Mahabharata Adhyaya 299
Vana ParvaAdhyaya 29983 Verses

Adhyaya 299

Ajñātavāsa-saṅkalpaḥ — Yudhiṣṭhira’s Resolve and Dhaumya’s Exempla on Concealment

Upa-parva: Ajñātavāsa-prastāna (Preparation for the Thirteenth-Year Concealment)

Vaiśaṃpāyana reports that the Pandavas, having been permitted (abhyanujñāta) in accordance with dharma, sit together with firm vows to announce their intent to undertake the thirteenth year in concealment. They address the forest-dwelling brāhmaṇas and ascetics who are devoted to them, explaining the background of dispossession by the Dhārtarāṣṭras and the necessity of remaining hidden lest hostile rivals (Suyodhana, Karṇa, Śakuni) exploit knowledge of their whereabouts. Yudhiṣṭhira, overwhelmed by grief, briefly loses composure; the brāhmaṇas and brothers console him. Dhaumya then delivers a stabilizing instruction: even great beings have faced adversity and acted in concealment to restrain adversaries, citing exemplary precedents (e.g., Indra’s hidden residence; Viṣṇu’s concealed strategies including Vāmana; other mythic instances of covert action). The counsel reframes concealment as dharmically compatible when used for protection and lawful completion of vows. Bhīma follows by affirming disciplined obedience and readiness, noting the restraint previously exercised despite capability. The brāhmaṇas offer blessings and depart; the Pandavas, with Dhaumya and Draupadī, set out and begin technical deliberation—seated separately as experts in śāstra and counsel, attentive to timing of alliance and conflict (saṃdhi-vigraha-kāla).

Chapter Arc: वन के श्रम में सत्यवान के शरीर पर अचानक विपत्ति उतरती है—लकड़ी चीरते-चीरते पसीना, थकान और सिर में तीव्र वेदना; सावित्री के लिए यह वही घड़ी है जिसकी छाया वह पहले से पहचानती है। → सत्यवान की पीड़ा बढ़ती है; सावित्री दौड़कर आती है, पति का सिर अपनी गोद में रखकर धरती पर बैठ जाती है। जीवन की डोर ढीली पड़ती दिखती है और वन का सन्नाटा मृत्यु की आहट बन जाता है। यमराज प्रकट होकर सावित्री को लौट जाने और और्ध्वदेहिक कर्म करने का आदेश देते हैं—पर सावित्री का धैर्य और वाक्-शक्ति पीछे नहीं हटती। → यम के दिए वरदानों की शर्तों को सावित्री अपने सत्य-वचन और बुद्धि से जीवन-दान में बदल देती है—‘आपने मुझे शतपुत्रता का वर दिया है; पति के बिना वह असंभव है; अतः सत्यवान जीवित हों।’ यम का वचन सत्य सिद्ध होता है और मृत्यु का निर्णय पलट जाता है। → यम संतुष्ट होकर सत्यवान को जीवन लौटाते हैं और सावित्री को अनेक वरदान देकर विदा करते हैं। रात्रि गहराती है; सावित्री सत्यवान से कहती है कि प्रातः सब यथावृत्त बताएगी। सत्यवान का सिर-दर्द उतरता है, वह माता-पिता से मिलने की इच्छा प्रकट करता है और समय से पहले घर लौटने की चिंता करता है। → रात भर वन में ठहरने और भोर में लौटने का संकेत—सत्यवान के माता-पिता को क्या ज्ञात होगा, और सावित्री कल किस प्रकार समस्त घटना सुनाएगी—यह अगले प्रसंग पर टिका रहता है।

Shlokas

Verse 1

#:73:.8 #::3:.7 (0) हि २ 7 सप्तनवर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: सावित्री और यमका संवाद

قال ماركانديّا: ثم إنّ ساتيافان، قويّ العزم شديد البأس، ومعه زوجته رفيقةً ومعيناً، جمع الثمار وملأ سَلّةً متينة. وبعد ذلك شرع يشقّ الحطب. ويُبرز هذا المشهد في هدوئه واجب البيت ورفقة الزوجين—أعمالاً مألوفة تُعاش فيها الثبات والدارما، قبيل أن تنكشف المحنة الكبرى في خبر حوار سافيتري ويَما.

Verse 2

तस्य पाटयत: काष्ठ स्वेदो वै समजायत । व्यायामेन च तेनास्य जज्ञे शिरसि वेदना

وبينما كان يواصل شقَّ الحطب، تفجَّر العرق عليه حقًّا؛ ومن ذلك الجهد نشأ في رأسه ألمٌ. ويُبرز السرد كيف أن العمل المُضني الذي لا يهدأ والشدّة يفضيان بطبيعتهما إلى معاناة الجسد، مُلمِّحًا إلى الحاجة الأخلاقية إلى جهدٍ موزونٍ وصبرٍ يقِظ.

Verse 3

सत्यवानुवाच व्यायामेन ममानेन जाता शिरसि वेदना

قال ساتيافان: «من عناء اليوم في قطع الحطب نشأ في رأسي ألمٌ. يؤلمني جسدي كلّه، ويبدو قلبي كأنه يحترق. يا حبيبتي رقيقةَ القول، أرى نفسي عليلًا. كأن أحدًا يثقب رأسي بمسامير حادّة. يا ذاتَ اليُمن، أريد أن أنام الآن؛ لم تعد فيّ قوةٌ على الوقوف.»

Verse 4

अड्जनि चैव सावित्रि हृदयं दूयतीव च । अस्वस्थमिव चात्मानं॑ लक्षये मितभाषिणि

قال ماركاندييا: «اليوم، يا ساڤيتري، أشعر كأن قلبي يحترق، وأرى نفسي عليلًا، يا رقيقةَ القول.» (وفي سياق الحكاية، يخبر ساتيافان ساڤيتري بعد ذلك بأن عناء قطع الحطب أورثه صداعًا، وألمًا في أطرافه، وإحساسًا بأن قلبه قد احترق، وأنه يريد أن يضطجع إذ لم تعد لديه قوةٌ على الوقوف—تمهيدًا لأزمةٍ ستختبر ثبات ساڤيتري على الدارما ووفاءها.)

Verse 5

शूलैरिव शिरो विद्धमिदं संलक्षयाम्यहम्‌ । तत्‌ स्वप्तुमिच्छे कल्याणि न स्थातु शक्तिरस्ति मे

«أشعر كأن رأسي قد ثُقِب بمسامير حادّة. وإذ أرى حالي هذا، يا ذاتَ اليُمن، أريد أن أضطجع وأنام؛ لم تعد لي قوةٌ على البقاء قائمًا.»

Verse 6

सा समासाद्य सावित्री भर्तारमुपगम्य च । उत्सड्रेडस्य शिर: कृत्वा निषसाद महीतले,यह सुनकर सावित्री शीघ्र अपने पतिके पास आयी और उनका सिर गोदीमें लेकर पृथ्वीपर बैठ गयी

فلما سمعت ساڤيتري ذلك أسرعت إلى زوجها. دنت منه، وجعلت رأسه على حجرها، ثم جلست على الأرض—فعلُ رعايةٍ ثابتة ووفاءٍ زوجيٍّ في مواجهة الفقد الذي يوشك أن يقع.

Verse 7

ततः सा नारदवचो विमृशन्ती तपस्विनी । त॑ मुहूर्त क्षणं वेलां दिवसं च युयोज ह,फिर वह तपस्विनी राजकन्या नारदजीकी बात याद करके उस मुहूर्त, क्षण, समय और दिनका योग मिलाने लगी

ثم إن تلك الفتاة الزاهدة، وهي تتأمل كلام نارادا، شرعت تحسب وتُوائم اللحظة الميمونة—تقيس المُهورتا، واللحظة الخاطفة، والوقت اللائق، واليوم—كي يوافق فعلها التالي التوقيت القويم والعزم المنضبط.

Verse 8

मुहूतदिव चापश्यत्‌ पुरुष॑ रक्तवाससम्‌ । बद्धमौलिं वपुष्मन्तमादित्यसमतेजसम्‌

قال ماركانديّا: «وبعد ما بدا كأنه لحظة واحدة، رأت رجلاً إلهياً قد ظهر—مرتدياً ثياباً حمراء، وعلى رأسه عصابة كالتاج، ذا هيئة مهيبة، يتلألأ ببريق يضاهي الشمس.»

Verse 9

श्यामावदातं रक्ताक्ष॑ं पाशहस्तं भयावहम्‌ । स्थितं सत्यवत: पारश्व निरीक्षन्तं तमेव च

قال ماركانديّا: «ورأت هيئةً إلهيةً مهيبةً مخيفةً قائمةً إلى جانب ساتيَفان—جسدها داكنٌ لكنه متلألئ، وعيناها حمراوان، وفي يدها حبلٌ ذو عُروة—تحدّق في ساتيَفان مرةً بعد مرة.»

Verse 10

त॑ दृष्टवा सहसोत्थाय भर्तुन्यस्य शनै: शिर: । कृताञ्जलिर्वाचार्ता हृदयेन प्रवेपती

فلما رأته نهضت ساڤيتري من فورها. وبرفق وضعت رأس زوجها، ثم ضمّت كفّيها إجلالاً وتكلمت بصوتٍ مخنوقٍ بالأسى، وقلبها يرتجف.

Verse 11

सावित्रयुवाच दैवतं त्वाभिजानामि वपुरेतद्धयमानुषम्‌ | कामया ब्रूहि देवेश कस्त्वं कि चिकीर्षसि

قالت ساڤيتري: «إني أعرف أنك إله، لأن هذا الجسد ليس كأجساد البشر. يا ربَّ الآلهة، إن شئت فقل لي: من أنت، وماذا تريد أن تفعل؟»

Verse 12

यम उवाच पतिव्रतासि सावित्रि तथैव च तपो<न्विता । अतस्त्वामभिभाषामि विद्धि मां त्वं शुभे यमम्‌

قال يَما: «يا سافيتري، إنكِ ثابتةٌ على عفّة الزوجة ووفائها، ومُتَحَلِّيَةٌ كذلك بقوّة الزهد والتقشّف. لذلك أستطيع أن أخاطبكِ. أيتها المباركة، اعلمي أني يَما، ربّ الموت.»

Verse 13

अयं ते सत्यवान्‌ भर्ता क्षीणायु: पार्थिवात्मज: । नेष्यामि तमहं बद्ध्वा विद्धयेतन्मे चिकीर्षितम्‌

«هذا ساتيَفان—زوجُكِ، ابنُ الملك—قد بلغ نهاية الأجل المقدر له. سأقيّده وآخذه معي. اعلمي أن هذا ما أنويه.»

Verse 14

सावित्रयुवाच श्रूयते भगवन्‌ दूतास्तवागच्छन्ति मानवान्‌ । नेतुं किल भवान्‌ कस्मादागतो<सि स्वयं प्रभो

قالت سافيتري: «أيها الربّ المبارك، لقد سُمِع أن رسلك يأتون ليحملوا البشر. فلماذا جئتَ أنتَ بنفسك إلى هنا، أيها السيّد؟»

Verse 15

मार्कण्डेय उवाच इत्युक्त: पितृराजस्तां भगवान्‌ स्वचिकीर्षितम्‌ | यथावत्‌ सर्वमाख्यातुं तत्प्रियार्थ प्रचक्रमे

قال ماركانديَيا: «وهكذا، لما خوطِبَ بتلك الكلمات، شرع يَما المبارك، ملكُ الراحلين، يبيّن—صدقًا وبتمامه—جميع مقصده، ليمنحها ما هو عزيزٌ عليها.»

Verse 16

अयं च धर्मसंयुक्तो रूपवान्‌ गुणसागर: । नाहों मत्पुरुषैनेतुमतो5स्मि स्वयमागत:

«إن هذا الرجل مقرونٌ بالدارما، حسنُ الطلعة، بحرٌ من الفضائل. لا يليق أن يحمله أعواني؛ لذلك جئتُ أنا بنفسي.»

Verse 17

ततः सत्यवत: कायात्‌ पाशबद्ध॑ वशं गतम्‌ । अड्गुष्ठमात्रं पुरुषं निश्चकर्ष यमो बलात्‌,तदनन्तर यमराजने सत्यवानके शरीरसे पाशमें बँधे हुए अंगुष्ठमात्र परिमाणवाले विवश हुए जीवको बलपूर्वक खींचकर निकाला

ثم إن يَمَا، بقوةٍ قاهرة، انتزع من جسد ساتيَفان «الشخص» بقدر الإبهام—مبدأ الحياة المقيَّد العاجز، الواقع في عُقدة حبلِه. ويُبرز هذا المشهد سلطانَ الموت الصارم على الحياة المتجسدة، وهو في الوقت نفسه يمهّد للمقابلة الأخلاقية: ثباتَ الاستقامة وعزمَ الوفاء الذي سيجابه ما يبدو حتمًا لا مفرّ منه.

Verse 18

ततः: समुद्धृतप्राणं गतश्वासं हतप्रभम्‌ । निर्विचेष्ट शरीरं तद्‌ बभूवाप्रियदर्शनम्‌,फिर तो प्राण निकल जानेसे उसकी साँस बंद हो गयी--अंगकान्ति फीकी पड़ गयी और शरीर निश्रेष्ट होकर अपरूप दिखायी देने लगा

ثم لما انتُزعت منه الحياة انقطع نَفَسُه، وانطفأ بهاؤه. وغدا ذلك الجسد ساكنًا لا حراك فيه، مجردًا من الحيوية، منظرًا موجعًا—صورةً لمدى سرعة انهيار بهاء الجسد حين تفارقه قوة الحياة.

Verse 19

यमस्तु त॑ं ततो बद्ध्वा प्रयातो दक्षिणामुख: । सावित्री चैव दुःखार्ता यममेवान्वगच्छत । नियमव्रतसंसिद्धा महाभागा पतिव्रता

قال ماركانديَيا: إن يَمَا، بعدما قيّد تلك الروح، مضى متجهًا نحو الجنوب، يسوقها معه. أمّا ساڤيتري، وقد أضناها الحزن، فتبعت يَمَا نفسه خطوةً بخطوة. تلك الأميرة ذات الحظ الأسمى—الثابتة في عفّة الزوجة ووفائها (pativratā)—كانت قد اكتملت بفضل الانضباط والعهود، فغدت قادرة على المضيّ بلا عائق حيثما شاءت.

Verse 20

यम उवाच निवर्त गच्छ सावित्रि कुरुष्वास्यौर्ध्वदेहिकम्‌ कृतं भर्तुस्त्वया5<नृण्यं यावद्‌ गम्यं गतं त्वया

قال يَمَا: «ارجعي يا ساڤيتري. وأقيمي له شعائر ما بعد الموت (antyeṣṭi). لقد قضيتِ الآن ما عليكِ من دَينٍ لزوجكِ؛ وقد صاحبته إلى الحدّ الذي تُلزَم به الزوجة.»

Verse 21

सावित्रयुवाच यत्र मे नीयते भर्ता स्वयं वा यत्र गच्छति । मया च तत्र गन्तव्यमेष धर्म: सनातन:

قالت ساڤيتري: «حيثما يُساق زوجي، أو حيثما يمضي من تلقاء نفسه، فإلى هناك يجب أن أمضي أنا أيضًا؛ فهذا هو الدَّرما الأزلي.»

Verse 22

तपसा गुरुभवत्या च भर्तुः स्नेहाद्‌ ब्रतेन च । तव चैव प्रसादेन न मे प्रतिहता गति:,तपस्या, गुरुभक्ति, पतिप्रेम, व्रतपालन तथा आपकी कृपासे मेरी गति कहीं भी रुक नहीं सकती

قال يَما: «بزهدكِ وتنسّككِ، وبخدمتكِ الموقّرة للكبار، وبمحبتكِ لزوجكِ، وبوفائكِ في حفظ النذور—وبفضلِ عنايتكِ أيضًا—لا يمكن أن يُعاق مساري في أي موضع.»

Verse 23

प्राहु: साप्तपदं मैत्रं बुधास्तत्त्वार्थदर्शिन: । मित्रतां च पुरस्कृत्य किज्चिद्‌ वक्ष्यामि तच्छुणु

يقول الحكماء المبصرون لحقيقة المعنى: «إنما تكفي سبعُ خطواتٍ تُسار معًا لتقومَ المودّة.» وإذ أقدّم هذه الصداقة، فسأعرض عليك شيئًا يسيرًا؛ فاسمعيه.

Verse 24

नानात्मवन्तस्तु वने चरन्ति धर्म च वासं च परिश्रमं च । विज्ञानतो धर्ममुदाहरन्ति तस्मात्‌ सन्‍्तो धर्ममाहु: प्रधानम्‌

قال يَما: «إن الذين تشتّت باطنهم—ولم يملكوا زمام النفس والحواس—لا يستطيعون حقًّا أن يثبتوا في حياة الغابة: لا في السلوك القويم، ولا في الإقامة المنضبطة كالإقامة في بيت المعلّم، ولا في نسك احتمال المشقّة. إنما يقدر على ذلك أهلُ ضبط النفس. والحكماء، بتمييزٍ بصير، يبيّنون ما هو الدارما؛ لذلك يعدّ الأخيارُ والنبلاءُ الدارما المبدأَ الأعلى.»

Verse 25

एकस्य धर्मेण सता मतेन सर्वे सम त॑ मार्गमनुप्रपन्ना: । मा वै द्वितीयं मा तृतीयं च वाउ्छे तस्मात्‌ सन्‍्तो धर्ममाहु: प्रधानम्‌

قال يَما: «بالتمسّك بدارما واحدة يقرّها الأخيار ويعدّونها صوابًا، يبلغ الناس جميعًا الطريق نفسه—طريق المعرفة الحقّة، وهو الغاية المشتركة. فلا ينبغي أن يتطلّع المرء إلى “مرتبة ثانية” أو “ثالثة”. ولهذا يعلن أهلُ الفضيلة أن الدارما هي الأسمى.»

Verse 26

सो$भिगम्य प्रियां भार्यामुवाच श्रमपीडित: । लकड़ी चीरते समय परिश्रमके कारण उनके शरीरसे पसीना निकल आया और उसी परिश्रमसे उनके सिरमें दर्द होने लगा। तब वे श्रमसे पीड़ित हो अपनी प्यारी पत्नीके पास जाकर बोले--

وقد أنهكه العناء، فمضى إلى زوجته الحبيبة وتكلّم. ثم قال يَما: «ارجعي، أيتها البريئة من العيب. لقد سُررتُ غاية السرور بكلامكِ—محكمًا في الحركات والحروف والمخارج، ومسنودًا بحسن التعليل. فاختاري منّي هنا نعمةً؛ سوى حياة سَتْيَفان، فإني أمنحكِ كلَّ ما تشائين، أيتها التي لا تُلام.»

Verse 27

सावित्रयुवाच च्युत: स्वराज्याद्‌ वनवासमाश्रितो विनष्टचक्षु: श्वशुरो ममाश्रमे । स लब्धचक्षुर्बलवान्‌ भवेन्नूप- स्तव प्रसादाज्ज्वलनार्कसंनिभ:

قالت ساڤيتري: «أيها الربّ المبارك، إنّ حَمِيَّ قد سقط عن مُلكه ولجأ إلى سُكنى الغابة، وهو يقيم في أشرمي. وقد ذهبت بصيرته. فبنعمتك، ليَعُدْ لذلك الملك بصرُه، وليغدُ قويًّا، متلألئًا كالنار وكالشمس».

Verse 28

यम उवाच ददानि ते5हं तमनिन्दिते वरं यथा त्वयोक्तंभविता च तत्‌ तथा । तवाध्वना ग्लानिमिवोपलक्षये निवर्त गच्छस्व न ते श्रमो भवेत्‌

قال يَما: «يا من لا عيب فيها، أمنحكِ ذلك العطاء. وكما نطقتِ يكون الأمر كذلك. وإني لأرى، كأنما أرى، ما أصابك من إعياء السفر. فارجعي واذهبي—لئلا يلحقك مزيدُ عناء».

Verse 29

सावित्रयुवाच श्रम: कुतो भर्त्‌समीपतो हि मे यतो हि भर्ता मम सा गतिर्धुवा । यतः पतिं नेष्यसि तत्र मे गति: सुरेश भूयश्व वचो निबोध मे

قالت ساڤيتري: «ومن أين يأتي التعبُ إليّ وأنا بقرب زوجي؟ فحيث يكون زوجي تكون وجهتي وقدري الثابت. وإلى أي موضعٍ تسوق سيدي، فإلى ذلك الموضع يكون ذهابي حتمًا. يا ربّ الآلهة، أصغِ إلى قولي مرةً أخرى».

Verse 30

सतां सकृत्संगतमीप्सितं परं ततः परं मित्रमिति प्रचक्षते । न चाफल सत्पुरुषेण सड़तं ततः सतां सन्निवसेत्‌ समागमे

قال يَما: «إنّ لقاءَ الصالحين ولو مرةً واحدة لَمَطلوبٌ غايةَ الطلب؛ وأعظمُ من ذلك—كما يقولون—أن يُنال الصالحُ صديقًا. فمخالطةُ الرجلِ الصالح لا تكون قطُّ بلا ثمرة؛ فلذلك ينبغي أن يُقيم المرء قريبًا من أهل الفضيلة وأن يلازم صحبتهم».

Verse 31

यम उवाच मनो<नुकूलं बुधबुद्धिवर्धनं त्वया यदुक्तं वचन हिताश्रयम्‌ । विना पुन: सत्यवतो<स्य जीवितं वरं द्वितीयं वरयस्व भामिनि

قال يَما: «يا ذاتَ النُّبل، إنّ الكلماتِ التي نطقتِ بها تُرضي قلبي، قائمةٌ على مصلحة الجميع، بل تزيدُ فهمَ الحكماء عمقًا. لذلك فاختاري عطاءً ثانيًا—ولكن اختاريه من غير أن تطلبي حياةَ هذا ساتياڤان».

Verse 32

सावित्रयुवाच ह्वतं पुरा मे श्वशुरस्य धीमतः स्वमेव राज्यं लभतां स पार्थिव: । जह्यात्‌ स्वधर्म न च मे गुरुर्यथा द्वितीयमेतद्‌ वरयामि ते वरम्‌

قالت سافيتري: «ليستعدْ حماي الحكيم—الذي سُلبت مملكته منذ زمن بعيد—تلك السيادة بعينها. وليثبتْ شيخي الموقَّر، مُعلّمي—الملك ديوماتسينا—على دَرمَه، فلا يتركه قط. هذا هو العطاء الثاني الذي أختاره منك.»

Verse 33

यम उवाच स्वमेव राज्यं प्रतिपत्स्यते5चिरा- न्नच स्वधर्मात्‌ परिहास्यते नृपः । कृतेन कामेन मया नृपात्मजे निवर्त गच्छस्व न ते श्रमो भवेत्‌

قال يَما: «بعد زمن طويل سيستعيد الملك مملكته حقًّا، ولن يحيد قطّ عن واجبه القويم، عن دَرمَه. أيتها الأميرة، لقد أُنجزت رغبتك الآن بيدي. فارجعي وامضي، لئلا يصيبك عناء.»

Verse 34

सावित्रयुवाच प्रजास्त्वयैता नियमेन संयता नियम्य चैता नयसे निकामया । ततो यमत्वं तव देव विश्रुतं निबोध चेमां गिरमीरितां मया

قالت سافيتري: «أيها الإله، إنك تُمسك هذه الكائنات بقيود القانون والنظام؛ فإذا نظّمتها قدتها بمشيئتك إلى عوالمها التي تليق بها. ولذلك اشتهرت منزلتك باسم “يَما”—المنظِّم والضابط—في كل مكان. فاسمع الآن ما أنطق به من قول.»

Verse 35

अद्रोह: सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा । अनुग्रहश्न दानं च सतां धर्म: सनातन:,मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना, सबपर दयाभाव बनाये रखना और दान देना यह साधु पुरुषोंका सनातन धर्म है

يُعلن يَما: «إن الدَّرما الخالدة لأهل الفضيلة هي: ألّا يُضمر المرء عداوةً لأي كائن حيّ—لا بالفعل، ولا بالفكر، ولا بالقول—وأن يحفظ روح الرحمة والإحسان، ويُظهرها بالعطاء والصدقة.»

Verse 36

एवंप्रायश्न॒ लोको<यं मनुष्या: शक्तिपेशला: । सन्तस्त्वेवाप्यमित्रेषु दयां प्राप्तेषु कुर्वते

«هكذا هو هذا العالم في الغالب: البشر قصيرو الأعمار، ووهنهم معروف. ومع ذلك فإن الأخيار حقًّا—حتى تجاه الأعداء—يرحمون من يأتي طالبًا الملجأ. فكيف إذن لا نُظهر الرحمة لأمثالي من الضعفاء؟»

Verse 37

यम उवाच पिपासितस्येव भवेद्‌ यथा पय- स्तथा त्वया वाक्यमिदं समीरितम्‌ | विना पुन: सत्यवतो<स्य जीवितं वरं वृणीष्वेह शुभे यदिच्छसि

قال يَما: «أيتها السيدة المباركة، كما يُبهِج الماءُ من أضناه العطش، كذلك أبهجتني كلماتُك التي نطقتِ بها هنا وأشبعتني رضاً عميقاً. فاختاري هنا أيَّ نعمةٍ أخرى—كما تشائين—على أن تُستثنى حياةُ ساتيافان.»

Verse 38

सावित्रयुवाच ममानपत्य: पृथिवीपति: पिता भवेत्‌ पितु: पुत्रशतं तथौरसम्‌ | कुलस्य सन्‍्तानकरं च यद्‌ भवेत्‌ तृतीयमेतद्‌ वरयामि ते वरम्‌

قالت سافيتري: «يا مولاي، إن أبي، ملك الأرض، لا ولد له. فامنحه مئةَ ابنٍ شرعيّين ليُقيموا استمرار السلالة ويحفظوا النسب. هذا هو العطاء الثالث الذي أختاره منك.»

Verse 39

यम उवाच कुलस्य सन्तानकरं सुवर्चसं शतं सुतानां पितुरस्तु ते शुभे । कृतेन कामेन नराधिपात्मजे निवर्त दूरं हि पथस्त्वमागता

قال يَما: «أيتها الأميرة المباركة، ليكن لأبيك مئةُ ابنٍ مشرقين يحملون استمرار السلالة. لقد قُضيت رغبتكِ يا ابنةَ الملك. والآن ارجعي—فقد ابتعدتِ حقاً بعيداً عن الطريق.»

Verse 40

सावित्रयुवाच न दूरमेतन्मम भर्तूसंनिधौ मनो हि मे दूरतरं प्रधावति । अथ व्रजन्नेव गिरं समुद्यतां मयोच्यमानां शृणु भूय एव च

قالت سافيتري: «يا مولاي، ليس هذا ببعيدٍ عني، فأنا بقرب زوجي. بل إن قلبي يَعدو إلى أبعد من ذلك. فاسمع—وأنت ماضٍ في طريقك—مرةً أخرى ما أنا مزمعٌ أن أقوله.»

Verse 41

विवस्वतस्त्वं तनय: प्रतापवां- स्ततो हि वैवस्वत उच्यसे बुध: । समेन धर्मेण चरन्ति ता: प्रजा- स्ततस्तवेहेश्वर धर्मराजता

قال يَما: «أنت الابنُ المهيبُ لِـڤيفَسڤان (إله الشمس)، ولذلك يدعوك الحكماءُ “ڤايڤسڤتا”. ولأنك تسير بين جميع الكائنات بدَرْمَا متوازنة—تحكم على الرعية بلا محاباة وفق الاستقامة—فلذلك، يا ربّ، تُعرَف هنا باسم “دهرماراجا”، ملك الدَّرْمَا وقاضيها.»

Verse 42

आत्मन्यपि न विश्वासस्तथा भवति सत्सु यः । तस्मात्‌ सत्सु विशेषेण सर्व: प्रणयमिच्छति

حتى في المرء نفسه لا تنشأ ثقةٌ كتلك التي يضعها الناس في الأخيار الأتقياء. لذلك فإن الجميع يلتمسون، على وجه الخصوص، المودةَ والتعلّقَ المحبّ بالفضلاء، لأن نزاهتهم تصبح ملجأً لغيرهم.

Verse 43

सौद्दात्‌ सर्वभूतानां विश्वासो नाम जायते । तस्मात्‌ सत्सु विशेषेण विश्वासं कुरुते जन:

من حسن النية والمودّة تنشأُ بين جميع الكائنات الحيّة ما يُسمّى بالثقة. لذلك يضع الناس ثقتهم—على وجه الخصوص وبأشدّ رسوخًا—في أهل الفضيلة، لأن فيهم الانسجام والإحسان.

Verse 44

यम उवाच उदादह्वतं ते वचन यदड्ने शुभे न तादृक्‌ त्वदते श्रुतं मया । अनेन तुष्टो5स्मि विनास्य जीवितं वरं चतुर्थ वरयस्व गच्छ च

قال يَما: «أيتها السيدة المباركة، إن الكلمات التي نطقتِ بها اليوم لم أسمع مثلها من فم أحدٍ غيرك. لقد سُررتُ بها سرورًا عظيمًا. فاختاري نعمةً رابعة—أيّ شيءٍ سوى حياة ساتيافان—ثم انصرفي من هنا.»

Verse 45

सावित्रयुवाच ममात्मजं सत्यवतस्तथौरसं भवेदुभाभ्यामिह यत्‌ कुलोद्वहम्‌ । शतं सुतानां बलवीर्यशालिना- मिदं चतुर्थ वरयामि ते वरम्‌

قالت سافيتري: «ليكن لي ولساتيافان ولدٌ شرعي—بل مئةُ ابن—يحملون لواء سلالتنا ويزيدونها نماءً، موفورين قوةً وبأسًا بطوليًا. هذه هي النعمة الرابعة التي أختارها منك.»

Verse 46

यम उवाच शतं सुतानां बलवीर्यशालिनां भविष्यति प्रीतिकरं तवाबले । परिश्रमस्ते न भवन्नपात्मजे निवर्त दूरं हि पथस्त्वमागता

قال يَما: «يا رقيقةَ الطبع، سيكون لك مئةُ ابنٍ موفوري القوة والبأس البطولي، يكونون لك مصدرَ سرور. أيتها الأميرة، ارجعي الآن لئلا يعتريك الإعياء؛ فقد ابتعدتِ كثيرًا عن الطريق القويم.»

Verse 47

सावित्रयुवाच सतां सदा शाश्चवतधर्मवृत्ति: सन्‍्तो न सीदन्ति न च व्यथन्ति । सतां सद्भि्नाफल: सड़मो<स्ति सद्धभयो भयं नानुवर्तन्ति सन्त:

قالت سافيتري: «إن سلوك الأخيار حقًّا ثابتٌ أبدًا، راسخٌ في الدارما لا يتزعزع. فأولئك النبلاء لا يهبطون إلى اليأس ولا تزلزلهم الشدائد. ولدى أهل الفضيلة لا تكون صحبةُ أهل الفضيلة عقيمةً قط؛ والخيرون لا يتبعون الخوف إذا كانوا في حضرة الخيرين».

Verse 48

सन्‍्तो हि सत्येन नयन्ति सूर्य सन्‍्तो भूमिं तपसा धारयन्ति | सन्‍्तो गतिर्भूतभव्यस्य राजन्‌ सतां मध्ये नावसीदन्ति सन्त:

قال يَما: «إن الأخيار والقديسين هم الذين، بالصدق، يهدون مسار الشمس؛ وهم الذين، بالزهد والتقشف، يحملون هذه الأرض. أيها الملك، إن الصالحين هم الملجأ والطريق الهادي لما كان وما سيكون. فإذا أقام الفاضلون بين الفاضلين لم يغرقوا هم أنفسهم في الحزن».

Verse 49

आर्यजुष्टमिदं वृत्तमिति विज्ञाय शाश्वतम्‌ | सन्त: परार्थ कुर्वाणा नावेक्षन्ति परस्परम्‌

قال يَما: «إذ يعلمون أن هذا هو السلوك الأبدي الذي أقرّه النبلاء ومارسوه، فإن الأخيار يعملون لخير الآخرين؛ فلا ينظر بعضهم إلى بعض بعين المنفعة الذاتية، ولا يزنون معاملاتهم بميزان الكسب الشخصي».

Verse 50

न च प्रसाद: सत्पुरुषेषु मोघो न चाप्यर्थो नश्यति नापि मान: । यस्मादेतन्नियतं सत्सु नित्यं तस्मात्‌ सन्‍्तो रक्षितारों भवन्ति

قال يَما: «بين الأخيار حقًّا لا يضيع فضلٌ كريم قط؛ ولا يفنى الكسبُ المشروع، ولا تُنقَص الكرامة. ولأن هذه الثلاثة—النعمة، والمنفعة، والشرف—تقيم على الدوام في أهل الفضيلة، فإن الأخيار يغدون حماةَ العالم كله».

Verse 51

यम उवाच यथा यथा भाषसि धर्मसंहितं मनोअ<नुकूलं सुपद॑ महार्थवत्‌ | तथा तथा मे त्वयि भक्तिरुत्तमा वरं वृणीष्वाप्रतिमं पतिव्रते

قال يَما: «يا زوجةً وفيّةً مكرَّسةً لزوجها (پَتِڤْرَتا)! كلما خاطبتِني بكلماتٍ موافقةٍ للدارما—مستملحةٍ للنفس، مزدانةٍ بألفاظٍ منتقاة، غنيةٍ بالمعنى العميق—ازداد لكِ وُدّي الأسمى وحسنُ رعايتي. فاختاري مني نعمةً لا نظير لها».

Verse 52

सावित्रयुवाच न ते5पवर्ग: सुकृताद्‌ विनाकृत- स्तथा यथान्येषु वरेषु मानद । वरं वृणे जीवतु सत्यवानयं यथा मृता होवमहं पतिं विना

قالت سافيتري: «يا واهبَ الكرامة، إنّ النعمة التي منحتَني إيّاها—الذرية—لا تُثمر من غير رباطِ زواجٍ قويمٍ ذي فضلٍ وبرّ. وهذه النعمة الأخيرة ليست كسائر النعم. لذلك أختارها من جديد: ليحيَ ساتيافان. فبدون سيدي زوجي، أنا كالميتة.»

Verse 53

न कामये भर्तृविनाकृता सुखं न कामये भर्त॒विनाकृता दिवम्‌ । न कामये भर्तविनाकृता श्रियं न भर्तहीना व्यवसामि जीवितुम्‌

وقالت: «لا أرغب في سعادةٍ تُنال من دون زوجي. ولا أرغب حتى في الجنة إن كانت تُبلغ من دون زوجي. ولا أرغب في رخاءٍ يُتمتَّع به من دون زوجي. بل إنني، من غير زوجي، لا أعزم حتى على مواصلة الحياة.»

Verse 54

वरातिसर्ग: शतपुत्रता मम त्वयैव दत्तो ह्वियते च मे पति: । वरं वृणे जीवतु सत्यवानयं तवैव सत्यं वचनं भविष्यति

«أنتَ نفسُك منحتَني نعمةَ أن يكون لي مئةُ ابن، وأنتَ نفسُك من تأخذ زوجي إلى غير موضعه. لذلك أطلب هذه النعمة: ليحيَ ساتيافان؛ وبهذا تكون كلمتُك أنتَ صادقة.»

Verse 55

मार्कण्डेय उदाच तथेत्युक्त्वा तु तं पाश मुक्त्वा वैवस्वतो यम: । धर्मराज: प्रह्ृष्टात्मा सावित्रीमिदमब्रवीत्‌

قال ماركاندييا: «وبعد أن قال: “فليكن كذلك”، أطلق ياما فايڤاسڤاتا سراحه من الحبل. ثم إنّ ياما، ملكَ الدارما، وقد امتلأ قلبُه سرورًا، خاطب سافيتري بهذه الكلمات.»

Verse 56

मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! तदनन्तर “तथास्तु” कहकर सूर्यपुत्र धर्मराज यमने सत्यवानका बन्धन खोल दिया और प्रसन्नचित्त होकर सावित्रीसे इस प्रकार कहा-- एष भटद्रे मया मुक्तो भर्ता ते कुलनन्दिनि । (तोषितो<हं त्वया साध्थवि वाक्यैर्थर्मार्थसंहितै: ।) अरोगस्तव नेयश्न सिद्धार्थ: स भविष्यति

قال ماركاندييا: «يا يودهيشثيرا، ثم إنّ ياما—ابنَ الشمس وملكَ الدارما—قال: “تَثاستو: فليكن كذلك”، ففكَّ قيودَ ساتيافان. وبقلبٍ مسرور خاطب سافيتري قائلاً: “أيتها السيدة النبيلة، لقد أطلقتُ زوجَك. يا بهجةَ سلالتك، لقد أرضتني تمامًا كلماتُك المقرونة بالدارما وبالمقصد القويم. أيتها العفيفة، سيكون ساتيافان معافًى من السقم، مُنجَزَ المراد، صالحًا لأن تقوديَه عائدةً.”»

Verse 57

चतुर्वर्षशतायुश्च त्वया सार्धमवाप्स्यति । इष्ट्वा यज्जैश्व धर्मेण ख्यातिं लोके गमिष्यति

قال يَما: «بملازمته لكِ سينال عمرًا قدره أربعمائة سنة. وبعد أن يعبد الربّ بالقرابين، وبثباته على الدَّرما، سيمضي مشهورًا في العالم أجمع».

Verse 58

त्वयि पुत्रशतं चैव सत्यवान्‌ जनयिष्यति । ते चापि सर्वे राजान: क्षत्रिया: पुत्रपौत्रिण:,'सत्यवान्‌ तेरे गर्भसे सौ पुत्र उत्पन्न करेगा और वे सभी राजकुमार राजा होनेके साथ ही पुत्र-पौत्रोंसे सम्पन्न होंगे

قال يَما: «بسببكِ سيُنجب ساتيافان مئة ابن. وسيكونون جميعًا من الكشاتريا وملوكًا، وسيُرزق كلّ واحدٍ منهم أبناءً وأحفادًا».

Verse 59

ख्यातास्त्वन्नामधेयाश्व॒ भविष्यन्तीह शाश्वृता: । पितुश्न ते पुत्रशतं भविता तव मातरि

قال يَما: «في هذا العالم سيغدو أولئك الأبناء الذين يحملون اسمكِ مشهورين إلى الأبد. وفوق ذلك، من أبيكِ سيولد مئة ابن في رحم أمّكِ».

Verse 60

मालव्यां मालवा नाम शाश्रचताः पुत्रपौत्रिण: । भ्रातरस्ते भविष्यन्ति क्षत्रियास्त्रिदशोपमा:

قال يَما: «ولأنهم وُلدوا من أمّكِ مالَفِي، فسيُعرفون على الدوام باسم “مالَفا”. وسيكون إخوتكِ من الكشاتريا، موفورين بالأبناء والأحفاد، متلألئين بهيبةٍ كهيبة الآلهة.»

Verse 61

एवं तस्यै वरं दत्त्वा धर्मराज: प्रतापवान्‌ । निवर्तयित्वा सावित्रीं सस्‍्वमेव भवनं ययौ,सावित्रीको इस प्रकार वरदान दे प्रतापी धर्मराज उसे लौटाकर अपने लोकको चले गये

وهكذا، بعدما منحَ دارماراجا (يَما) الجبّار سافيتريَ العطية، جعلها تعود أدراجها، ثم مضى هو إلى مقامه الخاص.

Verse 62

सावित्र्यपि यमे याते भर्तारें प्रतिलभ्य च । जगाम तत्र यत्रास्या भर्तु: शावं कलेवरम्‌,यमराजके चले जानेपर सावित्री अपने पतिको पाकर उसी स्थानपर गयी; जहाँ पतिका मृत शरीर पड़ा था

فلما انصرف يَمَ، وكانت سافيتري قد استردّت زوجها، رجعت إلى الموضع نفسه الذي كان جسد زوجها الخالي من الروح ملقى فيه.

Verse 63

सा भूमौ प्रेक्ष्य भर्तारमुपसुत्योपगृह च । उत्सड़े शिर आरोप्य भूमावुपविवेश ह,वह पृथ्वीपर अपने पतिको पड़ा देख उनके पास गयी और पृथ्वीपर बैठ गयी, फिर पतिको उठाकर उसने उनके मस्तकको गोदीमें रख लिया

فلما رأت زوجها مطروحًا على الأرض أسرعت إليه واحتضنته. ثم وضعت رأسه على حجرها وجلست على التراب.

Verse 64

संज्ञां चस पुनर्लब्ध्वा सावित्रीम भ्यभाषत । प्रोष्यागत इव प्रेम्णा पुन: पुनरुदीक्ष्य वै

فلما عاد إليه وعيه خاطب سافيتري. وكالرجل العائد بعد غياب طويل، أخذ ينظر إليها مرة بعد مرة بمحبةٍ وحنان، ثم تكلم.

Verse 65

सत्यवानुवाच सुचिरं बत सुप्तो5स्मि किमर्थ नावबोधित: । क्व चासौ पुरुष: श्यामो यो5सौ मां संचकर्ष ह

قال ساتيافان: «وا أسفاه يا حبيبتي، لقد نمتُ زمنًا طويلًا. لِمَ لَمْ أُوقَظ؟ وأين ذلك الرجل الأسمر الذي جرّني بعيدًا؟»

Verse 66

सावित्रयुवाच सुचिरं त्वं प्रसुप्तोडसि ममाड्के पुरुषर्षभ । गत: स भगवान्‌ देव: प्रजासंयमनो यम:

قالت سافيتري: «يا خير الرجال، لقد نمتَ طويلًا على حجري. إن ذلك الرجل الأسمر كان يَمَ نفسه، ربًّا إلهيًّا يَكُفُّ الخلائق ويُنَظِّمُها؛ وقد انصرف الآن.»

Verse 67

विश्रान्तोडसि महाभाग विनिद्रश्न नृपात्मज । यदि शकक्‍्यं समुन्तिष्ठ विगाढां पश्य शर्वरीम्‌

قال يَمَا: «يا أيها الأمير السعيد الحظ، لقد استرحتَ، وقد انقضى نومُك أيضًا. فإن استطعتَ فانهض الآن وانظر—لقد تعمّق الليل واشتدّت ظلمتُه وكثُفت.»

Verse 68

मार्कण्डेय उदाच उपलभ्य तत: संज्ञां सुखसुप्त इवोत्थित: । दिश: सर्वा वनान्तांश्व निरीक्ष्योवाच सत्यवान्‌

قال ماركاندييا: «ثم إنه، وقد استعاد وعيه، نهض ساتيافان كأنه كان نائمًا نومًا هنيئًا. وأخذ ينظر حوله—إلى الجهات كلها وإلى أطراف الغابة—ثم تكلّم…»

Verse 69

फलाहारो<स्मि निष्क्रान्तस्त्वया सह सुमध्यमे । ततः पाटयत: काष्ठं शिरसो मे रुजाभवत्‌

«يا رشيقة الخصر، لقد خرجتُ من الدار معكِ لنجمع الثمار. ثم لما كنتُ أشقّ الحطب، نهض في رأسي ألمٌ شديد.»

Verse 70

शिरोऊ5भितापसंतप्त: स्थातुं चिरमशवनुवन्‌ । तवोत्सज्ले प्रसुप्तो5स्मि इति सर्व स्मरे शुभे

«يا ذات اليُمن، لقد عذّبتني حرارة الألم في رأسي فلم أستطع أن أبقى قائمًا طويلًا. “لقد غلبني النوم ورأسي على حجركِ”—كل ذلك أذكره الآن بوضوح، خطوةً خطوة.»

Verse 71

त्वयोपगूढस्य च मे निद्रयापहतं मन: । ततो<पश्यं तमो घोर पुरुषं च महौजसम्‌

«حين ضممتِني غلب النومُ على ذهني. ثم أبصرتُ ظلمةً مروّعة، وأبصرتُ أيضًا شخصًا عظيمَ البأس، مشعًّا بالنور.»

Verse 72

तद्‌ यदि त्वं विजानासि किं तद्‌ ब्रूहि सुमध्यमे । स्वप्लो मे यदि वा दृष्टो यदि वा सत्यमेव तत्‌

قال يَمَا: «إن كنتِ تعلمينه حقًّا، يا ذاتَ الخصرِ الرشيق، فأخبِريني—ما ذاك؟ أكان ما رأيتُه حُلْمًا فحسب، أم كان هو الحقَّ بعينه؟»

Verse 73

तमुवाचाथ सावित्री रजनी व्यवगाहते । श्वस्ते सर्व यथावृत्तमाख्यास्यामि नृपात्मज,तब सावित्री उनसे बोली--राजकुमार! रात बढ़ती जा रही है। कल सबेरे मैं आपसे सब बातें ठीक-ठीक बताऊँगी

ثم قالت ساڤيتري له: «يا ابنَ المَلِك، إن الليل يمضي. غدًا صباحًا سأقصّ عليك كلَّ ما جرى، كما وقع تمامًا، قصًّا كاملًا.»

Verse 74

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते पितरौ पश्य सुव्रत । विगाढा रजनी चेयं निवृत्तश्न दिवाकर:,'सुत्रत! उठिये, उठिये, आपका कल्याण हो। आप चलकर माता-पिताका दर्शन तो कीजिये। सूर्य डूब गये तथा रात घनी हो गयी है

قال يَمَا: «قُمْ، قُمْ—ليحلّ عليك الخير، يا ثابتَ العهد. اذهب وانظر إلى والديك وابرُرهما. لقد غابَتِ الشمسُ واشتدَّ ظلامُ الليل.»

Verse 75

नक्तंचराश्नरन्त्येते हृष्ट: क्रराभिभाषिण: । श्रूयन्ते पर्णशब्दाश्व॒ मृगाणां चरतां वने

قال يَمَا: «هذه الكائناتُ السائرةُ ليلًا تتحرّك هنا في نشوةٍ، وتتفوه بكلامٍ غليظ. وفي هذا الغاب يُسمَع حفيفُ الأوراق، تُثيره أقدامُ الأيائل وهي تجول.»

Verse 76

एता घोरं शिवा नादान्‌ दिशं दक्षिणपश्चिमाम्‌ । आस्थाय विरुवन्त्युग्रा: कम्पयन्त्यो मनो मम,“दक्षिण और पश्चिमके कोणकी दिशामें जाकर ये उग्र सियारिनें भयंकर शब्द कर रही हैं, जिससे मेरा हृदय काँप उठता है

«هذه بناتُ آوى الشرساتُ قد اتخذنَ لهنّ مقامًا في الربعِ الجنوبيّ الغربيّ، ورفعنَ عواءً مروّعًا؛ إن عواءهنّ المشؤوم يُرجِفُ قلبي ويُزلزلُ خاطري.»

Verse 77

सत्यवानुवाच वन॑ प्रतिभयाकारं घनेन तमसा55वृतम्‌ । न विज्ञास्यसि पन्थानं गन्तुं चैव न शक्ष्यसि

قال ساتيافان: «يا حبيبتي، إن هذا الغاب يبدو حقًّا مُرعبًا، وقد غمرته ظلمة كثيفة. في مثل هذا الوقت لن تقدري على تمييز الطريق، ولن تستطيعي المضيَّ قُدُمًا».

Verse 78

सावित्रयुवाच अस्मिन्नद्य वने दग्धे शुष्कवृक्ष: स्थितो ज्वलन्‌ । वायुना धम्यमानोजअत्र दृश्यतेडग्नि: क्वचित्‌ क्वचित्‌

قالت ساڤيتري: «لقد لُفِحَت هذه الغابة اليوم بالنار. ها هنا شجرة يابسة قائمة ما تزال تحترق؛ وإذا هبّت الريح بدا اللهيب فيها يلمع هنا وهناك».

Verse 79

ततो<ग्निमानयित्वेह ज्वालयिष्यामि सर्वतः । काष्ठानीमानि सन्तीह जहि सन्‍्तापमात्मन:,वहींसे आग ले आकर मैं सब ओर लकड़ियाँ जलाऊँगी। यहाँ बहुत-से काठ-कबाड़ पड़े हैं। आप मनसे चिन्ता निकाल दीजिये

«ثم سأجلب النار إلى هنا وأُشعلها من كل جانب. فهنا حطب كثير؛ فاطرح عن قلبك القلقَ المُحرق.»

Verse 80

यदि नोत्सहसे गन्तुं सरुज॑ त्वां हि लक्षये । न च ज्ञास्यसि पन्थानं तमसा संवृते वने

قال يَما: «إن لم تكن لكِ طاقةٌ على المضيّ—فإني أراكِ تتألّمين—وإن كنتِ في هذه الغابة المجلَّلة بالظلام لا تقدرين حتى على تمييز الطريق، فبموافقتكِ لننطلق نحن الاثنان إلى الدار غدًا عند الفجر، حين تتضح الأشياء كلها في الغياض. يا طاهرةَ السيرة، إن شئتِ فلنقم هنا ليلةً واحدة.»

Verse 81

श्वः प्रभाते वने दृश्ये यास्थावो 5नुमते तव। वसावेह क्षपामेकां रुचितं यदि तेडनघ

قال يَما: «غدًا عند الفجر، حين تتضح الغابة للعين، نمضي—إن أذنتِ. يا طاهرةَ السيرة، إن شئتِ فلنقم هنا ليلةً واحدة.»

Verse 82

सत्यवानुवाच शिरोरुजा निवृत्ता मे स्वस्थान्यज्राननि लक्षये | मातापितृभ्यामिच्छामि संगम त्वत्प्रसादजम्‌

قال ساتيافان: «يا حبيبتي! لقد زال صداع رأسي، وأرى أن أعضائي كلها قد عادت إلى مواضعها سليمة. والآن، بفضل نعمتك ورحمتك، أودّ أن ألتقي بأبي وأمي.»

Verse 83

न कदाचिद्‌ विकालं हि गतपूर्वो मया55श्रम: । अनागतायां सन्ध्यायां माता मे प्ररुणद्धि माम्‌

قال يَما: «ما ذهبتُ قطّ من قبل إلى المحبسة في وقتٍ غير لائق. غير أنّ أمي اليوم، وقبل أن يحلّ الشفق، تمنعني وتحبسني.»

Frequently Asked Questions

Whether concealment can remain consistent with dharma: the Pandavas must balance truthfulness and openness against the lawful requirement of secrecy to complete the exile terms and prevent adversarial exploitation.

Adversity does not negate righteous identity; disciplined secrecy, when oath-bound and oriented to protection rather than harm, can be an ethically valid means to preserve dharma and enable future restoration.

Rather than a formal phalaśruti, the chapter supplies a justificatory frame: exempla from divine and exemplary figures function as interpretive guidance, positioning ajñātavāsa as a sanctioned method within the epic’s broader dharma discourse.

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