
तीर्थवंशोपदेशः (Tīrtha-vaṃśa Upadeśa: Instruction on the Fruits of Sacred Waters)
Upa-parva: Tīrtha-vaṃśa (Angiras–Gautama Dialogue on Sacred Waters)
The chapter opens with Yudhiṣṭhira requesting a principled account of why seeing and bathing at tīrthas is considered beneficial. Bhīṣma replies by transmitting a tradition spoken by Aṅgiras, introduced through a secondary frame: Gautama approaches Aṅgiras in a forest hermitage and asks about the dharmic uncertainty concerning tīrthas and the exact fruits of bathing, including post-mortem outcomes. Aṅgiras responds with an extensive enumerative map of sacred rivers, lakes, confluences, mountains, and āśramas (e.g., Candrabhāgā, Vitastā, Puṣkara, Prabhāsa, Naimiṣa, Gaṅgādvāra, Prayāga, Narmadā, Devadāruvana, Citrakūṭa), assigning distinct results: removal of pāpa, attainment of svarga or specific lokas, ritual-equivalent fruits (Aśvamedha/Vājapeya/Puruṣamedha analogues), beauty, fame, fearlessness, and extraordinary attainments (e.g., antardhāna). The discourse consistently conditions these outcomes on regulated conduct—fasting durations (one night to a month), purity (śuci), sense-control, truthfulness, non-violence, and conquest of desire/anger/greed. It also introduces a doctrinal bridge: mental visitation can substitute for physical travel to difficult sites. The chapter ends with a phalaśruti asserting that hearing/reciting this Aṅgiras-taught ‘rahasya’ yields purification, auspicious rebirth, and upward destiny, and it outlines qualified modes of transmission (to dvijas, sādhus, kin, or disciplined students).
Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह भीष्म से विनयपूर्वक पूछते हैं—श्राद्ध के समय देवकार्य और पितृकार्य में ऋषियों ने जिन-जिन कर्मों का विधान किया है, उसका क्रम और रहस्य क्या है? → भीष्म विधि को सूक्ष्म अनुशासन में बाँधते हैं—पूर्वाह्न में देवकार्य, अपराह्न में पितृकार्य; शौच-स्नान, आचार-शुद्धि, समय-पालन, पात्र-चयन और दान की ‘उपपत्ति’ (उचित कारण/विधि) पर जोर देते हैं। वे चेताते हैं कि कालहीन, अशुद्ध या उलटे क्रम से किया गया दान-भोजन राक्षस-भाग बन जाता है, और श्राद्ध का फल विकृत हो जाता है। → विधि-भंग के दुष्परिणामों का तीखा उद्घोष—अस्नात ब्राह्मण द्वारा देव/पितृकार्य ग्रहण करना अधर्म के तुल्य बताया जाता है; अनुचित पात्र (जैसे ऋणकर्ता, सूदखोर, प्राणि-विक्रयवृत्ति वाले) और परस्त्री-अपहर्ता/परस्त्री-दूती जैसे आचरणों को नरकगामी कहा जाता है। यहाँ श्राद्ध केवल कर्मकाण्ड नहीं, नैतिक शुद्धि की कसौटी बन जाता है। → भीष्म तीनों वर्णों के संस्कार-विधान (जातकर्म आदि) और मंत्र-व्यवस्था का संकेत देकर समग्र धर्म-रचना को स्थिर करते हैं; फिर देवकार्य-पितृकार्य और दानधर्म का सार बताते हैं—विधि, समय, पात्र और शुद्धि से किया गया कर्म परलोक-कल्याणकारी है, और करुणा-जितक्रोध-बहुपुत्र-शतायुषी सद्गुणी पुरुष स्वर्गगामी होते हैं। → अगले उपदेश के लिए भूमि तैयार होती है—‘राक्षस-भाग’ से बचने हेतु भोजन-दान की सूक्ष्म शर्तें और पात्र-अपात्र के और भी भेद आगे कैसे निर्धारित होंगे?
Verse 1
युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! देवता और ऋषियोंने श्राद्धके समय देवकार्य तथा पितृकार्यमें जिस-जिस कर्मका विधान किया है, उसका वर्णन मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—পিতামহ! শ্রাদ্ধকালত দেৱকাৰ্য আৰু পিতৃকাৰ্যত দেৱতা আৰু ঋষিসকলে যি যি কৰ্মৰ বিধান কৰিছে, তাৰ বিধিবদ্ধ বিৱৰণ মই আপোনাৰ মুখৰ পৰা শুনিবলৈ ইচ্ছা কৰোঁ।
Verse 2
भीष्म उवाच दैवं पौर्वाह्निकं कुर्यादपराह्ने तु पैतृकम् मड़लाचारसम्पन्न: कृतशौच: प्रयत्नवान्,भीष्मजीने कहा--राजन्! मनुष्यको चाहिये कि वह स्नान आदिसे शुद्ध हो, मांगलिक कृत्य सम्पन्न करके प्रयत्नशील हो पूर्वन्निमें देव-सम्बन्धी दान, अपराह्नमें पैतृक दान और मध्याह्नकालमें मनुष्य-सम्बन्धी दान आदरपूर्वक करे। असमयमें किया हुआ दान राक्षसोंका भाग माना गया है
ভীষ্মে ক’লে—ৰাজন! পূৰ্বাহ্নত দেৱসংশ্লিষ্ট কৰ্ম আৰু দান কৰিব লাগে, আৰু অপৰাহ্নত পিতৃসংশ্লিষ্ট কৰ্ম আৰু দান। স্নানাদি কৰি শুচি হৈ, মঙ্গলাচাৰে সম্পন্ন আৰু যত্নবান হৈ এই সকলো পালন কৰিব লাগে।
Verse 3
मनुष्याणां तु मध्याल्ले प्रदद्यादुपपत्तिभि: । कालहीनं तु यद् दानं तं भागं रक्षसां विदु:,भीष्मजीने कहा--राजन्! मनुष्यको चाहिये कि वह स्नान आदिसे शुद्ध हो, मांगलिक कृत्य सम्पन्न करके प्रयत्नशील हो पूर्वन्निमें देव-सम्बन्धी दान, अपराह्नमें पैतृक दान और मध्याह्नकालमें मनुष्य-सम्बन्धी दान आदरपूर्वक करे। असमयमें किया हुआ दान राक्षसोंका भाग माना गया है
ভীষ্মে ক’লে—হে ৰাজন! মানুহে মধ্যাহ্নকালত যথোচিত বিধিৰে দান কৰিব লাগে। কিন্তু অসময়ত দিয়া দান ৰাক্ষসসকলৰ ভাগ বুলি গণ্য কৰা হয়।
Verse 4
लड़घितं चावलीढं च कलिपूर्व च यत् कृतम् रजस्वलाभिदृष्टं च तं भागं रक्षसां विदु:,जिस भोज्य पदार्थको किसीने लाँघ दिया हो, चाट लिया हो, जो लड़ाई-झगड़ा करके तैयार किया गया हो तथा जिसपर रजस्वला स्त्रीकी दृष्टि पड़ी हो, उसे भी राक्षसोंका ही भाग माना गया है
ভীষ্মে ক’লে—যি আহাৰ কোনোবাই লংঘি গৈছে, চাটি লৈছে, কলহ-বিবাদৰ মাজত প্ৰস্তুত হৈছে, অথবা ঋতুমতী নাৰীৰ দৃষ্টিত পৰিছে—সেয়া ৰাক্ষসসকলৰ ভাগ বুলি ধৰা হয়।
Verse 5
अवषुष्ट च यद् भुक्तमव्रतेन च भारत । परामृष्टं शुना चैव तं भागं रक्षसां विदु:,भरतनन्दन! जिसके लिये लोगोंमें घोषणा की गयी हो, जिसे व्रतहीन मनुष्यने भोजन किया हो अथवा जो कुत्तेसे छू गया हो, वह अन्न भी राक्षसोंका ही भाग समझा गया है
ভীষ্মে ক’লে—হে ভাৰত! যি অন্নৰ বিষয়ে লোকসমাজত ঘোষণা কৰা হৈছে, যাক ব্ৰতহীন মানুহে খাইছে, অথবা যাক কুকুৰে স্পৰ্শ কৰিছে—সেয়াও ৰাক্ষসসকলৰ ভাগ বুলি গণ্য হয়।
Verse 6
केशकीटावपतित क्षुत॑ श्वभिरवेक्षितम् रुदितं चावधूतं च त॑ भागं रक्षसां विदु:,जिसमें केश या कीड़े पड़ गये हों, जो छींकसे दूषित हो गया हो, जिसपर कुत्तोंकी दृष्टि पड़ गयी हो तथा जो रोकर और तिरस्कारपूर्वक दिया गया हो, वह अन्न भी राक्षसोंका ही भाग माना गया है
ভীষ্মে ক’লে—যি অন্নত চুলি বা কীট পৰিছে, যি হাঁচিৰে দুষিত হৈছে, যাৰ ওপৰত কুকুৰৰ দৃষ্টি পৰিছে, আৰু যি কান্দি কান্দি বা তিৰস্কাৰে দিয়া হৈছে—সেয়াও ৰাক্ষসসকলৰ ভাগ বুলি ধৰা হয়।
Verse 7
निरोड्कारेण यद् भुक्तं सशस्त्रेण च भारत । दुरात्मना च यद् भुक्तं तं भागं रक्षसां विदु:,भरतनन्दन! जिस अन्नमेंसे पहले ऐसे व्यक्तिने खा लिया हो, जिसे खानेकी अनुमति नहीं दी गयी है अथवा जिसमेंसे पहले प्रणव आदि वेदमन्त्रोंके अनधिकारी शूद्र आदिने भोजन कर लिया हो अथवा किसी शस्त्रधारी या दुराचारी पुरुषने जिसका उपयोग कर लिया हो, उस अन्नको भी राक्षसोंका ही भाग बताया गया है
ভীষ্মে ক’লে—হে ভাৰত! যি অন্নত আগতে অনধিকাৰী/অনুমতিহীন মানুহে খাইছে, অথবা যাক অস্ত্ৰধাৰী বা দুষ্টচিত্ত মানুহে ভোগ কৰিছে—সেয়াও ৰাক্ষসসকলৰ ভাগ বুলি গণ্য হয়।
Verse 8
परोच्छिष्टं च यद् भुक्तं परिभुक्त च यद् भवेत् । दैवे पित्रये च सततं त॑ भागं रक्षसां विदु:,जिसे दूसरोंने उच्छिष्ट कर दिया हो, जिसमेंसे किसीने भोजन कर लिया हो तथा जो देवता, पितर, अतिथि एवं बालक आदिको दिये बिना ही अपने उपभोगमें लाया गया हो, वह अन्न देवकर्म तथा पितृकर्ममें सदा राक्षस्रोंका ही भाग माना गया है
ভীষ্মে ক’লে—যি অন্ন আনৰ উচ্ছিষ্ট হৈ পৰিছে, বা যাৰ পৰা কোনোবাই খাই পেলাইছে, আৰু দেৱতা আৰু পিতৃসকলক নিৰ্দিষ্ট ভাগ আগতে অৰ্পণ নকৰাকৈ যি নিজে ভোগ কৰা হয়—দৈৱকৰ্ম আৰু পিতৃকৰ্মত সেই অন্ন সদায় ৰাক্ষসসকলৰ ভাগ বুলি গণ্য হয়।
Verse 9
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं यच्छाद्ध॑ परिविष्यते । त्रिभिर्वर्णैर्नरश्रेष्ठ तं भागं रक्षसां विदु:,नरश्रेष्ठ तीनों वर्णोके लोग वैदिक मन्त्र एवं उसके विधि-विधानसे रहित जो श्राद्धका अन्न परोसते हैं, उसे राक्षसोंका ही भाग माना गया है
ভীষ্মে ক’লে—হে নৰশ্ৰেষ্ঠ! শ্ৰাদ্ধত যি অন্ন বৈদিক মন্ত্ৰবিহীন আৰু নিৰ্দিষ্ট ক্ৰিয়াবিধিবিহীনকৈ পৰিবেশন কৰা হয়, তিনিও বৰ্ণৰ লোকসকলে তাক ৰাক্ষসসকলৰ ভাগ বুলি জানে।
Verse 10
आज्याहुतिं विना चैव यत्किंचित् परिविष्यते । दुराचारैश्व यद् भुक्त तं भागं रक्षसां विदु:
ভীষ্মে ক’লে—ঘৃতাহুতি নিদিয়াকৈ যি কোনো অন্ন পৰিবেশন কৰা হয়, আৰু দুষ্কৰ্মী/দুৰাচাৰী লোকে যি ভক্ষণ কৰে—সেই ভাগ ৰাক্ষসসকলৰ বুলি জানিবা।
Verse 11
अत ऊर्ध्व विसर्गस्य परीक्षां ब्राह्मणे शूणु,अब दान और भोजनके लिये ब्राह्मणकी परीक्षा करनेके विषयमें जो बात बतायी जाती है, उसे सुनो। राजन! जो ब्राह्मण पतित, जड या उन्मत्त हो गये हों वे देवकार्य या पितृकार्यमें निमन्त्रण पानेके योग्य नहीं हैं
ভীষ্মে ক’লে—এতিয়া আগলৈ দান আৰু ভোজনৰ উদ্দেশ্যে ব্ৰাহ্মণক কেনেকৈ পৰীক্ষা কৰিব লাগে, সেয়া শুনা। হে ৰাজন! যিসকল ব্ৰাহ্মণ আচাৰচ্যুত (পতিত), জড়বুদ্ধি, বা উন্মত্ত—তেওঁলোক দেৱকাৰ্য বা পিতৃকাৰ্যত নিমন্ত্ৰণযোগ্য নহয়।
Verse 12
यावन्त: पतिता विप्रा जडोन्मत्तास्तथैव च । दैवे वाप्यथ पित्रये वा राजन् ना्हन्ति केतनम्,अब दान और भोजनके लिये ब्राह्मणकी परीक्षा करनेके विषयमें जो बात बतायी जाती है, उसे सुनो। राजन! जो ब्राह्मण पतित, जड या उन्मत्त हो गये हों वे देवकार्य या पितृकार्यमें निमन्त्रण पानेके योग्य नहीं हैं
ভীষ্মে ক’লে—হে ৰাজন! যিমান ব্ৰাহ্মণ আচাৰচ্যুত (পতিত), জড়বুদ্ধি আৰু উন্মত্ত—দেৱকাৰ্য হওক বা পিতৃকাৰ্য, কোনো ক্ষেত্ৰতেই তেওঁলোক নিমন্ত্ৰণযোগ্য নহয়।
Verse 13
श्वित्री क्लीबश्व कुछ्ठी च तथा यक्ष्महतश्न यः । अपस्मारी च यश्चान्धो राजन् नाहन्ति केतनम्,राजन्! जिसके शरीरमें सफेद दाग हो, जो कोढ़ी, नपुंसक, राजयक्ष्मासे पीड़ित, मृगीका रोगी और अन्धा हो, ऐसे लोग श्राद्धमें निमन्त्रण पानेके अधिकारी नहीं हैं
ভীষ্মে ক’লে—হে ৰাজন! যিসকলৰ দেহত শ্বেতদাগ (শ্বিত্ৰী) আছে, যি নপুংসক, কুষ্ঠৰোগী, ৰাজযক্ষ্মাত পীড়িত, অপস্মাৰ (মৃগী) ৰোগী বা অন্ধ—তেওঁলোক শ্ৰাদ্ধকর্মত নিমন্ত্ৰণযোগ্য নহয়।
Verse 14
चिकित्सका देवलका वृथा नियमधारिण: । सोमविक्रयिणश्वैव राजन् नाहन्ति केतनम्,नरेश्वर! चिकित्सक या वैद्य, देवालयके पुजारी, पाखण्डी और सोमरस बेचनेवाले ब्राह्मण निमन्त्रण देने योग्य नहीं हैं
ভীষ্মে ক’লে—হে নৰেশ্বৰ! চিকিৎসক (বৈদ্য), দেৱালয়-আশ্ৰিত পূজাৰী/সেৱক, বৃথা নিয়মধাৰী ভণ্ড, আৰু সোম বিক্ৰেতা—এঁহত নিমন্ত্ৰণযোগ্য নহয়।
Verse 15
गायना नर्तकाश्नैव प्लवका वादकास्तथा । कथका योधकाश्चैव राजन् नाहहन्ति केतनम्
ভীষ্মে ক’লে—হে ৰাজন! গায়ক, নর্তক, কসরৎকাৰী/কলাবাজ, বাদ্যকাৰ, কথক, আৰু যোদ্ধা-প্ৰশিক্ষক/মল্ল—এঁহতও নিমন্ত্ৰণযোগ্য নহয়।
Verse 16
राजन! जो गाते-बजाते, नाचते, खेल-कूदकर तमाशा दिखाते, व्यर्थकी बातें बनाते और पहलवानी करते हैं, वे भी निमन्त्रण पानेके अधिकारी नहीं हैं ।। होतारो वृषलानां च वृषलाध्यापकास्तथा । तथा वृषलशिष्याश्न राजन् नाहन्ति केतनम्,नरेश्वर! जो शूद्रोंका यज्ञ कराते, उनको पढ़ाते अथवा स्वयं उनके शिष्य बनकर उनसे शिक्षा लेते या उनकी दासता करते हैं, वे भी निमन्त्रण देने योग्य नहीं हैं
ভীষ্মে ক’লে—হে নৰেশ্বৰ! যিসকলে শূদ্ৰসকলৰ বাবে যজ্ঞ কৰায়, যিসকলে তেওঁলোকক পঢ়ায়, আৰু যিসকলে তেওঁলোকৰ শিষ্য হৈ তেওঁলোকৰ পৰা শিক্ষা গ্ৰহণ কৰে—তেওঁলোক শ্ৰাদ্ধাদি কৰ্মত নিমন্ত্ৰণযোগ্য নহয়।
Verse 17
अनुयोक्ता च यो विप्रो अनुयुक्तश्चन भारत । नाहतस्तावघपि श्राद्ध ब्रहद्मविक्रयिणौ हि तो,भरतनन्दन! जो ब्राह्मण वेतन लेकर पढ़ाता है और वेतन देकर पढ़ता है, वे दोनों ही वेदको बेचनेवाले हैं; अतः: वे श्राद्धमें सम्मिलित करनेयोग्य नहीं हैं
ভীষ্মে ক’লে—হে ভাৰতনন্দন! যি ব্ৰাহ্মণে বেতন লৈ পঢ়ায় আৰু যি ব্ৰাহ্মণে বেতন দি পঢ়ে—দুয়ো ব্রহ্মবিদ্যা (বেদবিদ্যা)ৰ বিক্ৰেতা; সেয়ে তেওঁলোক নিৰ্দোষ হ’লেও শ্ৰাদ্ধত অন্তৰ্ভুক্তিৰ যোগ্য নহয়।
Verse 18
अग्रणीर्य: कृत: पूर्व वर्णावरपरिग्रह: । ब्राह्मण: सर्वविद्योडपि राजन् नाहति केतनम्,राजन! जो ब्राह्मण पहले समाजका अगुआ रहा हो और पीछे उसने शूद्र-स्त्रीसे विवाह कर लिया हो, वह ब्राह्मण सम्पूर्ण विद्याओंका ज्ञाता होनेपर भी श्राद्धमें बुलाने योग्य नहीं है
ভীষ্মে ক’লে—হে ৰাজন! যি ব্ৰাহ্মণ পূৰ্বে সমাজৰ অগ্ৰণী আছিল, কিন্তু পাছত বৰ্ণধৰ্মৰ বিৰোধে (শূদ্ৰ-স্ত্ৰী আদি সৈতে) অনুচিত বিবাহ কৰে, সি সকলো বিদ্যাত নিপুণ হ’লেও শ্ৰাদ্ধত নিমন্ত্ৰণযোগ্য নহয়।
Verse 19
अनग्नयश्न ये विप्रा मृतनिर्यातकाश्न ये । स्तेनाश्न पतिताश्चैव राजन नाहन्ति केतनम्,नरेश्वर! जो ब्राह्मण अग्निहोत्र नहीं करते, जो मुर्दा ढोते, चोरी करते और जो पापोंके कारण पतित हो गये हैं, वे भी श्राद्धमें बुलाने योग्य नहीं हैं
ভীষ্মে ক’লে—হে ৰাজন! যিসকল ব্ৰাহ্মণে অগ্নিহোত্ৰ পালন নকৰে, যিসকলে মৃতদেহ বহন কৰি জীৱিকা চলে, যিসকলে চুৰিৰ অন্ন খায়, আৰু যিসকল পাপৰ ফলত পতিত—তেওঁলোক শ্ৰাদ্ধত নিমন্ত্ৰণযোগ্য নহয়।
Verse 20
अपरिज्ञातपूर्वाश्च गणपूर्वाश्न भारत । पत्रिकापूर्वपुत्राश्न श्राद्धे नाहन्ति केतनम्,भारत! जिनके विषयमें पहलेसे कुछ ज्ञात न हो, जो गाँवके अगुआ हों तथा पुत्रिका-- धर्मके अनुसार व्याही गयी स्त्रीके गर्भसे उत्पन्न होकर नानाके घरमें निवास करते हों, ऐसे ब्राह्मण भी श्राद्धमें निमन््त्रण पानेके अधिकारी नहीं हैं
ভীষ্মে ক’লে—হে ভাৰত! যিসকল ব্ৰাহ্মণ পূৰ্বৰে পৰা পৰিচিত নহয়, যিসকলে দল-গোটৰ অগ্ৰণী বুলি নিজকে দেখুৱায়, আৰু যিসকল ‘পুত্ৰিকা-ধৰ্ম’ অনুসাৰে বিবাহিত কন্যাৰ গৰ্ভত জন্ম লৈ মাতামহৰ ঘৰত বাস কৰে (পুত্ৰিকা-পুত্ৰ)—তেওঁলোক শ্ৰাদ্ধত নিমন্ত্ৰণযোগ্য নহয়।
Verse 21
ऋणकर्ता च यो राजन यश्न वार्धुषिको नर: । प्राणिविक्रयवृत्तिश्व राजन नाहन्ति केतनम्
ভীষ্মে ক’লে—হে ৰাজন! যি মানুহ ঋণ কৰে, যি সুদখোৰিৰে জীৱিকা চলে, আৰু যি প্ৰাণীৰ ক্ৰয়-বিক্ৰয়ক বৃত্তি কৰে—তেনে লোক, হে ৰাজন, উত্তম যশ (কেতন) নাপায়।
Verse 22
राजन! जो ब्राह्मण रुपया-पैसा बढ़ानेके लिये लोगोंको ब्याजपर ऋण देता हो अथवा जो सस्ता अन्न खरीदकर उसे मँहगे भावपर बेचता और उसका मुनाफा खाता हो अथवा प्राणियोंके क्रय-विक्रयसे जीविका चलाता हो, ऐसे ब्राह्मण श्राद्धमें बुलाने योग्य नहीं हैं ।। स्त्रीपूर्वा: काण्डपृष्ठाश्न॒ यावन्न्तो भरतर्षभ | अजपा ब्राद्मणाश्रैव श्राद्धे नाहन्ति केतनम्,जो स्त्रीकी कमाई खाते हों, वेश्याके पति हों और गायत्री-जप एवं संध्या-वन्दनसे हीन हों, ऐसे ब्राह्मण भी श्राद्धमें सम्मिलित होने योग्य नहीं हैं
ভীষ্মে ক’লে—হে ৰাজন! যিসকল ব্ৰাহ্মণে ধনবৃদ্ধিৰ বাবে সুদে ঋণ দিয়ে, অথবা সস্তা ধান্য কিনি মুল্য বঢ়াই বিক্ৰী কৰি লাভ খায়, অথবা প্ৰাণীৰ ক্ৰয়-বিক্ৰয়ে জীৱিকা চলে—তেওঁলোক শ্ৰাদ্ধত নিমন্ত্ৰণযোগ্য নহয়। আৰু হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! যিসকলে স্ত্ৰীৰ উপাৰ্জনত চলে, যিসকলে বেশ্যাবৃত্তিৰ সৈতে জড়িত (স্বামী/পালক), আৰু যিসকলে গায়ত্ৰী-জপ আৰু সন্ধ্যা-বন্দনা ত্যাগ কৰিছে—তেওঁলোকো শ্ৰাদ্ধত সন্মানাসনৰ যোগ্য নহয়।
Verse 23
श्राद्धे दैवे च निर्दिष्टो ब्राह्मणो भरतर्षभ । दातुः प्रतिग्रहीतुश्न शृणुष्वानुग्रह पुन:,भरतश्रेष्ठ! देवयज्ञ और श्राद्धकर्ममें वर्जित ब्राह्मणका निर्देश किया गया। अब दान देने और लेनेवाले ऐसे पुरुषोंका वर्णन करता हूँ जो श्राद्धमें निषिद्ध होनेपर भी किसी विशेष गुणके कारण अनुग्रहपूर्वक ग्राह्म माने गये हैं। उनके विषयमें सुनो इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि स्वर्गनरकगामिवर्णने त्रयोविंशो 5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमह्ाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें स्वर्ग और नरकमें जानेवालोंका वर्णनविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ভীষ্ম ক’লে—হে ভাৰতশ্ৰেষ্ঠ! দেৱযজ্ঞ আৰু শ্ৰাদ্ধকর্মত যিসকল ব্ৰাহ্মণ বর্জনীয়, তেওঁলোকৰ কথা আগতেই নিৰ্দিষ্ট কৰা হৈছে। এতিয়া পুনৰ শুনা—কৰুণাময় অনুগ্ৰহৰ বিশেষ ছাড় অনুসৰি—দান দিয়া আৰু দান গ্ৰহণ কৰা লোকসকলৰ সেই গুণলক্ষণ বৰ্ণনা কৰোঁ, যাৰ বাবে সাধাৰণতে নিষিদ্ধ হ’লেও শ্ৰাদ্ধত গ্ৰাহ্য বুলি গণ্য হয়।
Verse 24
चीर्णव्रता गुणैर्युक्ता भवेयुर्येडपि कर्षका: । सावित्रीज्ञा: क्रियावन्तस्ते राजन् केतनक्षमा:,राजन! जो ब्राह्मण व्रतका पालन करनेवाले, सदगुण-सम्पन्न, क्रियानिष्ठ और गायत्रीमन्त्रके ज्ञाता हों, वे खेती करनेवाले होनेपर भी उन्हें श्राद्धमें निमन््त्रण दिया जा सकता है
হে ৰাজন! যিসকল ব্ৰাহ্মণ ব্ৰতাচৰণত স্থিৰ, সদ্গুণে সমৃদ্ধ, বিধিক্ৰিয়াত নিষ্ঠাৱান আৰু সাবিত্ৰী (গায়ত্ৰী) মন্ত্রৰ জ্ঞাতা—তেওঁলোক জীৱিকাৰ বাবে কৃষি কৰিলেও শ্ৰাদ্ধত নিমন্ত্ৰণযোগ্য।
Verse 25
क्षात्रधर्मिणमप्याजी केतयेत् कुलजं द्विजम् । न त्वेव वणिजं तात श्राद्धे च परिकल्पयेत्,तात! जो कुलीन ब्राह्मण युद्धमें क्षत्रियधर्मका पालन करता हो, उसे भी श्राद्धमें निमन्त्रित करना चाहिये; परंतु जो वाणिज्य करता हो उसे कभी श्राद्धमें सम्मिलित न करें
তাত! যি কুলীন ব্ৰাহ্মণ যুদ্ধত ক্ষাত্ৰধৰ্ম পালন কৰে, তাকো শ্ৰাদ্ধত নিমন্ত্ৰণ কৰা উচিত; কিন্তু যি বাণিজ্য কৰে, তাক শ্ৰাদ্ধত কেতিয়াও অন্তৰ্ভুক্ত নকৰিবা।
Verse 26
अन्निहोत्री च यो विप्रो ग्रामवासी च यो भवेत् | अस्तेनश्वातिथिज्ञश्न स राजन् केतनक्षम:,राजन! जो ब्राह्मण अग्निहोत्री हो, अपने ही गाँवका निवासी हो, चोरी न करता हो और अतिथिसत्कारमें प्रवीण हो, उसे भी निमन्त्रण दिया जा सकता है
হে ৰাজন! যি ব্ৰাহ্মণ অগ্নিহোত্ৰ পালন কৰে, নিজৰ গাঁৱতে বাস কৰে, চুৰি নকৰে আৰু অতিথিসত্কাৰত নিপুণ—সেইজন শ্ৰাদ্ধত নিমন্ত্ৰণযোগ্য।
Verse 27
सावित्रीं जपते यस्तु त्रिकालं भरतर्षभ । भिक्षावृत्ति: कियावांश्व स राजन् केतनक्षम:,भरतभूषण नरेश! जो तीनों समय गायत्री-मन्त्रका जप करता है, भिक्षासे जीविका चलाता है और क्रियानिष्ठ है, वह श्राद्धमें निमन््त्रण पानेका अधिकारी है
হে ভাৰতভূষণ নৰেশ! যি তিনিও সময়ত সাবিত্ৰী (গায়ত্ৰী) জপ কৰে, ভিক্ষাৰে জীৱিকা চলায় আৰু ক্ৰিয়ানিষ্ঠ—সেইজন শ্ৰাদ্ধত নিমন্ত্ৰণ পোৱাৰ যোগ্য।
Verse 28
उदितास्तमितो यश्व तथैवास्तमितोदित: । अहिंस्नश्वाल्पदोषश्न स राजन् केतनक्षम:,राजन! जो ब्राह्मण उन्नत होकर तत्काल ही अवनत और अवनत होकर उन्नत हो जाता है एवं किसी जीवकी हिंसा नहीं करता है, वह थोड़ा दोषी हो तो भी उसे श्राद्धमें निमन्त्रण देना उचित है
ভীষ্মে ক’লে—হে ৰাজন! যি ব্ৰাহ্মণ কেতিয়াবা উন্নত হয়, কেতিয়াবা অৱনত, আৰু পুনৰ উন্নত হয়—তথাপি কোনো প্ৰাণীৰ হিংসা নকৰে, সি অলপ দোষ থাকিলেও শ্ৰাদ্ধত নিমন্ত্ৰণযোগ্য।
Verse 29
अकल्कको हातर्कश्न ब्राह्मणो भरतर्षभ । संसर्गे भैक्ष्यवृत्तिश्न स राजन् केतनक्षम:,भरतश्रेष्ठ! जो दम्भरहित, व्यर्थ तर्क-वितर्क न करनेवाला तथा सम्पर्क स्थापित करनेके योग्य घरसे भिक्षा लेकर जीवन-निर्वाह करनेवाला है, वह ब्राह्मण निमन्त्रण पानेका अधिकारी है
হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! যি ব্ৰাহ্মণ দম্ভহীন, ব্যৰ্থ তৰ্ক-বিতৰ্ক নকৰে, আৰু ঘৰে ঘৰে ভিক্ষা লৈ জীৱিকা চলায়—সঙ্গৰ যোগ্য—সি, হে ৰাজন, নিমন্ত্ৰণৰ অধিকাৰী।
Verse 30
अव्रती कितव: स्तेन: प्राणिविक्रयिको वणिक् । पश्चाच्च पीतवान् सोमं स राजन् केतनक्षम:,राजन! जो व्रतहीन, धूर्त, चोर, प्राणियोंका क्रय-विक्रय करनेवाला तथा वणिक्-वृत्तिसे जीविका चलानेवाला होकर भी पीछे यज्ञका अनुष्ठान करके उसमें सोमरसका पान कर चुका है, वह भी निमन्त्रण पानेका अधिकारी है
হে ৰাজন! যি ব্যক্তি ব্ৰতহীন, ধূৰ্ত জুৱাৰী, চোৰ, প্ৰাণীৰ ক্রয়-বিক্ৰয়কাৰী আৰু বণিকবৃত্তিত জীৱিকা চলায়—তথাপি পিছত বিধিপূৰ্বক যজ্ঞ কৰি তাত সোমপান কৰিছে—সি-ও নিমন্ত্ৰণযোগ্য।
Verse 31
अर्जयित्वा धन पूर्व दारुणैरपि कर्मभि: । भवेत् सर्वातिथि: पश्चात् स राजन् केतनक्षम:,नरेश्वरर जो पहले कठोर कर्मोंद्वारा भी धनका उपार्जन करके पीछे सब प्रकारसे अतिथियोंका सेवक हो जाता है, वह श्राद्धमें बुलाने योग्य है
হে ৰাজন! যি প্ৰথমে কঠোৰ কৰ্মৰ দ্বাৰাও ধন অৰ্জন কৰে, আৰু পিছত সকলো প্ৰকাৰেই অতিথিসেৱাত নিবেদিত হয়—সি শ্ৰাদ্ধত নিমন্ত্ৰণযোগ্য।
Verse 32
ब्रह्मविक्रयनिर्दिष्ट स्त्रिया यच्चार्जितं धनम् । अदेयं पितृविप्रेभ्यो यच्च क्लैब्यादुपार्जितम्,जो धन वेद बेचकर लाया गया हो या स्त्रीकी कमाईसे प्राप्त हुआ हो अथवा लोगोंके सामने दीनता दिखाकर माँग लाया गया हो, वह श्राद्धमें ब्राह्मणोंको देने योग्य नहीं है
যি ধন বেদ (ব্ৰহ্ম) বিক্ৰী কৰি অৰ্জিত, অথবা স্ত্ৰীৰ উপাৰ্জনৰ পৰা প্ৰাপ্ত, অথবা ভীৰুতা/দীনতা দেখুৱাই (ক্লৈব্যৰ পৰা) উপাৰ্জিত—সেই ধন পিতৃকাৰ্যৰ শ্ৰাদ্ধত ব্ৰাহ্মণক দানযোগ্য নহয়।
Verse 33
क्रियमाणे5पवर्गे च यो द्विजो भरतर्षभ । न व्याहरति यद्युक्त तस्याधर्मो गवानृतम्
ভীষ্মে ক’লে— হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! অপৱৰ্গ (মোক্ষপ্ৰদ) কৰ্ম চলি থাকোঁতে যি দ্বিজ বিধিসংগত আৰু যথোচিত বাক্য উচ্চাৰণ নকৰে, সেই অৱহেলাই তাৰ বাবে অধৰ্ম হয়—গোৰ বিষয়ে মিছা কোৱাৰ সমান মহাপাপ।
Verse 34
भरतश्रेष्ठ! जो ब्राह्मण श्राद्धकी समाप्ति होनेपर “अस्तु स्वधा” आदि तत्कालोचित वचनोंका प्रयोग नहीं करता है, उसे गायकी झूठी शपथ खानेका पाप लगता है ।। श्राद्धस्य ब्राह्मण: काल: प्राप्तं दधि घृतं तथा । सोमक्षयश्चव मांसं च यदारण्यं युधिष्ठिर,युधिष्ठिर! जिस दिन भी सुपात्र ब्राह्मण, दही, घी, अमावास्या तिथि तथा जंगली कन्द, मूल और फलोंका गूदा प्राप्त हो जाय, वही श्राद्धका उत्तम काल है
ভীষ্মে ক’লে— হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! শ্ৰাদ্ধ সমাপ্তিৰ সময়ত যি ব্ৰাহ্মণে ‘অস্তু স্বধা’ আদি কালোচিত বাক্য উচ্চাৰণ নকৰে, সি গোৰ বিষয়ে মিছা শপথ কৰাৰ সমান পাপ লাভ কৰে। হে যুধিষ্ঠিৰ! যি দিন সূপাত্ৰ ব্ৰাহ্মণ, দই-ঘি, অমাৱস্যা তিথি আৰু অৰণ্যজাত কন্দ-মূল আৰু ফলৰ মজ্জা একেলগে পোৱা যায়—সেই দিনেই শ্ৰাদ্ধৰ উত্তম কাল।
Verse 35
(मुहूर्तानां त्रय॑ पूर्वमह्नः प्रातरिति स्मृतम् । जपथध्यानादिभिस्तस्मिन् विप्रैः कार्य शुभव्रतम् ।। दिनका प्रथम तीन मुहूर्त प्रातःकाल कहलाता है। उसमें ब्राह्मगोंको जप और ध्यान आदिके द्वारा अपने लिये कल्याणकारी व्रत आदिका पालन करना चाहिये ।। सड्जवाख्य॑ त्रिभागं तु मध्याह्वस्त्रिमुहूर्तक: । लौकिकं सड्डवे<र्थ्य च स्नानादि हाथ मध्यमे ।। उसके बादका तीन मुहूर्त सड़व कहलाता है तथा सड़वके बादका तीन मुहूर्त मध्याह्न कहलाता है। सड़्व कालमें लौकिक कार्य देखना चाहिये और मध्याह्नकालमें स्नान- संध्यावन्दन आदि करना उचित है ।। चतुर्थमपराह् तु त्रिमुहूर्त तु पित्रयकम् । सायाह्नस्त्रिमुहूर्त च मध्यमं कविभि: स्मृतम् ।।) मध्याह्नके बादका तीन मुहूर्त अपराह्न कहलाता है। यह दिनका चौथा भाग पितृकार्यके लिये उपयोगी है। उसके बादका तीन मुहूर्त सायाह्न कहा गया है। इसे विद्वानोंने दिन और रातके बीचका समय माना है ।। श्राद्धापवर्गे विप्रस्य स्वधा वै मुदिता भवेत् | क्षत्रियस्यापि यो ब्रूयात् प्रीयन्तां पितरस्त्विति,ब्राह्मणके यहाँ श्राद्ध समाप्त होनेपर “स्वधा सम्पद्यताम्” इस वाक्यका उच्चारण करनेपर पितरोंको प्रसन्नता होती है। क्षत्रियके यहाँ श्राद्धकी समाप्तिमें “पितर: प्रीयन्ताम्” (पितर तृप्त हो जाये) इस वाक्यका उच्चारण करना चाहिये
ভীষ্মে ক’লে— দিনৰ প্ৰথম তিনিটা মুহূৰ্ত ‘প্ৰাতঃকাল’ বুলি স্মৃত। সেই সময়ত ব্ৰাহ্মণসকলে জপ-ধ্যান আদি কৰি নিজৰ কল্যাণৰ বাবে শুভ ব্ৰতাচৰণ কৰিব লাগে। তাৰ পিছৰ তিনিটা মুহূৰ্ত ‘সঙ্গৱ’, আৰু তাৰ পিছৰ তিনিটা ‘মধ্যাহ্ন’। সঙ্গৱকালত লৌকিক কাৰ্য কৰা উচিত; মধ্যাহ্নত স্নান আৰু সন্ধ্যাবন্দন যুক্ত। মধ্যাহ্নৰ পিছৰ তিনিটা মুহূৰ্ত ‘অপৰাহ্ন’—দিনৰ চতুৰ্থ ভাগ—পিতৃকাৰ্যৰ বাবে উপযোগী। তাৰ পিছৰ তিনিটা মুহূৰ্ত ‘সায়াহ্ন’; পণ্ডিতসকলে তাক দিন-ৰাতিৰ সন্ধিকাল বুলি মানে। ব্ৰাহ্মণৰ ঘৰত শ্ৰাদ্ধ সমাপ্তিত ‘স্বধা’ উচ্চাৰণ কৰিলে পিতৃগণ প্ৰসন্ন হয়; আৰু ক্ষত্ৰিয়ৰ ঘৰত ‘পিতৰঃ প্ৰীয়ন্তাম্’ বুলি ক’ব লাগে।
Verse 36
अपवर्गे तु वैश्यस्य श्राद्धकर्मणि भारत । अक्षय्यमभिधातव्यं स्वस्ति शूद्रस्य भारत,भारत! वैश्यके घर श्राद्धकर्मकी समाप्तिपर “अक्षय्यमस्तु” (श्राद्धका दान अक्षय हो) कहना चाहिये और शाूद्रके श्राद्धकी समाप्तिके अवसरपर *स्वस्ति” (कल्याण हो) इस वाक्यका उच्चारण करना उचित है
ভীষ্মে ক’লে— হে ভাৰত! বৈশ্যৰ শ্ৰাদ্ধকৰ্ম সমাপ্তিত ‘অক্ষয়্যম্’—‘দান অক্ষয় হওক’—বুলি ক’ব লাগে; আৰু হে ভাৰত! শূদ্ৰৰ শ্ৰাদ্ধ সমাপ্তিত ‘স্বস্তি’—‘কল্যাণ হওক’—উচ্চাৰণ কৰা উচিত।
Verse 37
पुण्याहवाचनं दैवं ब्राह्मणस्य विधीयते । एतदेव निरोड्कार क्षत्रियस्य विधीयते
ভীষ্মে ক’লে— ব্ৰাহ্মণৰ বাবে দেৱকৰ্ম ‘পুণ্যাহবাচন’—মঙ্গল আহ্বান আৰু আশীৰ্বচন—ৰূপে বিধেয়; আৰু ক্ষত্ৰিয়ৰ বাবে একে উদ্দেশ্য ‘নিৰোড্কাৰ’ দ্বাৰাই সম্পন্ন হয়।
Verse 38
इसी तरह जब ब्राह्मणके यहाँ देवकार्य होता हो, तब उसमें *कारसहित पुण्याहवाचनका विधान है (अर्थात् 'पुण्याहं भवन्तो ब्रुवन्तु--आपलोग पुण्याहवाचन करें' ऐसा यजमानके कहनेपर ब्राह्मणोंको “३० पुण्याहम् ३» पुण्याहम्” इस प्रकार कहना चाहिये)। यही वाक्य क्षत्रियके यहाँ बिना *कारके उच्चारण करना चाहिये ।। वैश्यस्य दैवे वक्तव्यं प्रीयन्तां देवता इति । कर्मणामानुपूर्व्येण विधिपूर्व कृतं शृणु,वैश्यके घर देवकर्ममें *प्रीयन्तां देवता:” इस वाक्यका उच्चारण करना चाहिये। अब क्रमश: तीनों वर्णोंके कर्मानुष्ठानकी विधि सुनो
ভীষ্মে ক’লে—এইদৰে যেতিয়া ব্ৰাহ্মণৰ গৃহত দেৱকাৰ্য হয়, তেতিয়া বিধিমতে ‘পুণ্যাহবাচন’ *কাৰসহিত কৰিব লাগে। যজমানে “পুণ্যাহং ভবন্তো ব্রুবন্তু—আপোনালোকে পুণ্যাহবাচন কৰক” বুলি ক’লে ব্ৰাহ্মণসকলে “পুণ্যাহম্, পুণ্যাহম্” বুলি উত্তৰ দিব লাগে। ক্ষত্ৰিয়ৰ গৃহত সেই একে বাক্য *কাৰ নোহোৱাকৈ উচ্চাৰণীয়। বৈশ্যৰ দেৱকর্মত “প্রীয়ন্তাং দেবতাঃ” বুলি ক’ব লাগে। এতিয়া ক্ৰমে তিনিও বৰ্ণৰ কৰ্মানুষ্ঠানৰ বিধিপূৰ্বক পদ্ধতি শুনা।
Verse 39
जातकर्मादिका: सर्वास्त्रिषु वर्णेषु भारत । ब्र्मक्षत्रे हि मन्त्रोक्ता वैश्यस्य च युधिष्ठिर,भरतवंशी युधिष्ठिर! तीनों वर्णोमें जातकर्म आदि समस्त संस्कारोंका विधान है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनोंके सभी संस्कार वेद-मन्त्रोंक उच्चारण-पूर्वक होने चाहिये
ভীষ্মে ক’লে—হে ভাৰতবংশীয় যুধিষ্ঠিৰ! তিন দ্বিজবৰ্ণত জাতকৰ্ম আদি সকলো সংস্কাৰ বিধিবদ্ধ। ব্ৰাহ্মণ, ক্ষত্ৰিয় আৰু বৈশ্য—এই তিনিওৰ সংস্কাৰ বেদমন্ত্ৰোচ্চাৰণসহিতেই বিধিপূৰ্বক সম্পন্ন কৰিব লাগে।
Verse 40
विप्रस्थ रशना मौज्जी मौर्वी राजन्यगामिनी । बाल्वजी होव वैश्यस्य धर्म एष युधिष्ठिर,युधिष्ठिर! उपनयनके समय ब्राह्मणको मूँजकी, क्षत्रियको प्रत्यज्जाकी और वैश्यको शणकी मेखला धारण करनी चाहिये। यही धर्म है
ভীষ্মে ক’লে—হে যুধিষ্ঠিৰ! উপনয়নৰ সময়ত ব্ৰাহ্মণৰ মেখলা মুঞ্জঘাঁহৰ, ক্ষত্ৰিয়ৰ মৌৰ্বী (ধনুৰ্জ্যা-তন্তু) আৰু বৈশ্যৰ শণ/সন তন্তুৰ হ’ব লাগে। এইয়েই ধৰ্মৰ স্থিৰ বিধান।
Verse 41
(पालाशो द्विजदण्ड: स्यादश्वत्थ: क्षत्रियस्य तु । औदुम्बरश्न वैश्यस्य धर्म एष युधिष्ठिर ।।) ब्राह्मणगका दण्ड पलाशका, क्षत्रियके लिये पीपलका और वैश्यके लिये गूलरका होना चाहिये। युधिष्ठिर! ऐसा ही धर्म है ।। दातुः प्रतिग्रहीतुश्न धर्माधर्माविमौ शूणु । ब्राह्मणस्यानृते<धर्म: प्रोक्त: पातकसंज्ञित: । चतुर्गुण: क्षत्रियस्य वैश्यस्याष्टगुण: स्मृत:,अब दान देने और दान लेनेवालेके धर्माधर्मका वर्णन सुनो। ब्राह्मणको झूठ बोलनेसे जो अधर्म या पातक बताया गया है उससे चौगुना क्षत्रियको और आठगुना वैश्यको लगता है
ভীষ্মে ক’লে—ব্ৰাহ্মণৰ দণ্ড পলাশ কাঠৰ, ক্ষত্ৰিয়ৰ অশ্বত্থ (পিপল) কাঠৰ আৰু বৈশ্যৰ উদুম্বৰ (গোলৰ) কাঠৰ হ’ব লাগে। হে যুধিষ্ঠিৰ! এইয়েই ধৰ্ম। এতিয়া দান দিয়া আৰু দান গ্ৰহণ কৰা লোকৰ ধৰ্ম-অধৰ্ম শুনা। ব্ৰাহ্মণৰ মিথ্যাভাষণত যি ‘পাতক’ বুলি কোৱা হৈছে, সেয়া ক্ষত্ৰিয়ৰ ক্ষেত্ৰত চাৰিগুণ আৰু বৈশ্যৰ ক্ষেত্ৰত আঠগুণ বুলি স্মৃতিত গণ্য।
Verse 42
नान्यत्र ब्राह्मणोश्रीयात् पूर्व विप्रेण केतित: । यवीयान् पशुहिंसायां तुल्यधर्मो भवेत् स हि,यदि किसी ब्राह्मणने पहलेसे ही श्राद्धका निमन्त्रण दे रखा हो तो निमन्त्रित ब्राह्मणको दूसरी जगह जाकर भोजन नहीं करना चाहिये। यदि वह करता है तो छोटा समझा जाता है और उसे पशुहिंसाके समान पाप लगता है
ভীষ্মে ক’লে—যদি কোনো ব্ৰাহ্মণক আগতেই অন্য এজন ব্ৰাহ্মণে শ্রাদ্ধৰ বাবে নিমন্ত্ৰণ কৰি ৰাখে, তেন্তে নিমন্ত্ৰিত ব্ৰাহ্মণে অন্য ঠাইলৈ গৈ ভোজন নকৰিব। যদি সি তেনে কৰে, তেন্তে সি হীন বুলি গণ্য হয় আৰু তাৰ দোষ পশুহিংসাৰ সমান বুলি ধৰা হয়।
Verse 43
तथा राजन्यवैश्याभ्यां यद्यश्नरीयात्तु केतित: । यवीयान् पशुहिंसायां भागार्ध समवाप्लुयात्,यदि उसे क्षत्रिय या वैश्यने पहलेसे निमन्त्रण दे रखा हो और वह कहीं अन्यत्र जाकर भोजन कर ले तो छोटा समझे जानेके साथ ही वह पशुहिंसाके आधे पापका भागी होता है
ভীষ্মে ক’লে—হে ৰাজন! ক্ষত্ৰিয় বা বৈশ্যই যদি আগতেই বিধিপূৰ্বক নিমন্ত্ৰণ দিয়ে থয়, আৰু সেই ব্যক্তি তাক উপেক্ষা কৰি আন ঠাইত গৈ ভোজন কৰে, তেন্তে সি নিন্দিত গণ্য হয় আৰু সেই ভোজনে হোৱা পশুহিংসাজনিত পাপৰ অর্ধাংশ তাৰ ভাগত পৰে।
Verse 44
दैवं वाप्यथवा पित्र्यं योडश्रीयाद ब्राह्मणादिषु । अस्नातो ब्राह्मणो राजंस्तस्याधर्मो गवानृतम्,नरेश्वर! जो ब्राह्मण ब्राह्मणादि तीनों वर्णोके यहाँ देवयज्ञ अथवा श्राद्धमें स्नान किये बिना ही भोजन करता है, उसे गौकी झूठी शपथ खानेके समान पाप लगता है
হে ৰাজন! যি ব্ৰাহ্মণে ব্ৰাহ্মণাদি (ত্রিবৰ্ণৰ) গৃহত দেৱযজ্ঞ বা পিতৃকাৰ্য (শ্ৰাদ্ধ)ত স্নান নকৰাকৈ ভোজন কৰে, সেই অস্নাত ব্ৰাহ্মণৰ অধৰ্ম গোৰ ওপৰত মিছা শপথ লোৱাৰ সমান বুলি স্মৃত।
Verse 45
आशीौचो ब्राह्मणो राजन् यो+श्रीयाद् ब्राह्मणादिषु । ज्ञानपूर्वमथो लोभात् तस्याधर्मो गवानृतम्,राजन! जो ब्राह्मण अपने घरमें अशौच रहते हुए भी लोभवश जान-बूझकर दूसरे ब्राह्मण आदिके यहाँ श्राद्धका अन्न ग्रहण करता है उसे भी गौकी झूठी शपथ खानेका पाप लगता है
হে ৰাজন! যি ব্ৰাহ্মণে নিজৰ ঘৰত অশৌচ থাকিলেও লোভত জেনে-বুজে আন ব্ৰাহ্মণাদি গৃহত শ্ৰাদ্ধৰ অন্ন গ্ৰহণ কৰে, তাৰ অধৰ্মো গোৰ ওপৰত মিছা শপথ লোৱাৰ সমান বুলি কোৱা হৈছে।
Verse 46
अर्थनान्येन यो लिप्सेत् कर्मार्थ चैव भारत । आमन्त्रयति राजेन्द्र तस्याधर्मोडनृतं स्मृतम्,भरतनन्दन! राजेन्द्र! जो तीर्थयात्रा आदि दूसरा प्रयोजन बताकर उसीके बहाने अपनी जीविकाके लिये धन माँगता है अथवा “मुझे अमुक (यज्ञादि) कर्म करनेके लिये धन दीजिये” ऐसा कहकर जो दाताको अपनी ओर अभिमुख करता है उसके लिये भी वही झूठी शपथ खानेका पाप बताया गया है
ভীষ্মে ক’লে—হে ভাৰত! যি মানুহে অন্য কোনো উদ্দেশ্য দেখুৱাই তাৰ আড়ত ধন বিচাৰে, অথবা ‘অমুক কৰ্ম (যজ্ঞাদি) কৰিবলৈ মোক ধন দিয়া’ বুলি কৈ দাতাক নিজৰ ফালে টানি আনে, তাৰ বাবে ই অধৰ্ম আৰু অনৃত (মিছা) বুলি স্মৃত।
Verse 47
अवेददब्रतचारित्रास्त्रिभिवरर्णर्युधिष्ठिर । मन्त्रवत्परिविष्यन्ते त्स्याधमों गवानृतम्,युधिष्ठिर! जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वेदव्रतका पालन न करनेवाले ब्राह्मणोंको श्राद्धमें मन््त्रोच्चारणपूर्वक अन्न परोसते हैं, उन्हें भी गायकी झूठी शपथ खानेका पाप लगता है
হে যুধিষ্ঠিৰ! ব্ৰাহ্মণ, ক্ষত্ৰিয় আৰু বৈশ্য—এই তিন বৰ্ণৰ লোক—যদি বেদব্ৰত আৰু শিষ্টাচাৰ নপালন কৰা ব্ৰাহ্মণসকলক শ্ৰাদ্ধত মন্ত্ৰোচ্চাৰসহ অন্ন পৰিবেশন কৰে, তেন্তে তেওঁলোকৰো অধৰ্ম গোৰ ওপৰত মিছা শপথ লোৱাৰ সমান বুলি কোৱা হৈছে।
Verse 48
युधिछिर उवाच पित्र्यं वाप्यथवा दैवं दीयते यत् पितामह । एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं दत्त केषु महाफलम्,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! देवयज्ञ अथवा श्राद्ध-कर्ममें जो दान दिया जाता है, वह कैसे पुरुषोंको देनेसे महान् फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है? मैं इस बातको जानना चाहता हूँ
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—পিতামহ! পিতৃকাৰ্য (শ্ৰাদ্ধ)ত বা দেৱযজ্ঞত যি দান দিয়া হয়, সেয়া কোন কোন পাত্ৰক দিলে মহাফল লাভ হয়? মই এই কথা জানিব বিচাৰোঁ।
Verse 49
भीष्म उवाच येषां दारा: प्रतीक्षन्ते सुवृष्टिमिव कर्षका: । उच्छेषपरिशेषं हि तान् भोजय युधिष्ठिर,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! जैसे किसान वर्षाकी बाट जोहता रहता है, उसी प्रकार जिनके घरोंकी स्त्रियाँ अपने स्वामीके खा लेनेपर बचे हुए अन्नकी प्रतीक्षा करती रहती हैं (अर्थात् जिनके घरमें बनी हुई रसोईके सिवा और कोई अन्नका संग्रह न हो), उन निर्धन ब्राह्मणोंको तुम अवश्य भोजन कराओ
ভীষ্মে ক’লে—যুধিষ্ঠিৰ! যেনেকৈ কৃষকে সুভৃষ্টিৰ অপেক্ষা কৰে, তেনেকৈ যিসকলৰ ঘৰত স্ত্ৰীয়ে স্বামীয়ে খাই লোৱাৰ পাছত বাকি থকা অন্নৰ অপেক্ষা কৰি থাকে—অৰ্থাৎ দিনৰ ৰান্ধনিৰ বাহিৰে কোনো সঞ্চয় নাই—সেই দৰিদ্ৰ ব্ৰাহ্মণসকলক তুমি নিশ্চয় ভোজন কৰোৱা।
Verse 50
चारित्रनिरता राजन् ये कृशा: कृशवृत्तय: । अर्थिनश्लोपगच्छन्ति तेषु दत्त महाफलम्,राजन्! जो सदाचारपरायण हों, जिनकी जीविकाका साधन नष्ट हो गया हो और इसीलिये भोजन न मिलनेके कारण जो अत्यन्त दुर्बल हो गये हों, ऐसे लोग यदि याचक होकर दाताके पास आते हैं तो उन्हें दिया हुआ दान महान् फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है
ভীষ্মে ক’লে—হে ৰাজন! যিসকল সদাচাৰত নিবিষ্ট, যিসকলৰ জীৱিকাৰ উপায় নষ্ট হৈছে আৰু অন্নাভাৱত অতিশয় কৃশ হৈ পৰিছে—এনে লোক যেতিয়া যাচক হৈ দাতাৰ ওচৰলৈ আহে, তেন্তে তেওঁলোকক দিয়া দান মহাফল প্ৰদান কৰে।
Verse 51
तद्धभक्तास्तद्गृहा राजंस्तद्धलास्तदपाश्रया: । अर्थिनश्व भवन्त्यर्थे तेषु दत्त महाफलम्,नरेश्वर! जो सदाचारके ही भक्त हैं, जिनके घरमें सदाचारका ही पालन होता है, जिन्हें सदाचारका ही बल है तथा जिन्होंने सदाचारका ही आश्रय ले रखा है, वे यदि आवश्यकता पड़नेपर याचना करते हैं तो उनको दिया हुआ दान महान् फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है
ভীষ্মে ক’লে—হে নৰেশ্বৰ! যিসকল সেই ধৰ্মৰেই ভক্ত, যিসকলৰ গৃহ ধৰ্মত প্ৰতিষ্ঠিত, যিসকলৰ বল ধৰ্ম আৰু যিসকল ধৰ্মকেই আশ্ৰয় কৰিছে—তেওঁলোকে প্ৰয়োজনবশতঃ যেতিয়া যাচনা কৰে, তেন্তে তেওঁলোকক দিয়া দান মহাফল প্ৰদান কৰে।
Verse 52
तस्करेभ्य: परेभ्यो वा ये भयार्ता युधिष्ठिर । अर्थिनो भोक्तुमिच्छन्ति तेषु दत्त महाफलम्,युधिष्ठिर! चोरों और शत्रुओंके भयसे पीड़ित होकर आये हुए जो याचक केवल भोजन चाहते हैं उन्हें दिया हुआ दान महान् फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है
ভীষ্মে ক’লে—যুধিষ্ঠিৰ! চোৰ বা শত্ৰুৰ ভয়ত পীড়িত হৈ অহা যিসকল যাচক কেৱল ভোজন বিচাৰে, তেওঁলোকক দিয়া দান মহাফল প্ৰদান কৰে।
Verse 53
अकल्ककस्य विप्रस्य रौक्ष्यात् करकृतात्मन: । वटवो यस्य भिक्षन्ति तेभ्यो दत्त महाफलम्,जिसके मनमें किसी तरहका कपट नहीं है, अत्यन्त दरिद्रताके कारण जिसके हाथमें अन्न आते ही उसके भूखे बच्चे “मुझे दो,” “मुझे दो" ऐसा कहकर माँगने लगते हैं; ऐसे निर्धन ब्राह्मण और उसके उन बच्चोंको दिया हुआ दान महान् फलदायक होता है
ভীষ্মে ক’লে—যি নিষ্কপট ব্ৰাহ্মণ অতিশয় দাৰিদ্ৰ্যত কঠোৰ হৈ পৰে, আৰু যাৰ হাতত অলপ অন্ন আহিলেই তাৰ ভোকাতুৰ সন্তানসকলে তৎক্ষণাৎ “মোক দিয়া, মোক দিয়া” বুলি ভিক্ষা মাগে—সেই ব্ৰাহ্মণ আৰু সেই সন্তানসকলক দিয়া দান মহাফলদায়ক হয়।
Verse 54
हृतस्वा ह्तदाराश्ष ये विप्रा देशसम्प्लवे । अर्थार्थमभिगच्छन्ति तेभ्यो दत्त महाफलम्,देशमें विप्लव होनेके समय जिनके धन और स्त्रियाँ छिन गयी हों; वे ब्राह्मण यदि धनकी याचनाके लिये आयें तो उन्हें दिया हुआ दान महान् फलदायक होता है
ভীষ্মে ক’লে—দেশত বিপ্লৱ-দুৰ্যোগৰ সময়ত যিসকল ব্ৰাহ্মণৰ ধন লুট হৈ যায় আৰু যিসকলৰ স্ত্ৰী অপহৃত হয়, তেওঁলোকে যদি জীৱিকাৰ বাবে ধন যাচনা কৰি আহে—তেওঁলোকক দিয়া দান মহাফলদায়ক হয়।
Verse 55
व्रतिनो नियमस्थाश्न ये विप्रा: श्रुतसम्मता: । तत्समाप्त्यर्थमिच्छन्ति तेभ्यो दत्त महाफलम्,जो व्रत और नियममें लगे हुए ब्राह्मण वेद-शास्त्रोंकी सम्मतिके अनुसार चलते हैं और अपने व्रतकी समाप्तिके लिये धन चाहते हैं, उन्हें देनेसे महान् फलकी प्राप्ति होती है
ভীষ্মে ক’লে—যিসকল ব্ৰাহ্মণ ব্ৰত আৰু নিয়মত স্থিৰ হৈ, শ্রুতি-শাস্ত্ৰসন্মত পথ অনুসৰণ কৰে আৰু ব্ৰতসমাপ্তিৰ বাবে ধন কামনা কৰে—তেওঁলোকক দিয়া দান মহাফলদায়ক হয়।
Verse 56
अत्युक्रान्ताश्व धर्मेषु पाषण्डसमयेषु च । कृशप्राणा: कृशधनास्तेभ्यो दत्त महाफलम्,जो पाखण्डियोंके धर्मसे दूर रहते हैं, जिनके पास धनका अभाव है तथा जो अन्न न मिलनेके कारण दुर्बल हो गये हैं, उनको दिया हुआ दान महान् फलदायक होता है
ভীষ্মে ক’লে—যিসকল পাষণ্ডীৰ মত-ধৰ্মৰ পৰা দূৰে থাকে, ধনৰ অভাৱত ভোগে আৰু অন্ন নাপাই দুৰ্বল হৈ পৰে—তেওঁলোকক দিয়া দান মহাফলদায়ক হয়।
Verse 57
(व्रतानां पारणार्थाय गुर्वर्थे यज्ञदक्षिणाम् । निवेशार्थ च विद्वांसस्तेषां दत्त महाफलम् ।। जो दिद्वान् पुरुष व्रतोंका पारण, गुरुदक्षिणा, यज्ञदक्षिणा तथा विवाहके लिये धन चाहते हों, उन्हें दिया हुआ दान महान् फलदायक होता है ।। पित्रोश्व रक्षणार्थाय पुत्रदारार्थमेव वा । महाव्याधिविमोक्षाय तेषु दत्त महाफलम् ।। जो माता-पिताकी रक्षाके लिये, स्त्री-पुत्रोंक पालन तथा महान् रोगोंसे छुटकारा पानेके लिये धन चाहते हैं, उन्हें दिया हुआ दान महान् फलदायक होता है ।। बाला: स्त्रियश्व वाउछन्ति सुभक्त चाप्यसाधना: । स्वर्गमायान्ति दत्त्वैषां निरयान् नोपयान्ति ते ।।) जो बालक और स्त्रियाँ सब प्रकारके साधनोंसे रहित होनेके कारण केवल भोजन चाहती हैं, उन्हें भोजन देकर दाता स्वर्गमें जाते हैं। वे नरकमें नहीं पड़ते हैं ।। कृतसर्वस्वहरणा निर्दोषा: प्रभविष्णुभि: | स्पृहयन्ति च भुक्त्वान्न॑ तेषु दत्त महाफलम्,प्रभावशाली डाकुओंने जिन निर्दोष मनुष्योंका सर्वस्व छीन लिया हो, अत: जो खानेके लिये अन्न चाहते हों, उन्हें दिया हुआ दान महान् फलदायक होता है
ভীষ্মে ক’লে—ব্ৰতপাৰণ, গুৰুদক্ষিণা, যজ্ঞদক্ষিণা আৰু গৃহস্থ-প্ৰতিষ্ঠা (বিবাহাদি)ৰ বাবে ধন কামনা কৰা বিদ্বানসকলক দিয়া দান মহাফলদায়ক। তদ্ৰূপ, মাতৃ-পিতৃৰ ৰক্ষাৰ বাবে, পত্নী-পুত্ৰৰ পালনাৰ্থে, অথবা মহাৰোগৰ পৰা মুক্তিৰ বাবে ধন বিচৰা লোকক দিয়া দানও মহাফল দিয়ে। আৰু উপায়হীন বালক আৰু নাৰীসকলে কেৱল সুপাচ্য আহাৰ মাগিলে, তেওঁলোকক আহাৰ দান কৰা দাতা স্বৰ্গ লাভ কৰে; নৰকত নপৰে। লগতে প্ৰভাৱশালী দস্যুৱে যিসকল নিৰ্দোষ লোকৰ সৰ্বস্ব হৰণ কৰিছে, তেওঁলোকে যদি অন্নৰ আকাঙ্ক্ষা কৰে—তেওঁলোকক অন্নদান কৰাও মহাফলদায়ক।
Verse 58
तपस्विनस्तपोनिष्ठास्तेषां भैक्षचराश्न ये । अर्थिन: किज्चिदिच्छन्ति तेषु दत्त महाफलम्,जो तपस्वी और तपोनिष्ठ हैं तथा तपस्वी जनोंके लिये ही भीख माँगते हैं, ऐसे याचक यदि कुछ चाहते हैं तो उन्हें दिया हुआ दान महान् फलदायक होता है
যিসকল তপস্বী তপস্যাত দৃঢ় আৰু তপস্বীৰ হিতৰ বাবেই ভিক্ষাবৃত্তি অৱলম্বন কৰে—এনে যোগ্য যাচকে অলপো যদি বিচাৰে, তেন্তে তেওঁলোকক দিয়া দান মহাফলদায়ক হয়।
Verse 59
महाफलविधिदनि श्रुतस्ते भरतर्षभ । निरयं येन गच्छन्ति स्वर्ग चैव हि तत् शूणु,भरतश्रेष्ठ। किनको दान देनेसे महान् फलकी प्राप्ति होती है, यह विषय मैंने तुम्हें सुना दिया। अब जिन कर्मोसे मनुष्य नरक या स्वर्गमें जाते हैं, उन्हें सुनो
হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! মহাফলদায়ক দানবিধি তুমি মোৰ পৰা শুনিলা। এতিয়া যি কৰ্মে মানুহ নৰকলৈ যায় আৰু যি কৰ্মে স্বৰ্গলৈও যায়—সেয়া শুনা।
Verse 60
गुर्वर्थमभयार्थ वा वर्जयित्वा युधिष्ठिर । येडनृतं कथयन्ति सम ते वै निरयगामिन:,युधिष्ठिर! गुरुकी भलाईके लिये तथा दूसरेको भयसे मुक्त करनेके लिये जो झूठ बोलनेका अवसर आता है, उसे छोड़कर अन्यत्र जो झूठ बोलते हैं वे मनुष्य निश्चय ही नरकगामी होते हैं
হে যুধিষ্ঠিৰ! গুৰুৰ হিতৰ বাবে বা আনক ভয়মুক্ত কৰিবলৈ যি অসত্য কোৱা হয়, সেয়া বাদ দি অন্য ক্ষেত্ৰত যিসকলে মিছা কয়, তেওঁলোক নিশ্চয় নৰকগামী।
Verse 61
परदाराभिहर्तार: परदाराभिमर्शिन: । परदारप्रयोक्तारस्ते वै निरयगामिन:,जो दूसरोंकी स्त्री चुरानेवाले, परायी स्त्रीका सतीत्व नष्ट करनेवाले तथा दूत बनकर परस्त्रीको दूसरोंसे मिलानेवाले हैं, वे निश्चय ही नरकगामी होते हैं
যিসকলে পৰস্ত্ৰীক অপহৰণ কৰে, যিসকলে পৰস্ত্ৰীৰ শীলভংগ কৰে, আৰু যিসকলে দূত হৈ পৰস্ত্ৰীক পৰপুৰুষৰ সৈতে অনাচাৰী মিলনত যোগায়—তেওঁলোক নিশ্চয় নৰকগামী।
Verse 62
ये परस्वापहर्तार: परस्वानां च नाशका: । सूचकाश्न परेषां ये ते वै निरयगामिन:,जो दूसरोंके धनको हड़पनेवाले और नष्ट करनेवाले हैं तथा दूसरोंकी चुगली खानेवाले हैं, उन्हें निश्षय ही नरकमें गिरना पड़ता है
যিসকলে আনৰ ধন অপহৰণ কৰে, যিসকলে আনৰ সম্পদ নষ্ট কৰে, আৰু যিসকলে আনৰ বিৰুদ্ধে চুগলী/নিন্দা কৰা সূচক হয়—তেওঁলোক নিশ্চয় নৰকগামী।
Verse 63
प्रपाणां च सभानां च संक्रमाणां च भारत | अगाराणां च भेत्तारो नरा निरयगामिन:,भरतनन्दन! जो पौंसलों, सभाओं, पुलों और किसीके घरोंको नष्ट करनेवाले हैं, वे मनुष्य निश्चय ही नरकमें पड़ते हैं
ভীষ্মে ক’লে—হে ভাৰত! যিসকলে জনসাধাৰণৰ পানস্থল, সভাগৃহ, সেতু আৰু পাৰাপাৰ-স্থান ধ্বংস কৰে আৰু আনৰ ঘৰত ভাঙি সোমাই সিহঁতক উজাৰি দিয়ে, সিহঁত নিশ্চয় নৰকগামী।
Verse 64
अनाथां प्रमदां बालां वृद्धां भीतां तपस्विनीम् । वज्चयन्ति नरा ये च ते वै निरयगामिन:,जो लोग अनाथ, बूढ़ी, तरुणी, बालिका, भयभीत और तपस्विनी स्त्रियोंको धोखेमें डालते हैं, वे निश्चय ही नरकगामी होते हैं
যিসকলে অনাথা, বৃদ্ধা, যুৱতী, বালিকা, ভীত আৰু তপস্বিনী নাৰীক প্ৰতাৰণা কৰে, সিহঁত নিশ্চয় নৰকগামী।
Verse 65
वृत्तिच्छेदं गृहच्छेदं दारच्छेदं च भारत । मित्रच्छेदं तथा55शायास्ते वै निरयगामिन:,भरतनन्दन! जो दूसरोंकी जीविका नष्ट करते, घर उजाड़ते, पति-पत्नीमें विछोह डालते, मित्रोंमें विरोध पैदा करते और किसीकी आशा भड़ करते हैं, वे निश्चय ही नरकमें जाते हैं
হে ভাৰত! যিসকলে আনৰ জীৱিকা কাটি দিয়ে, ঘৰ উজাৰি দিয়ে, স্বামী-স্ত্ৰীৰ বিচ্ছেদ ঘটায়, বন্ধুসমূহৰ মাজত বিভেদ বোৱায় আৰু কাৰোবাৰ আশা ভাঙি দিয়ে—সিহঁত নিশ্চয় নৰকলৈ যায়।
Verse 66
सूचका: सेतुभेत्तार: परवृत््युपजीवका: । अकृच्ञाश्च मित्राणां ते वै निरयगामिन:,जो चुगली खानेवाले, कुल या धर्मकी मर्यादा नष्ट करनेवाले, दूसरोंकी जीविकापर गुजारा करनेवाले तथा मित्रोंद्वारा किये गये उपकारको भुला देनेवाले हैं, वे निश्चय ही नरकमें पड़ते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যিসকলে চুগলি/সূচক, যিসকলে ধৰ্ম- কুল-সমাজৰ ৰক্ষাকবচ সীমা ভাঙে, যিসকলে আনৰ উপাৰ্জনত জীয়াই থাকে, আৰু যিসকলে বন্ধুদের উপকাৰ পাহৰি অকৃতজ্ঞ হয়—সিহঁত নিশ্চয় নৰকগামী।
Verse 67
पाषण्डा दूषकाश्चैव समयानां च दूषका: । ये प्रत्यवसिता श्चैव ते वै निरयगामिन:,जो पाखण्डी, निन्दक, धार्मिक नियमोंके विरोधी तथा एक बार संन्यास लेकर फिर गृहस्थ-आश्रममें लौट आनेवाले हैं, वे निश्चय ही नरकगामी होते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যিসকলে পাষণ্ডী, নিন্দুক, ধৰ্মীয় আচাৰ-নিয়মক কলুষিত কৰে, আৰু যিসকলে এবাৰ সন্ন্যাস লৈ পুনৰ গৃহস্থাশ্ৰমলৈ ঘূৰি আহে—সিহঁত নিশ্চয় নৰকগামী।
Verse 68
विषमव्यवहाराश्नव विषमाश्रैव वृद्धिषु । लाभेषु विषमाश्चैव ते वै निरयगामिन:,जिनका व्यवहार सबके प्रति समान नहीं है तथा जो लाभ और वृद्धिमें विषम दृष्टि रखते हैं--ईमानदारीसे उसका वितरण नहीं करते हैं, वे अवश्य ही नरकगामी होते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যিসকলৰ ব্যৱহাৰ সকলোৰে প্ৰতি সমান নহয়, আৰু লাভ আৰু বৃদ্ধি বিষয়ত যিসকলে পক্ষপাত কৰে—ন্যায়ে বণ্টন নকৰে—সিহঁত নিশ্চয় নৰকগামী।
Verse 69
दूतसंव्यवहाराश्व निष्परीक्षाश्व मानवा: । प्राणिहिंसाप्रवृत्ता श्व ते वै निरयगामिन:,जो किसी मनुष्यकी परख करनेमें समर्थ नहीं हैं और दूतका काम करते हैं, जिनकी सदा जीवहिंसामें प्रवृत्ति होती है, वे निश्चय ही नरकमें गिरते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যিসকলে পৰখ-বিচাৰ কৰিবলৈ অক্ষম হৈও দূতৰ কাম কৰে, আৰু যিসকলে সদায় প্ৰাণিহিংসাত প্ৰবৃত্ত থাকে, সিহঁত নিশ্চয় নৰকত পতিত হয়।
Verse 70
कृताशं कृतनिर्देशं कृतभक्तं कृतश्रमम् । भेदैयें व्यपकर्षन्ति ते वै निरयगामिन:,जो वेतनपर रखे हुए परिश्रमी नौकरको कुछ देनेकी आशा देकर और देनेका समय नियत करके उसके पहले ही भेदनीतिके द्वारा उसे मालिकके यहाँसे निकलवा देते हैं, वे अवश्य ही नरकमें जाते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যিসকলে বেতনত ৰখা পৰিশ্ৰমী ভৃত্যক কিবা দিব বুলি আশা দেখুৱাই, দিবলগীয়া সময়ো নিৰ্দ্ধাৰণ কৰি, তাৰ আগতেই ভেদনীতিয়ে তাক গৰাকীৰ সেৱাৰ পৰা আঁতৰাই দিয়ে—সিহঁত নিশ্চয় নৰকগামী।
Verse 71
पर्यश्षन्ति च ये दारानग्निभृत्यातिथींस्तथा । उत्सन्नपितृदेवेज्यास्ते वै निरयगामिन:,जो पितरों और देवताओंके यजन-पूजनका त्याग करके अग्निमें आहुति दिये बिना तथा अतिथि, पोष्यवर्ग और स्त्री-बच्चोंको अन्न दिये बिना ही भोजन कर लेते हैं, वे नि:संदेह नरकगामी होते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যিসকলে পিতৃ আৰু দেৱতাৰ যজন-পূজন ত্যাগ কৰি, অগ্নিত আহুতি নিদিয়ে, অতিথি, ভৃত্যবৰ্গ আৰু স্ত্ৰী-সন্তান আদি আশ্ৰিতক অন্ন নিদিয়াকৈ নিজে ভোজন কৰে—সিহঁত নিঃসন্দেহে নৰকগামী।
Verse 72
वेदविक्रयिणश्रैव वेदानां चैव दूषका: । वेदानां लेखकाश्रैव ते वै निरयगामिन:,जो वेद बेचते हैं, वेदोंकी निन्दा करते हैं और विक्रयके लिये ही वेदोंके मन्त्र लिखते हैं, वे भी निश्चय ही नरकगामी होते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যিসকলে বেদ বিক্ৰী কৰে, যিসকলে বেদৰ নিন্দা বা দুষণ কৰে, আৰু যিসকলে কেৱল বাণিজ্যৰ বাবে বেদমন্ত্ৰ লিখে—সিহঁত নিশ্চয় নৰকগামী।
Verse 73
चातुराश्रम्यबाह्ाश्र श्रुतिबाह्माश्व ये नरा: । विकर्मभिक्ष जीवन्ति ते वै निरयगामिन:,जो मनुष्य चारों आश्रमों और वेदोंकी मर्यादासे बाहर हैं तथा शास्त्रविरुद्ध कर्मोंसे ही जीविका चलाते हैं, उन्हें निश्चय ही नरकमें गिरना पड़ता है
ভীষ্ম ক’লে—যিসকল মানুহ চতুৰাশ্ৰমৰ শাসন আৰু বেদৰ অধিকাৰৰ বাহিৰত থাকে, আৰু শাস্ত্ৰবিৰুদ্ধ কৰ্ম বা ভিক্ষাৱৃত্তিৰে জীৱিকা চলায়, তেওঁলোক নিশ্চয় নৰকগামী।
Verse 74
केशविक्रयिका राजन् विषविक्रयिकाश्न ये । क्षीरविक्रयिकाश्वैव ते वै निरयगामिन:,राजन! जो (ब्राह्मण) केश, विष और दूध बेचते हैं, वे भी नरकमें ही जाते हैं
ভীষ্ম ক’লে—হে ৰাজন! যিসকলে চুলি বিক্ৰী কৰে, বিষ বিক্ৰী কৰে, আৰু দুধ বিক্ৰী কৰে—তেওঁলোকো নিশ্চয় নৰকগামী।
Verse 75
ब्राह्मणानां गवां चैव कन्यानां च युधिष्ठिर । येडन्तरं यान्ति कार्येषु ते वै निरयगामिन:,युधिष्ठिर! जो बाह्मण, गौ तथा कन्याओंके लिये हितकर कार्यमें विघ्न डालते हैं, वे भी अवश्य ही नरकगामी होते हैं
ভীষ্ম ক’লে—হে যুধিষ্ঠিৰ! যিসকলে ব্ৰাহ্মণ, গাই আৰু কন্যাৰ হিতকাৰ্যত বাধা দিয়ে, তেওঁলোক নিশ্চয় নৰকগামী।
Verse 76
शस्त्रविक्रयिकाश्वैव कर्तारश्न युधिष्ठिर । शल्यानां धनुषां चैव ते वै निरयगामिन:,राजा युधिष्लिर! जो (ब्राह्मण) हथियार बेचते और धनुष-बाण आदि शणस्त्रोंको बनाते हैं, वे नरकगामी होते हैं
ভীষ্ম ক’লে—হে যুধিষ্ঠিৰ! যিসকলে অস্ত্ৰ বিক্ৰী কৰে আৰু যিসকলে তীৰ-ধনু আদি শস্ত্ৰ নিৰ্মাণ কৰে, তেওঁলোক নিশ্চয় নৰকগামী।
Verse 77
शिलाभि: शड्कुभियववपि श्रवश्रैर्वा भरतर्षभ । ये मार्गमनुरुन्धन्ति ते वै निरयगामिन:,भरतश्रेष्ठ) जो पत्थर रखकर, काँटे बिछाकर और गड्ढे खोदकर रास्ता रोकते हैं, वे भी नरकमें ही गिरते हैं
ভীষ্ম ক’লে—হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! যিসকলে পাথৰ থৈ, খুঁটি/কাঁটা পুতি, বা গাঁত খুঁদি পথ অৱৰোধ কৰে, তেওঁলোক নিশ্চয় নৰকগামী।
Verse 78
उपाध्यायांश्व भृत्यांश्व भक्ताश्न॑ भरतर्षभ । ये त्यजन्त्यविकारांस्त्रींस्ते वै निरयगामिन:,भरतभूषण! जो अध्यापकों, सेवकों तथा अपने भक्तोंको बिना किसी अपराधके ही त्याग देते हैं, उन्हें भी नरकमें ही गिरना पड़ता है
ভীষ্মে ক’লে—হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! যিসকলে নিৰ্দোষ উপাধ্যায়, সেৱক আৰু ভক্ত আশ্ৰিতসকলক ত্যাগ কৰে, তেওঁলোক নিশ্চয় নৰকগামী হয়।
Verse 79
अप्राप्तदमकाश्रैव नासानां वेधकाश्ष ये । बन्धकाश्व पशूनां ये ते वै निरयगामिन:,जो काबूमें न आनेवाले पशुओंका दमन करते, नाथते अथवा कटपरेमें बंद करते हैं, वे नरकगामी होते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যিসকলে বশ নোহোৱা পশুক বলপূৰ্বক দমন কৰে, নাক ছিদ্ৰ/আঘাত কৰে, বা বান্ধি আবদ্ধ কৰি ৰাখে, তেওঁলোক নৰকগামী বুলি কোৱা হয়।
Verse 80
अगोप्तारश्न॒ राजानो बलिषड्भागतस्करा: । समर्थाक्षाप्पदातारस्ते वै निरयगामिन:,जो राजा होकर भी प्रजाकी रक्षा नहीं करते और उसकी आमदनीके छठे भागको लगानके रूपमें लूटते रहते हैं तथा जो समर्थ होनेपर भी दान नहीं करते, उन्हें भी निःसंदेह नरकमें जाना पड़ता है
ভীষ্মে ক’লে—যিসকল ৰজাই প্ৰজাক ৰক্ষা নকৰে, তথাপি কৰ বুলি প্ৰজাৰ আয়ৰ ষষ্ঠাংশ চোৰৰ দৰে লয়; আৰু যিসকলে সামৰ্থ্য থাকিও দান নকৰে—তেওঁলোক নিশ্চয় নৰকগামী।
Verse 81
(संश्रुत्य चाप्रदातारो दरिद्राणां विनिन्दका: । श्रोत्रियाणां विनीतानां दरिद्राणां विशेषत: ।। क्षमिणां निन्दकाश्रैव ते वै निरयगामिन: ।) जो देनेकी प्रतिज्ञा करके भी नहीं देते, दरिद्रोंकी एवं विनयशील निर्धन श्रोत्रियोंकी और क्षमाशीलोंकी निन्दा करते हैं, वे भी अवश्य ही नरकमें जाते हैं ।। क्षान्तान् दान्तांस्तथा प्राज्ञान् दीर्घकालं सहोषितान् । त्यजन्ति कृतकृत्या ये ते वै निरयगामिन:,जो क्षमाशील, जितेन्द्रिय तथा दीर्घकालतक साथ रहे हुए विद्वानोंको अपना काम निकल जानेके बाद त्याग देते हैं, वे नरकमें गिरते हैं
যিসকলে দিব বুলি প্ৰতিশ্ৰুতি দি-ও নেদিয়ে, দৰিদ্ৰসকলৰ—বিশেষকৈ বিনয়শীল দৰিদ্ৰ শ্ৰোত্ৰিয়সকলৰ—আৰু ক্ষমাশীলসকলৰ নিন্দা কৰে, তেওঁলোক নিশ্চয় নৰকগামী। আৰু যিসকলে নিজৰ কাম সিদ্ধ হ’লে দীঘলীয়া সময় একেলগে থকা ক্ষমাশীল, ইন্দ্ৰিয়জিত, প্ৰাজ্ঞ লোকক ত্যাগ কৰে, তেওঁলোকো নৰকত পতিত হয়।
Verse 82
बालानामथ वृद्धानां दासानां चैव ये नरा: । अदत्त्वा भक्षयन्त्यग्रे ते वै निरयगामिन:,जो बालकों, बूढ़ों और सेवकोंको दिये बिना ही पहले स्वयं भोजन कर लेते हैं, वे भी निःसंदेह नरकगामी होते हैं
যিসকলে শিশু, বৃদ্ধ আৰু সেৱকসকলক আগতে নিদিয়াকৈ নিজে আগতে ভোজন কৰে, তেওঁলোক নিঃসন্দেহে নৰকগামী।
Verse 83
एते पूर्व विनिर्दिष्टा: प्रोक्ता निरयगामिन: । भागिन: स्वर्गलोकस्य वक्ष्यामि भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ) पहलेके संकेतके अनुसार यहाँ नरकगामी मनुष्योंका वर्णन किया गया है। अब स्वर्गलोकमें जानेवालोंका परिचय देता हूँ, सुनो
ভীষ্মে ক’লে—এঁলোকসকল আগতেই নৰকগামী বুলি নিৰ্দিষ্ট কৰি কোৱা হৈছে। এতিয়া, হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ, স্বৰ্গলোকৰ ভাগী যিসকল, তেওঁলোকৰ বৰ্ণনা কৰোঁ—শুনা।
Verse 84
सर्वेष्वेव तु कार्येषु दैवपूर्वेषु भारत । हन्ति पुत्रान् पशून् कृत्स्नान् ब्राह्मणातिक्रम: कृत:,भरतनन्दन! जिनमें पहले देवताओंकी पूजा की जाती है, उन समस्त कार्योंमें यदि ब्राह्यणका अपमान किया जाय तो वह अपमान करनेवालेके समस्त पुत्रों और पशुओंका नाश कर देता है
হে ভাৰত! যিসকল কৰ্মত প্ৰথমে দেৱপূজা হয়, সেই সকলো কৰ্মত যদি ব্ৰাহ্মণক অপমান কৰা হয়, তেন্তে সেই ব্ৰাহ্মণাতিক্ৰম অপমানকাৰীৰ সকলো পুত্ৰ আৰু সকলো পশুধন ধ্বংস কৰে।
Verse 85
दानेन तपसा चैव सत्येन च युधिष्ठिर । ये धर्ममनुवर्तन्ते ते नरा: स्वर्गगामिन:,जो दान, तपस्या और सत्यके द्वारा धर्मका अनुष्ठान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं
ভীষ্মে ক’লে—হে যুধিষ্ঠিৰ! দান, তপস্যা আৰু সত্যৰ দ্বাৰা যিসকলে ধৰ্ম অনুসৰণ কৰে, সেই মানুহসকল স্বৰ্গগামী হয়।
Verse 86
शुश्रूषाभिस्तपोभिश्व विद्यामादाय भारत । ये प्रतिग्रहनि:स्नेहास्ते नरा: स्वर्गगामिन:,भारत! जो गुरुशुश्रूषा और तपस्यापूर्वक वेदाध्ययन करके प्रतिग्रहमें आसक्त नहीं होते, वे लोग स्वर्गगामी होते हैं
ভীষ্মে ক’লে—হে ভাৰত! গুৰুশুশ্ৰূষা আৰু তপস্যাৰ দ্বাৰা বিদ্যা (বেদাধ্যয়ন) লাভ কৰি, প্ৰতিগ্ৰহত (দান/আশ্ৰয় গ্ৰহণত) আসক্তি নথকা লোকসকল স্বৰ্গগামী হয়।
Verse 87
भयात्पापात्तथा बाधादू दारिद्रयाद् व्याधिधर्षणात् । यत्कृते प्रतिमुच्यन्ते ते नरा: स्वर्गगामिन:,जिनके प्रयत्नसे मनुष्य भय, पाप, बाधा, दरिद्रता तथा व्याधिजनित पीड़ासे छुटकारा पा जाते हैं, वे लोग स्वर्गमें जाते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যিসকলৰ প্ৰচেষ্টাত মানুহে ভয়, পাপ, বাধা, দাৰিদ্ৰ্য আৰু ব্যাধিজনিত যন্ত্ৰণাৰ পৰা মুক্তি পায়, সেই লোকসকল স্বৰ্গগামী হয়।
Verse 88
क्षमावन्तश्न धीराश्च धर्मकार्येषु चोत्थिता: | मड़ुलाचारसम्पन्ना: पुरुषा: स्वर्गगामिन:,जो क्षमावान्, धीर, धर्मकार्यके लिये उद्यत रहनेवाले और मांगलिक आचारसे सम्पन्न हैं, वे पुरुष भी स्वर्गगामी होते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যিসকল পুৰুষ ক্ষমাশীল, ধীৰ, ধৰ্মকাৰ্যত সদা উদ্যত আৰু মঙ্গলময় তথা শৃঙ্খলাবদ্ধ আচাৰে সমৃদ্ধ, তেওঁলোকে এই গুণবলেই স্বৰ্গপথ লাভ কৰে।
Verse 89
निवृत्ता मधुमांसे भ्य: परदारेभ्य एव च | निवत्ताश्चैव मद्येभ्यस्ते नरा: स्वर्गगामिन:,जो मद, मांस, मदिरा और परस्त्रीसे दूर रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যিসকলে মধু আৰু মাংসৰ পৰা নিবৃত্ত, পৰস্ত্ৰীৰ পৰা সংযত, আৰু মদ্য আদি নেশাজাতীয় বস্তুৰ পৰাও দূৰত থাকে—সেই নৰসকল স্বৰ্গগামী হয়।
Verse 90
आश्रमाणां च कर्तार: कुलानां चैव भारत । देशानां नगराणां च ते नरा: स्वर्गगामिन:,भारत! जो आश्रम, कुल, देश और नगरके निर्माता तथा संरक्षक हैं, वे पुरुष स्वर्गमें जाते हैं
ভীষ্মে ক’লে—হে ভাৰত! যিসকলে আশ্ৰম, কুল, দেশ আৰু নগৰৰ স্থাপক আৰু সংৰক্ষক, তেওঁলোক স্বৰ্গগামী হয়।
Verse 91
वस्त्राभरणदातारो भक्तपानान्नदास्तथा । कुट॒म्बानां च दातार: पुरुषा: स्वर्गगामिन:,जो वस्त्र, आभूषण, भोजन, पानी तथा अन्न दान करते हैं एवं दूसरोंके कुट॒म्बकी वृद्धिमें सहायक होते हैं, वे पुरुष स्वर्गलोकमें जाते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যিসকলে বস্ত্ৰ আৰু অলংকাৰ দান কৰে, ভোজন, পানীয় আৰু অন্ন দিয়ে, আৰু আনৰ কুটুম্বৰ পোষণ-প্ৰবৃদ্ধিত সহায় কৰে—তেওঁলোক স্বৰ্গলোক লাভ কৰে।
Verse 92
सर्वहिंसानिवृत्ताश्न॒ नरा: सर्वसहाश्च ये । सर्वल्याश्रयभूताश्न ते नरा: स्वर्गगामिन:,जो सब प्रकारकी हिंसाओंसे अलग रहते हैं, सब कुछ सहते हैं और सबको आश्रय देते रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যিসকলে সকলো প্ৰকাৰৰ হিংসাৰ পৰা নিবৃত্ত, সকলো কষ্ট সহন কৰে, আৰু সকলো প্ৰাণীৰ আশ্ৰয় হৈ উঠে—তেওঁলোক স্বৰ্গগামী হয়।
Verse 93
मातरं पितरं चैव शुश्रूषन्ति जितेन्द्रिया: । | 4 058 सस्नेहास्ते नरा: स्वर्गगामिन:,जो होकर माता-पिताकी सेवा करते हैं तथा भाइयोंपर स्नेह रखते हैं, वे लोग स्वर्गलोकमें जाते हैं
যিসকলে ইন্দ্ৰিয়-সংযমী হৈ মাতৃ-পিতৃৰ শুশ্ৰূষা কৰে আৰু ভ্ৰাতৃসকলৰ প্ৰতি স্নেহবান থাকে, সেই নৰসকল স্বৰ্গলোক লাভ কৰে।
Verse 94
आढ्याक्ष बलवन्तक्ष यौवनस्थाश्ष भारत । ये वै जितेन्द्रिया धीरास्ते नरा: स्वर्गगामिन:,भारत! जो धनी, बलवान् और नौजवान होकर भी अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखते हैं, वे धीर पुरुष स्वर्गगामी होते हैं
হে ভাৰত! ধনী, বলবান আৰু যৌৱনস্থ হৈয়ো যিসকলে ইন্দ্ৰিয় সংযম কৰে, সেই ধীৰ নৰসকল স্বৰ্গগামী হয়।
Verse 95
अपराधिषु सस्नेहा मृदवो मृदुवत्सला: । आराधनसुखाश्षापि पुरुषा: स्वर्गगामिन:,जो अपराधियोंके प्रति भी दया रखते हैं, जिनका स्वभाव मृदुल होता है, जो मृदुल स्वभाववाले व्यक्तियोंपर प्रेम रखते हैं तथा जिन्हें दूसरोंकी आराधना (सेवा) करनेमें ही सुख मिलता है, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं
যিসকলে অপৰাধীৰ প্ৰতিও স্নেহবান, যিসকলৰ স্বভাৱ মৃদু, মৃদুস্বভাৱী লোকক ভালপায় আৰু আনক আদৰ-সেৱা কৰাতেই সুখ পায়—সেই নৰসকল স্বৰ্গগামী হয়।
Verse 96
सहस्रपरिवेष्टारस्तथैव च सहस्रदा: । त्रातारक्ष सहस्त्राणां ते नरा: स्वर्गगामिन:,जो मनुष्य सहस्रों मनुष्योंको भोजन परोसते, सहस्रोंको दान देते तथा सहस्रोंकी रक्षा करते हैं, वे स्वर्गगामी होते हैं
যিসকলে সহস্ৰজনক অন্ন পৰিবেশন কৰে, সহস্ৰজনক দান দিয়ে আৰু সহস্ৰজনক ৰক্ষা-উদ্ধাৰ কৰে, সেই নৰসকল স্বৰ্গগামী হয়।
Verse 97
सुवर्णस्य च दातारो गवां च भरतर्षभ | यानानां वाहनानां च ते नरा: स्वर्गगामिन:,भरतश्रेष्ठ! जो सुवर्ण, गौ, पालकी और सवारीका दान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं
হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! যিসকলে স্বৰ্ণ, গৰু আৰু পালকি আদি যান-ৱাহন দান কৰে, সেই নৰসকল স্বৰ্গলোক লাভ কৰে।
Verse 98
वैवाहिकानां द्रव्याणां प्रेष्याणां च युधिष्ठिर । दातारो वाससां चैव ते नरा: स्वर्गगामिन:,युधिष्ठिर! जो वैवाहिक द्रव्य, दास-दासी तथा वस्त्र दान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं
হে যুধিষ্ঠিৰ! যিসকলে বিবাহ-সম্পৰ্কীয় দ্ৰব্য, দাস-দাসী আৰু বস্ত্ৰ দান কৰে, সেই মানুহসকল স্বৰ্গগামী হয়।
Verse 99
विहारावसथोद्यानकूपारामसभाप्रपा: । वप्राणां चैव कर्तारस्ते नरा: स्वर्गगामिन:,जो दूसरोंके लिये आश्रम, गृह, उद्यान, कुआँ, बागीचा, धर्मशाला, पौंसला तथा चहारदीवारी बनवाते हैं, वे लोग स्वर्गलोकमें जाते हैं
অন্যৰ কল্যাণৰ বাবে বিহাৰস্থান, আশ্ৰয়গৃহ, উদ্যান, কূপ, উপৱন/আৰামস্থান, সভাগৃহ, প্ৰপা (পানীয়জল-স্থান) আৰু ৰক্ষাবেষ্টনী/প্ৰাচীৰ নিৰ্মাণ কৰাসকল স্বৰ্গলোকলৈ যায়।
Verse 100
निवेशनानां क्षेत्राणां वसतीनां च भारत । दातार: प्रार्थितानां च ते नरा: स्वर्गगामिन:,भरतनन्दन! जो याचकोंकी याचनाके अनुसार घर, खेत और गाँव प्रदान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं
হে ভাৰত! যিসকলে প্ৰাৰ্থিত হ’লে যাচকৰ অনুৰোধ অনুসাৰে ঘৰ, ক্ষেত্ৰ আৰু বসতি/গাঁও দান কৰে, সেইসকল স্বৰ্গগামী হয়।
Verse 101
रसानां चाथ बीजानां धान्यानां च युधिष्छिर । स्वयमुत्पाद्य दातार: पुरुषा: स्वर्गगामिन:,युधिष्ठिर! जो स्वयं ही पैदा करके रस, बीज और अन्नका दान करते हैं, वे पुरुष स्वर्गगामी होते हैं
হে যুধিষ্ঠিৰ! যিসকলে নিজে উৎপন্ন কৰি ৰস, বীজ আৰু ধান্য/অন্ন দান কৰে, সেই পুৰুষসকল স্বৰ্গগামী হয়।
Verse 102
यस्मिंस्तस्मिन् कुले जाता बहुपुत्रा: शतायुष: । सानुक्रोशा जितक्रोधा: पुरुषा: स्वर्गगामिन:,जो किसी भी कुलमें उत्पन्न हो बहुत-से पुत्रों और सौ वर्षकी आयुसे युक्त होते हैं, दूसरोंपर दया करते हैं और क्रोधको काबूमें रखते हैं, वे पुरुष स्वर्गलोकमें जाते हैं
যি কোনো কুলত জন্ম লৈ বহু পুত্ৰ আৰু শতায়ু লাভ কৰে, দয়াশীল থাকে আৰু ক্ৰোধ জয় কৰে—সেই পুৰুষসকল স্বৰ্গলোকলৈ যায়।
Verse 103
एतदुक्तममुत्रार्थ दैवं पित्रयं च भारत । दानधर्म च दानस्य यत् पूर्वमृषिभि: कृतम्,भारत! यह मैंने तुमसे परलोकमें कल्याण करनेवाले देवकार्य और पितृकार्यका वर्णन किया तथा प्राचीनकालमें ऋषियोंद्वारा बतलाये हुए दानधर्म और दानकी महिमाका भी निरूपण किया है
হে ভাৰত! মই তোমাক পৰলোক-কল্যাণকাৰী দেবকাৰ্য আৰু পিতৃকাৰ্যৰ বৰ্ণনা দিলোঁ; আৰু প্ৰাচীন ঋষিসকলে প্ৰতিপাদিত দানধৰ্ম আৰু দানৰ মহিমাও ব্যাখ্যা কৰিলোঁ।
Verse 106
ये भागा रक्षसां प्राप्तास्त उक्ता भरतर्षभ | घीकी आहुति दिये बिना ही जो कुछ परोसा जाता है तथा जिसमेंसे पहले कुछ दुराचारी मनुष्योंको भोजन करा दिया गया हो, वह राक्षसोंका भाग माना गया है। भरतश्रेष्ठ! अन्नके जो भाग राक्षसोंको प्राप्त होते हैं, उनका वर्णन यहाँ किया गया
হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! ঘৃতাহুতি নিদিয়াকৈ যি কিছু পৰিবেশন কৰা হয়, আৰু যি অন্নত আগতে কিছুমান দুষ্কৰ্মী লোকক ভোজন কৰোৱা হৈছে—সেয়া ৰাক্ষসৰ ভাগ বুলি গণ্য। ইয়াত ৰাক্ষসসকললৈ প্ৰাপ্য অন্নভাগসমূহৰ বৰ্ণনা দিয়া হৈছে।
The inquiry seeks a precise account of tīrtha efficacy—why seeing and bathing at sacred places is meritorious and what specific results (including afterlife outcomes) arise from such observances.
Merit is presented as conditional: tīrtha-bathing is repeatedly paired with regulated vows—fasting, purity, sense-control, truthfulness, non-violence, and conquest of desire/anger/greed—so the ethical discipline is treated as constitutive of the result.
Yes. It characterizes the teaching as a purifying ‘rahasya’ and states that hearing/reciting it yields purification and auspicious destiny; it also specifies controlled transmission to qualified recipients (dvijas, sādhus, kin, friends, or disciplined students).