে প্রবৃত্ত হয়—তবে সে দীর্ঘকাল টেকে না; শীঘ্রই বিনষ্ট হয়।

Verse 15

नरकं त्रिंशतं प्राप्प स्वविष्ठामुपजीवति । श्वचर्यामभिमानं च सखिदारे च विप्लवम्‌

ত্রিশ নরকে পতিত হয়ে সে নিজেরই বিষ্ঠা খেয়ে বেঁচে থাকে। তারপর কুকুরের মতো দশা প্রাপ্ত হয়; সঙ্গে থাকে মোহগ্রস্ত অহংকার, আর তার গৃহস্থালি ও বন্ধুত্ব সর্বনাশে পর্যবসিত হয়।

Verse 16

श्वानं वै पापिनं पश्य विवर्ण हरिणं कृशम्‌

চাণ্ডাল বলল—“দেখো, এই পাপী কুকুরটি, আর এই বিবর্ণ ও কৃশ হরিণটি।”

Verse 17

अहं वै विपुले तात कुले धनसमन्विते

চাণ্ডাল বলল—“হে তাত, আমি সত্যিই এক বৃহৎ ও ধনসম্পন্ন কুলে জন্মেছিলাম।”

Verse 18

अन्यस्मिज्जन्मनि विभो ज्ञानविज्ञानपारग: । अभवं तत्र जानानो होतान्‌ दोषान्‌ मदात्‌ सदा

“হে প্রভু, অন্য জন্মে আমি জ্ঞান ও বিজ্ঞান—উভয়েই পারদর্শী হয়েছিলাম। তবু মদজনিত দোষগুলি জেনেও, অহংকার ও মোহে সেখানে বারবার সেগুলিই করতাম।”

Verse 19

संरब्ध एव भूतानां पृष्ठमांसमभक्षयम्‌ | सो<हं तेन च वृत्तेन भोजनेन च तेन वै

চাণ্ডাল বলল—“বাধ্য হয়ে আমি জীবদের পিঠের মাংস খেতাম। সেই জীবনযাপন ও সেই খাদ্যের ফলেই আমি আজ এমন হয়েছি।”

Verse 20

इमामवस्थां सम्प्राप्त: पश्य कालस्य पर्ययम्‌ | तात! प्रभो! मैं भी दूसरे जन्ममें धनसम्पन्न महान्‌ कुलमें उत्पन्न हुआ था। ज्ञान- विज्ञानमें पारंगत था। इन सब दोषोंको जानता था तो भी अभिमानवश सदा सब प्राणियोंपर क्रोध करता और पशुओंके पृष्ठका मांस खाता था; उसी दुराचार और अभक्ष्य- भक्षणसे मैं इस दुरवस्थाको प्राप्त हुआ हूँ। कालके इस उलट-फेरको देखिये ।। आदीप्तमिव चैलान्तं भ्रमरैरिव चार्दितम्‌

“আমি এই অবস্থায় পতিত হয়েছি—কালের এই উলট-পালট দেখো।”

Verse 21

स्वाध्यायैस्तु महत्पापं हरन्ति गृहमेधिन:

গৃহস্থেরা ভক্তিভরে স্বাধ্যায় ও শাস্ত্রপাঠের দ্বারা মহাপাপও দূর করে।

Verse 22

तथा पापकृतं विप्रमाश्रमस्थं महीपते

হে মহীপতে! তদ্রূপ, আশ্রমে অবস্থানকারী পাপকারী ব্রাহ্মণও (তদনুযায়ীই গণ্য)।

Verse 23

अहं हि पापयोन्यां वै प्रसूत: क्षत्रियर्षभ । निश्चयं नाधिगच्छामि कथं मुच्येयमित्युत,क्षत्रियशिरोमणे! मैं पापयोनिमें उत्पन्न हुआ हूँ। मुझे यह निश्चय नहीं हो पाता कि मैं किस उपायसे मुक्त हो सकूँगा?

চাণ্ডাল বলল—হে ক্ষত্রিয়র্ষভ! আমি সত্যই পাপযোনিতে জন্মেছি। কোন উপায়ে আমি মুক্ত হব—এ বিষয়ে আমি কোনো নিশ্চিত সিদ্ধান্তে পৌঁছাতে পারি না।

Verse 24

जातिस्मरत्वं च मम केनचित्‌ पूर्वकर्मणा । शुभेन येन मोक्ष॑ वै प्राप्तुमिच्छाम्यहं नृप,नरेश्वर! पहलेके किसी शुभ कर्मके प्रभावसे मुझे पूर्व-जन्मकी बातोंका स्मरण हो रहा है, जिससे मैं मोक्ष पानेकी इच्छा करता हूँ

চাণ্ডাল বলল—হে নরেশ্বর! পূর্বজন্মের কোনো শুভ কর্মের প্রভাবে আমার জাতিস্মরণ হয়েছে; সেই পুণ্যের বলেই, হে নৃপ, আমি এখন মোক্ষ লাভ করতে চাই।

Verse 25

त्वमिमं सम्प्रपन्नाय संशयं ब्रूहि पृच्छते । चाण्डालत्वात्‌ कथमहं मुच्येयमिति सत्तम,सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ! मैं आपकी शरणमें आकर अपना यह संशय पूछ रहा हूँ। आप मुझे इसका समाधान बताइये। मैं चाण्डाल-योनिसे किस प्रकार मुक्त हो सकता हूँ?

হে সৎপুরুষদের শ্রেষ্ঠ! আমি আপনার শরণ নিয়ে এই সংশয় জিজ্ঞাসা করছি; অনুগ্রহ করে বলুন—চাণ্ডালত্ব থেকে আমি কীভাবে মুক্ত হতে পারি?

Verse 26

राजन्य उवाच चाण्डाल प्रतिजानीहि येन मोक्षमवाप्स्ययसि । ब्राह्मणार्थे त्यजन्‌ प्राणान्‌ गतिमिष्टामवाप्स्यसि,क्षत्रियने कहा--चाण्डाल! तू उस उपायको समझ ले, जिससे तुझे मोक्ष प्राप्त होगा। यदि तू ब्राह्मणकी रक्षाके लिये अपने प्राणोंका परित्याग करे तो तुझे अभीष्ट गति प्राप्त होगी

ক্ষত্রিয় বলল—“হে চাণ্ডাল! যে প্রতিজ্ঞা গ্রহণ করলে তুমি মোক্ষ লাভ করবে, তা গ্রহণ করো। ব্রাহ্মণের কল্যাণার্থে যদি তুমি প্রাণ ত্যাগ করো, তবে তুমি অভীষ্ট পরম গতি লাভ করবে।”

Verse 27

दत्त्वा शरीर क्रव्याद्धयो रणाग्नौ द्विजहेतुकम्‌ । हुत्वा प्राणान्‌ प्रमोक्षस्ते नान्‍्यथा मोक्षमर्हसि,यदि ब्राह्मणकी रक्षाके लिये तू अपना यह शरीर समराग्निमें होमकर कच्चा मांस खानेवाले जीव-जन्तुओंको बाँट दे तो प्राणोंकी आहुति देनेपर तेरा छुटकारा हो सकता है, अन्यथा तू मोक्ष नहीं पा सकेगा

ক্ষত্রিয় বলল—“ব্রাহ্মণকে রক্ষা করতে যদি তুমি তোমার দেহকে যুদ্ধাগ্নিতে আহুতি দাও এবং তা মাংসভোজী প্রাণীদের ভাগ করে দাও, তবে প্রাণবায়ু উৎসর্গ করে তুমি মুক্তি পেতে পারো; নচেৎ তুমি মোক্ষের যোগ্য নও।”

Verse 28

भीष्म उवाच इत्युक्त: स तदा तेन ब्रह्मास्वार्थ परंतप । हुत्वा रणमुखे प्राणान्‌ गतिमिष्टामवाप ह,भीष्मजी कहते हैं--परंतप! क्षत्रियके ऐसा कहनेपर उस चाण्डालने ब्राह्मणके धनकी रक्षाके लिये युद्धके मुहानेपर अपने प्राणोंकी आहुति दे अभीष्ट गति प्राप्त कर ली

ভীষ্ম বললেন—“হে পরন্তপ! ক্ষত্রিয়ের এ কথা শুনে সেই চাণ্ডাল ব্রাহ্মণের ধন রক্ষার্থে যুদ্ধের সম্মুখে প্রাণাহুতি দিল এবং অভীষ্ট গতি লাভ করল।”

Verse 29

तस्माद्‌ रक्ष्यं त्वया पुत्र ब्रह्म॒स्वं भरतर्षभ । यदीच्छसि महाबाहो शाश्वतीं गतिमात्मन:,बेटा! भरतश्रेष्ठ) महाबाहो! यदि तुम सनातन गति पाना चाहते हो तो तुम्हें ब्राह्मणके धनकी पूरी रक्षा करनी चाहिये

ভীষ্ম বললেন—“অতএব, বৎস! হে ভরতশ্রেষ্ঠ, হে মহাবাহো! যদি তুমি নিজের জন্য শাশ্বত পরম গতি কামনা কর, তবে ব্রাহ্মণের সম্পত্তি সম্পূর্ণরূপে রক্ষা করো।”

Verse 100

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें अगस्त्य और भ्रगुका संवादनामक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে ‘অগস্ত্য-ভৃগু সংলাপ’ নামক শততম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 101

इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि राजन्यचाण्डालसंवादो नामैकोत्तरशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें क्षत्रिय और चाण्डालका संवादविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে ‘ক্ষত্রিয় (রাজন্য) ও চাণ্ডালের সংলাপ’ নামক একশো একতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 156

तुलया धारयन्‌ धर्ममभिमान्यतिरिच्यते । वह तीस नरकोंमें पड़कर अंतमें अपनी ही विष्ठापर जीनेवाला कीड़ा होता है। कुत्तोंको पालना, अभिमान तथा मित्रकी स्त्रीसे व्यभिचार--इन तीनों पापोंको तराजूपर रखकर यदि धर्मतः तौला जाय तो अभिमानका ही पलड़ा भारी होगा

চাণ্ডাল বলল—“ধর্মকে দাঁড়িপাল্লায় তুললে অহংকারই ভারী হয়ে ওঠে।”

Verse 166

अभिमानेन भूतानामिमां गतिमुपागतम्‌ | आप मेरे इस पापी कुत्तेको देखिये, यह कान्तिहीन, सफेद और दुर्बल हो गया है। यह पहले मनुष्य था। परंतु समस्त प्राणियोंके प्रति अभिमान रखनेके कारण इस दुर्गतिको प्राप्त हुआ है

চাণ্ডাল বলল—“সকল জীবের প্রতি অহংকারের কারণেই সে এই দশায় পৌঁছেছে। আমার এই পাপী কুকুরটিকে দেখো—এটি জ্যোতিহীন, ফ্যাকাশে ও দুর্বল হয়ে গেছে। একসময় সে মানুষ ছিল; কিন্তু সর্বপ্রাণীর প্রতি অহংকার রাখায় সে এই দুর্গতি লাভ করেছে।”

Verse 203

धावमानं सुसंरब्धं पश्य मां रजसान्वितम्‌ । मेरी दशा ऐसी हो रही है, मानो मेरे कपड़ोंके छोरमें आग लग गयी हो अथवा तीखे मुखवाले भ्रमरोंने मुझे डंक मार-मारकर पीड़ित कर दिया हो। मैं रजोगुणसे युक्त हो अत्यंत रोष और आवेशमें भरकर चारों ओर दौड़ रहा हूँ। मेरी दशा तो देखिये

আমাকে দেখুন—রজোগুণে আচ্ছন্ন হয়ে আমি প্রবল ক্রোধ ও আবেগে ভরে চারদিকে ছুটে বেড়াচ্ছি। আমার অবস্থা যেন আমার বস্ত্রের প্রান্তে আগুন লেগেছে, অথবা তীক্ষ্ণমুখ ভ্রমররা বারবার হুল ফুটিয়ে আমাকে যন্ত্রণায় কাতর করেছে।

Verse 216

दानै: पृथग्विधेश्वापि यथा प्राहुर्मनीषिण: । गृहस्थ मनुष्य वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायद्वारा तथा नाना प्रकारके दानोंसे अपने महान्‌ पापको दूर कर देते हैं। जैसा कि मनीषी पुरुषोंका कथन है

চাণ্ডাল বলল—“যেমন মনীষীরা বলেন, গৃহস্থ ব্যক্তি বেদ-শাস্ত্রের স্বাধ্যায় এবং নানাবিধ দানের দ্বারা নিজের মহাপাপ দূর করে।”

Verse 226

सर्वसंगविनिर्मुक्त छन्दांस्युत्तारयन्त्युत । पृथ्वीनाथ! आश्रममें रहकर सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्ता हो वेदपाठ करनेवाले ब्राह्मगको यदि वह पापाचारी हो तो भी उसके द्वारा पढ़े जानेवाले वेद उसका उद्धार कर देते हैं

চাণ্ডাল বলল—হে পৃথিবীনাথ! বৈদিক ছন্দসমূহ নিশ্চয়ই পার করায়। যে ব্রাহ্মণ আশ্রমে বাস করে সকল আসক্তি ত্যাগ করে বেদপাঠ করে, সে আচরণে পাপী হলেও, তার উচ্চারিত বেদই তার উদ্ধারের উপায় হয়ে ওঠে।

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns the ethical status and karmic cost of taking brahmasva—property designated for brāhmaṇas and ritual purposes—and whether participation in, benefit from, or facilitation of such appropriation implicates wider groups in the resulting consequences.

The chapter’s upadeśa is that dharma is enforced through karmic causality at both individual and collective levels: sacred resources require protection, commerce in certain ritual goods (notably soma) is censured, and ethical recovery is pursued through disciplined conduct rather than opportunistic gain.

Rather than a formal phalaśruti, the chapter ends with a directive conclusion: Bhīṣma instructs Yudhiṣṭhira to safeguard brahmasva as a condition for attaining a ‘śāśvatī’ (enduring) and ‘uttamā’ (higher) gati, functioning as a practical soteriological framing.