
Anuśāsana-parva Adhyāya 112: Dharma as the sole companion; karmic witnesses; rebirth sequences (Bṛhaspati–Yudhiṣṭhira Saṃvāda)
Upa-parva: Bṛhaspati–Yudhiṣṭhira Saṃvāda (Discourse on saṃsāra, dharma as the companion after death, and karmic rebirth)
Yudhiṣṭhira inquires into the operative law of human destiny: which conduct leads to higher worlds, and who follows a person after death when the body is abandoned like wood or clay. Bhīṣma announces the arrival of Bṛhaspati and identifies him as uniquely qualified to disclose the ancient, confidential doctrine. After formal reception, Yudhiṣṭhira asks who truly supports a mortal—parents, kin, teacher, or others—beyond death. Bṛhaspati answers that one is born and dies alone; relatives remain only briefly, while dharma alone accompanies the departed. He explains that dharmic alignment leads to svarga and adharmic alignment to naraka, and that dharma should be practiced with justly obtained wealth; he also notes how greed, delusion, fear, and misplaced compassion can prompt wrongful acts. In response to questions about how dharma ‘follows’ an unseen, subtle being, Bṛhaspati describes the five elements, mind/intellect, and the self as constant witnesses. He then outlines a physiology of conception (elements and mind culminating in semen, then embryo) and proceeds to an extensive karmic catalogue: specific transgressions (e.g., betraying trust, theft of various goods, disrespect to parents/elders, violations involving the teacher’s household) correspond to particular rebirths and durations, with eventual return to human birth after demerit is exhausted. The chapter closes by reaffirming that these teachings were heard from Brahmā and urging sustained commitment to dharma.
Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह भीष्म से पूछते हैं—सभी तीर्थों में कौन-सा तीर्थ श्रेष्ठ है, जहाँ परम शौच (पवित्रता) प्राप्त होती है; बाह्य तीर्थ-यात्रा के पार कौन-सा आन्तरिक मार्ग है जो मनुष्य को सचमुच शुद्ध करे। → भीष्म उत्तर देते हैं कि पृथ्वी के तीर्थ गुणवान हैं, पर उनसे भी सूक्ष्म ‘तीर्थ’ मन के भीतर है। वे ‘मानस-तीर्थ’ का स्वरूप खोलते हैं—धृति का कुण्ड, सत्य का जल, अगाध-निर्मल-शुद्ध सरोवर; और फिर शौच के घटक गिनाते हैं: अकामता/अयाचना, आर्जव, सत्य, मार्दव, अहिंसा, दया/अनृशंस्य, दम-शम आदि। बाह्य स्नान बनाम आन्तरिक स्नान का प्रश्न तीखा होता जाता है—क्या केवल जल से पाप धुलता है, या वृत्ति-शुद्धि ही वास्तविक स्नान है? → भीष्म निर्णायक वाणी में ‘मानसे तीर्थे स्नातव्यं’ का विधान करते हैं—सत्त्व का आलम्बन लेकर शाश्वत मानस-तीर्थ में स्नान ही परम है। वे कहते हैं कि जिनके भीतर के रज-तम (और अंततः त्रिगुण-आवरण) धुल चुके, जो समदर्शी, सर्वत्यागी, सर्वज्ञ-भावी, वृत्तिशौच से शुद्ध हैं—वही ‘तीर्थ’ हैं और वही ‘शुचि’। शौचाचार में स्थित, भावसमाहित, केवल गुणसम्पन्न मनुष्य सदा शुद्ध है—यह अध्याय का शिखर-निर्णय है। → अध्याय बाह्य और आन्तरिक—दोनों प्रकार के तीर्थों को स्वीकारते हुए उनका क्रम निर्धारित करता है: पृथ्वी पर पुण्य तीर्थ हैं और मन में भी; जो दोनों में स्नान करता है वह शीघ्र सिद्धि पाता है। अंत में शौच का सार ‘प्रज्ञान’ (विवेक), शरीर की विशेष पवित्रता, निष्किंचनत्व और मन की प्रसन्नता के रूप में स्थिर होता है—तीर्थ-यात्रा का फल चरित्र-यात्रा में परिणत हो जाता है।
Verse 1
नफमशा (0) आज अन+- अष्टाधिकशततमोब<् ध्याय: मानस तथा पार्थिव तीर्थकी महत्ता युधिछिर उवाच यद् वरं सर्वतीर्थानां तन्मे ब्रूहि पितामह । यत्र चैव परं शौचं तन्मे व्याख्यातुमहसि,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! जो सब तीथेंमें श्रेष्ठ हो तथा जहाँ जानेसे परम शुद्धि हो जाती हो, उस तीर्थको मुझे विस्तारपूर्वक बताइये
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— পিতামহ! সকলো তীৰ্থৰ ভিতৰত যিটো শ্ৰেষ্ঠ, সেয়া মোক কওক। আৰু যি তীৰ্থলৈ গ’লে পৰম শুচিতা লাভ হয়, সেই তীৰ্থটো মোক বিস্তাৰে ব্যাখ্যা কৰিবলৈ অনুগ্ৰহ কৰক।
Verse 2
भीष्म उवाच सर्वाणि खलु तीर्थानि गुणवन्ति मनीषिण: । यत्तु तीर्थ च शौचं च तन्मे शूणु समाहित:,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! इस पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, वे सब मनीषी पुरुषोंके लिए गुणकारी होते हैं; किंतु उन सबमें जो परम पवित्र और प्रधान तीर्थ हैं, उसका वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो
ভীষ্মে ক’লে— যুধিষ্ঠিৰ! এই পৃথিৱীত থকা সকলো তীৰ্থই মনীষীজনৰ বাবে গুণকাৰী। কিন্তু সিহঁতৰ ভিতৰত যিটো প্ৰকৃততে শ্ৰেষ্ঠ তীৰ্থ আৰু পৰম শুচিতা, সেয়া মই কওঁ—একাগ্ৰচিত্তে শুনা।
Verse 3
अगाधे विमले शुद्धे सत्यतोये धृतिहदे । स्नातव्यं मानसे तीर्थे सत्त्वमालम्ब्य शाश्वतम्,जिसमें धैर्यरूप कुण्ड और सत्यरूप जल भरा हुआ है तथा जो अगाध, निर्मल एवं अत्यन्त शुद्ध है, उस मानस तीर्थमें सदा परमात्माका आश्रय लेकर स्नान करना चाहिये
যি অগাধ, নিৰ্মল আৰু অতিশয় শুদ্ধ—যাৰ হ্ৰদ ধৈৰ্য আৰু যাৰ জল সত্য—সেই মানস তীৰ্থত শাশ্বত পৰমাত্মাৰ আশ্ৰয় লৈ সদায় স্নান কৰা উচিত।
Verse 4
तीर्थशौचमनर्थित्वमार्जवं सत्यमार्दवम् अहिंसा सर्वभूतानामानृशंस्यं दम: शम:,कामना और याचनाका अभाव, सरलता, सत्य, मृदुता, अहिंसा, समस्त प्राणियोंके प्रति क्रूरताका अभाव--दया, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह--ये ही इस मानस तीर्थके सेवनसे प्राप्त होनेवाली पवित्रताके लक्षण हैं
কামনা আৰু যাচনাৰ অভাৱ, সৰলতা, সত্য, মৃদুতা, সকলো প্ৰাণীৰ প্ৰতি অহিংসা, নিষ্ঠুৰতাৰ অভাৱ অৰ্থাৎ দয়া, ইন্দ্ৰিয়সংযম আৰু মনোনিগ্ৰহ—এইবোৰেই মানস তীৰ্থৰ আশ্ৰয়ে লাভ হোৱা পবিত্ৰতাৰ লক্ষণ।
Verse 5
निर्ममा निरहंकारा निर्दधन्धा निष्परिग्रहा: | शुचयस्तीर्थभूतास्ते ये भैक्ष्यमुपभुज्जते,जो ममता, अहंकार, राग-द्वेषादि द्वद्ध और परिग्रहसे रहित एवं भिक्षासे जीवन निर्वाह करते हैं, वे विशुद्ध अन्तःकरणवाले साधु पुरुष तीर्थस्वरूप हैं
যিসকল মমতা আৰু অহংকাৰহীন, দ্বন্দ্বাতীত, আৰু পৰিগ্ৰহ-আসক্তিৰ পৰা মুক্ত; যিসকল ভিক্ষাৰে জীৱন নিৰ্বাহ কৰে—সেই শুদ্ধচিত্ত সাধুসকলেই স্বয়ং তীৰ্থস্বৰূপ।
Verse 6
तत्त्ववित्त्वनहंबुद्धिस्तीर्थप्रवरमुच्यते । (नारायणे<5थ रुद्रे वा भक्तिस्तीर्थ परं॑ मता ।) शौचलक्षणमेतत् ते सर्वत्रैवान्ववेक्षत:,किंतु जिसकी बुद्धिमें अहंकारका नाम भी नहीं है, वह तत्त्वज्ञानी पुरुष श्रेष्ठ तीर्थ कहलाता है। भगवान् नारायण अथवा भगवान् शिवमें जो भक्ति होती है, वह भी उत्तम तीर्थ मानी गयी है। पवित्रताका यह लक्षण तुम्हें विचार करनेपर सर्वत्र ही दृष्टिगोचर होगा
যি তত্ত্বজ্ঞৰ বুদ্ধিত ‘মই’ বোধো উদয় নহয়, তেওঁক তীৰ্থসমূহৰ ভিতৰত শ্ৰেষ্ঠ বুলি কোৱা হয়। তদ্ৰূপ ভগৱান নাৰায়ণ বা ভগৱান ৰুদ্ৰৰ প্ৰতি যি ভক্তি, সেয়াও পৰম তীৰ্থ বুলি মান্য। এইয়াই শৌচৰ লক্ষণ—বিচাৰ কৰিলে সৰ্বত্ৰ দেখা যায়।
Verse 7
रजस्तम: सत्त्वमथो येषां निर्धौतमात्मन: । शौचाशौचसमायुक्ता: स्वकार्यपरिमार्गिण:,जिनके अन्त:करणसे तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण धुल गये हैं अर्थात् जो तीनों गुणोंसे रहित है, जो बाह्य पवित्रता और अपवित्रतासे युक्त रहकर भी अपने कर्तव्य (तत्त्वविचार, ध्यान, उपासना आदि) का ही अनुसंधान करते हैं। जो सर्वस्वके त्यागमें ही अभिरुचि रखते हैं, सर्वज्ञ और समदर्शी होकर शौचाचारके पालनद्वारा आत्मशुद्धिका सम्पादन करते हैं, वे सत्पुरुष ही परम पवित्र तीर्थस्वरूप हैं
যিসকলৰ অন্তঃকৰণৰ পৰা ৰজ, তম আৰু সত্ত্বো ধুই গ’ল—অর্থাৎ যিসকল ত্ৰিগুণাতীত—আৰু যিসকল বাহ্য জগতত শৌচ-অশৌচ অৱস্থাৰ মাজত থাকিও নিজৰ স্বকাৰ্য (তত্ত্ববিচাৰ, ধ্যান, উপাসনা আদি)ৰ অনুসন্ধানেই কৰে; তেওঁলোকে শৌচাচাৰৰ নিষ্ঠাৰে আত্মশুদ্ধি সাধি পৰম তীৰ্থস্বৰূপ হয়।
Verse 8
सर्वत्यागेष्वभिरता: सर्वज्ञा: समदर्शिन: । शौचेन वृत्तशौचार्थास्ति तीर्था: शुचयश्च ये,जिनके अन्त:करणसे तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण धुल गये हैं अर्थात् जो तीनों गुणोंसे रहित है, जो बाह्य पवित्रता और अपवित्रतासे युक्त रहकर भी अपने कर्तव्य (तत्त्वविचार, ध्यान, उपासना आदि) का ही अनुसंधान करते हैं। जो सर्वस्वके त्यागमें ही अभिरुचि रखते हैं, सर्वज्ञ और समदर्शी होकर शौचाचारके पालनद्वारा आत्मशुद्धिका सम्पादन करते हैं, वे सत्पुरुष ही परम पवित्र तीर्थस्वरूप हैं
যিসকল সৰ্বত্যাগত ৰত, পৰমাৰ্থজ্ঞানী আৰু সমদৰ্শী—যিসকল শৌচৰ অনুশাসনে জীৱন যাপন কৰি অন্তঃশুদ্ধিৰ বাবেই প্ৰবৃত্ত—সেই শুদ্ধমনস্ক পুৰুষসকলেই পৰম তীৰ্থস্বৰূপ।
Verse 9
नोदकक्लिन्नगात्रस्तु स्नात इत्यभिधीयते । स स्नातो यो दमस्नात: स बाह्याभ्यन्तर: शुचि:,शरीरको केवल पानीसे भिगो लेना ही स्नान नहीं कहलाता है। सच्चा स्नान तो उसीने किया है, जिसने मन-इन्द्रियके संयमरूपी जलमें गोता लगाया है। वही बाहर और भीतरसे भी पवित्र माना गया है
কেৱল পানীৰে দেহ ভিজাই লোৱাই স্নান নহয়। সত্য স্নান তেওঁেই কৰিছে, যি দম—মন আৰু ইন্দ্ৰিয়সংযম—ৰূপ জলত স্নাত হৈছে; তেওঁ বাহিৰে আৰু ভিতৰে দুয়োফালেই শুদ্ধ।
Verse 10
अतीतेष्वनपेक्षा ये प्राप्तेष्वर्थेषु निर्ममा: । शौचमेव पर तेषां येषां नोत्पद्यते स्पृहा,जो बीते या नष्ट हुए विषयोंकी अपेक्षा नहीं रखते, प्राप्त हुए पदार्थोमें ममताशून्य होते हैं तथा जिनके मनमें कोई इच्छा पैदा ही नहीं होती, उन्हींमें परम पवित्रता होती है
যিসকলে অতীত বিষয়ৰ প্ৰত্যাশা নাৰাখে, লাভ কৰা বস্তুত মমতা নকৰে আৰু যিসকলৰ অন্তৰত স্পৃহা (লালসা) জন্মে নাহে—তেওঁলোকৰেই পৰম শৌচ (পবিত্ৰতা) থাকে।
Verse 11
इस जगतमें प्रज्ञान ही शरीर-शुद्धिका विशेष साधन है। इसी प्रकार अकिंचनता और मनकी प्रसन्नता भी शरीरको शुद्ध करनेवाले हैं
এই জগতত প্ৰজ্ঞানেই দেহ-শুদ্ধিৰ প্ৰধান সাধন; তদ্ৰূপ আকিঞ্চনতা আৰু মনৰ প্ৰসন্নতাও দেহক শুদ্ধ কৰে।
Verse 12
वृत्तशौचं मन:शौचं तीर्थशौचमत: परम् । ज्ञानोत्पन्नं च यच्छौचं तच्छौचं परमं स्मृतम्,शुद्धि चार प्रकारकी मानी गयी है--आचारशुद्धि, मनःशुद्धि, तीर्थशुद्धि और ज्ञानशुद्धि; इनमें ज्ञानसे प्राप्त होनेवाली शुद्धि ही सबसे श्रेष्ठ मानी गयी है
শুদ্ধি চাৰি প্ৰকাৰ—আচাৰশুদ্ধি, মনঃশুদ্ধি, তীৰ্থশুদ্ধি; আৰু এই সকলোতকৈও ঊৰ্ধ্বে জ্ঞানৰ পৰা উদ্ভৱ হোৱা শুদ্ধিকেই পৰম শুদ্ধি বুলি সোঁৱৰণ কৰা হয়।
Verse 13
मनसा च प्रदीप्तेन ब्रह्मज्ञानजलेन च । स्नाति यो मानसे तीर्थे तत्स्नानं तत्त्वदर्शिन:,जो प्रसन्न एवं शुद्ध मनसे ब्रह्मज्ञानरूपी जलके द्वारा मानसतीर्थमें स्नान करता है, उसका वह स्नान ही तत्त्वदर्शी ज्ञानीका स्नान माना गया है
যি প্ৰসন্ন আৰু দীপ্ত মনৰে, ব্ৰহ্মজ্ঞানৰূপ জল লৈ, মানস-তীৰ্থত স্নান কৰে—তেওঁৰ সেই স্নানকেই তত্ত্বদৰ্শী জ্ঞানীসকলে প্ৰকৃত স্নান বুলি মানে।
Verse 14
समारोपितशौचस्तु नित्यं भावसमाहित: । केवलं गुणसम्पन्न: शुचिरेव नर: सदा,जो सदा शौचाचारसे सम्पन्न, विशुद्ध भावसे युक्त और केवल सदगुणोंसे विभूषित है, उस मनुष्यको सदा शुद्ध ही समझना चाहिये
যি নিত্য শৌচাচাৰক দৃঢ় শৃঙ্খলা হিচাপে স্থাপন কৰি, শুদ্ধ ভাবত সমাহিত থাকে আৰু কেৱল সদ্গুণেৰে সমৃদ্ধ—তেওঁক সদায় শুচি (পবিত্ৰ) বুলি মানিব লাগে।
Verse 15
शरीरस्थानि तीर्थानि प्रोक्तान्येतानि भारत । पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यानि शृणु तान्यपि,भारत! यह मैंने शरीरमें स्थित तीर्थोंका वर्णन किया; अब पृथ्वीपर जो पुण्यतीर्थ हैं, उनका महत्त्व भी सुनो
ভীষ্মে ক’লে—হে ভাৰত! দেহত অৱস্থিত তীৰ্থসমূহ মই এইদৰে বৰ্ণনা কৰিলোঁ। এতিয়া পৃথিৱীত থকা পুণ্য তীৰ্থস্থানসমূহো শুনা।
Verse 16
शरीरस्य यथोद्देशा: शुचय: परिकीर्तिता: । तथा पृथिव्या भागाश्च पुण्यानि सलिलानि च,जैसे शरीरके विभिन्न स्थान पवित्र बताये गये हैं, उसी प्रकार पृथ्वीके भिन्न-भिन्न भाग भी पवित्र तीर्थ हैं और वहाँका जल पुण्यदायक है
ভীষ্মে ক’লে—যেনেকৈ দেহৰ কিছুমান স্থান শুচি-পবিত্ৰ বুলি কীৰ্তিত, তেনেকৈ পৃথিৱীৰ বিভিন্ন অংশো তীৰ্থৰূপে পুণ্যময়; আৰু তাত থকা জল পুণ্যদায়ক।
Verse 17
कीर्तनाश्चैव तीर्थस्य स्नानाश्न पितृतर्पणात् । धुनन्ति पापं तीर्थेषु ते प्रयान्ति सुखं दिवम्,जो लोग तीर्थोंके नाम लेकर तीर्थोमें स्नान करके तथा उनमें पितरोंका तर्पण करके अपने पाप धो डालते हैं, वे बड़े सुखसे स्वर्गमें जाते हैं
ভীষ্মে কয়—তীৰ্থৰ নাম-গুণ কীৰ্তন কৰি তীৰ্থত স্নান কৰি আৰু তাত পিতৃতৰ্পণ কৰা লোকসকলে পাপ ধুই পেলায়; আৰু সুখে স্বৰ্গলৈ গমন কৰে।
Verse 18
परिग्रहाच्च साधूनां पृथिव्याश्वैव तेजसा । अतीव पुण्यभागास्ते सलिलस्य च तेजसा,पृथ्वीके कुछ भाग साधु पुरुषोंके निवाससे तथा स्वयं पृथ्वी और जलके तेजसे अत्यन्त पवित्र माने गये हैं
ভীষ্মে ক’লে—পৃথিৱীৰ কিছুমান অংশ সাধুজনৰ বাস-সান্নিধ্যৰ বাবে, আৰু পৃথিৱী আৰু জলৰ স্বাভাৱিক তেজ (শুদ্ধিকাৰক শক্তি)ৰ বাবে, অতিশয় পুণ্যময় বুলি গণ্য হয়।
Verse 19
मनसश्न पृथिव्याश्व पुण्यास्तीर्थास्तथापरे । उभयोरेव यः स्नायात् स सिद्धि शीघ्रमाप्तुयात्,इस प्रकार पृथ्वीपर और मनमें भी अनेक पुण्यमय तीर्थ हैं। जो इन दोनों प्रकारके तीर्थोर्में स्नान करता है, वह शीघ्र ही परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धि प्राप्त कर लेता है
ভীষ্মে ক’লে—এইদৰে পৃথিৱীতেও আৰু মনতো বহু পুণ্যময় তীৰ্থ আছে। যি উভয়তে স্নান কৰে, সি শীঘ্ৰে সিদ্ধি লাভ কৰে।
Verse 20
यथा बल क्रियाहीनं क्रिया वा बलवर्जिता । नेह साधयते कार्य समायुक्ता तु सिध्यति
ভীষ্মে ক’লে—যেনে ক্ৰিয়াহীন বল বা বলহীন ক্ৰিয়া এই জগতত কোনো কাৰ্য সাধন কৰিব নোৱাৰে; কিন্তু বল আৰু ক্ৰিয়া সম্যকভাৱে যুক্ত হ’লে তেতিয়াহে কাৰ্য সিদ্ধ হয়।
Verse 21
एवं शरीरशौचेन तीर्थशौचेन चान्वित: । शुचि: सिद्धिमवाप्रोति द्विविधं शौचमुत्तमम्
ভীষ্মে ক’লে—যি দেহশৌচ আৰু তীৰ্থশৌচ—দুয়োটাৰে সৈতে যুক্ত, সেয়াই সত্য শুচি হৈ সিদ্ধি লাভ কৰে; এই দ্বিবিধ শৌচকেই উত্তম বুলি কোৱা হৈছে।
Verse 107
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उपवासकी विधिनामक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ অন্তৰ্গত দানধৰ্মপৰ্বত ‘উপবাসৰ বিধি’ নামৰ একশ সাততম অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল।
Verse 108
जैसे क्रियाहीन बल अथवा बलरहित क्रिया इस जगतूमें कार्यका साधन नहीं कर सकती। बल और क्रिया दोनोंके संयुक्त होनेपर ही कार्यकी सिद्धि होती है, इसी प्रकार शरीरशुद्धि और तीर्थशुद्धिसे युक्त पुरुष ही पवित्र होकर परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धि प्राप्त करता है। अतः दोनों प्रकारकी शुद्धि ही उत्तम मानी गयी है ।। इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शौचानुपृच्छा नामाष्टाधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शुद्धिकी जिज्ञासानामक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ
ভীষ্মে ক’লে—যেনে ক্ৰিয়াহীন বল বা বলহীন ক্ৰিয়া এই জগতত কাৰ্য সাধন কৰিব নোৱাৰে, আৰু বল-কৰ্ম একেলগে যুক্ত হ’লে তেতিয়াহে কাৰ্যসিদ্ধি হয়; তেনেদৰে দেহশুদ্ধি আৰু তীৰ্থশুদ্ধি—দুয়োটাৰে সৈতে যুক্ত পুৰুষেই পবিত্ৰ হৈ পৰমাত্মপ্ৰাপ্তিৰূপ সিদ্ধি লাভ কৰে। সেয়ে দ্বিবিধ শুদ্ধিকেই উত্তম বুলি মানা হৈছে। এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ অন্তৰ্গত দানধৰ্মপৰ্বত ‘শৌচানুপৃচ্ছা’ নামৰ একশ আঠতম অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল।
Verse 131
प्रज्ञानं शौचमेवेह शरीरस्य विशेषत: । तथा निष्किंचनत्वं च मनसक्षु प्रसन्नता
ভীষ্মে ক’লে—ইয়াত প্ৰজ্ঞান আৰু শৌচ—বিশেষকৈ দেহশৌচ—আৰু নিষ্কিঞ্চনতা তথা মনৰ প্ৰসন্নতা—এইবোৰেই সদাচাৰৰ লক্ষণ; এইবোৰৰ অনুশীলন কৰা উচিত।
The dilemma is existential and ethical: when social supports (family, kin, teacher) cannot accompany a person beyond death, what should guide action—immediate advantage or sustained dharma that determines post-mortem fate.
Dharma is treated as an objective, accompanying force: practice righteousness consistently (including with just means of wealth), avoid greed-driven wrongdoing, and understand that actions generate traceable consequences across embodied states.
Yes. Bṛhaspati frames the doctrine as ancient and ‘guhya,’ and the chapter concludes by stating it was heard from Brahmā among divine seers, reinforcing lineage-based authority and urging Yudhiṣṭhira to keep his mind fixed on dharma.