कामबन्धन-निवृत्ति तथा शान्तिलक्षण-उपदेशः | Release from Desire-Bondage and the Marks of Peace
जो धार्मिकताका ढोंग दिखानेके लिये अपने नख और बाल बढ़ाकर आया हो, अपने ही मुखसे अपने किये हुए धर्मका विज्ञापन करता हो, अकारण अन्निहोत्रका त्याग कर चुका हो अथवा गुरुके साथ कपट करनेवाला हो, ऐसा मनुष्य भी गृहस्थके घरमें अन्न पानेका अधिकारी है। वहाँ सभी प्राणियोंके लिये अन्न-वितरणकी विधि है। जो अपने हाथसे भोजन नहीं बनाते, ऐसे लोगों (ब्रह्मचारियों और संन्यासियों) के लिये गृहस्थ पुरुषको सदा ही अन्न देना चाहिये ।। विघसाशी भवेन्नित्यं नित्यं चामृतभोजन: । अमृतं यज्ञशेषं स्थाद् भोजनं हविषा समम्,गृहस्थको सदा विघस और अमृत अन्नका भोजन करना चाहिये। यज्ञसे बचा हुआ भोजन हविष्यके समान और अमृत माना गया है
vighaśāśī bhavennityaṃ nityaṃ cāmṛtabhojanaḥ | amṛtaṃ yajñaśeṣaṃ syād bhojanaṃ haviṣā samam ||
قال فياسا: حتى من جاء وقد أطال أظفاره وشَعره ليُظهر تديّنًا مُتكلَّفًا؛ أو من يعلن بلسانه ما صنعه من «دَرْمَا»؛ أو من ترك الأَغْنِيهوترا بلا سبب؛ أو من يخادع معلّمه—فإن مثل هذا أيضًا له حقّ الطعام في بيت ربّ الأسرة. فهناك شريعةٌ لتوزيع القوت على جميع الكائنات. ولمن لا يطبخون بأيديهم (كالبراهمتشاريين والسنّياسيين)، على ربّ البيت أن يطعمهم دائمًا. وعلى ربّ الأسرة أن يأكل على الدوام «فيغاسا»—وهو ما يبقى بعد إطعام الآخرين—وأن يداوم على أكل ما يُسمّى «أَمْرِتَا». فإن الطعام المتبقي من القربان يُعدّ أَمْرِتَا، وأكله بمنزلة أكل «هَفِس»؛ أي طعام الأضحية المقدّس.
व्यास उवाच