Adhyaya 103
Anushasana ParvaAdhyaya 10349 Verses

Adhyaya 103

नहुषोपाख्यानम्—दीपदान-धूप-बलीकर्म-प्रशंसा (Nahūṣa Episode and the Commendation of Lamp-Gifting and Household Offerings)

Upa-parva: Dīpa–Dhūpa–Bali-vidhi (Household Offerings and the Nahūṣa Episode)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to explain how Nahūṣa became fallen, why he was cast to earth, and how he lost Indra-status. Bhīṣma recounts that Nahūṣa initially flourished through comprehensive observance of divine and human rites: lamp-gifts, incense offerings, salutations, water-based acts, and bali portions offered within the household space—practices described as ‘sadācāra’ recognized in both deva- and human realms and as especially beneficial for householders. When fortune waned, Nahūṣa neglected these disciplines; his ritual sphere became disturbed, and he summoned Agastya as a conveyance. A hidden Bhṛgu enters Agastya’s matted locks; Nahūṣa, acting in anger, strikes Agastya’s head with his foot. Bhṛgu curses Nahūṣa to fall to earth as a serpent; later, through austerities and supplication, a mitigation is granted: a future king named Yudhiṣṭhira will release him from the curse. The chapter closes with a phala-oriented commendation of dīpa-dāna: householders should give lamps at evening; the giver is said to gain ‘divine sight’ after death, and worldly qualities such as attractiveness and wealth are linked to the duration of a lamp’s burning.

Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि अगस्त्य–भृगु के संवाद के बीच उस महात्मा के आश्रम में दिव्य और मानुष—दोनों प्रकार के यज्ञ-उपचार, बलिकर्म और दान-क्रियाएँ स्वतः प्रवर्तित होने लगीं; और इसी प्रसंग से दीपदान का महात्म्य प्रकट होता है। → कथा नहुष के अपराध की ओर मुड़ती है—राजा का अहंकार ऋषि-तेज से टकराता है। भृगु के तेजस्वी क्रोध और नहुष की अविनय-पराकाष्ठा से शाप का भय घनीभूत होता है; साथ ही गृहस्थ-धर्म में संध्या-समय दीपदान की अनिवार्यता का विधान उभरता है। → भृगु का शाप नहुष पर गिरता है—‘सर्प बनकर शीघ्र पृथ्वी पर जा’; पतन का क्षण ही अध्याय का शिखर है, जहाँ राज-वैभव क्षण में धूल हो जाता है और ऋषि-धर्म की अजेयता स्थापित होती है। → पतन के बाद भी नहुष स्मृतिमान रहता है और भृगु से शाप-शान्ति की याचना करता है; आगे पुण्यकर्मों—विशेषतः दीपदान—के प्रभाव से क्रमशः सिद्धि और पुनरुत्थान का मार्ग दिखाया जाता है, और इन्द्र (शतक्रतु) ब्रह्मा के अभिषेक से पूर्ववत् शोभा पाते हैं। → नहुष के लिए शापान्ति/उद्धार की शर्तें और दीपदानादि पुण्यकर्मों का फल आगे के उपदेश-क्रम में विस्तार से खुलने का संकेत छोड़ता है।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें अगस्त्य और भ्रगुका संवादनामक निन्‍यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ९९ ॥। ऑपन--माजल छा अफ<-जआकऋा-ज शततमो< ध्याय: नहुषका पतन

যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! রাজা নহুষ কীভাবে বিপদে পতিত হলেন? কীভাবে তাঁকে পৃথিবীতে নিক্ষেপ করা হল? আর কীভাবে তিনি ইন্দ্রপদ হারালেন? অনুগ্রহ করে এ কথা আমাকে বলুন।

Verse 2

भीष्म उवाच एवं तयो: संवदतो: क्रियास्तस्य महात्मन: । सर्वा एव प्रवर्तन्ते या दिव्या याश्व मानुषी:

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! মহর্ষি ভৃগু ও অগস্ত্য এভাবে কথোপকথন করছিলেন, সেই সময় মহাত্মা নহুষের গৃহে দেবীয় ও মানবীয়—সব প্রকার ক্রিয়াকর্মই চলছিল।

Verse 3

तथैव दीपदानानि सर्वोपकरणानि वै | बलिकर्म च यच्चान्यदुत्सेका श्व पृथग्विधा:

তদ্রূপ দীপদান এবং সকল প্রয়োজনীয় উপকরণসহ দান-সমর্পণ করা হয়; আর বলিকর্ম ও অন্যান্য নানাবিধ উৎসেক (ব্রত-উপাসনার বিশেষ আচরণ)ও বিধিপূর্বক সম্পন্ন হয়।

Verse 4

सर्वे तस्य समुत्पन्ना देवेन्द्रस्य महात्मन: । देवलोके नृलोके च सदाचारा बुधै: स्मृता:

ভীষ্ম বললেন—সেই মহাত্মা দেবেন্দ্র থেকে উদ্ভূত সকলেই দেবলোক ও নৃলোক—উভয় জগতে, জ্ঞানীদের দ্বারা সদাচারের আদর্শরূপে স্মরণীয়।

Verse 5

दीपदान, समस्त उपकरणोंसहित अन्नदान, बलिकर्म एवं नाना प्रकारके स्नान- अभिषेक आदि पूर्ववत्‌ चालू थे। देवलोक तथा मनुष्यलोकमें विद्वानोंने जो सदाचार बताये हैं, वे सब महामना देवराज नहुषके यहाँ होते रहते थे ।।

ভীষ্ম বললেন— প্রদীপদান, সকল উপকরণসহ অন্নদান, বলিকর্ম এবং নানাবিধ স্নান‑অভিষেক প্রভৃতি পূর্বের মতোই চলছিল। দেবলোক ও মনুষ্যলোকে পণ্ডিতেরা যে সদাচারের বিধান করেছেন, সেই সবই মহামনা দেবরাজ নহুষের গৃহে সর্বদা পালিত হত। হে রাজেন্দ্র! গৃহস্থের ঘরে যদি সেই সদাচার থাকে, তবে গৃহস্থ সর্বতোভাবে সমৃদ্ধি লাভ করে; ধূপদান, দীপদান এবং দেবতাদের প্রতি নমস্কার দ্বারা গৃহস্থের ঐশ্বর্য‑সিদ্ধি বৃদ্ধি পায়।

Verse 6

यथा सिद्धस्य चान्नस्य ग्रहायाग्रं प्रदीयते | बलयश्न गृहोद्देशे अतः प्रीयन्ति देवता:

যেমন রান্না সম্পূর্ণ হলে প্রথম অংশ অতিথিকে দেওয়া হয়, তেমনি গৃহে দেবতাদের জন্য অন্নের বলি পৃথক করে রাখা হয়। এই পূর্বার্পণে দেবতারা প্রসন্ন হন।

Verse 7

यथा च गृहिणस्तोषो भवेद्‌ वै बलिकर्मणि । तथा शतगुणा प्रीतिर्देवतानां प्रजायते,बलिकर्म करनेपर गृहस्थको जितना संतोष होता है, उससे सौगुनी प्रीति देवताओंको होती है

বলিকর্ম সম্পাদনে গৃহস্থের যতটা তৃপ্তি হয়, দেবতাদের ততটাই নয়—তার শতগুণ অধিক প্রীতি উৎপন্ন হয়।

Verse 8

एवं धूपप्रदानं च दीपदानं च साधव: । प्रयच्छन्ति नमस्कारैर्युक्तमात्मगुणावहम्‌,इस प्रकार श्रेष्ठ पुरुष अपने लिये लाभदायक समझकर देवताओंको नमस्कारसहित धूपदान और दीपदान करते हैं

এইভাবে সাধুজন নিজেদের কল্যাণকর জেনে দেবতাদের প্রতি নমস্কারসহ ধূপদান ও দীপদান করেন।

Verse 9

स्‍्नानेनाद्धिश्न यत्‌ कर्म क्रियते वै विपश्चिता । नमस्कारप्रयुक्तेन तेन प्रीयन्ति देवता:

জ্ঞানী ব্যক্তি স্নান করে নমস্কারসহ যে তर्पণ প্রভৃতি কর্ম করেন, তাতে দেবতারা প্রসন্ন হন; বিধিপূর্বক শ্রদ্ধাসহ সম্পন্ন হলে গৃহের পূজায় মঙ্গল ও সামঞ্জস্য আসে।

Verse 10

पितरश्न महाभागा ऋषयश्न तपोधना: । गृह्माश्व देवता: सर्वाः प्रीयन्ते विधिनार्चिता:

ভীষ্ম বললেন— মহাভাগ পিতৃগণ, তপোধন ঋষিগণ এবং গৃহের সকল দেবতা বিধিপূর্বক পূজিত হলে প্রসন্ন হন। অতএব বিদ্বান ব্যক্তি স্নান করে দেবতাদের প্রণাম জানিয়ে তर्पণাদি কর্ম সম্পাদন করলে, সেই পবিত্র অধিকারীগণ তৃপ্ত হন এবং গৃহধর্মের শৃঙ্খলা রক্ষিত থাকে।

Verse 11

इत्येतां बुद्धिमास्थाय नहुष: स नरेश्वरः । सुरेन्द्रत्वं महत्‌ प्राप्प कृतवानेतददभूतम्‌,इसी विचारधाराका आश्रय लेकर राजा नहुषने महान देवेन्द्रपद पाकर यह अदभुत पुण्यकर्म सदा चालू रखा था

ভীষ্ম বললেন— এই বোধকে আশ্রয় করে নরেশ নহুষ মহান ইন্দ্রপদ লাভ করেও এই আশ্চর্য পুণ্যকর্ম সম্পাদন করেছিলেন এবং তা নিরন্তর পালন করে গিয়েছিলেন।

Verse 12

कस्यचित्‌ त्वथ कालस्य भाग्यक्षय उपस्थिते । सर्वमेतदवज्ञाय कृतवानिदमीदृशम्‌

কিন্তু কিছু কাল পরে, যখন তাঁর সৌভাগ্য ক্ষয়ের সময় উপস্থিত হল, তখন তিনি এই সব বিধানকে অবজ্ঞা করে এমন পাপকর্মে প্রবৃত্ত হলেন।

Verse 13

ततः स परिहीणो<भूत्‌ सुरेन्द्रो बलदर्पत: । धूपदीपोदकविधधि न यथावच्चकार ह

ভীষ্ম বললেন— তারপর শক্তির দম্ভে মত্ত হয়ে সেই দেবরাজ যথাস্থান থেকে পতিত হলেন। তিনি ধূপ, দীপ ও জল অর্পণের বিধি শাস্ত্রানুসারে আর পালন করলেন না।

Verse 14

ततो<स्य यज्ञविषयो रक्षोभ्रि: पर्यबध्यत । अथागस्त्यमृषिश्रेष्ठ वाहनायाजुहाव ह

তখন তার যজ্ঞভূমি রাক্ষসদের দ্বারা ঘিরে বাধাপ্রাপ্ত হল। এরপর সে মুনিশ্রেষ্ঠ অগস্ত্যকে নিজের বাহনরূপে (বহন/উঠিয়ে নেওয়ার জন্য) আহ্বান করল; এভাবেই তার অহংকার ধর্মের বদলে জবরদস্তির রূপ নিতে লাগল।

Verse 15

द्रुतं सरस्वतीकूलात्‌ स्मयन्निव महाबल: । ततो भृगुर्महातेजा मैत्रावरुणिमब्रवीत्‌

তখন মহাবলী (নহুষ) যেন মৃদু হাসি হেসে সরস্বতীর তীর থেকে দ্রুত অগ্রসর হলেন। এরপর মহাতেজস্বী ভৃগু মৈত্রাবরুণি (অগস্ত্য)-কে সম্বোধন করে বললেন।

Verse 16

निमीलय स्वनयने जटां यावद्‌ विशामि ते । स्थाणुभूतस्य तस्याथ जटां प्राविशदच्युत:

ভৃগু বললেন—“মুনে, আমি যতক্ষণ তোমার জটায় প্রবেশ করি, ততক্ষণ তুমি তোমার দুই চোখ বন্ধ করো।” তখন অগস্ত্য চোখ বন্ধ করে স্তম্ভের মতো স্থির হয়ে দাঁড়ালেন; আর মর্যাদা-অচ্যুত ভৃগু তাঁর জটায় প্রবেশ করলেন।

Verse 17

भगुः स सुमहातेजा: पातनाय नृपस्य च । ततः स देवराट प्राप्तस्तमृषिं वाहनाय वै

অতিশয় তেজস্বী ভৃগু রাজাকে পতিত করবার উদ্দেশ্যে উদ্যত ছিলেন। ঠিক সেই সময় দেবরাজ নহুষ সেই ঋষির কাছে এসে উপস্থিত হলেন—তাঁকে নিজের বাহন (বাহক) করতে।

Verse 18

ततोडगस्त्य: सुरपतिं वाक्यमाह विशाम्पते | योजयस्वेति मां क्षिप्रं कं च देशं वहामि ते

তখন অগস্ত্য দেবরাজকে বললেন—“হে প্রজাপতি! আমাকে শীঘ্র রথে জুড়ে দিন, আর বলুন—আমি আপনাকে কোন দেশে নিয়ে যাব? আপনি যেখানে আদেশ করবেন, সেখানেই আপনাকে পৌঁছে দেব।”

Verse 19

यत्र वक्ष्यसि तत्र त्वां नयिष्यामि सुराधिप । इत्युक्तो नहुषस्तेन योजयामास त॑ मुनिम्‌

অগস্ত্য বললেন—“হে সুরাধিপ! আপনি যেখানে বলবেন, সেখানেই আমি আপনাকে নিয়ে যাব।” এ কথা শুনে নহুষ সেই মুনিকে রথে জুড়ে দিলেন।

Verse 20

भगुस्तस्य जटान्तस्थो बभूव हृषितो भृशम्‌ | न चापि दर्शनं तस्य चकार स भृगुस्तदा,यह देख उनकी जटाके भीतर बैठे हुए भृगु बहुत प्रसन्न हुए। उस समय भृगुने नहुषका साक्षात्कार नहीं किया

তার জটার ভিতরে আসীন ভৃগু অত্যন্ত আনন্দিত হলেন; কিন্তু সেই সময় ভৃগু নহুষকে প্রত্যক্ষ দর্শন দিলেন না—সাক্ষাৎ করলেন না।

Verse 21

वरदानप्रभावज्ञों नहुषस्य महात्मन: । न चुकोप तदागस्त्यो युक्तोडपि नहुषेण वै,अगस्त्यमुनि महामना नहुषको मिले हुए वरदानका प्रभाव जानते थे, इसलिये उसके द्वारा रथमें जोते जानेपर भी वे कुपित नहीं हुए

মহাত্মা নহুষের প্রাপ্ত বরদানের প্রভাব জানতেন বলে মহামুনি অগস্ত্য, নহুষ তাঁকে রথে জুড়লেও ক্রুদ্ধ হলেন না—সংযম রক্ষা করলেন।

Verse 22

तं तु राजा प्रतोदेन चोदयामास भारत । न चुकोप स धर्मात्मा ततः पादेन देवराट्‌

হে ভারতবংশীয়! রাজা তাকে চাবুক-দণ্ডে তাড়িত করল; কিন্তু সেই ধর্মাত্মা ক্রুদ্ধ হলেন না। তখন দেবরাজ পায়ে আঘাত করলেন।

Verse 23

तस्मिन्‌ शिरस्यभिहते स जटान्तर्गतो भगुः

যখন সেই মস্তকে আঘাত করা হল, তখন জটার ভিতরে লুকিয়ে থাকা ভগু প্রকাশিত হলেন।

Verse 24

शशाप बलवत्क़ुद्धो नहुषं पापचेतसम्‌ | यस्मात्‌ पदा55हत: क्रोधाच्छिरसीमं महामुनिम्‌

তখন প্রবল ক্রোধে মহামুনি পাপচিত্ত নহুষকে শাপ দিলেন; কারণ ক্রোধবশে নহুষ পায়ে আঘাত করে সেই মহামুনির মস্তকে প্রহার করেছিল।

Verse 25

तस्मादाशु महीं गच्छ सर्पों भूत्वा सुदुर्मते । उनके मस्तकपर चोट होते ही जटाके भीतर बैठे हुए महर्षि भूगु अत्यन्त कुपित हो उठे और उन्होंने पापात्मा नहुषको इस प्रकार शाप दिया--'ओ दुर्मते! तुमने इन महामुनिके मस्तकमें क्रोधपूर्वक लात मारी है, इसलिये तू शीघ्र ही सर्प होकर पृथ्वीपर चला जा” ।।

ভীষ্ম বললেন—“অতএব, হে দুর্মতি! তুমি শীঘ্রই সর্প হয়ে পৃথিবীতে নেমে যাও।” এ কথা শুনে, মহর্ষির প্রতি অহংকারপূর্ণ দুষ্কর্মের ফলে অভিশপ্ত নহুষ তৎক্ষণাৎ সর্প হয়ে পতিত হল।

Verse 26

भूगुं हि यदि सोडद्रक्ष्यन्नहुष: पृथिवीपते

ভীষ্ম বললেন—“হে পৃথিবীপতি! যদি নহুষ প্রজার রক্ষা করতে করতে ভৃগুর (ক্রোধ/অভিশাপ) পর্যন্ত সহ্য করতে উদ্যত হয়, তবে…”

Verse 27

स तु तैस्तै: प्रदानैश्व तपोभिर्नियमैस्तथा

ভীষ্ম বললেন—“কিন্তু সে নানাবিধ দান, এবং তপস্যা ও নিয়মাচরণের দ্বারা (পুণ্য ও সাধনায়) উন্নতি লাভ করল।”

Verse 28

पतितो5पि महाराज भूतले स्मृतिमानभूत्‌ । प्रसादयामास भृगुं शापान्तो मे भवेदिति

ভীষ্ম বললেন—“হে মহারাজ! ভূমিতে পতিত হয়েও সে স্মৃতিবান রইল। ‘আমার অভিশাপের অবসান হোক’—এই ভাবনা নিয়ে সে ভৃগুকে প্রসন্ন করতে লাগল।”

Verse 29

महाराज! नहुषने जो भिन्न-भिन्न प्रकारके दान किये थे, तप और नियमोंका अनुष्ठान किया था, उनके प्रभावसे वे पृथ्वीपर गिरकर भी पूर्वजन्मकी स्मृतिसे वंचित नहीं हुए। उन्होंने भूगुको प्रसन्न करते हुए कहा--'प्रभो! मुझको मिले हुए शापका अंत होना चाहिये” ।।

ভীষ্ম বললেন—“হে মহারাজ! নহুষ যে নানাবিধ দান, তপস্যা ও নিয়মাচরণ করেছিল, তার প্রভাবে সে পৃথিবীতে পতিত হয়েও পূর্বজন্মের স্মৃতি হারায়নি। সে ভৃগুকে প্রসন্ন করে বলল—‘প্রভু! আমার উপর পতিত অভিশাপের অবসান হোক।’ তখন অগস্ত্য করুণায় বিগলিত হয়ে অভিশাপ-সমাপ্তির জন্য ভৃগুর কাছে গেলেন; আর দয়াপরায়ণ ভৃগু কৃপা করে অভিশাপের অন্তের বিধান স্থির করলেন।”

Verse 30

भूगुरुवाच राजा युधिष्ठिरो नाम भविष्यति कुलोद्वह: । सत्वां मोक्षयिता शापादित्युक्त्वान्तरधीयत

ভৃগু বললেন—রাজন! তোমার বংশে যুধিষ্ঠির নামে এক রাজা জন্ম নেবে, বংশের শ্রেষ্ঠ ধারক। সেই তোমাকে এই শাপ থেকে মুক্ত করবে। এ কথা বলে ভৃগু অদৃশ্য হয়ে গেলেন।

Verse 31

अगस्त्योडपि महातेजा: कृत्वा कार्य शतक्रतो: । स्वमाश्रमपदं प्रायात्‌ पूज्यमानो द्विजातिभि:,महातेजस्वी अगस्त्य भी शतक्रतु इन्द्रका कार्य सिद्ध करके द्विजातियोंसे पूजित होकर अपने आश्रमको चले गये

মহাতেজস্বী অগস্ত্যও শতক্রতু ইন্দ্রের কার্য সম্পন্ন করে, দ্বিজাতিদের দ্বারা পূজিত হয়ে, নিজ আশ্রমে প্রত্যাবর্তন করলেন।

Verse 32

नहुषो<पि त्वया राजंस्तस्माच्छापात्‌ समुद्धृतः । जगाम ब्रह्मभवनं पश्यतस्ते जनाधिप,राजन! तुमने भी नहुषका उस शापसे उद्धार कर दिया। नरेश्वर! वे तुम्हारे देखते-देखते ब्रह्मतोकको चले गये

রাজন! তুমিও নহুষকে সেই শাপ থেকে উদ্ধার করেছ। হে জনাধিপ, তোমার চোখের সামনেই সে ব্রহ্মলোকের দিকে প্রস্থান করল।

Verse 33

तदा स पातयित्वा त॑ नहुषं भूतले भगुः । जगाम ब्रद्म॒भवनं ब्रह्मणे च न्यवेदयत्‌,भूगु उस समय नहुषको पृथ्वीपर गिराकर ब्रह्माजीके धाममें गये और उनसे उन्होंने यह सब समाचार निवेदन किया

তখন ভৃগু নহুষকে ভূমিতে পতিত করে ব্রহ্মার ধামে গেলেন এবং সমস্ত বিষয় ব্রহ্মাকে নিবেদন করলেন।

Verse 34

तत: शक्रं समानाय्य देवानाह पितामह: । वरदानान्मम सुरा नहुषो राज्यमाप्तवान्‌

তারপর পিতামহ ব্রহ্মা শক্র (ইন্দ্র)কে ডেকে দেবতাদের বললেন—হে সুরগণ! আমার প্রদত্ত বরদানের ফলে নহুষ রাজ্যাধিকার লাভ করেছে।

Verse 35

स चागस्त्येन क्रुद्धेन भ्रंशितो भूतलं गत: । तब पितामह ब्रह्माने इन्द्र तथा अन्य देवताओंको बुलवाकर उनसे कहा--'देवगण! मेरे वरदानसे नहुषने राज्य प्राप्त किया था। परंतु कुपित हुए अगस्त्यने उन्हें स्वर्गसे नीचे गिरा दिया। अब वे पृथ्वीपर चले गये ।।

ভীষ্ম বললেন—ক্রুদ্ধ ঋষি অগস্ত্য তাকে স্বর্গ থেকে পতিত করে ভূতলে নিক্ষেপ করলেন; সে পৃথিবীতে এসে পড়ল। তখন পিতামহ ব্রহ্মা ইন্দ্রসহ অন্যান্য দেবতাকে আহ্বান করে বললেন—‘দেবগণ! আমার বরদানে নহুষ রাজ্য লাভ করেছিল; কিন্তু ক্রুদ্ধ অগস্ত্য তাকে স্বর্গ থেকে নীচে ফেলে দিয়েছেন, এখন সে পৃথিবীতে গিয়েছে। রাজা ব্যতীত দেবতাদের পক্ষে কোথাও শাসন-ব্যবস্থা রক্ষা করা সম্ভব নয়।’

Verse 36

एवं सम्भाषमाणं तु देवा: पार्थ पितामहम्‌

হে পার্থ! পিতামহ যখন এভাবে ভাষণ দিচ্ছিলেন, তখন দেবগণ তাঁর বাক্য মনোযোগ দিয়ে শ্রবণ করছিলেন।

Verse 37

सो5भिषिक्तो भगवता देवराज्ये च वासव:

এইভাবে ভগবানের দ্বারা অভিষিক্ত বাসব (ইন্দ্র) দেবরাজ্যে প্রতিষ্ঠিত হলেন।

Verse 38

एवमेतत्‌ पुरावृत्तं नहुषस्य व्यतिक्रमात्‌

নহুষের সীমালঙ্ঘনের ফলেই এই প্রাচীন ঘটনা এভাবেই ঘটেছিল।

Verse 39

तस्माद्‌ दीपा: प्रदातव्या: सायं वै गृहमेधिभि:

অতএব গৃহস্থদের উচিত সন্ধ্যাবেলায় অবশ্যই প্রদীপ দান করা।

Verse 40

पूर्णचन्द्रप्रतिकाशा दीपदाश्व॒ भवन्त्युत

ভীষ্ম বললেন—প্রদীপ দানকারী মানুষ পূর্ণচন্দ্রের ন্যায় দীপ্তিমান হয়। প্রদীপদানকারী নিশ্চিতই চন্দ্রসম জ্যোতি লাভ করে। যতক্ষণ প্রদীপ জ্বলে—চোখের পলক পড়া পর্যন্ত যত মুহূর্ত—তত বছর ধরে সেই দাতা রূপবান ও বলবান হয়।

Verse 41

यावदक्षिनिमेषाणि ज्वलन्ते तावती: समा: । रूपवान्‌ बलवांश्वापि नरो भवति दीपद:

যতক্ষণ—চোখের নিমেষমাত্র—প্রদীপ জ্বলে, তত বছর ধরে প্রদীপদানকারী মানুষ রূপবান ও বলবান হয়।

Verse 100

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अगस्त्य भूगुसंवादो नाम शततमो<ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে ‘অগস্ত্য-ভৃগু সংলাপ’ নামে শততম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 226

अगस्त्यस्य तदा क्रुद्धो वामेनाभ्यहनच्छिर: । भारत! राजा नहुषने चाबुक मारकर हाँकना आरम्भ किया तो भी उन धर्मात्मा मुनिको क्रोध नहीं आया। तब कुपित हुए देवराजने महात्मा अगस्त्यके सिरपर बायें पैरसे प्रहार किया

ভীষ্ম বললেন—তখন ক্রুদ্ধ হয়ে সে মহাত্মা অগস্ত্যের মস্তকে বাম পা দিয়ে আঘাত করল। হে ভারতবংশীয়! রাজা নহুষ যখন ধর্মাত্মা মুনিদের চাবুক মেরে তাড়াতে শুরু করল, তবু সেই পবিত্র ঋষিগণ ক্রুদ্ধ হলেন না; কিন্তু দেবরাজ ক্রোধে উন্মত্ত হয়ে মহাত্মা অগস্ত্যের মাথায় বাম পায়ে আঘাত করল।

Verse 253

अदृष्टेनाथ भुगुणा भूतले भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! भूगु नहुषको दिखायी नहीं दे रहे थे। उनके इस प्रकार शाप देनेपर नहुष सर्प होकर पृथ्वीपर गिरने लगे

ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! ভৃগু মুনি যখন আর পৃথিবীতে দৃশ্যমান ছিলেন না এবং তাঁর শাপে নহুষ সাপ হয়ে ভূমিতে পতিত হল, তখন (দেবতারা বললেন)—“অতএব শক্রকে পুনরায় দেবরাজ্যে অভিষিক্ত করা হোক। কারণ রাজা ছাড়া কোথাও শৃঙ্খলিত জীবন টেকে না; সুতরাং পূর্ব ইন্দ্রকেই আবার দেবলোকের অধিপতি পদে প্রতিষ্ঠিত করো।”

Verse 263

न च शक्तो5भविष्यद्‌ वै पातने तस्य तेजसा । पृथ्वीनाथ! यदि नहुष भूगुको देख लेते तो उनके तेजसे प्रतिहत होकर वे उन्हें स्वर्गसे नीचे गिरानेमें समर्थ न होते

ভীষ্ম বললেন—হে পৃথিবীনাথ! নহুষ যদি ভৃগুকে না দেখত, তবে ভৃগুর তেজে প্রতিহত হয়ে সে তাকে স্বর্গ থেকে নীচে নিক্ষেপ করতে সক্ষম হত না। সত্য তপস্যার তেজ অহংকার ও অন্যায় বলকে সংযত করে এবং অধর্মের শক্তিকে নিষ্ফল করে ধর্মকে রক্ষা করে।

Verse 363

एवमस्त्विति संद्ृष्टा: प्रत्यूचुस्तं नराधिप । कुन्तीनंदन! नरेश्वर! पितामह ब्रह्माका यह कथन सुनकर सब देवता हर्षसे खिल उठे और बोले--'भगवन्‌! ऐसा ही हो”

ভীষ্ম বললেন—হে নরাধিপ, হে কুন্তীনন্দন, হে নরেশ্বর! ‘এমনই হোক’—এই বলে তারা সম্মতিসূচক দৃষ্টিতে তাকিয়ে তাকে উত্তর দিল। পিতামহ ও ব্রহ্মার সেই বাক্য শুনে সকল দেবতা আনন্দে প্রস্ফুটিত হয়ে উঠল এবং বলল—‘ভগবন্! তেমনই হোক।’

Verse 373

ब्रह्मणा राजशार्दूल यथापूर्व व्यरोचत । राजसिंह! भगवान्‌ ब्रह्माके द्वारा देवरराजके पदपर अभिषिक्त हो शतक्रतु इन्द्र फिर पूर्ववत्‌ शोभा पाने लगे

ভীষ্ম বললেন—হে রাজশার্দূল! সে পূর্বের মতোই আবার দীপ্তিমান হল। হে রাজসিংহ! ভগবান ব্রহ্মা যখন তাকে দেবরাজের পদে অভিষিক্ত করলেন, তখন শতক্রতু ইন্দ্র পুনরায় তার পূর্বতন শোভা ফিরে পেল।

Verse 383

सच तैरेव संसिद्धों नहुष: कर्मभि: पुनः । इस प्रकार पूर्वकालमें नहुषके अपराधसे ऐसी घटना घटी कि वे नहुष बार-बार दीपदान आदि पुण्यकर्मोंसे सिद्धिको प्राप्त हुए थे

ভীষ্ম বললেন—এইভাবে সেইসব পুণ্যকর্মের দ্বারাই নহুষ আবার সিদ্ধি লাভ করল। প্রাচীন কালে নহুষের অপরাধের কারণে এমন ঘটনা ঘটেছিল; তবু দীপদান প্রভৃতি পুণ্যকর্ম বারবার করে সে পুনঃপুনঃ শুভ সিদ্ধি অর্জন করত।

Verse 396

दिव्यं चक्षुरवाप्नोति प्रेत्य दीपस्प दायक: । इसलिये गृहस्थोंको सायंकालमें अवश्य दीपदान करने चाहिये। दीपदान करनेवाला पुरुष परलोकमें दिव्य नेत्र प्राप्त करता है

ভীষ্ম বললেন—দীপদানকারী ব্যক্তি মৃত্যুর পরে দিব্য দৃষ্টি লাভ করে। অতএব গৃহস্থদের সন্ধ্যাকালে অবশ্যই দীপদান করা উচিত; দীপ দানকারী পরলোকে দিব্য চক্ষু পায়।

Frequently Asked Questions

The narrative frames his failure as a compound breach: neglect of established ritual disciplines (dhūpa/dīpa/bali/namaskāra) alongside an abuse of authority toward a sage (striking Agastya), producing a moral and cosmic backlash.

Everyday, rule-bound household observances—performed with respect—are presented as stabilizing forces for prosperity and legitimacy; conversely, arrogance and discontinuity in practice undermine both ritual order and personal standing.

Yes. The chapter explicitly commends evening lamp-giving (dīpa-dāna), stating post-mortem attainment of ‘divine sight’ and associating the lamp’s burning duration with extended merit, alongside worldly benefits such as beauty and wealth.