
Svargārohaṇa-parva Adhyāya 2 — Yudhiṣṭhira’s Inquiry for His Kin and the Vision of a Punitive Realm
Upa-parva: Naraka-darśana (Yudhiṣṭhira’s Descent and Inquiry Episode)
This chapter opens with Yudhiṣṭhira addressing the devas, stating that he does not see Rādheya (Karṇa) nor his brothers and other eminent allies who fell in the war for his sake. He declares that a heaven without them is not ‘his’ heaven, and requests to see them. The devas consent and appoint a divine messenger. Yudhiṣṭhira follows the messenger along a dark, difficult path characterized by foul odors and vivid descriptions of a punitive environment: rivers of hot water, an asipatravana (razor-leaf forest), heated sands and iron stones, boiling oil cauldrons, thorny kūṭaśālmalī trees, and scenes of torment. Overwhelmed, he asks how far they must go and where his brothers are. The messenger indicates the limit of his escort and invites Yudhiṣṭhira to return if fatigued. As Yudhiṣṭhira turns back, he hears afflicted voices requesting him to remain briefly, saying that a purifying breeze follows him and grants them relief. He asks who they are; the voices identify themselves as Karṇa, Bhīma, Arjuna, the twins, Dhṛṣṭadyumna, Draupadī, and the Draupadeyas. Yudhiṣṭhira reflects on the apparent contradiction of their presence there, questions karmic causality and the status of Suyodhana elsewhere, and experiences anger, censuring the devas and dharma as he understands it. He then tells the messenger to return and report that he will not go back, since his presence brings comfort to his kin; the messenger conveys this intent to Indra.
Chapter Arc: स्वर्ग के द्वार पर पहुँचा युधिष्ठिर देवताओं से कह उठता है—“नेह पश्यामि विबुधाः…”—मुझे यहाँ वे नहीं दिखते जिनके बिना स्वर्ग भी सूना है; मेरे भाई, पाञ्चाली, और वे राजर्षि कहाँ हैं जो मेरे कारण रण में गिरे? → देवगण उसे स्मरण कराते हैं कि जिन महारथियों ने ‘रणवल्नल’ में देह की आहुति दी, उन्होंने लोक जीता; पर युधिष्ठिर का मन स्वर्ग-वैभव में नहीं टिकता—वह पाञ्चाली और भीम को देखने की जिद करता है और स्पष्ट कह देता है कि उनके बिना वह यहाँ नहीं रहेगा। → देवदूत उसे नरक-दर्शन कराता है: कटे अंग, रक्त-मेद, दुर्गन्ध, करुण क्रन्दन—और वहीं वे पीड़ित प्राणी युधिष्ठिर की उपस्थिति से क्षणिक शान्ति पाते हैं; उनकी दीन वाणी सुनकर दयावान राजा ठिठक जाता है और निर्णय करता है कि वह उन्हें छोड़कर नहीं जाएगा। → युधिष्ठिर देवदूत से कहलवाता है—“न हाहं तत्र यास्यामि स्थितोऽस्मीति निवेद्यताम्”—मैं यहीं रहूँगा; मेरे आश्रय से ये (और मेरे भाई) सुखी हों—यह संदेश इन्द्र तक पहुँचा दिया जाए। → देवदूत इन्द्र के पास जाकर युधिष्ठिर के निश्चय का निवेदन करता है—अब देवसभा क्या उत्तर देगी, और यह नरक-दर्शन किस सत्य की परीक्षा है?
Verse 1
औपनआक्राा बछ। आर: 2 द्वितीयो&्ध्याय: युधिष्ठिरको नरकका दर्शन कराना तथा करुण-क्रन्दन सुनकर उनका वहीं रहनेका निक्षय करना युधिछिर उवाच नेह पश्यामि विबुधा राधेयममितौजसम् | भ्रातरौ च महात्मानौ युधामन्यूत्तमौजसौ,युधिष्ठिरने पूछा--देवताओ! मैं यहाँ अमित-तेजस्वी राधानन्दन कर्णको क्यों नहीं देख रहा हूँ? दोनों भाई महामनस्वी युधामन्यु और उत्तमौजा कहाँ हैं? वे भी नहीं दिखायी देते
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—হে দেবগণ! মই ইয়াত অমিত পৰাক্ৰমী ৰাধেয় (কৰ্ণ)ক দেখা নাপাওঁ। আৰু সেই দুজন মহাত্মা ভ্ৰাতা—যুধামন্যু আৰু উত্তমৌজা—ক’ত? তেওঁলোকো দেখা নাযায়।
Verse 2
जुह॒वुर्ये शरीराणि रणवल्नलौ महारथा: । राजानो राजपुत्राश्न ये मदर्थे हता रणे,जिन महारथियोंने समराग्निमें अपने शरीरोंकी आहुति दे दी, जो राजा और राजकुमार रणभूमिमें मेरे लिये मारे गये वे सिंहके समान पराक्रमी समस्त महारथी वीर कहाँ हैं? क्या उन पुरुषप्रवर वीरोंने भी इस स्वर्गलोकपर विजय पायी है? इति श्रीमहाभारते स्वर्गारोहणपर्वणि युधिष्ठटिरनरकदर्शने द्वितीयो5ध्याय:
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—সিংহসম বীৰসকল ক’ত, যিসকলে ৰণাগ্নিত নিজৰ দেহ আহুতি দিছিল? মোৰ কাৰণে ৰণভূমিত নিহত হোৱা সেই ৰজা আৰু ৰাজপুত্ৰসকল ক’ত? সেই পুৰুষশ্ৰেষ্ঠ বীৰসকলেও কি এই স্বৰ্গলোকত বিজয় লাভ কৰিছে?
Verse 3
क्व ते महारथा: सर्वे शार्ट्लसमविक्रमा: । तैरप्ययं जितो लोक: कच्चित् पुरुषसत्तमै:,जिन महारथियोंने समराग्निमें अपने शरीरोंकी आहुति दे दी, जो राजा और राजकुमार रणभूमिमें मेरे लिये मारे गये वे सिंहके समान पराक्रमी समस्त महारथी वीर कहाँ हैं? क्या उन पुरुषप्रवर वीरोंने भी इस स्वर्गलोकपर विजय पायी है?
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—ব্যাঘ্ৰসম বিক্ৰমশালী সেই সকলো মহাৰথী এতিয়া ক’ত? যিসকলে ৰণাগ্নিত নিজৰ দেহ আহুতি দিছিল, সেই পুৰুষশ্ৰেষ্ঠসকলেও কি এই স্বৰ্গলোক জয় কৰিছে?
Verse 4
यदि लोकानिमान_ प्राप्तास्ते च सर्वे महारथा: । स्थितं वित्त हि मां देवा: सहित तैर्महात्मभि:
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—যদি সেই সকলো মহাৰথী এই লোকসমূহ প্ৰাপ্ত কৰিছে আৰু যদি তেওঁলোক সকলোৱে ইয়াতেই আছে, তেন্তে নিশ্চিত জানিবা—দেৱতাসকলে মোকো সেই মহাত্মাসকলৰ সৈতে একেলগে ইয়াত স্থাপন কৰিছে।
Verse 5
देवताओ! यदि वे सम्पूर्ण महारथी इन लोकोंमें आये हैं तो आप समझ लें कि मैं उन महात्माओंके साथ रहूँगा ।। कच्चिन्न तैरवाप्तो<5यं नृपैलोको$क्षय: शुभ: । न तैरहं विना रंस्ये भ्रातृभिज्ञातिभिस्तथा,परंतु यदि उन नरेशोंने यह शुभ एवं अक्षयलोक नहीं प्राप्त किया है तो मैं उन जाति- भाइयोंके बिना यहाँ नहीं रहूँगा
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—হে দেৱসকল! যদি সেই সমগ্ৰ মহাৰথী এই লোকসমূহলৈ আহিছে, তেন্তে জানিবা—মই সেই মহাত্মাসকলৰ সৈতে একেলগে থাকিম। কিন্তু যদি সেই ৰজাসকলে এই শুভ আৰু অক্ষয় লোক লাভ নকৰিলে, তেন্তে মই তেওঁলোকৰ বিনা—মোৰ ভ্ৰাতৃসকল আৰু জ্ঞাতিবন্ধুসকলৰ বিনা—ইয়াত আনন্দ নকৰিম।
Verse 6
मातुर्हि वचन श्रुव्वा तदा सलिलकर्मणि । कर्णस्य क्रियतां तोयमिति तप्यामि तेन वै
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—সালিলকৰ্ম (তৰ্পণ) সময়ত মাতাৰ বাক্য শুনি মই এই কথাটোৱেই লৈ দগ্ধ হৈ আছোঁ—‘কৰ্ণৰ বাবেও জল অৰ্পণ কৰা হওক।’
Verse 7
युद्धके बाद जब मैं अपने मृत सम्बन्धियोंको जलाञज्जलि दे रहा था उस समय मेरी माता कुन्तीने कहा था--“बेटा! कर्णको भी जलाञ्जलि देना।” माताकी यह बात सुनकर मुझे मालूम हुआ कि महात्मा कर्ण मेरे ही भाई थे। तबसे मुझे उनके लिये बड़ा दुःख होता है ।। इदं च परितप्यामि पुन: पुनरहं सुरा: । यन्मातु: सदृशौ पादौ तस्याहममितात्मन:,देवताओ! यह सोचकर तो मैं और भी पश्चात्ताप करता रहता हूँ कि “महामना कर्णके दोनों चरणोंको माता कुन्तीके चरणोंके समान देखकर भी मैं क्यों नहीं शत्रुदलमर्दन कर्णका अनुगामी हो गया?” यदि कर्ण हमारे साथ होते तो हमें इन्द्र भी युद्धमें परास्त नहीं कर सकते
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—যুদ্ধৰ পাছত যেতিয়া মই মোৰ মৃত আত্মীয়-স্বজনসকলৰ উদ্দেশে জলাঞ্জলি দিছিলোঁ, তেতিয়া মোৰ মাতা কুন্তীয়ে মোক ক’লে—“বেটা! কৰ্ণকো জলাঞ্জলি দিয়া।” এই কথা শুনি মই জানিলোঁ যে মহাত্মা কৰ্ণ মোৰেই সহোদৰ ভ্ৰাতা। সেই মুহূৰ্তৰ পৰা তেওঁৰ বাবে গভীৰ শোক মোৰ অন্তৰত গধুৰ হৈ ৰ’ল। হে দেৱসকল! এই চিন্তাত মই পুনঃ পুনঃ অনুতাপে দগ্ধ হওঁ—যাৰ অমিতাত্মা মহামনাৰ পদযুগল মই মোৰ মাতা কুন্তীৰ পদযুগলৰ সদৃশ দেখিছিলোঁ, তথাপি মই কিয় শত্রুদল-মৰ্দনকাৰী কৰ্ণৰ অনুগামী নহ’লোঁ? কৰ্ণ যদি আমাৰ পক্ষত থাকিলেহেঁতেন, তেন্তে যুদ্ধত ইন্দ্ৰেও আমাক পৰাজিত কৰিব নোৱাৰিলেহেঁতেন।
Verse 8
दृष्टवैव तौ नानुगतः कर्ण परबलार्दनम् | न हस्मान् कर्णसहितान् जयेच्छक्रोडपि संयुगे,देवताओ! यह सोचकर तो मैं और भी पश्चात्ताप करता रहता हूँ कि “महामना कर्णके दोनों चरणोंको माता कुन्तीके चरणोंके समान देखकर भी मैं क्यों नहीं शत्रुदलमर्दन कर्णका अनुगामी हो गया?” यदि कर्ण हमारे साथ होते तो हमें इन्द्र भी युद्धमें परास्त नहीं कर सकते
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—মাতা কুন্তীৰ পদযুগলৰ সদৃশ সেই দুটা পদ দেখিও মই কিয় পৰবলাৰ্দন, শত্রুদল-মৰ্দনকাৰী কৰ্ণৰ অনুগামী নহ’লোঁ? এই ভাবনাই মোৰ শোক আৰু অনুতাপক অধিক বৃদ্ধি কৰে। কৰ্ণ যদি আমাৰ সৈতে থাকিলেহেঁতেন, তেন্তে যুদ্ধত শক্ৰ (ইন্দ্ৰ)ও আমাক জয় কৰিব নোৱাৰিলেহেঁতেন।
Verse 9
तमहं यत्र तत्रस्थं द्रष्टमिच्छामि सूर्यजम् । अविज्ञातो मया योडसौ घातित: सव्यसाचिना,ये सूर्यनन्दन कर्ण जहाँ कहीं भी हों मैं उनका दर्शन करना चाहता हूँ; जिन्हें न जाननेके कारण मैंने अर्जुनद्वारा उनका वध करवा दिया
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—সূৰ্যপুত্ৰ কৰ্ণ য’তেই থাকক, মই তেওঁক দৰ্শন কৰিব বিচাৰোঁ। তেওঁক চিনিব নোৱাৰাৰ বাবেই মই অৰ্জুনৰ হাতেদি তেওঁৰ বধ ঘটালোঁ।
Verse 10
भीमं च भीमविक्रान्तं प्राणेभ्योडपि प्रियं मम । अर्जुन चेन्द्रसंकाशं यमौ चैव यमोपमौ,मैं अपने प्राणोंसे भी प्रियतम भयंकर पराक्रमी भाई भीमसेनको, इन्द्रतुल्य तेजस्वी अर्जुनको, यमराजके समान अजेय नकुल-सहदेवको तथा धर्मपरायणा देवी द्रौपदीको भी देखना चाहता हूँ। यहाँ रहनेकी मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है। मैं आप लोगोंसे यह सच्ची बात कहता हूँ
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—মই ভীমক—ভয়ংকৰ পৰাক্ৰমী, মোৰ প্ৰাণতকৈও প্ৰিয়—দেখিব বিচাৰোঁ; ইন্দ্ৰসম দীপ্তিমান অৰ্জুনক দেখিব বিচাৰোঁ; আৰু যমসম অজেয় যমজ ভ্ৰাতা নকুল-সহদেৱকো দেখিব বিচাৰোঁ। লগতে ধৰ্মপৰায়ণা দেৱী দ্ৰৌপদীকো দৰ্শন কৰিব বিচাৰোঁ। ইয়াত থাকিবলৈ মোৰ একেবাৰে ইচ্ছা নাই; এই কথাই মই তোমালোকক সত্যকৈ ক’লোঁ।
Verse 11
द्रष्टमिच्छामि तां चाहं पाञज्चालीं धर्मचारिणीम् । न चेह स्थातुमिच्छामि सत्यमेवं ब्रवीमि व:,मैं अपने प्राणोंसे भी प्रियतम भयंकर पराक्रमी भाई भीमसेनको, इन्द्रतुल्य तेजस्वी अर्जुनको, यमराजके समान अजेय नकुल-सहदेवको तथा धर्मपरायणा देवी द्रौपदीको भी देखना चाहता हूँ। यहाँ रहनेकी मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है। मैं आप लोगोंसे यह सच्ची बात कहता हूँ
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—মই সেই পাঞ্চালী, ধৰ্মাচাৰিণী দ্ৰৌপদীক দৰ্শন কৰিব বিচাৰোঁ। আৰু মই ইয়াত থাকিব নিবিচাৰোঁ। এই কথাই মই তোমালোকক সত্যকৈ ক’লোঁ।
Verse 12
कि मे भ्रातृविहीनस्य स्वर्गेण सुरसत्तमा: । यत्र ते मम स स्वर्गो नायं स्वर्गो मतो मम,सुरश्रेष्रणण! अपने भाइयोंसे अलग रहकर इस स्वर्गसे भी मुझे क्या लेना है? जहाँ मेरे भाई हैं वहीं मेरा स्वर्ग है। उनके बिना मैं इस लोकको स्वर्ग नहीं मानता
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—হে দেৱশ্ৰেষ্ঠসকল! ভ্ৰাতৃবিহীন হৈ এই স্বৰ্গ মোৰ কি কামৰ? য’ত মোৰ ভাইসকল আছে, সেয়াই মোৰ স্বৰ্গ; তেওঁলোক নাথাকিলে মই এই লোকক স্বৰ্গ বুলি নমানো।
Verse 13
देवा ऊचु यदि वै तत्र ते श्रद्धा गम्यतां पुत्र मा चिरम् । प्रिये हि तव वर्तामो देवराजस्य शासनात्,देवता बोले--वत्स! यदि उन लोगोंमें तुम्हारी श्रद्धा है तो चलो, विलम्ब न करो। हम लोग देवराजकी आज्ञासे सर्वथा तुम्हारा प्रिय करना चाहते हैं
দেৱতাসকলে ক’লে—বৎস! যদি তোমাৰ শ্ৰদ্ধা সঁচাকৈ তেওঁলোকৰ প্ৰতিই থাকে, তেন্তে আহা—বিলম্ব নকৰিবা। দেৱৰাজৰ আদেশ অনুসাৰে আমি তোমাৰ প্ৰিয় সাধন কৰোঁ।
Verse 14
वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा त॑ ततो देवा देवदूतमुपादिशन् । युधिष्ठटिरस्य सुहृदो दर्शयेति परंतप,वैशम्पायनजी कहते हैं--शत्रुओंको संताप देनेवाले जनमेजय! युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर देवताओंने देवदूतको आज्ञा दी--'तुम युधिष्ठिरको इनके सुहृदोंका दर्शन कराओ'
বৈশম্পায়নে ক’লে—হে পৰন্তপ জনমেজয়! এইদৰে কৈ দেৱতাসকলে দেৱদূতক আদেশ দিলে—“যুধিষ্ঠিৰক তাৰ সুহৃদসকলৰ দৰ্শন কৰোৱা।”
Verse 15
ततः कुन्तीसुतो राजा देवदूतश्न जग्मतुः । सहितौ राजशार्दूल यत्र ते पुरुषर्षभा:,नृपश्रेष्ठ! तब कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर और देवदूत दोनों साथ-साथ उस स्थानकी ओर चले जहाँ वे पुरुषप्रवर भीमसेन आदि थे
তাৰ পিছত কুন্তীপুত্ৰ ৰজা যুধিষ্ঠিৰ দেৱদূতৰ সৈতে একেলগে, হে ৰাজশাৰ্দূল! সেই ঠাইলৈ গ’ল য’ত সেই পুৰুষশ্ৰেষ্ঠ—ভীমসেন আদি—আছিল।
Verse 16
अग्रतो देवदूतश्न ययौ राजा च पृष्ठतः । पन्थानमशुभं दुर्ग सेवितं पापकर्मभि:,आगे-आगे देवदूत जा रहा था और पीछे-पीछे राजा युधिष्छिर। दोनों ऐसे दुर्गम मार्गपर जा पहुँचे जो बहुत ही अशुभ था। पापाचारी मनुष्य ही यातना भोगनेके लिये उसपर आते- जाते थे
বৈশম্পায়নে ক’লে—দেৱদূত আগতে গ’ল, আৰু ৰজা পিছফালে অনুসৰণ কৰিলে। তেওঁলোকে এক অশুভ, দুৰ্গম পথত উপস্থিত হ’ল; পাপকর্মী লোকসকলে যাতনা ভোগ কৰিবলৈ সেই পথেদি অহা-যোৱা কৰিছিল।
Verse 17
तमसा संवृतं घोरं केशशैवलशाद्वलम् । युक्त पापकृतां गन्धैर्मासशोणितकर्दमम्,वहाँ घोर अन्धकार छा रहा था। केश, सेवार और घास इन्हींसे वह मार्ग भरा हुआ था। वह पापियोंके ही योग्य था। वहाँ दुर्गन्ध फैल रही थी। मांस और रक्तकी कीच जमी हुई थी
Vaiśampāyana said: The path was shrouded in dreadful darkness, strewn with hair, slime-like growth, and grass. It was fit only for evildoers, reeking with foul odors, and caked with mire of flesh and blood—an image of moral ruin made visible as a landscape.
Verse 18
दंशोत्पातकभल्लूकमक्षिकामशकावृतम् । इतश्रेतश्व कुणपै: समन्तात् परिवारितम्,उस रास्तेपर डाँस, मच्छर, मक्खी, उत्पाती जीवजन्तु और भालू आदि फैले हुए थे। इधर-उधर सब ओर सड़े मुर्दे पड़े हुए थे
Vaiśampāyana said: The path was covered with gadflies and other stinging pests, with ominous creatures and bears; it was swarmed by flies and mosquitoes. Here and there, on every side, it was hemmed in by rotting corpses—an image of the moral wreckage left by violence, confronting the travelers with the grim aftermath of adharma and the impermanence of embodied life.
Verse 19
अस्थिकेशसमाकीर्ण कृमिकीटसमाकुलम् । ज्वलनेन प्रदीप्तेन समन्तात् परिवेष्टितम्,हड्डियाँ और केश चारों ओर फैले हुए थे। कृमि और कीटोंसे वह मार्ग भरा हुआ था। उसे चारों ओरसे जलती आगने घेर रखा था
Vaiśampāyana said: The path was strewn everywhere with bones and hair, swarming with worms and insects, and on all sides it was encircled by blazing fire—an image of the dreadful consequences that attend the soul’s passage when it confronts the residues of violence and suffering.
Verse 20
अयोमुखैश्न काकाद्यर्गुप्रैश्ष समभिद्रुतम् । सूचीमुखैस्तथा प्रेतैर्विन्ध्यशैलोपमैर्वृतम्,लोहेकी-सी चोंचवाले कौए और गीध आदि पक्षी मँडरा रहे थे। सूईके समान चुभते हुए मुखोंवाले और विन्ध्यपर्ववके समान विशालकाय प्रेत वहाँ सब ओर घूम रहे थे
Vaiśampāyana said: That place was swarmed by iron-beaked birds—crows and the like, and vultures. It was also surrounded by spirits with needle-like, piercing mouths, huge as the Vindhya mountains, roaming on every side—an image of the grim consequences that follow violence and moral collapse.
Verse 21
मेदोरुधिरयुक्तैश्व च्छिन्ननाहूरुपाणिभि: । निकृत्तोदरपादैश्व तत्र तत्र प्रवेरिते:
Verse 22
वहाँ यत्र-तत्र बहुत-से मुर्दे बिखरे पड़े थे, उनमेंसे किसीके शरीरसे रुधिर और मेद बहते थे, किसीके बाहु, ऊरु, पेट और हाथ-पैर कट गये थे ।। स तत्कुणपतदुर्गन्धमशिवं लोमहर्षणम् । जगाम राजा धर्मात्मा मध्ये बहु विचिन्तयन्,धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर मन-ही-मन बहुत चिन्ता करते हुए उसी मार्गके बीचसे होकर निकले जहाँ सड़े मुदोंकी बदबू फैल रही थी और अमंगलकारी बीभत्स दृश्य दिखायी देता था। वह भयंकर मार्ग रोंगटे खड़े कर देनेवाला था
বৈশম্পায়নে ক’লে—ধৰ্মাত্মা ৰজা যুধিষ্ঠিৰ সেই পথৰ মাজেদিয়েই আগবাঢ়িল; পচা মৃতদেহৰ দুৰ্গন্ধে পথ ভৰি আছিল, দৃশ্য অশুভ আৰু ৰোমহর্ষক। অন্তৰত বহু চিন্তা ঘূৰাই তেওঁ সেই ভয়ংকৰ পথ অতিক্ৰম কৰিলে।
Verse 23
ददर्शोष्णोदकै: पूर्णा नदीं चापि सुदुर्गमाम् । असिपत्रवनं चैव निशितं क्षुरसंवृतम्,आगे जाकर उन्होंने देखा, खौलते हुए पानीसे भरी हुई एक नदी बह रही है, जिसके पार जाना बहुत ही कठिन है। दूसरी ओर तीखी तलवारों या छूरोंके-से पत्तोंसे परिपूर्ण तेज धारवाला असिपत्र नामक वन है
বৈশম্পায়নে ক’লে—তেওঁ উষ্ণ, ফুটন্ত পানীৰে পূৰ্ণ এক নদী দেখিলে, যাক পাৰ হোৱাটো অতি দুৰ্গম; আৰু ‘অসিপত্ৰবন’ নামৰ বনো দেখিলে—ক্ষুৰৰ দৰে তীক্ষ্ণ পাতৰে আৱৃত।
Verse 24
करम्भवालुकास्तप्ता आयसीश्व शिला:पृथक् । लोहकुम्भी श्व॒ तैलस्य क्वाथ्यमाना: समन्ततः,कहीं गरम-गरम बालू बिछी है तो कहीं तपाये हुए लोहेकी बड़ी-बड़ी चट्टानें रखी गयी हैं। चारों ओर लोहेके कलशोंमें तेल खौलाया जा रहा है
বৈশম্পায়নে ক’লে—কিছুমান ঠাইত কৰম্ভ-মিশ্ৰিত বালি দগ্ধ হৈ পৰি আছিল, কিছুমান ঠাইত পৃথক পৃথক গৰম কৰা লোহাৰ শিলা; আৰু চাৰিওফালে লোহাৰ কুম্ভত তেল ফুটাই থোৱা হৈছিল।
Verse 25
कूटशाल्मलिकं चापि दुःस्पर्श तीक्ष्णकण्टकम् । ददर्श चापि कौन्तेयो यातना: पापकर्मिणाम्,जहाँ-तहाँ पैने काँटोंसे भरे हुए सेमलके वृक्ष हैं, जिनको हाथसे छूना भी कठिन है। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने यह भी देखा कि वहाँ पापाचारी जीवोंको बड़ी कठोर यातनाएँ दी जा रही हैं
বৈশম্পায়নে ক’লে—কৌন্তেয়নে কূট-শাল্মলী গছো দেখিলে, যিবোৰ স্পৰ্শ কৰাই দুষ্কৰ আৰু তীক্ষ্ণ কাঁটাৰে ভৰা; লগতে তাত পাপকর্মীসকলক দিয়া কঠোৰ যাতনাও তেওঁ দেখিলে।
Verse 26
देवदूतका युधिष्ठिरको मायामय नरकका दर्शन कराना स तं दुर्गन्धमालक्ष्य देवदूतमुवाच ह । कियदध्वानमस्माभिर्गन्तव्यमिममीदृशम्,वहाँकी दुर्गन्धका अनुभव करके उन्होंने देवदूतसे पूछा--“भैया! ऐसे रास्तेपर अभी हमलोगोंको कितनी दूर और चलना है? तथा मेरे वे भाई कहाँ हैं? यह तुम्हें मुझे बता देना चाहिये। देवताओंका यह कौन-सा देश है, इस बातको मैं जानना चाहता हूँ”
বৈশম্পায়নে ক’লে—সেই দুৰ্গন্ধ অনুভৱ কৰি যুধিষ্ঠিৰে দেৱদূতক ক’লে—“ভাই, এনেকুৱা পথত আমি আৰু কিমান দূৰ যাব লাগিব? আৰু মোৰ ভাইসকল ক’ত আছে? সেয়া মোক কোৱা উচিত। এইটো দেৱলোকৰ কোন অঞ্চল? মই জানিব বিচাৰোঁ।”
Verse 27
क्व च ते भ्रातरो महां तन्ममाख्यातुमर्हसि । देशो<यं कश्न देवानामेतदिच्छामि वेदितुम्,वहाँकी दुर्गन्धका अनुभव करके उन्होंने देवदूतसे पूछा--“भैया! ऐसे रास्तेपर अभी हमलोगोंको कितनी दूर और चलना है? तथा मेरे वे भाई कहाँ हैं? यह तुम्हें मुझे बता देना चाहिये। देवताओंका यह कौन-सा देश है, इस बातको मैं जानना चाहता हूँ”
“ভাই! এই পথত আমি আৰু কিমান দূৰ যাব লাগিব? আৰু মোৰ সেই ভাতৃসকল ক’ত আছে? এই কথা তুমি মোক নিশ্চয় ক’ব লাগিব। দেবতাসকলৰ এইটো কোন দেশ—সেয়া মই জানিব বিচাৰোঁ।”
Verse 28
स संनिववृते श्रुत्वा धर्मराजस्य भाषितम् | देवदूतो<ब्रवीच्चैनमेतावद् गमनं तव,धर्मराजकी यह बात सुनकर देवदूत लौट पड़ा और बोला--“बस, यहींतक आपको आना था
ধৰ্মৰাজৰ কথা শুনি দেবদূত ঘূৰি আহি ক’লে—“তোমাৰ যাত্ৰা এইখানলৈকে।”
Verse 29
निवर्तितव्यो हि मया तथास्म्युक्तो दिवौकसै: | यदि श्रान्तो$सि राजेन्द्र त्वमथागन्तुमरहसि,“महाराज! देवताओंने मुझसे कहा है कि जब युधिष्ठिर थक जायेँ तब उन्हें वापस लौटा लाना; अतः अब मुझे आपको लौटा ले चलना है। यदि आप थक गये हों तो मेरे साथ आइये”
“মহারাজ! দেবতাসকলে মোক আদেশ দিছে—যুধিষ্ঠিৰ ক্লান্ত হ’লে তেওঁক উভতাই আনিবলৈ। সেয়ে এতিয়া মই আপোনাক উভতাই লৈ যাব লাগিব। হে ৰাজেন্দ্ৰ, আপুনি যদি ক্লান্ত হয়, তেন্তে মোৰ সৈতে আহক।”
Verse 30
युधिष्ठिरस्तु निर्विण्णस्तेन गन्धेन मूर्च्छित: । निवर्तने धृतमना: पर्यावर्तत भारत,भरतनन्दन! युधिष्ठिर वहाँकी दुर्गन्न्धसे घबरा गये थे। उन्हें मूर्च्छा-सी आने लगी थी। इसलिये उन्होंने मनमें लौट जानेका ही निश्चय किया और उस निश्चयके अनुसार वे लौट पड़े
হে ভৰতনন্দন! সেই দুৰ্গন্ধত যুধিষ্ঠিৰ বিমৰ্ষ হৈ পৰিল; মূৰ্ছা আহিব যেন লাগিল। সেয়ে তেওঁ মনতে উভতি যোৱাৰ নिश्चয় কৰি, সেই নिश्चয় অনুসৰিয়েই উভতি গ’ল।
Verse 31
स संनिवृत्तो धर्मात्मा दुःखशोकसमाहत: । शुश्राव तत्र वदतां दीना वाच: समन्ततः,दुःख और शोकसे पीड़ित हुए धर्मात्मा युधिष्ठिर ज्यों ही वहाँसे लौटने लगे त्यों ही उन्हें चारों ओरसे पुकारनेवाले आर्त मनुष्योंकी दीन वाणी सुनायी पड़ी--
দুখ আৰু শোকে জৰ্জৰিত ধৰ্মাত্মা যুধিষ্ঠিৰ উভতি যাবলৈ ধৰোঁতেই, তাত চাৰিওফালৰ পৰা মাতি থকা আর্ত লোকসকলৰ দীন কণ্ঠস্বর তেওঁ শুনিলে।
Verse 32
भो भो धर्मज राजर्षे पुण्याभिजन पाण्डव | अनुग्रहार्थमस्माकं तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम्,हे धर्मनन्दन! हे राजर्षे! हे पवित्र कुलमें उत्पन्न पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर| आप हमलोगोंपर कृपा करनेके लिये दो घड़ीतक यहीं ठहरिये
বৈশম্পায়নে ক’লে— হে ধৰ্মৰাজ! হে ৰাজৰ্ষি! হে পুণ্য আৰু মহৎ বংশজাত পাণ্ডৱ! আমাৰ ওপৰত অনুগ্ৰহ কৰি অলপ সময়—এটা মুহূৰ্ত—ইয়াতে স্থিৰ হৈ থাকক।
Verse 33
आयाति वत्वयि दुर्धर्षे वाति पुण्य: समीरण: । तव गन्धानुगस्तात येनास्मान् सुखमागमत्,“आप दुर्धर्ष महापुरुषके आते ही परम पवित्र हवा चलने लगी है। तात! वह हवा आपके शरीरकी सुगन्ध लेकर आ रही है जिससे हमलोगोंको बड़ा सुख मिला है
বৈশম্পায়নে ক’লে— হে দুৰ্ধর্ষ! তোমাৰ আগমনে পৰম পবিত্ৰ বতাহ বলিবলৈ ধৰিছে। প্ৰিয়! সেই বতাহে তোমাৰ দেহৰ সুগন্ধ বহন কৰি আনে; তাতে আমাৰ মনত সান্ত্বনা আৰু আনন্দ জাগিছে।
Verse 34
ते वयं पार्थ दीर्घस्य कालस्य पुरुषर्षभ । सुखमासादयिष्यामस्त्वां दृष्टवा राजसत्तम,'पुरुषप्रवर! कुन्तीकुमार! नृपश्रेष्ठ) आज दीर्घकालके पश्चात् आपका दर्शन पाकर हम सुखका अनुभव करेंगे
বৈশম্পায়নে ক’লে— হে পাৰ্থ! হে পুৰুষশ্ৰেষ্ঠ! হে ৰাজসত্তম! দীঘলীয়া সময়ৰ পাছত আজি তোমাৰ দৰ্শনে আমি সুখ লাভ কৰিম।
Verse 35
संतिष्ठस्व महाबाहो मुहूर्तमपि भारत । त्वयि तिष्ठति कौरव्य यातनास्मान् न बाधते,“महाबाहु भरतनन्दन! हो सके तो दो घड़ी भी ठहर जाइये | कुरुनन्दन! आपके रहनेसे यहाँकी यातना हमें कष्ट नहीं दे रही है”
বৈশম্পায়নে ক’লে— হে মহাবাহু ভাৰত! এটা মুহূৰ্ত হলেও স্থিৰ থাকক। হে কৌৰব্য! তুমি ইয়াতে থাকিলে এই স্থানৰ যাতনা আমাক পীড়া নকৰে।
Verse 36
एवं बहुविधा वाच: कृपणा वेदनावताम् । तस्मिन् देशे स शुभ्राव समन्ताद् वदतां नृप,नरेश्वर! इस प्रकार वहाँ कष्ट पानेवाले दुखी प्राणियोंके भाँति-भाँतिके दीन वचन उस प्रदेशमें उन्हें चारों ओरसे सुनायी देने लगे
বৈশম্পায়নে ক’লে— হে নৰেশ্বৰ! এইদৰে সেই দেশত বেদনাৰে কাতৰ দীন প্ৰাণীৰ নানা ধৰণৰ কৰুণ আৰ্তনাদ তেওঁ চাৰিওফালৰ পৰা শুনিবলৈ ধৰিলে।
Verse 37
तेषां तु वचन श्रुत्वा दयावान् दीनभाषिणाम् | अहो कृच्छमिति प्राह तस्थौ स च युधिषछिर:,दीनतापूर्ण वचन कहनेवाले उन प्राणियोंकी बातें सुनकर दयालु राजा युधिष्ठिर वहाँ खड़े हो गये। उनके मुँहले सहसा निकल पड़ा--'अहो! इन बेचारोंको बड़ा कष्ट है!
দুখত কাতৰ হৈ কোৱা সেই প্ৰাণীবোৰৰ কৰুণ বাক্য শুনি দয়ালু যুধিষ্ঠিৰ তাতেই থমকি ৰ’ল। তেওঁৰ মুখৰ পৰা সহসাই ওলাই আহিল—“হায়! কিমান কঠিন কষ্ট!”
Verse 38
स ता गिर: पुरस्ताद वै श्रुतपूर्वा पुन: पुन: । ग्लानानां दुःखितानां च नाभ्यजानत पाण्डव:,महान् कष्ट और दु:खमें पड़े हुए प्राणियोंकी वे ही पहलेकी सुनी हुई करुणाजनक बातें सामनेकी ओरसे बारंबार उनके कानोंमें पड़ने लगीं तो भी वे पाण्डुकुमार उन्हें पहचान न सके
মহা কষ্ট আৰু দুখত পৰি থকা প্ৰাণীবোৰৰ সেই আগতে শুনা কৰুণ বাক্যবোৰ সন্মুখৰ পৰা বাৰে বাৰে তাৰ কাণত পৰি থাকিল; তথাপি পাণ্ডৱে তেওঁলোকক চিনিব নোৱাৰিলে।
Verse 39
अबुध्यमानस्ता वाचो धर्मपुत्रो युधिष्ठिर: । उवाच के भवन्तो वै किमर्थमिह तिष्ठथ,उनकी वे बातें पूर्णएरूपसे न समझकर धर्मपुत्र युधिष्ठिने पूछा--“आपलोग कौन हैं और किसलिये यहाँ रहते हैं?”
তেওঁলোকৰ কথা সম্পূৰ্ণ বুজি নাপাই ধৰ্মপুত্ৰ যুধিষ্ঠিৰে সুধিলে—“তোমালোক কোন? আৰু কিহৰ বাবে ইয়াত থিয় হৈ আছা?”
Verse 40
इत्युक्तास्ते ततः सर्वे समन््तादवभाषिरे | कर्णो5हं भीमसेनो5हमर्जुनो5हमिति प्रभो,उनके इस प्रकार पूछनेपर वे सब चारों ओरसे बोलने लगे--'प्रभो! मैं कर्ण हूँ। मैं भीमसेन हूँ। मैं अर्जुन हूँ। मैं नकुल हूँ। मैं सहदेव हूँ। मैं धृष्टद्युम्न हूँ। मैं द्रौपदी हूँ और हमलोग द्रौपदीके पुत्र हैं।! इस प्रकार वे सब लोग चिल्ला-चिल्लाकर अपना-अपना नाम बताने लगे
এনেদৰে সুধা মাত্ৰ তেওঁলোক সকলোৱে চাৰিওফালৰ পৰা চিঞৰি উঠিল—“প্ৰভো! মই কৰ্ণ, মই ভীমসেন, মই অৰ্জুন”—এইদৰে প্ৰত্যেকে নিজৰ পৰিচয় ঘোষণা কৰিবলৈ ধৰিলে।
Verse 41
नकुल: सहदेवोहं धृष्टद्युम्नो5हमित्युत । द्रौपदी द्रौपदेयाश्व इत्येवं ते विचुक्रुशु:ः,उनके इस प्रकार पूछनेपर वे सब चारों ओरसे बोलने लगे--'प्रभो! मैं कर्ण हूँ। मैं भीमसेन हूँ। मैं अर्जुन हूँ। मैं नकुल हूँ। मैं सहदेव हूँ। मैं धृष्टद्युम्न हूँ। मैं द्रौपदी हूँ और हमलोग द्रौपदीके पुत्र हैं।! इस प्रकार वे सब लोग चिल्ला-चिल्लाकर अपना-अपना नाम बताने लगे
কোনোৱে চিঞৰি ক’লে—“মই নকুল”, কোনোৱে—“মই সহদেৱ”, আৰু কোনোৱে—“মই ধৃষ্টদ্যুম্ন”; পুনৰ—“মই দ্ৰৌপদী” আৰু “আমি দ্ৰৌপদেয় (দ্ৰৌপদীৰ পুত্ৰ)”—এইদৰে তেওঁলোক সকলোৱে উচ্চস্বৰে চিঞৰি উঠিল।
Verse 42
ता वाच: स तदा श्रुत्वा तद्देशसदृशीर्नुप । ततो विममृशे राजा कि त्विदं दैवकारितम्,नरेश्वर! उस देशके अनुरूप उन बातोंको सुनकर राजा युधिष्ठिर मन-ही-मन विचार करने लगे कि दैव-का यह कैसा विधान है
সেই দেশৰ উপযুক্ত সেই বাক্য শুনি ৰজা যুধিষ্ঠিৰে মনতে ভাবিলে—“এয়া দেৱবিধিৰ কেনে বিধান?”
Verse 43
कि तु तत् कलुषं कर्म कृतमेभिमहात्मभि: । कर्णेन द्रौपदेयैर्वा पा्चाल्या वा सुमध्यया,“मेरे इन महामना भाइयोंने, कर्णने, द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंने अथवा स्वयं सुमध्यमा द्रौोपदीने भी कौन-सा ऐसा पाप किया था जिससे ये लोग इस दुर्गन्धपूर्ण भयंकर स्थानमें निवास करते हैं। इन समस्त पुण्यात्मा पुरुषोंने कभी कोई पाप किया था, इसे मैं नहीं जानता
কিন্তু এই মহাত্মাসকল—কৰ্ণ, দ্ৰৌপদীৰ পুত্ৰসকল, অথবা সুমধ্যা পাঞ্চালী দ্ৰৌপদী—এনে কোন কলুষিত কৰ্ম কৰিছিল যে তেওঁলোকে এই দুৰ্গন্ধময় ভয়ংকৰ স্থানত বাস কৰিবলগীয়া হৈছে?
Verse 44
य इमे पापगन्धेडस्मिन् देशे सन्ति सुदारुणे । नाहं जानामि सर्वेषां दुष्कृतं पुण्यकर्मणाम्,“मेरे इन महामना भाइयोंने, कर्णने, द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंने अथवा स्वयं सुमध्यमा द्रौोपदीने भी कौन-सा ऐसा पाप किया था जिससे ये लोग इस दुर्गन्धपूर्ण भयंकर स्थानमें निवास करते हैं। इन समस्त पुण्यात्मा पुरुषोंने कभी कोई पाप किया था, इसे मैं नहीं जानता
এই পাপগন্ধময় অতি দাৰুণ দেশত যিসকল পুণ্যকৰ্মী জন আছে—তেওঁলোকৰ কোনো দুষ্কৃত মই নাজানো।
Verse 45
कि कृत्वा धृतराष्ट्रस्य पुत्रो राजा सुयोधन: । तथा श्रिया युत: पापै: सह सर्व: पदानुगै:,“धृतराष्ट्रका पुत्र राजा सुयोधन कौन-सा पुण्यकर्म करके अपने समस्त पापी सेवकोंके साथ वैसी अद्भुत शोभा और सम्पत्तिसे संयुक्त हुआ है?
ধৃতৰাষ্ট্ৰৰ পুত্ৰ ৰজা সুয়োধনে কোন পুণ্যকৰ্ম কৰি নিজৰ সকলো পাপী অনুচৰসহ এনে শ্ৰী-সমৃদ্ধিত যুক্ত হৈছে?
Verse 46
महेन्द्र इव लक्ष्मीवानास्ते परमपूजिता: । कस्येदानीं विकारो5यं य इमे नरकं॑ गता:
সেয়া মহেন্দ্ৰৰ দৰে লক্ষ্মীবান হৈ পৰমপূজিত হৈ বহি আছে; আৰু এইসকল নৰকলৈ গ’ল—তেন্তে এতিয়া এই পৰিবর্তন কাৰ?
Verse 47
“वह तो यहाँ अत्यन्त सम्मानित होकर महेन्द्रके समान राजलक्ष्मीसे सम्पन्न हुआ है। इधर यह किस कर्मका फल है कि मेरे सगे-सम्बन्धी नरकमें पड़े हुए हैं? ।। सर्वधर्मविद: शूरा: सत्यागमपरायणा: । क्षत्रधर्मरता: सन््तो यज्वानो भूरिदक्षिणा:,“मेरे भाई सम्पूर्ण धर्मके ज्ञाता, शूरवीर, सत्यवादी तथा शास्त्रके अनुकूल चलनेवाले थे। इन्होंने क्षत्रिय-धर्ममें तत्यर रहकर बड़े-बड़े यज्ञ किये और बहुत-सी दक्षिणाएँ दी हैं (तथापि इनकी ऐसी दुर्गति क्यों हुई)?
সিও ইয়াত অতি সন্মানিত হৈ, স্বয়ং মহেন্দ্ৰৰ দৰে ৰাজলক্ষ্মীত সমৃদ্ধ হৈছে। কিন্তু কোন কৰ্মফল এনেকুৱা যে মোৰ নিজৰ স্বজন-সম্বন্ধীয়ে নৰকত পতিত হৈছে? মোৰ ভাতৃসকল সৰ্বধৰ্মবিদ—শূৰ, সত্যবাদী আৰু শাস্ত্ৰানুগ আচৰণত পৰায়ণ আছিল। ক্ষত্ৰধৰ্মত অটল হৈ তেওঁলোকে মহাযজ্ঞ সম্পন্ন কৰিছিল আৰু প্ৰচুৰ দক্ষিণা দান কৰিছিল; তথাপি তেওঁলোকৰ এনে দুৰ্গতি কিয় ঘটিল?
Verse 48
कि नु सुप्तो5स्मि जागर्मि चेतयामि न चेतये । अहो चित्तविकारो<यं स्याद् वा मे चित्तविभ्रम:,'क्या मैं सोता हूँ या जागता हूँ? मुझे चेत है या नहीं? अहो! यह मेरे चित्तका विकार तो नहीं है, अथवा हो सकता है यह मेरे मनका भ्रम हो”
মই শুই আছোঁ নে জাগি আছোঁ? মই সঁচাকৈ উপলব্ধি কৰিছোঁ নে একেবাৰে নকৰোঁ? হায়—ই মোৰ চিত্তৰ কোনো বিকাৰ নে, নতুবা মোৰ চেতনাক আৱৰি ধৰা কোনো বিভ্ৰম?
Verse 49
एवं बहुविधं राजा विममर्श युधिष्ठिर: । दुःखशोकसमाविष्टश्विन्ताव्याकुलितेन्द्रिय:,दुःख और शोकके आवेशसे युक्त हो राजा युधिष्ठिर इस तरह नाना प्रकारसे विचार करने लगे। उस समय उनकी सारी इन्द्रियाँ चिन्तासे व्याकुल हो गयी थीं
এইদৰে ৰজা যুধিষ্ঠিৰে নানা ধৰণে চিন্তা কৰিবলৈ ধৰিলে। দুখ আৰু শোকে আৱিষ্ট হৈ, উদ্বেগভৰা ভাবনাই তেওঁৰ ইন্দ্ৰিয়সমূহ ব্যাকুল কৰি তুলিলে।
Verse 50
क्रोधमाहारयच्चैव तीव्र धर्मसुतो नृपः । देवांक्ष गर्हयामास धर्म चैव युधिष्ठिर:,धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके मनमें तीव्र रोष जाग उठा। वे देवताओं और धर्मको कोसने लगे
তেতিয়া ধৰ্মপুত্ৰ ৰজা যুধিষ্ঠিৰৰ ভিতৰত তীব্ৰ ক্ৰোধ জাগি উঠিল। সেই অৱস্থাত তেওঁ দেৱতাসকলক—এমনকি ধৰ্মকো—নিন্দা কৰিবলৈ ধৰিলে।
Verse 51
स तीव्रगन्धसंतप्तो देवदूतमुवाच ह । गम्यतां तत्र येषां त्वं दूतस्तेषामुपान्तिकम्,उन्होंने वहाँकी दुःसह दुर्गन्न्धसे संतप्त होकर देवदूतसे कहा--“तुम जिनके दूत हो उनके पास लौट जाओ । मैं वहाँ नहीं चलूँगा। यहीं ठहर गया हूँ, अपने मालिकोंको इसकी सूचना दे देना। यहाँ ठहरनेका कारण यह है कि मेरे निकट रहनेसे यहाँ मेरे इन दुखी भाई- बन्धुओंको सुख मिलता है”
অসহ্য দুৰ্গন্ধে কাতৰ হৈ তেওঁ দেৱদূতক ক’লে—“যাৰ দূত তুমি, তেওঁলোকৰ ওচৰলৈ উভতি যোৱা। মই তাত নাযাওঁ; মই ইয়াতেই থাকিম। এই কথা তোমাৰ প্ৰভুসকলক জনাই দিয়া। কিয়নো মোৰ সান্নিধ্যত ইয়াত মোৰ এই দুখিত ভাতৃ-বান্ধৱ আৰু স্বজনসকলে অলপ হলেও সান্ত্বনা পায়।”
Verse 52
न हाहं तत्र यास्यामि स्थितो<5स्मीति निवेद्यताम् | मत्संश्रयादिमे दूता: सुखिनो भ्रातरो हि मे,उन्होंने वहाँकी दुःसह दुर्गन्न्धसे संतप्त होकर देवदूतसे कहा--“तुम जिनके दूत हो उनके पास लौट जाओ । मैं वहाँ नहीं चलूँगा। यहीं ठहर गया हूँ, अपने मालिकोंको इसकी सूचना दे देना। यहाँ ठहरनेका कारण यह है कि मेरे निकट रहनेसे यहाँ मेरे इन दुखी भाई- बन्धुओंको सुख मिलता है”
“নাই—মই তাত নাযাম। মই ইয়াতেই থাকিবলৈ স্থিৰ সিদ্ধান্ত লৈছোঁ বুলি জনাই দিয়া। কিয়নো মোৰ আশ্ৰয় ল’লে মোৰ এই দুখীয়া ভ্ৰাতৃসকলেও কিছু সান্ত্বনা পায়।”
Verse 53
इत्युक्तः स तदा दूत: पाण्डुपुत्रेण धीमता । जगाम तत्र यत्रास्ते देवराज: शतक्रतु:ः,बुद्धिमान् पाण्डुपुत्रके ऐसा कहनेपर देवदूत उस समय उस स्थानको चला गया जहाँ सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले देवराज इन्द्र विराजमान थे
বুদ্ধিমান পাণ্ডুপুত্ৰে এইদৰে কোৱাত সেই দেৱদূত তেতিয়াই সেই ঠাইলৈ গ’ল, য’ত শতযজ্ঞকাৰী দেৱৰাজ ইন্দ্ৰ আসীন আছিল।
Verse 54
निवेदयामास च तद् धर्मराजचिकीर्षितम् | यथोक्तं धर्मपुत्रेण सर्वमेव जनाधिप,नरेश्वर! दूतने वहाँ धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी कही हुई सारी बातें कह सुनायीं और यह भी निवेदन कर दिया कि वे क्या करना चाहते हैं
তাৰ পাছত সেই দূতে জনাধিপৰ আগত ধৰ্মপুত্ৰ যুধিষ্ঠিৰে কোৱা সকলো কথা যথাযথভাৱে নিবেদন কৰিলে আৰু ধৰ্মৰাজে কি কৰিবলৈ স্থিৰ কৰিছে সেয়াও জনালে।
Yudhiṣṭhira confronts whether he can accept a privileged posthumous state while those he loves and honors appear to suffer; he rejects isolated reward and prioritizes solidarity with the afflicted.
The chapter teaches that dharma is validated by principled compassion even when outcomes appear unjust; ethical commitment is shown by remaining with sufferers rather than pursuing personal comfort.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is narrative-theological—demonstrating that final judgment and karmic sequencing can appear counterintuitive, thereby deepening the epic’s mokṣa-oriented frame.