अश्रुपूर्णमुखो राजा निःश्वसंश्व पुनः पुनः । कश्मलं प्राविशद् घोरं दृष्टवा कर्णस्य विक्रमम्,इस प्रकार भीमको आदेश देकर राजा युधिष्ठिर बारंबार सिसकते हुए अपने रथपर जा बैठे। उस समय उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी। वे कर्णका पराक्रम देखकर घोर चिन्तामें डूब गये थे
وكان الملك ووجهه مغمورًا بالدموع، يزفر زفراتٍ متتابعة. ولمّا رأى بأس كارنا دخلته حيرةٌ مروّعة واضطرابٌ شديد.
संजय उवाच