रश्मिजालम् इवादित्यस् तत्कालं संनियच्छति एवम् एवैष तत् सर्वं क्रीडार्थम् अभिमन्यते //
ইয়াত কেৱল শ্লোক-সংখ্যা আছে; মূল শ্লোক উপলব্ধ নহয়।