Aṣṭāvakra–Bandi Vāda at Janaka’s Assembly
Numerical Cosmology and Restitution
(एष राजा संश्रवणे स्थितस्ते स्तुहोनं त्वं वचसा संस्कृतेन । स चानुज्ञां दास्यति प्रीतियुक्तः प्रवेशने यच्च किंचित् तवेष्टम् ।।) ये नरेश तुम्हारी बात सुन सकें, इतनी ही दूरीपर यज्ञमण्डपमें स्थित हैं, तुम अपने शुद्ध वचनोंद्वारा इनकी स्तुति करो। इससे ये प्रसन्न होकर तुम्हें प्रवेश करनेकी आज्ञा दे देंगे तथा तुम्हारी और भी कोई कामना हो तो वे पूरी करेंगे ।। अष्टावक्र उवाच भो भो राजञ्जनकानां वरिष्ठ त्वं वै सम्राट् त्वयि सर्व समृद्धम् । त्वं वा कर्ता कर्मणां यज्ञियानां ययातिरेको नृपतिर्वा पुरस्तात्,अष्टावक्र बोले--राजन्! आप जनकवंशके श्रेष्ठ पुरुष हैं, सम्राट हैं। आपके यहाँ सभी प्रकारके ऐश्वर्य परिपूर्ण हैं, वर्तमान समयमें केवल आप ही उत्तम यज्ञकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले हैं; अथवा पूर्वकालमें एकमात्र राजा ययाति ऐसे हो चुके हैं
aṣṭāvakra uvāca | bho bho rājan janakānāṃ variṣṭha tvaṃ vai samrāṭ tvayi sarva-samṛddham | tvaṃ vā kartā karmaṇāṃ yajñiyānāṃ yayātir eko nṛpatir vā purastāt ||
«إنّ الملك قائمٌ في مَندَبِ اليَجْنَة على مسافةٍ يسمع فيها كلامك. فامدحه بقولٍ مُهذَّبٍ طاهر؛ فيرضى ويمنحك الإذن بالدخول، ويقضي لك أيضًا ما تشتهي إن كان لك مطلبٌ آخر.» وقال أَشْطافَكْرَة: «يا أيها الملك، يا أرفعَ آلِ جَنَكَة، إنك لَسُلطانٌ حقًّا؛ وفيك تكتمل وجوهُ الازدهار. في هذا العصر أنت وحدك القائم بأعمال القربان والبرّ؛ وإلا ففي الأزمنة السالفة لم يكن مثلُك إلا الملكُ يَياَتي.»
अष्टावक्र उवाच