Śuka–Janaka Saṃvāda: Āśrama-krama, Jñāna-vijñāna, and the Marks of Liberation (शुक-जनक संवादः)
गन्धवासो विहारेषु शयनेष्वासनेषु च । दिवास्वप्नेडतिवादे च प्रमादेषु च वै रति:,मोह, अप्रकाश (अज्ञान), तामिस्र और अन्धतामिस्र--ये सब तमोगुणके लक्षण हैं। इनमें तामिस्र क्रोधका वाचक है और अन्धतामिस्र मरणका। भोजनमें रुचिका न होना, खानेकी वस्तुओंसे तृप्ति या संतोषका अभाव अथवा कितना ही भोजन क्यों न मिले, उसे पर्याप्त न मानना, पीनेकी वस्तुओंसे कभी तृप्त न होना, दुर्गन्धयुक्त वस्त्र, अनुचित विहार, मलिन शय्या और आसनोंका सेवन, दिनमें सोना, अत्यन्त वाद-विवादमें और प्रमादमें अत्यन्त आसक्त रहना, अज्ञानवश नाच-गीत और नाना प्रकारके बाजोंमें श्रद्धा, नाना प्रकारके धर्मोंसे द्वेष--ये तमोगुणके लक्षण हैं
gandhavāso vihāreṣu śayaneṣv āsaneṣu ca | divāsvapne ’tivāde ca pramādeṣu ca vai ratiḥ ||
যাজ্ঞবল্ক্য ক’লে—সুগন্ধ, ভোগ-বিলাস, অনর্থক বিহাৰ, আৰু আৰামদায়ক শয্যা-আসনত ৰতি; দিনত নিদ্ৰা; আৰু অতিবাদ-বিবাদ আৰু প্ৰমাদত অতিশয় আসক্তি—এইবোৰ তমোগুণৰ লক্ষণ। এনে স্বভাৱত অন্ধকাৰেই বৃদ্ধি পায়; ই মানুহক আলস্য, বিভ্ৰান্তি আৰু আত্মবিনাশী অভ্যাসৰ দিশে টানে, স্পষ্টতা, সংযম আৰু ধৰ্মাচৰণৰ দিশে নহয়।
याज़्वल्क्य उवाच